मति निर्मल

पश्चिम का भोग रुचिकर सबको लुभाता है।
माया अविद्या के भ्रमर में घुमाता है।।
घोर अन्धकार करे कलियुग लहराता है।
जीवन के कारण सभी युगों से मम नाता है।।


कलि का है अर्थ कलह।
प्रेम प्रणति जाता बह।।
आगे की परिस्थिति कठिन होती जायेगी।
मानव की आयु दश पंच रह जायेगी।।


इसलिए कि भोग से हों रोग प्रबल बलशाली।
ऐन्द्रिकसंयम छोड़े बनते बर्बर पशु खाली।।
मानव गिरता जाता भूला हुआ स्वयं का पथ।
स्रक् चन्दन सुन्दरी आकर्षक हैं मन्मथ।।


शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध विषय मारते।
इनमें लगी आसक्ति ये सब हैं जारते।।
माया अविद्या का घनघोर दावानल।
लगी है प्रचण्ड आग जाते सब जल जल।।


इसीलिए गुरु हैं अनिवार्य सबके जीवन में।
नहीं तो यह जीव फॅंसे भटके वन वन में।।
माता गुरू पिता गुरू शिक्षक गुरू होते हैं।
इसी संसार के व्यवहार बीज बोते हैं।।


लेकिन इन सबसे अलग हैं दीक्षा गुरू मुक्त।
भारत ऋषि भूमि में कर देते हैं जीवन्मुक्त।।
भारत रहा है विश्व गुरु प्रमाण वेद बोले।
माया अविद्या बन्ध बन्धन के पाश खोले।।


ऐसे ही गुरुजन ब्रह्मा विष्णु रुद्र ब्रह्मरूप।
विस्मृत स्वस्वरूप जीवों को करें विश्वरूप।।
व्यास गूरुपूर्णिमा पर है विशेष श्रद्धानति।
गुरुपदपंकजध्यान विषयों से होये विरति।।


“दासविन्ध्येश्वरी” बलिहारी गुरुचरणकमल।
श्रीमलूक-अग्रपीठस्वामी कुरु मति निर्मल।।


गुरुहरिसन्तः शरणम्
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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