राम मरैं तो हम मरैं नाहिं त मरै बलाय अबिनासी का बालका मरै न मारा जाय।
— महात्मा कबीर।
करम भोग है जनम का भोगत भोगत जाय।
काल प्रवाह अनादि है ईश्वर इहै कहाय।।
हम शाश्वत शाश्वत गुरू हरिगुरुसन्त बताय।
काल गुरू कर्ता गुरू शून्य समुझि परि जाय।।
विन्ध्येश्वरि कै दास मुख बानी यहि निकसाय।
राम नाम श्रुति मुखन बिच राजत स्वान्तसुखाय।।
राम नाम हर श्वाँस में आवै निकसै भाय।
गुरु किरपा सब होत है रहै अनन्तै जाय।।
रहै अनन्तै जाय रामजन सांचो दास कहाय।
दास कहाय तरै भवसागर निरमल होत सुभाय।।
राम नाम सौं नमत जो रहि सब ताहि नवाय।
रहि सब ताहि नवाय कौन तेहि अस्थिर करिहै।।
तब चल मन नम रमो राम ढिंग रहै अनन्दै ठायँ।
रहै अनन्दै ठायँ सोइ मधु राम नाम जो खायँ।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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