महागौरीति चाष्टमम्



नवद्वारे मध्ये कृतनियतनिष्ठां सुनियताम्।

रमन्तीं वसुसंख्यां सुललितशृङ्गारसुभगाम्।।

महागौरीं देवीं द्युतियुतदिवाकरनिभाम्।

भजन्ते सानन्दं भजनरसिकाः भुवि नराः।।


हरिः शरणम्।
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रामनाम जो खायँ

राम मरैं तो हम मरैं नाहिं त मरै बलाय अबिनासी का बालका मरै न मारा जाय।
  — महात्मा कबीर।

करम भोग है जनम का भोगत भोगत जाय।

काल प्रवाह अनादि है ईश्वर इहै कहाय।।

हम शाश्वत शाश्वत गुरू हरिगुरुसन्त बताय।

काल गुरू कर्ता गुरू शून्य समुझि परि जाय।।

विन्ध्येश्वरि कै दास मुख बानी यहि निकसाय।

राम नाम श्रुति मुखन बिच राजत स्वान्तसुखाय।।


        
राम नाम हर श्वाँस में आवै निकसै भाय।

गुरु किरपा सब होत है रहै अनन्तै जाय।।

रहै अनन्तै जाय रामजन सांचो दास  कहाय।

दास कहाय तरै भवसागर निरमल होत सुभाय।।


राम नाम सौं नमत जो रहि सब ताहि  नवाय।

रहि सब ताहि नवाय कौन तेहि अस्थिर करिहै।।

तब चल मन नम रमो राम ढिंग रहै अनन्दै ठायँ।

रहै अनन्दै ठायँ सोइ मधु राम नाम जो खायँ।।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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इन्द्रपूजा विरोध या सुधार

पुण्यपुराकृत कर्म भोगवश इन्द्र पदवी किन्ही निष्कामी प्रेमी भक्तों के लिए हेय और तुच्छ है।”इन्द्र” इन्द्रियभोगी देशकाल बाधित व्यक्तित्व है।
जबकि गोपीजन अबाधित आनन्द सत्ता में विहार करने वाली तात्विक प्रेमाभक्ति होने से देशकालातीत तत्व।”सदृश श्वान मघवान युवानू” (सन्तप्रवर तुलसीदास)
अर्थात्-
इन्द्र-युवक और कुत्ता समान भोगभोगी लोलुप इन्द्रियोन्मुखी तत्व होने से विमुख जीव कोटि में हैं।जबकि गोपियाँ सन्मुख जीव।गोपियाँ वेद की ऋचाएं हैं, इसलिए की भगवान् ऐसे ही निष्कामी प्रेमियों के साथ मानव रूप धर कर श्वास-प्रश्वास पूर्वक क्रीडारत होते हैं।

और ऋचाएं गोपिकाएँ इसलिये भी हैं कि, तस्य निःश्वसिताः वेदाः है। भगवान् की निर्गत श्वास वायु सृष्टिरचना हेतु निर्दिष्ट ब्रह्मा जी के कानों में पड़कर मुखनिःसृत होकर वेद मन्त्र हो गई हैं। यह गोपिकाएं भगवान् के लिए भगवान् को चाहती हैं।
अनन्याः चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते के स्वरूप में यह गोपिकाएं भगवान् की अनन्य प्रेमी भक्ता हैं।यह भगवान् की चरम परम प्रेम का जीवन्त रूप हैं। ऋचा और गोपी दोनों स्त्री हैं।और पुरुष तो एकमात्र पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ही हैं। भक्तों के साथ लीला ललाम लीनता भगवान् की ही होती है,किसी भोगी विषयी पामर जीव के साथ नहीं। इन्द्र भोग का प्रतीक है तो गोपीजन परमचरम प्रेमयोग की।
श्वासरूप हैं गोपियाँ भगवान् की। इसलिये कि भक्त और भगवान् का सम्बन्ध अभिन्न है। भगवान् का अप्राकृत दिव्य देह विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन मनुज अवतार होने के साथ भक्तों के साथ क्रीडा प्रयोजन अपेक्षित प्रेक्षित है।
इसलिए वानर भालु ऋषि और ऋचाओं का गोप-गोपी रूप धर कर नित्य के साथ नित्य की लीला है।
क्योंकि नित्य, अनित्य के विजातीय होने से कैसे खेल सकता है।
इसलिये सृष्टि के आरम्भ में उपजी, नित्य ऋचाओं का गोपी भाव आश्चर्य जनक नहीं है। “गो” शब्द इन्द्रिय वाचक है।”प” शब्द पालन रक्षण के लिए प्रयोग होता है।इसलिए, इन्द्रिय रुप गो का पालन रक्षण इन्ही भगवान् द्वारा होना स्वाभाविक है।
सम्पूर्ण भागवतविमर्श का सारत्व भगवान् के लीलावतार द्वारा मानव शिक्षा का प्रायोगिक निदर्शन है।भक्त-भगवान् की लीला का अद्भुत स्वरूप  भागवत में दीखता है, क्योंकि अन्ततः चाहे मरण धर्मा ब्रह्मा हों या तद्वत् रूप विनाशी इन्द्र ,सभी एक अद्वितीय भगवान् की ही स्तुति करते हैं।इन्द वैदिक देवता होने पर भी प्रचण्ड मायावी दुर्धर्ष रावण की सभा में “इन्द्रं माल्यकरम्” (हनुमन्नाटक)
माली का काम करते दीखते हैं।भगवान् अंगी हैं और इन्द्र अंगरूप हैं। इसलिए अंगीरूप श्रीकृष्ण भगवान् की पूजा होनी चाहिये, अंगरूप इन्द्र की नहीं,इसी अव्यवस्था को मेटने हटाने की लीला है  इन्द्रपूजा के स्थान पर गोवर्धनपूजा की परम्परा की अवतारणा। ऐसी पौराणिक घटना को सज्जन प्रेमी वृन्दजनों को वेद और लोक के सामंजस्यरूप में अवश्य  देखना चाहिए किसी विरोध में नहीं।
किसी लोकादि कीर्ति की वासना कामना से प्रेरित होकर काम करने पर तो  एक मानवजीवन और व्यर्थ हो जायेगा।
वेद की विद्वान् वाली अवधारणा जो अभेद तत्वदर्शनवती है, उसी को विद्वान् की परिधि में रखना चाहिए,न कि कीर्तिकामी प्रचारपरायण व्यक्ति के लिए।वेद कहते हैं-“विद्वान् न विभेति कदाचन”

संसार प्रवाह और कामना वासना तो संसार में बार बार उलझायेगी।इसलिए   भगवान् आदि शङ्कर के अनुकूल सन्तवेदशास्त्र सिद्धान्त आचरण ही निष्कामी सद्गुरु पादाश्रय देगा, जिससे पुराणों और व्यासवाणी का यथार्थ जानकर मानव जीवन सफल हो सकता है अन्यथा भगवान् के साथ अनन्यता की अबोधदशा में “माया” चढ़ बैठेगी,यथार्थ ज्ञान नहीं होगा और ऐसे ही पौराणिक वर्णनों में विरोध अवरोध की दृष्टि बनी रहेगी। इसलिये विनय और प्रेम का आश्रय लेकर रामहिं भजहिं ते चतुर नर
का अनुप्रयोग सारी जड़ता से मुक्ति का एकमेव उपाय है।इन्द्रपूजा को परम्परा सुधार की प्रेमदृष्टि से देखना चाहिए, न कि वेद शास्त्र लोक विरोध दृष्टि से।


हरिः शरणम्।
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अद्भुत आनन्द


कैसी कमनीय रहनि कै सहनि
दर्शनीय दीखै चलनि बोलनि।    
रसमग्न होति भगवदीयकरनि
जया एकादशि तिथि निरखि।

देहपार्थिवतः निश्वासनिःसरनि
श्रीरामकृष्णलीला प्रविशनि।
विक्रम संवत् दोहजार गवनि 
इक्यासी चलनि शुक्रवासरनि।

भाद्रकृष्णा वैष्णव एकादशिनि
तिथि नित्यलीला-ललाम-लीनि।
रैवासाधाम अग्रपीठाधीश्वरनि
नामतः प्रसिद्ध श्रीराघवाचार्यनि।

नमत्यनेकधा जनः तच्चरणनि
पिण्ड त्यागि ब्रह्माण्डसंचरनि। 
दिव्य-देव-लोक-धाम-धामनि
अति-विराट-राज्यश्री-प्रसरनि।

अग्रपीठ श्रीमहान्तपदरिक्त भवनि
तदीयपदधारण हित निरधरनि।
श्री-मलूक-पीठ अधि ईश्वरनि
परमोदार-साधु-शिरोमणनि।

“दास विन्ध्येश्वरी”नत मन मननि
लखि लीला सिद्धसाधुभूषणनि।
सानँद लखत सबै सभ्यसन्तनि
राघव-राजेन्द्र-रमणीय-करनि।

विद्यमान अग्रपीठ अस्मद् गुरुनि
साधु-सदाचार-मूर्त-विग्रहनि।
मोदमान “दास” दिव्य दर्शननि
अद्भुत आनन्द रसमग्न रसनि।

हरिः शरणम्
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श्रीनन्दनन्दनस्तोत्रम्

बालं नवीनशतपत्रविशालनेत्रं बिम्बाधरं सजलमेघरुचिं मनोज्ञं
मन्दस्मितं मधुरसुन्दरमन्दयानं श्रीनन्दनन्दनमहं मनसा नमामि ॥१॥

मञ्जीरनूपुररणन्नवरत्नकाञ्ची-श्रीहार केसरिनखप्रतियन्त्र-संघम्।
दृष्ट्यार्तिहारिमषिबिन्दुविराजमानं, वन्दे कलिन्दतनुजा-तटबाल-केलिम् ॥२॥

पुर्णेन्दुसुन्दरमुखोपरि-कुञ्चिताग्रा: केशा: नवीनघननीलनिभा: स्फुरन्ति।
राजन्त आनतशिर:कुमुदस्य यस्य नन्दात्मजाय सबलाय नमो नमस्ते ॥३॥

श्रीनन्दनन्दनस्तोत्रं प्रातरुत्थाय य: पठेत् ।
तस्य नेत्रगोचरं याति सानन्दं नन्दनन्दन:॥४॥

उपवास का विशुद्धार्थ

नारायण महात्माओं की दृष्टि तो साधु गुरुशास्त्रसम्मत होती है।अतः इस दृष्टिकोण से उपवास का अर्थ ‘दास’की विचारसरणि में त्रिविध है।वह है, सिद्धार्थ मूलार्थ और गूढार्थ। सिद्धार्थ शास्त्र सम्मत कहनी है। उप अर्थात् समीप में वास माने बसना,इसमें विप्रतिपत्ति नहीं है।यही है सिद्धार्थ।यह समीपता,इस बात की स्वयं अनुभूति है, कि हम प्रतिक्षण अपने अंशी(परमात्मा)के समीप ही बस रहे हैं।

अब जगत जिस अर्थ को ग्रहण करता है, वह है अल्प मात्रा में सात्विक फलमूलादि लेकर भगवत् चिन्तन पूर्वक नारायण की “उनकी”समीपता का अनुभव करना।यही वस्तुतःमूलार्थ है, जो स्पष्ट ही है। अल्पाहारपूर्वक देशकाल की मर्यादा में रहना और भगवच्चिन्तन करना ही प्रमुख मूल अर्थ है।

अब गूढार्थ विचारें तो यह है? जीवात्मापरमात्मयोग। यह भी “कृपालु” महात्मा बताते रहते हैं। यह सिद्धार्थ मूलार्थ और गूढार्थ परस्पर अभिन्न ही समझना चाहिए।
अब उपवास के “तुरीय”और अपर चतुर्थ अर्थ पर भी एक विचार कर लिया जाय। हालाँकि यह चौथा अर्थ भी पूर्वोक्त त्रिविध अर्थों से अभिन्न ही है। यह सूक्ष्मार्थ है।

यह क्या है, वह यह है कि, यह जीवपरमात्मा का सम्बन्ध परस्पर अपृथक् है,ऐसी दृष्टि शनैः शनैः विकसित हो जाय,माने कि अभेद दृष्टिकोण बने। इसीलिये नारायण! मायाकृत प्रारब्ध भोगी मनुष्य के पीछे नारायण ने अपनी “माया” लगा दी है दौड़ा दी है।
ताकि वह ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः मेरा सनातन सदातन अंशभूत जीव परेशान थक हार कर जन्मजन्मान्तर से ऊब कर मुझे देखे और कहे,अनुभव करे कि हे राम! तवास्मि
इसीलिये सनातन ऋषियों ने “उपवास” का विधान रचा है।
यह है,उपवास का सूक्ष्मार्थ।
नारायण! यह योगमाया या माया संसार वर्धन के लिये अथवा कहिये, सृजन पालन और संहार के लिये है। माया ही संसार रचती पालती है। निग्रह का कार्य वस्तुतः भगवान् का है। संसार ऐसे ही चलता रहता है। लेकिन जब हमारे स्वामी(भक्तसन्तगुरु) चाहैं,तब माया अविद्या भ्रम और इसके रचित आवरण विक्षेप सभी कुछ,क्षण मात्र में नष्टभ्रष्ट हो जायें। नहीं तो कठिन है डगर पनघट की।

गोस्वामी जी ने संसार की समस्त नारी मात्र को “नारि विष्णु या विश्व माया प्रकट” कहकर इनसे अति सावधान रहने का संकेत किया है।गृहस्थाश्रमी को स्वस्त्री छोड़कर नारीमात्र के लिये, मातृदृष्टि का आदेश है। यह भी उपवास का सूक्ष्मार्थ ही है।
वस्तुतः इसलिये सारतः तत्वज्ञान के लिये, जीवपरमात्माभेद के लिए, और माया अविद्या की निवृत्ति के लिये ” उपवास ” शब्द प्रयोज्यमाण है।
नारायण! यही उपवास का विस्तृत समग्रार्थ है।यह उपवास शब्द संकेत है, आहार शुद्धि का भी,क्यों?
क्योंकि शास्त्रवचन ही प्रमाण है- “आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः,सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
आहार शुद्धि के बिना, अविद्या माया संसार की स्मृति रहने से बारम्बार संसार आवागमन बना रहता है।इसलिये उपवास का अर्थ सन्तचरणों से सत्संग से जान कर ही आचरण में प्रवृत्ति होने पर संसार राग नष्ट होगा और उपवास के चरम फल की प्राप्ति होगी।यह नाना इन्द्रियों की आहार शुद्धि भी उपवास का सूक्ष्मार्थ ही है। इसलिए “दास” की गुरुपीठ का,मलूकपीठ का उद्घोष है-
अर्थ विशुद्ध उपवास जु पाया।
जेहिं जरि जाय मूल यह माया।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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न पुनः जन्म जायते 

धारकोद्धारकः धर्मः सिद्धः साध्यश्च कीर्तितः।अग्नौ दाहकत्वे सति तदग्निः सिद्धपूर्वतः। अन्यथा यदि  शीतत्वं तदग्निः स्यात् कथं वद। एवं मनुष्यता धर्मः मनुष्ये यदि वर्तते।तन्मनुष्यः भवेन् नूनं साध्यधर्मो निगद्यते।मनुना मानवेन्द्रेण मनुधर्मः प्रकीर्तितः।तावत् प्राथमं कृत्यं मानुषे यत् शरीरकम् ।विवेकशीलता धर्मः ख्यातः साधुमानितः।
यदि विवेचिनी बुद्धिः मनुष्ये पूर्वसिद्धिता।
तदा विचारः कर्तव्यः सर्वस्मिन्कार्यकारके।

विचार्यैव कार्यं कर्तव्यं सर्वकाले पदे-पदे।
विचार्य कार्यकरणे मर्यादा भवति ध्रुवम्।।

मर्यादा यदि जायेत गुणा आयान्ति निश्चितम्। करुणा क्षमा सुशीलत्वं सारल्यं तोषकारिता। यद्येषः गुणगणः मनुष्ये व्यवहार्यते।तदेषः मनुजः नूनं वक्तुं शक्यमिति ध्रुवम्।अन्यथा वैपरीत्ये सति  मानुषो नैष कीर्तितः।
मानुषो धर्मश्च मर्यादा शिक्षिता साधुसम्मता।भगवता रामचन्द्रेण प्राकृतं योनिमास्थितम्।अतः परीक्ष्य कर्तव्यं सर्वकर्मसमुत्थिते।सार्थं जन्म हि तस्यैव न पुनः जन्म जायते।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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साधक स्वतन्त्र नहीं, स्वतन्त्र साधक नहीं

यद् यद् आचरति श्रेष्ठः तत् तत् एव इतरो जनः।
सः यत् प्रमाणं कुरुते लोकः तद् अनुवर्तते।


जिन जिन श्रेष्ठ लोगों रामकृष्ण आदि ने आचरण किया,वही वही इतर(अन्य)जन भी,यदि व्यवहार करते हैं,तो वही धर्म का मानदण्ड(प्रमाण)है अतः मनुष्य लोक(लोग) वही अनुवर्तन करें।
भगवान् श्रीराम ने जो मानव शरीर धर कर मानव बनने की मर्यादा(सीमा) बताई, वह धर्म है। आचरण की शिक्षा ही सर्वश्रेष्ठ शिक्षा है।
वेद शास्त्र सन्त सम्मत मत स्वीकार करके आचरण(धर्म) में लाकर ही,मनुष्य बना जा सकता है। मनमाना स्वच्छन्द आचरण करके कदापि नहीं। अन्यथा यह मानव शरीर असाधन होगा, साधना साधन नहीं। और वेदशास्त्र सन्त साधु प्रतिपादित मार्ग पर चलने की, हम सभी जीवों की परतन्त्रता है।
भगवत् भागवत् पारतन्त्र्य ही साधन साधना और धर्म मार्ग है।स्वतन्त्र स्वच्छन्द विषय भोग में जाने पर इस भगवत्प्रदत्त मानव शरीर का प्रयोजन नष्ट हो जायेगा।
इसलिये, वेद गुरु सन्त मत में असन्देह विश्वास(श्रद्धा) करते हुए भगवत् भागवत् पारतन्त्र्य में रहकर ही धर्म(साधन) बनेगा।अन्यथा इससे इतर- शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध जैसे विषयों की लालसा और मान पूजा बड़ाई ने तो हमें अपने मानवीय- करुणा दया त्याग सौशील्य वात्सल्य सन्तोष आदि विभिन्न मानव गुणों से बहुत दूर कर दिया है।
अतः नारायण!साधक(धर्मपथ प्रवृत्त) स्वतन्त्र नहीं होता है।और स्वतन्त्र, साधक नहीं होता।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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मिलेगा ध्रुव सुनो तन नई से नई

मिला मानव का तन चाहना ना गई।

मिलेगा ध्रुव सुनो तन नई से नई।।



व्यासदेव भगवान् ने किया नहीं है भेद।
नारायण गुरु एक हैं तत्व अभेद अभेद।।

नारायण गुरु एक हैं जान सको जो जान।
नहीं जान पाए अगर पा न सके कुछ मान।।

गुरू एक हरि एक हैं मत देखो तुम भेद।
भेद देखते हो पुनः परौ धरनि कै छेद।।


सीख मिली संस्कृत भये गुरू कृपा ते जान।

जौ रहस्य यह ना खुला जान न पाए जान।।


गुरु आचरण गुरू चरण पकड़ सकौ जो पकड़।

नहीं पकड़ पाए अगर जा न सकैगी अकड़।।


जा न सकैगी अकड़ और होगा वर्तित संसार।

मिला मनुज तन गिर पड़ो गुरु चरणों में सार।।

“अष्टावक्र” गुरू भयौ चौबिस गुरू बनाय।
लख चौरासी “निगुरु” पड़ जागै सोवै खाय।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।।
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चले रहै अभिचार 

सारे भौतिक जगत् का आधार ही आध्यात्मिक है।
भौतिक संगत तभी तक है, जब तक आत्मिक। संगत
असंगत विसंगत सुसंगत कुसंगत/गति सभी में गमन या संसार चलनशीलता है,इसी को हमारी तुच्छ बुद्धि , भौतिकता माया अविद्या मानती है।
इस माया अविद्या संसार के आकर्षण से प्रभावित होकर नाना कल्प बीत चुके हैं।अनुभव तब होगा,जब कोई इसका अनुभोक्ता अनुभव करा दे। परिवर्तन संसारासक्ति पूर्वक नाना शरीर धारण करना इस शरीर का लक्ष्य ही नहीं है।
नाना ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं के अनुकूलतम संघात इस देह से पृथक् आत्म तत्व है, इसी बात को जाने समझे लोगों और उनकी परा वाणियों से स्वयं में आत्मत्व का अनुभव ऐदं प्राथम्येन इस पिण्ड में रहने का प्रयोजन है।
दूसरा भी परम चरम प्रयोजन है, पुनः कर्म वासनाजनित शरीर न धारण करना।
अतः भौतिक और आध्यात्मिक जगत् को आधार आधेय समझ कर एक साथ समझ कर आगे चलना होगा।नहीं तो-तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्रावित् ,में संगति नहीं बनेगी। संगत गति सत्संग में,रहो भले दिन चार।या पाले संसार के चले रहै अभिचार।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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