अतीत-नित्य-चित्

भगवान् अतीत, नित्य और चिन्मात्र हैं। अतीत का मतलब आत्यन्तिक रूप से इत यानी कि गत। अर्थात् शब्दातीत,स्पर्शातीत
रूपातीत,रसातीत और गन्धातीत। इसीलिये गीताशास्त्र में वे कहते हैं कि मैं विषयातीत हूँ। मुझमें संसार तो है लेकिन मैं संसार में नहीं हूँ।
श्रुति कहती है कि मन और वाणी जहाँ ,जीव को पहुँचा कर लौट आते हैं ,ऐसे परब्रह्म के आनन्द को जान लेने वाला, निर्भय हो जाता है-

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।
आनन्दं ब्रह्मणः विद् वान् न विभेति कदाचन- तैत्तिरीय उपनिषद् ।

अब इस ऋषि वाणी का मतलब यह निकला कि संसार भयंकर और परमात्मा अभयंकर। संसार के सारे सुख-दुःखादि द्वन्द्व, भयमूलक हैं ,जिनसे मुक्ति का एक मात्र उपाय “द्वन्द्वातीतो द्वयातिगः” की शरण ग्रहण ही है।
अब मुक्ति का सन्दर्भ बन्धन से और भय का सम्बन्ध अभय से है। कहीं से बँधा है,अतः मुक्ति और भय है तो अभयता साकांक्ष हो जाती है।
बन्धन-मुक्ति और भयाभय की जन्म जन्मान्तर प्रवृत्ति का प्रवाह चलता रहता है।लेकिन मन की वृत्ति मायिक होने से वही कहानी दोहराई जाती है-

सो माया बस भयौ गोसाईं।
बन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं।।
और इसीलिये किसी ने यह भी कह दिया-
माया तू ठगिनी हम जानी।

लेकिन हम हैं कि ठगिनी को पहचान कर भी उसी में फँसे हुए हैं।
यह माया तो सर्वकारणकारण,जगद् के आधार, जगन्नियन्ता परम प्रभु की ही है।इसी से ये मायाधीश और हम अकिंचन जीव , मायाधीन।

हम माया के अधीन जीव जब तक परिणामी जगत् में आनंद खोजते हैं, तब तक शरीरान्तर भटकाव में ही रहते हैं।

इस भटकाव से बचने और नित्य आनंद की प्राप्ति के लिए हम भक्ति-स्तोत्र साहित्य एवं नाम-जपादि का आश्रय लेते हैं। और यह सब कुछ शब्द स्वरुप है।
इस शब्द की साधना ऐसे रूपारूप अर्थ में जाकर समाप्त होती है, जहाँ सब का विलय हो जाता है। तत्वतः शब्द से शब्दातीत की अवस्था। और यही अवस्थान है आनंद का ।
सृष्टि का अनुक्रम भी ऐसा ही है, जहाँ उस परमात्मा से आकाश और आकाश से शब्द तत्व उपजता है।लेकिन आनन्द के लिए शब्दातीत अथवा अर्थ की अपरिमित अवस्था की अनुभूति ही अनिवार्य है।
अतः शब्द साधन का चरम, अशब्द में लय है।
आकाश शरीर वाले परमात्मा और उनके गुणस्वरूप शब्द के अनुकम्प से वायु तत्व का सृजन है जो अस्थिचर्ममय देह में त्वचा द्वारा अनुभूयमान होता हुआ सम्पूर्ण शरीर में जीवनी शक्ति प्राण है।
इसी प्राण वायु रूप के प्रकारान्तर अन्य अपान, समान ,व्यान और उदान हैं, जिनसे शरीर व्यवस्थित बना रहता है। किन्तु इससे भी अतीत जाना होगा, क्योंकि प्राणाधार तो एकमेवाद्वितीय ही है।

आगे की मीमांसा में नेत्रेन्द्रिय से अग्राह्य क्रमशः आकाश और वायु द्वारा अग्नि की सृष्टि होती है,जो प्रत्यक्ष दृष्ट ” रूप ” है।

लेकिन इस रूप तत्व की साधना भी पूर्व की तरह रूपातीत को चरम बनाती है।
क्रमिक रूप से चलती यह सृजन यात्रा निराकार आकाश- वायु और साकार अग्नि से जल तत्व पर पहुँचती है ,जो शरीर में रस रूप में रसनेन्द्रिय द्वारा ग्राह्य है।और इसके भी पार” रसो वै सः ” की अनुभूति इसका परिणाम है।
अनन्तर की अन्तिम यात्रा का क्रमिक विकास, आकाश-वायु-अग्नि और जल से पृथ्वी तत्व पर आता है ,जो शरीर में गन्ध गुणस्वरूप में प्रतिष्ठित है, जहाँ कि इससे भी अतीत यानी कि गन्धातीत स्थिति की प्राप्ति ही गन्धोपासना का लक्ष्य है।
इस प्रकार शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध के परं पार होने पर अतीत, नित्य, चिन्मात्र आनन्दकारी सत्ता की प्राप्ति अपनी आत्मा में ही अनुभूत है, अन्यत्र नहीं।

जो आनंद सिन्धु सुखरासी।
सीकर ते त्रैलोक सुपासी।।
सो सुखधाम राम अस नामा।
अखिल लोक दायक विश्रामा।।

।।हरिश्शरणम्।।

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भक्ति भक्त स्वरूप

अनेक स्थलों पर भक्ति की चर्चा आती है और भगवान् ने तो भक्त के ही चार स्वरूप बता दिया है-चतुर्विधा मां भजन्ते जना: सुकृतिनोर्जुन।आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।
आर्त,जिज्ञासु ,अर्थ को चाहने वाले और ज्ञानी ये चार प्रकार के मेरे भक्त हैं जिनमें ज्ञानी भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है(तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त: एकभक्तिर्विशिष्यते।प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रिय:)अनन्य प्रेम वाला ज्ञानी भक्त मुझमें एकीभाव से स्थित है, क्योंकि वह तत्व दर्शी मुझसे प्रेम करता है और मैं उससे।
आगे कहते हैं-उदारा:सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थित: स हि युक्तात्मा मामे-
वानुत्तमां गतिम्।।
सभी भक्त उदार तो हैं, किन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा ही
स्वरूप है।वह उत्तम गतिस्वरुप
मुझमें अच्छी प्रकार स्थित है।
अन्त मे इस प्रकरण का संहरण करते हुए और भी स्पष्ट कर दिया-
बहूनां जन्मनामन्ते
ज्ञानवान्मां प्रपद्यते
वासुदेव:सर्वमिति
स महात्मा सुदुर्लभः।।
बहुत जन्मो को धारण करते हुए
अन्त मे तत्वज्ञ पुरष ही सब कुछ मुझे ही मानने वाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।
।।हरिश्शरणम्।।

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भक्ति और ज्ञान में अभेद

भक्ति शब्द सेवार्थक है ,तो ज्ञान का सम्बन्ध बुद्धि-विवेक से। दोनों एक दूसरे के परिपूरक और एकत्व विधायक भी।
श्रीमदाद्य भगवत्पाद आचार्य शङ्कर ,जब भक्ति का मतलब आत्मस्वरूप के परिज्ञान से करते हैं, तब भक्ति और ज्ञान एक दूसरे से अभिन्न प्रतीत होते हैं।
नारद भक्तिसूत्र में चर्चा है कि” भक्ति को किसी भी वासना की पूर्ति का साधन नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि वह तो सारी वासनाओं के निरोध का कारणस्वरूप है।”
“सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्।”
और सेवार्थक भज् धातु इस बात को भी निश्चित करती है कि, जब सेवक की अपने सेव्य के प्रति समस्त क्रियाएँ समर्पित हों जायें तथा और उसके विस्मरण से व्याकुलता उत्पन्न हो जाय, तभी भक्ति का उदय समझे।
“नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता तद् विस्मरणे परमव्याकुलितेति।”
तब इस प्रकार स्वकीय ज्ञान का पर्यवसान अपने सेव्य में होना ही भक्ति का स्वरूप निश्चित होने से ज्ञान एवं भक्ति में एकत्व सिद्ध होता है।
कलिपावनावनावतार गोस्वामीजी भी भक्ति और ज्ञान में अभेद मानते हुए दोनों के द्वारा भवमुक्ति स्वीकारते हैं-

भगतिहिं ज्ञानिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भवसम्भव खेदा ।।

और भक्ति-ज्ञान की अखण्ड परिपूत अवस्था में भक्त तुलसी अपने आराध्य में
कैसे रससिक्त हैं।वे कहते हैं-

रामचरित जे सुनत अघाहीं।
रसविशेष जाना तिन नाहीं।।
वे कहते हैं “ज्ञान “तो एकमात्र मेरे प्रभु श्रीराम हैं और जीव माया के वशीभूत।
ज्ञान अखण्ड एक सीतावर।
मायावस्य जीव सचराचर।।

माया के द्वारा रचित सारे भेदाभेद यद्यपि व्यर्थ हैं, किन्तु बिना हरिसेवा के यह मायिक भेद जा भी नहीं सकता।
मुधा भेद यद्यपि कृत माया।
बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया ।।
भगवान् स्वयं अपने श्रीमुख से कहते हैं-
भगतिवन्त अति नीचउ प्रानी।
मोहिं प्रान प्रिय अस मम बानी।।
मतलब कि निम्न कुल और कर्मादि वाला प्राणी भी यदि मेरी भक्ति में प्रीति में एक निष्ठ हो ,तो वह मेरा अतिप्रिय है।
इसीलिये भगवान् ने गीता में एक बात कही है-
अपि चेत् सुदुराचारो,
भजते मामन्यभाक्।
साघुरेव स मन्तव्यः,
सम्यग् व्यवसितो हि सः।।

तात्पर्यतः ज्ञान स्वरूप परमात्मा में किन्हीं कारणों से जिस किसी ने भी आत्मस्वरूप को जान लिया है, वह अनन्यपरायण व्यक्ति जन्मजन्मान्तर के प्रारब्ध को छिन्न करके मुक्त हो जाता है।
यही भक्ति (सेवा)और ज्ञान(परमात्मा) के ऐक्य का परम रहस्य है।
अतः श्रद्धा -भक्ति और सदाचार पूर्वक अवतार-चरित्रों में सञ्जीवनी मानते हुए कलि के एकमेवाद्वितीय धर्म श्रीरामकृष्ण के नामजप का आश्रयण विश्वास पूर्वक
करना चाहिए-
बिनु विश्वास भगति नहिं,
तेहिं बिनु द्रवहिं न राम।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ,
जीव न लह विश्राम।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/06/21/भक्ति-और-ज्ञान-में-अभेद/

जड चैतन्यव्यतिरेक कैसे हो

अब प्रश्न है कि जड चैतन्यव्यतिरेक कैसे हो?
अथवा इन गुणों से पार कैसे पाया जाय?

उत्तर साफ है कि इसमें सर्वप्रथम भगवत् कृपा ही मूल कारण है, जिससे आत्मजिज्ञासा और सद्गुरु का मिलन प्राप्त होता है।सद्गुरु गुणों से पार जाने का साधन, युक्ति, उपाय बताते हैं।तब साधक उसके अनुकूल साधन करके अविद्या को पार कर सकता है।वेदान्त ग्रन्थों मे अविद्यासे पार पाने या गुणों के चक्कर से छूटने के लिये व्यवस्था दी गई है-

“वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणान् यच्छेन्द्रियाणि च।आत्मानमात्मना यच्छ न भूयः कल्पसेध्वने:।”वाचं नियच्छात्मनि तं नियच्छ,बुद्धौ धियं यच्छ च बुद्धि-साक्षिणि।तं चापि पूर्णात्मनि निर्विकल्पे,विलोप्य शान्तिं परमां भजस्व।”

अर्थात् वाणी को स्वतंत्रता से रोक कर,मन मे लय करे ।मन को संकल्प विकल्प से हटा कर बुद्धि मे लय करे।बुद्धि को साक्षी आत्मा मे लय करे।आत्मा को पूर्ण चैतन्य मे लय करके शान्त हो जाय।

ओ3म् शान्ति:शान्ति:शान्ति:।

यही बात सर्वोत्कृष्ट उपदेष्टा भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रकारान्तर से सरलीकृत, समूहालम्बीकृत करके इस सन्दर्भ पर पूर्ण विराम लगा दिया कि सर्वथा मत्परायण होकर ही मायापारगम्यता सम्भव है-

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।

|| हरिश्शरणम् ||

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जगत् प्रकाश्य प्रकाशक रामू

यह जगत् प्रकाश्य है और इसके प्रकाशक श्रीराम हैं। कलिपावनावनावतार गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री राम को परमात्मरूप में चित्रित किया है। इसलिए वे उक्त बात कहते हैं कि यह संसार इन्हीं भगवान् के द्वारा प्रकाशित हो रहा है।
परमात्मा स्वयं प्रकाश स्वरूप है, जिनके प्रकाश से संसार प्रकाशित है।
और मनुष्य शरीर में इसी तरह आत्मा भी है,जिससे समग्र शरीर प्रकाशित है।
बात केवल अनुभव की है, कि हम इस प्रकाश का कितना ,कैसे और किस रुप में अनुभव करते हैं।
क्योंकि अनुभव (Perception) ही किसी भी अस्तित्व का अद्वितीय प्रमाण है। यह अनुभूति स्वयं ज्योति या स्वयं प्रकाश है। किसी भी इन्द्रियातीत ज्ञान से परे जाने के लिए इसी प्रकाशरूप आत्मा की आवश्यकता होती है।
यह अनुभूति ,अस्तित्व, भाव सभी एकार्थक सिद्ध हैं।क्योंकि सभी में पृथक् प्रत्यय अवश्य लगे हैं, कि धातु सभी में एक है, जिसका अर्थ सत्तात्मक है। आत्मा का अर्थ है आत्मीयते ,अर्थात् जो सबका मानदण्ड या प्रमाण हो।किन्तु उसका कोई प्रमाण नहीं हो।
इस प्रकार शरीर है तो उसमें और उससे अनेक अनुभव क्रियाएँ भी हैं। कोई अनुभव क्रिया संज्ञाविहीन नहीं है।प्रत्येक अनुभूति क्रिया का स्वरूप ही संज्ञात्मक है।और उपर्युक्त धात्विज अर्थ के अनुसार जब सत्ता और अनुभव एक वस्तु है तथा जिसका कोई कारण नहीं है, वही अनन्त है।इसीलिये अनुभूति स्वयमेव अपना चरम प्रमाण और अनन्तस्वरूप है।
अनुभूति,अस्तित्व या भाव जब स्वसंवेद्य है ,तब यह स्वयं ज्ञाता स्वरूप है।
यह स्वयं ज्ञातृत्व मन का धर्म नहीं, किन्तु इसके रहने से मन रहता है।यही एकमेव अनुभूति ही स्वप्रकाश रूप आत्मा है।और यह आत्मा है परमात्मा का अंश।इसीलिये वेद में –द्वासुपर्णा सयुजा सखाया..इत्यादि के द्वारा जीवात्मा को प्रारब्धवश भोगी और परमात्मा को आनन्दमात्र स्वरूप चित् सिद्ध किया है।
वास्तव में एकमेवाद्वितीय आत्मा ही अनेक शरीर गामी जीवात्मा पद वाच्य है, जहाँ पंचप्राण एकीभूत हैं और उसका नियामक आत्मा ही है। यही जीवात्मा परमात्मा है। अन्य को अन्य समझना भ्रमादि वश है,जो मायिक है।
यह अनुभूति ,भाव ,स्वयं ज्योति ही केवल मायिक नहीं अतः यही अमायिक राम हैं।इन्हें आत्मा में ही उपासित किया जा सकता है और केवल आत्मोपासना से ही मुक्ति प्रकट होगी।इसीलिये आदि शङ्कर ने अपने आत्म स्वरूप के आन्तरिक अनुसन्धान को भक्ति कहा-
“स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते”
और इसलिये एक सुन्दर सा दोहा इस समस्त विचार को समेटता है-

कस्तूरी कुण्डल बसै ,मृग ढूँढै बन माहिं।
ऐसे घट-घट राम हैं ,दुनिया दखै नाहिं।।

बालकाण्ड में भगवान् शिव ,माता पार्वती से उनके प्रश्न के उत्तर में इन्ही अनुभव ही एकमात्र प्रमाणवाले श्रीराम को बताते हैं-

विषय करन सुर जीव समेता।
सकल एक ते एक सचेता।।
सब कर परम प्रकाशक जोई।
राम अनादि अवध पति सोई।।

अर्थात् शब्द,स्पर्श, रूपादि विषयों का प्रकाश इन्द्रियों द्वारा होता है और इन्द्रियों का प्रकाशन तत् तत् स्थानीय देवों द्वारा।
क्योंकि-
इन्द्री द्वार झरोखे नाना।
जहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।।
सभी पञ्च ज्ञानेन्द्रियों और छठवें मन आदि सभी में तत्तत् स्थानिक देवों का निवास है। और इन ऐन्द्रिक देवों का भी प्रकाशक जीवात्मा स्वयं है।इस तरह ये विषय, इन्द्रियाँ, तद्गत देवता गण और जीवात्मा सभी क्रमशः एक की सहायता से एक चिद्रूप होते हैं।
इन सभी का जो प्रकाशक है,वह “परम” अर्थात् परमात्मा है, जो परमात्मा और कोई नहीं प्रत्युत अनादि अनन्त अयोध्या के नरेश भगवान् श्री राम हैं।

अब कहते हैं-

जगत् प्रकाश्य प्रकाशक रामू।
मायाधीश ग्यान गुन धामू।।
जासु सत्यता ते जड़ माया।
भास सत्य इव मोह सहाया।।

मतलब कि इस प्रकाश्य जगत् के प्रकाशक मायाधीश स्वयं भगवान् श्रीराम हैं।ये ज्ञान और गुणों के धाम हैं।इन्हीं की आंशिक आत्मा रूप सत्ता, अस्तित्व, भाव, भावना, अनुभूति,और स्वयं ज्योति की सहायता पाकर मोह(अज्ञान)वश माया भी सत्य जैसी दीख रही है।
क्योंकि-

रजत सीप महुँ भास जिमि,
यथा भानु कर वारि।
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ,
भ्रम न सकै कोउ टारि।।

जैसे सीप में चाँदी और सूर्य की किरणों में जल की प्रतीति होती है, यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालों में असत्य है, फिर भी इस भ्रम को कोई हटा नहीं पाता।
और इसलिये-

जो आनंद सिन्धु सुखराशी।
सीकर तें त्रैलोक सुपासी।
सो सुख धाम राम अस नामा।
अखिल लोक दायक विश्रामा।।

आनन्द के सागर ,सुख की राशि और जिनके सीकर (एक जलकण) मात्र से तीनों लोकों का पोषण होता है, ऐसे ब्रह्माण्ड के चरम विश्राम स्थान श्री राम की स्वयं प्रकाश रूप में स्वात्मा में अनुभूति ही वरेण्य है। अनन्त जन्मो से भटके और नाना शरीरों में अटके इस मन को उन्हीं प्रभु चरणों में डालना होगा तभी एकाश्रित होकर यह आत्मदेव के रूप में उनके दर्शन का साधन हो पायेगा। भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/05/27/जगत्-प्रकाश्य-प्रकाशक-रा/

यक्ष – युधिष्ठिर संवाद

का वार्ता किमाश्चर्यं कः पन्थाः कश्च मोदते।
इति मे चतुरः प्रश्नान् पूरयित्वा जलं पिब ।।

सबसे बड़ी बात क्या है?
सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
संसार में चलने का मार्ग क्या है?
संसार में कौन आनन्दित होता है?

1-मासर्तु वर्षाःपरिवर्तनेन
सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन।
अस्मिन् महामोहमये कटाहे
भूतानि कालः पचतीति वार्ता।।

इस संसार रूपी महा मोहमय कड़ाही में मास,वर्ष आदि ऋतुओं के परिवर्तन से, सूर्यरूप अग्नि के ईंधन से रात्रिऔर दिन का काल प्राणियों को पकाता है।इस बात का अहसास मनुष्य को नहीं होता, यही सबसे बड़ी बात है।

2-अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम्
शेषाः जीवितुमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतःपरम् ।।

प्रतिदिन प्राणी संसार को त्याग कर यमलोक सिधार रहे हैं।इसे देखने के बाद भी अन्य लोग जीने की इच्छा पाल कर सोचते हैं, हम ऐसे ही रहेंगे।इससे बड़ा आश्चर्य क्या है?

3-श्रुतयो विभिन्ना स्मृतयो विभिन्नाः
नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् ।
धर्मस्य तत्वं नहितं गुहायां
महाजनो येन गतः स पन्थाः।।

श्रुतियाँ अनेक ,स्मृतियाँ भी अनेक हैं।कोई
एक भी ऐसे ऋषि नहीं हैं, जिनका ही केवल एक वचन प्रमाण रूप माना जा सके।और धर्म का तत्व भी बड़ा गूढ़ है।अतः श्रेष्ठ जन जिस मार्ग पर चले हैं, वही मार्ग ग्रहण करना चाहिए।

4-दिवसस्याष्टमे भागे शाकं पचति स्वे गृहे।
अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते।।

हे जलचर प्राणी! दिन के आठवें भाग यानी कि सुबह शाम जो अपने घर में शाक आदि पूर्ण अन्न भोजन करता है।साथ ही जिस पर कोई ऋण न हो और जिसे जीविका वश अन्यत्र प्रवास नहीं करना पड़ता, वही इस संसार का सबसे सुखी प्राणी है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/05/27/यक्ष-युधिष्ठिर-संवाद/

आत्मानुभूति

अस प्रभु हृदय अछत अविकारी।
सकल जीव जग माहिं दुखारी ।।

जब ऐसे अक्षय निर्विकारी परमात्मा प्रभु हृदय में विराजते हैं, तब यह सारा संसार दुखी क्यों है? इसके दुःख का कारण क्या है? आनन्द घन घनश्याम के हृद्देश में रहने पर हमें उस आनन्द की अनुभूति आखिर क्यों नहीं?
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
चेतन अमल सहज सुखरासी।।
यह जीवात्मा ऐसे अविनाशी चेतनमात्र निर्मल स्वभावसिद्ध सुखराशि स्वात्म मात्र पर्यवसित ईश्वर का अंश है ,फिर पुनः दुखी क्यों है?

आगे पंक्तियों में उत्तर साफ-साफ दे देते हैं

सो माया बस भयेउ गोसाईं।
बँध्यौ कीर मर्कट की नाईं।।
और
भूमि परत भा ढाबर पानी।
जिमि जीवहिं माया लिपटानी।।

यह मानव जगत् माया की अधीनता परवशता स्वीकार कर लेने से कीर (तोते)और मर्कट(बन्दर) अथवा अन्यान्य पशु जीवों की तरह पीने खाने के पदार्थों में आकृष्ट होकर स्वयं बँध गया है।
जैसै वर्षा का निर्मल जल आकाश से गिरता तो है स्वच्छ रूप में किन्तु भूमि पर आकर गन्दा हो जाता है, उसी तरह इस मनुष्य की भी गति है,कि माया रूपी आपातरमणीय किन्तु दुख परिणामी ठगिनी के वशीभूत हो जाता है और इसको आत्मविस्मृति हो जाती है।इस तरह आनन्दी परमात्मा का का अंश बेचारा बार बार जीव जगत् का चक्कर लगाता फिरता है। और बात ये भी है कि अनेकानेक जन्मों के पश्चात् स्वकीय कर्मों और करुणा के अविकल कोश अंशी परमात्मा की कृपा से प्राप्त यह मानव शरीर उसी की प्राप्ति का साधनभूत है। मुक्ति का एकमात्र परम मार्गस्वरूप है,किन्तु-

फिरत सदा माया कर फेरा।
काल कर्म स्वभाव गुन घेरा।।

काम,क्रोधादि और अहंकार के कारण माया की अधीनता स्वीकार करके संसार चक्र में पड़ा हुआ है।
अब बात ये भी है कि बिना अंशी को प्राप्त किये इस अंश रूप मनुष्य का परम कल्याण भी सम्भव नहीं।और यही अंशी ही एक है जो हृद्गत और समस्त चर अजर में व्याप्त उसकी अनुभूति कर सकता है।
जब तक स्वयं में उसकी अनुभूति नहीं होगी तब तक कहीं भी और कभी भी उसकी अनुभूति सम्भव नहीं।
और स्वयं में अनुभूति होने के लिए सन्त भगवन्त की कृपा करुणा अनिवार्य है।
इस कृपाकरुणा की प्राप्ति हेतु उस अंशी का सतत स्मरण परम अनिवार्य है।

क्योंकि –विपद् विस्मरणं विष्णोः सम्पद्
नारायणस्मृतिः।
उसको भूलना और उसकी स्वप्नवन्माया में भटकना ही विपत्ति का मूल और माया के गुणों बन्धनों में बँन्धन स्वीकारना तथा उस चिदानन्द घन का निरन्तर स्मरण रखना समस्त सुख शान्ति का मूल है और यही आत्मानुभूति भी है।
और इसलिये-
जब लगि उर न बसत रघुनाथा।
धरे चाप सायक कटि भाथा।।
ममता तमी तरुन अँधियारी ।
राग द्वेष उलूक सुखकारी ।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं।
जब लगि प्रभु प्रताप रवि नाहीं।।

इसलिये संसार की अहंता ममता को छोड़ और निर्मल मन से प्रभुस्मरण ही आत्मानुभूति और उनकी कृपा प्राप्ति का एकमेव उपाय है-
मन क्रम बचन छाँड़ि चतुराई।
भजत कृपा करिहहिं रघुराई।।

सन्त भगवन्त की हो और तत्क्षण आत्मानुभूति हो जाय।

।।हरिश्शरणम्।।

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मन का भटकाव/ठहराव

यह मन भी बड़ा विचित्र है। अनेक जन्मों और शरीरों के धारण का कारण यह मन ही तो है , जिसके भटकाव से चित्त अस्थिर है और कहीँ विश्रान्ति नहीं मिली।
विषयों का आसंगी यह बेचारा एक कामना के पूरा होते ही दूसरे की ओर दौड़ पड़ता है।और कबीर ने इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा-
माला फेरत जुग भया फिरा न मन फेर।
कर का मनका डारि दे मन का मनका फेर

माया के झाँसे में पड़ कर इसकी विवशता तो देखिये कि इसी के इधर-उधर विषयोँ में फिरते रहने से अनेक युग ही बीत गए और यह अब तक भटकाए ही जा रहा। कबीर ने कहा कि इसलिए कर में लिए हुए गोलाकार माले के मनके दाने को छोड़ कर अब मन के मनके को फिराने को सोचना चाहिए।क्योंकि जब तक यह विषयों में फिरता रहेगा और उन विषयों से नहीं फिरेगा यानी कि विमुख नहीं होगा, तब तक परम शान्ति और विश्रान्ति नहीं मिलेगी।
और यदि किसीने इस मन को मूड़ लिया या विषयों से मोड़ लिया, तो बार बार सिर मुड़ाने की जरूरत नहीं-
केसन कहाँ बिगारिया जे मुंडे सौ बार।
मन को काहे न मूड़िये, जाने विषय विकार

भगवान् ने गीता में इसीलिए इस मन को बन्धन /मुक्ति का कारण कह दिया-
मन एव मनष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः

और कबीरवाणी ये भी है कि यदि इस मन को वैराग्य अभ्यास के द्वारा भगवन् नाम और भजन में बाँधकर निर्मल कर लिया जाय तो यह गंगा की तरह परम पवित्र हो जायेगा और भगवान् भी उस भाग्यवान् के अनुगामी हो जायेंगे-

कबिरा मन निर्मल भया जैसै गंगा नीर।
पाछे पाछे हरि फिरैं कहत कबीर कबीर।।

लाखन में एक बात तुलसी बताये जात।
जन्म जो सुधारो चाहो तो राम नाम लीजिए।।
और यह भगवन् नाम जपने रटने की ही महिमा है माहात्म्य है कि मन निर्मल हो जायेगा केन्द्रित और नियन्त्रित हो जायेगा, एकत्व को प्राप्त हो जायेगा और कोई आत्मा से महात्मा भी हो जायेगा-

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्।
मनस्यन्यद् वचस्यन्यद् कर्मण्यन्यद् दुरात्मनाम् ।।

भगवान् श्रीराम ने इसीलिये स्पष्ट कहा था कि-
मोहि कपट छलछिद्र न भावा।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।।
और इसीलिए चैतन्य वाणी का नाद भी इसी भगवन् नाम को रटने,गद्गद वाणी और गलदश्रु होकर रोमांचित होकर जीवन धन्य बनाने को बैचैन है-

नयनं गलदश्रुधारया वदनं गद्गदया गिरा।
पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नामग्रहणे भविष्यति।।

और मन्मना भव मद्याजी मद्भक्तः मां नमस्कुरु का गीतानाद इन्ही विषयों में अटके भटके मन को बाँध कर मायाधीश के चरणों में समर्पण करके परमात्म भाव में अनन्त शान्ति पाने का मन्त्र है।
इसी भाव को कबीर ने स्मरण करते हुए मन के मरने या नाम में रमने पर माया के मरने तथा सद्यः मुक्ति और आत्मलाभ की बात कह डाली है-

मन मरा माया मरी हंसा बेपरवाह।
जाको कछू न चाहिए सो शाहन का शाह

अतः अपवित्र विषयों के राग से मुक्ति और मूलतः बन्धन मुक्ति हेतु नामजप में बँधने पर ही अन्तिम आत्यन्तिक शान्ति की प्राप्ति सम्भव है।

।।हरिश्शरणम्।।

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मनुष्य का नित्य वैरी काम

धर्म ,अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों के मध्य में पड़ा काम तो अराजक नहीं दीखता, क्योंकि उस पर धर्म का अंकुश जो है । और काम- क्रोधादि षड् रिपु वर्ग में परिगणित जो काम है,वह भी सृष्टि व्यवहार के लिये ही निर्धारित है, उस पर भी धर्म का अंकुश अनिवार्य है।
किन्तु धर्म मर्यादा को त्यागने वाला काम ,निश्चय ही पशु ( सर्वम् अविशेषेण सामान्येन पश्यति इति पशुः) आचरण में पतन करा देता है। पशु का मतलब, जिसका आचरण धर्म विहीन हो। इस प्रकार सब में अविशेष अर्थात् सामान्य बोध-व्यवहार वाला प्राणी पशु है ,जिसके लिये कोई आचार नियत नहीं है।जो केवल और केवल भोग के लिये ही शरीर धारण किए है,वह पशु है।
किन्तु अनेक जन्मार्जित पुण्य और प्रभु कृपा से प्राप्त देव दुर्लभ यह मनुष्य शरीर भी ,यदि उसी पशु प्रवृत्ति या भोगवृत्ति में पड़ जाये तो इससे बड़ा पाप क्या होगा?
अधर्म पूर्वक सेवित काम , मानव का सबसे बड़ा शत्रु है।और यह जगद् विदित तथ्य है कि मनुष्य और पशु में अन्तर करने वाला भेदक तत्व धर्म ही है।
अब श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय में अर्जुन की जिज्ञासा देखें, जब प्रश्न उठता है कि ,वह कौन है ,जो बल पूर्वक राजा की से प्रयुक्त सेवक की तरह,मनुष्य को पाप कर्म में लगा देता है?

अथ केन प्रयुक्तोयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:

इस पर भगवान् ने उत्तर दिया-

काम एषः क्रोध एषः रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्धि एनमिह वैरिणम्

मतलब कि रजोगुण से उत्पन्न होने वाला यह काम ,मनुष्य का सबसे प्रबल शत्रु है।
एक काम या कामना की पूर्ति होते ही, दूसरी आकर खड़ी हो जाती है। और उसके बाद यह अनेक रूप, आकार, प्रकार और परिमाण में वृद्धि को प्राप्त होता रहता है।हमेशा अविश्रान्त ही रहने वाला यह विषयसंगी कामशत्रु ,जब कभी पूरा नहीं होता तब, इसका आत्मज क्रोध आकर दस्तक देता है ।रजोगुणसमुद्भव यह काम ,अपूर्ण रहने पर जब क्रोध पुत्र को पैदा करता है, तब मेरे विचार से क्रोध तमोगुण को स्पर्श कर लेता है, और मनुष्य को असंतुलित करके एकदम से गिरा देता है। क्रोध पाप कर मूल।
भगवान् तो इन दोनों पिता-पुत्रों ,काम-क्रोध को महा अशन करने वाला, कहते हैं। महा अशन का मतलब कि बहुत खाने वाले और कभी भी तृप्त न होने वाले।
भगवान् आगे इसका स्वभाव बताते हुए कहते हैं कि ये नित्यवैरी काम, मनुष्य के ज्ञान को आच्छादित करके इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर अधिष्ठित होकर जीवात्मा को नाना प्रकार से मोह में फँसाए रखता है।

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्।।
गीता- 3/39-40 ।
इस तरह के ज्ञानविज्ञान नाशी कामक्रोध को ,स्वयं इन्द्रियों को वश में करके त्याग देना चाहिए –

पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।
जहि शत्रुं महाबहो कामरूपं दुरासदम्।।
गीता- 3/ 41-43 ।
उधर मानस में भी जब विभीषण ,प्रभु राम से मिलने आते हैं, और वानर समुदाय शंका करता है यह कामी-क्रोधी राक्षस क्यों आया है?
जानि न जाइ निशाचर माया।
कामरूप केहि कारन आया।।
तब त्रिकालज्ञ भगवान् उस विभीषण को निर्मल मन वाला निर्दिष्ट करके अपनाने की बात करते दीखते हैं-
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।।

इस प्रकार कामक्रोधादि राक्षसी वृत्ति को त्यागना पड़ेगा और मनुष्य के स्वभाविक सन्त सरल स्वभाव को अपनाना होगा, तभी भगवान् की कृपा प्राप्त होगी और कल्याण भी सम्भव है-

मन क्रम बचन छाँड़ि चतुराई।
भजत कृपा करहहिं रघुराई।।

यह सरलता और सन्तस्वभावता शबरी के नवधा भक्ति प्रसंग में नवीं भक्ति है-

नवम सरल सब सन छल हीना।।

अतः मानव जीवन को अमानव या दानव पशु अधम बना देने वाले इन बाप बेटों से अत्यन्त सावधानी बरतनी चाहिए,क्योंकि ये आत्मा का नाश कर देने वाले नरकद्वार भी हैं-
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामःक्रोधःतथा लोभः तस्मादेतत्रयं त्यजेत्

गीता-अध्याय- 16 मन्त्र 21 ।
अतः भगवान् कृपा करें और उन बाप-बेटों काम-क्रोध से मुक्ति हो।

।।हरिश्शरणम्।।

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अजन्मा का जन्म

यो दुर्विमर्शपथया निजमाययेदं,
सृष्ट्वा गुणान् विभजते तदनुप्रविष्ट: ।
तस्मै नमो दुरवबोधविहारतन्त्र-
संसारचक्रगतये परमेश्वराय।।

जिन्होंने अपनी अचिन्त्यगति माया से इस संसार चक्र का निर्माण करके उसमें स्वयं प्रवेश कर लिया और गुणों के आधार पर, कर्म एवं कर्मफल का विभाजन भी कर दिया है, ऐसे दुरवबोध विहार लीला विस्तार करने वाले परमेश्वर को प्रणाम है।
स: अकामयत एकोहं बहु स्याम, की वैदिक अवधारणा , संसार के सृजन का मूलाधार है।उसकी कामना से आकाश बन गया और उसमें वायु चलने लगी,प्रकाश भी हो गया। गरमी की अनुभूति हुई तो जल भी बन गया। गीलेपन का अहसास हुआ और पृथ्वी भी बन गई।
यही तो उस अचिन्त्य की क्रीड़ा है।
इसी क्रीड़ा में सृष्टि प्रादुर्भूत हो जाती है।
भगवान् की क्रीड़ा का विस्तार समस्त ब्रह्माण्ड पर्यन्त है। सत् ,रज और तम के क्रमशः सुख,दुख मोहादि कार्यों का निरन्तर प्रवाह सृष्टि, स्थिति और विनाश में एक के बाद एक चलता रहता है।
काम ही सृष्टि का मूल है, जिसे रजोगुण से उद्भूत कहा गया है। इस काम पूर्ति की प्रक्रिया में सन्तोष और असन्तोष के बीच क्रोध भी जन्म ले लेता है, जिसका मूल तमोगुण है। और इस क्रोध और अहंकार की विनिवृत्ति के लिये अजन्मा को भी जन्म लेन की विवशता प्रतीत होती है।इस प्रकार अजन्मा के जन्म और उसकी क्रीड़ा का सातत्य सतत चलता है।
आज उसी क्रीड़ा के प्रादुर्भाव में बलवती प्रभु कामना को सत्य करनेवाला भारतीय नव वर्ष का प्रथम दिन है।
पौराणिक मान्यता में ब्रह्मा की सृष्टि का प्रथम दिन,चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि है।अनेक महापुरुषों का जन्मदिवस यह दिन सृष्टि में यत्र तत्र सर्वत्र नवीनता का संचार करनेवाला है।
शक्ति की उपासना का महत्वपूर्ण काल नवरात्र भी आज के दिन से प्रारम्भ होकर नव दिन पर्यन्त चलता है। भारतीय जनमानस का उत्सव पर्व आज ही के दिन से प्रारम्भ हो जाता है।
एक और महत्वपूर्ण घटना सृष्टि में आज के नवम दिन अवतरित होती है जब प्रभु श्रीराम का अवतरण अहंकार रावण के विनाश हेतु होता है।

नवमी तिथि मधुमास पुनीता।
सुकल पक्ष अभिजित हरिप्रीता।।
मध्य दिवस अति शीत न घामा।
पावन काल लोक विश्रामा।।

चैत्र मास की नवमी तिथि को सृष्टि रचना या जगद्विस्तार के नवम दिन ,जो अंक की दृष्टि से सबसे बड़ा अंक और पूर्णता का प्रतीक भी है, भगवान् श्री राम अयोध्या में अवतरित होते हैं। यह पूरा नवरात्र काल प्रथम दिन से नव दिनों तक शक्ति उपासना के साथ ही साथ प्रभुश्रीराम के जन्मोत्सव का काल भी है, जहाँ तमस के पर्याय राक्षसों का विनाश प्रभु अपनी शक्ति के साथ स्वयं करते हैं।
उन्हीं अजन्मा के जन्म और विभिन्न देवों की शक्ति के समूहीभूत शक्ति से उत्पन्न भगवती की स्मृति में अनन्त प्रणिपात करते हुए यह विचारशृंखला उन्हीं को समर्पित करता हूँ।

।।हरिश्शरणम्।।

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