चले रहै अभिचार 

सारे भौतिक जगत् का आधार ही आध्यात्मिक है।
भौतिक संगत तभी तक है, जब तक आत्मिक। संगत
असंगत विसंगत सुसंगत कुसंगत/गति सभी में गमन या संसार चलनशीलता है,इसी को हमारी तुच्छ बुद्धि , भौतिकता माया अविद्या मानती है।
इस माया अविद्या संसार के आकर्षण से प्रभावित होकर नाना कल्प बीत चुके हैं।अनुभव तब होगा,जब कोई इसका अनुभोक्ता अनुभव करा दे। परिवर्तन संसारासक्ति पूर्वक नाना शरीर धारण करना इस शरीर का लक्ष्य ही नहीं है।
नाना ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं के अनुकूलतम संघात इस देह से पृथक् आत्म तत्व है, इसी बात को जाने समझे लोगों और उनकी परा वाणियों से स्वयं में आत्मत्व का अनुभव ऐदं प्राथम्येन इस पिण्ड में रहने का प्रयोजन है।
दूसरा भी परम चरम प्रयोजन है, पुनः कर्म वासनाजनित शरीर न धारण करना।
अतः भौतिक और आध्यात्मिक जगत् को आधार आधेय समझ कर एक साथ समझ कर आगे चलना होगा।नहीं तो-तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्रावित् ,में संगति नहीं बनेगी। संगत गति सत्संग में,रहो भले दिन चार।या पाले संसार के चले रहै अभिचार।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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