प्रेम संसारी वस्तुओं से प्रायः होता है,जो कि सकाम पंकिल मलिन वासना का फलन है। किन्तु यही प्रेम यदि गुरुभगवत् भागवत कृपा से कामनातीत हो जाय,तब प्रेम रूप भगवान् ही दृष्ट होंगे।
वैष्णवी परम्परा में देवर्षि नारद ने प्रेम को इस जीवात्मगत ,भक्ति को ही परमप्रेमरूपा कहा है। प्रेम और आनन्द पृथक् नहीं, तत्वतः एक ही हैं। भक्ति का व्याख्यान करते हुए, कहते हैं कि-
अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः।
सा तु अस्मिन् परमप्रेमरूपा।
अमृतस्वरूपा च।
मतलब कि वह भक्ति ही प्रेम और अमृत है,जो ईश्वर के लिए ईश्वर से ईश्वरप्राप्ति हेतु की जाय।
वस्तुतः लौकिकी वासना मृत्यु और ईशवासना अर्थात् प्रेम अमृत है।प्रेम प्रेमी और प्रेमास्पद की त्रिपुटी, नित्य सुयोग अमरत्व है।इस प्रेम में भोग नहीं, बल्कि निष्काम कामना का सुखद सुन्दर सुयोग है।
चाहौं न सुगति सुमति संपति कछु रिधि सिधि बिपुल बड़ाई। हेतुरहित अनुराग रामपद बढ़ुअनुदिन अधिकाई।।
महाराज जनक ने श्रीरामलक्ष्मण को अति अनुराग कहते हुए, प्रेम ही कह डाला-
इन्हहिं बिलोकत अति अनुरागा।बरबस ब्रह्मसुखहिं मन त्यागा।
नारद जी ने इस प्रेम को वाणी से परे कहा-
अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्।
मूकास्वादनवत्।
भैया, प्रेम और आनन्द वस्तुतः समानार्थी हैं। इसलिये कि,प्रेम भी भगवान् और आनन्द भी भगवान्,जो आनन्द सिन्धु सुखराशी।
हनुमान् जी महाराज जब जगदम्बा जानकी को भगवान् का सन्देश सुनाते हैं, तब कहते हैं-
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।जानत प्रिया एक मन मोरा।।
सो मन सदा रहत तोहिं पाहीं।
जानु प्रीति रस एतनेहिं माहीं।।
प्रेम की अनुभूति मन से होती है।और मन रहता है, प्रेमी के पास।तब मन जब प्रेमी में चला गया,तो कौन उस मन के अभाव में प्रेम का वर्णन करेगा। जब प्रेम रूप आनन्द रूप प्रभु ने मन को आकृष्ट कर लिया,तो ज्यों गूँगे मीठे फल को रस अन्तरगत ही भावै,की विचित्त दशा सृष्ट हो गई, और ऐसी सृष्टि हो जाने पर प्रेमी तो प्रेमानन्द में डूब ही गया समझो।
नारायण, हरिगुरुसन्त कृपा से ऐसे प्रेम और आनन्द में डूबने का अवसर मिलता है।
और जब कोई भाग्यशाली उस अनन्त परम प्रेम आनन्द में डूब गया,तो अनुभव तो करेगा,किन्तु मन के अभाव में परम प्रेम के प्रभाव में बोलना सम्भव नहीं है-
डूबै सो बोलै नहीं, बोलै सो अनजान।गहरो प्रेम समुद्र कोउ,डूबै चतुर सुजान।
प्रेममूर्ति भरत जी ने,अरथ न धरम न काम रुचि,गति न चहौं निरबान।जनम जनम रति रामपद,यह बरदान न आन,
कहकर इसी प्रेमानन्द को रामचरनरति,कह डाला था,और मार्ग में त्रिवेणी से,इसी रामचरनरति प्रेम की ही याचना की।नारायण, प्रेममूर्ति भरत जी और तद्वत् ठीक उसी तरह श्रीराम जी का प्रेम तो ब्रह्माविष्णुमहेश भी,कह सकने में असमर्थ हैं।
अगम सनेह भरत रघुबर को।
जहँ न जाइ मन बिधि हरिहर को।।
भरत जी का प्रेमानन्द और गोपियों का भी,प्रेमी सन्तों की वाणी का आश्रय लेकर यत्किंचित् कहा जा सकता है,समग्र तो उस समग्र के वश में है।
गोपियों का भगवान् के प्रति यही प्रेमानन्द सिन्धु उमड़ आया था।जब उद्धव जी की बातें सुनकर उन्होंने कहा था –
ऊधो मन न भए दस बीस।एक हु तौं सो गयौ श्याम संग,को अवराधे ईश।
और भगवान् जो स्वयं परम प्रेमानन्द स्वरूप ही हैं, उन्होंने आत्मतत्व की तज्ञा,गोपियों को ही कह डाला-
भगवान् का माहात्म्य, पूजा और तत्प्रति श्रद्धा, मनोगत भाव को गोपियों के सिवा कोई नहीं जान पाया-
मन्माहात्म्यं मत्सपर्यां मच्छ्रद्धां मन्मनोगतं।जानन्ति गोपिकाः पार्थ नान्ये जानन्ति तत्वतः।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
http://shishirchandrablog.in