सद्गुरु बैद


बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।भागः जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्प्यते।इत्यादि श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय5मन्त्र 9) वाक्य,और (कठोपनिषद् अ.1.20तथा श्वेताश्वतर 3.20) अणोरणीयान् महतो महीयान् इत्यादि ,वाक्य यह बात प्रमाणित करते हैं,कि हमारा शरीरपिण्डस्थ जीव, बाल के अग्रभाग के सैकड़ों टुकड़े और उन टुकडों के भी सैकड़ों खण्ड करने पर जो भी अवशिष्टरूप बचता है, वही चर्म चक्षुओं से अदृश्यमान “जीवात्मा” है।वह तो सूक्ष्म से सूक्ष्मतम है।और वही चेतन जीवात्म तत्व,परमात्मा का अंश होने से विशाल से विशालतम भी है।


मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्।यत् कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्। वह परात्पर माधव तो कर्तुम् अकर्तुम् अन्यथाकर्तुम् है। हम उन्ही के अंश मात्र हैं। इसीलिये आत्म अनुभूति होने पर हम” अहं ब्रह्मास्मि” और”तत्वमसि” हैं।हम सूक्ष्म से सूक्ष्मतम विशाल से विशालतम हैं तब, जब कि आवागमन से मुक्त हो जायें। यही मुक्तमुक्ति(मोक्ष)है। धर्मार्थकाममोक्ष आदि सभी पुरुषार्थों में अन्तिम पुरुषार्थ “मोक्ष” की प्राप्ति हो जाने पर किसी भी “भोग” के लिये कोई शरीर धारण नहीं करना पड़ेगा और भोग तो कर्मभोग है,वह भोग चाहे भूः आदिलोकों से लेकर ब्रह्मलोक तक का हो या यमादि नरकलोकों का भोग।

प्रश्न विचारणीय यहाँ यह कि,मोक्ष कैसे?
जिससे सारे भोगों से छुटकारा मिले।
तो ऐसी स्थिति में सद्गुरु कृपातः शरणागताभक्ति,ही एक ऐसी ही, जिससे, मोक्ष हो सकता है।
यह ऐसी भक्ति है, जिसमें भक्त संसार दुःख से दुःखी होकर,सन्तसद्गुरु चरणों में गिर पड़ता है।और जब गुरु भगवान् की कृपा,अकारणकरुणावरुणालय भगवान् से जोड़ देती है, तब संसार बन्धन नष्टभ्रष्ट हो ही जाता है।मुक्ति होती है, केवल और केवल भक्ति से।


भक्ति का नशा चढ़ते ही, सारे शरीर संसार का नशा चूर-चूर हो जाता है- “देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद”, वाली भक्ति। “मामेव ये प्रपद् यन्ते मायामेतां तरन्ति ते”, वाली भक्ति। आत्मीयों! ऐसी ही भक्ति के भाव प्रभाव से निश्चित रूप से इस नश्वर जगत्
और जगत् की वस्तुओं में मनबुद्धि चित्त का राग नहीं रह जाता।वह राग रागात्मक मायात्मक जगत् के कर्ता कारयिता से जुड़कर इच्छित लक्ष्य “मोक्ष” की प्राप्ति करा देता है।
समर्पणभक्ति का प्रभाव पड़ते ही,तत्क्षण सच्चिदानन्दानुभूति होती है। संसार माया की पकड़, अकड़ या “अहमादिवृत्ति” क्षीण होती जाती है।मनुष्य शरीर मिलने का प्रयोजन सिद्ध हो जाता है।
लेकिन पहले ,सदाचरण,मनुष्योचित आचरण और क्रमशः सद्गुरु प्राप्ति होती है।उसके बाद सद्गुरु कृपा के प्रसाद से सब कुछ मिल जाता है।
श्रीमदाद्य रामानन्दाचार्य भगवान् की कृपा से तुलसी सूर कबीर रैदास मीरा जैसों को सामीप्य,सायुज्य, सालोक्य,सारूप्य और सार्ष्टि मुक्ति मिली है, और इसी कराल कलिकाल में।
ऐसी मुक्ति ही तत्वतः अणिमा,गरिमा लघिमा प्राकाम्या ईशित्व वशित्व सिद्धियों की प्राप्ति भी करा देती है।
और जीव कृतकृत्य हो जाता है – अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्मा परमात्मा की अनुभूति होने लगती है। और, सगुण साकार रामकृष्णनारायण सीताराधालक्ष्मी विन्ध्यवासिनीदुर्गा कामाख्या आदि की करुणा कृपा का अंशाश भी अनुभव होने लगता है।

लेकिन इन सभी के विपरीत, यदि भगवदीय गुणों की अनुभूति इस जीव को इस मानव पिण्ड में नहीं हुई,तो शरीर और आकृति भले ही मानव जैसा दीखे,वह उक्त मानवीय भगवदीय गुणों के बिना दानव ही है।
“जे आचरहिं ते नर, न घनेरे”
वेद सन्त आज्ञा का आचरण होने लगा तभी नर(मनुष्य) और न(नहीं आचरण हुआ) तो घनेरे(राक्षस) क्योंकि-
“आचारः परमो धर्मः” मनुष्यता का आचरण ही श्रेष्ठ धारणीय धर्म है।
और नारायण! “साधन धाम मोक्ष करि द्वारा” यह देवदुर्लभ( सुर दुरलभ सब ग्रन्थन गावा) नर तन (शरीर) है।
“पाइ न जे परलोक सँवारा”।ऐसा शरीर मिलने पर भी जनम जनम की बिगड़ी नहीं बनी तो दोष हमारा ही है। पूज्य
गोस्वामी जी जैसे सन्तो ने वेदतुल्य श्रीराचरितमानस जैसे ग्रन्थों से दृष्टि दे दी है।हम अणु परमाणु की तरह नहीं दीखने वाले जीवात्मा और परमात्मा कीअनुभूति करके ही ” आवागमन मुक्त” लोक ” वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति कर पाते हैं।
अतः सन्त सद्गुरू की वाणी और आज्ञाओं का पालन और दृढ विश्वास पूर्वक होने पर सारी मुक्ति का मार्ग मिलेगा। इसलिये सदाचार वेदाचार सन्त संग ही संसारसागर के “रोग” की असली दवाई है। तुलसीसूरकबीररैदासमीरा बैद्य डाक्टर हैं, और इनके वचन,इस भवरोग की औषधि,विश्वास करना पड़ेगा।बिना विश्वास के कोई दवा काम नहीं करेगी।

” सद्गुरु बैद बचन बिस्वासा”

“गुरुहरी शरणम्”

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भू से ऊपर

हमारे ऋषियों ने एक अनावृत तथ्य यह रखा है कि पृथ्वी आदि पंच तत्वों से ऊपर उठे बिना जीव को लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा।
भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्य आदि सात लोकों में भी क्रमशः गति होती है।
सत्य लोकावाप्ति हो जाने पर गुरु भगवत् कृपातः फिर नीचे गिरने की कथंचित् ही स्थिति नहीं बनती।
इसी तरह शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा पंच विषय वाली धरती है।हम मानव पिण्ड में इसका सूक्ष्म अनुभव कर सकते हैं।यह धरती इन्ही अपने शब्दादि गुणों/विषयों के कारण अत्यंत गुरु है। हम इन्ही विषयों में पड़कर बार-बार इस धरती पर नाना शरीरों में चंक्रमण करते रहते हैं।यही इसके गुरुत्वाकर्षण का रहस्य सूझता है।

शब्द आकाश का मूल गुण, स्पर्श वायु का मूल गुण,रूप अग्नि का मूल गुण,रस जल का मौलिक गुण और गन्ध धरती का मूल गुण है।
शब्दादि पंच में एक उसका मूल गुण तथा
उसके बाद अपने पूर्वज वर्ती का क्रमशः गुण अन्तरित हुआ है।
आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी तक आते आते,इसीलिये क्रमशः एक,दो,तीन,चार और पाँच गुण धरती के होते हैं।
आसान नहीं इन गुणों/विषयों की आसक्ति से बचना।
सभी के अन्तः में एक और विशिष्ट गुण
सत्व,रजः और तम भी शिष्ट अनुस्यूत है।
जिसके कारण क्रमशः, सुख दुःख और
मोह होता है।

इन भोगरूप शब्दादिक की असारता का बोध भी जीवनदुःखों से ऊबने के कारण और किसी भक्तसन्त के चरणाश्रय से पैदा होता है।
शरीर भी त्रिविध- स्थूल,सूक् ष्म और कारण रूप है।
स्थूलशरीर पृथ्वी आदि हैं।

सूक् ष्म शरीर मनोबुद्ध्यहमादि है।

औरकारणशरीर पूर्वप्रारब्ध है।

अब शनैः-शनैः इन स्थूलसूक् ष्मादि में राग ही, मूलतः विराग भी बनता जाता है।
यह विराग स्थूल से सूक् ष्म शरीर की ओर बढ़ता है।क्योंकि-
स्थूलादि पंच और मन आदि सूक् ष्म
भोगों से व्याकुलित व्यथित होते हैं।इसी भोग वैकल्य में,आत्मदेव भगवत् कृपा से अपने ही अंगो से घृणा होती है।और मन आदि की अशुचि,जब शुचिता की ओर बढ़ती है, तब यही हमारी पार्थिव देह भारभारी घृण्य हो गई-

शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा।

इसी में विवेक वैराग्य सम्पुष्ट होता है। तब आत्म गत भाव को परख कर परमात्मा किसी सन्त सद्गुरु का चरण पकड़ाते हैं।और बार बार के नाना देहों में जाकर आने जाने से मुक्ति का भाव उपजता है।
सिद्धों(मुक्तों) की संगति ही मुक्ति का परमोपाय है।और वह भी क्रमशः अनेक जन्मों में शनैः शनैः भोगनिरास होते होते
आत्मोपलब्धि का प्रबल भाव बनता है,तब जाकर परमसाधुता सज्जनता से
जीव, जीवन्मुक्त और मुक्त हो पाता है-

अनेकजन्मसन्सिद्धः ततो याति परां गतिम्।

पंचविषया पृथ्वी से ऊपर जाने पर शब्द स्पर्श रूप रस को धारण करने वाला “जल” तत्व है। इस जल का प्रधान गुण तो”रस” है, जबकि रूपस्पर्शशब्द इस जल को अपने पूर्वजों से प्राप्त है।इस रस का बड़ा आकर्षण होता है।भोजन अन्न पानादि के भोग पर सभी आकृष्ट होकर लक्ष्य से भटक जाते हैं।इससे ऊपर जाना प्रत्येक मनुष्य का परम कर्तव्य है।अतः खाने पीने की भोगसामग्री में पड़कर व्यर्थ में जीवन नष्ट नहीं करें।यही ध्यान करके सन्तों ने कहा- जितं सर्वं जिते रसे।मतलब कि यह वह सीढ़ी है जिससे खानपान में विचार करके हम उन्नत हो सकते हैं, अन्यथा नीचे की योनियों में जाना सुनिश्चित है।
जल से ऊपर उठकर त्रिविषय अग्नि तत्व
शब्दस्पर्शरूप मात्र बचता है। और इसके भी ऊपर की स्थिति वायु है।
यह वायु दो विषयों शब्द और स्पर्श मात्र गुण वाला है।यही वायु तत्व है जो हमारी चेतना या प्राण का स्वरूप माना गया है।
इसी प्राणिक/वायु चेतना से ऊपर जाकर एक शब्दगुण वाले आकाश में गति होती है, जिससे धीरे धीरे हम पृथ्वी आदि के गुरुत्वाकर्षण से अलग आत्मसत्ता की अनुभूति कर पाते हैं।
इस सारी प्रक्रिया में सन्तभगवन्त की कृपा करुणा और स्वयं की मुक्ति का भाव दृढ होना ही परम सार है।
धीरे धीरे धैर्य पूर्वक सन्तचरण की सीढ़ी ऊपर उठा ही देती है।
नहीं तो देवता या सारी धरती का राजा बनकर भी संसृतिचक्र टूटने वाला नहीं।

छोट बिबुध दरबार तें भूनृप कै दरबार। जापक पूजक दोउ कौ असह अनादर भार।

बिबुध भूपती दोउ हैं, मलिन चित्त सुन लीजिये। द्वन्द मान अपमान में पड़े जुगल कह लीजिए।

भगवत पूजन बिबुध भी भूनृप करत सँम्हार। भोग बुद्धि दोऊ कहो पहने संसृति हार।
मान और अपमान में जो सम भाव विचार। वही मनुज वैराग्य जुत होता बेड़ा पार।

बिना गुरू कै ग्यान कहँ जो बैराग बिमल मति।मिलै शान्ति उन्ह आर्तजन, रहत अचार विचार गति।
रहत अचार विचार सनातन होत कृपा श्रीराम की। तब मिल सन्तन संग ढिंग कथा लुप्त हो काम की।
देवता हो या भूमिनृप कामाहत दोऊ सुनो। देव श्रेष्ठ हैं जान मान, भू से ऊपर उन जन गुनो।

गुरुहरी शरणम्।
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अक्षय तृतीया

न क्षीयते शुभं कर्म यस्मिन् दिव्यदिने सदा।सा सिद्धाक् षयतृतीया कथिता स्वैः मुनिभिः मता। अतः साधो विचार्यैव कुरु कर्म विचारितम्। विचारिते वेदविहिते कर्तव्ये कर्मणि जनैः।प्राप्यते हि तल्लक्ष्यं पुनर्जन्म न जायते।
💐💐💐💐💐
अनेकजन्मसंसिद्धः ततो याति परां गतिम्।

यह जीवात्मा अक्षय है।
शरीरक्षय है। शरीर से जुड़े संसार और सभी पद पदार्थ अनित्य क्षय हैं।अतः अक्षय तृतीया तो अध्यात्म की सन्देशदात्री ऋषिप्रणीत ऐसी शुभ घड़ी है,जिसमें इस शरीर और संसार से जुड़े, समस्त वस्तुओं से वैराग्य का ज्ञान होना ही चाहिए।

अक्षय तृतीया, वस्तुतः वह दिन है जिससे इस शरीर के नित्य क्षरण का बोध होना चाहिए।
यह ऐसा काल है जो कालकवलित होते संसार का ध्यान कराने वाला है।
नाशवान् शरीर और उससे जुड़े संसार की वस्तुओं सम्बन्धों की अनित्यता का सन्देशदायक है।
और कहें तो, हमारे अद्वैत वेदान्त के चरम विचारदर्शन “नित्यानित्यवस्तुविवेक” का ज्ञान करा कर पुनर्जन्ममृत्युचक्र का ही आत्यन्तिक नाश करा देने वाला दिन है।

क्या नित्य(अक्षय) है और क्या अनित्य (क् षय)है, यही जानकर,संसार के राग मोहमाया में प्रवृत्ति से निवृत्ति मानव जीव की सार्थता है। इसीलिए आज अक्षय तृतीया इस लक्ष्य को लक् षित करने के कारण अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
क्योंकि संसारप्रवृत्ति से निवृत्ति ही जीव के चिरप्रतीक्षित निर्वृति(आनन्द) का सूत्रधार है।

अक्षय्या या तृतीया सा परमनिर्वृतिदायिनी। अतः विवेकं लब्ध्वैव
नित्यानित्यं सुखी भवेत्।

गुरुहरी शरणम्।
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भजस्व माम्


अनित्यम् असुखं लोकम् इमं प्राप्य भजस्व माम्।
मलमूत्र का बर्तन, यह पृथ्वी आदि पंच तत्वों का शरीर भगवान् का भजन करने के लिए मिला है। इसे काम क्रोधादि में पड़कर,ऐसे तैसे खाने पीने और ऐन्द्रिक सुखों(सुखाभासों)में गँवाना ठीक नहीं।

जैसे यह शरीर विनाशी है,वैसे ही संसार भी। मानिए शरीर संसार दो,नहीं बल्कि एक ही हैं।अब प्रतिक् षण नष्ट होते हुए इस,शरीर की प्राप्ति, भगवत् प्राप्ति हेतु ही है।भगवत् प्राप्ति नहीं होगी,तो बार बार,नानाजन्म धारने होंगें।
सोचिये,जिस भगवत् तत्व,प्राणरूप,श्वास प्रतिश्वास के रहते सम्पूर्ण शरीर क्रियाशील,है उसकी ओर हमारी (स्वयं की) दृष्टि नहीं जाती,वह कैसा अद्भुत है।
दृष्टि नहीं जाने का कारण, भगवान् की प्रचण्ड माया है,जिससे बड़े बड़े ऋषिमुनि भी नहीं बच पाये थे।
माया,अज् ञान ,अभिमान, ये सभी एकार्थक हैं। अतः –
सद्गुरु बैद बचन विश्वासा।
अर्थात् हरि कृपा से हरिरूप गुरु प्राप्ति हो जाने पर ही भगवान् का भजन बनेगा।
सूर,कबीर,तुलसी आदि की वाणी वह औषधि है,जिसका सेवन करने से ही,यह माया,अज् ञान और अभिमान जाता है।
जा रहा है,जायेगा और गया भी।
अब इसमें बात इतनी सी है कि हम राम कृष्ण नारायण सीता राधा दुर्गा आदि नामों का स्मरण जप करें।सभी पूर्वाचार्यों ने शरीर को संसार मुखी से भगवन् मुखी
बनाने का एकमात्र उपाय यही कहा है।

जननि जननं जातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः।

गोविन्दं भज मूढमते!

राम न सकहिं नाम गुन गाई।

भजन करत बिनु जतन प्रयासा ।संसृति मूल अविद्या नासा।।
संसृति मूल सूलप्रद नाना।
सकल सोकदायक अभिमाना।।

भजन करत सोइ मुकुति गोसाईं।अनइच्छित आवै बरिआईं।।

राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।।

श्रीराम जय राम जय जय राम।
महामन्त्र जेहि जपत महेसू।कासी मुकुति हेतु उपदेसू।।

इसीलिए भगवान् ने स्वयं की प्राप्ति के लिए,स्वयं(आत्मानम्) को भजने के लिये आदेश किया।
भजस्व माम्।

श्रीराम जय राम जय जय राम।

गुरुहरी शरणम्

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जीवन का रण



अनन्त बलवन्त विद्यावन्त गुणवन्त भक्तिमन्त हनुमन्त कृपा करें, इस जीव की श्रीराम चरणारविन्दों में प्रीति हो। संसार के नामरूपलीला की विस्मृति और भगवान् के नामरूपलीला की स्मृति बने।

प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना।
बोला बचन विगत अभिमाना।।

गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति,अमान।

बार-बार प्रभु चहहिं उठावा।
प्रेम मगन तेहिं उठब न भावा।।

प्रभु कर पंकज कपि कै सीसा।सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।

निरभिमानी ही निरभिमानिता को दे सके। निष्कामी ही निष्काम कर सके।

मैं खुदी हम हम निकालो।
थक गया हूँ हे!कृपालो।
आरत के चित रहै न चेतू।
फिर फिर कहै आपने हेतू।

नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव।

सादरं वन्दे भूषणपन्नगम् इन्दुभूषणम्। श्रीराम जय राम जय जय जय राम।

राम काज लगि तव अवतारा।सुनतहिं भयउ पर्वताकारा। काम लगा दो राम से।रहूँ सदा आराम से।बार बार है वान्त जगत।कृपा करो हे अविगत गत। छूटे माया का बन्धन।विनसे विषयवास इन्धन।अहमाकार वृत्ति विनसे।रामाकार चित्त विहसे।लक्ष्य पूर्ण हो इस शरीर का।
अतिरस्कृत हो कृपावीर का।

बदलो दृष्टि विचार आचरण।
जीत सकूँ जीवन का रण।।

गुरुहरी शरणम्।

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गई माया

जो शक्ति के अनन्त स्रोत मेरे मन आदि अन्तःकरण में प्रवेश करके, मेरे पिण्ड शरीर को अपना निवास(धाम)बनाकर मेरी प्रसुप्त वाणी को जीवन देते हैं।और अन्य,हाथ पैर कान त्वचा आदि इन्द्रियों में भी प्राण के रूप में रहते हुए, क्रियाशील रखते हैं, ऐसे समस्त जड-चेतन के आधार परमपुरुष परात्पर परमात्मा को ,प्रणाम करता हूँ।

योन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां सञ्जीवयति अखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना।
अन्यान् च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन् , प्राणान् नमः भगवते पुरुषाय तुभ्यम्।।
(भगवद् दर्शनकाले भक्तध्रुवः)

सब कुछ जो दीख निरन्तर,
बाहर भीतर सर्वाभ्यन्तर।
क्या है वह कौतूहल आया,
पहले मातृ अंक हरषाया।

भूख तृषा निद्रातुर रहकर,
उसे मिटाते माँ को पाया।
हुई प्रथम पहचान जननि से,
पिता यही पहचान कराया।

पुनः हुआ साक्षर गुरु माँ से,
तब,भाषाज्ञान सरस्वतिमन्दिर।
पूर्वशिष्ट अनुशासन पाया,
गुरु शिक् षक आचरण सिखाया।

मातृपितृ गुरुभक्ति बढ़ी तब,
कारणकार्य जगत दीखा।
जो अनुकूल मिला सुख पाया,
जो प्रतिकूल न दुख भाया।

हुई कृपा परमेश परम जब,
सद्गुरु करुणामूर्ति मिले।
जगी मनुजता उनकी दाया,
हुई सफल मानव काया।

वाह्य दृष्टि अन्तर में फेरी,
वही गुरू परमेश दिखे।
वही बोलता प्रेरक पाया,
सुनता “वही” गई माया।

श्रीगुरुहरी शरणम्।

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होगा महाबीर का

गो गोचर मन जहँ लगि जाई।
सो सब जानहुँ माया भाई।

अभिमान ही अज्ञान है।
वाणी और वर्ण साधन भर हैं।
लेकिन निरभिमान तुलसी जैसों की। परं प्राप्त की परा वाणी,आश्रय लेने पर अपरा अविद्या को तिरोहित करेगी।
इस भयंकर कलिकाल में मायातीत जगत् के सन्तजनों की तदर्थानुभूतिमय वाणी
वाणवत् क्षणमात्र में कर देती है,अनुग्रह। और मिट जाता है,सभी असद् विग्रह। मिटता क्षण भर में ही जगत् का समस्त
अन्तर्द्वन्द्व।ध्वस्त नष्ट होते ही माया के, हो जाता निर्द्वन्द्व। संसार की मायिक सत्ता, काल कर्म नानाजन्म गुण स्वभावविवशीकृत मनुष्य को भी बना देती दास है।अच्छा लगता है जो विषयविष आसपास है। और फिरत दास सदा माया कर फेरा। छोड़ नहीं पाता बना माया का चेरा।एक और पतन की पुष्टि। कहीं जाओ होगी ही नहीं सन्तुष्टि।
इसलिये कि यह शरीर संसार चिरसखा हैं।करते रहते हैं परस्पर की ही पुष्टि।
मैं संसार में सर्वत्र रहता हूँ।
लेकिन दीखता नहीं।

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः

इसलिये कि यह चर्मचक्षुग्राम शब्द स्पर्शादि तक ही गति करते हैं।ऐन्द्रिक अनुभूतियोजक आत्मा की आत्म दुर्गति करते हैं। दीखता उसे ही जिसका अन्तःकरण हो शुद्ध।
तुलसी सरीखों जैसी बुद्ध या प्रबुद्ध। और यों कहें कि जैसे केवल उसी के लिये उसी
की चाहत करे माया को आहत। सारी कर्मज्ञान इन्द्रियाँ बस बन जायँ प्रेम की। प्रेम भी प्रेम के लिये ही मात्रचित्र। लेकिन ज्ञानियों का चित्त भी हर लेती वही कैसी है विचित्र।
बरबस डालती व्यामोह में।
अजब गजब क्षणिक ऊहापोह में।
मन भी प्रेम तन भी प्रेम।चित्त भी प्रेम बुद्धि भी प्रेम अभिमान भी प्रेम।
जब सब हो जायं विशुद्ध प्रेम। तब मिटती माया क्षण क्षण रूपान्तरिता। क्योंकि शब्द, रामकृष्णहरि हरे माया।
नहीं तो नारायण, बारम्बार पड़े चक्कर में सब को काल खाया। सब कुछ खोया ही खोया कुछ भी न पाया। अतः करना पड़ेगा अनुग्रह अपने पर स्वतः। यह प्रामाण्य उपनिषद्दर्शन नहीं है परतः।
नव नव कर्म की मिली हमें स्वतन्त्रता।दिव्य मनुजन्म नहीं प्रारब्धतन्त्रता। अतः
त्यागो तुच्छ देहाभिमान अभी। व्यापेगी नाविद्या माया बनोगे धन्यातिधन्य तभी।

वाणी का प्रसाद तुलसी या कबीर का।

करेगा लक्ष्य पूर्ण और होगा महाबीर का।

गुरुहरी शरणम्।

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जो है जानता न कहता

खटकने का कोई आनन्द नहीं
अटकने का कोई आनन्द नहीं
भटकने का कोई आनन्द नहीं
भोगार्थ भ्रमण आनन्द नहीं

द्वन्द्वातीतानन्द, आनन्द जाने
जो सब हृदयन में बसा सभी में
बस, बास बसाये वही सही
पुनरावृत्ति, भोग ढिंग मत हो
करे कराये ना कराये भी वही।

हुआ है जो हो रहा है होगा भी
तभी जब सद्गुरू चरणन
की ज्योति, शुद्ध नेत्र होंगें।
कृपापारपारावारपूरपरिपूर्णदिव्य कर्म
जन्म उनकी कृपाकरुणाचितक्षेत्र होंगे।

और ना तरीका है सलीका
एकमेव मात्र रामकृष्ण हरि नारायण
कहता ही रहता। नरता तब पाता नाम राम राम कहै फिरे।राम राम कहे गहे दिव्य काय, बनता। वैकुण्ठ विगत कुण्ठ फल फूल फूला रहै, डूबा आकण्ठ और करता भी न करता।

दिव्यता दिव दिव्य दिव्य
सभी शिव होत भव्य भूमि
परम जब मातृभाव जानि कर्म करता।
रहता ना रहा है ना रहेगा कभी अभाव,
गुरुचरन परता बस एक ही है परता।

होती है अविस्मृत स्मृति गुरू की कृपा करूणा।पाई है शरणागति सदैव भाग्यमन्तों ने। रहता अनन्दभाव,कहते क्या कहते हम, जो भी,मिला मिल रहा है, मिलेगा आगे भी,चाहत देख चाही अनचाही दिया सन्तों ने।
ऐसे ही भावपूर्ण बनना है तो बनिये।
समुझि समुझि बूझि कृपाकातर रहिये।

पाकर कृपा की एक बूँद, बन जाता कुछ और ही,न कहते भी बनता जब आनँद ही
गहता। आनँद मध्य रहता तब कहता
क्या न कहता। हरिगुरुकृपा का लेशमात्र अवलम्ब गहि गहन गँभीर गर्व उसी पर करता।
एकमेव गुरुद्वितीय यही आधार है, उस आनँद को जानि,जो है जानता न कहता।

गुरुहरी शरणम्।

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हरे राम कृष्ण

यद्यनित्यं जगज्जातं
मलमूत्रकलेवरम्।
तदा रुचिः कथं देव
विनश्यद्भाण्डमध्यगे।

नूनं वयं विभक्तैवं त्वत्तः कर्मविपाकतः। अतः भक्तं मन्यमानं माम् अविभक्तं क्रियात् प्रभो।

मनसस् त्यागः भवेत् कस्य भाग्यवन्तस्य देहिनः। आपातरमणीयस्य संसारानित्यवस्तुनः।

यदि भवति वमनवन् निर्गतष्तृष्णभूत्वा जगति विषयजालं त्याग एवाभिरम्यम्।

कुरु गुरुगुरुता मर्षणीयः जनोयम्। यच्छतु नवनितरां रागरागं पदाब्जे।

मनोबन्धबन्धाय चरणारविन्दे।
हरे राम कृष्ण हरे राम कृष्ण।
कुरु त्वं प्रभो पाहि मां दीनबन्धो। असह्यं विषं वैषयं जातमानम्।

सदानन्दसन्दोहपूर्णं क्रियान् माम्। हरे राम कृष्ण हरे राम कृष्ण।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्

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अब हो न पतन

होगा कोई मुनि ज्ञान प्रबल। जो तपःपूत निर्मल अविकल। जिसका अन्तस गंगाजल बन।धो देता मायिक सब अनबन।
जब जलती अग्निशिखा भाषी। जब जलकण बनें अगम राशी।।तब छः मन्वन्तर मार्कण्डे देखते न समझे हरिमाया।यह कैसी अद्भुत है माया। श्रीव्यासपुत्र शुकदेव प्रभू।सब जान योगमाया प्रमान। रह छिपे मातृगर्भान्तर में।बारह बा रह वर्षान्तर में।
अब रही कामना शेष नहीं।
हम शुक मार्कण्डे नहीं सही।
पर उनकी ही सन्तानें हैं।
हम सब हरिमाया जानें हैं।
अब शीघ्र हटा सब तमस दूर।
दो शीतल चरणाश्रय अक्रूर।
अब हो न पतन।
अब हो न पतन।

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

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