अपनी खाल को मरम न जानै दूजी खाल बिछाय करे।
साधू मारग वह नहिं होवै डूबै थाह न उतर तरें।
कर्म जाल जाला निर्बन्धित वसना रह संसार करे।
बार बार हो पतन चलै ऊपर नीचे गति डूब मरें।
यदि सद्गुरु शुभ स्नेह मिले तो,रुके पतन वह नाव धरे।
कोई जीव भाग्यशाली हो,गुरू भागवत चरण परें।
धर्मराज यमराज अधर्मी से पूछें औ दण्ड धरें।
स्वागत करें धरमधारी का पूजन भी सविशेष करें।
इन्द्रादिक भी करत आरती धर्मी चल वैकुण्ठ परें।
अंशी वे वैकुण्ठ लोक पति अंश पाय वात्सल्य करें।
तब जानौ ये जीव कृतारथ मानव जीवन सफल करें।
गुरु कृपया नारायण कृपया शब्द डोर गहि जीव तरें।
श्रीहरिगुरुसन्तः शरणम् http://shishirchandrablog.in