माघ के कुम्भ मेला में जाने वाले सन्त महात्मा विशेष कोटि के टकसाली महात्मा होते हैं। मेरे जैसे अड़िया खड़िया साधु का वहां क्या काम। दूसरे यह भी कि पुण्यार्जन लाभ का भी कोई लोभ नहीं।
पूज्य भक्तमाली प्रातः स्मरणीय श्रीगणेशदास भक्तमाली महाराज ने कहा।
इसके पहले अपने दीक्षागुरु भगवान् श्रीअग्रपीठाधीश्वर एवं मलूकपीठाधीश्वर ने पूज्य भक्तमाली जी से प्रयाग माघ मेला दर्शन की इच्छा व्यक्त की थी,इसी बात पर पूज्य चरण के अत्यंत सरल उद्गार हैं ये।
यह बात सन् उन्नीस सौ नब्बे के आसपास की है। उक्त प्रसंग पूज्य भक्तमाली जी महाराज की अकिंचनता और सच्चे साधुभाव का उदाहरण है। इन पंक्तियों का लेखक यह विन्ध्येश्वरीदास ऐसे प्रकरण का स्मरण करके रोमांचित हो जाता है।
उस समय अपने मलूकपीठाधीश्वर महाराज जी युवावस्था में थे और श्रीभक्तमाली जी के संरक्षण में पठन पाठन में संलग्न रहा करते थे। अपने मलूक वाले महाराज जी इसके पहले कभी भी कुम्भ मेला में नहीं गये थे,अतः इनकी प्रयाग कुम्भ दर्शन करने की उत्कट अभिलाषा थी।
बात तब की है जब श्रीभक्तमाली जी एवं अपने गुरुदेव, गुरु-शिष्य परम्परा में उस समय सुदामा कुटी, श्रीधाम वृन्दावन में विराजते थे।
यहां एक से बढ़कर एक सन्तों महात्माओं का आवागमन बराबर होता था।
किन्तु पूज्य दादा गुरुदेव कुछ अलग ही स्वरूप के महात्मा थे। अमानी रहकर दूसरों को मान देने वाले,जीवन भर एक इंच भूमि का भी संग्रह न करने वाले,संग्रह-परिग्रह से दूर रहने वाले ऐसे अपने अनन्तश्रीविभूषित गणेशदास भक्तमाली जी महाराज साधुता की जीवन्त मूर्ति थे।
साधुता की मूर्ति थे वे सरल स्वभाव सिद्ध
परम सन्तुष्ट निर्मल अन्तःकरण राजते।
लोकालोका वस्तुओं की कामना की गन्ध नहीं
रहते प्रसन्न सदा औरन के काजते।
वेद वेदान्त न्याय व्याकरण गीता भागवत की शिक्षा में प्रवीण वे अहर्निश विराजते।
श्रीमलूक वाले महाराज के भी महाराज श्रीगणेशदास भक्तमालमाली छाजते।
तुलसी के अनुपम नवावतार ऐसे सन्त,चरनन में परा रहूं छांड़ि सब काजते।
गुरुःशरणम्
shishirchandrablog.in