“मानव शरीर प्राप्ति, घर वापसी”


यह मनुष्य जीवन घर वापसी है। घर कौन? परमात्मा।
जीवात्मा का अपना घर परमात्मैव।
लेकिन जब तक छोटा/बड़ा ऊँचा/नीचा इस चमड़े के नेत्र से दीखता रहेगा।
तब तक भोगने वाला कर्म होता रहेगा।
और पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् चलता रहेगा, नाना शरीरों की यात्रा जारी रहेगी।
हे हरि कवन जतन भ्रम भागै।

यह जाति विद्या पद पदार्थ जमीन मकान दुकान का महत्व और रूपयौवनादि का अभिमान बना रहेगा।
कोई भक्ति, पूजा-पाठ जप तप आराधना तीर्थ समाधि योग ध्यान गंगास्नान काम नहीं आयेगा।
भक्ति केवल शरणागतिभाव है,जिसे अपने नेत्रों से दीख रहे भेददर्शन को मिटाने से मिलेगा।
सिया राम मय सब जग जानी
करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।
को अपनाये बिना सब आराधना अभिमान मात्र है।
स्कन्द -पुराणे –
जातिः विद्या महत्वं च रूपं यौवनमेव च।
पञ्चैते यत्नतः त्याज्याः
एते वै भक्तिकङ्टकाः।।

अपने को अपने में देखो
सभी में वही एकः देवः सर्वभूतेषु गूढः।

जब अपनी पहचान होगी तब भेदबुद्धि भ्रम मिटेगा।
अपनी पहचान गीता, रामायण जैसे शास्त्र सतत सेवन करने और रोज भागवत -रामकथा सुनने से ही होगी।
दुनिया के तीर्थों में जाकर भी मनुष्य भी नहीं बन पाओगे यदि निष्कामी साधु सज्जन सन्त का संग नहीं मिला।
भगवान्/भगवती से प्रार्थना मात्र इतनी की जैसे विभीषण को हनुमान् जी मिले,क्योंकि इसमें कारण केवल सीताराम जी का अनुग्रह ही था।
” अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता,बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा तौ तुम मोहिं दरस हठि दीन्हा।”

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।बन्दौं सबके पदकमल सदा जोरि जुग पानि।

पहले अपने को पहचानो
तब समझ में आयेगा कि,जो मैं हूँ वही सामने दीख रहा सब कुछ है।
नारायण नारायण नारायण
सीताराम सीताराम सीताराम
राधेकृष्ण राधेकृष्ण राधेकृष्ण

दुर्गा सीता राधा उमा रटते रहो
चैबीसों घण्टें।सब दृष्टिदोष मिटेगा। सब में भगवान्/भगवती दीखेंगे।
मनुष्य जीवन सफल होगा।

गुरुः शरणम् ।हरिः शरणम्।।

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भरतहिं जानि राम परिछाहीं


भरत तो राम की परछाईं हैं। जिस प्रकार करुणा,दया,शरणागतवात्सल्य और प्रेम
श्रीराम में है,वह केवल भरत में सम्भव है।
क्योंकि भरत श्रीराम की परछाईं हैं,और
कोई भी परछाईं अपने “मूल”से भिन्न हो ही नहीं सकती।
नारायण! जो रूप-स्वरूप धारण करके व्यक्ति चलता है, परछाईं ठीक उसके पीछे-पीछे अनुगमन करती चलती है।
“मूल” की मौलिकता,”प्रतिच्छाया” से एकदम अभिन्न होती है।
श्रीभरत की रामप्रतिच्छायिता होने से वे अपने मूल श्रीराम जी से पूर्णतः एक हैं। तात्पर्यतः उनका भी निश्चयेन छायात्वेन “गोद्विजधेनुदेवहितकारित्व” सिद्ध है।
मतलब कि मर्यादा और लोकमंगल की प्रतिस्थापना करने के लिए “रामावतार”
हुआ है, तो भरत इससे विपरीत कैसे हो सकते हैं? इसलिये –
कोई भी भय देवताओं को अपने मन में कदापि नहीं रखना चाहिए,”गुरुबृहस्पति” का “गुरुमत”यही मूल्य स्थापित करता है।

राक्षसों के अनाचार से पीड़ित शिव और ब्रह्मादि देवताओं सहित गोरूपिणी धरती जब व्याकुल होकर भगवान् की शरण ग्रहण करती है, तब शरणागतवात्सल्य में अभिससिंचित श्रीहरि की गो-गिरा तो निर्भयता का”कवच” ही बन जाती है-
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा।
तुम्हहिं लागि धरिहहुँ नरबेसा।।

इधर “रामलीला “के भरत-राम संवाद में भगवान् श्रीराम, भरत की विह्वल दशा देख कर अत्यंत संकुचित हो जाते हैं-
“अंतरजामी प्रभुहिं सँकोचू”

जब प्रभु संकोच में तब उनकी परछाईं जैसे भरत भी अभिन्न होने से भगवान् के अत्यान्तात्यन्त अनुग्रह आशीष का स्मरण करते हुए दोनों हाथ जोड़कर विनयावनत
हो जाते हैं-
कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।
यदि गुरु वशिष्ठ प्रसन्न हैं और प्रभु भी हमारे ही अनुकूल तब मेरा अब कोई भी आग्रह नहीं।
मेरा दुर्भाग्य माता कैकेयी की मोहासक्त “कुटिलता” विधाता की “विषमता” और काल की “कठिनता”है।
मेरा पैर ही खींचकर इन सभी ने मुझे कष्ट दिया है और हे मेरे प्रभु!आपने तो अपने और रघुकुल की मर्यादा “रघुकुल रीति सदा चलि आई।प्रान जाहिं पर बचन न जाई” का मार्ग छोड़ा ही नहीं।संसार तो भला,भला कहाँ?(दुःखालयमशाश्वतम्)है।

आपका स्वभाव कल्पवृक्ष के समान है, क्योंकि,उसमें सन्मुख-विमुख होने का कोई मतलब नहीं है,वृक्ष की परिधि तो वृत्ताकार है।जो भी उसकी छाया अथवा शरण ग्रहण करता है , उसकी इच्छा भला अपूर्ण कहाँ?
“कहौं कहावौं का अब स्वामी ।कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।।गुरु प्रसन्न साहिब अनुकूला।मिटी मलिन मन कलपित सूला
मोर अभागु मातु कुटिलाई बिधि गति बिषम काल कठिनाई।।पाउ रोपि सब मिलि मोहिं घाला।प्रनतपाल पन आपन पाला।।जगु अनभल भल एक गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाई।।
“देउ देवतरु सरिस सुभाऊ।
सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।

गुरु और आप जैसे स्वामी को पाकर अब कोई सन्देह और क्षोभ मन में नहीं रहा।
जो जनहित हो,आप वही करें ।सेवक भरत का आपकी सब प्रकार से सेवा ही सर्वोच्च है।सेव्य को यदि सेवक संकोच में डाल दे,तो उसकी बुद्धि बिगड़ी हुई है।
सेवक अपने सेव्य की सेवा पर अडिग रहे।अपने सुख-लाभ का लोभ छोड़े।
” लखि सब बिधि गुरु स्वामि सनेहू।
मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू ।।
अब करुनाकर कीजिअ सोई ।
जन हित प्रभु चित छोभु न होई।।
जो सेवकु साहिबहिं सँकोची।
निज हित चहइ तासु मति पोची।।
सेवक हित साहिब सेवकाई।
करै सकल सुख लोभ बिहाई।।
भरत सेवक और भगवान् सेव्य हैं।सेवक तो सेव्य का अनुगामी होता है,इसीलिये वह सेव्य की छाया की तरह चलता है।

इसी सूर्यवंश परम्परा में महाराज दिलीप,जब गोसेवाराधना धर्म में थे ,तब उनकी सेवा इसी तरह थी।महाराज दिलीप नन्दिनी के पीछे-पीछे उसकी छाया(परछाईं)की तरह चलते हैं।महाकवि कालिदास ने गुरु वशिष्ठ प्रदत्त “नन्दिनी”
की सेवा करते हुए दिलीप का वर्णन किया है-” जब जहाँ वह बैढती तब,तहाँ राजा बैठते और जब उठ कर चलती तब वह उसके पीछे-पीछे चलने लगते थे।”
” स्थितः स्थिताम् उच्चलितः प्रयाताम्।
निषेदुषीम् आसनबन्धधीरः”
इस प्रकार “छायासेवा”की सरणि भरत की अपनी मान्य पूर्व परम्परा है।इसलिये ” भरतहिं जानि राम परिछाहीं”
भरत ने आगे गुरुसम्मत अनेक प्रस्ताव प्रभु राम के समक्ष रखे हैं-
1- यदि भगवान् अयोध्या लोटें तो सभी अवधवासियों,विधवा माताओं,पुरजन,
परिजन,मेरा स्वयं का स्वार्थ सिद्ध होगा।
अनाथ अयोध्या प्रभु राम से सनाथ होगी।

“स्वारथु नाथ फिरें सबही का”

2- यदि आप द्वारा प्रदत्त “आदेश का पालन” किया जाये तो वह करोडों तरह से नीक(सुन्दर)ही होगा।यही स्वार्थ और परमार्थ रूप(दानव-वध से धरती का भार रहित होने रूप) सम्पूर्ण पुण्यफल और सारी शुभ गतियों का सार-सर्वस्व है।
और यही सभी विकल्पों का सुन्दर शृंगार भी –
“किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।
यह स्वारथ परमारथ सारू।
सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू।।”

3- प्रभु! के समक्ष सेवक भरत की विनती
यदि “उचित” समझी जाय तो यह कि “राज्याभिषेक” की समस्त सामग्री सजी सजाई है, आप “राजतिलक” करायें।
आप इस “सामग्री” को कृतार्थ करें, यदि आपका “मन” माने।
” देव एक बिनती सुनि मोरी।
उचित होइ तस करब बहोरी।।
तिलक समाज साजि सब आना।
करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।

4- अनुज शत्रुघ्नलाल जी सहित मुझे वन भेज कर सभी को सनाथ कर दें।
” सानुज पठइअ मोहि बन,
कीजिअ सबहिं सनाथ।”
5- शत्रुघ्नलाल जी और भैय्या लक्ष्मण को अयोध्या भेज दें,मैं आपके साथ वन चलूँ।
” नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ,
नाथ चलौं मैं साथ।।”
6- आप श्रीजानकी सहित अयोध्या प्रस्थान करें,और हम तीनों भाई वन चले जायँ।
” नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई।
बहुरिअ सीय सहित रघुराई।।”

हे प्रभु!जिन विकल्पों ,विधियों में से जिसमें भी आपकी प्रसन्नता हो, आप वही करें,क्योंकि-
आप तो सकलार्तिहर, करुणासागर हैं।
“जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई।
करुना सागर कीजिअ सोई।”

मेरे ऊपर ऐसा विचित्र भार पड़ा है,कि मुझे न तो धर्म का और न ही नीति का
ज्ञान रह गया है।मैनें सेवक होकर आपसे जितनी तरह की बातें की हैं, उन सभी में नीति और धर्म विचार का लेशमात्र भी नहीं है।
स्वार्थ से सनी मेरी बातें हैं, आर्त का चित्त विचित्त होता है। मैं सेवक होकर आपको उत्तर दूँ ,यह ठीक नहीं। आपका आदेश सर्वोपरि है। किसी भी सेवक के लिये स्वामी का “आदेश” होऔर वह यदि “उत्तर” दे दे तो लज्जा भी लजा जाय।
“देव दीन्ह सबु मोहि अभारू।
मोरे नीति न धरम बिचारू।।
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू।
रहत न आरत के चित चेतू।।
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई।
सो सेवक लखि लाज लजाई।।”
भरत सब प्रकार से अपार अवगुणसागर
है।स्वामी का यह परम प्रेम है कि लोग
उसे “साधु पद” से सराह रहे हैं।
अब अच्छा तो यही है कि आप जैसे “संकोची” स्वामी का मन जाने नहीं पाये। अर्थात् आपके “मनोनुकूल” जो हो,वही सभी(अवधवासियों,सभी परिजनपुरजन
माताओं ,गुरुदेवताओं ,दनुजों) के लिये भी श्रेष्ठ होगा।
“अस मैं अवगुन उदधि अगाधू।
स्वामि सनेह सराहत साधू।।
अब कृपाल मोहि सो मत भावा।
सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।।”

हे प्रभु! आपके चरणों की सौगन्ध है, भरत सत्यभाव से कहता है कि जगमंगल का हेतु आपकी आज्ञा का पालन ही है।
जिसे जो-जो आदेश हो, आप कहें,वही सबको शिरोधार्य है। सभी झूँठ,अनाचार समाप्त हो जायेंगे।
” प्रभु पद सपथ कहउँ सतिभाऊ।
जग मंगल हित एक उपाऊ।।”
” प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि,
जो जेहि आयसु देब।
सो सिर धरि धरि करहिं सबु,
मिटिहिं अनट अवरेब।।”
अनन्तर प्रभु राम शान्त रहते हैं।भरत के वचनों से देवमण्डली और तपस्वी वनवासी हर्षित हैं।अवधवासी असमंजस
में हैं, इसलिये कि जाने क्या निर्णय हो।
” भरत बचन सुनि सुनि सुर हरषे।
साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।
असमंजस बस अवध नेवासी।
प्रमुदित मन तापस बनबासी।।
चुपहिं रहे प्रभु राम सँकोची।
प्रभु गति देखि सभा सब सोची।।

नारायण! ज्ञानी-विज्ञानी वन-तापस मण्डली तो यह जानती थी कि प्रभु, धरती का भार, उतारने और भक्तों के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाने के लिए मानुष तन धर कर आए हैं –
“विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह,
मनुज अवतार।निज इच्छा निरमित तनु,
माया गुन गो पार।”
अतः सभी का भला होगा,इसमें कुछ भी अन्यथा नहीं है,क्योंकि भरत श्रीराम की परछाईं हैं- और परछाईं अनुसरण करती है “जिमि पुरुषहिं अनुसर परिछाहीं” भरत तद्वत्” “श्रीरामवत्” हैं। किसी का भी अनभल नहीं होने वाला।
इसलिये देवगुरु वृहस्पति ने देवराज को सान्त्वना दे दी थी कि, हे देवताओं मन को स्थिर करो,भरत जब रामपरछाईं हैं तब रामवत् ” भरत” से भय करना ठीक नहीं है-

” मन थिर करहु देव डरु नाहीं।
भरतहिं जानि राम परिछाहीं।।”

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम् ।

भरत चरन अनुराग

अपनी मर्यादा शिक्षण लीला में रघुनाथजी ने वनवास लीला के माध्यम से भरत का ऐसा चारुचारित्र्य चित्र उतार दिया कि स्वयं भरत का नामस्मरण ही भवसागर तारनतार बन गया।
लोक सुजस परलोक सुख सुमिरत नाम तुम्हार।
आगे भगवान् ने कहा कि शिवजी को साक्षी मान मैं सत्य स्वभाव से कहता हूँ कि, हे भरत! यह सारी धरती तुम जैसे त्यागी वीतरागी के निर्दिष्ट मार्ग के अनु- सरण से सुखी और टिकी है,सभी सुख की अनुभूति कर रहे हैं,क्योंकि”कस्य सुखं न करोति विरागः”। इसमें कोई कुतर्क नहीं करो,क्योंकि किसका किससे वैर है और किसका किससे प्रेम है, यह छिपा नहीं रहता-
कहहुँ सुभाउ सत्य सिव साखी,भरत भूमि रह राउरि राखी।तात कुतरक करहुँ जनि जाएँ,बैर प्रेम नहिं दुरइ दुराएँ।

ऋषियों और मुनियों के समीप पशु-पक्षी
निर्भ्रान्त चले जाते हैं, लेकिन उनके प्राणों के ही बाधक,बधिकों को दूर से देखकर वे भाग जाते हैं।कौन मेरा हितकर और कौन अहितकर,पशु-पक्षी भलीभाँति जानते हैं।
और मनुष्य शरीर तो परम विवेक सम्पन्न, गुणों और ज्ञान-विज्ञान, का निधान है-
मुनि गन निकट बिहग बन जाहीं,बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।हित अनहित पसु पच्छिउ जाना,मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।
तात भरत!मैं तुम्हें शैशव से ही अच्छे से जानता हूँ।तुम अपने हृदय में असमंजस क्यों रखते हो।”राजा”ने मुझे त्याग कर अपने संकल्पित “सत्य” की रक्षा कर ली।
शरीर त्याग कर प्रेम-प्रण का रक्षण किया
“तात तुम्हहिं मैं जानउँ नीके ,करौं काह असमंजस जीके।राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी, तनु परिहरेउँ प्रेम पन लागी।”
“रानी कैकेयी के प्रति प्रेम-प्रण की रक्षा सत्यसंकल्प की रक्षा, और प्रेमविग्रह चित्स्वरूप प्राणाधार मेरे(राम के) त्याग से स्वाभाविक प्राणत्याग करके “पिताजी”ने अपने पति-पिता-राज-धर्म सबकी रक्षा कर ली” उनके वचनों के विपरीत जाना मेरे लिये शोचनीय है।और इससे भी अधिक मेरे लिये तुम्हारा संकोची स्वभाव है। और सबसे बड़ी बात यह कि गुरु का मेरे लिए यह आदेश है कि, जो भरत चाहें वही,मुझे करना है-
तासु बचन मेटत मन सोचू,तेहिं ते अधिक तुम्हार सँकोचू।ता पर गुरु मोहि आयसु दीन्हा,अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।
भगवान् का भरत पर ऐसा अनुग्रह देखकर, सारी उपस्थित सभा सानन्द हो गई, क्योंकि भगवान् ने कहा कि हे भरत! तुम अपने मन में प्रसन्नता धारण करो,कोई संकोच मत करो,मैं सत्यसन्ध हूँ, जो कुछ भी तुम कहोगे,अवश्य ही मैं वही करने का वचन देता हूँ –
मनु प्रसन्न करि सकुच तजि,कहहु करौं सोइ आजु।सत्यसन्ध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाज।
अब इधर इन्द्रादि देव भयभीत हो गए।
सोचा कि राक्षस विनाश का बना बनाया खेल बिगड़ सकता है।परस्पर विचारने लगे कि भगवान् तो भक्त के वशीभूत रहते हैं।अम्बरीश-दुर्वासा की घटना का स्मरण होने लगा,कि भक्त अपने प्रति कृतापराध को तो क्षमा करते हैं, किन्तु भक्तापराध को कदापि नहीं।सभी निराश होने लगे,और मन ही मन श्रीराम जी के शरण में चले गए।किन्तु उन्होने सोचा –
” भक्तापराध तो भक्त शरणागति से ही कटेगा, इतिहास साक्षी है।”
माथा पीटने लगे और परस्पर एक दूसरे के कान में कहने लगे कि अब तो देवकार्य
भरत के हाथों है ।लम्बे समय तक विषाद में देवता रहे।”भक्तदृष्टसत्यरक्षण”और भक्त-रक्षण हेतु भगवान् ने “नृसिंहावतार”
धारण कर सबको बचाया था।
भक्तभरत-स्मरण और भक्तशरणागति ही एकमात्र उपाय है-
सुरगन सहित सभय सुरराजू।
सोचहिं चाहत होन अकाजू ।।
बनत उपाय करत कछु नाहीं।
राम सरन सब गे मन माहीं।
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं।
रघुपति भगत भगति बस अहहीं।।
सुधि करि अंबरीस दुरबासा।
भे सुर सुरपति निपट निरासा।
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा
नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।।
लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा।
अब सुर काज भरत के हाथा।।
देवताओं को कोई भी अन्योपाय नहीं सूझता,सिवाय भगवान् के भक्त की सेवा। राम जी अपने सेवक की सेवा से ही सर्वाधिक प्रसन्न होते हैं।
आन उपाय न देखिअ देवा।
मानत रामु सुसेवक सेवा।।
यदि राम जी को वश में करना हो तो सभी
लोग,हृदय से भरत जी का सप्रेम स्मरण करें। श्रीभरत जी ने अपने गुणों और शील स्वभाव से श्रीराम जी को वश में कर लिया है-
हियँ सप्रेम सुमिरहु सब भरतहिं।
निज गुन सील राम बस करतहिं।।

अब तो गुरु बृहस्पति ने देवताओं के विवेक की सराहना की है। क्योंकि देवों ने
विवेकपूर्वक ,भरतभक्ति करने का जो निश्चय कर लिया है।
इन देवताओं का तो सौभाग्य ही जग गया है, क्योंकि सारे “सुमंगल के मूल” भरत के चरणों में अनुराग पर अडिग हो चुके हैं।इन्ही भरत के चरणाश्रय से रामाश्रय मिलेगा और रावणादिक आसुरी शक्तियाँ भी विनष्ट हो जायेंगीं-

सुनि सुरमत सुरगुरु कहेउ,
भल तुम्हार बड़ भागु।
सकल सुमंगल मूल जग,
” भरत चरन अनुरागु।।”

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।
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सुमिरत नाम तुम्हार

जासु नाम सुमिरत एक बारा,उतरइ नर भवसिंधु अपारा । जिन भगवान् के नाम का एक बार भी आर्त-स्मरण करने पर मनुष्य मात्र इस असारभवसागर से पार हो जाता है, ऐसे रघुनाथ जी भरतजी के नामस्मरण को सारे लोकालोक सुखों का साधन मानते हैं ।
यह त्रिकालाबाधित और त्रिभुवन व्यापक मत श्रीरामजी का है कि, इन सभी में जितने भी पुण्यात्माधर्मात्मा हैं,हुए हैंऔर जो भविष्य में होने वाले हैं, उन सभी में भरत जैसा कोई नहीं है।जो भी किंचित् धर्मात्मापुण्यात्मा का स्वरूप है,वह सभी भरत से निम्नवत् हैं।
तीनि काल तिभुवन मत मोरे,पुन्यसिलोक तात तर तोरे।
इसके पहले की लीला है कि
नारायण! श्रीरामजी भरत की बड़ाई उनके सम्मुख करते हुए संकुचित हो जाते हैं ,क्योंकि भरत लघुभ्राता हैं।
अब चूँकि भरत तो रामजी की परछाईं ही हैं, इसलिये रामेच्छा भरतेच्छा और भरतेच्छा,रामेच्छा है।तब श्रीरामजी ने कहा कि जो भरत कहें ,उसी में सभी का भला है ,ऐसा कह चुप हो जाते हैं-
लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई ,करत बदन पर भरत बड़ाई ।भरतु कहहिं सोइ किएँ भलाई ।अस कहि राम रहे अरगाई।अब-

गुरु समाधान का क्षण आ जाता है , और भरत से वशिष्ठ जी ने कहा कि कोई संकोच की बात नहीं, कृपाकरुणासागर अपने भाई से अपने हृदय की बात कह दें तो अच्छाई है-
तब मुनि बोले भरत सन,सब सँकोच तजि तात।कृपासिंधु प्रिय बन्धु सन कहहु हृदय कै बात।
रामहिं भजहिं ते चतुर नर, जैसे राम के अभिन्न भक्तभरत ,गुरु और प्रभु की ऐसी समग्र अनुकूलता देख कर,स्वयं पर ही सारा निर्णय-भार समझ कर , विचार करने पर भी कुछ कह नहीं पाते।शरीर रोमांचित है।सभामध्य खड़े होते हैं और नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की धारा बह चलती है।

कहतेहैं कि मुनिश्रेष्ठ ने हमारे कुछ कहने से पहले ही ,मुझे वन औरआप सभी को अयोध्या लौटने का मत व्यक्त कर दिया है ,जिसका निर्वाह हो जाय तो मेरे लिये यही सर्वस्व है-
सुनि मुनि बचन रामरुख पाई ,गुरु साहिब अनुकूल अघाई।लखि अपनें सिर सबु छरु भारु।कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े।नीरज नयन नेह जल बाढ़े।कहब मोर मुनिनाथ निबाहा।एहिं ते अधिक कहौं मैं काहा।
हमारे नाथ का शीलस्वभाव ऐसा है कि वह तो अपराधियों पर भी क्रोध नहीं करते ।मुझ जैसे छोटे भाई पर स्नेह ऐसा कि खेल-खेल में भी कोई रोष नहीं करते थे।शैशव से हमने आपका संगत्याग नहीं किया(सतां सङ्गो हि भेषजम् )आपने मेरा मन रखने के लिए मेरे हारने पर भी ,मुझे जिता दिया करते थे।आपकी कृपारीति मुझे सर्वथा ज्ञात है-
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ, अपराधिहु पर कोह न काऊ।मो पर कृपा सनेहु बिसेषी ,खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।सिसु पन ते परिहरेउँ न संगू,कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।मैं प्रभुकृपा रीति जिय जोही ,हारेहु खेल जितावहिं मोही।

विधाता मुझे मिलते दुलार को नहीं सह सका और जननी कैकयी को माध्यम बना कर हम दोनों में भेद डाल दिया।
“बिधि न सकेउ सकि मोर दुलारा, नीच बीचु जननी मिस पारा।”
लेकिन यह कहते मेरी शोभा नहीं है।क्या कभी कोई अपने को साधु और पवित्र कहे,तो वह कभी पवित्र माना जा सकता है?जब तक कि दूसरे लोग उसे साधु न कहें। माता कैकेयी ने मन्दता का परिचय दिया और मैं सच्चरित्र हूँ,यह बात हृदय में लाना भी दुराचार है ।क्या कभी मोटे चावल की बाली में सुन्दर सालि (चावल)
फल सकता है? क्या कभी काले घोंघे में मोती उत्पन्न हो सकती है?इसमें किसी का दोष नहीं है ,मेरा दुर्भाग्य ही अथाह सागर बन गया है।
हृदय में बारम्बार विचारने पर मेरा भला तो यही है कि गुरु और सीताराम प्रभु,की जो इच्छा हो, उसी में मेरी भी इच्छा-
” यहउ कहत मोहि आजु न सोभा,अपनी समुझि साधु सुचि को भा।मातु मंदि मैं साधु सुचाली,उर अस आनत कोटि कुचाली।फरइ कि कोदव बालि सुसाली , मुकता प्रसव कि संबुक काली।सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू,मोर अभाग उदधि अवगाहू।हृदय हेरि हारेउँ सब ओरा,एकहिं भाँति भलेहिं भल मोरा।गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू,लागत मोहिं नीक परिनामू।
भरत, व्याकुल होकर सन्तसभा गुरुजनों और भगवान् के निकट सत्यभाव से बोले कि,मेरा कथन सत्यप्रेमकरुणापूर्ण है या जगत् प्रपंचपूर्ण असत्य,इसे गुरु वशिष्ठ और रघुश्रेष्ठ राम जी ही भली भाँति जान सकते हैं।
“अन्तर्यामी सद्गुरु और परमात्मा से छिपा हुआ क्या है?”
ज्यौं जग अन्तर भासता,तो कहि-कहि काहि जनाव।अन्तर्यामी जानता अन्तरगत के भाव।
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाये।
कहहु कवन सिधि लोक रिझाए।।
भरत ने कहा -साधु सभा गुरु प्रभु निकट कहहुँ सुथल सतिभाउ।प्रेम प्रपंचु कि झुठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ
जननी की कुबुद्धि सारा संसार जानता है और राजा दशरथ प्रेम(राम)प्रण को स्वयं रखनेवाले सिद्ध हैं, न कि शरीर रखनेवाले
प्रतिक्षण को अपने में समेटे-लपेटे सर्वगत परमात्मा के प्रेमी ने क्षणमात्र में क्षणदा ही त्याग दी।राम राम कहि राम कहि राउ गयेउ सुरधाम।
भूपति मरन प्रेमपन राखी,जननी कुमति जगतु सब साखी।
माताओं का कष्ट देखा नहीं जाता।अवध वासी तो असह्य वेदना में जल रहे।मैं भरत ही सारी अनर्थ की जड़ हूँ और इसे समझ कर सारी वेदना का शूल सहूँगा।इन सारी घटनाओं के साक्षी त्रिशूलधारी हैं
“देखि न जाइ बिकल महतारी,जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।मही सकल अनरथ कर मूला,सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।बिनु पानहिन्ह पयादेहिं पाएँ,संकरु साखि रहेउँ एहिं धाएँ।

मार्ग में मिले निषाद का प्रगाढ़ अपूर्व प्रेम दृष्ट है,यह मेरा ही दुर्दृष्ट है कि मेरे वज्रवत् हृदय में छेद नहीं हो गया।सब अपने नेत्रों से हमने देख लिया है।मैं जीता जी जड़ हो चुका हूँ, रुका हूँ तो केवल प्रेम(राम)की आशा में रुका हूँ। मैं चूक चुका हूँ।आप सद्गुरु भगवान् सभी जड़चेतन के सहायक हैं।आप तो ऐसे हैं कि आप युगल को देखकर तामस शरीर सर्पबिच्छू भी अपनी विषम विषवितरण का वैषम्य छोड़ देते हैं-
बहुरि निहारि निषाद सनेहू,कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई,जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।
जिन्हहिं निरखि मग साँपिन बीछी, तजहिं बिसम बिसु तामस तीछी।
ऐसे रघुनन्दन सीतालक्ष्मण सहित जिसे अहित (शत्रु)लगते हों उनकी क्या गति होगी? ” रामं बिना का गतिः?”
ऐसे राजा दशरथ,जो तृणवत् शरीर छोड़ दें श्रीराम विरह में,उनका पुत्र तो दैवी सहायता से ही असहनीय को सह सका।
“तेइ रघुनंदनु लखनु सिय,अनहित लागे जाहि।तासु तनय तजि दुसह दुख देउ सहावइ काहि।”
ऐसी त्यागतपःमूर्ति भरतजी की व्याकुल और आर्ति,प्रीति,विनय,नय सरस वाणी सुनकर सारी शोकसभा “सारी” बोलने पर उतारी हो गई,मानो कमल समूह पर पाला पड़ गया-
“सुनि अति बिकल भरत बर बानी।
आरति प्रीति बिनय नय सानी।।
सोक मगन सब सभा खभारू।
मनहुँ कमल बन परेउ तुसारु।।”
मुनिवशिष्ठ ने पूर्व सच्चरित कथापुराण के माध्यम से विशिष्ट वचनों से प्रबोधन किया है।और रघुनन्दन राम जो कि दिनकरकुलोत्पन्न कुमुदिनी वन के लिए आह्लादकारी अपनी आह्लादिनी शक्ति से सर्वदा संयुक्त चन्द्रमा हैं, औचित्यपूर्ण वाणी बोलते हैं-
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी।
भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।।
बोले उचित बचन रघुनंदू।
दिनकर कुल कैरव बन चंदू।।
भगवान् ने कहा हे भरत! तुम ग्लानि मत करो। इसलिए कि जीवात्मा की समग्र गति अपने अंशी परमात्मा के आधीन है।तीनों लोकों(धरती,स्वर्ग, पाताल)और
वर्तमान-भूत-भविष्यत् कालों में भी मेरी दृष्टि में जितने भी पुण्यात्मा जीव हैं, वे सभी के सब तुम्हारे नीचे हैं। जो भी वासनाव्यसनी तुम्हारे लिए हृदय में भी कुटिलता धारण करेंगे, उन सबकी इस लोक की वैभव-सम्पदा यशादि नष्ट हो जायेंगे, अन्य लोकों में भी सुगति प्राप्ति नहीं होगी-
तात जाय जियँ करहु गलानी,ईस अधीन जीव गति जानी।तीनि काल तिभुवन मत मोरे,पुन्यसिलोक तात तर तोरे।उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई, जाइ लोकु परलोकु नसाई।
माता कैकयी का दोष भी नहीं, क्योंकि सारी व्यवस्था भगवान् की त्रिभुवन मोहिनी माया के अधीन है।जो लोग माँ को दोषी मानते हैं, उन्हें साधुसभा यानी कि सत्संग, सन्तसंग सेवन के लिए प्राप्त नहीं हुआ,ऐसे लोग जड़मति हैं-
दोसु देहिं जननिहिं जड़ तेई,जिन्ह गुरु साधु सभा नहिं सेई।
और इतना ही नहीं भरत!तुम तो विश्व भरण पोषण कर जोई,ताकर नाम भरत अस होई,जैसे नामानुरूप स्वरूप को धारण करने वाले हो।
जो लोग तुम्हारे नाम का स्मरण मात्र कर लेंगे ,उनका अखिल पापभार संभार नष्ट हो जायेगा।लोक में सुन्दर यश फैलेगा और परलोक में भी में सुखप्राप्ति होगी-

मिटिहहिं पाप प्रपंच सब
अखिल अमंगल भार।
लोक सुजसु परलोक सुख,

” सुमिरत नाम तुम्हार “

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्

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भयउ न भुअन भरत सम भाई


रामलीला का प्रकाश फैलाती हनुमान् चालीसा की शीसा से प्रक्षेपित सुन्दर पंक्ति”रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई।” का अर्थ श्रीभरत जी को “प्रमाण” प्रमाणित कर देती है।
“श्रीहनूमान् जी महाराज, रघुनाथ जी को इतने प्रिय हैं, जैसे कि भरत।” वस्तुतः
भरत तो महामहिमा के मानदण्ड हैं प्रमाण हैं और ऐसे मानदण्ड कि वैसी रचना रची ही नहीं रमारमेश राम ने।

भरत-श्रीराम की कथा तो नारायण! अद्भुत ऐसी कि “विस्मय” ही स्थायी भाव बन जाता है।
काव्यशास्त्र में , साहित्यशास्त्र में वर्णित सुन्दरता का सौन्दर्य है “अद्भुतरस”

गुरु वशिष्ठ स्वयं “विस्मयस्थायी” भाव से ओतप्रोत होकर “अबला मति” बन गए।
और विस्मयस्थायी का “अद्भुतरस” जैसे कि बहता हुआ प्रतीत होने लगता है।
यह भरत का महामहिमात्व है,जो गुरु को ही अस्थिर और विस्मयवश करके शत्रुघ्नलाल सहित भरत को वनवास और
वनवासी सीतारामलक्ष्मण को अवध जाकर राजकाज सँभालने का अद्भुत निर्णय सुना देता है।स्वयं गुरु भी चकित।
लेकिन गुरु तो गुरु ही ठहरे, बुद्धिविद्युत्
पुनःसंयत संचरण शील होकर अपना पूर्व निर्णय वापस ले लेती है।और वशिष्ठ जी ने भगवान् से कहा कि मेरी चमत्कृत बुद्धि अब परिवर्तित निर्णय पर अडिग हो चुकी है कि आपको भरत की रुचि के अनुकूल शिव को स्वयं साक्षी मानकर शिवनिर्णय
ही करना होगा,जो कि कल्याणविधान करनेवाला सिद्ध होगा-
मोरे जान भरत रुचि राखी।जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।
और इतना ही नहीं, भरत का विनयनय
ऐसा अद्भुत है कि, वेदशास्त्र-सन्त और राज्य नय, सबका आनयन करके ही सुविचारित सम्मिश्र मिश्रित आश्रित निर्णय देना होगा।
भरत बिनय सादर सुनिअ,करिअ बिचारु बहोरि।करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।
अब गुरु का गुरुअनुराग भरत पर देखकर स्वयं सच्चिदानन्द ही विशेषानन्द से भर जाते हैं।वह भरत को “धर्मधौरेय” तो मानते ही हैं और उससे भी आगे मन वचन और कर्म से अपना सेवक भी।गुरु की आज्ञा को दृष्टिगत करके मंगल के मूल मंजुल वचन बोलते हैं-
“गुरु अनुरागु भरत पर देखी।राम हृदय आनंदु बिसेषी।।भरतहिं धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।बोले गुरु आयसु अनुकूला।बचन मंजु मृदु मंगलमूला।।
ऐसे लोगों का परम सौभाग्य है,जो कि गुरुचरणकमलों के परमानुरागी होने से लोक और वेदशास्त्र सम्मत आचरण करते हैं।और जिस पर कुलगुरु ही प्रेमासक्त हों,उसका भाग्य वर्णनातीत है-
” जे गुरु पद अंबुज अनुरागी,ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।राउर जा पर अस अनुरागू ,को कहि सकइ भरत कर भागू”

और इसीलिये रघुनाथ जी पिताश्री दशरथ के चरणों की दुहाई(साक्षी) देते हैं।जैसे कि शपथपत्र(affidavit)देते हुए दिखाई पड़ते हैं। कहते हैं कि भरत जैसा भाई तो चौदह भुवनों में कोई हुआ ही नहीं है-

नाथ सपथ पितु चरन दोहाई।

” भयउ न भुअन भरत सम भाई।”

गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।।

भरत भगति बस भइ मति मोरी

गुरु वशिष्ठ स्वीकारते हैं कि मेरी बुद्धि तो इस समय भरत जैसे लोकपावन भक्त के वशीभूत हो गई है।
भरत की महिमा रूपी समुद्र के तीर पर यह बुद्धि किंकर्तव्यविमूढ कोमला अबला जैसी चकित थकित श्रमित होकर स्थिर हो गई है।इससे पार भी जाना चाहती है, हृदय खोजता है किन्तु यत्न सूझता नहीं।
अब तो पार जाने के लिए किसी जहाज की जरूरत है।और भरत की बड़ाई का व्यास विस्तार बड़ा ही अगम है।यह तो वर्णनातीत हो चुका है।तलैया की छोटी सी सीपी में समुद्र समायेगा नहीं। और भरत की महिमासमुद्र के पार कोई जायेगा नहीं
गा चह पार जतनु हियँ हेरा।पावति नाव न बोहितु बेरा।।औरु करिहि को भरत बड़ाई ।सरसी सीपि कि सिन्धु समाई।।
यह समस्या गुरु के सामने इसलिये आई कि उन्होंने शत्रुघ्नलाल और भरत जी को वन निवास और सलक्ष्मणसीताराम जी को अयोध्या चलकर राजकाज सँभालने का प्रस्ताव,भरत के सामने रख दिया।भरत ने अविलम्ब इसे यथावत् लागू करने का आग्रह गुरु से कर डाला। समस्या के समाधान का यह पक्ष दानवी शक्ति के विनाश की बाधा बनती प्रतीत होने लगी। गुरु वशिष्ठ यह सोचकर अपने प्रस्तुत प्रस्ताव से पीछे हटने लगे,क्योंकि रामवन गमन का प्रमुख हेतु” राक्षसविनाश” और देवताओं के जीवन में “भवितव्यप्रकाश” बाधित होता सा दीख पड़ा।
आ जाते हैं भरत के साथ श्रीराम के पास गुरु वशिष्ठ जी। भगवान् प्रणाम करके सुन्दर आसन पर गुरु को बैठाते हैं।वशिष्ठ जी देशकाल अवसर का विचार कर भगवान् की भगवत्ता के अनुरूप उन्हें धर्मनीतिनिपुण,सर्वान्तर्यामी,सर्वज्ञ और असंख्येयकल्याणगुणगणनिलय बताते हैं।
अयोध्यावासियों, समस्त माताओं,भरत सहित,जिसमें “सहित” हो ऐसा साहित्य रचने हेतु आग्रह करते हैं-
भरतु मुनिहि मन भीतर भाए।सहित समाज राम पहिं आए।।प्रभु प्रनाम करि दीन्ह सुआसनु।बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।।बोले मुनिबरु बचन बिचारी।देस काल अवसर अनुहारी।।सुनहु राम सरबग्य सुजाना।धर नीति गुन ग्यान निधाना।।
सब के उर अन्तर बसहु,जानहु भाउ कुभाउ।पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।। और अब देखिये जैसे
आर्त जनों की वैचारिक दृष्टि मानो कि विलुप्त ही हो जाती है,जुआरी को अपना दाँव ही याद रहता है।
“आरत कहहिं बिचारि न काऊ।सूझि जुआरिहिं आपन दाऊ।। नारायण
क्या वाक्चातुर्य है प्रभु का वह तो ऐसी परिस्थिति में गुरु-निर्णय का नय-भार गुरु पर गिरा देते हैं।
“गुरोराज्ञा गरीयसी”आज्ञा गुरूणां हि अविचारणीया”
सभी का हित तो गुरु आज्ञा के अधीन है।
गुरु वशिष्ठ जी का आदेश ही सभी के लिए श्रेयस्कर है।गुरु आदेश ही गुरु है।

“सेवक राम”सहित सभी का हित जिसमें हो जाये , वही आदेश मिलने में सभी को आनन्द होगा।
“सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ।नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।।सब कर हित रुख राउरि राखें।आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई।माथे मानि करौं सिख सोई।।पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं।सो सब भाँति घटिहि सेवकाई।।”
वशिष्ठ जी अब अपनी बुद्धि के शक्तिहीन
हो जाने का रहस्य समझ जाते हैं।
” मुनि मति तीर ठाढ़ि अबला सी ” क्यों हो जाती है।वह इसलिये कि भरत तो तपोनिष्ठा ,त्याग, शील,संयम,और प्रेम में श्रीराम की (ट्रू कापी)छायाप्रति हैं।
और इसीलिये लगता है भरत के इन्हीं स्नेहादि गुणों ने गुरु के गुरुविचार को ठहरने ही नहीं दिया –
कह मुनि राम सत्य तुम भाषा।भरत सनेह बिचारु न राखा।।
और बारम्बार गुरु ने इन्ही अलक्षित गुणों की सराहना की और कहा कि इन्ही गुणों का कारण उनकी बुद्धि भरत की दिव्य “प्रेमा-भक्ति” के वशीभूत अबला सी हो गई थी-

“तेहि ते कहउँ बहोरि बहोरी।
भरत भगति बस भइ मति मोरी।।”

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

जगद् ही हरि , हरि ही जगत्

क्या कहें,भगवान् और सन्त से बड़ा शिक्षक कौन हुआ है नारायण! सभी जीव स्वयं की करमकुण्डली के कारण शरीर धरते हैं।किसी भी माता पिता पुत्र सगे सम्बन्धी का किसी से कुछ भी लेना देना नहीं। सभी एक दूसरे तीसरे से स्वतन्त्र हैं
सद्गुरु भगवान् का चरणाश्रय मिलने पर ही भव बन्ध की फाँस कटेगी।
संसार में हमारा किसके साथ क्या क्या व्यवहार होना चाहिए शास्त्रसन्तप्रमाण हैं
“तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ “सामान्यतः और परिस्थिति विशेष में क्या करें,क्या न करें
शास्त्र और सन्त ही प्रमाण हैं।आश्रयेद् सन्तशास्त्राणि।
भगवान् ने अपने रामकृष्णादि मानवलीलावतारों में सभी मातापितागुरुभातृपत्नीकुटुम्बसमाजदेश परिवारीजनों के प्रति आचरणीय आचरण की आचरण द्वारा शिक्षा दे करके ही क्या नहीं सिखाया।
विप्रधेनुसुरसन्तहित लीन्ह मनुज अवतार का मतलब ही यही था। पहली शिक्षा आचरण के द्वारा ही मानी जाती है। अतः सब कुछ भगवान् द्वारा आचरित कर्म करने पर वह कर्म नहीं, बल्कि उपासना साधना बन जाती है।
सो मन सदा रहत तोहिं पाहीं जानि प्रीति रस एतनेहिं माहीं।ऐसा भगवान् का वचन और नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट,भगवती की वाणी से शक्ति शक्तिमान् समर्पित पारस्परिक दाम्पत्य तो “तात्विक वास्तविक प्रेम” का उदाहरण है अतः हम सभी शेषकर्मभोग के कारण शरीर धरने वाले मलिनचित्त के जीवों को विशुद्ध प्रेम के लिए प्रेम करना होगा।
बिना विशुद्ध प्रेम के माया जायेगी नहीं और मनोमालिन्य दूर नहीं होगा। कठिनाई ये है कि संसार त्रिगुणात्मक शरीर भी त्रिगुणात्मक अतः मन इसी में विचरता है।
संसार सदा स्मरण में, भगवान् अविस्मरण में। और –
नाम जपस्मरण से ही यह अविस्मरण का रोग नष्ट होगा होगा।संसार व्याधि ही विनष्ट हो जायेगी। सर्वत्र समदर्शन का दर्शन होने लगेगा। निष्काम काम सिद्ध हो जायेगा,निष्प्रयास ही।तब तो नानाशरीर
सम्बन्धों की क्रिया प्रतिक्रिया से कोई समस्या ही नहीं होगी ।अविचलितभाव से नामपर दृढ रहने पर सही दृष्टि मिल जायेगी। जगत्कारण कार्य एक दीखेंगे।
सुमिरि पवन सुत पावन नामू अपने बस करि राखे रामू ।जगद् ही हरि और हरि ही जगद् दीखने लगेंगे। चंचल मन को तो अचंचल नाम ही स्थिर करेगा।सब सियामय और राममय दिखेगा प्रचुर रूप में। ( प्राचुर्ये मयट्) की पाणिनीय शक्ति समुदित हो जायेगी।और-
हरिरेव जगद् जगदेव हरिः हरितो जगतो नहिं भिन्नतनुः। अन्तः वाह्य सिद्ध दृष्ट।


“जगद् ही हरि, हरि ही जगद्”

गुरुः शरणम् हरिः शरणम्

भरत महा महिमा जलरासी

भरत, महामहिमा की अपार जलराशि हैं

नारायण! भगवान् की रामलीला में
जो चारु चारित्र्य का गाम्भीर्य दीखा है
भरत का,वैसी अथाह गहराई किसी में
कहाँ? और गहराई दीख जाय तो कैसी
गहराई, और फिर समुद्र कैसा?

राजाराम के वनगमन और दशरथजी की
लीला पूरी होने पर ननिहाल से अयोध्या
लौट कर इस अयोध्या की विपरीत दशा
” योध्या” दीख पड़ती है,उन्हें।
घर श्मशान जैसा और सभी परिजन
भूत-प्रेत सरीखे,और सगे सम्बन्धी मित्र
जन जमदूत जैसे।
” घर मसान परिजन जनु भूता
सुत हित मीत मनहुँ जमदूता”
पिता के परलोक गमन से अधिक भारी
है, सीतारामलक्ष्मण का वनगमन।
भगवान् जिस मार्ग से जाते हैं, उसी
मार्ग की रज,शिर धरते, गिरते-पड़ते
अनुगमन करते आये हैं चित्रकूट,जहाँ
प्रभु ने पर्णकुटी बनाई है। और राम के
प्रत्यक्ष होते ही-
“भूतल परेउ लकुट की नाईं”

अचेतन “दण्ड”स्वामी के साथ जैसे रचा
बसा,स्वामी के साथ ,समर्पित भाव से
जहाँ स्वामी चलते हैं,साथ चलते जाना
उसका आत्मभाव है, वैसे ही भरत जी
अचेतन दण्डवत् स्वामीराम के समक्ष गिर
पड़ते हैं।नारायण! बात बड़ी गम्भीर है।

शङ्कराचार्य की बड़ी पंक्ति भगवती से
क्षमा याचना काल में कही गई है।
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता नभवति

का अपवाद साक्ष्य ही जैसे उपस्थित है
कि मानो ब्रह्मा ने पति-द्रोही और वंश की
कलंक भूता माता ” कुमाता” रच दी है।
“कुल कलंक करि सृजेउ बिधाता
साइँदोह मोहि कीन्ह “कुमाता”
तब आचार्य शङ्कर की पंक्ति जो सभी
जगह सामान्यतया ठीक है ,लेकिन
यहाँ असाधारण घटना विशेष में
विपरीत गढ़ी पढ़ी जा सकती है।
” सुपुत्रो जायेत क्वचिदपि
कुमातापि भवति” ऐसा अपवाद भरत है।

इस प्रकार भरत अत्यंत विरह और राम
प्रेम में आकुलित दशा को प्राप्त हैं।अब
भगवान् और यथायोग्य सभी से सादर
मिलने के अनन्तर पुनः यह विचार
करते हैं,कि काल ने माता के बहाने से
बहुत बड़ा कुचक्र रचा है।जैसे अतिवृष्टि
आदि छः ईतियों के भय से धान जल्दी
परिपक्व होकर निर्भय होना चाहे और
यह काल तो पहले से ही निर्भय है।
” कीन्हि मातु मिस काल कुचाली
ईति भीति जस पाकत साली”

संशय कुतर्क के विचार-सागर में डूबते
उतराते हैं,भरत सोच केवल एक कि
कैसे श्रीराम का राज्याभिषेक हो।उपाय
समझ नहीं पड़ता। गुरु वशिष्ठ की आज्ञा
से लौट सकते हैं, किन्तु वे भी पहुँचे हुए
गुरु हैं, राम की रुचि भाँपकर ही कहेंगे
“केहि बिधि होइ राम अभिषेकू
मोहि अवकलत उपाउ न एकू
अवसि फिरहिं गुरु आयसु मानी
मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी”
मैं प्रभु का अनुचर सेवक और दास हूँ।
समय और विधाता हमारे प्रतिकूल है।
मेरा लौटने का हठ करना सेवक-धर्म
नहीं, प्रत्युत अधर्म/कुकर्म होगा।और
सेवक का धर्म तो शिव-सेवित कैलाश
से भी वजनदार बड़ा और श्रेष्ठ होता है।
” मोहि अनुचर कर केतिक बाता
तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू
हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू “
कोई भी एक युक्ति निश्चित नहीं हो पाती
सोचते-सोचते रात बीती सुबह हो गई।
“एकउ जुगुति न मन ठहरानी
सोचत भरतहिं रैनि बिहानी “

प्रातः वशिष्ठजी ने सभी को बुलाया।
समयानुकूल बात बताई और श्रीराम को
धर्मधुरीण “स्वतन्त्रः कर्ता “सत्यसन्ध
पालनकर्त्ता,जगमंगल के एककारण
सूर्यवंश के सूर्य और वेदशास्त्र का सेतु भी
बताया।

” धरम धुरीन भानुकुल भानू
राजा राम स्वबस भगवानू
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू
राम जनमु जग मंगल हेतू”
राम,गुरुमातापिता आज्ञापरायण दुष्दमन
कर्ता और देवहितकर्ता हैं।इनके समान
नीति प्रीति परमार्थ स्वार्थ कोई नहीं जान
सकता।
” गुरु पितु मातु बचन अनुसारी
खल दलु दलन देव हितकारी
नीति प्रीति परमारथ स्वारथ
कोउ न राम सम जानि जथारथ”

वशिष्ठ ने सभी मंगलों का मूल, राम का
अभिषेक बताया, जिसमें नीति,परमार्थ
स्वार्थ सब कुछ है,लेकिन उपस्थित सभी
को कोई उत्तर नहीं सूझा,भावविह्वल
दशा को जो प्राप्त थे।
भरत ने सिर चरणों में रख कर निवेदन
किया है।
” सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू
मंगल मोद मूल मग एकू
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ
कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ
सब सादर सुनि मुनिबर बानी
नय परमारथ स्वारथ सानी”
लोगों को कोई उत्तर सूझा।सभी लोग
भावसार में डूब चुके हैं।भरत बद्धांजलि
बोलते हैं-
“उतरु न आव लोग भए भोरे
तब सिरु नाइ भरत कर जोरे”
उन्होंने कहा कि सूर्य वंश में एक से एक
राजा हुए हैं, क्रम से सभी के माता-पिता
हैं, सभी के कर्मों का शुभाशुभ फल तो
विधाता देते हैं,किन्तु सभी के दुःखों का
आत्यंतिक नाश करनेवाले सर्वमंगल के
दाता हे गुरुदेव! आपके आशीष ही हैं।

अतः जिससे विधिगति और तन्निश्चित
व्यवस्था उलट पुलट जाय ऐसे आशीष
पर आप दृढ़ हो जायें तो भला कौन उसे
रोक सकता है।
” भानुबंस भए भूप घनेरे
अधिक एक ते एक बड़ेरे
जनम हेतु सब कहँ पितु माता
करम सुभासुभ देइ बिधाता
दलि दुख सजइ सकल कल्याना
अस असीस राउरि जगु जाना
सो गोसाइँ बिधि गति जेहि छेंकी
सकइ को टारि टेक जो टेकी”
तब गुरु बशिष्ठ ने कहा कि जो कुछ भी
अच्छा होगा, वह राम जी की कृपा से ही
होगा, इनके प्रतिकूल कोई भी सिद्धि तो
सम्भव नहीं।
” तात बात फुरि राम कृपाहीं
राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं
लेकिन “इनका” अनुमोदन यदि हो तो हम
समझते हैं कि,शत्रुघ्नलाल जी के साथ
भरत बन चले जायँ और सीतासहित
रामलक्ष्मण यहाँ से वापस अयोध्या चलें,
यद्यपि यह कहते हुए भी संकोच हो रहा।

” सकुचहुँ तात कहत एक बाता
अरध तजहिं बुध सरबस जाता”
सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पण्डितः

” तुम कानन गवनेहु दोउ भाई
फेरिअहिं लखन सीय रघुराई”
अब भरत शत्रुघ्नलाल जी के हर्ष का
ठिकाना नहीं।सारा शरीर प्रमोद से भर
गया,और ऐसा लगा कि अब तो राजा
राम जी हो ही गए।
” सुनि सुबचन हरष दोउ भ्राता
भे प्रमोद परिपूरन गाता
मन प्रसन्न तन तेज बिराजा
जनु जिय राउ रामु भए राजा”
रानियाँ रो पड़ी,उनके लिए तो दोनों ही
बातें सुखदुख दोनों की कारक हैं।
” बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी
सम दुख सुख सब रोवहिं रानी”
भरत यह बात सुन आनन्द विभोर हैं।
कहते हैं कि, वे शत्रुघ्नलाल जी के साथ
आजन्म वनवास के लिये तैयार हैं, मानो
सारे जीवन का एकत्रित फल ही मिल
गया है उन्हे।इससे बड़ा सुख क्या होगा?
” कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे
फलु जग जीवन अभिमत दीन्हे
कानन करउँ जनम भरि बासू
एहि तेअधिक न मोर सुपासू”
भरत ने कहा कि सीताराम जी तो सभी
जीवों की आत्मा ही हैं।इनसे अगम्य कुछ
भी नहीं।और गुरुदेव भी सर्वज्ञ साधुजन
हैं, अतः अब शीघ्रता से अपनी बात को
प्रमाणित करें।
“अंतरजामी रामु सिय
तुम सरबग्य सुजान
जौं फुर कहहु त नाथ
निज कीजिअ बचनु प्रमान”

भरतद्वारा सप्रेम आजन्म वनवास का
निश्चय करने पर सारी सभा सहित मुनि
भी अपनी देहदशा मानो भूल गए।
” भरत बचन सुनि देखि सनेहू
सभा सहित मुनि भए बिदेहू”

नारायण! अब श्रीरामलीला में भरत का
का चरित्र एक अरित्र (सुन्दर मार्ग)बन
गया है, जो उनके प्रेम और त्याग की
सर्वोच्च पराकाष्ठा है। देखिये-
गोस्वामी जी की झोली उपमालंकार से
तो भरी है, लेकिन उत्प्रेक्षा भी अद्वितीय,
क्योंकि इसके आलम्बन वशिष्ठभरत
जैसे उत्प्रेक्षणीय चरित्र हैं।दर्शनीय है यह
स्वरूप।

“भरत की महामहिमा अगाधसमुद्रवत् है”

” भरतमहिमा के अपारजलराशि के तट
पर गुरुवशिष्ठ की धीर बुद्धि ऐसी स्थिर
स्थित हो गई,जैसे किंकर्तव्यविमूढ़ कोई
स्त्री,कि अब क्या करें क्या न करें”
अथवा-
“भरतमहिमा रूपी समुद्रतट पर अबला
स्त्री की बुद्धि भी अबला होकर अधीर
अस्थिर(चंचल) हो गई,कि अब क्या करें
क्या कहें”
इसीलिये गोस्वामी जी ने कहा।
” भरत महा महिमा जल रासी
मुनि मति तीर ठाढ़ि अबला सी”

गुरु शरणम् ।। हरि शरणम् ।।

भरत महा महिमा जलरासी

भरत, महामहिमा की अपार जलराशि हैं

नारायण! भगवान् की रामलीला में
जो चारु चारित्र्य का गाम्भीर्य दीखा है
भरत का,वैसी अथाह गहराई किसी में
कहाँ? और गहराई दीख जाय तो कैसी
गहराई, और फिर समुद्र कैसा?

राजाराम के वनगमन और दशरथजी की
लीला पूरी होने पर ननिहाल से अयोध्या
लौट कर इस अयोध्या की विपरीत दशा
” योध्या” दीख पड़ती है,उन्हें।
घर श्मशान जैसा और सभी परिजन
भूत-प्रेत सरीखे,और सगे सम्बन्धी मित्र
जन जमदूत जैसे।
” घर मसान परिजन जनु भूता
सुत हित मीत मनहुँ जमदूता”
पिता के परलोक गमन से अधिक भारी
है, सीतारामलक्ष्मण का वनगमन।
भगवान् जिस मार्ग से जाते हैं, उसी
मार्ग की रज,शिर धरते, गिरते-पड़ते
अनुगमन करते आये हैं चित्रकूट,जहाँ
प्रभु ने पर्णकुटी बनाई है। और राम के
प्रत्यक्ष होते ही-
“भूतल परेउ लकुट की नाईं”

अचेतन “दण्ड”स्वामी के साथ जैसे रचा
बसा,स्वामी के साथ ,समर्पित भाव से
जहाँ स्वामी चलते हैं,साथ चलते जाना
उसका आत्मभाव है, वैसे ही भरत जी
अचेतन दण्डवत् स्वामीराम के समक्ष गिर
पड़ते हैं।नारायण! बात बड़ी गम्भीर है।

शङ्कराचार्य की बड़ी पंक्ति भगवती से
क्षमा याचना काल में कही गई है।
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता नभवति

का अपवाद साक्ष्य ही जैसे उपस्थित है
कि मानो ब्रह्मा ने पति-द्रोही और वंश की
कलंक भूता माता ” कुमाता” रच दी है।
“कुल कलंक करि सृजेउ बिधाता
साइँदोह मोहि कीन्ह “कुमाता”
तब आचार्य शङ्कर की पंक्ति जो सभी
जगह सामान्यतया ठीक है ,लेकिन
यहाँ असाधारण घटना विशेष में
विपरीत गढ़ी पढ़ी जा सकती है।
” सुपुत्रो जायेत क्वचिदपि
कुमातापि भवति” ऐसा अपवाद भरत है।

इस प्रकार भरत अत्यंत विरह और राम
प्रेम में आकुलित दशा को प्राप्त हैं।अब
भगवान् और यथायोग्य सभी से सादर
मिलने के अनन्तर पुनः यह विचार
करते हैं,कि काल ने माता के बहाने से
बहुत बड़ा कुचक्र रचा है।जैसे अतिवृष्टि
आदि छः ईतियों के भय से धान जल्दी
परिपक्व होकर निर्भय होना चाहे और
यह काल तो पहले से ही निर्भय है।
” कीन्हि मातु मिस काल कुचाली
ईति भीति जस पाकत साली”

संशय कुतर्क के विचार-सागर में डूबते
उतराते हैं,भरत सोच केवल एक कि
कैसे श्रीराम का राज्याभिषेक हो।उपाय
समझ नहीं पड़ता। गुरु वशिष्ठ की आज्ञा
से लौट सकते हैं, किन्तु वे भी पहुँचे हुए
गुरु हैं, राम की रुचि भाँपकर ही कहेंगे
“केहि बिधि होइ राम अभिषेकू
मोहि अवकलत उपाउ न एकू
अवसि फिरहिं गुरु आयसु मानी
मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी”
मैं प्रभु का अनुचर सेवक और दास हूँ।
समय और विधाता हमारे प्रतिकूल है।
मेरा लौटने का हठ करना सेवक-धर्म
नहीं, प्रत्युत अधर्म/कुकर्म होगा।और
सेवक का धर्म तो शिव-सेवित कैलाश
से भी वजनदार बड़ा और श्रेष्ठ होता है।
” मोहि अनुचर कर केतिक बाता
तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू
हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू “
कोई भी एक युक्ति निश्चित नहीं हो पाती
सोचते-सोचते रात बीती सुबह हो गई।
“एकउ जुगुति न मन ठहरानी
सोचत भरतहिं रैनि बिहानी “

प्रातः वशिष्ठजी ने सभी को बुलाया।
समयानुकूल बात बताई और श्रीराम को
धर्मधुरीण “स्वतन्त्रः कर्ता “सत्यसन्ध
पालनकर्त्ता,जगमंगल के एककारण
सूर्यवंश के सूर्य और वेदशास्त्र का सेतु भी
बताया।

” धरम धुरीन भानुकुल भानू
राजा राम स्वबस भगवानू
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू
राम जनमु जग मंगल हेतू”
राम,गुरुमातापिता आज्ञापरायण दुष्दमन
कर्ता और देवहितकर्ता हैं।इनके समान
नीति प्रीति परमार्थ स्वार्थ कोई नहीं जान
सकता।
” गुरु पितु मातु बचन अनुसारी
खल दलु दलन देव हितकारी
नीति प्रीति परमारथ स्वारथ
कोउ न राम सम जानि जथारथ”

वशिष्ठ ने सभी मंगलों का मूल, राम का
अभिषेक बताया, जिसमें नीति,परमार्थ
स्वार्थ सब कुछ है,लेकिन उपस्थित सभी
को कोई उत्तर नहीं सूझा,भावविह्वल
दशा को जो प्राप्त थे।
भरत ने सिर चरणों में रख कर निवेदन
किया है।
” सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू
मंगल मोद मूल मग एकू
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ
कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ
सब सादर सुनि मुनिबर बानी
नय परमारथ स्वारथ सानी”
लोगों को कोई उत्तर सूझा।सभी लोग
भावसार में डूब चुके हैं।भरत बद्धांजलि
बोलते हैं-
“उतरु न आव लोग भए भोरे
तब सिरु नाइ भरत कर जोरे”
उन्होंने कहा कि सूर्य वंश में एक से एक
राजा हुए हैं, क्रम से सभी के माता-पिता
हैं, सभी के कर्मों का शुभाशुभ फल तो
विधाता देते हैं,किन्तु सभी के दुःखों का
आत्यंतिक नाश करनेवाले सर्वमंगल के
दाता हे गुरुदेव! आपके आशीष ही हैं।

अतः जिससे विधिगति और तन्निश्चित
व्यवस्था उलट पुलट जाय ऐसे आशीष
पर आप दृढ़ हो जायें तो भला कौन उसे
रोक सकता है।
” भानुबंस भए भूप घनेरे
अधिक एक ते एक बड़ेरे
जनम हेतु सब कहँ पितु माता
करम सुभासुभ देइ बिधाता
दलि दुख सजइ सकल कल्याना
अस असीस राउरि जगु जाना
सो गोसाइँ बिधि गति जेहि छेंकी
सकइ को टारि टेक जो टेकी”
तब गुरु बशिष्ठ ने कहा कि जो कुछ भी
अच्छा होगा, वह राम जी की कृपा से ही
होगा, इनके प्रतिकूल कोई भी सिद्धि तो
सम्भव नहीं।
” तात बात फुरि राम कृपाहीं
राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं
लेकिन “इनका” अनुमोदन यदि हो तो हम
समझते हैं कि,शत्रुघ्नलाल जी के साथ
भरत बन चले जायँ और सीतासहित
रामलक्ष्मण यहाँ से वापस अयोध्या चलें,
यद्यपि यह कहते हुए भी संकोच हो रहा।

” सकुचहुँ तात कहत एक बाता
अरध तजहिं बुध सरबस जाता”
सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पण्डितः

” तुम कानन गवनेहु दोउ भाई
फेरिअहिं लखन सीय रघुराई”
अब भरत शत्रुघ्नलाल जी के हर्ष का
ठिकाना नहीं।सारा शरीर प्रमोद से भर
गया,और ऐसा लगा कि अब तो राजा
राम जी हो ही गए।
” सुनि सुबचन हरष दोउ भ्राता
भे प्रमोद परिपूरन गाता
मन प्रसन्न तन तेज बिराजा
जनु जिय राउ रामु भए राजा”
रानियाँ रो पड़ी,उनके लिए तो दोनों ही
बातें सुखदुख दोनों की कारक हैं।
” बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी
सम दुख सुख सब रोवहिं रानी”
भरत यह बात सुन आनन्द विभोर हैं।
कहते हैं कि, वे शत्रुघ्नलाल जी के साथ
आजन्म वनवास के लिये तैयार हैं, मानो
सारे जीवन का एकत्रित फल ही मिल
गया है उन्हे।इससे बड़ा सुख क्या होगा?
” कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे
फलु जग जीवन अभिमत दीन्हे
कानन करउँ जनम भरि बासू
एहि तेअधिक न मोर सुपासू”
भरत ने कहा कि सीताराम जी तो सभी
जीवों की आत्मा ही हैं।इनसे अगम्य कुछ
भी नहीं।और गुरुदेव भी सर्वज्ञ साधुजन
हैं, अतः अब शीघ्रता से अपनी बात को
प्रमाणित करें।
“अंतरजामी रामु सिय
तुम सरबग्य सुजान
जौं फुर कहहु त नाथ
निज कीजिअ बचनु प्रमान”

भरतद्वारा सप्रेम आजन्म वनवास का
निश्चय करने पर सारी सभा सहित मुनि
भी अपनी देहदशा मानो भूल गए।
” भरत बचन सुनि देखि सनेहू
सभा सहित मुनि भए बिदेहू”

नारायण! अब श्रीरामलीला में भरत का
का चरित्र एक अरित्र (सुन्दर मार्ग)बन
गया है, जो उनके प्रेम और त्याग की
सर्वोच्च पराकाष्ठा है। देखिये-
गोस्वामी जी की झोली उपमालंकार से
तो भरी है, लेकिन उत्प्रेक्षा भी अद्वितीय,
क्योंकि इसके आलम्बन वशिष्ठभरत
जैसे उत्प्रेक्षणीय चरित्र हैं।दर्शनीय है यह
स्वरूप।

भरत बिकल सुचि सोच


भरत को रामपद पाने की व्याकुलता है।
अतः राजपद मिलने की पीड़ा। क्योंकि
राजपद अनित्य भोगमय और रामपद
नित्य योगमय। नित्ययोगमय भगवान्
और केवल इन्हे छोड़कर और कुछ न
चाहने वाले हरिः ओ३म् तत्सत् भक्त
भक्तभरत अपूर्व प्रेम के विग्रह इसीलिये
हैं।

चित्रकूट की धरती पर रामभरतमिलन
अन्वर्थ सुयोग का सार्थक उदाहरण है।
चित्रकूट विचित्र और कूट (रहस्यमय)है।
भगवान्-भक्त के विचित्र चित्र का साक्षी
बना है।यह मिलन प्रेम-प्रेमी का है,जहाँ
प्रेमी प्रेम(भगवान्) को पाने का हठी एवं
आकांक्षी है।वह प्रेम के लिये ही प्रेम
करता है, वियोग की ज्वाला में जलकर
हृदय को परिशुद्ध बना डालता है
” देखे बिनु रघुनाथ के
जिय की जरनि न जाइ”
भक्त-भगवान् का प्रेम रहस्यमय(कूट) है
इसीलिये चित्र विचित्र चित्र है।
चित्रकूट का और भाव है।
इस भाव में”चित्तकूट “संज्ञा मान लें
तब कूट(रहस्यपूर्ण) चित्त वाला होने से
यह “चित्तकूट”अन्यार्थ वाची हो जाता है।
भगवान्-भक्त की चित्तदशा का रहस्य
उन दोनों के अतिरिक्त और किसी के भी
अत्यंत गूढ हो जाता है,जो इसी कोटि के
भक्त के द्वारा गम्य है।
अब सोचने वाली बात है कि ऐसे स्थल
का ऐसा महत्व,रहस्य और वैचित्र्य है कि
देवत्रितयी के मनबुद्धि के पहुँच के बाहर
कह दिया गोस्वामी जी ने।

“जहँ न जाइ मन बिधि हरि हर को”

और विनय की पराकाष्ठा देखिये उन्होंने
कहा कि मलिनचित्त मैं कैसे परिशुद्ध
चित्तवृत्ति वाले भगवान्-भक्त का वर्णन
कर सकता हूँ। सद्रजः तमस् का मायिक
शरीरवाला मैं नित्य , अनित्य का ही
चिन्तन करनेवाला हूँ। मैं कुबुद्धि हूँ।
भगवान्-भक्त त्रिगुणात्मक भी और
त्रिगुणातीत भी। यही तो रहस्य(कूट) है।

दुर्बुद्धि व्यक्ति गुणातीत दशा का बखान
कर नहीं सकता जैसे कि तन्त्री(तारवाद्य)
को बजाने के लिये गाँडर(तालाब की
कोमल घास) को ताँती (तार ) के रूप में
प्रयोग करने पर,वह टूट हि जायेगा,
सुन्दर रागध्वनि तो दूर की बात है।

” सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती
बाज सुराग कि गाँडर ताँती”
अब ऐसी चित्र विचित्र चित्रकूट की भूमि
पर शोचनीय सोच विचार शोक और
परम प्रेम भरतभगवान् का है तो उसे
जानना उन्हीं के जनाने से सम्भव है।
कथा प्रवाह आगे बढने बढ़ता जाता है।

सभी आपस में गुरजन,माताओं समेत
एक दूसरे से प्रेमपूर्वक सादर मिलते हैं।
भरतजी अनुज सहित प्रेमोत्कर्ष में सीता
जी के चरणकमलरज को सिर पर धरते
हुए प्रेमविह्वल हैं
” सानुज भरत उमगि अनुरागा
धरि सिर सिय पद पदुम परागा “
सीता जी आशीष देती हैं और प्रेममग्नता
में देह की सुध बुध समाप्त हो जाती है
” सीय असीस दीन्हि मन माहीं
मगन सनेह देह सुधि नाहीं “
भगवान् ने गुरु को दण्डवत् प्रणाम किया
है।मुनि ने हृदय से लगाया है।देवों ने पुष्प
वर्षा की है।भगवान् की आर्त दशा लोगों
ने देखी है।सीता जी ने सासुओं की सेवा
की है।एक भगवान् ही समझ रहे हैं कि
सभी माताएं साक्षात् माया सीता की
माया से ग्रस्त हैं
” लखा न मरमु राम बिनु काहूँ
माया सब सिय माया माहूँ “
सीता जी के साथ रामलक्ष्मण का सरल
स्वभाव देख कर कुटिल कैकेयी रानी को
पछतावा हो रहा है
“लखि सिय सहित सरल दोउ भाई
कुटिल रानि पछितानि अघाई “
धरती और यमराज से याचना करती हैं।
धरती फटती नहीं है कि उसमें समा जायँ
और विधाता मृत्यु भी नहीं दे रहा है।
कितना कठिन काल है।
“अवनि जमहि जाचति कैकेई
महि न बीचु बिधि मीचु न देई “
लोक और वेदविदित बात कविगण
कहते हैं कि राम से विमुख को धरती
क्या, नरक में भी स्थान नहीं मिलेगा।
” लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं
राम बिमुख थलु नरक न लहहीं “
भरत जी को प्रेमविह्वल दशा में न नींद
आती है और न ही भूख लगती है।
कीचड़ के नीचे फँसी मछली अगाध जल
में विहार करने की लोभी होकर भी जैसे
संकुचित है।
वैसे ही भरत जी भी मायिक कीच में
फँसे लोगों बीच का संग त्याग कर पवित्र
रामप्रेमसलिल के संकोची हैं

नीच कीच बिच मगन जस
मीनहिं सलिल सँकोच
निसि न नींद नहिं भूख दिन

“भरतु बिकल सुचि सोच “


गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।।