संस्कृत भाषा में एक धातु है – ” प्रीञ् ” इसका अर्थ होता है- तृप्ति , इसी धातु में ” मनिन् ” प्रत्यय जोड़कर “प्रेम ” शब्द बनता है। तब प्रेम का अर्थ हुआ परम तृप्ति, क्योंकि धातु अतिशय अर्थ में है।
इधर भक्ति शब्द की निष्पत्ति पहले ” भज् ” धातु से मानने पर इसका अर्थ तो ” सेवा ” है,क्योंकि सेवार्थक धातु है।
अब सेवा किसकी? तो इस पिण्ड शरीर में भिन्न-प्रभिन्न इन्द्रियों से शरीर-सुखार्थ की गई स्वयं की ही सेवा सबसे पहले है।क्योंकि इसके बिना तो शरीर-गति सम्भव नहीं। अब आती है ,इस पिण्ड-शरीर से संसार के अन्यान्य जीव-जगत् की सेवा का कार्य, जो साधु-कार्य है।
इस तरह स्वशरीर एवं पर शरीर की सेवा का कार्य ही भक्ति है। भक्ति से तृप्ति प्राप्त होती है। और अतिशय तृप्ति या आत्यन्तिक तृप्ति को यदि “प्रेम” यह अन्य नाम दे दें ,तो बात समझ में आती है कि इसी प्रेम-दशा में सेवा या भक्ति का अंकुर फूटता है।
वस्तुतः प्रेम से भी तृप्ति होती है और (भक्ति) सेवा से भी। प्रेम हो या सेवा ,दोनों केवल प्रेम या सेवा के लिए ही होने चाहिए।इसमें और कुछ दूसरा नहीं।
तुलसी का “मानस ” याद आता है, जब तमोभार से व्यथित “पृथ्वी” भगवान् श्रीविष्णु का शरण लेकर प्रार्थना करती है।
देवता भी साथ रहते हैं, महादेव भी।
देवाधिदेव ने यह बात भगवती पार्वती से अपने अनुभव की कही। उन्होने कहा कि भगवान् श्रीहरि तो अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड में सभी जगह व्यापक हैं। किन्तु मैं यह जानता हूँ कि, निश्छल प्रेम पूर्वक स्मरण किये जाने पर वे इस विपत्ति से अवश्य छुटकारा दिलायेंगे।वह अकारण कारुणा-वरुणालय और स्वयं प्रेम स्वरूप ही हैं-
तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ।
अवसर पाइ वचन एक कहेऊँ ।।
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना ।।
तो भगवान् तो स्वयं प्रेम स्वरूप हैं।उनके समान अपने भक्तों के प्रति प्रेम या सेवा और किसी में सम्भव नहीं।
भगवान् भक्त के हैं और भक्त भगवान् के।
यही भाक्त (प्रेम) सम्बन्ध सतत और अटूट है। देवर्षि नारद अपने भक्ति-सूत्र में “भक्ति” को परम प्रेम स्वरूप ही कहते हैं।
भगवान् के प्रेमी और उनके भक्तों का यह प्रेम अनश्वर है।इसी प्रेमाविष्ट दशा में वह कर्म-बन्ध को तोड़कर तज्जन्य जन्म से विरहित होकर निश्चिन्त हो जाता है।
इसीलिए वह ” शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः ” श्रुति वाक्यतः अमृतमय दीखता है।
इस परम प्रेममय भक्ति से भक्त , अमृत और तृप्त होता है-
सा तु अस्मिन् परमप्रेमस्वरूपा।
अमृतस्वरूपा च।
यत् लब्ध्वा पुमान् सिद्धः भवति।
अमृतः भवति तृप्तः भवति।
वस्तुतः परम के प्रति प्रेम ही भक्ति पद वाच्य है।वह भक्ति ही प्रेम है या प्रेम ही भक्ति है।
अनन्यशरणागत बाबा तुलसी एक अवसर पर भक्ति की दृढ़ता प्रेम द्वारा मानते हैं, तो दूसरे क्षण परम प्रेम स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति को जोग,जप,ज्ञान और वैराग्य से न मानकर एकमेव प्रेम द्वारा ही मानते हैं।और एक मार्मिक प्रसंग में उत्तर काण्ड में गुरु वशिष्ठ द्वारा जन्म-जन्मान्तर से विषयासक्त जीव की वैषयिक-मलिनता का आत्यन्तिक विनाशीकरण एकमात्र प्रेम-भक्ति के जल से होता है।क्योंकि मल की शुद्धि मल से नहीं, बल्कि अत्यन्त शुद्ध जल से ही सम्भव है-
छूटहिं मल कि मलहिं के धोए।
घृत कि पाव कोइ बारि बिलोए।
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभयन्तर मल कबहुँ न जाई।।
अतः निष्काम प्रेमी और भगवद् भक्त श्रीभरत जी महाराज एवं भगवान् के अत्यन्तात्यन्त प्रिय हनुमान् जी महाराज
हम जैसे विषयासक्त जीवों पर करुणा भरी निगाह फेर दें तो उनके प्रेम और भक्ति का लवमात्र हममें आ जाये, जिससे यह मानव-जन्म सार्थक हो सके।
।। हरिश्शरणम् ।।