उतरो और तरो

बुद्ध श्रीरामकृष्ण की बातें करने वाले,बुद्ध और राम कृष्ण न हो जायें, यह उनका दुर्भाग्य है।
” मैं अपनी योगमाया से आच्छन्न होने के कारण सबके लिए प्रकाशित नहीं होता।”
नाहं प्रकाशः सर्वस्य,
योगमायासमावृतः।

डूब मरो बार बार नाचो नाना शरीरों और योनियों में,देहवादियों।

यह दुर्लभ मानव देह,उन्ही का सार्थक है,जिन्हे बुद्ध ईशा और राम कृष्ण चिन्मय और अमायिक दिखाई दिये।

शरीर एक ही है।उसी में मुख ब्राह्मण, बाहु क्षत्रिय,उदर वैश्य और चरण शूद्र हैं।

शरीर मानव शरीर, किसी जाति कुल वर्ण में जन्मे,जबतक तुलसी रैदास कबीर जैसे तदाकाराकारित चित्तवृत्तिमहात्माओं में उसका मन नहीं जायेगा,ऐसे ही “माया”
की फाँस में फँसे रहना पड़ेगा।
वर्णाश्रमव्यवस्था पूर्ण विज्ञान सम्मत है। ऋषियों और उनकी इन्द्रियों के पार दर्शनक्षमत्व का परिणाम है।पागलों!
पल-पल दैहिक/ऐन्द्रिक सुख के लिए बेचैन मानवतन धारियों।पागल हो जाओ और पागलपन की पराकाष्ठा पार कर जाओ,उस “आत्मिक”आनन्द के लिए।

करो करो जल्दी करो,कूपहिं में यहाँ भाँग परी है, एक ही मानव शरीर में चारों वर्णों की अनुभूति करो।
आदर करो “सनातन”का जिसने वेदादिशास्त्र दिये,जिन्होंने,एक विशुद्ध
पूर्ण वैज्ञानिक वर्णाश्रमव्यवस्था निर्दिष्ट की। यही एकमात्र वह सर्वकारणकारण
आत्मा ही आत्मा की अनुभूति कर सकती है। “आत्मनि एवात्मना तुष्टः” हो जाओ।

अन्तः में विराजित उस निराकार निर्गुण को जान लो,जो ब्राह्मण क्षत्रियादि नहीं।
किसी का भी मानव देह इस ईश्वर का साक्षात् कर सकता है।लेकिन मैं देह नहीं, मैं इन्द्रिय नहीं।ऐसे परानुभूत रैदासजी तुलसीदास जी कबीर दास जी की परावाणी का आश्रय लो।
धन्य धन्य कर लो, देख लो इन्हीं आँखों से,जिस नित्य लीलाललाम राम को सन्तों ने देखा था।
यह परमहंस रामकृष्णदेव की वह धरती है, जिसे ऋषियों ने “माता” कहा था।
सभी जड़ चेतन मात्र इसी धरती माँ से जन्मे और इसी में मिल जाने वाले हैं।
बुद्ध ईशा वही।रामकृष्ण वही। तुलसीसूरकबीररैदास और मीरा भी वही।
जाओ इनके आत्म अनुभूत अक्षरों में खो जाओ अपना मायिक स्वरूप नष्ट कर दो।

वर्ना चक्कर में पड़े रहो “जातियों”के चक्कर में।गँवाते रहो अमूल्य मानव-जीवन।

राम ते अधिक राम कर दासा।
मोरे मन प्रभु अस विश्वासा।।

इसलिये राम और उनके दासों की भक्ति करो,तर जाओ।उतर जाओ, जहाँ तक वे उतरे थे। उतरो और तरो।

गुरुहरी शरणम्।

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त्रिकालस्मरणकारक

अकलकरुणाकलाकलित कालकृपाकार
कारकपल-पल-पालक सर्वकारणकारण
हारकहरहरक्षणकणकणरणितायमान
सर्वप्रिय प्रेरकसमस्तकरण-कारण
सर्वजिद्रण चिदानन्दसन्दोह
अपाकृतमहामोह चित्तहारक हरहर मनोहरहरि दृष्टदर्शनभक्तजन
-हेतुग्रहणमायातीतगुणाकार
चिन्मयामायामायातीतदेहाकार
दिव्यजन्मकर्म धारितजगजीवमर्म
अनघ अघओघसमुत्सारित
कृपापारावारवारितभव भवानीश
अजोपियोगमायाकर्षितप्रकाशित
अधर्मधारणधुरीणधराशायीकृत
परित्राणसाधुसन्तसज्जनजीवन
धर्मधौरेयाधारधाराधारिततनु
भक्तजनपार-पारावार-वश्यपराकृष्ट
अक्लिष्टसाधननाम-नमनीय
कलिकालक्लान्तजन-नामरूपाकार
ध्यानरूपनाम-मनन-मथित-मानस-मन
सर्वसेवकध्यानसातत्याचिरचरचरण
नष्टभ्रष्टागणितजन्मकर्मजालज्वालक
पालकशरणागतसततदीनबन्धु
दयासिन्धुमहामहनीय सन्तहृन्निवास
पूज्यमानभक्तसन्तसन्तानतानित
स्वतःपूजायमानतद्हृदयवर्तमान
अमानमानद सर्वार्तिसमुत्सारित
सर्वानुग्रहकारक नवग्रहविपरीतफलहारक
मारकविदारक-कामादिषड्रिपु
स्वयमेवासनधर्ताभक्तभावभावनासीन
गुणगण प्रभु! त्रिकालस्मरणकारको भव।

गुरुहरी शरणम्

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धर्मसारत्व



धर्म से आपका क्या तात्पर्य है?

उत्तर में “एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतं” के अनन्य “गीतकार” महाभारतोक्त श्रीमद्भगवद्गीता की अत्यन्त प्रसिद्ध पंक्तियों का आश्रय लेकर चलना होगा।
ब्रह्माण्ड गुरु श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा-

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
धर्म नहीं धर्म का निचोड़
“सारतत्व” क्या है, सुनो।
सुनकर धारण करो क्योंकि
” धारणात् धर्मः”जो धारण करके विवेक पूर्वक आचरण किया जाय,वही धर्म है।

“आचारः परमो धर्मः श्रुति उक्तः स्मार्त एव च” भगवद्वाणी भी इसी आचरण मूलक धर्म का प्रकाश करती है।
” आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्”
यही धर्म का तत्व है।

हम मनुष्य का कर्तव्य कर्म
(धर्म)पालन करें यही धर्म है।
जो हमारे(मनुष्य) लिये आचरण योग्य (रागद्वेष,हिंसा क्रूरता) नहीं है, उसे हम कदापि धारण न करे।
” हमारे वास्तविक मनुष्य स्वरूप के लिए उदारता करुणा दया क्षमा त्याग धैर्य आदि गुण आवश्यक हैं, इन्हें हम अवश्य धारण करें।”
यही ईश्वरीय गुण चेतना है।
हम निश्चित रूप से अविनाशी ईश्वर के अंश हैं।तो हम अपने विस्मृत ईशस्वरुप को स्मृत करके,अपनी स्मृति को जागृत रखने के लिए, समस्त जड़ चेतन जीव जगत्,यानी कि पशुपक्षीकीटपतंग और नदीपर्वतवृक्षादि सभी के प्रति भगवद् भाव से कर्तव्यकर्म करते हैं, तभी धर्म है, अन्यथा,अधर्म।
“परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई।” की अतुलसी तुलसी सरस्वती इसी भाव का विस्तार और प्रकाश करती है।
इसलिये हम सभी ईश्वर की सन्तान, ईश्वरीय और दैवी गुणों के अनुकूल ही व्यवहार करें,यही धर्म है।
” हम अन्यों के साथ इन्ही मानवीय अनुकूल व्यवहार करने के कारण मनुष्य कहलाने के पात्र हैं”

“यदि कोई इन मानवधारणीय पालनीय कर्मो का आचरण नहीं करे,तो वह मनुष्य नहीं।”

“यदि कोई मेरे साथ उक्त मानवधारणीय करणीय कर्मों के विपरीत व्यवहार करे,तो वह मुझे स्वयं अच्छा नहीं लगेगा।”
यही “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्”
का श्रीकृष्ण परिभाषित धर्म है।
यह धर्म का सारत्व तत्व है।

गुरुहरी शरणम्

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श्रद्धाविश्वासैक्य

संसार में सबकी दवा है किन्तु मूर्खता की कोई भी दवा नहीं।
श्रद्धा और विश्वास को कभी भी पृथक् नहीं किया जा सकता।
किसी मूढ़ की वाणी से कोई भी सनातन मतावलंबी कदापि
सहमत हो नहीं सकता, तो मैं कैसे?
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ
मैं ऐसे भवानीशंकर को प्रणाम करता हूँ, जो श्रद्धा और विश्वास स्वरुप हैं।
इन्हे उसी प्रकार अलग नहीं कर सकते,
जैसे कि “बल”और “बलवान्” को।
कोई भी व्यक्ति अपने स्वयं के अन्दर निहित बल(शक्ति) को अलग करके अपने शरीर पिण्ड से बाहर नहीं दिखा सकता,जब तक कि वह चरम परम योगी न हो। और कोई योगी,ऐसा करे भी तो भी वह अपनी स्वयं की निःसारित शक्ति को अपने में स्थापित किये बिना पिण्ड(शरीर) में कोई स्पन्दन नहीं ला सकता।
यही मामला विश्वासश्रद्धा का है।

कोई सिरफिरा विषयवासनाविष से अमरत्व और मुक्ति की बेवकूफी भरी बात
इस भारत की सहिष्णु धरती पर कर सकता है, तो करे। भोगप्रवण व्यक्ति की नाना शूकरकूकर योनियों में भटक कर आने के कारण इसमें प्रवृत्ति होनी स्वाभाविक है। किन्तु वृत्ति, भोगसंस्कारी होगी तो कौन योग जगेगा? भोग को प्रारम्भिक क्षणों में आपातरमणीय मानने वाला “पश्चिम” इस अन्धविश्वास को सही मान कर एक अनर्थकारी “सिरफिरे” के पीछे चल सकता है। यह वही सिरफिरा है जिसने वेद,गीता,रामायण,उपनिषदादि
शास्त्रों को सद्गुरु परम्परया नहीं पढ़ा।
और विश्वास तथा श्रद्धा को अलग मान कर अर्थ का अनर्थ कर देता है। इसका
नाम बड़ा प्रसिद्ध है।यह सहज भोग प्रवृत्ति वाला केवल और केवल मूर्ख है।

सम्भोग से समाधियोग तक ले जाने की कुतार्किक परिणति वाला , भोगी व्यक्ति इस सनातन को क्या दे सकता है?

हम चूँकि नाना शूकर कूकर और यहां तक कि विभिन्न यक्ष किन्नर नाग गन्धर्व राक्षस लोकपालों की देवविशेष जातियों,
इन्द्रादि की भोग योनियों से भोगसंस्कार ले कर उपजे प्राणी हैं।अतः हम जैसों का किसी मूर्ख के प्रति भोगसंस्कारत्वेन आकर्षित होना अस्वाभाविक नहीं है।

हे भगवान् ऐसे नारकीय प्राणी, जिन्हे श्रद्धा और विश्वास में अलगाव दीखता है, सनातन वेद वेदान्त का अल्प बोध नहीं है, इन्हें भी क्षमा करना।

क्षमा करना इसलिये भी कि कभी न कभी तो भटका हुआ बेचारा भोगबेचैन “वह”
सनातन को सनातनी सद् गुरुओं से समझ कर तर जायेगा।
श्रद्धा-विश्वास शक्तिशक्तिमान् राधाकृष्ण सीताराम उमाशंकर इसे करुणा करके
“गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न, न भिन्न।बन्दौं सीताराम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न”इस श्रद्धाविश्वासैक्य का बोध करा कर इस मूर्ख और इसके भोगमय विचलित अशुद्ध मनबुद्धिचित्ताहंकाररूप अन्तःकरण को शुद्ध कर ही देंगे।
शिवाशिवयोरभेदः का सनातन सम्मत मत
कोई मूर्ख विभाजित नहीं कर सकता।
“वेदान्तसार” में सदानन्द योगीन्द्र का वेद मत “गुरूपदिष्टवेदान्तवाक्येषु विश्वासः
श्रद्धा ” सदा सर्वदा सर्वथा रूप में अखण्ड है। सद्गुरु द्वारा उपदेश किये गये वेद और वेदान्त वचनों में दृढ़विश्वास रखना ही श्रद्धा है।
अतः विश्वास और श्रद्धा में भेद दर्शन पूर्ण
अवैदिक है। श्रद्धाविश्वासैक्य वेदसिद्ध है।

गुरुहरी शरणम्

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शालग्रामराम



जनजन के हृदय-देश राजे।
श्रीसीताराम सदा साजे।

सीता सहित चले सीतापति।
शालग्राम शिला बन कर।
अनाहूत उमड़े प्रेमी जन
श्रद्धाविश्वास उठे युग कर।

गुरुजन परिजन परिवारी जन।
रामानुज चलें राम-रंजन।
जनकसुता जनजन की शक्ती।
चली देन मर्यादा भक्ती।


गुणावेश में गुणाकेश कर्षित
सब कृष्ण रूप लख कर।
सब हृदयभूमि बह प्रेम-धार
धर राधा-प्रेम-युगल बन कर।

हम भी हर्षित तुम भी हर्षित
सब सीताराम कृपा कर्षित।।
उमड़ी घुमड़ी यह भगत भीर।
आँखन अँसुवन की प्रेम नीर।।

💐💐💐💐💐

सादर विनावनत
करता स्वागत।
करो स्वीकार।
शरणागताकार।
मानो सत्य सत्य।
मैं तेरा तूँ मेरी गत्य।

शालग्रामशिला मात्र यह नहीं
मान मन मम नारायण सत।
जो त्रेता उतरी करुणमूर्ति
रतिराम “भक्ति” रामायण रत।

अब काम! चलो गह द्वार-राम।
हो धन्य धन्य तुम भी कृतार्थ।
शुचि शिला चली यह शालग्राम।
बन राम राम है यही स्वार्थ।।

हरिगुरू शरणम्

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शालग्रामराम



जनजन के हृदय-देश राजे।
श्रीसीताराम सदा साजे।

सीता सहित चले सीतापति।
शालग्राम शिला बन कर।
अनाहूत उमड़े प्रेमी जन
श्रद्धाविश्वास उठे युग कर।

गुरुजन परिजन परिवारी जन।
रामानुज चलें राम-रंजन।
जनकसुता जनजन की शक्ती।
चली देन मर्यादा भक्ती।


गुणावेश में गुणाकेश कर्षित
सब कृष्ण रूप लख कर।
सब हृदयभूमि बह प्रेम-धार
धर राधा-प्रेम-युगल बन कर।

हम भी हर्षित तुम भी हर्षित
सब सीताराम कृपा कर्षित।।
उमड़ी घुमड़ी यह भगत भीर।
आँखन अँसुवन की प्रेम नीर।।

💐💐💐💐💐

सादर विनावनत
करता स्वागत।
करो स्वीकार।
शरणागताकार।
मानो सत्य सत्य।
मैं तेरा तूँ मेरी गत्य।

शालग्रामशिला मात्र यह नहीं
मान मन मम नारायण सत।
जो त्रेता उतरी करुणमूर्ति
रतिराम “भक्ति” रामायण रत।

अब काम! चलो गह द्वार-राम।
हो धन्य धन्य तुम भी कृतार्थ।
शुचि शिला चली यह शालग्राम।
बन राम राम है यही स्वार्थ।।

हरिगुरू शरणम्

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अध्यात्म तले

अध्यात्म नदी का जल बन कर
प्रभु के चरणों में बहना है।
अध्यात्म तले ही सोना है।
अध्यात्म तले ही जगना है।

यह हृदयदेश सुन्दर प्रदेश।
जहँ राजमान श्रीशक्तिमान।
जिनकी है चार भुजा शोभित।
है चार पुरुष का अर्थ कथित।

मनसा वचसा नारायण भज।
कर्मणा कुसंस्कार अब तज।

अज्ञान तमस तब दूर भगे।
जब ज्योतित आत्मप्रकाश जगे।

वह आत्मप्रकाश स्वयं ज्योतित।
अनुभवकारयिता कर्तासित।

हम वही दिव्यचेतनायुक्त।
गुणयुक्त भवार्णव सदामुक्त।

सद्गुरु नारायण करुणाकर।
कर कृपादृष्टि अब अपना कर।

यह कामक्लेश ना रहें शेष।
शरणागति दो हे भाववेश।

अब मुझे और ना कहना है।
तव अविरल स्मृति में रहना है।

अध्यात्म नदी का जल बन कर।
प्रभु के चरणों में बहना है।
अध्यात्म तले ही सोना है।
अध्यात्म तले ही जगना है।

गुरुहरी शरणम्।

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इन्द्रियों से इन्द्रियातीत

लम्बेलम्बे श्वास प्रश्वास में चलते प्राणवायु स्वरूप परमात्मा का अनुभव करो जो
सारी चेतना का मूल है।पंचवायु, पंचभूत पंचविषयप्रपंच,पंचदेवों की उपासना
ज्ञान और भक्ति है।
श्रोत्र त्वक् चक्षु जिह्वा नासिका इन्ही
प्राण अपान उदान समान व्यान से ही चलितचालित है । वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ आदि पंच कर्मेन्द्रियसंघात भी इन्ही पंचवायु द्वारा संचरित हैं।

मन बुद्धि चित्त अहंकार ही चतुर्भुज भगवान् हैं जिनके कारण दशेन्द्रियाँ अपने शब्दादि विषयों में समुचितचेष्टाशील हैं।

और सारी चेष्टा के अनन्त मूल
श्वासप्रश्वासप्राण को मत भूल।
इसी में चराचरजगत् स्पन्दित है
इन्द्रियातीतवृत्ति भी आक्रन्दित है।

हरिः शरणम् गुरुः शरणम्।

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जब नाम चले


सारे सनातन धर्म में बात कही एक सार।
जपो जपो रामनाम और सबही है असार।

कही आदि शंकर ने रामानुज ने भी कही।
मध्व आचार्य आचार्य निम्बार्क भी यही।
वल्लभ भी विशुद्ध नाम रटनकी बातकही
जनमि प्रयागराज रामानन्दाचार्य कही।
रामकृष्णहरीनामरती मति विशुद्ध सही।

पन्द्रह सौ ईसवी में धन्य बंगाल धरती।
जो है महाप्रभू चैतन्य को धरती।
हुआ कलिकाल धन्यधन्य हुए लोग सभी।
माधव युगल भाव लेकर आए वे जभी।

कहा कृष्णनामसंकीर्तन है आत्मास्नान।
हर एक नाम अमृत पूर्ण आस्वादन।
आनँद समुद्र ओर छोर नहीं पारावार।
रामनाम कृष्णनाम जीवन का आरपार।
विद्या रूप भामिनी का पती यही नाम है।
श्रेयस्चक्रवाक की है चन्द्रिका को कामहै।
चित्त रूपी दर्पण को शुद्ध करे नाम है।
भवमहादावानल बुझाए कृष्ण नाम है।

श्रीमच्चैतन्य की नामरससिक्त वाणी,
जो “शिक्षाष्टक” में यही भाव लेकर बही-

चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम्।श्रेयःकैरव –
चन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वा –
दनम्।सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्।।1।।

नाम्नाम् अकारि बहुधा निजसर्वशक्तिः
तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।
एतावती तव कृपा भगवन् ममापि
दुर्दैवम् ईदृशम् इह अजनि नानुरागः।।2।।

हे राम मेरे कृष्ण तुमने नाम में शक्ती भरी।
स्मरण में भी काल तुमने है नहीं नीयत करी। बस करो इतनी लघु कृपा मिट जाय
दुर्दिन-बन्ध का।तव नाम रटते मिले ज्योति, हटे भवाभव अन्ध का।

नारायण! चैतन्य महाप्रभु के शिक्षाष्टक के पद्यद्वय। करते सदैव ये दृढानुराग वैसा न करै कोई अद्वय।
देखिये,
मन्त्रजप में विधि अनिवार्य है।नामजप विधि से परे कार्य है।

जिह्वा पर स्वादानुभव हो चाहे मत हो जपते-जपते नामी प्रकट-प्रत्यक्ष हो जाता है।
तब इन्द्रियातीत स्वाद आता है,मायातीत जगद् अनुभूत होता है, यह पार्थिव शरीर
अपार्थिव, सच्चिदानन्दरूप ही शेष रहता है। इसलिये
श्रीमन्नारायण गुरु कृपया हो नाम राग अनुराग पले।भौतिकशरीर के धर्म भोग सब नष्ट भ्रष्ट जब नाम चले।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्।

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विरत मति दो


नारायण ! मैं अपनी अपनी कोई बात नहीं थोप रहा । मेरा मनगढ़न्त विचार नहीं।
श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु के परिकर ने व्रजभू में एक महत्वपूर्ण बात कही थी।विचारणीय है विषय।विवेच्य है आशय।

विचरती मेरी मति ने कही।
मेरा विचार तो है प्रभु यही।
क्या सही क्या न सही।
हमें क्या बार बार किसी
भोग के लिए मिलेगी मही।
नहीं नहीं नहीं नहीं।
राधामाधव युगल भाव को लेकर इसी कलिकाल में बंगाल की धरती पर पन्द्रह सौ ईसवी में अवतीर्ण हुए चैतन्य महाप्रभु जी ने आठ पद्य मुमुक्षुओं के मंगल हेतु रचे थे।
किसी भी स्वतन्त्र ग्रन्थ का प्रणयन नहीं किया था। महाप्रभु जी के आठ श्लोक सभी प्रणयी भक्तों में “शिक्षाष्टक” नाम से
प्रसिद्ध हैं।उन्होंने भगवन्नाम संकीर्तन से नाना प्रकार के हमारे सदृश अनेक विमुख
विषयी जीवों का उद्धार किया।नारायण !
यह समस्त संसार भगवद् विमुख प्राणियों
के लिए बार-बार आवागमन का कारण बनता है। महाप्रभु जी इस संसार में किसी वस्तुव्यक्तिपदपदार्थ में कोई राग स्वीकारते नहीं।
राग का कारक और कारण कौन है? कौन है जो नाना इन्द्रियों में चेतनासंचरण करते हुए अनुकूल और प्रतिकूल स्थितियों का अनुभव कराता है?
वह तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् परमात्म सत्ता भगवन्नामधारिणी ही तो है, जिससे यह पिण्ड शरीर सबको ज्ञान का विषय बनाता है। वही प्रज्ञानं ब्रह्म है।
सगुण साकार व्यावहारिकी और नित्य लीलाललाम दृश्यमान भगवान् अवध और व्रज में भक्तों हेतु उतर कर अजस्र आनन्दरस में उन्हें सरस कर दे रहे हैं।
यही रसधार बहाई महाप्रभु ने और अनुभूति भी कराई।और भगवद्विरह में व्याकुल होकर नाम ही रटने की शिक्षा आचरित करके मानव में आनन्द ही मानो रचित कर दिया।अपने शिक्षाष्टक में प्रभु ने कहा- भगवद् विरह मे एक पल भी युगों जैसा हो गया है । नेत्र वर्षा ऋतु की अवतारणा करते हैं। इस गोविन्दविरह में मुझे सारा संसार सूना-सूना दीखता है।

“शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्दविरहेण मे”

इन्हीं महाप्रभु जी के परिकर ने श्रीधाम वृन्दावन में एक बड़ी बात कही थी।
जो आज भी व्रजरज के कण-अण में भक्तों द्वारा अनुभूयमान है।इसी तरह की
ऐसी ही दृष्टि दी थी कुरुक्षेत्र रणक्षेत्र में अनित्यसम्बन्धों के चक्कर में चकराने वाले अर्जुन को भगवान् ने।उन्होंने मान और अपमान को तिरोहित करने का आदेश किया था-“मानापमानयोस्तुल्यः
तुल्यः मित्रारिपक्षयोः” कहकर।
यही भक्त की दृष्टि विचारधारा, संसार से मुक्ति का सूत्रवत् सूत्रपात करती है-अब मूल बातयह कि श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु के परिकर ने श्रीधाम वृन्दावन में क्या कहा –
“सम्मानं कलयातिघोरगरलं
नीचापमानं सुधा।”

सम्मान को घोर विष और अपमान को विषवत् समझो।
पूज्य गोस्वामी जी ने भी सूत्र दिये थे-

सुत वित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।

लोकेषणा सम्मान का प्रतिस्फुटन है।ये सब बाध्यकारी भोग के लिए स्वस्वरूप
से विच्युत करके जीव को नाना प्रकार के नरकस्वर्गादि लोकों में ढकेलने वाले हैं।

मानापमान माना कि द्वन्द्व हैं।
लेकिन दोनों ही अन्तर्द्वन्द्व हैं।
मन की “मथनी” रूपिका है।
नाना शरीरों की भूमिका है।

दोहावली में बाबा ने कहा।

एक मृगा के कारने भरत धरी दुइ देह। उनकी क्या होगी गती जिनके नाना नेह।

यह दशा ब्रह्मर्षि की देखी।
तब अपनी क्या कहें लेखी।

अस प्रभु अछत हृदय अविकारी।सकल जीव जग दीन दुखारी।

वही स्मरण करायें कृपा मनुहार यहीं। अपने साधन का कोई अहंकार नहीं।

ऐसे प्रभु का अपने में गुरुकृपया जब होगा दर्शन।
तब कटे हमारे जैसे विषयी जीवों का विषयस्पर्शन।

अतः सर्वत्र दीखे वही।
चाहिए न और कुछ सही।
हे अचाह मुझे बनाओ अचाही।
कराओ अपने में रमण सदा ही।

पाकर तुम्हें शान्त अक्षय होंगे हम सदा ही
हम तुम्हारे रहें त्रिकाल सत्य सदा ही।
अपनी स्मृति में अक्षुण्ण अविरत रति दो।
आपात रमणीय संसार से विरत मति दो।

हरिः गुरुः शरणम्।

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