नान्देड़ श्रीमहाराष्ट्र में शिव की कथा हुई सुन लें।
अपने सद्गुरु कहे आज ही यह प्रसंग निश्चित गुन लें।।
अग्र-मलूक-श्री-पीठाधीश्वरपद परितिष्ठित गुरु अपने।
“समरथ” गुरुद्वय छत्र छाँव में आत्म ग्यान गुन गने बने।।
क्या वैराग्यपूर्ण जीवनी उनकी कथन करन अन्तर नाहीं।
जहाँ रहें तहँ सन्त बिराजें तीरथ प्रकटै तहँ ताहीं।।
हरि हर दुर्गा श्रीगणेश की नारायण की कथा शुभा।
भवबन्धन से काट जीव को हरती सारी शुभाशुभा।।
श्रीभगवान् भागवत चर्चा करती चमत्कार भारी।
हरि चरणों में धरै भगत को हरै व्यथा जग की सारी।।
शिवपुराण की कथा मध्य इक तथ्य सुना मुझको भावै।
जो जन सुनत न कथा निरन्तर, बाँधि डोर तेहि कथा सुनावै।।
जोर जबरदस्ती उस जन को कथा सुनाना शुभ फल है।
कथा सुने औ सदा सुनावै अथवा जीवन निष्फल है।।
श्रीभागवत माहात्म्य कथन में कहें यही “गोकर्ण” कृती।
सेवा करे कथारस पीवै वही यती संकल्प व्रती।
अतः कथा सुन सुनें सुनायें जन्म कर्म का बन्ध छुटै।
इह संसार मनुज तन का जो चरम लक्ष्य तेहि पन्थ डटै।।
चरमलक्ष्य आना न कभी इस संसृतिसागर धरो अकल।
नाम राम को गाय कथा, पाये हैं पायें जीवन-फल।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
कलुषित कलजुग्ग गयो
जेहिं पर कृपा करहिं जनु जानी,कवि उर अजिर नचावहिं बानी।।
जानै वही जान जानो,कृपा केवल हरी और हरी के दासन की मानो।।
नातो नारायण सों जो मनै वहै मानो,करते स्वीकार वह सच्चे से हृदय जानो।।
हरि हरिदास हरैं प्रेमियों के चित्त सदा,होवै समरपन से हरषन प्रवर्ष मुदा।।
ऐसे दास दासन के प्रणते सन्तोष मिले, मिटै काम,पूर्ण होवै चाहै कुछ भी न ले।।
निकसै तबै बानी भूलिजगद्व्यवहार हार, मान लो तब नष्ट हुआ सदातना कर्म जार।।।
सन्तों ने कही सही बालमीकि भये मान,तुलसिदास नाम सिद्ध काटैं कलि के वितान।।
गुरू पाय “नरहरि” सुनी कथा राम की सुजान, गाई तबै रामकथा रामायन महि महान।।
कठिन कलि काल जबै सबै बेहाल भये,राम के चरित्र छन्द बद्ध द्वादश काव्य नये।।
काल के कुचाल कुचले हैं सदा तुलसि- बानि,जीवजन्मजगतबन्ध तोरि फेंके तानि तानि।।
अशरण को शरण सदा “तुलसी” रामायन भयो ,राम भक्ति भक्तश्रद्धा कलुषित कलजुग्ग गयो।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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चण्ड और मुण्ड दोनों प्रवृत्ति मार्गी हैं
चण्ड और मुण्ड दोनों प्रवृत्ति मार्गी हैं। तमोगुणी हैं। संसार ही चाहिए दोनों को।
संसार में चित्त वृत्ति अथवा प्रवृत्ति अथवा संसार लोभ अथवा अविद्या अथवा माया सभी एक ही बातें हैं।हमी चण्डमुण्ड हैं।नाना जन्म बीते शरीर बदला हम नहीं बदले,हमें संसार चाहिए।और चाहिए तो हम रावण कंस चण्डमुण्ड शुम्भनिशुम्भ महिषासुर नहीं तो और क्या हैं?
मोक्ष का मतलब है सब कुछ त्यागना या छोड़ना।
भक्त को जब भगवान्/भगवती से और कुछ नहीं चाहिए।चाहिए केवल और केवल एकमात्र वे भगवान् और भगवती ही,तब जाकर मानो कि मोक्ष हुआ।ध्यान से समझ लीजिए नारायण!
रूपया पैसा मान बड़ाई पद पदार्थ प्रतिष्ठा ही मुझे चाहिए अगर तो हम – रूपयादास,पैसादास,मानदास,बड़ाईदास,पददास, पदार्थदास,प्रतिष्ठादास ही तो हैं। इसीलिये संसार और संसार की चीजें पाने की ललक हमें बार बार आवागमन जन्म-मृत्यु के चक्र में उलझाये हुए हैं।
नारायण! जब हम हार मान लेते हैं, और संसार की हर वस्तु से दुःख का अनुभव शुरु होता है, तब इनसे निवृत्ति पाने या छूटने के लिए तड़प होने लगती है तब अकारण करुणामयी माँ अपना वात्सल्य उड़ेलने के लिए कोई सन्त/सद्गुरु से मिलाती है।
सन्त सद्गुरु और कोई नहीं वह कृपामयी करुणामयी माँ ही हैं।संसार से लड़ते लड़ते हथियार डालने पर,और शरणागत होने पर,या यों कहें सरेण्डर कर देने पर सन्त सद्गुरु निवृत्ति(मोक्ष) देकर तार देते हैं।
उतार देते हैं, ऐसी धरती पर जहाँ हम संसार पाने की भीख नहीं चाहते।
अतः प्रवृत्ति चण्डमुण्ड है।
चामुण्डा वह सन्त सद्गुरु हैं इन्ही से निवृत्ति(छुटकारा) वाला मार्ग मिलता है।
श्रीमद्भागवत शास्त्र में स्वयं श्रीभगवान् ने – आचार्यं मां व्यजानीयात् नावमन्येत कर्हिचित्।न मर्त्यबुध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः।
मतलब कि आचार्य सन्त सद्गुरु ही भगवान्/भगवती के रूप हैं। समस्त देवी देवता ये सन्त सद्गुरु हैं।
तब इस चमड़े के शरीर धरे ये सन्त सद्गुरु हमें तारने और जन्मो के संसार नशे को उतारने के लिए बैठे हैं।
आवश्यकता है, सरेण्डर शरणागत होने की।
शरणागति वह सार है देती नशा उतार। गुरु शरणागति के बिना कोउ ना उतरा पार।।
हरिः गुरुसन्तः शरणम्
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नाम कहे नामी बोले
अपने गुरु भगवान् देहातीत अवस्था के स्वामी हैं। सभी सन्तों और शास्त्रों सहित अपने प्रभु भी नाम को ही सविशेष अशेष पाप का विनाशक नाम को ही माने हैं।
सन्त भगवत् भागवत गुरु मत यही कि जब साधक नाम अथवा कोई मन्त्र विशेष जपे तब उस मन्त्र के अक्षर पर सतत ध्यान रहे।
समय जरूर लगता है, ऐसे जप में।
लेकिन इसी नाम जप से नामी का स्वरूप दृष्ट होता है-“नाम कहे नामी बोले”
दृष्टस्वरूप से स्वस्वरूप मिल जाता है।
यही बात नाम लेखन के अक्षर से भी है।क्षरण/ नाश नहीं होने वाला अवस्थान ही स्वस्वरूपाधिष्ठान है।
इसीलिये मानव शरीर है, स्त्री पुरुष जाति इस प्रस्थान में बाधक नहीं। मीरा रैदास तुलसी तो परम प्रमाण ही हैं।
अविद्या माया जगद्भ्रम के नाश तथा विद्या अमाया और जगत् स्थैर्य का परम परम साधन एकमात्र नाम है।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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जीवन सफल करौंगो
काहू सौं कछु न चहौंगो,अविगत गतिहि लहौंगो।
गुरुकृपया गहि छाप तिलक मन्त्रहिं मन मनन करौंगो।
अहंकार अति विषम वारि लहि गुरुपदकमल तरौंगो।
देइ कोउ कछु कहै भलो,एहिं तृष्णा उर न धरौंगो।
दास विचारत सब सन हारत भगतहि आस करौंगो।
श्रीगुरुपद रज भव भय भंजन माथे धरै फिरौंगो।
भक्ति भगत भागवत गुरू करुणहि श्रीपतिहिं लहौंगो।
और न बूझत कोउ मारग पचि पचि अब नाहिं मरौंगो।
हरि-गुरु-सन्त-पाद-पदमन लहि जीवन सफल करौंगो।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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सद्भिः शास्त्रैश्च प्राप्यते
शरीरं मृद्भाण्डं तद् यदा रामो न धार्यते।
रामे मनस् तदा जातं चिन् मयं तत्कलेवरम्।।
कस्तूरिका नाभिदेशे राजते गन्धमादिनी।
मृगेणान्विष्यते सैव बहिर्वनवनान्तरे।।
एवम् अनन्तं च सत्यं च ज्ञानसत्वं ध्रुवं स्थितम्।सच्चिदानन्दात्मके ह्यात्मनि गुरुकृपयानुभूयते।।
कोहं कस्मादहं जातः कुत्र लक्ष्यं न पश्यति।शास्त्रस्य कृपया लक्ष्येत् स्वात्मदृष्टिः न संशयः।।
आत्मा कः परमात्मा कः तस्यैकत्वं न पश्यति।सतां हि कृपया लक्ष्येत् स्वात्मदृष्टिः न संशयः।।
विहितानां हि कृत्यानां धारणं नैव वारणम्। निषिद्धकर्मणां त्यागः विवेकत्वात् परा गतिः।।
मनुष्याणामात्मकल्याणं स्वात्मनैवावधार्यते।
अतः सन्तः सदा धार्याः मनोवाक्कायकर्मभिः।
सतां यत् सङ्गस्तत् पुण्यैः कृत्यैः फलीयते।
हरेर्गुरोः कृपातो वा रसस्याधिगमो भवेत्।।
अतः सतां च शास्त्राणां प्रीतिः प्रति प्रतीयते।सदात्मकल्याणप्राप्तिः सद्भिः शास्त्रैश्च प्राप्यते।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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पापपंच
हरिनाम से सारे पाप कटते हैं, लेकिन यह पाँच पाप नहीं कटते। चन्द्रकला सखी के अवतार श्रीअग्रदेवाचार्य के पद में यह बात आई है। अग्रपीठाधीश्वर एवं मलूकपीठाधीश्वर अपने महाराज जी ने गोपाष्टमी के दिन सूरश्याम गोशाला के अष्टादशवें महोत्सव में श्रीभद्भागवत श्लोकक्रमचर्चा में दि.09/11/2024को उक्त प्रकरण का उल्लेख किया।
गुरु भगवान् ने पद नहीं कहा था,केवल व्याख्यानम मात्र किया था।”दास”ने जैसा सुना था,उसे “उन्ही”की कृपा ने काव्य का आकार दे दिया-
गुरू विषय नर बुद्धि, भक्त की जाती जाने।
शिलासमान गनै हरिमूरति चरणोदक जल माने।।
महाप्रसादहि अन्न मानि सो बनै पाप दुर्घट आकार।
कटत नहीं हरि नाम जपै यह नहिं इसको कोऊ निस्तार।।
हे गुरु भगवन् भक्त भक्ति करुणा करु।
एहिं प्रपंच ये पापपंच आवै ना हिय तरु।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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जय जय जयना
कस्मादरविन्दमुखाद् अवतीर्णेयं सरस्वती।
पहुनामिथिलापूर्णावासः चोरयते चित्तम्।।
ए पहुना मिथिलै में रहुना।।
पहुना देखो एक रूप से मिथिलै में रहि गयना।
भयौ विवाह जनकतनया तैं ससुरारी कै भयना।।
ससुरारी में रामचन्द्र पहिरत शादी कै गहना।
सिया मिलन से भै अधीर सब धैर्य धार बहि गयना।।
बानी बनी मूक सब समझत कहि न जाइ कछु कयना।
देखत निरखत जनक दुलारी मूँदि गये द्वौ नयना।।
रास रसेश्वरि रसलीला लखि कोटि वारुँ रतिमयना।
शोभा कैसी मनहर देखो सियाराम कै हियना।।
चित्त चुराये भै हरषाये सियाराम कै बयना।
अवध जनक पुर वासी जड़वत् कछू न चाहैं लयना।।
सीताराम मिले दोनो मिलि गणित फेल ह्वै गयना।
एक एक दो एक बने यह गणितहुँ समुझि परयना।।
यह विवाह लीला अनन्त की दिव्य देखु द्वै नयना।
दास विन्ध्येश्वरि मोद भरे नाचत कहि जय जय जयना।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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आत्मप्रकाश
सौभाग्यम् दर्शनीयं किम् अस्याः देव्याः विचार्यताम्।
अस्मद्गुरुजननीयं देहत्यागे विशिष्यते।
नाम्ना व्रजलता सिद्धा रजव्रजे महीयते।।
त्यक्त्वा स्वं पार्थिवं देहं श्रीमलूकगुरुसन्निधौ।
सिद्धां कोटिं विधास्यन्ती सा गता किम् नु स्वागता।।
एकाशीतिवैक्रमे वर्षे द्विसहस्रसितमाधवमासि पाञ्चभौतिकं त्यक्तं गात्रं द्वादश्यां तिथिरायाते।।
वृन्दाशालग्रामविवाहे सम्पन्ने वृन्दाविपिने।
श्रीधामनि व्रजलता रोपिता व्रजे माधवीसुधायुता।।
क्या देखिये विलसती शोभा देवी देहत्याग करे।
विन्ध्येश्वरि दासहिं गुरुमाता गई पार्थिवहिं देह परे।।
नाम व्रजलता नित व्रजवासिनि किया दिव्यवैकुण्ठ प्रयाण।
श्रीमलूक पीठहिं त्यागा तन किया प्रसिद्ध स्थान प्रमाण।।
रही वृत्ति आजीवन इनकी नामरूपलीलागुण धाम।
यही कार्य कारण लगता है हुआ धन्य जीवन निष्काम।।
व्रज की लता आय उपजी थी निकट ओरछा राजाराम।
धन्य धन्य धन्यातिधन्य है देखो यह “आचार्य” ग्राम।।
निज स्वरूप भावानुरूप पति पाणिगृहीता “रामस्वरूप”।
मन निरमल अध्यापनजीवन चितप्रविष्ट”श्रीरामस्वरुप”।।
रहा पूर्ण पातिव्रत जीवन वृत्ति लगी पद-सीताराम।
पाण्डे कुल भी धन्य धन्य व्रजलता पता पा मुदित लगा।
ग्राम-निवासी रामकथासी भक्ति ज्ञान वैराग्य जगा।।
रामकृष्णहरिनारायण पदकमल विमल व्रजलता-कार।
“राजेन्द्रदास” सुत सुन्दर जन, जन-जन का किया दिव्य उपकार।।
ऐसी माता कै चरणन चित ध्यान,धन्य विन्ध्येश्वरि-दास।
भाग बड़े अनुभवत मोद भरि लेत आत्माराम प्रकाश।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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राम राम है एक निबेरो
जानकीनाथ सहाय करैं तब राम से राम चहै नर नेरो।
नामहि राम रटै नर प्रतिछन देखि परैं हरि इत उत मेरो।
बनै दसा येहि गुरु किरपा कृत दास बुद्धि मन निश्चय मेरो।मानुष जनम सफलता एहि मैं राम नाम रसना रट तेरो।
यह इतिहास पुरान विदित मुनि वेदव्यास कहि गये चितेरो। वचन अन्यथा होत कबहुँ नहिं यदि विश्वास राम पर तेरो। जरत करम गत पूर्व कुण्डली राम राम है एक निबेरो।
हरिः शरणम्।
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