मिलेगा ध्रुव सुनो तन नई से नई

मिला मानव का तन चाहना ना गई।

मिलेगा ध्रुव सुनो तन नई से नई।।



व्यासदेव भगवान् ने किया नहीं है भेद।
नारायण गुरु एक हैं तत्व अभेद अभेद।।

नारायण गुरु एक हैं जान सको जो जान।
नहीं जान पाए अगर पा न सके कुछ मान।।

गुरू एक हरि एक हैं मत देखो तुम भेद।
भेद देखते हो पुनः परौ धरनि कै छेद।।


सीख मिली संस्कृत भये गुरू कृपा ते जान।

जौ रहस्य यह ना खुला जान न पाए जान।।


गुरु आचरण गुरू चरण पकड़ सकौ जो पकड़।

नहीं पकड़ पाए अगर जा न सकैगी अकड़।।


जा न सकैगी अकड़ और होगा वर्तित संसार।

मिला मनुज तन गिर पड़ो गुरु चरणों में सार।।

“अष्टावक्र” गुरू भयौ चौबिस गुरू बनाय।
लख चौरासी “निगुरु” पड़ जागै सोवै खाय।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।।
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चले रहै अभिचार 

सारे भौतिक जगत् का आधार ही आध्यात्मिक है।
भौतिक संगत तभी तक है, जब तक आत्मिक। संगत
असंगत विसंगत सुसंगत कुसंगत/गति सभी में गमन या संसार चलनशीलता है,इसी को हमारी तुच्छ बुद्धि , भौतिकता माया अविद्या मानती है।
इस माया अविद्या संसार के आकर्षण से प्रभावित होकर नाना कल्प बीत चुके हैं।अनुभव तब होगा,जब कोई इसका अनुभोक्ता अनुभव करा दे। परिवर्तन संसारासक्ति पूर्वक नाना शरीर धारण करना इस शरीर का लक्ष्य ही नहीं है।
नाना ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं के अनुकूलतम संघात इस देह से पृथक् आत्म तत्व है, इसी बात को जाने समझे लोगों और उनकी परा वाणियों से स्वयं में आत्मत्व का अनुभव ऐदं प्राथम्येन इस पिण्ड में रहने का प्रयोजन है।
दूसरा भी परम चरम प्रयोजन है, पुनः कर्म वासनाजनित शरीर न धारण करना।
अतः भौतिक और आध्यात्मिक जगत् को आधार आधेय समझ कर एक साथ समझ कर आगे चलना होगा।नहीं तो-तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्रावित् ,में संगति नहीं बनेगी। संगत गति सत्संग में,रहो भले दिन चार।या पाले संसार के चले रहै अभिचार।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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जीव अविनाशी

ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
जब जानै तो प्रकटे काशी।।

जीवन मुक्त सदा सन्यासी।
फिरै न फेरा करम विनाशी।।

गुरू कृपा कर मुक्तिप्रकाशी।
आनँद मग्न सदा सुखराशी।।

मातृ शरीर फिरत माया सी।
देखि रहै मन मनहिं उदासी।।

मानै जब सब अपनी मा सी।
मोह अविद्या तबहिं तरासी।।

साधु सन्त चरणन गिरि जासी।
होवै तब सुख शिवगिरिजासी।।

ऐसी दृष्टि देत गुरु काशी।
अविगत गति गत माया नासी।।

जय करुणाविग्रह की राशी।
गुरुपदकमल दिव्य प्रतिभासी।।

मनहिं ध्यानरत गुरु गंगा सी।
देवि सरस्वति युति यमुना सी।।

गुरु पद अम्बुज रति सुखराशी।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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सिद्धसिद्धम्

सर्वकामकारको रामः।जगद्बन्धसंहारो रामः।।पञ्चभूतनिस्तारो रामः।भवनिधि- पीडाहारो रामः।।कौशल्यासुखमूलो रामः।दशरथहृदयविहारो रामः।।भरतप्रेमविस्तारो रामः।लक्ष्मणसेवाधारो रामः।।शत्रुहननसौशील्यो रामः।हनूमान-
हृद्वासो रामः।।रावणमदनविनाशो रामः।
सेवक-भक्त-सुखाशो रामः।।

प्रतिकूलमपि भावितं कृतं सानुकूलवद्
ग्राहितं मतम्।ततः ततं सुखसारमद्भुतं श्रीरघूत्तमचरित्रमुतत्तमम्।।
मोहमहासन्दोहहानिता।जायते तव कृपाकारिता।।
येषां समेषां यदि जातु जातं, वैकुण्ठलोकप्रतिवासवासनम्।साकेतसंप्राप्य निवासलोकान् जनान् न्नतोयं कृतबद्धसाञ्जलिः।।

विषयविषविषाक्तः कण्टको यो विलग्नः,
हरिगुरिगुरुकृपातो सार्यते केवलं तत्।
परपरक-कमपि वन्द्यं विश्वविश्वासहेतुम् ,
रमणरामरम्यं श्रद्धया  सिद्धसिद्धम्।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।


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सदानन्दः जीवः

न कोई अल्पज्ञ है, न सर्वज्ञ।
जो आप वही हम। जीव का जीवन नाना वन -वन नाना शरीर बन तब नहीं भटकता जब वह तुलसी कबीर मीरा रैदास जैसे भक्तों का चरणानुराग पा जाता है।
मैं क्या कोई भी रसो वै सः की एक कणी का स्वाद पा जाये,तब प्रेम मद छाके पग परत कहाँ के कहाँ, की दशा में चला जाता है।
सोचिये,जिन भगवान् की माया का विस्तार यह प्रपंच भौतिक जगत् है, वह कितनी सारहीन और मादक है, मोह में भोगों में इस जीव को डाले हुए हैं, वह जीव “उन्ही”की कृपा से गुरुमाध्यम से थोड़ी भी भगवद्रस मदिरा पी ले,तो उस भाग्यशाली जीव का क्या कहना। वह तो संसार के निर्माण करवाने वाले भगवान् में ऐसा भावित आकृष्ट होगा कि, संसार रस भोग भाग ही जाये। अरे नारायण! जब वह अपने प्रेमपाश में फँसा लें तब माया मोह निवृत्त। सदा आनन्द ही आनन्द।
इसलिए-
सदानन्दः जीवः जनितमायाजितकृपाकारणपरः।न पारं यातुं तत् परमगुरुकरुणान्धितधिया। अतः साध्यः सः प्रतिसमयसर्वत्रप्रसृतः।मुदा दद्यान् मुक्तिं हृदयकृपयाविष्टमनसा।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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परमात्मा सुलभ, महात्मा दुर्लभ


किसी व्यक्ति विशेष द्वारा कोई दिन विशेष घोषित करने पर सम्भव है, जिस क्रिया विशेष हेतु वह घोषित है,तद्दृष्टि जाने से तत् सृष्टि हो जाय।
किन्तु कोई लेख/विचार विशेष,केवल और केवल आवेश विशेष का परिणाम होता है।जब आवेश होता है, तब वह लिखवा लिया जाता है।बिना आवेश के कोई भी गद्य/पद्य उपहास पात्र बनता है, मम्मट ने तो यही माना है।आज इक्कीस जून दोहजार चौबीस, योग दिवस है।आज योग करने का महत्व विशेष है।
यानी कि आज से लेकर आगे सतत ऐसी  प्रक्रिया में इस आसनादि को जारी रखना चाहिए। यही आज का सन्देश है।
योग तो शुद्ध रूप से आत्मिक प्रयोग है। दिखावे के लिए ही सही हो,लेकिन प्रेरणादायक और जागृति करने वाला तो  होता है।
          सूक्ष्म विचारणा में,देखिये तो यह 
योगी भी अभिमानी होता है। अभिमान पुनः जन्मने का कारण है। अतः योग के समस्त आठों सोपान दम्भ में रखनेवाले हैं। तब क्या योग और तत् शास्त्र क्या दुरुपयोग हैं? ऐसा नहीं मानना चाहिए।वस्तुतः योगादिशास्त्र मानव धर्म पालन के अन्यतम चरण हैं। हम इसके द्वारा ईश्वर प्रणिधान,सत्य पालनादि को व्यवहार में लाकर एक अदद मनुष्य तो बन ही   सकते हैं,जोकि चरमप्रयोजन सिद्धि का  प्रथम प्रयोजन है।
योगः चित्तवृत्ति निरोधः इत्यादि वाक्यों से यह जानिये,कि यह चिद् वृत्ति,जो संसार राग मे,मायिक बन्धनों में हमें जकड़ रखे है,वह निवृत्त/नष्ट हो जाय। वह हमारा असली स्वरूप नहीं है। हमारा असली स्वरूप संसार भोग नहीं है, बल्कि संसार योग है। आमूल चूड यह जगत् ईश्वरीय आवास है। “ईशावास्यम् इदं सर्वम्”
अब योग की सार्थता यही है कि, यह जीव जगत् वासुदेवः सर्वं दीखने लगे। और योग के वर्तमान, आसन प्राणायाम आदि को करके हमें ऐसी योग दृष्टि नहीं मिलेगी। तब इसके लिये परमयोगीश्वर ब्रह्माण्ड गुरु की वाणी का प्रसाद ग्रहण  करना पड़ेगा, जहाँ जाकर योग की गुत्थी  सुलझेगी। नारायण!नारायण ने कहा- वासुदेवः सर्वमिति स महात्मातिदुर्लभः। और दूसरी ओर कहा- तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।
मतलब समझें कि किसी भी समाधि योगी की कृपा से उसी की तरह हमें भी समाधि में भगवान् सुलभ हैं।
लेकिन सर्वत्र भगवद् दृष्टि वाले सन्त/महात्मा दुर्लभ हैं।
  अब समग्र गवेषणा से तथ्य निकला कि,सन्त दुर्लभ और भगवन्त सुलभ हैं।

योग से,और कहिये किसी योगी के निर्देशन में भगवत् तो दर्शन हो जायेगा।लेकिन कहिए कि इस योगदर्शन से जन्म बन्ध विनिर्मुक्ति हो जाये तो हम जैसे दास को यह सम्भव नहीं लगता। यह सम्भव है, केवल सर्वत्र सर्वं खलु इदं ब्रह्म वाले महात्मा की चरणरज में अभिषेकस्नान  होने से।
अतः आज जिस योग का प्रयोग योगा के रूप में योग दिवस के रूप में मनाया जा रहा है, हो सकता है, यह क्रिया,मनुष्य बनने में मदद करे। लेकिन वास्तविक रूप में परम कल्याण और आत्म कल्याण तो,सियाराम मय सब जग जानी। करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी,वाले दृष्टिकोण के दुर्लभ सन्त महात्मा दे पायेंगे।और इस शरीर का चरम यही है कि, भवबन्ध टूटै।
अतः सद्गुरु शरणागति ही मुक्ति का एकमेव उपाय है। आज का योग मुक्ति नहीं देगा।अभिमान ऊपर से बढ़ायेगा।अतः,अर्जुन की तरह श्रीकृष्ण चरणों में गिर पड़ो,बस काम बन जायेगा।
भवबन्धन खोलें वही जिन्हे न माया मोह। यह संसार पड़ा हुआ कंचन कामिनि कोह।।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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श्रीरामकृष्णावतरण की अलौकिकता

भगवान् श्रीराकृष्ण की जन्मलीला अलौकिक है। वे ही लोक के कारण और कार्य भी हैं।वस्तुतः वे ही लोक के कर्ता कारयिता हैं और करणसामग्री भी हैं।
अस्थिरसंसार सरक रहा है।दरक रहा है। एकमात्र वे ही स्थिर हैं।जगत् के गमन की अनुभूति इन्ही के साक्षिभाव से है।ये साक्षीरूप अनुभव में न आवैं,रमारमण में रमण नहीं हो तो भ्रमण भावी भव भुवन में कर्मबद्ध पुनर्भव कराता रहेगा।
समाधि सिद्ध सिद्धवाणियां प्रसिद्ध हैं।
रामो विग्रवान् धर्मः

दशरथ को भगवान् ने अपने पिता रूप में स्वयं वरण करके विप्रधेनुसुरसन्त हित लीन्ह मनुज अवतार।

असामान्य जन्म है, अजन्मा का। सामान्य रूप से माता के गुण,पुत्र में होते हैं, यह लोकवेद सिद्ध सिद्धांत है।
लेकिन यशोदाकौशल्यादि माताओं में श्रीकृष्णरामादि के लीला गुणगण यथा-माखन चोरी से खाना,मिट्टी खाना,
सौशील्य, आदि प्रकट होते हैं। यही भगवान् के जन्म की अलौकिकता और अप्राकृतता है।

हरिः शरणम्।
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साधो कार्य जोईसोई विधि

विन्ध्याचल माता में कैसी है मनोगति 
परम विरक्तों संग हुई  कृष्णमयीमति।
समरथ सद्गुरु का हार्दिकअन्तःविलास
सर्वत्रगतगति क्या धरती क्या आकाश।
अहमादिवृत्तिशून्य साधु दृष्ट हाव भाव
जिसे चाहें हो जाये लोकरति का अभाव।
क्योंकी  है विस्मृत विनष्ट संसार व्यथा
सदालीन भक्तमालभागवतश्रीरामकथा।
कृपा हो दास पर देख लो प्रभु करुणदय 
खिले हृत्कमल होय भक्ती का अरुणोदय।
अकिंचन-जन-प्रिय सिद्धभाव-लासवास  
दीन दयित देखो पूज्यगुरुश्रीराजेन्द्रदास।
समरथ गुरुद्वय”भक्तमाली-पहाड़ीबाबा” 
देवानुग्रह आपको मिले ज्यौं नदीद्वाबा।।
बाबा ने खाकचौक किया पदवीप्रतिष्ठ
हरेराम सिद्ध-सन्निधि पाकर हुए बलिष्ठ।। 
पाए जीवनान्त साधना का तपःपुंजबल
बहता रहता तेजःसरिता-जल अविरल।।
श्रीगणेशदास गुरू सरल थे साधुविग्रह   मिले गुरु-मातु-पिता बरसा करुणानुग्रह।।
परमसिद्ध सन्तबाबा हो गए हैं मलूकदास
केशीघाट वंशीवट विलसित समाधिवास।
अन्तरतम ऊर्जित बल परम परिनिष्ठित
आप श्रीमलूककृपा हैं मलूकपीठाधिष्ठित।
श्रीकृष्णकरुणाकृत त्रिवेणी का आगम  
बाबा-पहाड़ीगणेशदास-श्रीमलूकसंगम।
ऐसा साधु-संग-नदी-संगम सुधारसकर
विस्मृतसंसारस्मृति भवसागर पारकर।
देकर के प्रेमा भगति आनँद की महानिधि 
विन्ध्येश्वरिदास साधो कार्य जोईसोई विधि

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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भावमयी कल्पना

पुरा कालेन नीता शुभा कल्पना।दिव्यदिव्या-मनःकूल-रूपं गता।।
यत्-कवेर्भाव-भावान्विता भावना।तत्क्रिया-कारिता विन्ध्यमातुःकृपा।।
यत् समाधेर्वैश्यस्य श्रीर्नाशिता।
भूपति-सुरथस्य राज्यं विराज्यं गता।।
विन्ध्य-नग-राज-राज्ञी समासाधिता।सर्वकामान् पुरे पूरयन्ती स्थिता।।
विन्ध्यगङ्गानदी-सङ्गमे राजिता।
विन्ध्यमाता मुदा कामदा राजते।।
एकरसानन्द-विद्या-संस्था-स्तुता।
दिव्य-चण्डी-शती-पाठ-पूजा परा।।
पुरा कालेन नीता शुभा कल्पना।
दिव्य-दिव्या-मनःकूल-रूपं गता।।
अथ हर्ष-प्रकर्षं परां प्रौढिताम्।
श्रीकृपा-कारणाज्जातकामास्सदा।।
पुरा कालेन नीता शुभा कल्पना।
दिव्य-दिव्या-मनःकूल-रूपं गता।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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रामकाज

राम काज कीन्हे बिनु मोहिं कहां विश् राम।
भगवान् का माधुर्य गुण ही कृपा करुणा अनुग्रह अवतार लीला विस्तार का परम चरम सारभूत है।नहीं तो, उनके ऐश्वर्य स्वरूप को देख सकने की भी सामर्थ्य किसी देवी देवता को नहीं है।
अतः करुणासागर दीनदयाल और कृपानुग्रहविग्रह जैसे अपने ही नामों को सार्थक करने हेतु और रसिकों सन्तों भक्तों को आनन्द देने के लिए, उन अजन्मा का भी मानव जन्म हुआ है।


जब, करुणा कृपा अनुग्रह की नितान्त आवश्यकता को और कहिए अनिवार्यता को मनुष्य जीवन में दर्शाने के लिए भगवान् मनुज रूप धरते हैं, तब उनकी रसमयी लीला के लालायित अंजनी के लाल भी अपने लोभ का संवरण नहीं कर पाते हैं, और रामकाज लगि तव अवतारा सुनते ही,रामकाजरसिक वे पर्वताकारा हो जाते हैं।


अरे नारायण! सज्जन संरक्षण और दुर्जन विनाशन के मूल में भी उनकी कृपा और करुणा ही बरसती है, जब मारने गई मातृरूप पूतना का स्तन पान करते हुए उसके समस्त जन्मों का कालुष्य भी पीकर,माता से भी बढ़कर अनन्त मुक्ति लाभ से उसे कृतार्थ कर देते हैं। यह उनकी करुणा उत्स का निर्झर भी राम काज है।
राम काज तो नारायण! आनन्द ही आनन्द देना है, क्यों? क्योंकि इस आत्मा की मौलिकता देह लौलिकता न होकर,जो आनन्द सिन्धु सुखरासी है।

और-
आनन्द,आनन्द तो सत् चित् आनन्द में ही मिलेगा। नहीं तो सब सुखाभास हो सकता है। एतावता, ब्रह्माण्ड के सबसे बड़े नायक की स्वभाव सिद्ध करुणा का प्रवाह अंशभूत अपने में आ जाय,जो कि पूर्वसिद्ध ही है, यही अपना वास्तविक स्वरूप है, यह भी रामकाज है नहीं तो और सब मायिक- राक्षस काज।रामकाज और राक्षस काज में निष्कामता और सकामता का विपरीत परस्पर विरोधी अन्तर है।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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