अन्त राम कहि आवत नाही

मानसकार के मन में यह बात कैसे आकर शब्दाकार हो गई, समझ में नहीं आती।

अब देखिए ,वे कितनी उँचाई से कहते हैं-
जनम जनम मुनि जतन कराहीं।
अन्त राम कहि आवत नाहीं ।।
बारम्बार यत्न-प्रयत्न करते रहने पर भी जीवन के अन्त समय में भगवन्नाम और स्वरूप की स्मृति नहीं हो पाती, और यह कार्य अनेकानेक जन्मों में ऐसे ही चलता रहता है। आखिर इसका कारण क्या है?
अब इस पर विचार करने से पूर्व एक दाक्षिणात्य कवि का भावस्मरण होता है, जिसमें वह भगवान् के चरण-कमलों को पिंजरा और और स्वयं के मन को राजहंस का स्वरूप मानते हैं। इस मन रूपी हंस को भगवत्कृपा प्राप्त हो जाये,कि वह आज ही तत्क्षण चरण कमल के पिंजर में प्रवेश कर ले,क्योंकि अन्त का क्या ठिकाना ? वात-पित्त-कफों से घिरे कण्ठ से नामोच्चारण ही न हो पाये।
इसी सन्दर्भ में अपने मलूक-पीठ वाले महराजश्री ने एक स्मरण बार -बार अपनी वाणी से व्यक्त किया है। वे अपने कथा-प्रसंगों में बताते हैं कि एक बात पूज्य-भगवत्पाद शङ्कराचार्य श्री निश्चलानन्द तीर्थ जी ने स्वयं उनसे कही थी-
प्रसंग यों है कि एक वणिक्-सज्जन ,जो कि अनन्तश्रीविभूषित करपात्रीजी के शिष्य थे, जब उनका महाप्रयाण काल आया ,उसी समय परिव्रजन में टहलते -टहलते आचार्य शङ्कर वहाँ पधारे।
उनके पुत्रों ने उन्हें रोक लिया और कहा – महाराज ! मेरे पिताजी ने कभी कोकाकोला का सेवन हमारी जानकारी में नही किया, जीवन भर भवच्चर्चा और नाम जप में गुरु-कृपा से लगे रहे,किन्तु अब अन्त समय में ये ” कोकाकोला ” क्यों बोल रहे हैं?
आचार्य शङ्कर ने तत्काल शालग्राम शिला-स्पृष्ट जल उनके मुँह में क्या डलवाया कि ,वे तत्क्षण भगवन्नाम का उच्चारण करने लगे।
अब सोचिये क्या प्रतिबन्ध रह होगा कि अन्त ” राम ” कहि आवत नाहीं।
इसके बाद यह बात चर्चा में आई कि मनुष्य-मात्र को भगवदपराध और भक्तापराध से अवश्य बचना चाहिए। इसके साथ ही भगवत्प्रेमी जनों को भगवान् के लीला-रूप धाम में चिन्तन करते हुए अहं की निवृत्ति पर विशेष ध्यान रखना होगा। यदि इन दो बातों का ख्याल रखा जाय तो ,सम्भव है अन्त समय में भी भगवत्स्मृति और नामोच्चारण हो सके।
इसमें अहंकार बड़ा अहम् है। क्योंकि इसी को भगवत्स्मृति का बड़ा अवरोधक मानते हैं। इसे पाँच प्रकार का कह गया है-
जाति, विद्या, पद ,रूप और यौवन। भक्त को इन पाँचों से अनिवार्यतः मुक्त होना ही होगा,क्योंकि नान्यः पन्था विद्यतेयनाय-
जातिः विद्या महत्वं च,
रूप-यौवन-मेव च।
एते वै यत्नतः त्यज्याः,
पञ्चैते भक्ति-कङ्टकाः।।
तो अब इस बात में कोई सन्देह नहीं कि भगवद्भक्त यदि भगवान् को ही जगत् का
निमित्तोपादान कारण मानते हुए उक्त अभिमान से मुक्त हो पाये तो भगवान् और उनके प्यारे-प्यारे भक्तोंकी कृपा से अवश्य ही परम -प्रयाण काल में नाम- लीला का स्मरण हो पायेगा, जैसा कि सन्त-सङ्कल्प से ” अजामिल” को भी मिला।

।। हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2019/01/20/अन्त-राम-कहि-आवत-नाही/

प्रेम ही भक्ति है

संस्कृत भाषा में एक धातु है – ” प्रीञ् ” इसका अर्थ होता है- तृप्ति , इसी धातु में ” मनिन् ” प्रत्यय जोड़कर “प्रेम ” शब्द बनता है। तब प्रेम का अर्थ हुआ परम तृप्ति, क्योंकि धातु अतिशय अर्थ में है।
इधर भक्ति शब्द की निष्पत्ति पहले ” भज् ” धातु से मानने पर इसका अर्थ तो ” सेवा ” है,क्योंकि सेवार्थक धातु है।
अब सेवा किसकी? तो इस पिण्ड शरीर में भिन्न-प्रभिन्न इन्द्रियों से शरीर-सुखार्थ की गई स्वयं की ही सेवा सबसे पहले है।क्योंकि इसके बिना तो शरीर-गति सम्भव नहीं। अब आती है ,इस पिण्ड-शरीर से संसार के अन्यान्य जीव-जगत् की सेवा का कार्य, जो साधु-कार्य है।
इस तरह स्वशरीर एवं पर शरीर की सेवा का कार्य ही भक्ति है। भक्ति से तृप्ति प्राप्त होती है। और अतिशय तृप्ति या आत्यन्तिक तृप्ति को यदि “प्रेम” यह अन्य नाम दे दें ,तो बात समझ में आती है कि इसी प्रेम-दशा में सेवा या भक्ति का अंकुर फूटता है।
वस्तुतः प्रेम से भी तृप्ति होती है और (भक्ति) सेवा से भी। प्रेम हो या सेवा ,दोनों केवल प्रेम या सेवा के लिए ही होने चाहिए।इसमें और कुछ दूसरा नहीं।
तुलसी का “मानस ” याद आता है, जब तमोभार से व्यथित “पृथ्वी” भगवान् श्रीविष्णु का शरण लेकर प्रार्थना करती है।
देवता भी साथ रहते हैं, महादेव भी।
देवाधिदेव ने यह बात भगवती पार्वती से अपने अनुभव की कही। उन्होने कहा कि भगवान् श्रीहरि तो अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड में सभी जगह व्यापक हैं। किन्तु मैं यह जानता हूँ कि, निश्छल प्रेम पूर्वक स्मरण किये जाने पर वे इस विपत्ति से अवश्य छुटकारा दिलायेंगे।वह अकारण कारुणा-वरुणालय और स्वयं प्रेम स्वरूप ही हैं-

तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ।
अवसर पाइ वचन एक कहेऊँ ।।
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना ।।

तो भगवान् तो स्वयं प्रेम स्वरूप हैं।उनके समान अपने भक्तों के प्रति प्रेम या सेवा और किसी में सम्भव नहीं।
भगवान् भक्त के हैं और भक्त भगवान् के।
यही भाक्त (प्रेम) सम्बन्ध सतत और अटूट है। देवर्षि नारद अपने भक्ति-सूत्र में “भक्ति” को परम प्रेम स्वरूप ही कहते हैं।
भगवान् के प्रेमी और उनके भक्तों का यह प्रेम अनश्वर है।इसी प्रेमाविष्ट दशा में वह कर्म-बन्ध को तोड़कर तज्जन्य जन्म से विरहित होकर निश्चिन्त हो जाता है।
इसीलिए वह ” शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः ” श्रुति वाक्यतः अमृतमय दीखता है।
इस परम प्रेममय भक्ति से भक्त , अमृत और तृप्त होता है-

सा तु अस्मिन् परमप्रेमस्वरूपा।
अमृतस्वरूपा च।
यत् लब्ध्वा पुमान् सिद्धः भवति।
अमृतः भवति तृप्तः भवति।

वस्तुतः परम के प्रति प्रेम ही भक्ति पद वाच्य है।वह भक्ति ही प्रेम है या प्रेम ही भक्ति है।
अनन्यशरणागत बाबा तुलसी एक अवसर पर भक्ति की दृढ़ता प्रेम द्वारा मानते हैं, तो दूसरे क्षण परम प्रेम स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति को जोग,जप,ज्ञान और वैराग्य से न मानकर एकमेव प्रेम द्वारा ही मानते हैं।और एक मार्मिक प्रसंग में उत्तर काण्ड में गुरु वशिष्ठ द्वारा जन्म-जन्मान्तर से विषयासक्त जीव की वैषयिक-मलिनता का आत्यन्तिक विनाशीकरण एकमात्र प्रेम-भक्ति के जल से होता है।क्योंकि मल की शुद्धि मल से नहीं, बल्कि अत्यन्त शुद्ध जल से ही सम्भव है-

छूटहिं मल कि मलहिं के धोए।
घृत कि पाव कोइ बारि बिलोए।
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभयन्तर मल कबहुँ न जाई।।

अतः निष्काम प्रेमी और भगवद् भक्त श्रीभरत जी महाराज एवं भगवान् के अत्यन्तात्यन्त प्रिय हनुमान् जी महाराज
हम जैसे विषयासक्त जीवों पर करुणा भरी निगाह फेर दें तो उनके प्रेम और भक्ति का लवमात्र हममें आ जाये, जिससे यह मानव-जन्म सार्थक हो सके।

।। हरिश्शरणम् ।।

http://shishirchandra.com/2019/01/01/प्रेम-ही-भक्ति-है/

प्रवृत्ति एवं निवृत्ति

प्रवर्तनं प्रवृत्तिः किसी संसार व्यापार में प्रवृत्त होना या लगना प्रवृत्ति है। इन्द्रियादि के वशीभूत होकर उनके विषयों में जीव का अनेक शरीरों में संचरण निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।यही नैसर्गिक गति भी है। किन्तु अनेकानेक जन्मों से गतिशील यह प्रक्रिया एक न एक दिन तो अवश्य ही मानवीय वेदना और चेतना को को यह समझने के लिये मजबूर करती है कि आखिर यह गतानुगतिको लोकः न लोकः पारमार्थिकः की वस्तुस्थिति क्या है।
हालाँकि सनातन धर्मावलंबियों में यह बात बड़ी विधिक रूप से रखी गई है जिसमें मानवीय आयु को एक सौ वर्षों का होना कहा जाता है- जीवेम शरदः शतम्।
और वेदादि शास्त्र जीने ही नहीं बल्कि सोचने, समझने, सुनने और बोलने की शक्ति रहने के लिए बारम्बार ईश्वर से प्रार्थना करते दीखते हैं। यह तो हुई प्रवृति की बात, जिसमें सत् शास्त्रों और सद् गुरुजनों के निर्दिष्ट आचरणों पर चलते रहने से मन की वृत्ति एक ऐसे मुकाम पर आ जाती है कि आखिर यह कब तक?
और इसी संसारी प्रवृत्ति से ऊब कर यहीं, इसीके एक छोर से प्रारम्भ होता है, निवृत्ति का पथ। जगत् के भोग से वितृष्ण होने और जगत् को ही कृष्ण मान लेने की दृष्टि यदि भगवान् या उनके प्यारे भक्तों की कृपा से मिल जाय, तो यही तो निवृत्ति है।
इस निवृत्ति मार्ग पर चलने की हमारी सनातनी व्यवस्था का स्मरण ब्रह्माण्ड के परम शिक्षक सोलहवें अध्याय में करते हैं-
प्रवृतिं च निवृत्तिं च,
जनाः न विदुः आसुराः।
न शौचं नापि च आचारः,
न सत्यं तेषु विद्यते ।।
अब सोचिए किसमें प्रवृत्त होया जाय और किससे निवृत्त, यह आसुरी भाव यानी कि रजोगुणी और तमोगुणी लोग नहीं जानते।
ऐसे लोगों में पवित्रता नहीं और सत्य परायणता भी नहीं।
बचपन में एक श्लोक पढ़ा करते थे-
अकृत्वा परसन्तापं अगत्वा खलमन्दिरम्।
अनुल्लंघ्य सतां मार्गं यत् स्वल्पमपि तद् बहु ।।
दूसरों के आनंद, सुख, वैभव को देख कर कोई द्वेष नहीं करना क्योंकि यह तो अपने अपने प्रारब्धवश उस परं का ही वैभव है ,इससे कुण्ठा क्यों? और यह भाव आए विना वैकुण्ठ की प्राप्ति भी असंभव ही है। दुर्जनों के मध्य न जाना , सदाचरण की प्रवृत्ति न छोड़ कर ,जो थोड़ा भी बने ,वही बहुत है।
अब सोचें तो प्रवृत्ति मार्ग यानी कि कर्मकाण्ड का व्यापक उपदेश हमारे वेद शास्त्र करते हैं, जिसमें अमुक -अमुक कामनाओं की प्राप्ति हेतु भिन्न-प्रभिन्न विधियाँ सनातन काल से चली आ रही हैं।
रही निवृत्ति की बात, तो यह तो वेदों के अन्तिम भाग वेदान्त शास्त्र का विषय है, जिसे ज्ञानकाण्ड भी कहते हैं।
यह निवृत्ति विषयक चर्चा बहुत थोड़ी है।
लेकिन अपनी ऊपर की बात का सन्दर्भ लें , तो उसमें एक मनुष्य की सौ वर्ष की आयु में चार आश्रमों का प्रतिपादन है।
इसे पचीस-पचीस वर्षों में बाँटा गया है-
प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम है, जिसमें गुरु के समीप जाना(उपनयन)है।
यहीं गुरुकृपा से वेदारम्भ होता है, जिससे आत्मा -अनात्मा का विचार सुदृढ हो जाता है। आगे संसार की रक्षा और सृष्टि की प्रक्रिया जारी रखने या वंश परम्परा को सुरक्षित रखने के लिए समावर्तन संस्कार होता है, जिससे गुरु आज्ञप्त होकर विवाह-संस्कार और पचीस वर्ष की गृहस्थ आश्रम परिपाटी पूरी होती है।
यही वह गृहस्थ आश्रम है, जो अन्य सभी तीनों का आधारभूत है-धन्यो गृहस्थाश्रमः।
क्योंकि इसके बिना तो किसी आश्रम की कल्पना भी सम्भव नहीं ।
इसके बाद का तृतीय आश्रम है, वानप्रस्थ, इसमें वनवासी-गिरिवासी की तरह अत्यंत अल्प आवश्यकता रखते हुए जीवन निर्वाह का व्रत पालन करना होता है । इसीमें गृहस्थोत्तर पचास वर्ष से आगे की व्यवस्था वन में निवास करते हुए तन्निष्ठ आचरण, कम से कम आवश्यकताओं से सरोकार रखने वाली
होती है, चाहे वन में जाकर हो अथवा कहीं भी रहकर। वस्तुतः वानप्रस्थी पना एक भाव है, यदि वन में जाकर भी संसार निवृत्ति नहीं, तो गृहस्थ ही ठीक।
साधु परम्परा में कहते हैं कि यह पचास से पचहत्तर का वानप्रस्थ तो पचास से आगे की गिनती ही संकेत कर देती है-
हर एक गिनती आगे जाने पर-
इक्यावन, बावन ,तिरपन ,चौवन,पचपन, छप्पन, सत्तावन और अठ्ठावन तक कम से कम पाँच बार वन -वन की प्रवृत्ति होती जाती है। मतलब कि पचास से आगे की गिनती में सात-आठ साल तक तो चलेगा,लेकिन उससे आगे नहीं-

क्यों? क्योंकि उससे आगे की गिनती तो सीधे शठ (दुष्ट) ही सिद्ध कर देगी-

उनसठ, साठ इकसठ, बासठ, तिरसठ, चौंसठ, पैंसठ, छासठ, सतसठ, अठसठ।

इससे आगे भी ख्याल नहीं तो वह डुबो तो देगा ही- उनहत्तर, सत्तर आदि ।
इस प्रकार पचास से पचहत्तर तक यदि भव सागर से तर (डूब) कर पार करके आगे इससे निकलने की प्रवृत्ति नहीं उपजी तो तर (डूब) ही जाना है।
मतलब कि पचहत्तर से आगे सौ वर्ष की आयु सन्यास आश्रम है, जहाँ सर्व कर्म सन्यास यानी कि एषणा त्रय( सुत-वित-लोक) त्याग ही ध्येय बन जाता है।
यही चतुर्थाश्रम और अन्तिम आश्रम है। यही निवृत्ति या वेदों के ज्ञान काण्ड की पराकाष्ठा है। और सोचिए यह सब हमारे सनातन धर्म में विभिन्न संस्कारों और आश्रमों के माध्यम से बड़े सहज रूप से समझा दिया गया है।
इस तरह हम मानव प्राणियों की वृत्ति की प्रवृत्ति और निवृत्ति को सरल रीति से ऋषियों ने कठिन रीति से भी-
उत्तिष्ठत, जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत।
उठो ,जागो और एक के बाद एक श्रेष्ठ मार्ग पर बढ़ते हुए निवृत्त हो जाओ।
सुलभ कर दिया है। भगवान् और उनके प्रेमी भक्त जन कृपा करें।

।। हरिश्शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2018/12/21/प्रवृत्ति-एवं-निवृत्ति/

आत्मा की अनुभूति

आत्मा की अनुभूति का विचार आने पर एक अद्भुत आनन्द की लहर दौड़ जाती है। यह मानव जीवन इसीलिये मिला भी लगता है कि इसी शरीर( पिण्ड ) से ही आत्मानुभूति हो जाये।

यह जीवात्मा ही आत्मानुभूति यानी कि परमात्मा की अनुभूति कर भी सकता है।और उसकी अनुभूति स्वात्मा का ही विषय है, क्योंकि वस्तुतः दोनों एक ही हैं। एक परमात्मा अंशी है और दूसरा जीवात्मा उसका अंशमात्र।
दोनों की तुलना करने पर बहुत सूक्ष्म भेद प्रतीत होता है-
यह जीवात्मा एक असीम वृत्त में है, जिसकी परिधि कहीं नहीं है। लेकिन इसका केन्द्र एक स्थान में निश्चित है। इसी प्रकार परमात्मा भी एक असीम वृत्त है,जिसकी भी परिधि कहीं नहीं है। जीवात्मा का केन्द्र जैसे एक स्थान में निश्चित है, लेकिन इसका कोई केन्द्र निश्चित नहीं।वस्तुतः इस परमात्मा का केन्द्र सर्वत्र है।
और इसीलिये यह परमात्मा सभी हाथों द्वारा काम करता है, सभी नेत्रों द्वारा देखता है, सभी पैरों द्वारा चलता है, सभी शरीरों द्वारा श्वाँस-प्रश्वाँस करता है, सभी जीवों में वास करता है, सभी मुखों द्वारा बोलता है और सब मस्तिष्कों द्वारा विचार भी करता है- सर्वतोक्षिशिरोबाहु… इत्यादि श्रुति वाक्य प्रमाण हैं-
सहस्रशीर्षापुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं स्पृत्वात्यतिष्ठद् दशांगुलम्।।

इत्यादि वेद वाक्य भी उसी परमात्मा की अनन्तता के प्रमाणपत्र हैं, जिसका अंशी यह जीवात्मा है। यदि यह जीवात्मा भी अपनी आत्म चेतना को अनन्त गुनी कर ले ,तो यह भी परमात्म स्वरूप प्राप्त कर सकता है, यानी कि आत्मानुभूति कर सकता है।
अब शरीर में उस परमात्मा का वास उक्त श्रुति से हृदय देश में अंगुष्ठ प्रमाण सिद्ध है, ऐसा इसके अन्यतम भाष्यकारों -सायणाचार्य एवं उव्वट-महीधर आदि ने व्यक्त किया है।
सर्वशास्त्रमयी गीता – सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः (15/15) और – ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति( 18/61) भी परम आत्मा को हृदय देश में विराजमान मानती है।
अब जब ईश्वर हृदय देश में विराजित है, तब हृदय को ही महत्व देते हुए इसी के परि संस्कार और परिशुद्धि की आवश्यकता है। बुद्धि के परिसंस्कृत होने पर सैकड़ों विज्ञानों का आविष्कार हुआ है और आगे, प्रायः भोग-सामग्रियाँ ही एकत्रित होती रहेंगी, जिनसे नानात्व में विचरते हुए, भटकाव ही सम्भव है।
अन्तिम ध्येय तक पहुँचाने की क्षमता हृदय में ही है।बुद्धि द्वारा अगम्य विषय तो शुद्ध हृदय ही देख सकता है।जिसका हृदय स्फूर्तिमय हो जाता है वह सर्व हृदय की बातें जान सकता है, जहाँ तर्क और बुद्धि कभी भी नहीं पहुंचे हैं।
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा कि आत्मा की अनुभूति का पढ़े लिखे होने से कोई मतलब नहीं है।वे कहते हैं-
” यदि तुम किसी का प्राण लेना चाहो तो,तुम्हें ढाल-तलवार आदि शस्त्रों से सज्जित होना होगा।परन्तु आत्महत्या करनी हो तो केवल सुई ही पर्याप्त है।इसी तरह यदि दूसरों को सिखलाना हो तो बहुत सी बुद्धि और विद्वत्ता की आवश्यकता होगी, किन्तु आत्मानुभूति के लिए यह आवश्यक नहीं है।इसके लिये तो हृदय-शुचिता आवश्यक है।और जिनका हृदय शुद्ध है, वे धन्य हैं, क्योंकि उन्हें आत्मा का अनुभव अवश्य होगा।”
श्रीमदाद्य भगवत्पाद शङ्कर इस बात में एक युक्ति देते हैं।वे कहते हैं कि किसी भी तरह की भूख-प्यास, चिन्ता, आरोग्य, कष्ट, दर्द, रोग, बन्धन-मोक्ष आदि का अनुभव तो अपने आप स्वयं ही को होता है, दूसरों द्वारा उनका ज्ञान तो आनुमानिक ही है। इसी तरह आत्मा की अनभूति तो अपने हृद्देश में विराजित आत्मा में ही ऐदंप्राथम्येन सम्भव है-

बन्धो मोक्षः च तृप्तिः च,
चिन्तारोग्यक्षुधादयः।
स्वेनैव वेद्याः यज्ज्ञानं,
परेषाम् आनुमानिकम्।।
– विवेकचूडामणि- 476 ।
इसलिये संसार के भोगमात्र का भोग ही न करने हेतु जन्मे इस मनुष्य को आत्मा की अनुभूति इसी शरीर से इसी जन्म में सभ्भव है।और यदि -नर तन पाइ विषय मन देहीं की स्थिति बनी रहती हैं तो पलटि सुधा ते शठ विष लेहीं भी अवश्यंभावी है।
भगवत्पाद शङ्कर भी इसी की पुष्टि करते दीखते हैं, जब वे कहते हैं कि ,जो लोग आराममय और विलासिता पूर्ण जीवन की इच्छा रखते हुए आत्मानुभूति की चाह रखते हैं, वे सभी उस मूर्ख के समान हैं, जिसने नदी पार करने के लिए एक मगर को लकड़ी क लट्ठा समझ कर पकड़ लिया है। वह मगर उसे अवश्य ही खा डालेगा नदी पार करने की बात तो बहुत दूर है-

शरीरपोषणार्थी सन्,
य आत्मानं दिदृक्षति ।
ग्राहं दारुधिया धृत्वा,
नदीं तर्तुं स इच्छति।।
– विवेकचूडामणि-86।
इस तरह आत्मा की अनुभूति तो विशुद्ध हृदय में ही साक्षाद् की जा सकती है।वह नित्यबोध, स्वस्वरूप, केवलानंद रूप, निरुपम, कालातीत, नित्य मुक्त, निश्चेष्ट, आकाशवद् निःसीम, निष्कल,निर्विकल्प, परमात्मा पूर्ण मनोयोग से हृल्लीन दशा में आत्मा द्वारा अनुभूत हो रहा है।और जिन्हें यह अनुभव हो गया, उनके आनंद की कोई सीमा नहीं-

किमपि सततबोधं केवलानन्दरूपं,
निरुपम-मतिवेलं नित्यमुक्तं निरीहम्।
निरवधि गगनाभं निष्कलं निर्विकल्पं,
हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्ण समाधौ।।

– विवेकचूडामणि- 409 ।

।।हरिश्शरणम्।।

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अहैतुकी भक्ति

अहैतुकी अर्थात् बिना किसी हेतु के भक्ति , सोचने पर बड़ा अटपटा सा लगता है।बिना किसी हेतु या कारण के इस संसार में कौन है जो किसी भी देवतादि की भक्ति करेगा। आज जहाँ भी देख लीजिए , जो भी पूजा, पाठ ,जप, तप,व्रत किये जा रहे हैं ,उन सबके पीछे कोई न कोई कामना अवश्य रहती है। यह कामना ही तो हेतु या कारण है, जिसकी पूर्ति के लिए हम देवार्चनादि में प्रवृत्त होते हैं।

अब प्रश्न यह है कि कामना-भेद से भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की पूजा अनादि काल से चली आ रही है – स्वर्गकामो यजेत , इत्यादि वेद -वाक्य प्रमाण हैं कि ,हमारे अनुष्ठान प्रायः सकाम,सहेतु ही प्रायोजित होते चले आ रहे रहे हैं। अब इसमें कठिनाई क्या है, यही कारण है बार -बार शरीर धारण के बन्धन से मुक्त न होने का। तब इसका मतलब है कि देवार्चन और अनुष्ठान तो हों ,किन्तु सभी सकाम या सहेतुक नहीं। वाल्मीकि प्रमाण हैं, कि महाराज दशरथ ने अपने जीवन भर अनेक यज्ञानुष्ठान निष्काम निर्हेतुक ही किए थे। विशेष परिस्थिति में अत्यन्त अनिवार्य होने पर ही उन्होंने-पुत्रकाम शुभ -यज्ञ करावा।
और गीतादि शास्त्र इस बात के प्रबल प्रमाण हैं कि- शरीर धारण किए हुए प्राणी का शरीर त्याग करना सुनिश्चित है।इसके बाद दूसरी अर्धाली में बड़ा जोर देकर यह बात भी आती है कि मरे हुए का जन्मना भी उतना ही सुनिश्चित है।
तब चार पुरुषार्थों में अन्तिम वाला मुक्ति क्या है? क्या श्रीभगवान् मुक्ति का कोई अन्य अर्थ स्वीकारते हैं। इसका उत्तर वह स्वयं देते हैं कि इस मुक्ति के लिए अनेक बार जन्म ग्रहण करते -करते शनैः शनैः मन और बुद्धि.की शुद्धि होते जाने से मुक्ति का मार्ग. प्रशस्त होता है।
जब भगवान् को भी यह प्रतीत होता कि अमुक व्यक्ति जन्म-मृत्यु के पाश से छूटना चाहता है।इसकी व्याकुलता चरम पर है, यह कर्म-भोग से त्रस्त हो गया है, तभी उसे अपनी ओर ऐसा आकृष्ट करते हैं, कि वह अनेक जन्मार्जित प्रारब्ध को तत्काल त्याग कर, सदा -सदा के लिए उनके वैकुण्ठ-धाम को प्राप्त कर लेता है।
इस मुक्ति के न होने का साधारण सा कारण स्पष्ट दीखता है कि जब तक हमारी भगवद्भक्ति या प्रीति किसी हेतु , कारण या कामना को लेकर होती रहती है हम मुक्त हो ही नहीं सकते।
क्योंकि कोई हेतु, कारण या कामना पूर्ण होते ही, दूसरी कामना आ जाती है और इसके बाद तीसरी और चौथी।इस तरह एक हेतु के बाद अनन्त हेतुओं की पूर्ति और इससे अनन्त जन्मों का बन्धन चक्रवत् चलता रहता है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि सदाचार-सम्पन्न मनुष्य का जीवन जीते-जीते इन कामनाओं, हेतुओं से स्वतः वैराग्य होता है और मुक्ति का मार्ग स्वतः लक्ष्य पूर्ण कर लेता है, इसी को सोचकर भगवान् उत्तर देते हैं-

अनेक-जन्म-संसिद्धिः,
ततो याति परां गतिम्.

और इस सहेतुक, सकाम भक्ति की सारी प्रक्रिया में मेरे मन में भगवत्कृपया यह बात भी उपजती है कि, जब परमात्मा सभी से निर्हेतुक प्रेम करते हैं, यह तो उनका स्वभाव है।

अकारणकरुणावरुणालय श्रीभगवान् का स्वयं सिद्ध भाव अपने भक्त में प्रीति का होता है ,उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए। अरे सर्व कारण कारण अपने भक्त को अपने स्वभाव का देखना चाहते हैं। उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए।जो सबको सब कुछ देता है ,उसे क्या चाहिए?
अब ऐसे समझें कि जब परमात्मा का निर्हेतुक, निष्काम ,निष्कारण स्वभाव है, तब उनके अंशभूत जीवात्मा का भी मूल स्वरूप-स्वभाव जब तक निर्हेतुक नहीं होगा, तब तक मुक्ति असम्भव है।
अरे भाई भगवान् के अनेकानेक प्रह्लाद आदि भक्त हुए हैं, जिन्होंने भगवान् के बारम्बार वर याचना का आग्रह करने पर ,यही कहा था कि , हे भगवान्! मुझे अनेक जन्मों में आपने बहुत कुछ दिया है, और देते ही चले आ रहे हैं, अब मुझे कुछ भी नहीं चाहिए और यदि आपका देने का हठ ही है, तो अब यही दीजिए कि मेरे जन्म-जन्म का मँगतापना ही छूट जाय।
नित्य-मुक्त-जीवात्मा का मूल स्वभाव निर्हेतुक, निष्काम और निष्कारण ही है।वह जब अपने अंशी के इसी मूल भाव में होगा मुक्ति तभी होगी।
श्रीकृष्ण प्रेम में पागल हो जाने आग्रह हमारे श्रीरामकृष्ण परमहंस देव का था ,तो हमेशा श्रीकृष्ण- प्रेम में उन्मत्त रहनेवाले श्रीचैतन्य महाप्रभु भी इसी नाम -लीला और धाम में बेसुध रहते थे।और यही कारण है कि उन्होंने एकमात्र आठ पद्यों का शिक्षाष्टक ही स्वयं के जीवन में निर्देश किया था, जिसे उनकी कृति कहा जाता है।उनके परम षट् शिष्य-गणों- रूपगोस्वामी प्रभृति भगवद् भक्तों ने अनेक भक्ति-परक रचनाएँ और व्याख्याएँ रची हैं, जो रस-पिपासु भगवद्-भक्तों की अमूल्य निधियाँ हैं।
श्रीचैतन्य महाप्रभु ने जिस निर्हेतुक, निष्कारण और भक्ति के लिए भक्ति का अत्यन्त प्रेमवश उपदेश किया था, उसमें भी ,वही प्रहलाद जैसी प्रेमानुरक्ति ही प्रतीत होती है। यही नित्य मुक्त अंशी और उनके अपने अंशभूत जीवात्मा का स्वतः सिद्ध स्वभाव है।जब उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए, तब इस अंशभूत तुच्छ को भी कुछ नहीं चाहिए।वे कहते हैं-

न धनं न जनं न सुन्दरीं
कवितां वा जगदीश कामये।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे
भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि।।

ऐसी अहैतुकी भक्ति ही पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी-जठरे-शयनं से से मुक्त कर सकती है।

श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे! मुरारे!
हे नाथ! नारायण! वासुदेव! मुरारे!

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2018/11/22/अहैतुकी-भक्ति/

नाम में देश-काल-पात्र का अविचार

भगवान् या भगवती का नाम स्मरण करने में देश-काल-पात्र का कोई भी विचार नहीं है। मतलब कि किसी भी जाति कुल में उत्पन्न कोई भी व्यक्ति भगवन्नाम के स्मरण में किसी भी स्थान अथवा काल में स्वतंत्र है। और इसका स्वारस्य ये भी है कि नाम का सतत मानसिक/हार्दिक स्मरण करने से अनायास ही वह स्वयं होने लगता है।इस तरह कि स्थिति को ही अजपा जप की स्थिति समझ सकते हैं।
गीता में भगवान् कहते भी हैं कि जिस जिस भाव को स्मरण करता हुआ प्राणी अन्त में शरीर त्यागता है ,वह उसी स्वरूप को प्राप्त कर लेता है-
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजन्त्यन्ते कलेवरम्।
तं तमैवेति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।

अब इस बात यह भी तात्पर्य हुआ कि नाम स्मरण का विस्मरण किसी भी स्थिति में नहीं होना चाहिये। चैतन्य महाप्रभु भी इसी पर ऐकमत्य देते दीखते हैं। उनका कहना है कि हे भगवान्! आपने अनेक लोगों की अनेकानेक रुचियों को देखते हुए अपने नित्य-सिद्ध अनेक नामों को प्रकाशित कर दिया है। और इतना ही नहीं उन-उन नामों में अपनी सम्पूर्ण शक्ति भी भर दी है,जिनका स्मरण करने में किसी देश -काल-पात्र का कोई विचार नहीं।
ऐसे प्रभु-नाम-स्मरण से यह भवसागर आसानी से पार किया जा सकता है।और इस कलिप्रभावग्रस्त प्राणी के लिये इससे सुन्दर कोई साधन भी नहीं।कलिपावनावतार बाबा तुलसी अपनी सभी रचनाओं में इसे बारम्बार स्वीकारते हैं।प्रसिद्ध पंक्ति है-

कलियुग केवल नाम अधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।

इस प्रसंग में एक बात बरबस स्मरण आती है। पिछले दो वर्ष पहले मेरे पिताजी का जब निधन हुआ, उसी दिन रात्रि में मेरे कन्तित ग्रामनिवासी पण्डित जी घर में पधारे। अनेक चर्चाओं के मध्य उन्होंने एक प्रश्न कर दिया कि भगवान् के नाम -रूप -लीला का अशुचि अवसरों पर भी स्मरण होता रहता है। क्या यह ठीक है या नहीं?
मैंने कहा महराज! यह तो मेरे साथ भी होता है और ऐसा अनेक ऐसे लोगों के साथ भी अवश्य ही होता होगा।इसमें तो हमारी विवशता ही दीखती है,क्या करें।
एक बात मैने उस अवसर पर यह भी कही कि , अपवित्र या पवित्र सभी दशाओं में ,किसी भी अवस्था को प्राप्त कर लेने पर भी ,भगवान् पुण्डरीकाक्ष का स्मरण मात्र ही व्यक्ति को बाहर-भीतर से पवित्र कर डालता है।

ओम् अपवित्रः पवित्रो वा,
सर्वावस्थां गतोपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं ,
स वाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।

यह मन्त्र तो हम सभी अवसरों पर उच्चारण करते हैं और पवित्र हो जाते हैं।तब मुझे लगता है कि भगवद्स्मरण किसी भी दशा में हो जाय तो कोई हर्ज नहीं।यह तो सतत स्मरण का परिणाम है और होना भी चाहिए।
अस्तु , यह बात मेरे मन में अबकी बार के ” कल्याण ” अंक को देख कर उठी।
उसमें इसी प्रकार की बात अपने गुरुवर्य मलूक पीठाधीश्वर श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज के शिक्षा गुरु गोलोकवासी सन्त श्रीगणेदास भक्तमाली जी के पत्र-पुष्प से उद्धृत है। जो बातें लिखी गई हैं, उनका उल्लेख मलूकपीठाधीश्वर श्रीमहाराज जी के सत्संग-प्रसंगों प्रायः होता रहता, जिसे अनेक बार मैंने भी सुना है और सुनकर रोमांचित होता रहता हूँ। दो घटनाओं का उल्लेख इस प्रकार है-

1- एक महात्मा शौच-क्रिया सम्पादन काल में अपनी जीभ को दाँतों से दबाए रहते थे, और निवृत्त होने पर ही उसे छोड़ते थे।इसलिए कि प्रभु-नाम न निकल जाय और प्रभु प्रकट न हो जायँ।ऐसी बात जान कर उनके एक शिष्य ने कहा कि महराज यदि ऊसी अवस्था में प्राण छूट गए तो क्या होगा? यह सुनकर उन सन्त ने अपने शिष्य को धन्यवाद दिया और स्वीकार किया कि भगवद् स्मरण अभ्यास वशात् किसी भी काल में होता है, तो यह तो होना ही चाहिए।ध्यान यही रहे वाचिक न हो।

2- दूसरी घटना में हनुमानजी महाराज और प्रभु श्रीराम का स्मरण हुआ है।
इसके अनुसार एक व्यवसायी को प्रभु स्मरण का समय नहीं मिलता था, तो वह शौच-क्रिया-सम्पादन-काल में ही भगवान् के नाम का मानस स्मरण कर लेता था। यह जानकर हनुमानजी को गुस्सा आता था।एक दिन उन्होंने उसकी पीठ पर एक लात से प्रहार कर दिया।भक्त को थोड़ी पीड़ा हुई, वह अपनी क्रिया सम्पादित करबाहर निकल आया। उधर हनुमानजी महाराज जब प्रभुश्रीराम की सेवा में पहुँचे, तब भगवान् ने कहा कि हनुमान् मेरी पीठ में बड़ी पीड़ा हो रही है। हनुमान् जी ने देखा और कारण पूछा।तब प्रभु ने कहा कि तुम्हींने ही मारा है। उन्होंने कहा कि मेरा भक्त ,जो शौच-क्रिया में मेरा स्मरण कर रहा था यदि उसे प्रहार लग जाता तो वह तो सिधार जाता, अतः तत्काल मुझे उसकी रक्षा करने के लिए अपनी पीठ वहाँ लगानी पड़ी। हनुमान् जी महाराज ने अपनी भूल स्वीकार करके प्रभु से क्षमा माँगी।
अस्तु इन घटनाओं और उनके उल्लेख का मतलब यही है कि भगवन्नाम का स्मरण सतत सभी पवित्रापवित्र कालों में हो सकता है।
सभी वर्णों में उत्पन्न भगवान् के भक्तों और यहाँ तक कि पशु-पक्षी योनियों में भी जन्मे प्राणियों को भी प्रभुनाम स्मरण ने जीवन से मुक्त कर परम लोक में प्रतिष्ठित कर दिया है-

गनिका गीध अजामिल तारे,
सबरो गो गजराज।
सूर पतित पावन करि कीजै,
बाँह गहे की लाज।

पतित पावन नाम को सार्थक करनेवाले परम प्रभु के नाम आश्रय ही मुक्ति का परम चरम उपाय है। और यह नामाश्रय कोई भी किसी भी काल में ग्रहण कर सकता है।यह मेरा मत नहीं अपितु भगवान् के सभी प्यारे भक्तों का अभिमत है। और जब श्रीभगवान् देश-काल से परे और सभी हाल में हममें तुममें खड़ग खम्भ में सनातन सतत सुप्रतिष्ठित हैं।तब उनसे परे कौन देश काल है ।अतः अणु-परमाणु में विद्यमान का निरन्तर स्मरण मुक्ति दायक हो-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा

।।हरिश्शरणम्।।

http://www.shishirchandra.com/2018/11/16/नाम-में-देश-काल-पात्र-का-अव/

प्रणाम-चतुष्टय

मार्कण्डेयपुराण का पञ्चम अध्याय उत्तर चरित्र नाम से साधकों-भक्तों में प्रसिद्ध है।
उत्तर चरित्र के नाम की अन्वर्थता इस बात में भी प्रतीत होती है कि मानव-जीवन में प्राप्तव्य योग की उपलब्धि कैसे हो,क्योंकि यही जीवन जीवनान्त मुक्ति का द्वार है।
इसी मुक्ति की प्राप्ति को लक्षित करती हुई ऋषि-वाणी प्रवाहित होती है-

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

उक्त मन्त्र में सर्वव्यापी भगवान् की सर्वभूतव्याप्ता माया को कुल चार बार प्रणाम किया जा रहा है:-

1-नमस्तस्यै

2-नमस्तस्यै

3-नमस्तस्यै 

4-नमो नमः

इन चार प्रणामों में से तीन में एकरूप दिखाई पड़ता है- तस्यै नमः।
उस जगदम्बा को प्रणाम है और चतुर्थ में नमः नमः की आवृत्ति अर्थात् बारम्बार प्रणाम है।
यह तो उक्त मन्त्र का साधारण अर्थ है।
असाधारण और आध्यात्मिक अनुभूति वाले साधकों, महात्माओं ने इसे एक दूसरा अर्थ भी दिया है। वस्तुतः प्रथम नमस्तस्यै द्वारा भगवती के सक्षात् प्रत्यक्ष-गोचर स्थूल स्वरूप या स्थूल मूर्ति को प्रणाम निवेदन है और यह स्थूल प्रणति भी इस मानवीय शरीर के चर्म-चक्षु-गत अन्नमय शरीर द्वारा होता है। आत्माधार यह शरीर ही प्राथमिक दृष्टि से मूर्ति या भगवद्विग्रह को आधार बनाकर स्वयं की श्रद्धा को उपपादित करता है।
स्वामी विवेकानन्द जी ने भी यह बात स्वीकारी है कि उन्हें आधार और साधन युक्त साधना में प्रवृत्त करनेवाले उनके गुरु न मिले होते तो वे जीवन का चरम न जान पाते।  निःसन्देह इस त्रिगुणात्मक शरीर को साधना के परम में पहुँचाने के लिए प्रथमतया स्थूल आधार की सहायता चाहिए , जो माता के स्थूल विग्रह द्वारा और स्थूल मुद्रादि के प्रकटीकरण पूर्वक ही सम्भव है।  इस प्रकार यह प्रथम प्रणाम स्थूल द्वारा, स्थूल का कायिक-वाचिक रूप में होता है।  ध्यान रहे कि इसी प्रथम चरण के प्रणाम से साधक को सालोक्य मुक्ति भी मिल सकती है।
द्वितीय नमस्तस्यै द्वारा वैज्ञानिक भाषा में हम स्थूल से सूक्ष्म की ओर अग्रसर होते ।त्रिविध शरीर का दूसरा सूक्ष्म भाग ही सूक्ष्म शरीर है। इसमें साधक की पञ्च-ज्ञानेन्द्रियाँ , मन -बुद्धि चित्ताहंकार भी आ जाता है। स्थूल शरीर का कारण रूप यही सूक्ष्म शरीर है ,जिससे पुनः -पुनः यह जीवात्मा स्थूल शरीरों को धारण करता रहता है।
अतः द्वितीय नमस्तस्यै का स्वारस्य सूक्ष्म शरीर के प्राणमय और मनोमय तत्वों के द्वारा जगन्माता के प्रणाम में विहित होता है। इसके द्वारा समीप्य – मुक्ति भी सम्भव हो जाती है।
अब तृतीय नमस्तस्यै पर विचारने पर इस सूक्ष्म शरीर का भी मूल कारण ,कारण शरीर प्रतीत होता है। इस कारण शरीर द्वारा भी श्रीमाता को प्रणाम निवेदित होता है। इसका रहस्य गत विज्ञानमय जीवात्मा स्थिर होता है। यह विज्ञान मय शरीर रुप जीवात्मा ही परमात्मा का चिदंश है। इसके द्वारा तद्बुद्धिगत भाव में प्रणाम निवेदन के द्वारा सारूप्य-मुक्ति की सम्भावना होती है।
अब चतुर्थ प्रणाम नमो नमः को विचारें तो यह कारणातीत शरीर का प्रणाम सिद्ध होता है।क्योंकि कारण का कारण तो कारणातीत ही स्वतः सिद्ध है। सर्वकारणकारण में तो एकत्व ही सिद्ध हो जाता है ,उसे शक्ति या शिव के रूप में पृथक् करके नहीं देखा जा सकता है।और शास्त्रकार यहीं शिवाशिवयोरभेदः की बात स्वीकारते दीखते हैं।
अतःयह चतुर्थ नमो नमः का प्रणाम भी तुरीय शुद्ध-बुद्ध ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयस्वरूप सिद्ध होता दीखता है ,जहाँ नमस्तस्यै या नमस्तस्मै नहीं, वरन् केवल नमो नमः बन गया है। इस अन्तिम तुरीय चतुर्थ प्रणाम की परिणति परम आनन्दमयशरीर के लिए सर्वलयगत सायुज्य मुक्ति में है।
इस प्रकार जगन्माता के स्थूल, सूक्ष्म ,कारण और कारणातीत स्वरूप प्रणामों की शृंखला अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड जननी को समर्पित है, जिसके भृकुटि विलास में सृष्टि और लय समाहित है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2018/11/07/प्रणाम-चतुष्टय/

भगवद् रति

संसार के तमाम झंझावातों में चतुरस्र घिरा हुआ मानव कभी -कभी बहुत दुःखी हो जाता है।वह ऐसे विह्वल क्षणों में बार -बार अपने प्रारब्ध या पूर्वजन्म कृत दुष्कृतों का स्मरण करता है, जो उसे वर्तमान में ऐसी विकट परिस्थिति में डाल रखे हैं।
ऐसी परिस्थिति में सन्तों महात्माओं का एक सूत्र वाक्य स्मरण होना स्वाभाविक है-

दुःखे तु क्षीयते पापः।
सुखे पुण्यः प्रणश्यति।।

मतलब कि दुःख की विद्यमान घड़ी में ऐसा समझना चाहिए कि पाप नष्ट हो रहा है और सुखानुभूति काल में पुराकृत पुण्य का नाश हो रहा है।इस सनातन सत्य पर विचारते हुए यह भी अनुभव होना चाहिए कि यह मानव शरीर ही ऐसा है जो बार-बार के जन्म-मृत्यु के पाश से मुक्त करने का एकमात्र साधनोपाय है-

साधन धाम मोक्ष करि द्वारा।
पाइ न जे परलोक सँवारा।।

सारी विभीषिकाओं और झंझावातों में कर्मानुसार बारम्बार जन्मते और मरते हुए एक ऐसा अन्तिम सुखालब्धी प्रारब्ध बन जाता है, जिससे भगवान् की माया से रचित संसार की असारता का ज्ञान होने लगता है। और इसी कारण समग्र अनेक जन्मो के समूहीभूत पुण्य प्रसाद स्वरूप भगवच्चराणविन्दों में स्वतः प्रीति उत्पन्न होती है। यह भगवच्चराणविन्दों की रति प्रीति और प्रेम ही उनकी अविद्या माया के क्लेश को काटनेवाली और साक्षाद् आनन्दातिरेक का एकमेवाधार है-

माम् एव ये प्रपद्यन्ते।
मायाम् एतां तरन्ति ते।।

और
कलिपावनावतार बाबा तुलसीदास का आत्मज्ञान रसमय हो जाता है-

वेद पुरान सन्त मत एहू।
सकल सुकृत फल राम सनेहू।।

भगवान् सच्चिदानन्द कृपा करें।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2018/11/04/भगवद्-रति/

मानापमानयोः तुल्यः

गीता के चतुर्दश अध्याय के पचीसवें मन्त्र में भगवान् ने एक कठिन बात बड़ी सरलता से कही है, जिसका पालन करना अत्यन्त दुरूह है।उन्होंने कहा कि मनुष्य को मान और अपमान दोनों ही दशाओं में समान भाव से रहना चाहिए। लेकिन ऐसा प्रायः होता नहीं और मान- प्रतिष्ठा-बड़ाई होने पर मन में होता है कि हम तो इसके योग्य हैं, मुझे तो यह मिलना ही चाहिए था।अथवा हम इससे भी कहीं अधिक सम्मान के पात्र हैं, मुझे तो कम ही मिला।इसके विपरीत होन की दशा भी विचित्र है।

अपमान होने की स्थिति में सामर्थ्य वश प्रतीकार या स्वयं के शरीरादि को त्यागने तक की मनःस्थिति बन जाती है।
एक अनुकूल दशा है तो दूसरी प्रतिकूल,जिसे हमारे पूर्वज ऋषियों ने सुख और दुःख नाम दिया है। इस सम्मानजनित सुख की अवस्था से ऊपर भी एक सुखानुभूति है जिसे प्रतिष्ठा अथवा यश-कीर्ति से अभिहित किया गया है। मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में वस्तुतः आधार-आधेय सम्बन्ध है।
सन्तशिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास इस लोकप्रतिष्ठा को हेय मानते हुए,उससे सावधान करते हैं-

सुत वित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।।

मतलब कि तीन मानवीय एषणाएँ हैं-सुतेषणा,वित्तेषणा और लोकेषणा।

गहन विचार करने पर यह भी प्रतीत होता है कि अन्तिम एषणा या कामना रहने पर अन्य दो तो अवश्य ही आ जायेंगी।क्योंकि लोकप्रतिष्ठा होने पर प्रचुर वित्त और पुत्रादि रूप में ,चाहे शिष्य-प्रशिष्य और सेवकादि ही क्यों न हों,अवश्य जुड़ जाते हैं।इस प्रकार एक ,मानजनित कारण से लोकेषणा तथा अन्य सुतवित्तादि स्वतः उपस्थित हो जाते हैं।
अब बात यह भी विचारने की है कि इस मान-सम्मान और लोकप्रतिष्ठा से होने वाली आनन्दानुभूति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही जाती है। अब यह भी सत्य है कि इससे अहंकार का परिपोषण होने लगता है।यह अहंकार-अहंभाव या व्यर्थ का मिथ्याभिमान मनुष्य को पतन के गर्त में डाल कर तिर्यग् योनियों में भटकाता रहता है। और इस अहंभाव का मूलकारण प्रकृति के रजोगुण और तमोगुण तो ही हैं।
यही अहम् और मम(मैं-मेरा) का भाव बार-बार संसार जनक बनता है।
इसीलिये गोस्वामी जी “बड़े भाग मानुष तन पावा” और ” पाइ न जे परलोक सुधारा” की बात करते हुए मानवशरीर की दुर्लभता सिद्ध करके एक प्रसंग में इस मानापमान से ऊपर होने का सर्वोत्तम और सत्य उपाय बताते हैं-

गुन तुम्हार समुझहिं निज दोषा।
जेहिं सब भाँति तुम्हात भरोसा।।

इसमें भक्त भगवान से कहता है कि, हे भगवान्! मुझमें जो कुछ भी गुण है, वह तो आपका ही है और अवगुण हमारा।
मायिक पर्दे के कारण हम वास्तविक स्थिति और स्वस्वरूप को जान नहीं पाते।
इसी मानापमान में उलझ कर नीचे गिर जाते हैं।

” क्वचिदन्यतोपि” की सरणि में मेरे द्वारा सन्त मुख से यह भी सुना गया है कि मान-सम्मान से पुण्य क्षय होता है और अपमान से पापक्षय। अब संसार में कौन होगा जो पुण्य क्षय करना चाहेगा?
अतः मानापमान के संसारभाव से ऊपर उठकर ,सारे सद्गुणों को ईश्वरीय मानते हुए सम्मान प्राप्ति की दशा में उस परम पिता के प्रति कृतज्ञ होना ही सबसे उत्तम आनन्द का मूल है।

और इसी कारण गीता के द्वादश अध्याय में पहले ही भगवान् ने अर्जुन को लक्ष्य कर सारी मानवजाति को निन्दा और स्तुति के समय समान भाव में रहने का अमूल्य उपदेश दिया है-

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी।
सन्तुष्टो येन केनचित्।।

अतः समस्त मानव जाति हेतु इस सरल सी बात पर बुद्धि दृढ होनी चाहिए कि सारे गुणगण भगवान् के और अवगुण हमारे।
तभी यह जन्म सार्थक सिद्ध हो सकता है।
श्रीअनन्तानन्त श्रीभगवान् कृपा करें।

।। हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/09/25/मानापमानयोः-तुल्यः/

भगवत् कृपा

राम भजत सोइ मुक्ति गोसाईं।
अन इच्छित आवै बरिआईं।।

राम नाम रटते रटते जीवन के विषादों से मुक्ति मिलती है।
दूसरी पंक्ति का अर्थ बड़ा विचित्र है-

अन इच्छित अर्थात् जिसकी कभी इच्छा या कल्पना नहीं हुई, ऐसी लौकिक या पारलौकिक कामनाएं भी अकस्मात् पूरी हो जाती हैं।
यह कामनाएं सिद्धियों के रूप में प्रकट हो जाती हैं। यानी कि व्यक्ति सिद्ध भावापन्न हो जाता है।
और यह सारा कुछ सब कुछ राम नाम को जिह्वा पर धारण करने पर होता है।

क्योंकि नाम और नामी में कोई भेद नहीं ।
हम जिस व्यक्ति का नाम लेकर उसे पुकारते हैं, वही व्यक्ति उस नाम से उपस्थित होता है।
तब राम नाम लेने पर राम क्यों नहीं आयेंगे।इसमें कोई सन्देह नहीं है ,वे अवश्य आयेंगे।
और एक बात और होगी ,वह ये कि
बुद्धिमतां वरेण्य हनुमानजी महाराज भी स्वतः प्रकट रहेंगे।
क्योंकि जहाँ-जहाँ श्रीरामजी का स्मरण होगा, वहाँ-वहाँ भक्तराज शिवावतार भी रहेंगे। और नामजापक तो लोकालोक सिद्धियों को पा लेगा।

क्योंकि ये ” यत्र-यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र-तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम् ” जो हैं।
अतः – अन इच्छित आवै बरिआईं।

भगवान् कृपा करें कि उनकी विस्मृति क्षण मात्र के लिए भी न हो।

।।हरिश्शरणम् ।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/09/25/भगवत्-कृपा/