जब नाम चले


सारे सनातन धर्म में बात कही एक सार।
जपो जपो रामनाम और सबही है असार।

कही आदि शंकर ने रामानुज ने भी कही।
मध्व आचार्य आचार्य निम्बार्क भी यही।
वल्लभ भी विशुद्ध नाम रटनकी बातकही
जनमि प्रयागराज रामानन्दाचार्य कही।
रामकृष्णहरीनामरती मति विशुद्ध सही।

पन्द्रह सौ ईसवी में धन्य बंगाल धरती।
जो है महाप्रभू चैतन्य को धरती।
हुआ कलिकाल धन्यधन्य हुए लोग सभी।
माधव युगल भाव लेकर आए वे जभी।

कहा कृष्णनामसंकीर्तन है आत्मास्नान।
हर एक नाम अमृत पूर्ण आस्वादन।
आनँद समुद्र ओर छोर नहीं पारावार।
रामनाम कृष्णनाम जीवन का आरपार।
विद्या रूप भामिनी का पती यही नाम है।
श्रेयस्चक्रवाक की है चन्द्रिका को कामहै।
चित्त रूपी दर्पण को शुद्ध करे नाम है।
भवमहादावानल बुझाए कृष्ण नाम है।

श्रीमच्चैतन्य की नामरससिक्त वाणी,
जो “शिक्षाष्टक” में यही भाव लेकर बही-

चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम्।श्रेयःकैरव –
चन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वा –
दनम्।सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्।।1।।

नाम्नाम् अकारि बहुधा निजसर्वशक्तिः
तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।
एतावती तव कृपा भगवन् ममापि
दुर्दैवम् ईदृशम् इह अजनि नानुरागः।।2।।

हे राम मेरे कृष्ण तुमने नाम में शक्ती भरी।
स्मरण में भी काल तुमने है नहीं नीयत करी। बस करो इतनी लघु कृपा मिट जाय
दुर्दिन-बन्ध का।तव नाम रटते मिले ज्योति, हटे भवाभव अन्ध का।

नारायण! चैतन्य महाप्रभु के शिक्षाष्टक के पद्यद्वय। करते सदैव ये दृढानुराग वैसा न करै कोई अद्वय।
देखिये,
मन्त्रजप में विधि अनिवार्य है।नामजप विधि से परे कार्य है।

जिह्वा पर स्वादानुभव हो चाहे मत हो जपते-जपते नामी प्रकट-प्रत्यक्ष हो जाता है।
तब इन्द्रियातीत स्वाद आता है,मायातीत जगद् अनुभूत होता है, यह पार्थिव शरीर
अपार्थिव, सच्चिदानन्दरूप ही शेष रहता है। इसलिये
श्रीमन्नारायण गुरु कृपया हो नाम राग अनुराग पले।भौतिकशरीर के धर्म भोग सब नष्ट भ्रष्ट जब नाम चले।

हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्।

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विरत मति दो


नारायण ! मैं अपनी अपनी कोई बात नहीं थोप रहा । मेरा मनगढ़न्त विचार नहीं।
श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु के परिकर ने व्रजभू में एक महत्वपूर्ण बात कही थी।विचारणीय है विषय।विवेच्य है आशय।

विचरती मेरी मति ने कही।
मेरा विचार तो है प्रभु यही।
क्या सही क्या न सही।
हमें क्या बार बार किसी
भोग के लिए मिलेगी मही।
नहीं नहीं नहीं नहीं।
राधामाधव युगल भाव को लेकर इसी कलिकाल में बंगाल की धरती पर पन्द्रह सौ ईसवी में अवतीर्ण हुए चैतन्य महाप्रभु जी ने आठ पद्य मुमुक्षुओं के मंगल हेतु रचे थे।
किसी भी स्वतन्त्र ग्रन्थ का प्रणयन नहीं किया था। महाप्रभु जी के आठ श्लोक सभी प्रणयी भक्तों में “शिक्षाष्टक” नाम से
प्रसिद्ध हैं।उन्होंने भगवन्नाम संकीर्तन से नाना प्रकार के हमारे सदृश अनेक विमुख
विषयी जीवों का उद्धार किया।नारायण !
यह समस्त संसार भगवद् विमुख प्राणियों
के लिए बार-बार आवागमन का कारण बनता है। महाप्रभु जी इस संसार में किसी वस्तुव्यक्तिपदपदार्थ में कोई राग स्वीकारते नहीं।
राग का कारक और कारण कौन है? कौन है जो नाना इन्द्रियों में चेतनासंचरण करते हुए अनुकूल और प्रतिकूल स्थितियों का अनुभव कराता है?
वह तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् परमात्म सत्ता भगवन्नामधारिणी ही तो है, जिससे यह पिण्ड शरीर सबको ज्ञान का विषय बनाता है। वही प्रज्ञानं ब्रह्म है।
सगुण साकार व्यावहारिकी और नित्य लीलाललाम दृश्यमान भगवान् अवध और व्रज में भक्तों हेतु उतर कर अजस्र आनन्दरस में उन्हें सरस कर दे रहे हैं।
यही रसधार बहाई महाप्रभु ने और अनुभूति भी कराई।और भगवद्विरह में व्याकुल होकर नाम ही रटने की शिक्षा आचरित करके मानव में आनन्द ही मानो रचित कर दिया।अपने शिक्षाष्टक में प्रभु ने कहा- भगवद् विरह मे एक पल भी युगों जैसा हो गया है । नेत्र वर्षा ऋतु की अवतारणा करते हैं। इस गोविन्दविरह में मुझे सारा संसार सूना-सूना दीखता है।

“शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्दविरहेण मे”

इन्हीं महाप्रभु जी के परिकर ने श्रीधाम वृन्दावन में एक बड़ी बात कही थी।
जो आज भी व्रजरज के कण-अण में भक्तों द्वारा अनुभूयमान है।इसी तरह की
ऐसी ही दृष्टि दी थी कुरुक्षेत्र रणक्षेत्र में अनित्यसम्बन्धों के चक्कर में चकराने वाले अर्जुन को भगवान् ने।उन्होंने मान और अपमान को तिरोहित करने का आदेश किया था-“मानापमानयोस्तुल्यः
तुल्यः मित्रारिपक्षयोः” कहकर।
यही भक्त की दृष्टि विचारधारा, संसार से मुक्ति का सूत्रवत् सूत्रपात करती है-अब मूल बातयह कि श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु के परिकर ने श्रीधाम वृन्दावन में क्या कहा –
“सम्मानं कलयातिघोरगरलं
नीचापमानं सुधा।”

सम्मान को घोर विष और अपमान को विषवत् समझो।
पूज्य गोस्वामी जी ने भी सूत्र दिये थे-

सुत वित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।

लोकेषणा सम्मान का प्रतिस्फुटन है।ये सब बाध्यकारी भोग के लिए स्वस्वरूप
से विच्युत करके जीव को नाना प्रकार के नरकस्वर्गादि लोकों में ढकेलने वाले हैं।

मानापमान माना कि द्वन्द्व हैं।
लेकिन दोनों ही अन्तर्द्वन्द्व हैं।
मन की “मथनी” रूपिका है।
नाना शरीरों की भूमिका है।

दोहावली में बाबा ने कहा।

एक मृगा के कारने भरत धरी दुइ देह। उनकी क्या होगी गती जिनके नाना नेह।

यह दशा ब्रह्मर्षि की देखी।
तब अपनी क्या कहें लेखी।

अस प्रभु अछत हृदय अविकारी।सकल जीव जग दीन दुखारी।

वही स्मरण करायें कृपा मनुहार यहीं। अपने साधन का कोई अहंकार नहीं।

ऐसे प्रभु का अपने में गुरुकृपया जब होगा दर्शन।
तब कटे हमारे जैसे विषयी जीवों का विषयस्पर्शन।

अतः सर्वत्र दीखे वही।
चाहिए न और कुछ सही।
हे अचाह मुझे बनाओ अचाही।
कराओ अपने में रमण सदा ही।

पाकर तुम्हें शान्त अक्षय होंगे हम सदा ही
हम तुम्हारे रहें त्रिकाल सत्य सदा ही।
अपनी स्मृति में अक्षुण्ण अविरत रति दो।
आपात रमणीय संसार से विरत मति दो।

हरिः गुरुः शरणम्।

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भृकुटि विलास सृष्टि लय होई।सपनेहुँ संकट परै कि सोई।।

सुन्दरी शूर्पणखा, स्वर्णमृग मारीच और भिक्षुक रावण इन सभी का अपना मूल “असुरत्व” है।ये सभी अपने असुरत्व के विपरीत,क्रमशः सुन्दरता, स्वर्णाकारता और साधुता को धारण करते हैं।

जगदम्बा जानकी ने किसी पर अविश्वास नहीं किया था।वह वास्तविकता भी जानती थी।किन्तु “परात्पर ब्रह्म” की परा “शक्ति” सगुण साकार मानव लीला कर रही थीं। मानवीय स्वभाव के अनुरूप सहज विश्वास और “कबीर की साखी” “कबिरा आप ठगाइए और न ठगिये कोय।आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय” के मानवीय-वैचारिक आदर्श को जो प्रदर्शित कर रही थीं।इसीलिये संकट का नाटक कर रही थीं। अब देखिये
“जीति को सकै अजय रघुराई।माया ते असि रचि नहिं जाई।”कह कर “जननी” अपनी सगुण साकार लीला विलास में पूरा विश्वास दिखाते हुए उसे युक्तिसंगत भी सिद्ध करती हैं।
लेकिन “भगवत्ता” और सृष्टि की “सूत्रधारिता” इसी से खुल जाती है। क्योंकि “माया ते असि रचि नहिं जाई” कहकर “विद्यामाया”और भगवान् की “चिरसंगिनी” “अवियुक्त” माया ने संसारी माया को प्रकट प्रत्यक्ष कर दिया। नि:सन्देह “अजय” “रघुराई” कहते ही “परात्पर ब्रह्म” के अपरस्वरूप “सगुण साकार” दशरथ नन्दन”श्रीराम”की भी “मानवाकारता” पर से पड़ा पर्दा “माँ” ने एक झटके से हटा कर “उन्हे” सर्वकारण कारण जतला दिया।
संसार रचयिनी “अविद्यामाया” को भी
रचने और संचालित करने वाली “यह” “विद्यामाया” जो ठहरीं।
इसलिये मानव लीलावश “माता”ने तो शूर्पणखामारीचरावण की अनभिज्ञता का “नाटक” ही किया।नारायण!यह तो वस्तुतः”रामरामा” सबको नचावनवारी हैं।

सबहिं नाचावत राम गोसाईं। अरे नारायण
जिसकी भृकुटि विलास से सृजन पालन संहार कर्त्री अविद्या माया क्षणार्ध में तत्पर हो जाती है।और सृजनादि कार्यों में लग जाती है,उसे क्या स्वप्न में भी कोई संकट विपत्ति अथवा विपरीत मति हो सकती है?
भृकुटि विलास सृष्टि लय होई ।
सपनेहुँ संकट परै कि सोई।।

गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।

द्वितीयाद् वै भयं भवति

द्वितीयाद् वै भयं भवति ।
(बृहदारण्यक,उ.1/4/2)
जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, सब कुछ आत्मीय है।तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ,
इस संसार की रचना करके,वह परमात्मा सभी जड-चेतन प्राणियों में प्रवेश कर गया। इसका मतलब है कि,इस हमारे पिण्डभूत शरीर में और इसके बाहर भी सब दृश्यमान जगत् परमात्मा में परमात्मा का और परममात्मभाव से विद्यमान है।
हमें अपने से भिन्न किसी को नहीं मानना चाहिए। यदि हम अपने से भिन्न दृष्टि रखते हैं, तब नाना सांसारिक भयों में रहेंगे ही। अतः अपने इस मनुष्य शरीर के पहले के नाना शरीरों का चिन्तन करते हुए, सर्वव्यापक परमात्मा को सर्वत्र अनुभव में लाना चाहिए। और ऐसा अभ्यास करते-करते सभी में हरिः ओ३म् तत् सत् दीखने लग जायेगा। सारी समस्या का निदान हो गया। जब सभी में वही है, तब भय कैसा?और क्यों?
वस्तुतः सबका सबसे भागवत सम्बन्ध ही है। तह सम्बन्ध तो स्वाभाविक/प्राकृतिक/स्वतः सिद्ध है। यही भगवान् की अर्जुनोपदिष्ट वाणी में “योग” कहा गया।जीवपरमात्मनित्ययोग ही योग है।
अन्य संसार के गृहस्थादि आश्रमों के विभिन्न सम्बन्ध माने हुए,अनित्य और कल्पित हैं।
निश्चित रूप से बाकी सब सम्बन्ध माने हुए अस्वाभाविक/अप्राकृतिक/थोपे हुए सम्बन्ध हैं। अतः यदि सबमेंभगवान् मान कर सभी से भागवत्सम्बन्ध स्वीकार कर लें, जो कभी न कभी किसी जन्म में और मानव जन्म में ही ,प्रायः आभासित होते हैं, समझो मानवजीवन सफल है ।

नहीं तो भेद दृष्टि से कुछ नहीं मिलेगा। पुनः एक बार यह ईश्वरीयकृपाकरुणा को,हम ठुकरा देंगे।

सब छोटे बड़े को,पेड़ पौधे तक कोभी भगवत् स्वरूप में प्रणाम करो।

भेद देखना मनुष्य की दुर्बलता और सारी समस्या,की जड़ है।

तत्र को मोहः को शोकः एकत्वम् अनुपश्यतः(ईशोपनिषद् -7)
सभी में अपना आत्मस्वरूप वह एक ही परमात्मा देख लेने पर कोई अज्ञान नहीं,कोई दुःख नहीं और कोई भय नहीं।
इसीलिये परमात्मद्रष्टा ऋषियों ने इस मन्त्र का दर्शन किया-
“द्वितीयाद् वै भयं भवति”
इस देववाणी और वेदवाणी का सार समझो।
जीवन धन्यधन्य होगा।
अन्यथा ईर्ष्या राग द्वेष तो पूर्व शरीरों की कमाई, सब गुड़ गोबर कर देगी।

हरिः शरणम् गुरुः शरणम्।

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किम् आश्चर्यम् अतः परम्

इससे बड़ा इस मनुज शरीर का कोई भी आश्चर्य नहीं है कि,नर तन पाइ विषय मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।

मन मनन करता रहे संसारविषभोगों का।
है सतत न्यौता यही भव भवज रोगों का।

मन जब भगवान् या भगवती के किसी नामरूप में चला जाये।सब मतलब सिद्ध।

नंबर एक, हम क्या हैं, जान जायेंगे।
नंबर दो, सामने प्रत्यक्ष संसार की वास्तविकता समझ में आ जायेगी।
नंबर तीन ,सब रोनाधोना,मिट जायेगा।
नंबर चार, आनन्द ही आनन्द शेष बचेगा।

अतः आनन्द ही आनन्द में रहना है, तब इस अपने पिण्ड शरीर का और प्रत्यक्ष संसार का रहस्य जानना चाहते हो,तो सरल उपाय है-

सरल बनो,साधुस्वभाव के हो जाओ। किसी सुरक्षा उपकरण की जरूरत नहीं।No, need to security.
साधु सन्त के तुम रखवारे।
असुर निकन्दन राम दुलारे।
अतुलितबलधाम,अन्जनी कुमार, रामदूत, श्रीहनुमानजी महाराज कृपा करेंगे।

करना क्या है, केवल भगवन् नाम का जप, राम जपो राम जपो राम जपो भाई।
(श्रीविनयपत्रिका)
शरीर पूरा होने पर,जब दूसरे लोग, अपने कर्तव्य कर्मवश राम-राम , नाम रटें, तो वह सूक्ष्म शरीर, (प्राण) जो लम्बे समय से,उस पार्थिव पिण्ड में था,राम नाम को
सूक्ष्म शरीर से सुनता तो है, लेकिन भारी विपत्ति, रामनाम स्वयं नहीं ले सकता।

अस्तु ” राम राम राम , जीह जौ लौं तू न जपिहै,तौ लौं तू कहूँ जाय ,तिहूँ ताप तपिहै।”(श्रीविनयपत्रिका)

इसीलिये इस मानव देह का सबसे बड़ा आश्चर्य ही है, कि जिन भगवान् की करुणा से यह नरतन, बर्तन मिला है, उसमें संसार का वैषयिक भोग ही बसा है,क्योंकि “महदाश्रय” नहीं मिला, और महदाश्रय(महापुरुष)इसलिये अनुपलब्ध कि, “रामनाममहाराज” चित्त में नहीं आते। रामनाम सरल सुलभ है। हमने
ऐसे भारत देश में जन्म लिया है, जहाँ की सभ्यतासंस्कृति,अनादि है,सनातन है।

जहाँ गली-गली में हनुमानजी के मन्दिर मिलेंगे ,अनगढ़ पत्थर शिवरूप में पूजे जा रहे हैं।और “शिव” हैं कि अहर्निश रामनाम
सादर जपते हैं।
“तुम पुनि राम राम दिनराती।सादर जपहु अनंग अराती” (श्रीराचरितमानस)

हमें राम राम रटना ही तो है,मन में,और
हमारी जीभ हमारे वश में है।
जो हम चाहते हैं, एड़ी चोटी लगा देते हैं, उसे पाने,खाने के लिए।और खाद्याखाद्य खाकर सन्तुष्ट भी हो जाते हैं।फिर खाने की जरूरत बनी रहती है।
अरे! खाओ चबाओ पीओ राम नाम, अनुभव करके देखो। जिह्वा हमारी है, हमारे वश में है।
दुर्भाग्य! है कि, ऐसा मानव शरीर पाकर भी, नापजप हर क्षण,न करके संसार का चिन्तन करते-करते पुनः गिरना, पुनः दूसरे शरीर पाने की यात्रा की ओर हम
इस “रथशरीर” को आगे बढ़ा देते हैं।

रामकृष्णनारायण दुर्गारमा सरस्वती काली नामों को चौबीसों घण्टे जप कर,ही संसार, पर काबू पाओगे।
संसार की संपदा भी मिलेगी।
परलोक भी बनेगा ,लेकिन,कैसी प्रचण्ड माया है।लुभाये,भुलाये बैठी है।
नारायण !भाग जायेगी “माया” लेकिन केवल “नामजप”से।
इसके बिना हम दुर्दशाग्रस्त होकर नरकों और नारकीय शरीरों की प्राप्ति बार-बार करते जा रहे हैं।


राम बिमुख संपति प्रभुताई।
जाइ रही पाई बिनु पाई।।

सुलभं भगवन् नाम ,जिह्वा च वशवर्तिनी।तथापि नरकं यान्ति किम् आश्चर्यम् अतः परम्।।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

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जीवन-पाथेय-महदाज्ञा

तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्
ईशावास्यं इदं सर्वम्

भगवच्चेतना,यत्र-यत्र-सर्वत्र व्याप्त है।
उसके सिवाय कुछ है ही नहीं।
आवश्यकता है, अनुभूति की।

वह परमात्मा इस,ब्रह्माण्ड को रचकर,
इसमें प्रवेश कर गया।और यह समस्त जीवजगत् “उसीका” आवास है।

अतः जड़-चेतन-प्राणि-मात्र की हिंसा अथवा उनके प्रति हिंसा का भाव रखना ईश्वर के प्रति हिंसा है।

मनुष्य शरीर मनुष्य बनने के लिए मिला है।”मनुर्भव”।

किसी भी अच्छे-बुरे भोग भोगने ओर किसी भी अन्य शरीर में जाने के लिये नहीं मिला है।

अतः हरि गुर सन्त वाणियों का महदाश्रय ग्रहण करें।
नारद-शुक-सनकादि-व्यास
अपनी-अपनी वाणियों में आज भी अपने “ग्रन्थरूप”
में विराजे हैं।
“बिना महत्पादरजोभिषकम्”

तुलसी-कबीर-सूरमीरा-रैदास
आज भी” जीवन्त”हैं।भगवत् स्वरूप होकर सार्वकालिक हैं। अपने-अपने “आत्मानुभूति” परक भगवत् कथा-लीला-गुण-रूप ग्रन्थों में प्रत्यक्ष होकर दीख रहे हैं।

हाँ,इन सबका, किसी एकं का सहारा तो लेना ही होगा।

दुर्लभ हैं,तीन चीजें इस भवाटवी में, असारसंसार के “मायाजाल”में।
1-मनुष्यता।मानवीय(भगवान् के ) गुणों -करूणाक्षमादया की अभिव्यक्ति,स्वीकार्यता,
ग्राह्यता, अभिज्ञान(पहचान)
और तदनुरूप नैत्यिक व्यवहार।
2-मोक्षेच्छा।जन्म-मृत्यु के बन्धन से छूटने की इच्छा।
3- सन्तसद्गुरु का चरणाश्रय

यह सभी दुर्लभतम चीजें भगवान् की कृपानुग्रह के विना मिलेंगी भी नहीं।
मनुष्य का शरीर ही –
“हरिः ओ३म् तत् सत्” की करुणा से प्राप्त है।हम जैसे मलिनचित्तजीव की ऐसी योग्यता कहाँ?
कबहुँक करि करुना नर देही,देत ईस बिनु सनेही।

आद्याचार्य भगवत् शङ्कर ने अपने “विवेकचूडामणि” में ऐसी विवेकवाणी व्यक्त की-

दुर्लभं त्रयम् एव इदं, देवानुग्रह-हेतुकम्।मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः।

अतः मनुष्य जीवन निरर्थक न होने पाये,इसके लिये “हिंसात्याग” कर हरि गुरु सन्तों की बात मान कर, तत्क्षण “शुभ” हेतु प्रयास करें।
मातु-पिता हरि गुरु की बानी।
बिनहिं बिचार करै शुभ जानी।।
महद् आज्ञा का उल्लंघन, पतनोन्मुख करेगा।
अतः कालिदास कहें -” गुरूपदेश आज्ञा, विचार किये विना,पालनयोग्य है।
आज्ञागुरूणां हि अविचारणीया”अथवा
तुलसी,-“अनुचित उचित बिचार तजि जे पालहिं पितु बैन,ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन”
इसे जीवन का पाथेय बनायें।

हरिः शरणम् गुरुः शरणम्

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“सकुचि दीन्ह रघुनाथ”

ध्यान रखें यह ऋषियों की,वेदपुराणों और अजन्मा भगवान् के द्वारा जन्म लेने वाले रामकृष्ण की धरती है।
यहाँ किसी का “भोगवाद” नहीं चला, चल भी नहीं सकता।

हमारे सनातन धर्म में दान का अर्थ हमारे पूर्वजन्म के शरीर के प्रारब्धकर्म से मिली धरतीधनादि को देने से है। जब हम अत्यंत श्रद्धा पूर्वक, किसी भी वस्तु,पदपदार्थ,जमीन ,मकान दुकान, रूपयापैसा,जो हमारे अधिकार में है, उस पर अपना अधिकार स्वयं समाप्त कर, किसी दूसरे को, इन सबका अधिकार सौंपते हैं।
तब वह ” दान” कहा जाता है।यह हमारा धर्म शास्त्र है।

भगवान् ने बिना श्रद्धा के,किये दान को “असत्” कहा और ऐसा दान इस लोक और परलोक दोनों में कोई फल देने वाला नहीं होगा,ऐसा बताया है।
“अश्रद्वया हुतं दत्तं तपः तप्तं
कृतं च यत्।असद् इति उच्यते पार्थ! न तत् प्रेत्य नेह च।।”

अतः दान की सनातन धर्मनिष्ठ विधि व्यवस्था जानकर ही दान में प्रवृत होना
चाहिए।

किसी “विधर्मी” की मीठी-मीठी बातों से सावधान रहना चाहिए ।हमारी आत्मा रामकृष्णनारायण हैं।हमें उनकी वाणी का अक्षरशः पालन करना चाहिए।और
भगवान् की कथा नित्य ही सुननी चाहिए,क्योंकि केवल वही हमारे अन्तः इन्द्रिय मनबुद्धिचित्ताहङ्कार के मालिन्य
की सफाई करती है।
हम अपने शरीर घर द्वार की सफाई जैसेकि रोज-रोज करते हैं।उसी तरह उक्त “अहमादि” की मलिनता (गन्दगी)को जैसी हरिकथा शुद्ध कर देती है, वैसी और कोई नहीं।
“हरिकथा” और कुछ नहीं रोज-रोज का “सत्संग” ही है।
हरिकथा सुनने से श्रीहरि चित्त में आ विराजते हैं।”हरिः चित्तं समाश्रयेत्”और

“बिनु सत्संग न हरि कथा ,तेहि बिनु मोह न भाग।मोह गये बिनु रामपद होइ न दृढ़ अनुराग।”
संसार के त्रिविध गुणों ,सद् रजःतमः से
मलिन बनता रहता मन और चित्त कभी भी भस्मसात् हो चुके समस्त शुद्धसाधन
वाले कलियुग में विशुद्ध नहीं हो सकता।
केवल और सन्तसंगहरिकथा ही मलिन जीव के अन्तःकरण को परिमार्जित करती है।
इसलिये नित्य भगवत्कथा से मन को नहलाना धुलाना होगा। तब विवेक जागेगा।बस समझिये हो गया काम।

और दान तो श्रद्धा से, किसी जोर दबाववश नहीं हो,ऐसा वेद भी कहते हैं।

“भय मानते हुए, कि यह सब मेरा नहीं प्रभु का है, दान करो। सम्पति,सामर्थ्य के अनुसार दान करो । लजाते सकुचाते हुए दान करो ।”

“भिया देयं,श्रिया देयं,ह्रिया देयम्”

“तैत्तिरीय” उपनिषद् की ब्रह्मानन्दवल्ली

विभीषण को जब श्रीमान् रावण,लात मारकर राज्य से भगा देते हैं, तब वह श्रीभरत जी सेवित श्रीराम के चरणों में जाकर गिर पड़ता है।
भगवान् उसे उठाकर गले लगाते हैं, बगल में सादर बैठाते हैं।और तत्क्षण “लंकेश” ही कह देते हैं।
” कहु लंकेस सहित परिवारा
कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।
खल मंडली बसहु दिन राती।
सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
अब देखिये, भगवान् तो सबके अन्तर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। भगवत्ता, जिसे छिपा कर वह मर्यादा में रहते हैं,एकाएक प्रकट हो जाती है।
बिना लंका का राज्य मिले ही लंकेश कह डालते हैं।

अपना दर्शन संसार में अमोघ (कभी व्यर्थ न होने वाला ) कहते हैं।और लंका के सिंहासन के अनिच्छुक विभीषण का “राजतिलक” ही कर डालते हैं। आकाश
से देवता फूल बरसाते हैं। इसलिये कि “रावण का काम तमाम” होना सिद्ध हो गया।
“जदपि सखा तव इच्छा नाहीं।मोर दरस अमोघ जग माहीं।।अस कहि राम तिलक तेहिं सारा।सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।”

और नारायण! दान के विषय में स्वयं परमात्मा “वेद” की मर्यादा रखते हुए, सकुचाते लजाते हुए लंका का राज्य सौंप देते हैं।
अतः अपना कुछ भी नहीं है ।प्रारब्धवश जो कुछ कहने के लिए मेरे हिस्से का स्वतः उत्तराधिकार वश या स्वयं श्रम करके हमने पाया है,उसे ईश्वर का माने।

“दानम् एकं कलौ युगे” इस व्यास वचन को विचार करके,श्रद्धा से दान दें।

क्योंकि सतयुग, त्रेता,द्वापर में क्रमशः तप,ज्ञान,यज्ञ(तपः परं कृतयुगे,त्रेतायां ज्ञानम् उच्यते।द्वापरे यज्ञम् एव आहुः दानम् एकं कलौ युगे) “धर्म”की धुरी रहा है।और कलियुग में दान ही धर्म की धुरी है।
इसीलिये भगवान् भी स्वयं की श्वास से प्रकट ” जाकी सहज स्वास स्रुति चारी”यस्य निःश्वसिता वेदाः” वेद की मर्यादा की रक्षा करते हुए संकुचित होते हुए, विभीषण को दान करते हैं।
“यह दान वैदिक मर्यादा का दान है।”
“अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्ड की अनन्त सम्पदायें सब भगवान् की हैं।”
तब भी नरलीला में भगवान् नागरिक मर्यादा सिखाने के लिए लजाते शर्माते लंका का राज्य विभीषण को देते हैं –

जो संपति सिव रावनहिं दीन्हि दिएँ दस माथ।सोइ संपदा बिभीनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ।।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।


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नामवाणी निकट श्यामश्यामा प्रकट

बिना नाम जपे संसार में गुजारा नहीं।
जिन्होंने इस संसार को गुजर जाने को बाध्य किया,वे बड़े-बड़े नामजापक अनुकरणीय हैं, जिन्होंने माया को ठेंगा दिखा दिया। व्याख्येय विषय की मीमांसा
रामकृष्णनारायण नामोच्चारण से प्रारंभ की जा रही है।
नारायण! यह शरीर पाँच तत्वों -” क्षिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम शरीरा।” है।
यह जड़ तत्व हैं। इनमें कोई स्पन्दन नहीं। निर्लेप, निर्गुण, निराकार, आत्मा जो परमात्मा का अंश है, उसके शरीर में स्थित रहने से यह क्रियाशील रहता है।
“गगन समीर अनल जल धरनी।इनकै नाथ! सहज जड़ करनी।”ये शब्द समुद्र ने सुन्दरकाण्ड में रघुनाथ जी से कहे थे।

वस्तुतः शास्त्र और सन्त सारे ब्रह्माण्ड को भगवान् की “माया” द्वारा रचित मानते हैं,जो कि परमसत्य है। इस माया का वर्णन श्रीकागभुशुण्डि जी ने गरुड जी के समक्ष,उन्ही के उत्तर के रूट में “उत्तर काण्ड” में किया है-
“सुनहु तात यह अकथ कहानी।समुझत बनइ न जात बखानी।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
चेतन अमल सहज सुखराशी । सो मायाबसभयउ गोसाई ।बन्ध्यौ कीरमर्कट की नाईं ।जड़ चेतनहिं ग्रन्थि परि गई।
जदपि मृषा छूटत कठिनई।तब ते जीव भयउ संसारी।छूट न ग्रन्थि न होइ सुखारी।”
यह जीवात्मा जो पंचतत्व के “पिण्ड” में बैठा है, निश्चित रूप से अविनाशी, चेतना पूर्ण निर्मल,स्वाभाविक सुखपूर्ण, रहनेवाले “ईश्वर” का “अंश” है। वह “ईश्वर” हमारा “अंशी” है।और हम उसके “अंश” मात्र। सत् रज और तम यही कुल तीन गुण हैं। लेकिन यह यह गुण – अविद्यामाया ( प्रकृति) के हैं।
सत् रज और तम गुणों का क्रमशः तीन – सुख-दुःख-मोह, यह कार्य है।
इस जड़ ” पिण्ड” शरीर में उक्त सुख दुःखादि , इन्हीं के कारण, अनुभव में आता है।
यह माया भगवान् की है।
इस माया के दो रूप हैं।
1-अविद्या माया (इसीसे संसार में चेतना है)
2-विद्यामाया(भगवान् की चिर संगिनी, कभी भी क्षण मात्र के लिए भी वियुक्त न होनेवाली सरस्वती,लक्ष्मी और उमा)
मूलरूप में “विन्ध्यवासिनी” जो, दुर्गा-सीता-राधा रूप में कार्यविशेष से “अवतरित” हुई, भगवान् की चिरसंगिनी
“विद्या माया” है।
अतः माया के विषय में यह दो रूप अवश्य जानना चाहिए।

अब देखिये, गोस्वामी जी की पंक्तियों की यह अर्धाली – सो माया बस भयउ गोसाईं।बन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं।
मतलब कि ऐसे निर्विकार चेतन,परमात्मा का अंशभूत यह जीव सुख में रहना चाहिए, किन्तु उक्त प्रकृति यानी कि ” अविद्या माया” के सद् रज तम आदि गुणों में जकड़ कर बँध जाता है।
जैसेकी कीर(तोता) और मर्कट(बन्दर) पिंजर-डोर में बँध जाते हैं।वैसे ही यह मनुष्य भी माया के मायिक गुणों से बने संसार की भूलभुलैया में अपना ईश्वरीय आत्मस्वरूप भूल कर बँधा है।

नारायण!त्रिविध गुणों(मायिक गुणों)के कारण इस संसार में बन्धन और बार-बार जन्म होता है।
सृष्टि चलाने के लिए ही यह माया (अविद्या माया) और उसके गुणों की आवश्यकता भी है,लेकिन बस उतने मात्र के लिए ही।और सबसे बड़ी बात कि, यह ज्ञान , कि यह माया के गुण हैं, इसे बताते हैं ‘सन्तसद्गुरु’। ये सद्गुरु हैं –
सूर ,कबीर, तुलसी,नानक, मीरा, रैदास, जो अपने “आत्मानुभूत” वाणियों के माध्यम से”ग्रन्थाकाररूप”में जीवित हैं।

इनके पहलेभी- नारदव्यास,शुक,सनकादि, के रूप में अपने स्वानुभूत परमात्मचिन्तन ग्रन्थों( कृतियों ) भक्तिसूत्र ,भागवत आदि पुराणों के रुप में वे आज भी जीवन्त अनुभव किये जा रहे हैं।
बिना इन सन्तसद्गुरुओं का आश्रय लिये
भगवान् की दुस्तर माया और त्रिविध गुणों के झंझावात रूप शरीरसंसार से विरति सम्भव नहीं।
“हरि माया अति दुस्तर,तरि न जाइ बिहगेस।” उत्तरकाण्ड।
मायाधीश भगवान् कृष्ण ने मायाधीन
इस जीवात्मा को इससे बचने और माया की गाँठ(फाँस) से बचने के लिए अर्जुन के माध्यम से जीवजगत् को सन्देश दिया

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
माम् एव ये प्रपद्यन्ति मायामेतां तरन्ति ते।
और कहा कि-
मद् भक्तानां तु ये भक्ताः ते मे भक्ततमाः मताः। गोस्वामीजी ने भी उत्तर काण्ड में कहा- “मोरे मन प्रभु अस बिस्वासा।राम तें अधिक राम कर दासा।”

भगवान् की त्रिवधगुणमयी माया से पार पाना अत्यंत कठिन है। जो नामरूप लीलाधाम के द्वारा मेरे भक्तपरायण हो जाते हैं, वे ही इससे मुक्त हो पाते हैं। नारदशुकसनकादि हनुमानजी जैसे भक्तों के जो भक्त बन जायें, तो ही सब समस्या का समाधान है।क्योंकि “भक्तभक्त” मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं। और इस भक्त का भक्त बनकर अविद्यामाया के पार जाकर मानवजन्म सफल होगा।

और रह गई ईश्वरीय माधुर्य गुणों की तो, यह करुणा दया, क्षमा, सहजता सरलता,वात्सल्य आदि रूपों में निरन्तर वर्षाधारा की तरह , उन्ही ईश्वर की अभिन्न (शक्ति) विन्ध्यवासिनी-दुर्गा-सीता और उमा-राधा रूपों के माध्यम से बरबस कृपा बरसा रही है।
इसीलिये बरसाने में यही “शक्ति” बरसाने वारी कही जा रही है।किन्तु केवल भक्तों का भक्त बनकर,उनके माध्यम से ही अनुभूति का विषय बन जाती है। भक्त
नारद ने ध्रुव प्रह्लादादि के लिये माध्यम बनना स्वीकारा,क्योंकि इन भक्तों की किंचित् प्रवृत्ति भगवान् के प्रति थी। सब जानते हैं,कि –
जगदम्बा के परमनिष्कामी भक्त पूज्य
परमहंस रामकृष्णदेव ,जब युवा सन्यासी विवेकानन्द को माँ काली का अनुभव कराते हैं, तब यह उदाहरण रूप में बहुश्रुत और सार्वजनिक हो जाता है ।

और यदि कोई भी अवगुण यदि मुझमें है, तो संसार के ,शब्द ,स्पर्श,रूप,रस,गन्ध आदि पाँच विषयों में आकृष्ट होने से है।
इस आकर्षण से बचना, भक्तचरणाश्रय से ही हो पाता है।
ये विषय, क्रमशः उन्ही -आकाश, वायु, अग्नि, जल,पृथ्वी के हैं।
अब रह गई ईश्वरीय करुणा आदि गुणों के पाने की, तो यह सब उस” अंशी ” ईश्वर का “अंश” होने से हम सभी मनुष्य शरीरों में स्वतः है।अनुभव में नहीं आता बिना माध्यम के।
“अस प्रभु अछत हृदय अविकारी।
सकल जीव जग माहिं दुखारी।।”

कलिकाल में केवल नारायण हरि राम कृष्ण लक्ष्मी सीता राधा उमा दुर्गा नामों का सतत जप अभ्यास करके जन्म-मृत्यु का बन्धन कटेगा, माया की गाँठ छूटेगी।
गोस्वामीजी अन्त में कह डालते हैं,देववाणी में –
“हरिं नरा भजन्ति येतिदुस्तरं तरन्ति ते”
अति दुस्तर ” अविद्या माया ” का स्तर बड़ा ऊँचा है, विकट है। और विकट है तो इस मानव जीव के जीवन का बहुत बड़ा संकट है।

किन्तु इसके लिए शुकसनकादि नानकमलूकमीरा तथा तुलसीकबीरादि की वाणियों का अवलम्ब लेना होगा, जिनमें भगवन् नाम को ही मानव जीवन के चरमलक्ष्य मायामुक्ति और भगवद्दर्शन
का एकमेवोपाय कहा गया।
इसीलिये व्रज के सिद्धरसिक गा-गाकर धन्यातिधन्य कृतकृत्य हैं-

“सत्य है यह विकट संसार जायेगा कट
नाम वाणी निकट श्यामश्यामा प्रकट”
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तरूपा
नारायणि नमोस्तुते


गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

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राम जपो

देखो बड़ी बातें कह देना लिख देना और कुछ है ।
किन्तु रामकृष्णनारायण नामों का सतत मनवचनकर्म में अनुभव करना दूसरी बात।
रामकृष्णनारायण नामों का चौबीसों घंटे जब सतत स्मरण करोगे तब आदमी बनोगे। मैं तो आदमी बनने की तलाश इन्हीं नामों में कर रहा हूँ। आज से अभी से इनके लीला कथा चरित अमृत में डूब जाना पड़ेगा।
तब आत्मस्मृति होगी।
आत्मस्मृति होते ही जगद् में जगत् के कण-कण में आमने सामने इधर उधर छोटे बड़े सभी में तत् तत्व आत्मतत्व का इन्हीं चर्मचक्षुओं से दर्शन होने लगेगा। सब काम बन जायेगा।
और नहीं तो रोज चौबीसों घंटे सतत नाम स्मरण नहीं होगा।कुछ उखड़ने वाला नहीं। यह त्रिगुणात्मक माया सब उखाड़ देगी।
राम राम राम जीह जौ लौं तू न जपिहै।
तौ लौं तू कहूँ जाय त्रिविध ताप तपिहै।

गुरुः शरणम् ।हरिः शरणम्।

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विनयप्रेम से परमसत्ता-बोध

नारायण!इस संसार में,सबको धरनेवाली इस धरती पर कामनाओं का अन्त नहीं। सारी धरती का सारा साम्राज्य भी किसी एक को दे दिया जाय तब भी कमी बनी रहेगी। भगवान् के ध्रुव प्रह्लाद आदि भक्त, तो भगवान् से भगवान् को ही माँगते हैं।
नचिकेता यमराज से परमात्मसत्ता की जिज्ञासा करता है।
नारद शुकसनकादि की वाणियों का सार भी यही है।हमें इन्हीं का सहारा लेना पड़ेगा, जहाँ नारदजी “भक्ति”की सर्वोच्चता निष्कामता को स्वीकारते हैं। क्योंकि एक कामना पूरी होते ही दूसरी कामना मुँह बाये खड़ी रहेगी।और हम भगवान् “दास”नहीं, बल्कि “कामनादास” बने रहेंगे।
अतः भगवान् की कृपाकरुणा से मिले मानव शरीर के जन्म को सार्थक करना है तो, कामनाओं का दास नहीं भगवान् दास बनकर ही पुनः जन्म का बन्धन कटेगा।

भगवद् विग्रह या भगवान् के अर्चावतार का अर्चन इसलिये कि, “भोग” के लिये न जन्मना पड़े,बल्कि भगवदाज्ञा से भगवान् के परिकर बन कर भगवान् के ही साथ उनकी उद्घोषणा ” धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे” में योग के लिये और
भगवद् रसलीलाविलासार्थ “रसो वै सः” की रसानुभूति हेतु जन्म हो।इसके लिए वेदादिशास्त्र और उनके आचारक साधु-सन्त या उनकी वाणियों का आश्रय और कहिये कि उन्ही चरण रज लेनी होगी -“विना महत्पादरजोभिषकम्”
इसकी सिद्धि दीखती नहीं।
जब नारद जी अपने “भक्तिसूत्र” में “भक्ति”की सार्थकता बताते हैं। तब इसे कामनारहित ही कहते हैं।
“सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्” वे तो
कामना त्याग को भक्ति का मूलाधार बताते हैं। इसका संकल्प लेते ही-
भक्तवत्सल भगवान् लौकिक अलौकिक सभी सुख दे देते हैं। निष्कामता में कहीं भी सन्तोष ढूँढना नहीं है।सिद्धरूप में वह
सन्तोष स्वतः प्राप्त है। इसके लिए कमर कस करके,संसार में-
प्रभु प्रदत्त कार्य को विनय और प्रेम पूर्वक करना होगा। जिसमें अहं भूमिका
समय और अनुशासन की भी है।
सभी में मनुष्यों में प्रभु सत्ता देखकर दण्डवत् प्रणाम करना होगा।कम से कम
लीलापुरुषोत्तम ने आज से 52सौ साल पहले यही उपदेश किया था-
दण्डवत् प्रणमेद् भूमौ
आश्वचाण्डालगोखरान्।
भागवत महापुराण

अ+अश्व=आश्व चाण्डाल गो खर
अश्व,चाण्डाल, गो और खर(गदहा)”आ”
(तक) को देखकर भगवद् भाव से दण्डवत् प्रणाम करे। नारायण! सीखना होगा।
इसीलिये तीन-तीन बार रघुनाथ जी का दर्शन करने वाले-
“रामचरित मानस” जैसे अद्वितीय ग्रन्थ की रचना करनेवाले परम पूजनीय प्रातः स्मरणीय “गोस्वामीजी” जी ने
कहा-
जड़ चेतन जग जीव जत
सकल राममय जानि।
बन्दौं तिनके पदकमल सदा जोरि जुग पानि।
सियाराममय सब जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।

यही तो मनुष्य जीवन की मर्यादा है।मानवीय जीवन का संविधान है।
इसके बिना किसी को कुछ नहीं मिला है और न ही मिलेगा।
“विनय” और”प्रेम” मानव के सर्वोच्च अस्त्र-शस्त्र हैं।
विनय प्रेमबस भई भवानी।
खसी माल मूरति मुसुकानी।

इसलिये रामकृष्णनारायण नाम जपना जिससे”अतिविनयी” और “अतिप्रेमी” प्रभु की “प्रेमाभक्ति” पाकर जीवन सार्थक हो जाय।अपने और प्रभु के नित्य सम्बन्ध की “स्मृति” होकर मानव-जन्म सफल हो।
विनय और प्रेम के बिना जगत् की वास्तविकता और ” परमसत्ता” का बोध
नहीं होगा,नहीं होगा।

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।