अकारण करुणा वरुणालय भगवान् ने एक और अवसर मुक्त होने के लिए प्रदान किया है। यह अवसर मानव जन्म के रूप में हम समी को प्राप्त है। लेकिन शरीर संसार और तज्जन्य कामनाओं ने हमें भटका दिया है। इसलिए कुछ गुरुशास्त्रसमम्मत बातों पर अडिग रहकर हम यह जीवन कृतार्थ कर सकते हैं।
शतं विहाय भोक्तव्यं,सहस्रं स्नानम् आचरेत्।
लक्षं विहाय दातव्यं,कोटिं त्यक्त्वा हरिं स्मरेत्।।
सैकड़ो काम छोड़कर भोजन करे। हजारों काम छोड़कर स्नान करना चाहिए। लाखों काम छोड़कर दान करे और करोड़ों काम छोड़कर हरि स्मरण करे। हरि स्मरण ही श्रेयस्कर है।
मतलब कि, भोजन, स्नान,दान,हरिस्मरण की उत्तरोत्तर श्रेष्ठता है।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते!
उमा कहहुं यह अनुभव अपना।
सत हरिभजन जगत सब सपना।।
उमा राम सुभाव जेहिं जाना।
ताहि भजन तजि भाव न आना।।
राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा।
थल विहीन तरु कबहुं कि जामा।।
बिनु सन्तोष न काम नसाहीं।
काम अछत सुख सपनेहुं नाहीं।।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनम् आत्मनः।
कामः क्रोधः तथा लोभः तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत्।।
नारायण! कामना ही जगत् में बन्धन का मूल है। इसलिए गुरु शास्त्र सम्मत नित्य कर्मानुष्ठान और नियम पालन करे। स्वयं कोई संकल्प (कामना) न करे।
सब संकल्प श्रीमन्नारायण पर छोड़ दें। जाही विधि राखें राम वाही विधि रहिए। सीताराम सीताराम सीताराम कहिए।
बिनु सतसंग न काम नसाही।
काम अछत सुख सपनेहुं नाहीं।।
नयी नयी नित नूतन आशा।
नहीं जीव की यह परिभाषा।।
आशा तृष्णा काम मुक्ति की।
प्रभु सन्तन के चरण भक्ति की।।
इसलिए प्रथम भगति सन्तन कर संगा।
गुरु-हरि-सन्तःशरणम्
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