यदि भारत में रहना है।
मर्याद सनातन गहना है।
नष्ट हुआ गजवाये हिन्द।
उदित सनातनधर्म अनिन्द।
रामराष्ट्र के हैं सन्यास।
राम भारती माँ विन्यास।
भारत की अस्मिता खड़ी।
हिन्दुराष्ट्र की नींव पड़ी।
आसेतुहिमाचल रामराज्य।
राम सत्य अविचलअविभाज्य
राम गान्धी स्वप्निल भारत।
केशव माधव मन महिमारत।
राम राष्ट्रिय स्वयं संघ हैं।
राम सभी में स्पन्द संघ हैं।
राम सनातन प्रेम प्रवाह।
राम हृदय के मोद उछाह।
राम हमारे हैं चिर नूतन।
राम जनों के पूर्व पुरातन।
राम राष्ट्र अभिनन्दन मूर्ति।
राम बुद्धि चिन्तन की स्फूर्ति।
राम प्राण बह रोम रोम।
राम पवन धरणी में व्योम।
राम अपावन पावन करते।
राम पवित्रित पावन करते।
राम मनुज आचार संहिता।
राम विचारित नदी बृंहिता।
राम सतत श्वास प्रश्वास।
राम दीप दीपित आकाश।
राम नवल नव नव्य निनाद।
राम तमःपशु सिंहनिनाद।
राम कहो आराम मिलेगा।
राम रटो भवरोग कटेगा।
राम राम कह राजा राम।
राम राम श्रीसीताराम।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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किसी के होके सीखा है
निर्लोभता आयेगी,दीन भाव धारण करने में।दीनता,भक्ति महरानी का आसन है।दीन और अकिंचन भक्तों को भक्तमाल में देखना होगा।देने के भाव में,यदि यह समझ में आ जाये,कि सारी माया,तो मायापति की है। मेरा क्या है, तो कहाँ का लोभ मोह।
और यह भाव कि,मुझे जो भी मिला है, मैं उसके योग्य नहीं था। इग्नोर मत करें,भक्तचरित्रों को। भक्तचरित्रों का पठन ही दैन्य,उपजायेगा,बारम्बार।
भक्तचरित्रों के श्रोता,तो भगवान् हैं। भक्त का मतलब ही है, अब भगवान् ही चाहिए।बहुत बिगड़ा का नाना जन्मों से काम, दास का । विनयजी और भक्तमाल पढ़े बिना, और नहीं चाहिए मुझे अब सिवाय अपने अंशी के,यह भाव सतत रहे बिना,एक जीवन और व्यर्थ।
जिन भक्तों/गुरुओं की लोभ वृत्ति थी ही नहीं, उन्हीं का चरित्रानुसन्धान भक्तमाल का आश्रय लेकर अपनाना होगा।
अन्यथा, गोस्वामीजी की विनय चिठ्ठी, कोउ कछु देइ कहै भल,यह वासना न उर ते जाईं,एक पतन के लिये बढ़ा देगा। जैसे घूरे पर फेंकी वस्तु का अपना स्वत्व नहीं, हमारे द्वारा प्रयुज्यमान हमारी रूमाल,हम हाथ पोंछें,सर पर धरें,कमर में बाँधें उसे कोई गिला शिकवा नहीं, वैसे अपने को समर्पित भाव की दृढता में पगना होगा।
न हँस के सीखें हैं, ना रोके सीखें हैं।जो कुछ भी सीखें हैं, किसी के होके सीखें हैं।
शरणागति भाव दास भाव है।सन्तोष हो जाय,धन मान से,और असन्तोष हो जाय, दासभाव से या यों कहें कि मेरी साधक भी नहीं बन पाया। साधक क्या मनुष्य भी नहीं, वेद कहते हैं, मनुर्भव।यह मनुष्यता ही आयेगी तभी जब नाना जन्मों की अकड़न जकड़न के अतीत बैठे अमानी,निर्लोभी चरित्रों का चरित्रानुसन्धान होगा।
सद्गुरु बैद बचन बिस्वासा,
वाले सद्गुरु की चरण शरण ग्रहण ही लोभः पापस्य कारणम्, से हटाकर निर्लोभ आकारवृत्ति देने में क्षम है।अतः बात एक ही है, किसी सद्गुरु को,सब कुछ सौंपो।और निर्लोभी,अपरिग्रही,के बिना, संग्रहपरिग्रहभाव जायेगा ही नहीं। बात फिर से वही- न हँस के सीखा है, ना रोके सीखा है।जो कुछ भी सीखा है, किसी के होके सीखा है।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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जब शरण हमारी श्रीराधा
तब जीवन पथ पर क्या बाधा।
जब शरण हमारे रघुपति हैं।
तब नहीं हमारी दुर्गति है।
हम जीव अंश तुम अंशी हो।
आधार अधर धर वंशी हो।
राधामाधव नित महारास।
देखें प्रतिक्षण है यही आस।
हम सेवक सेव्य आप जानो।
यह दास सदा अपना मानो।
जीवन की बाजी लगा दिया।
दम निकले रटते पियासिया।
यह जग जीवन सब तेरा है।
हे प्रभु कहिये क्या मेरा है।
तब सब तेरा तुझको अर्पण।
मैं तेरा हूँ तूँ मम दर्पण।
यह भाव स्वभाव तुम्हारा है।
यह जग माया से हारा है।
स्मृति प्रभु अब दो अपनी अविरल।
जग विस्मृत होये विरल विरल।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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जीव तरें
अपनी खाल को मरम न जानै दूजी खाल बिछाय करे।
साधू मारग वह नहिं होवै डूबै थाह न उतर तरें।
कर्म जाल जाला निर्बन्धित वसना रह संसार करे।
बार बार हो पतन चलै ऊपर नीचे गति डूब मरें।
यदि सद्गुरु शुभ स्नेह मिले तो,रुके पतन वह नाव धरे।
कोई जीव भाग्यशाली हो,गुरू भागवत चरण परें।
धर्मराज यमराज अधर्मी से पूछें औ दण्ड धरें।
स्वागत करें धरमधारी का पूजन भी सविशेष करें।
इन्द्रादिक भी करत आरती धर्मी चल वैकुण्ठ परें।
अंशी वे वैकुण्ठ लोक पति अंश पाय वात्सल्य करें।
तब जानौ ये जीव कृतारथ मानव जीवन सफल करें।
गुरु कृपया नारायण कृपया शब्द डोर गहि जीव तरें।
श्रीहरिगुरुसन्तः शरणम् http://shishirchandrablog.in
हरिशरण न एकौ बाधा
मनुष्य का शरीर मिल गया और यह मन, श्रीसीताराम के अमितसौन्दर्यपूर्ण छवि के अनुसन्धान में नहीं जा पाया,तो समझो कि, एक जीवन पुनः पतन की ओर अग्रसर।
सुन्दरता कहुँ सुन्दर करई।
छविगृह दीपशिखा जनु बरई।।सब उपमा कवि रहे जुठारी।केहिं पटतरौं विदेहकुमारी।
जिन भगवती का सौन्दर्य, सुन्दर को भी सुन्दर बना दे और जो प्रकाशित भवन को भी सप्रकाश कर दे,उस रूप को कोई अनन्यचरणानुरागी ही देख पायेगा। सारी उपमाओं को जिन कविजनों ने प्रयोग कर जूँठाकर दिया है, ऐसी भूमिजा जानकी के रूप की उपमा इस अनन्त अनन्तब्रह्माण्ड में प्राप्त ही नहीं। अतः गुरुकृपावलम्बित भक्त नाम बल से युगललीला में प्रवेश पा सकता है।
ऐसे भक्त की मनोदशा ही ऐसी हो सकती है,जब वह अचाह हो जाये।और कह उठे-
हे नाथ आप अपने को ही दे दीजिए।अब कछु नाथ न चाहिअ मोरे।दीनदयाल अनुग्रह तोरे। क्योंकि,संसारेच्छा तो संसार में आनेजाने को ही दृढतर करती है।इस संसार के वासनाप्रवाह से एकहरिनाम ही मुक्त कर सकता है।
युगलसरकार के अवतार इसी कलिकाल में,बंगधरती को पवित्र करने वाले महाप्रभु चैतन्यदेव ने इसीलिये हरिनाम कीर्तन जप,स्मरण को एकमेवाश्रय माना और उस अवतार काल में नामशक्तिद्वारा जीव के पतनप्रवाह पर सदा सर्वदा के लिये रोक ही लगा दी।
उन्होंने कहा कि,वस्तुतः भगवान् ने अपने नाना नाम प्रकट किये और उन नामों में प्रायः अपनी सारी शक्ति ही भर दी। ऐसे हरिनाम का स्मरण देश काल और शुद्धाशुद्धि से परे है, जिसकी सतत
अविस्मृत स्मृति भगवान् और उनके रचे संसार तथा स्वयं भगवान् को भी दे देने में समर्थ है।
नामन्यकारि बहुधा निजसर्वशक्तिः तत्रार्पिता,नियमितः स्मरणे न कालः।
-शिक्षाष्टक
गोस्वामीजी ने हम जैसे मलिन जीवों पर दया ही दिखाते हुए कामना इच्छाहीन बनने और भगवच्चरणाश्रय पाने का यही मार्ग बताया-
राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा।थल विहीन तरु कबहुँ कि जामा।।
भगवान् तो करुणामूर्ति हैं, जो हमारी मलिनवासना नष्ट कर,वैकुण्ठ ही दे देते हैं, जहाँ श्रीभागवतजी प्रमाण हैं –
अहो बकीयं स्तनकालकूटं जिघांसया अपाययद् अपि असाध्वी।लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोन्यं कं वा दयालुं शरणं प्रपद्ये।।3/2/23 भागवत
जिस असाध्वी पूतना ने अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर,बालश्रीकृष्ण को मारने की इच्छा से,दूध पिलाया,उन श्रीभगवान् ने उसे माता के अनुरूप गति देकर कृतार्थ कर दिया। अतः अब बताओ ऐसे दयाशील प्रभु को, छोड़ किसकी शरण ग्रहण श्रेयस्कर है।
इसलिये हम जैसे मलिन चित्त के जीव, ऐसे प्रभु रामकृष्णनारायण के नामों का आश्रय लेकर कृतार्थ हो जायँ।क्योंकि, नाम ही श्रेयस्कर है,इस प्रपंच बाध के लिए।नाम का आश्रय नामी का आश्रय होने से सदानन्ददाता है।तभी गोस्वामी जी ने उद्धोष किया-
सुखी मीन जहँ नीर अगाधा।
जिमि हरिशरण न एकौ बाधा।।
श्रीगुरुहरिसन्तः शरणम्।
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दशार्थक दिव्य
दिव् क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुति- स्वप्नमोदमदकान्तिगतिषु।
इस प्रकार दिव् धातु के दस अर्थ भगवान् पाणिनि ने किये हैं :
1- मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य अपनी आत्मा में परमात्म दर्शन कर उसमें रमण क्रीडा करना ही है।
2-विजिगीषा का अर्थ विजय की इच्छा है। यह मनुष्य जीव, कामादि विचारों पर विजय अभिलाषा,रखते हुए उसमें नाम जपादि साधनों से प्रवृत्त होकर,जीवन को कृतार्थ कर ले।
3- व्यवहार ऐसा हो,जिससे अपने अंशी परमात्मा के करुणा,कृपा,सौशील्य आदि
गुण संचरित होकर स्व का पर से भेद ही मिटकर ,अभेद दर्शन करा हो जाय।और यही तो परम प्रयोजन है।
4- द्युति प्रकाशार्थक है।आत्मा भी प्रकाश रूप है,इसकी पहचान ही,भक्ति है।
5- स्तुति, मनुष्य जीवन का अभिन्न मार्ग है, जिससे लौकिक, अलौकिक सभी पद पदार्थ प्राप्य हैं।
6-स्वप्न से तात्पर्य, नाम जपादि साधनों द्वारा,ईश्वर का सगुण रूप सर्व प्रथम स्वप्न में देख लेना है।
7- मोद, हृदय की प्रसन्नता का स्वसिद्ध
स्वरूप है, क्योंकि भगवान् जो विराजे हैं,वह मोदप्रमोद ही हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् में,इस आत्मा का आत्मा इस मोद को ही कहा गया है।
8- मद, परम काम की स्थिति है, जिसका अनुभव भक्त ही करै,जानिये।
9- कान्ति, का अर्थ प्रकाश और चमक है, जिसको शरीस्थ चेतन ज्ञानस्वरूप के रूप में सारे व्यवहार का प्रवर्तक मानिये।
क्योंकि वह कान्तिमान् परमात्मा या आत्मा,न हो तो कौन सा शरीर कान्तिमान् रह सकता है। और कहिये कि शरीर पिण्ड के समस्त स्वयं या परस्पर व्यवहार उसी हरिः ओ3म् तत् सत् कान्ति से हैं।
10-गति का अर्थ जाना, प्राप्त करना और
ज्ञान भी है। वह आत्मरूप परमात्म तत्व
की ओर आत्मा से जाना,उसकी प्राप्ति और ज्ञान ही मानव जन्म का उद्देश्य है।
इस तरह यह दिव्य शब्द,दशार्थक है।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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लेत प्रसादी हुआ प्रसन्न
राम राम जिह्वा रटि लागी।
माया छोड़ि कहाँ गै भागी।।
जिह्वा कौशल्या करि बूझो।
रामजनम प्रतिपल हीं सूझो।
मिटी अविद्या माया जानो।
विद्या रूप ऊजागर मानो।।
संसृतिचक्र चक्र- कर्तित।
स्वस्वरूपगत मन हर्षित।।
वही दिखाये दुर्लभ रस्ता।
जो उसमें सन्तत अलमस्ता।।
गुरु भगवत् कहता संसार।
देता वह षड् रिपु को जार।।
दुर्जय मोह अविद्या माया।
फँसी देह आकर्षी भाया।।
वह विद्या जो भेद मिटाती।
गुरु वत्सलता सबहिं दिलाती।।
हरिगुरुसन्तः चरणप्रपन्न।
जीव जगत माया आसन्न।।
गुरु भगवान् कृपामय अन्न।
लेत प्रसादी हुआ प्रसन्न।।
हरिः शरणम्।
अनुपम झाँकी
दिव्य काल अब दृश्य श्रव्य।
हैं वीर शिवाजी दिव्य भव्य।
यह अतीत का काल मनोहर,
हर हर नगरी हर हर हर।।
देखो समझो जानो मानो,
दृढ निश्चय कर्म, उठो ठानो।
काशी में मंचन शिवाचरण,
मानवविरोधिता के प्रति रण।
जब म्लेच्छत्रस्त भारतमाता,
प्रतिकूल वेद उनका नाता।।
तब वीर शिवा थे उदित हुए,
बर्बर आक्रान्ता गए मुए।।
इतिहास कहानी कहता है,
हिन्दू न दुष्टता सहता है।।
विक्रम संवत द्विसहस्र बीस।
दशमी कार्तिक गुरु शुक्ल शीष।।
जाणता राजा उद्दाम नाट्य,
सुन्दर अभिनय है यह अकाट्य।।
मीरजा पुरी वासी हर्षित,
शिववीरवीरता आकर्षित।।
आनन्दमग्न रसपूर प्रकट,
सब दृश्य श्रव्य आमोद निकट।।
इतिहास जानता कहता है,
क्या वीर अनाचर सहता है।।
वह अमर शिवा राजा प्रति पल,
हर हिन्दु हृदय कहता अविरल।।
काशी हिन्दू विद्या धरती,
जाणता राजा अभिनय करती।
अमर कथा यह वीर शिवा की,
है अतीत की अनुपम झाँकी।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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मौनं सर्वार्थसाधनम्
सामान्य सी बात है, पोथी का पण्डित और पण्डिताः समदर्शिनः वाले पण्डित में बड़ा भेद है।
शास्त्र और सन्तों की मानें तो,उनके ही शब्दों में एक मायिक है तो दूसरा है पूर्ण अमायिक,गुणातीत।
काशी में शरीर धरे और शास्त्रभाषा को सरल साधुवाणी में कहने वाले,श्रीमद् जगद्गुरु आद्यरामानन्दाचार्य भगवान् के एक सच्छिष्य हुए महात्मा कबीरदासजी।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पण्डित भया न कोय,कहकर पण्डित की तो अपर परिभाषा ही गढ़ दी,आपश्री ने। बिरले महात्मा थे।देखिए तो-
उनके शब्द, कैसे त्रिगुणा माया से पार नहीं हो पाने का संकेत करते हैं-
माया मरी न मन मरा मरि मरि गया शरीर आशा तृष्णा ना मरी कहते दास कबीर।
अरे,नारायण ध्यान देने योग्य है,कि माया
की आवरण,विक् षेप शक्तियों को पढ़ने पढ़ाने से दुर्धर्ष माया का आवरण नहीं हटेगा। माया जल्दी हटती भी नहीं।
कबीर की ही मानें तो उन्होंने गुरुप्रदत्त श्रीराम जय राम जय जय राम नाम पकड़ कर विक्षिप्त मन और माया जीत ली थी।एक जगह वे कहते हैं-
रमैया की दुलहन ने लूटल बजार,
ब्रह्मा को लूटल शिव को भी लूटल।
लूटल सकल संसार।कबिरा बच गया साहिब कृपा से शबद डोर गहि उतरा पार।यह शबदडोर रामनाम ही है। अब देखिये-
परिवर्तन परिवर्धन पतन उत्थान सृष्टि का नियम है। मन जब संसार राग रागी होकर भ्रमणशील रहता है,टिकना रुकना सम्भव ही नहीं है।चलेगा चलायेगा घूमेगा और घुमायेगा।नाना शरीरों और योनियों भी में भटकायेगा। बारम्बार भवाटवी भ्रमण
की प्राप्ति रोक देना और इसी मानव शरीर से जन्ममृत्युबन्ध को रोक देना,तो अत्यंत सरल है।वह सरल है केवल नाम जप की निरन्तर आवृत्ति की ऊर्जा से,जो कि हृद्गतज्योति परारूप है।
समझ की बात है, इस मानवीय जीवन में
लोक और लोकान्तर पदार्थ की प्राप्ति के प्रयोजन की सिद्धि, श्रीराम जय राम जय जय राम से हुई है, हो रही और होगी।
नाम, हरिकृष्ण राम नारायण दुर्गा सीता राधा कोई भी हो, सभी शब्दरूप है।इसके चाररूप-परा,पश्यन्ती,मध्यमा और वैखरी होते हैं।आकाशमय शब्द वैखरी वाणी है, इन वैखरी आदि का क्रमशः विलय मध्यमा,पश्यन्ती और परा में होता है। जो वाणी का उत्स है, वह परा है। चलन गमन उच्छलन क्रमण का स्रोत यहीं से है। लेकिन वाह्य परिणति वैखरी में है। पश्यन्ती और मध्यमा स्मृति है,तो परा आत्मस्थ। लेकिन कैसे भी हो, वैखरी भी जरूरी है।सन्तों के वैखरीशब्दरूप श्रीराचरितमानस जैसे ग्रन्थ नहीं होते और,वेदादिशास्त्रवैखरीवाणी न होती तो साधन क्या था।जीव का परम कल्याण हो या संसार ही की रहनी सहनी हो,कौन मार्ग बताता।संसार व्यवहार कैसे होता।अतः शब्द साधन अनिवार्य है।
भैया,वैखरी के विना तो हम जैसे सामान्य कलिमलग्रस्त जीव कुछ समझ भी नहीं सकते।जीव के आत्मकल्याण का साधन वैखरीशब्द भगवन्नाम जपरूप है।
जप व्यक्तायां वाचि और जप मानसे च, दो अर्थों में व्यवहृत है।इस प्रकार जप का अर्थ पश्यन्ती मध्यमा रूप मानसिक और वैखरी रूप स्फुट शब्द भी है।
चाहे नाम सङ्कीर्तन हो या स्मृतिरूप मनन श्रवण स्मरणादि हो,पहुँचेगा उस अनन्त परम परात्पर या तत् शक्ति परमा परात्परा तक,यहीं विश्रान्ति है। क्योंकि इसी से निकल कर, इसी की लीला से यह जीव अलग हुआ था।तब यहाँ पहुंचे बिना पायो परम विश्राम,कहां सम्भव है। अतः
शब्द से ही संसार और असंसार के सारे अर्थ का अवगम है,योगी,ज्ञानी भक्त की बात अलग है।परम योगी भर्तृहरि ने कहा था कि सभी को यह जानना चाहिए कि,
शब्द ज्योतिस्वरुप वैखरी विभाग में आने पर ही अर्थ का अर्थात् प्रयोजन का प्रकाश करता है।परा तो इसका मूल है।वाणी का शब्द का परम रस इसी परा तक जाकर परम शान्त हो जाता है।यही अन्तिम स्थिति लाभ है।
जगत् का सारा भान तो वैखरीशब्दानुगम से ही होता है।यह वैखरी ही अन्दर प्रवेश करके,इस शरीर पिण्डस्थ परमात्मरस का बोध कराती है, ऋषि ने इसे अनुभूत करके परम रस कहा था,जो परम प्रेम और आनन्द की अवस्था है,इसे शब्दादि साधनों से पाने के लिए ही,यह देह है।श्रुति उक्ति प्रमाण है-
रसो वै सः। रसं हि अयं लब्ध्वा आनन्दी भवति- तैत्तिरीयोपनिषद्- 2/7/2
परम योगी भर्तृहरि ने भी यही कहा-
प्राप्तरूपविभागायाः यो वाचः परमो रसः।
यत्तत् पुण्यतमं ज्योतिः तस्य मार्गः अयमञ्जसः। न सोस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते।अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भाषते।
वाक्यपदीय ब्रह्मकाण्ड- 12-24
यह संसार और उसके सरकते दरकते व्यवहार व्यापार, बिना शब्दोच्चारण के कैसे सम्भव है। इसके विना कोई कैसे ज्ञान करायेगा।वैखरीशब्द से ही तो सभी,संसारक्रियाकलाप होता है। यह शब्द अनादिब्रह्म है। आकाश इसे धारण करता है। वाक्यपदीय में ही मङ्गलाशासन करते हुए, महायोगी भर्तृहरि इसी मत की पुष्टि करते हैं-
अनादिनिधनं ब्रह्म,शब्दतत्वं यदक्षरम्।
विवर्ततेर्थभावस्य प्रक्रिया जगतः यतः।।
ब्रह्मकाण्ड-1
शब्दोङ्कार से उद्भूत संसार है, ऐसा शास्त्र और सन्त कहते हैं।
यह जीव जगत् अन्धकारमय ही तो रहता,यदि शब्दमयी ज्योति का स्फुरण शक्तिपात नहीं होता।महाकवि दण्डी ने भी इसी का समर्थन किया –
इदमन्धन्तमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयं यदि शब्दाह्वयं ज्योतिः आसंसारं न दीप्यते।
काव्यादर्श-दण्डी -1/4
यह शब्द, अग्निप्रधान ज्योति स्वरूप है। यह शब्दज्योति परा रूप में सुषुप्त है।जब किसी अर्थ या प्रयोजन की प्राप्ति करनी होती है, तब सबका मूल अन्तः इन्द्रिय मन, विचलित होता है।और शरीर में विद्यमान अग्नि पर इसी मन का प्रहार होता है। ततः अग्नि, वायु को प्रेरित कर भेजता है,जो वायु आकाश में बिखर कर वैखरीशब्द बनता है। सृष्टि के क्रम में यह वायु ही अग्नि के पिता हैं।यह वायुदेव हृद्देश के मार्ग से चलकर,कण्ठगत होते हुए, मुखविवर से अपने पिताजी, आकाश जी में बिखर जाते हैं।यही है, वाणी का शब्द का अन्तिम चरम सोपान परिणाम, जिसे कहकर,सुनकर हम सभी अपने पराये अपराये सभी अर्थों को समझते बूझते हैं।
भगवान् पाणिनि ने अपने शिक् षा ग्रन्थ में इसका प्रकाश किया है,कि कैसे शाब्दी वाणी निकलती है-
आत्मा बुद्ध्या समेति अर्थान्,मनो युङ्ते विवक्षया।
मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम्।मारुतः तु उरसि चरन् मन्द्रं जनयति स्वरम्। पाणिनीय शिक् षा- 2/6-7
आत्मा बुद्धि के साथ अर्थसिद्धि के लिये जब यत्न करता है, तब वह शरीरस्थ अग्नि पर प्रहार करता है। यह अग्नि, वायु को प्रेरित कर हृदय मार्ग से कण्ठमार्ग से,मुखद्वार से बाहर करके, वैखरी की सृष्टि कर देता है।
वैखरी वाणी रूप शब्द जैसे संसार का अर्थ सिद्ध करता है,वैसे ही असंसार का भी।अर्थानुसन्धान कभी भी, शब्दप्रयोग के बिना सम्भव नहीं है। इसलिए सर्वोच्च शरीर मानव का ग्रहण करके,अन्धेनैव नीयामानाः यथान्धाः की स्थिति न बने।इसका ध्यान करते हुए, प्रायः जब तक अनिवार्य न हो,न बोलने का अभ्यास और मन ही मन रामकृष्णनाराराण नामों के सतत मनन का अभ्यास ही कलिकाल में सारी उपलब्धियों का मूल है।
सुभाषितरत्नसमुच्चय में आई एक विचित्र परिहास परक गम्भीर बात सन्तों द्वारा कही सुनी जाती है-
मुख से निकलने वाणी को बन्ध मुक्ति कारक बताते हुए, पक्षी जैसी योनि का उदाहरण, दिया है। अपने मुख दोष से ही शुक और सारिकाएँ बन्धन में पड़ते हैं।बगुले नहीं बँधते,क्योंकि वे वस्तुतः अपने लक्ष्य शिकार पर ध्यान गड़ाए,मौन रह कर,लक्ष्य के समीप आ जाने पर झपट कर उसे पा लेते हैं।अतः मनुष्य को इसी वृत्ति से अपने इष्ट पर ध्यान गड़ा कर प्रायः मौन साधन करते हुए नाम जपादि अभ्यास में रहना चाहिए, जिससे जीवन लक्ष्य पाने में सरलता हो-
आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिकाः। बकाः तत्र न बध्यन्ते मौनं
सर्वार्थसाधनम्।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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स्वतन्त्र साधक नहीं होता
चर्म चक्षुओं से दृश्यमान दीप,जब सद्गुरु कृपालेशतः अतीन्द्रिय नेत्रगत हो तो संसार में खोया मैं प्रकाशित हो जाय।
मानव जीवन में भगवान् और शास्त्रसन्त ही अतीन्द्रिय नेत्र देते हैं। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्, कहकर भगवान् ने अर्जुन को अतीन्द्रिय नेत्र दिये थे।
और तब अर्जुन की मोहरात्रि विगत हो गई थी,और प्रकाश हुआ, अनुभूति हुई अन्तःकरण परिशुद्ध होकर बोल उठा,नष्टो मोहः स्मृतिः लब्धा त्वत् प्रसादान् मया अच्युत।
और नहीं तो जगत् जितना मिला है, उससे कहीं और अधिक कामिनी कांचन पद प्रतिष्ठा के लोभ मोह के अँधेरे को छोड़ता नहीं।
इसलिये सन्तशास्त्र का अवलम्ब लेकर करुणा दया क्षमा त्यागादि आनन्दमय स्वतः प्राप्त भगवदीय गुणों को जान पहचान कर आत्मसात् करना चाहिए।
भगवदीय गुण कहीं गए नहीं हैं,आत्म विस्मृति और संसार के चाकचिक्य चकाचौंध के दृष्टि भ्रम की सतत स्मृति में खो जैसे,गए हैं।
मनुष्य जीवन में आत्मप्रकाश ही त्रिगुणा माया का बन्ध तोड़ सकता है।
श्रीरामनामादि का कहीं भी किसी भी काल में देश में अपने हृद्देश में स्मरण श्रवण मात्र का साधन आत्मदीप के प्रकाशमान रूप को दिखा देगा।
जाकर नाम सुनत शुभ होई
मोरे गृह आवा प्रभु सोई।।
हम शारीर इन्द्रियों के तन्त्र में उलझ कर फिर एक बार भगवान् की कृपा करुणा को ठुकरा देंगे, यदि इनके परतन्त्र हो गए तो। अतः श्रुत शास्त्र सन्त का पारतन्त्र्य ग्रहण कर,आत्मदीप का दर्शन करना ही प्रकाश पर्व के आलोक का स्वारस्य है।
भैया, विषयी साधक सिद्ध सयाने में, साधक की अवस्था में तो जाना ही पड़ेगा, आगे की अवस्था तत् तन्मयता से स्वतः मिलेगी। लेकिन याद रहे, शास्त्र सन्त पारतन्त्र्य तो स्वीकारना ही होगा।
नारायण,स्मरण रहे संसाररण में-
साधक स्वतन्त्र नहीं होता और स्वतन्त्र साधक नहीं होता
हरिगुरुसन्तः शरणम्