भक्तचरन सुखलाई

मन रम रामचरन सुखदाई।भज मन भक्तचरन सुखलाई।
नारायण सुन्दर प्रभु-प्रभुता
भजत मैल मन जाई।
जिन्ह सन्तन कै मिटी मलिनता, तेहिं चरनन परि जाई।मन रम रामचरन सुखदाई। भज मन भक्तचरन सुखलाई। भक्त हनूमत हृदय बसत तुम राम राम कहि जाई। जाकर रिनिया मेरे प्रभु भे, भगत राज कहि जाई।रम मन राम चरन सुखदाई। भज मन भक्तचरन सुखलाई।
राम-राम रटि मीरा कौ मिलि कृष्णचरन सुख भाई।जिन चरनन अस्मरन करत ही, द्रौपदि लाज बचाई।मन रम रामचरन सुखदाई।भज मन भक्तचरन सुखलाई।
अम्बरीष राजा जेहि चरनन परत भगति सुख पाई। प्रभु भव भंजन सेवक रंजन हेतु जनम जेहि भाई।ऐसो प्रभु भगतन कै चरनन्हि पर गिर काम बिहाई।
रम मन रामचरन सुखदाई।
भज मन भक्तचरन सुखलाई।।


गुरः शरणम्। हरिः शरणम्।

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आनन्द के घन

मोहबन्धन स्वयं टूटा है किसी का, मिलें सद्गुरु बन्ध टूटे,टूटता है, जिस किसी का।

आते न वे परमेश जो गुरुदेव के आकार में।रहता अँधेरा ही अँधेरा मोह का संसार में।

ईश, गुरु में भेद क्या होता कभी है।आत्मदर्शन तुष्ट होवे जीव जब देखे तभी है।

मोह का तम शीर्ण हो चुकता समझ लो।

गुरुब्रह्मासूर्य दीपक है चमकता जब समझ लो।

सन्त वैदिक आचरण करते रहो बस।

सत्य संकल्पित पथों पर चलो हँस हँस।

ध्यान रखते फाँस कटते,कट चुके बन्धन कृपातः।

गुरु देव ही समझो सदा,शिवविष्णुधातः।

हम हमारा, तुम तुम्हारा, भाव यह,जब तक चलेगा।

सृजन विसृजनबन्ध भी चलता रहेगा। कर्म बनते तब तलक हैं, पापमूलक,पुण्यमूलक।

नरक स्वर्गादिक रहेंगे तब तलक ही भोगमूलक।

जय पराजय दुःख सुख के पार जाना ही पड़ेगा।

ईश गुरु चरणारविन्दों में सतत जब गिर, अड़ेगा।

इसलिये आदर्श सद्गुरु,दर्पणों में दर्प धो लो।

इसलिये आदर्श सद्गुरु वचन अमृत प्रेम घोलो।।

इसलिये तुम राम की गंगा बहाओ।

नाम नद में डूबकर उस पार जाओ।।

नाम से वह राम चिन्मय ठहर जाता।

नित्यलीला शाश्वती करता रता है।।

और अन्तिम धाम की प्रभुपद निराली।

पा गया पाकर न लौटा हाँथ खाली।।

जो अकुण्ठित सच्चिदानँद नन्दनन्दन।

गुरुकृपा माध्यम मिलें आनन्द के घन।।

गुरुः शरणम् । हरिःशरणम्।

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संसृति की चक्रनाशि!

मेरी माँ!माया मत दे,माया का साया हटा।
शरणागतदुःखजगत क्षण में है कटा कटा। माया ने जगत् में बहुत है भटकाया। दूसरे शरीरों की राहों को दिखाया।
खोया सब अनेक बार, कुछ भी नहीं पाया। यहीसंसार की त्रिगुणा है माया। छूटते न मोहपाश,विघ्नअन्तराया।कृपा करो विद्या माया(विन्ध्यवासिनी)
बरसे मेघ- दया दाया।
जपतप व्रतअनुष्ठान, तीर्थाटन साधन महान।सबका फल दे दोअम्ब!तुम ही हो स्वावलम्ब।विस्मृत सुखदुखाभास। मेरा न अपना प्रयास।जानता न पूजापाठ।खोलो भवबन्ध गाँठ। दे दो अविस्मृत स्वरूप।
धाम लीला नाम रूप। अविच्छिन्न अविचल स्मृति माँ मैं तेरा।तूँ भी कह मेरा है,मिट जाये फेरा। अपनाओ मैं कुपूत, तुम नहीं कुमाता। मेरी हो गुरू, तात पिता और माता। भागी है, भागेगी दासी अविद्या माया। करुणामयि कृपामूर्ति अब तो करो दाया।रामकृष्ण दुर्गा रटे,नष्ट पाप पुण्य राशि।जीवन के त्रिविध रंग,अन्तर प्रत्यन्तर भाषि। भासती अनुभव कराती आतम प्रकाश राशि।मायातीत रंग चढ़ै संसृति की चक्रनाशि!

गुरुहरी शरणम्

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संसृति की चक्रनाशि!

मेरी माँ! माया मत दे, माया का साया हटा।
शरणागतदुःखजगत क्षण में है कटा कटा। माया ने जगत् में बहुत है भटकाया। दूसरे शरीरों की राहों को दिखाया।
खोया सब अनेक बार, कुछ भी नहीं पाया। यही संसार की त्रिगुणा है माया। छूटते न मोहपाश,विघ्नअन्तराया। कृपा करो विद्या माया(विन्ध्यवासिनी)
बरसे मेघ- दया दाया।
जपतप व्रतअनुष्ठान, तीर्थाटन साधन महान। सबका फल दे दोअम्ब!तुम ही हो स्वावलम्ब।विस्मृत सुखदुखाभास। मेरा न अपना प्रयास। जानता न पूजापाठ।खोलो भवबन्ध गाँठ। दे दो अविस्मृत स्वरूप।
धाम लीला नाम रूप। अविच्छिन्न अविचल स्मृति माँ मैं तेरा।तूँ भी कह मेरा है,मिट जाये फेरा। अपनाओ मैं कुपूत, तुम नहीं कुमाता। मेरी हो गुरू, तात पिता और माता। भागी है, भागेगी दासी अविद्या माया। करुणामयि कृपामूर्ति अब तो करो दाया।रामकृष्ण दुर्गा रटे,नष्ट पाप पुण्य राशि।जीवन के त्रिविध रंग,अन्तर प्रत्यन्तर भाषि। भासती अनुभव कराती आतम प्रकाश राशि।मायातीत रंग चढ़ै संसृति की चक्रनाशि!

गुरुहरी शरणम्

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आर्ष आचरण

अर्थों का अर्थ समझ लो जब,तब शब्द प्रयोग अवश्य करो। जब परम्परा अधुनातन हो,तब आर्ष आचरण करो करो। आर्ष आचरण मतलब कि ऋषि प्रोक्त मार्ग पर चलना। इस मार्ग पर चलने के लिए, जिज्ञासा, साधु और सन्यास शब्दों पर विचार कर लेना होगा। जिज्ञासा का तात्पर्य है,जानने की इच्छा।ज्ञातुम् इच्छा। ज्ञा धातु से ‘ सन् ‘ प्रत्यय करके जिज्ञासा शब्द निष्पन्न है।इसी तरह अनेक शब्द हैं- हर्तुम् इच्छा जिहीर्षा, मर्तुम् इच्छा मुमूर्षा, गन्तुम् इच्छा जिगमिषा। ऐसे ही तितिक्षा शब्द है। त्यज् धातु में सन् प्रत्यय लगकर तितिक्षा बना। त्यक्तुम् इच्छा तितिक्षा।त्याग की इच्छा, को तितिक्षा समझें।किसका त्याग? हानि-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश, अनुकूल-प्रतिकूल आदि संसार-द्वन्द्वों का का त्याग। अब यह भी समझो कि यह सारे द्वन्द्व प्रारब्धवश होते हैं।हाँ यह अवश्य है कि, किसी भी आने वाले, बुरे प्रारब्ध को हरिहरगुरुकृपया नष्ट भी,किया जा सकता है। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी। लेकिन उक्त भगवद् वचनों के अनुसार सर्वारम्भपरित्यागी, द्वन्द्वातीतो द्वयातिगः गुणातीतः हुए बिना,एक बार फिर मानव जन्म निरर्थक हो जायेगा।इसलिये द्वन्द्वों से दूर, जब हमारे “अंशी ” हैं, तब हम “अंशभूत” भी द्वन्द्वों से दूर अविकल स्व-स्वभावगत आत्मगत होने पर ही संसृति-चक्र से छूट पाते हैं।सारी की सारी वेदसन्त-मर्यादा, तो इसी मानव देह के लिए है।अतः “तितिक्षा ” का तात्पर्य, निर्द्वन्द्व हो जाना है।अब साधु-“साधु” स्वरूप भी इसी तितिक्षा और कहिये अपने आत्म स्वरूप में स्थित होने पर स्वतः प्राप्त है। ” साध् संसिद्धौ” धातु में “उ”(उणादि प्रत्यय) लगकर, साधु शब्द निष्पन्न है। साध्नोति परकार्यम् इति।जो अपना नहीं, दूसरे शरीरों का कार्य सिद्ध करे,वह साधु है।परमारथ के कारने साधुन्ह धरा शरीर।।परमार्थ का तात्पर्य,पर अर्थ( प्रयोजन) की सिद्धि और परम अर्थ(प्रयोजन) माने कि, अपने सहित सबके परम हित “मोक्ष” के लिए सतत-रत होना है। इस परार्थ या परमार्थ की उपलब्धि में सत् अर्थात् सत्य के पग पर चलकर उस सत्यात्म परमात्मा की अनुभूति प्राप्ति होगी। इसीलिए ” सन्यास” होता है।यह सन्यास चतुर्थ आश्रम है।सत्+न्यास मिलकर सन्यास बना है।न्यास शब्द के नकार के बाद में होने से सत् का त् दकार होकर पर यानि कि न् हो जाता है। इसी को संस्कृत में परसवर्ण सन्धि कहा है। सत् में सत् हेतु सत् द्वारा अवस्थित होना ही,वस्तुतः सन्यास है। एतावता, आत्म अंशी के अंशाश होने से हमें तितिक्षा, साधुता और सन्यास भाव स्वतः प्राप्त है, किन्तु अभावों के कोश इस संसार की ही निरन्तर स्मृति होने से उक्त स्वभावगत भाव को विस्मृत किये बैठे एक और जन्म की तैयारी है।अतः हरिगुरुकृपा,श्रीरामनामामृत आदि का पान ही लोक परलोक की सिद्धि करेगा। इसलिये आर्ष आचरण करो करो।

गुरुहरी शरणम्।

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नाम ही विराजा

अक्षय विधाता, अपने करम।
आरोग्य धन ऊर्जा हैं भरम।
सीताराधा रामकृष्ण उमा।
शिव आदि नामों में चित घुमा।

मिटेगा फेरा फेर-फेर आने का।
अस्थिर धन यौवन अस्थिर है मन।
मैं हरिहर का निश्चित हूँ जन।
हर छन-छन जिह्वा रट नाम।
कीर्तन कर-कर करो काम।


संसार के अनित्य सभी सुख।
कहाँ कौन नहीं भोग रहा दुख।
नम मन मिला मानव तन।
आनत आरत नाम जप मन।

सभी दिव्य चिन्मय जनों का उपदेश।
रटो राम कोई हो भेष देश।
भागी से भाग कहाँ जाना है।
अंशी में अंश मिल जाना है।

तुलसीकबीररैदासमीरा वचन।
पिओ विश्वास श्रद्धा भाव प्रवचन।
रहो अलमस्त नाम की मस्ती।
अस्थिर शरीर संसार की बस्ती।


ध्रुव प्रह्लाद अम्बरीष राजा।
सकल कल-कल नाम ही विराजा।

गुरुहरी शरणम्

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वनदुर्गा विन्ध्यवासिनी

सौवर्णाम्बुजमध्यगां त्रिनयनां सौदामनीसन्निभाम्।
ग्रैवेयाङ्गगदहारकुण्डलधराम्
आखण्डलाद्यैः स्तुताम्।
ध्यायेद् विन्ध्यनिवासिनीं
शशिमुखीं पार्वस्थपञ्चाननाम् ।।

स्वर्ण कमल राजित कमला
त्रिनयन विद्युतनिभ विमला।
शंखचक्रवर अभय धारिता
चन्द्रकला दीपित अमला।।
गले सुशोभित उज्वल माल
कर्ण विराजत कुण्डल जाल।
इन्द्र देव अस्तुति करते हैं
बगल खड़े केसरि रहते हैं।।
चन्द्रमुखी विन्ध्याचल रानी
ध्यानी ध्यावत मुनि विज्ञानी।।

ऊपर उक्त संस्कृत वाणीमयध्यान श्रीवनदुर्गा विन्ध्यनिवासिनी का है।
नीचे अनुवाद किया गया है।

श्रीधाम विन्ध्याचल में वर्तमान मन्दिर पर
तीनों देवियों महालक्ष्मी महाकाली और महासरस्वती की मूर्ति प्रतिष्ठित है।
यह त्रिदेवियों का “लघुत्रिकोण” है।
एक “वृहत् त्रिकोण” भी है। विन्ध्याचल
नगर से दक्षिण पूर्व दिशा में दो देवियों का विग्रह क्रमशः “महाकाली” और पर्वत की गुफा में ” महासरस्वती” रूप में राजित है।

दुर्गासप्तशतीवर्णित प्राधानिक रहस्य में इन तीन स्वरूपों में ” महालक्ष्मी ” को सब देवियों की ” आदि ” कहा गया है।
वस्तुतः इन “देवीत्रितयी” में प्रति एक का नाम “विन्ध्यनिवासिनी” ही है।
अब ध्यान योग्य बात ये है कि, विन्ध्याचल
में प्रतिष्ठित “लघुत्रिकोण” में महालक्ष्मी ही
“विन्ध्यनिवासिनी” रूप में पूजायमाना हैं।
हालाँकि अन्य दोनों स्वरूप भी इन्ही का विस्तृत रूप होने से “विन्ध्यनिवासिनी” मान्य हैं। यद्यपि”वृहत् त्रिकोण” में विराजमान महाकाली और महासरस्वती भी विन्ध्यवासिनी हैं,तथापि –
प्राधानिक रहस्य में-
सर्वस्याद्या महालक्ष्मीः त्रिगुणा परमेश्वरी।
कहकर ऋषि ने महालक्ष्मी रूप को विशेषतया “विन्ध्यवासिनी” रूप कहा है । अतः महालक्ष्मी रूप ही प्रधान है।
वर्तमान में यह “महालक्ष्मी रूपा” जो “विन्ध्यवासिनी” मन्दिर पर हैं, उनकी मूर्ति ” श्रीयन्त्र” पर अधिष्ठित है ।
ऐसी ऐतिहासिक मान्यता है कि, काशी
के महाराजा ने वर्तमान “महालक्ष्मी” विन्ध्यनिवासिनी की मूर्ति आज से लगभग दो से तीन हजार वर्ष पूर्व स्थापित की थी।
ध्यातव्य है कि,यह स्वरूप “यन्त्रस्थ” है।
“श्रीयन्त्रोपरिस्थिता विन्ध्याचलनिवासिनी”
वचन प्रामाण्य “औशनस”उपपुराण में उल्लिखित है।
अतः ऊपर ” सौवर्णाम्बुजमध्यगाम्..”
इत्यादि वनदुर्गा ध्यान से भिन्न ध्यान
भगवती कृपा से “दास” द्वारा भगवती ने ही लिखवाया है,जो इस प्रकार है-

कुङ्कुम-चर्चित-रक्त-भाल-विलसद् –
दिव्याम्बरालङ्कृताम्, शङ्खं चक्रवराभ- यानिदधतीं प्रख्यैः चतुर्भिः भुजैः।
श्रीयन्त्रे विलसन् -मृगेन्द्र-सुमहत् -पीठस्थितां मातरं,दक्षिण-वाम-गणेश-
योगिनि-गतां विन्ध्ये वसन्तीं नुमः।।

भाषानुवाद-
रोली रचित रजत मस्तक है दिव्यवस्त्र आभूषण साजत, चारि भुजा राजित मुद्रा वर अभय शंख अरु चक्र विराजत।यन्त्रश्री शोभित मृगेन्द्र-पीठस्थ-विन्ध्य-
नगराज राजिनी, दक्षिण वाम गणेश योगिनी-युक्त-मूर्ति भव अभय दायिनी।

यह विन्ध्यनिवासिनी ध्यान हरिः ओ३म् तत् सत् कृपया लिखित होने से तद् युगल चरणारविन्दों में सतत सादर समर्पित।
गुरुहरी शरणम्।
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अधिमासः पुरुषोत्तममासः

अधिमास या पुरुषोत्तम मास का प्रति तीन वर्षानन्तर आना अवश्यंभावी है।
नारायण! हमें जिस प्रदेश में अपने प्रारब्ध वशात् निवास करने का अनुग्रह वात्सल्यगुणसागर! करुणानिधि! भगवान् ने प्रदान किया है,उसमें चान्द्र पंचांग का व्यवहार होता है। पंचांग द्विविध- चान्द्र और सौर भेद से होता है।
चन्द्रमा की घटती कला से कृष्ण पक्षादि मास द्वारा हमारे पंचांग का प्रारंभ है।
पुनः द्वितीया चन्द्रोदय से चन्द्रमा की पूर्णिमा पर मासान्त द्रष्टव्य है। लेकिन
सौर पंचांगों का प्रारंभ मेषादि बारह राशियों पर सूर्यनारायण के आगमन से होता है।इस सौर पंचांग में तीस दिनों का ही प्रायः मास सुनिश्चित है।
अब हमारे यहाँ प्रचलित चान्द्र पंचांग का आधार चूँकि, कलाक्षयत्वेन घटने बढ़ने
क्षय लोप होने में है, अतः सम्पूर्ण वर्ष में
तीन सौ चौवन दिन होते हैं।
सौर पंचांग मेष आदि राशि पर सूर्य के आने पर होने से कुल निर्धारित काल तीन सौ पैसठ दिन और छः घण्टे होते हैं।
इस तरह उक्त चान्द्रऔर सौर पंचागों में ऐकरूप्य लाने के लिए, तीन वर्षानन्तर चान्द्र पंचांग में एक मास बढ़ा दिया गया है। यह तो ज्योतिः शास्त्र आधारित अधिमास का परिगणन हुआ।
नारायण! इसके अतिरिक्त भविष्य पद्म और हरिवंश आदि पुराणों में इस मास के आगमन और माहात्म्य का सविस्तर वर्णन है।
हिरण्यकशिपु को प्राप्त वरदान में किसी मास में भी मृत्यु न होने का वरप्राप्त होने से, भगवान् ने एक मास अधिक करके,पुरुषोत्तम नृसिंह रूप धर कर उसका वध कर दिया।
इस मास में किसी भी मेषादि राशि पर सूर्यसंक्रमण नहीं होता।अतः कोई संक्रांति नहीं होती।
ग्रेगेरियन कैलेण्डर भी घटते बढ़ते तीस इकतीस दिनों और चौथे वर्ष उनतीस दिनों के फरवरी मास में पूर्ण होता है।
हमारे इस अधिमास में कोई संक्रांति नहीं होने से मांगलिक संस्कार वर्जित हैं।

किन्तु दीपदान का अनन्त फल,पुराणों में वर्णित है,जिससे दारिद्र्य क्षय हो जाता है,खूब लक्ष्मी की वृद्धि भी होती है।

” दीपदाने$धिमासेस्मिन् ,रमावृद्धिकरं नृणाम्।”-भविष्य पुराण।

नारायण! समस्त वेदवर्णित तीर्थ स्नान
योगयज्ञतन्त्रमन्त्र और कृच्छ्र चान्द्रायण व्रतादि, गयाश्राद्ध,सूर्यचन्द्रग्रहण व्यतीपात आदि का फल इसी मास में दीपदानेन प्राप्यते।
विद्याप्राप्ति, विवाहेच्छु को वरस्त्री प्राप्ति और मुक्तिकामी को मुक्ति लाभ भी इसी मास में सश्रद्ध दिये गए धूपदीपादि से होना सुनिश्चित है।
कृष्णार्थी प्राप्नुयात् कृष्णं,
मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात्

गुरुः शरणम्। शरणम्।


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श्रीराम नाम वरानने

नारायण यदि दानवव्यवहार,किसी का भी हो,तो इतिहास साक्षी है, कोई भी शक्ति, किसी भी निष्कामी भक्त को परास्त नहीं कर सकता। प्रह्लाद ध्रुव मार्कण्डेय प्रबल उदाहरण हैं।
अतः गणेश दुर्गा शिव विष्णु सूर्य आदि पंचदेवों के उपासक साधक की प्रथम शर्त ही शरणागति और निष्काम भक्ति की है।
संसार सुख तो भक्त को स्वतः सुलभ होगा। और यदि नित्य भगवान् से अनित्य संसार और संसारी भोग राग माँगा जायेगा, तो बार-बार संसार में आना जाना लगा रहेगा।जबकि यह मानव शरीर बड़े भाग मानुष तन पावा और सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन गावा,है। इसलिये केवल इसी एकमात्र विवेकसम्पन्न मानव शरीर का चरम लक्ष्य,इसी शरीर से अभी पा लो।और वह चरम लक्ष्य है, पुनः किसी मानव दानव पशु की माता के गर्भ में न जाना। किसी अच्छे बुरे भोग के लिये, दूसरा कोई भी शरीर नहीं धारण करना।
केवल भगवतीभगवान् की अनुपम श्रीनखमणिचन्द्रिका की सायुज्य प्राप्ति कर लेना।

केवल और केवल भगवान् की आज्ञा से भगवदीय कार्य के लिये, धर्मस्थापन के लिये, शरीर प्राप्ति हो, जैसे तुलसीसूरकबीररैदासमीरा आदि निष्कामी भक्तों को धरती पर भगवदाज्ञा से आना पड़ा।
” चारि जुगन के भगत जे, तिनके पग की धूरि।सरबस, आइ बिराजिहौं, मेरौ जीवन मूरि।
भक्ति भक्त भगवन्त गुरु चारि नाम वपु एक।तिनके पद बंदन किये,नासैं बिघ्न अनेक।
सहस नाम सम सुनि शिव बानी।जपि जेई पिय संग भवानी। तुम पुनि राम राम दिन राती सादर जपहु अनंग अराती।

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।सहस्र नाम तत् तुल्यं श्रीराम नाम वरानने।।

गुरुःशरणम्।हरिः शरणम्।

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साधनापथ



साधना का पथ कठिन लेकिन सरल से भी सरल है।
सृष्टि का प्रत्येक कोना आत्म अंशी का महल है।
हो गई “गुरु” की कृपा यदि जीव जीवन ही सफल है।
जब हुए निष्काम हम माया मरी सुन लो अटल है।
साधना का पथ कठिन लेकिन सरल से
भी सरल है।
थी चली यात्रा जहाँ से बढ़ रहे प्रतिपल विपल है।
कठिन पनघट की डगर फिर हम गहें संकल्प बल है।
काल कहता “ध्रुव” कहानी कल हुआ था आज कल है।
राम का अभिराम का सब नाम का ही आत्मबल है।
साधना का पथ कठिन लेकिन सरल से भी सरल है।


गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।
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