नान्ये जानन्ति तत्वतः

प्रेम संसारी वस्तुओं से प्रायः होता है,जो कि सकाम पंकिल मलिन वासना का फलन है। किन्तु यही प्रेम यदि गुरुभगवत् भागवत कृपा से कामनातीत हो जाय,तब प्रेम रूप भगवान् ही दृष्ट होंगे।
वैष्णवी परम्परा में देवर्षि नारद ने प्रेम को इस जीवात्मगत ,भक्ति को ही परमप्रेमरूपा कहा है। प्रेम और आनन्द पृथक् नहीं, तत्वतः एक ही हैं। भक्ति का व्याख्यान करते हुए, कहते हैं कि-
अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः।
सा तु अस्मिन् परमप्रेमरूपा।
अमृतस्वरूपा च।
मतलब कि वह भक्ति ही प्रेम और अमृत है,जो ईश्वर के लिए ईश्वर से ईश्वरप्राप्ति हेतु की जाय।
वस्तुतः लौकिकी वासना मृत्यु और ईशवासना अर्थात् प्रेम अमृत है।प्रेम प्रेमी और प्रेमास्पद की त्रिपुटी, नित्य सुयोग अमरत्व है।इस प्रेम में भोग नहीं, बल्कि निष्काम कामना का सुखद सुन्दर सुयोग है।

चाहौं न सुगति सुमति संपति कछु रिधि सिधि बिपुल बड़ाई। हेतुरहित अनुराग रामपद बढ़ुअनुदिन अधिकाई।।
महाराज जनक ने श्रीरामलक्ष्मण को अति अनुराग कहते हुए, प्रेम ही कह डाला-
इन्हहिं बिलोकत अति अनुरागा।बरबस ब्रह्मसुखहिं मन त्यागा।
नारद जी ने इस प्रेम को वाणी से परे कहा-
अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्।
मूकास्वादनवत्।
भैया, प्रेम और आनन्द वस्तुतः समानार्थी हैं। इसलिये कि,प्रेम भी भगवान् और आनन्द भी भगवान्,जो आनन्द सिन्धु सुखराशी।
हनुमान् जी महाराज जब जगदम्बा जानकी को भगवान् का सन्देश सुनाते हैं, तब कहते हैं-
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।जानत प्रिया एक मन मोरा।।
सो मन सदा रहत तोहिं पाहीं।
जानु प्रीति रस एतनेहिं माहीं।।
प्रेम की अनुभूति मन से होती है।और मन रहता है, प्रेमी के पास।तब मन जब प्रेमी में चला गया,तो कौन उस मन के अभाव में प्रेम का वर्णन करेगा। जब प्रेम रूप आनन्द रूप प्रभु ने मन को आकृष्ट कर लिया,तो ज्यों गूँगे मीठे फल को रस अन्तरगत ही भावै,की विचित्त दशा सृष्ट हो गई, और ऐसी सृष्टि हो जाने पर प्रेमी तो प्रेमानन्द में डूब ही गया समझो।
नारायण, हरिगुरुसन्त कृपा से ऐसे प्रेम और आनन्द में डूबने का अवसर मिलता है।
और जब कोई भाग्यशाली उस अनन्त परम प्रेम आनन्द में डूब गया,तो अनुभव तो करेगा,किन्तु मन के अभाव में परम प्रेम के प्रभाव में बोलना सम्भव नहीं है-

डूबै सो बोलै नहीं, बोलै सो अनजान।गहरो प्रेम समुद्र कोउ,डूबै चतुर सुजान।

प्रेममूर्ति भरत जी ने,अरथ न धरम न काम रुचि,गति न चहौं निरबान।जनम जनम रति रामपद,यह बरदान न आन,
कहकर इसी प्रेमानन्द को रामचरनरति,कह डाला था,और मार्ग में त्रिवेणी से,इसी रामचरनरति प्रेम की ही याचना की।नारायण, प्रेममूर्ति भरत जी और तद्वत् ठीक उसी तरह श्रीराम जी का प्रेम तो ब्रह्माविष्णुमहेश भी,कह सकने में असमर्थ हैं।
अगम सनेह भरत रघुबर को।
जहँ न जाइ मन बिधि हरिहर को।।
भरत जी का प्रेमानन्द और गोपियों का भी,प्रेमी सन्तों की वाणी का आश्रय लेकर यत्किंचित् कहा जा सकता है,समग्र तो उस समग्र के वश में है।
गोपियों का भगवान् के प्रति यही प्रेमानन्द सिन्धु उमड़ आया था।जब उद्धव जी की बातें सुनकर उन्होंने कहा था –
ऊधो मन न भए दस बीस।एक हु तौं सो गयौ श्याम संग,को अवराधे ईश।
और भगवान् जो स्वयं परम प्रेमानन्द स्वरूप ही हैं, उन्होंने आत्मतत्व की तज्ञा,गोपियों को ही कह डाला-
भगवान् का माहात्म्य, पूजा और तत्प्रति श्रद्धा, मनोगत भाव को गोपियों के सिवा कोई नहीं जान पाया-
मन्माहात्म्यं मत्सपर्यां मच्छ्रद्धां मन्मनोगतं।जानन्ति गोपिकाः पार्थ नान्ये जानन्ति तत्वतः।।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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किमाश्चर्यमतः परम्


हरिश्शरणम्


विषयाकर्षण का विकर्षण और किसी साधन से उतना सम्भव नहीं, जितना रामकृष्ण नारायण हरि नामों से हुआ, हो रहा और होगा।
विषयाकारवृत्ति नाना शरीर गत जन्म जन्मान्तर सिद्ध है।
अनेकजन्मार्जित जगद् वासनाक्षय का सरल साधन भगवन्नाम ही सन्त शास्त्र माने हैं। सन्त सबै गुरुदेव हैं, यह रसिकन की रीति।
दत्तात्रेय भगवान् ने तो सृष्टि के नाना उपादानों को गुरुरूप मान कर जो गुरूपसत्ति की गरिमा का उत्कर्ष दर्शन कराया,वह सनातन का निकष निदर्शन है। सोचिये जिन सन्तों की भगवदाकार चित्तवृत्ति है,वही तो विषयाकारवृत्ति को क्षणमात्र में हटा सकते हैं।
गुरुकृपावलम्बावलम्बन ही नेत्रों से निरन्तर प्रविशमान जगद् का बन्ध करेगा। कानों से श्रूयमाण वाग्वैखरीझरी के झर झर प्रपात का स्रोत ही सुखा देगा।
वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां का प्रवर्तन तो सन्तसद्गुरु सज्जन संग ही साधेगा। संग्रहपरिग्रह से दूर सन्तों की कृपा करुणा का प्रवाह, बहा देगा संसारविषय विष की सरिता को।राम नाम
हरि नाम कृष्ण नाम नारायण नाम की बहती अजस्र निर्मल धारा जो देवर्षि की कलकल अजस्र वीणा के नाद को अनुसरती चली चल रही और अनन्त तक चलती रहने वाली है,वह तो किसी किसी भाग्यशाली को अवश्य ही, हृदयंगम होकर तारती जगदुद्धारती चल रही है,सभी को नहीं। अब देखिये कि क्यों नहीं होता विषयों से विराग।
इसलिये कि जगद् राग भोग भी उन्हीं भगवान् का लीला विलास है।
यह लीला विलास अनन्त काल से एक प्रहेलिकावत् बना हुआ है।
शास्त्रसन्त इस लीला को भगवान् की दुर्धर्ष माया का विस्तार मानें हैं।
समझ की बात महाकवि कालिदास ने इस सन्दर्भ में रखी,जब उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति रघुवंश में रघुवंशी राजाओं
को यौवने विषयैषिणां कहा।
उन्होंने रघुवंशी राजाओं को शैशव में ही सर्वविद्याभ्यासी, यौवन में सृष्टि विस्तार मात्र के लिए विषमविषयसेवी,वृध्दावस्था में मुनिवृत्ति से रहनेवाले और अन्त में योगविधि से शरीरान्त करने वाले बता कर
सनातन धर्म की सनातन प्रवहमान मर्यादा प्रस्तुत की है।
शैशवेभ्यस्तविद्यानां,यौवने विषयैषिणाम्।
वार्धक्ये मुनिवृत्तीनां,योगेनान्ते तनुत्यजाम्। एवम्भूतानां रघूणां वंशं वक्ष्ये।

अब देखिये, इस मायिक जगत् में सृजन परम्परा अक्षुण्ण रखने हेतु ही गृहस्थ धर्म स्वीकार कर विषयसेवन की बात कही गई,इसके पहले और बाद में भी नहीं।
यह खुला रहस्य आज सबके सामने है, किन्तु दुर्भाग्य हमारा जो मनुष्य शरीर पाकर, समझ कर भी समझे नहीं।
कबहुँक करि करुना नर देही देत ईश बिनु हेतु सनेही, की कृपाकरुणा को ठुकरा रहें हैं। तुलसी जैसे महापुरुषों का चरणाश्रय लेकर, आत्मोद्धार और कहिये कि अपने परम कल्याण के लिये रामनाम जपादि सरलतम साधनों से संसृतिचक्र से मुक्त होना जाना चाहिए।
भैया,भगवान् का नाम सर्वसुलभ है।
रसना हमारी वशवर्ती है।फिर भी जगद् बन्धक्षय सुलभ होकर भी दुर्लभ है।इससे बड़ा और कोई आश्चर्य नहीं।
सुलभं भगवन्नाम जिह्वा च वशवर्तिनी।
तथापि नरकं यान्ति किमाश्चर्यमतः परम्।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।


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काशते काशिका

यस्य मानं गतं यन्मनो निर्मलं
श्रीगुरोः श्रीहरेर्वै कृपाशक्तितः।
तस्य काशीं गतं नागतं का कथा।

यस्य बुद्धिर्विवेके चरत्यनुदिनं
श्रीहरेर्हारिणी सा कृपालम्बिता।
तस्य काशीं गतं नागतं का कथा।

यस्य चित्तं गतं श्रीगुरोर्नीरजे
गन्धमत्तं प्रमत्तं क्षणं प्रतिक्षणम्।
तस्य काश्यामयोध्यां गतं नागतम्।

यज्जगत्कारणं सद्रजस्तामसं
ईश्वरीशक्तिकां जातजातां पराम्।
तस्य काशीं गतं नागतं का कथा।

कर्मजालानुबद्धा वयं जीवकाः
श्रीगुरोरम्बुजान् मे मतिर्मानिता।
तस्य काश्यामयोध्यां गतं नागतम्।

यद्यहङ्कारमूढं मतं मद्गतं
श्रीगुरोः श्रीहरेः तद्दयाशीलतः।
तस्य काशी पुरः काशते काशिका।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।


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सदा अनुरागो

देव प्रतिष्ठित मन्दिर माहीं।
अन्तःकरण शुद्ध करि जाहीं।।

मन्दिर जाकर करै याचना
कहो मनुज वह साँच साँच ना

हरि कर कृपा जाहि पर होती।
सन्तगुरू मिलते तब मोती।।

मन अशुद्ध संसार परक है।
दीखे जगत जगत नरक है।।

बुद्धि मलिन कुविचार परी है।
हृदय माहिं अविवेक भरी है।।

चित्त चेतता जगत पदारथ।
कैसे क्यों सोचै परमारथ।।

हरिगुरुसन्त जिन जगत न रागा। ते सब भै हरिहर अनुरागा।।

अहं बुद्धि ममता नहिं छूटै।
क्या संसार वासना टूटै।।

अपने हृदय बसत संसारा।
कानन प्रविशे देखु अपारा।।

राम राम जपु प्रतिपल माहीं।
शुद्ध मनः बुधि चित्त तदा हीं।।

और न कलि यहिं साधन देखो। जप करि राम हरीहर लेखो।

कैसे हो अपरोक्ष आत्मगत।
स्वयं स्वतः है परम आत्मरत।।

सुख दुख सब है मनः भ्रमागत। मन कर शुद्धि राम नामागत।।

अतः जाहु गुरु सबद विचारौ।
शबद टेकि संसारहु टारौ।।

तुलसी सूर कबीर गहो पद।
तब वैराग्य भगै सारा मद।

संगासक्ति सबहिं विध त्यागो।
संगति साधु सदा अनुरागो।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्


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भक्तजनैरनुभूयते

यदि समस्तमिदं जगतीतलं
तव स्वरूपमहो प्रभु दृश्यते।
तदनु कारणमामनुते मनः
तव कृपाकरुणा परिसिद्ध्यति।।

यदि मयि प्रति ते द्रवते मनः,
तदिह चेतयते मम चेतना।
त्वमिह सिद्ध्यसि हेतुरवश्यता
जननि रामरमे शिववासने।।

यदि विनिश्तितबुद्धिरभून्मता
भवसि कालकलाकुलिता कले।
सकलसज्जनसज्जितधारणे,
धरणि धाम्नि धराधरिता कृपा।।

अधरधारितहास्यविशेषता,
सविधि ये परिभूय परिस्थिता।
परमपारपरे परितः स्थितिः,
तव विलोक्य जनाः विवशीकृताः।।

स्ववशहारविहारविचित्रता,
जनितमादनमोदमदा मता।
तव सुदर्शनदर्शनदिव्यता,
समनुभूय जगत् परिभाव्यते।।

यदि जने भविता करुणाकृपे
हृदि गतं रसनं स्रवते शुभे।
तव स्वभावविभावविभाव्यते,
सकलभक्तजनैरनुभूयते।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्

https://shishirchandrablog.in/2023/11/03/भक्तजनैरनुभूयते/

पूछ लीजिए ज्ञान

रावण रजोगुण काम अहम् का दास था। राम विशुद्ध सत्व प्रजाकाम और कर्ता कारयिता होकर भी मर्यादा धर्म के विग्रह थे।

शंकर सहस विष्नु अज कोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।

ब्राह्मण वंशी होकर वेदज्ञ होकर भी यदि विद्या मद दम्भ दर्प और अतिमानिता है, तो समझो वह ब्राह्मण क्या, एक अदद मनुष्य भी नहीं।

अतः रावयति अर्थात् जन्म जन्मान्तर तक रोने धोने वाले संसार में ढकेलने वाले असद् भाव को धारण करनेवाला रावण है। वह प्रवृत्ति मार्ग से भगवत् प्राप्ति कामी था।प्रवृत्ति मार्ग से भगवत् प्राप्ति शास्त्र निषिद्ध है। श्रीराम दूत हनुमानजी महाराज जैसे ज्ञानिनाम् अग्रगण्यं की प्रथम अवहेलना ही,उसके पुनः पुनः वध की अवाध परम्परा सिद्ध करती है।

जो अपराध भगत कर करई। रामरोष पावक सों जरई।।

कोई जाति ब्राह्मण होने पर भी दानवता प्रतिमूर्ति होने पर ,बधार्ह ही है। और रही बात कुशासन मूर्तिमन्त लोभवन्त दुःशासन दुर्योधनों जैसों की,तो भगवान् ने द्रौपदी की करुणा से द्रवित होकर वस्त्रावतार ही ग्रहण कर लिया था।

यतः कृष्णः ततो जयः।

अधर्मी रावण भी और दुर्योधन भी। एक अभिमानमूर्ति और दूसरा राज्य लोभ मूर्ति।हमारी अपनी छोटी बुद्धि, अपनी सीमा में यही निर्णय कर पाती है कि, काम बड़ा अधर्म है और लोभ किंचित् छोटा अधर्म।काम का सन्यास यही कि, भगवत् काम हो जाय। और लोभ का सन्यास यही की भगवत् चरणारविन्द लोभी हो जाय।

हम जन्म जन्मान्तर की अपनी मलिन वासना से सही निर्णय पर नहीं पहुँच पाते।सुविचारित सुसंगत का तो, निर्णय सती बुद्धि करती है, असती कभी नहीं। अतः रावण को सहज भाव से दुर्योधनादि कंस की श्रेणी में रखना अयुक्तिक है।

इसलिये आज रावण को ब्राह्मण वंशीय कहकर महिमा मण्डित पण्डित वेदज्ञ कहकर कालिक परम्परा में जातिगत आक्षेप ठीक नहीं। शास्त्र सन्त और सद्गुरु जात्यापेक्षी नहीं हैं।सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म ही वस्तुतः ब्राह्मणत्व है,जाति नहीं।

नैव जातिः ब्राह्मणत्वम्, अपितु ब्रह्मवित्वं ब्राह्मणत्वम्। सर्वोपकारित्वं ब्राह्मणत्वम्।

इसलिये जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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सद्गुरु संग पवाइये

नारायण नारायण नारायण कामलीलासक्त हम जैसे लोग जब, वेद देव सन्त समर्थ सद् गुरु चरणाश्रय ग्रहण करें तभी सन्मार्ग मिले।अत्यन्तवैराग्यवान् गुरुभगवान् ही कामादि हटायेंगे, जिनका कि हट चुका है। विषयविष बन्ध निर्मुक्तसाधु भक्त का पादाश्रय ही स्वर्गापवर्गासक्त भाव हटायेगा। जगत् का मान सम्मान पद पदार्थों की रुचि तो बारम्बार पार्थिव देहों में जीव को डालेगा ही।कालकर्म और ऐन्द्रिक ग्राहकों ने मुझे आजन्म घेर लिया है।जब मैं उनके हाथ बिकना,स्वीकार नहीं करता, तब वे मुझे बाँधकर,दाम दिखाते हैं।मतलब कि जैसे तैसे लालच दिखाकर अपने वश में करना चाहते हैं।कालकरमइन्द्रियविषय गाहकगन घेरो।हौं न कबूलत,बाँधि कै मोल करत करेरो – विनयपत्रिका पद 146

हे प्रभु जहाँ सत्संग कथा माधव की होती है, वहाँ मन जाता ही नहीं।लोभ मोहादि से मुझे प्रेम है।जहँ सतसंग कथा माधव की, सपनेहुँ करत न फेरो।लोभ मोह मद काम कोह रत,तिन्ह सों प्रेम घनेरो -वही पद -143

इसलिये हे नाथ साधुसद्गुरु संग देकर संसारद्वन्द्व भगाइये और अपनेचरणकमलों में ही राग दे दीजिये, तभी पार्थिव विकृति हटेगी और स्वस्वरूप की अवगति होगी,अन्यथा मैं संसार सागर में बारम्बार डूब ही जाता हूँ- सेवत साधु द्वैत भय भागै।श्रीरघुबीर चरन लय लागै।।देह जनित बिकार सब त्यागै।तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै।।

वही 136/11स्वप्न में भी द्वैतदर्शन में सुख नहीं है, सुखाभास छोड़कर।ब्रह्मविद् ब्राह्मण देवता गुरु हरि सन्तों के बिना संसार से पार पाना असम्भव है-सपनेहुँ नहीं सुख द्वैत दरसन,बात कोटिक को कहै।द्विज देव गुरु हरि संत बिनु संसार पार न पाइये ।यह जानि तुलसीदास त्रासहरन रमापति गाइये-वही 136/12

अतः हम मायाधीन जीव।मायाधीश आप सिवासीव।हमें चाहे जैसा मान अपनाइये। विरागीसज्जन सद्गुरु संग पवाइये।

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विषयविषसम

नारायण नारायण नारायण अत्यन्त वैराग्य सम्पन्न महापुरुष का चरणाश्रय ही वैराग्य दे सकता है। यस्य निर्विषयं मनः और अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः जैसे वाक्य कथन में मानदण्ड हैं।विवेकवैराग्यख्यात जन ही वैराग्य बाँटते हैं, लेकिन किसी किसी सौभाग्यशाली को,गुरुहरि कृपा ही कारणता दीखती है, विषयविष के परित्याग में।ऐसे लोगों का जीवन धन्य धन्य है, जिन्हे हरिकथासंग प्राप्त हो।

क्योंकि हरिकथा इस कराल कलिकाल में मरणधर्मा मानव की अमरता है। तव कथामृतं तप्तजीवनम्।और वे धन्यातिधन्य हैं, जिन्हे पूज्य गोस्वामी जी जैसे सन्तों की वाणी में तृप्ति और आनन्दानुभूति होने लगे।ऐसे सन्तचरित्र और उनकी वाणी का प्रसाद, वर्तमान समय में तो, कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणाः इत्यादि व्यासवचन की सत्यता सिद्ध करते हैं।

भक्तसन्तों की उपस्थिति में यह स्वतः ही ध्रुव प्रमाण है।रमाविलासविलास राम अनुरागी तजत वमन इव नर बड़ भागी एवं गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताहीं राम कृपा करि चितवा जाही जैसी वैराग्य विवेकसम्पन्नता हरिगुरुकृपा ही देती है। जिससे इस मायिक संसार में सुखाभासता की चरम प्रतीति होने लगती है। आपातरमणीय संसार के भोगों की निःसारता और सर्वकारणकारण भगवान् की सच्चिदानन्दमयता में सतत आत्मिक अनुभूति आने लगती है।

जब नेति नेति वह,,अपनी आत्मा में आनन्दनिर्झरझर्झर झरने लगा, तो चरम प्राप्य तो यही है।एक विशेष बात यह भी कि,मायिक उपाधियों से मुक्त परमपरमात्मा की अपरोक्षानुभूति मायोपाधि शून्यता दशा में ही अनुभवैक गम्य है। क्योंकि- आप मायाधीश मायाधीन जीव हम। करो निर्मल चित्त तुच्छ विषयविषसम।

हरिःशरणम्।। गुरुः शरणम्।।

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सकलसुखसङ्गो विजयते

कृष्ण चेतना ही प्रत्येक कण-कण और प्राणिमात्र में है।अनुभूति कराने वाले साधक के मिले बिना उसका अनुभव असम्भव है। हमारी नाना जन्मो योनियों की संसारी वासना को सिद्ध साधक क्षण भर में,हटाकर मायाबन्ध को नष्ट कर देता है, जैसे परमहंसदेव श्रीरामकृष्ण ने बहुतों का किया।और आज भी अनुभवप्रत्यक्ष सिद्ध सद्गुरु किसी जीव को उसके वेदाचरण से अभिभूत होकर,उसका मायिक बन्धन तोड़ रहे हैं, तोड़ते आगे भी रहेंगे।आवश्यकता केवल वेद,महापुरुष और सन्त आचरित मार्ग पर चल पड़ने की है।जैसा -जैसा श्रेष्ठ जन आचरण करते चलते हैं, उसी तरह बाद में उत्पन्न लोगों को भी करना ही चाहिए।ऐसे महत्पुरुष जो चलने का मार्ग दिखायें,उसी का अनु करण हो।यद् यद् आचरति श्रेष्ठः,तत् तत् एव इतरः जनः।स यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तद् अनुवर्तते।। -ब्रह्माण्डगुरु श्रीकृष्ण।चेतनाशक्ति, चेतनाधर्ता की है। जब सबमें वही है तब अलग क्या है। बिनु सत्संग न हरिकथा। मतलब कि हरि कथा ही सत्संग है। और सत्संग अमृत के बिना अनेक जन्मों की संसार वासना जायेगी नहीं- जौ कछु काल करिय सतसंगा। जब मन से बे मन से नाम स्मरणकीर्तन उच्चारण होता है, और भगवत्कथा पीयूषरस का पान होता है, तब भगवान् /भगवती स्वयं जीव के उद्धार का संकल्प करते हैं। अतः हमें अहंकार मात्र ही है, कि हम अमुक साधन करके भोग/मोक्ष पा लेंगे।गुरोराज्ञा गरीयसी जान कर जीव मात्र को बड़ों के आदेश का पालन करना चाहिए।ऐसे ही सन्त सद्गुरु और बड़ों की वैराग्य पूर्ण रहनी-सहनी का समादर करके ही तमसो मा ज्योतिः गमय प्राप्य है। यही संसार यात्रा का सुगम मार्ग और लक्ष्य पर ले जाने की सरणि है।शरण्य,भगवान् हैं। प्रत्येक मनुष्य जीव अपनी श्वासप्रश्वास में उनका अनुभव कर सकता है।लेकिन यही अनुभव मात्र सद्गति नहीं दे सकता। हरि गुरु सन्त की संगति ही भवबन्धन भंग का एकमेवोपाय है।

सतां सङ्गःसङ्गः भवविभवभङ्गः भुवि नृणाम्।

समाकृष्टः जातः सकलसुखसङ्गो विजयते।

गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।

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शिक्षक/गुरु

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम का समग्र जीवन प्रतिकूलता में अनुकूलता की अनुभूति है।

सौभाग्य से और वैदिक आचार व्यवहार के पालन से कोई सौभाग्यशाली श्रीराचरित्र का अनुसन्धान करे,तो वह मनुष्य और देवतुल्य हो जायेगा।

प्रथम शिक्षा आचरण द्वारा शिक्षण है,जिसे प्रभु राम ने पालन करके दिखाया।

पल-पल प्रभु का अविस्मृत स्मरण बना रहे, जिससे, अहंता, ममता की खटाई मनुष्यता अवरुद्ध न कर सके।

सृष्टि के प्रत्येक कण-कण में तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ,परमात्मा ही विराजते हैं।अतः सदा तद्भावभावितः रहना प्रत्येक मनुष्य प्राणी का कार्य है।

पन्द्रहवीं शती में बंगाल की पवित्र धरती पर, अवतीर्ण परम पूज्य परमहंस श्रीरामकृष्ण देव का मानना था,कि प्रत्येक शिक्षक को आत्मिक अनुभूति अवश्य ही करनी चाहिए,क्योंकि इसके बिना, मर्यादित आचरण सम्भव नहीं है।
और प्रत्येक शिक्षक/आचार्य से चरित्र शिक्षण ही ऐदं प्राथम्येन अपेक्षित होता है।
सद्गुरु/शिक्षक/परमात्मा एक कोटिक हैं। वह कौन शिक्षक है,जिसे आत्म अनुभूति न हुई।

आते न वे परमेश जो ,गुरुदेव के आकार में।रहता अँधेरा ही अँधेरा मोह का संसार में।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

सभी देवतुल्य शिक्षक और शिक्षकधर्मा
आत्मीय जनों को सन्तत सादर नमन।

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