संसार पार

नाना जीवों की मातृ गर्भ, निज अटल करम वश सोया हूं।
पाया तो कुछ भी नहीं नाथ केवल सब कुछ मैं खोया हूं।।
अब कृपा आपकी नारायण जब हुई मनुज तन मिली त्रिगुण।
उन भिन्न-भिन्न तन के विभिन्न लेकर जन्मा हूं गुण अवगुण।।

मानव शरीर है पृथक् सभी में यह विशिष्ट आया विचार।
माता के गर्भ शयन में था नाना देहों का ज्ञान भार।।
हे नारायण हे गुरो हरे तव करुणा कृपा अपार मिली।
तब पूर्व शरीरों के अशुद्ध संस्कार धुले हृत्कली खिली।।

अब भक्त भागवत कथा रास रस रमण चित्त में वृत्ति हुई।
तब आकर सब गुण आकर हरि बैठे भववृत्ति निवृत्ति हुई।।
दास विन्ध्येश्वरि बार बार बलि जाता गुरु चरनन अपार।
बनी रहे करुणा वत्सलता करिये एहिं संसार पार।।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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