भगवद्भजन से ही अन्त:करणशुद्धि

सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्त:-

करणप्रवृत्तय: ” सज्जनों के अन्त:करण की वृत्तियाँ सन्देह का निराकरण कराती हैं।” कविकुलगुरु कालिदास की अमरवाणी का यह अमर सन्देश अमर- वाणी उपासकों के लिये अत्यन्त आदरणीय है। वैचारिक परिणति में यह- मन-बुद्धि-चित्ताहंकार रूप में चार हैं।

इन सभी में मन अद्वितीय है, जो शरीर के भीतर और बाहर सभी जगह तादात्म्य बनाये रखता है।शरीर में विद्यमान पंच ज्ञानेन्द्रियों-कान,त्वचा,आँख, जिह्वा और नासिका से यदि मन का तादात्म्यीकरण नहीं होगा तो ये पाँचों अपने-अपने विषयों –शब्द,स्पर्श, रूप,रस,गन्ध का भान नहीं कर पायेंगे।क्योंकि व्यवहार जगत् में इसका जिसके साथ योग-संयोग पूर्णतया होगा, उसी का पूर्ण ज्ञान संभव है।

मानसकार ने ” शिव संकल्प कीन मन माहीं।यह तन सती भेंट अब नाहीं।। ” में जिस शिव के संकल्प का शिवयोग दर्शाया है, वह संकल्पात्मक मन का ही स्वरूप है। और शिव की ही लीलाविग्रह शिवा के लीला संशय का उच्छेदन उनकी नित्यसंगिनी दक्षसुता सती के योगाग्निध्वंस में परिणमित हो जाता है।इस घटना में दक्ष का अहंकार नाश भी हेतु बनता है और जन्मान्तर में पुनः शिव की लीलासंगिनी हिमालय -पुत्री रूप में आकर शिव-पाणि-गृहीता हो जाती है।
सती का भावचांचल्य सदाशिव के सदा मन:स्थैर्य को व्यक्त करके ,मानवीय मन को विकल्पों को छोड़ कर संकल्प पर ही टिकने का अमिट आदेश दे देता है।
चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्। वाला अर्जुन का मन- अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते। का निर्देश पाकर एकमात्र संसाररागनिवृत्तिऔर नाम -अभ्यास-जपादि द्वारा ही वश में आ पाता है। यही मार्कण्डेय ऋषि का ” निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ “ और हमारे वैदिक ऋषियों का ” तन्मे मन: शिव-संकल्पमस्तु ।” भाव है।इसी अनुशीलन और इसी अनुशासन में ही जन्म जन्मान्तर के ग्राहक-अनुग्राहक मन की शुद्धि निहित है, जो सर्वानन्दावाप्ति करा देगा।
पंच ज्ञानेन्द्रियों , तद्विषयों ,मन ,बुद्धि और आत्मा की उत्तरोत्तर श्रेष्ठता शास्त्रों द्वारा सिद्ध है-

इन्द्रियेभ्य:परा ह्यर्था: ,
अर्थेभ्य: परं मन: ।
मनसस्तु परा बुद्धि: ,
बुद्धेरात्मा महान् पर:।।

ऊपर उक्त चारों अन्त:करणों में एक चित्त भी है, जिसे चेतना के रूप में शरीर के सभी अंगोपांगों में अनुभव किया जाता है।
इसी से सभी शरीरांगों में सर्वत: समग्र स्फुरण,स्फूर्ति,चेष्टागति हो रही है।
ऋषि मार्कण्डेय ने इसीलिये ” चेतना ” के रूप में भगवती का स्मरण-दर्शन किया है-

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

और ऊपर की मन:शुद्धि की तरह यहाँ भी चेतना या चित्शक्ति का शुद्धीकरण देवी के रूप में अवधारित करके सम्भव है।

तृतीय अन्तकरण ” अहंकार” है। इसमें सन्धि करने पर अहम् और कार दो पृथक् शब्द हो जाते हैं। अहं पद से” मैं “और कार से तद्भाव समझ में आता है।मतलब कि संसार एवं तद्विषयों में मैंपना या स्वयं कर्तृतादि का चिन्तन ही अहंकार है।
अहंता से अस्मिता, इदन्ता ,ममता आदि अपृथक् रूप से संयुक्त हैं।जिससे पुनः पुनःशरीर धारण करना पड़ता है।
” सोहमस्मि इति वृत्ति अखण्डा ” की गोस्वामी जी की अवधारणा का ध्रुवीकरण ही, जो चाहे अष्टांग योगादि जन्य हो अथवा भगवान् की भक्तिज्ञानश्रद्धालभ्य, इस अहंकार से मुक्ति दिला सकती है।
एक अन्तिम अन्तरिन्द्रिय ” बुद्धि ” है।
यह मन से श्रेष्ठतर और आत्मा से कमतर है। यह आत्मा के और मन के भी अत्यन्त निकट होने है। इसलिए इसी बुद्धि के नैर्मल्य द्वारा विवेकपूर्वक संपादित कार्य कार्यसिद्धि का कारण बनता है ,मन के मनमानी- पने से नहीं।
बुद्धिशुद्धि भी इसे गायत्री माँ मानने पर है,क्योंकि गायत्री का मनन चिन्तन इसी को गायत्रीमन्त्र रूप में मन्त्र मुग्ध भाव से जप कर बुद्धनैर्मल्य रूप में परिणमित देता है।और इसीलिये मार्कण्डेय ऋषि ने इस बुद्धि को नमन किया दैवी रुप में-

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

यह देवी गायत्री हो ,दुर्गा हो अथवा सीता ,यदि समाहित समर्पित बुद्धि से इसका मनन चिन्तन होगा, तो निश्चय ही यह बुद्धिनैर्मल्य देगीं ही।
सर्वसुरासुरमुनिमनुजदनुज-वृन्द-वन्दनीया सकलब्रह्माण्डजननी करुणानिधान श्रीराम की अतिशयप्रिया विदेहतनया श्रीजानकी जी के युगलपादपद्मों की वन्दना से गोस्वामी जी के शब्दोंमें निर्मलमतित्व की प्राप्ति वर्णित है-

जनकसुता जग जननि जानकी।
अतिशय प्रिय करुणानिधान की।।
ताके युग पदकमल मनावौं।
जासु कृपा निर्मल मति पावौं।।

नारायण यही रामगायत्री है ,जिसे उन्मुक्त भाव से किसी विधिविधान के विना भी स्मरण मनन चिन्तन करके मनुष्य मात्र की बुद्धि निर्मल हो जाती है।
सम्यक् आधीयते चित्तं यस्मिन्(यस्याम्) समाधि: की समाधि दशा इन्हीं भगवान् की अचिन्त्य शक्ति में ध्यान करके पाई जा सकती है, जिसका फल अविद्या, अस्मिता,राग,द्वेष,अभिनिवेश आदि पंच क्लेशों का शमन भी है।
इस प्रकार उक्त चतुर्धा विभक्त अन्तरिन्द्रियों का परिशुद्धीकरण इन सभी में भगवत्ता की अनुभूति से हो सकती है।और इसका भी एकमेव उपाय भगवद् भजन ही सत्य सिद्ध है-

उमा राम सुभाव जेहि जाना।
ताहि भजन तजि भाव न आना।।
तथा
कह हनुमन्त विपति प्रभु सोई।
जब तब सुमिरन भजन न होई।।
और
उमा कहहुँ यह अनुभव अपना।
सत हरि भजन जगत सब सपना।।

इत्यादि मानसकार की वाणी मानस में धरती हुई विरमती है।

।।हरिश्शरणम्।।

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भक्त रैदास

आज माघमास की वैक्रमाब्द 2076 की पूर्णिमा तिथि को सन्त रविदास का अनुस्मरण हो रहा है,क्योंकि भक्त समाज ,आज ही के दिन आपका प्राकट्य मानता है। श्रीरामानन्दाचार्य जी के द्वादश प्रधान शिष्यों में आपकी ख्याति है।
“श्रीभक्तमाल ” ग्रन्थ के प्रसिद्ध टीकाकार प्रियादास जी ने अपनी कवित्तमयी टीका में भक्त रैदास के जन्म की कथा कही है। इसके अनुसार गुरु रामानन्दाचार्य जी ने प्रतिदिन भिक्षाटन का कार्य एक ब्राह्मण बालक को सौंपा था और वह भिक्षान्न ब्राह्मण गृहों से संग्रह होता था, जिससे बने भोग को प्रतिदिन भगवान् को अर्पित किया जाता था।
इस बात की मनाही थी कि, अन्य किसी घर से अन्न ग्रहण नहीं किया जायेगा।पर भिक्षाटन करते समय इन बालक से एक वणिक् प्रतिदिन भिक्षान्न ग्रहण की प्रार्थना करते थे।जिसे ये गुरु आज्ञा के विपरीत मान कर स्वीकारते नहीं थे।एक दिन खूब जोर की वर्षा हो रही थी, और बालक ने उन वणिक् का ही अन्न स्वीकार कर लिया और उसी से बने भोग को भगवान् को अर्पित किया गया।किन्तु भगवान् ने वह भोग जब स्वीकार नहीं किया, तब गुरु श्री रामानन्दाचार्य जी को ज्ञात हो गया कि, बालक ने आज्ञा के विपरीत भिक्षाटन किया है। और उधर उस वणिक् को किसी ने बताया था कि, यदि श्री रामानन्दाचार्य जी उसकी भिक्षा स्वीकारें, तो उसे पुत्र प्राप्ति हो सकेगी।अतः वह तो कृतकार्य हुआ , किन्तु गुरु रामानन्दाचार्य जी ने इस ब्राह्मण बालक को मलिन जाति में जन्म लेन के लिए शाप दे दिया। ब्राह्मण बालक ने काशी में ही ” रघु” नामक चर्मकार के यहाँ जन्म ग्रहण किया। और अपनी पूर्व जन्म की जानकारी रहने से उस घर में दुग्धादि तक खानपान नहीं स्वीकारा।तब श्री रामानन्दाचार्य जी प्रकट हुए और वहीं पुनः शिष्य स्वीकारने की कृपा की ।
इसी घर में गुरु कृपा से पुनः जन्म प्राप्त रैदास ने गुरुभगवान् की कृपा से अल्पायु में ही भगवद् दर्शन किया और उपनिषद्, वेदान्त मय सिद्धान्तों को अपनी टूटी फूटी भाषा में दोहों ,पदों के माध्यम से अभिव्यक्ति दी।
उनका प्रसिध्द पद्य –

प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी।
जाकी अंग अंग बास समानी।।
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा।
जैसे चितवत चन्द चकोरा।।
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोत बरै दिन राती।।
प्रभु जी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भगति करै रैदासा।।

प्रायः पद का आशय पूर्णतया स्पष्ट ही है, किन्तु प्रभु को दीपक और स्वयं को उसकी बाती का भाव तो कुछ और ही है।
वस्तुतः इस अर्थ में औपनिषदिक बात पिरोई लगती ,जहाँ जीव-परमात्म का अभेद ही परिलक्षित होता है ।

एक दोहे में अपने गुरुभाई सन्त कबीर के भावों का स्मरण करते दीखते हैं, जहाँ अभिमान को त्याग देने का सन्देश है।

कबीर ने कहा-
लघुता ते प्रभुता मिले ।प्रभुता ते प्रभु दूरि।
चींटी लै शक्कर चली।हाथी के सिर धूरि।।
यही भाव रैदास वाणी में-
कह रैदास तेरी भगति दूरि है,
भाग बड़ो सो पावै ।
तजि अभिमान मेटि आपा पर ,
पिपलिक हवै चुनि खावै।

कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य मात्र को भगवान् की प्राप्ति और मुक्ति का समान अधिकार प्राप्त है किन्तु इसमें सबसे बड़ी बाधा देहाभिमान ही है। स्वयं पर सब कुछ करने और कर लेने का अभिमान रहते ,कुछ भी मिलना संभव नहीं ,जबकि भगवत् शरणागति हो जाने और सभी सांसारिक कार्य को भगवत् प्रीत्यर्थ करने लगने पर कुछ भी मिलना शेष नहीं रहता, और सभी कुछ मिल जाता है।
अतः इस अवसर पर प्रभु स्मरण करते हुए, सन्त रैदास की वाणी से वाणी विरमती है,जहाँ शरणागत भक्त सभी कामनाओं की पूर्ति में प्रभु श्रीराम का ही भरोसा मानता है-

प्रतिज्ञा प्रतिपाल चहुँ जुग,
भगति पुरवन काम ।
आस तोर भरोस है,
रैदास जै जै राम ।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/01/31/भक्त-रैदास/

युक्त योगी

युंजान योगी और युक्त योगी ,ये दो प्रकार योगियों के हो सकते हैं। युंजान का तात्पर्य ऐसे साधक योगाभ्यासी से है, जो योग साधन -परायण है, अर्थात् योगक्रिया में विधिवत् लगे हुए हैं। इसी से आगे की अवस्था को प्राप्त करने वाला योगी ,सिद्ध योगी कहा जायेगा, जहाँ पहुंच कर अब उसे कुछ भी प्राप्तव्य नहीं रहता।मतलब कि भगवान् की भाषा में युक्त योगी।
ऐसे ही योगी को भगवान् ने छठें अध्याय के अन्त में युक्ततम योगी कह दिया है,जो अनन्यपरायण होकर एकमात्र भगवद् आसक्त होकर अन्तरात्मा से श्रद्धा पूर्वक भगवान् को भजते हैं-

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मत:

वहीं षष्ठाध्याय के अष्टम श्लोक में भगवान् ने युक्त योगी या पूर्वोक्त सिद्ध योगी का वर्णन किया है।इसमें उसके चार विशेषण दिये गए हैं-

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चन:

इसमें प्रथम विशेषण ज्ञान विज्ञान से तृप्त आत्मा वाला कहा गया।ज्ञान का अर्थ एक मत के अनुसार परोक्ष ज्ञान से है, अर्थात् जो प्रत्यक्ष न होकर आचार्य या शास्त्रों द्वारा उपदिष्ट हो।इसी प्रकार विज्ञान का तात्पर्य अपरोक्ष ज्ञान से है, जो दैनन्दिन जीवन में अनुभव एवं क्रियान्वयन के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से बिना सन्देह और भ्रम के प्राप्त हो।
अन्य विचारकों के अनुसार, परमात्मा के निर्गुण निराकार तत्व के प्रभाव तथा माहात्म्य आदि के रहस्य सहित यथार्थ बोध को ज्ञान और उनके सगुण साकार तत्व के महत्व तथा गुणादि के रहस्य सहित यथार्थ बोध को विज्ञान कहते हैं।
वस्तुतः ये दोनों बातें एक ही परिभाषा की दो भाषास्वरूप हैं।क्योंकि निर्गुण ब्रह्म तथा अदृश्य जगत् का ज्ञान परोक्ष ही तो है और अवतार रूप सगुण ब्रह्म एवं दृश्यमान जगत् की प्रकृतिलीला का ज्ञान प्रत्यक्ष।
अतः जिनको परमात्मा के साकार निराकार दोनों तत्वों का भलीभाँति ज्ञान हो गया है और उनका अन्त:करण उनके प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप यथार्थ ज्ञान से सम्यक् तृप्त हो गया है, जिसके कारण उसे अब कुछ भी जानना शेष नहीं रहा, वही तो
“ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा” है।
भगवत्प्राप्त योगी के लक्षणों में”कूटस्थ” का समावेश भी बड़ा सार्थक है।सुनारों या लोहारों के यहाँ प्रयुक्त होने वाले लोहे के”अहरन” या ” निहाई ” को कूट कहते हैं।उस पर सोना-चाँदी या लोहादि धातुएं रखकर हथौड़े से कूटी जाती हैं।और कूटते समय उस पर बार-बार करारी चोट पड़ती है, फिर भी वह हिलता डुलता नहीं और बराबर एक स्थान पर एकरूप व अचल बना रहता है।इस तरह, जो व्यक्ति नाना प्रकार के हर्ष-सुख तथा दारुणदु:ख एवं भीषण कष्टों आ जाने पर भी अपने अन्त:करण में तनिक भी विकार उत्पन्न नहीं होने देता और सदासर्वदा अचल भाव से परमात्मा में ही स्थित रहता है, वही कूटस्थ है।
संसार के समस्त पदार्थों को मायामय एवं क्षणिक समझ लेने के कारण , युक्तयोगी की दशा ही ऐसी हो सकती है।वह किसी भी वस्तु में अनासक्त होने से संसार के सभी भोग्य पदार्थों के प्रति एक भाव वाला हो जाता है ,चाहे वह मिट्टी हो या सोना या और कोई अन्य। इसीलिए ऐसे युक्ततम योगी को “समलोष्टाश्मकाञ्चन” कहा गया है।

भगवान् स्वात्म में चित्त स्थिर करने की कृपा करें। जन्मजन्मान्तर से निरंतर प्रवहमान हम सब की चित्तवृत्ति का प्रवाह रुक सके ,और ” योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: “की पातञ्जलिक अञ्जलि-जल का पान हो सके।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/01/27/युक्त-योगी/

कालेन आत्मनि विन्दति

श्रीमद्भगवद्गीता की उक्ति है, काल आ जाने पर स्वयं में आत्म लाभ हो जायेगा।
इन पंक्तियों को स्वामी विवेकानंद जी अपने अनेकानेक व्याख्यानों में बराबर दुहराते रहते थे। मकर सक्रांति, जो उनके जन्म के वर्षों में बारह जनवरी को पड़ती थी, उनका आविर्भाव काल था। और उनके शरीर धारण के अवसर ,वर्तमान मकर संक्रांति का काल जो 12 से 15 जनवरी पर खिसक कर आ चुका है,मन , उस आत्मज्ञ ,आत्मस्थ,सत्ता पर बारम्बार केन्द्रित हो जा रहा है।
वे कहते थे पाप और पुण्य का सारा द्वन्द्व ,अनेकत्व भावना के सृजन से है।अथवा बहुत्व के भाव से यह सब आ पहुंचा है।मनुष्य जितना एकत्व की ओर बढ़ता जाता है, उतना ही ” हम-तुम ” का भाव कम होता जाता है।हमसे यह पृथक् है, ऐसा भाव मन में उत्पन्न होने से ही अन्यान्य द्वन्द्वों का विकास होता है।परन्तु सम्पूर्ण एकत्व का अनुभव होते ही, मनुष्य का शोक या मोह नहीं रह जाता-

तत्र को मोह: को शोक: एकत्वम् अनुपश्यत:
सब प्रकार की दुर्बलता को ही पाप कहते हैं-Weakness is sin . इसीसे हिंसा एवं द्वेषादि जन्मते हैं ।हृदय में आत्मा सर्वदा प्रकाशमान है, किन्तु इस ओर कोई ध्यान नहीं देता।केवल इस जड़ शरीर, हड्डी तथा मांस के अद्भुत पिंजरे पर ही ध्यान रखकर ” मैं मैं ” करता है।यही देहाध्यास है, यही सारी दुर्बलताओं का मूल है, यही समस्त व्यवहार जगत् का मूल भी।इसके परे परमार्थ भाव है।
“जब तक “मै शरीर हूँ ” यह ज्ञान है तब तक ये सत्य हैं।परन्तु जब”मैं आत्मा हूँ ” यह अनुभव होता है, तब यह सब व्यवहार -सत्ता का मिथ्यात्व भान होता है।
लोक जिसे पाप कहता है, वह दुर्बलता का फल है।इस शरीर को”मैं” जानना-यह दुर्बलता का रूपान्तर है।जब “मैं आत्मा हूँ”इसी भाव पर मन स्थिर होगा,तब पाप और पुण्य ,धर्माधर्म के पार पहुंचा जा सकेगा। ” श्रीरामकृष्ण कहते थे, ” मैं ” के नाश में ही दु:ख का अन्त है।”
उन्होंने कहा -यह अहं या मिथ्या भाव कहाँ है ,कोई मुझे बताये? जो वस्तुतः स्वयं है ही नहीं उसका मरना और जीना कैसा?इस अहं रूप मिथ्या भाव से सभी मोहित- Hipnotised हैं।इस पिशाच से मुक्त होते ही,यह स्वप्नवद् दूर हो जाता है और दिखाई देता है कि आब्रह्मस्तम्ब सभी में एक ही आत्मा विराज रही है।इसीको जानना होगा, प्रत्यक्ष करना होगा।”
जितने भी साधन भजन हैं, वे सभी इस आवरण को दूर करने के निमित्त हैं।इसके हटने से ही ज्ञात होगा कि चित्सूर्य अपनी प्रभा से स्वयं ज्योतिमान् है।क्योंकि आत्मा ही एकमात्र स्वयं ज्योति है, स्वयं वेद्य है।
इसीलिये श्रुति कहती है-
” विज्ञातारम् अरे केन विजानीयात् ”
– बृहदारण्यक उपनिषद् 2/4/14

जो कुछ यह मनुष्य जानता है, वह मन की सहायता से, किन्तु मन तो जड़ वस्तु है।उसके पीछे शुद्ध आत्मा रहने के कारण मन का कार्य होता है।अतः मन के द्वारा उस आत्मा को कैसे जाना जा सकता है?
इससे तो लगता है कि मन या बुद्धि कोई भी शुद्धात्मा के पास नहीं पहुंच सकती।
ज्ञान की पहुंच यहीं तक है।परन्तु जब मन विकल्प रहित या वृत्तिहीन होता है, तभी मन का लोप होता है और तभी आत्मा प्रत्यक्ष होती है।इसी को श्रीमदाद्य शङ्कर ने ” अपरोक्षानुभूति” कहा है।

फिर प्रश्न ये उठा कि यदि मन ही अहं है, तो मन का लोप तो ” मैं ” कहाँ रहा?
इस पर स्वामी जी का उत्तर था-वह जो अवस्था है, यथार्थ में वही अहं का स्वरूप है।उस समय का जो ” अहं ” रहेगा वह सर्वभूतस्थ ,सर्वगत,सर्वान्तरात्मा होता है।घटाकाश टूटकर महाकाश का प्रकाश होता है।क्या घट टूटने पर उसके अन्दर के आकाश का विनाश होता है? नहीं।
इसी प्रकार छोटा “अहं” ,जिसे शरीर में बन्द समझा जाता है, फैल कर सर्वगत अहं या आत्मा रूप से प्रत्यक्ष हो जाता है।अतः मन मरा या रहा, इससे यथार्थ अहं या आत्मा का क्या।
इन्ही बातों को सहजता से समझाने के लिए अनेक शास्त्र लिखे गये हैं। ये सभी साधनमात्र हैं, साध्य तो वही आत्मा है।हम आपातमधुर स्वर्ण रजत और स्त्रियों के क्षणभंगुर सौन्दर्य से मोहित होकर इस देव दुर्लभ मनुष्य जन्म को कैसे खो रहे हैं।जबकि यह शरीर ही आत्मज्ञान का अद्वितीय साधन है-साधन धाम मोक्ष करि द्वारा। पाइ न जे परलोक सँवारा ।हे! महामाया यह भी आपका ही आश्चर्य जनक प्रभाव है ,कि आपने बड़े बड़े ज्ञानियों के भी चित्त को भ्रमित कर रखा है।अस्तु-
जब तुम्हारी कृपा करुणा का प्रसाद मिलेगा, तब हे महामाये विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषी , वह काल अवश्य ही आ जायेगा और कर्म-ज्ञान-भक्ति की योग संसिद्धि अवश्य ही हो जायेगी-

न हि ज्ञानेन सदृशं
पवित्रमिह विद्यते।
तत् स्वयं योगसंसिद्ध:
कालेनात्मनि विन्दति।।गीता-4/38।

।।हरिश्शरणम्।।

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राम नाम सर्वस्वम्

सन्त शिरोमणि तुलसीदास की हरिभक्ति का दर्शन दास्यभाव में ” मानस ” सहित उनकी सम्पूर्ण रचनाओं में मूर्तिमंत विराजित है, किन्तु दोहावली के स्फुट दोहों में दृश्यमान रामनामानुराग भी साधकों को जीवन्मुक्त करने में सर्वथा समर्थ है। जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना,
श्रवन रंध्र अहि भवन समाना का समर्थक दोहा द्रष्टव्य है-

रसना सापिन बदन बिल,जे न जपहिं हरिनाम।
तुलसी प्रेम न राम सों, नाहिं विधाता बाम ||

तात्पर्य यह कि ऐसे लोगों की जिह्वा सर्पिणी और मुख बिल के समान है जो हरिनाम नहीं जपतेऔर जिन्हें श्रीरामनाम से प्रेम नहीं हो उनका क्या भला होगा?
कदापि नहीं।उनके लिए तो ब्रह्मा भी वाम(प्रतिकूल) हो जाते हैं अर्थात् उनका बड़ा दुर्भाग्य है।

चित्रकूट सब दिन बसत,प्रभु सिय लखन समेत।
रामनाम जप जापकहिं,तुलसी अभिमत देत ।। दोहावली- 04 ।

वे भगवान् श्रीराम , चित्रकूट पर्वत पर श्रीजानकी जी तथा लक्ष्मण जी के साथ नित्य निवास करते हैं।वहाँ रहते हुए सभी नाम जापकों को अभीष्ट सिद्धि भी हो जाती है।इसमें यह भी संकेत है कि इस कराल कलिकाल में स्वामी जी को वहीं भगवान् का दर्शन लाभ हुआ था। एक दूसरे भाव के अनुसार जिन्हें अपने चित्त रुपी मकान में सदा अन्तर्यामी रूप से विद्यमान प्रभु श्रीराम, सीता रूपिणी बुद्धि और अहंकार रूपी श्रीलक्ष्मण जी का दर्शन होता है, उनकी अभिलाषपूर्ति तो स्वत:सिद्ध है।

एक छत्र इक मुकुट मनि,सब बरनन पर जोउ।तुलसी रघुवर नाम के, बरन विराजत दोउ।। दोहावली -09 ।

राम नाम के दोनों अक्षर सभी वर्णों के ऊपर होकर विराजते हैं। “र”अक्षर सभी वर्णों पर शुद्ध व्यंजन रूप में रेफ बनकर छत्र की तरह तथा “म” अक्षर अनुस्वार होकर मणिवत् विराजता है।इसलिए सम्पूर्ण वार्ता को शोभित करने के लिये रामनाम अवश्यंभावी है-श्वांस श्वांस में राम कहु श्वांस वृथा जनि होय,श्वांस बिचारी पाहुना आवन होय न होय ।
दूसरे भाव में यदि वर्ण शब्द से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्णों का बोध करें तो पहला वर्ण “र” छत्र रूप से सर्वरक्षक तथा” म” मणि रूप में समस्त सुखों का मूल मान्य होगा- असन बसन पशु वस्तु विविध विधि सब मणि मंह रह जैसे।इस प्रकार रामनाम के सब वर्णों के ऊपर रहने का अभिप्राय है कि इस पर सभी वर्णों का समान अधिकार है।

अतः- तुलसी प्रीति प्रतीति सों ,रामनाम जपु जाग।किये होय विधि दाहिनो, देइ अभागेहि भाग।। दोहावली-36

प्रेम और विश्वास पूर्वक रामनाम जपने से प्रतिकूल विधि या दैव अनुकूल(दाहिनो) हो जाता है और अभागे का भाग्य खुल जाता है।मानस में इसकी पुष्टि करते हुए-

मन्त्र महामनि विषय व्याल के।
मेटत कठिन कुअंक भाल के।।
तथा-
नाम जीह जपि जागहिं जोगी।
विरति विरंचि प्रपंच वियोगी।।

इसी का पोषण करते हैं।

मंगल भवन अमंगलकारी उमा सहित जेहि जपत पुरारी, की मानस अभिव्यक्ति का सुन्दर उदाहरण अध्यात्म रामायण में भी दीखता है, जहाँ शिवाशिव राम नाम को जपते हैं और मुक्ति कामियों को नामोपदेश
करते हुए निवास करते हैं-

अहं भवन् नाम गृणन् कृतार्थ:
वसामि काश्याम् अनिशं भवान्या।
मुमूर्षमाणस्य विमुक्तयेहं
दिशामि मन्त्रं तव राम नाम।।

इसीलिए दोहावली के सत्ताइसवें दोहे में नाम को कल्पवृक्ष बताया गया है।यह सारे सुमंगल की कंदली अर्थात् बीजवत् है जिसके विना किसी सुखद वृक्ष की कल्पना सम्भव नहीं।इस रामनाम के स्मरण मात्र से सारी सिद्धियाँ करतल गत होकर राजती हैं और पग -पग पर परम आनन्द की अनुभूति होती रहती है।

राम नाम कलि कल्पतरु, सकल सुमंगल कन्द।
सुमिरत करतल सिद्धि सब, पग पग परमानन्द ।।

।।हरिश्शरणम्।।

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सभी भगवत् स्वरूप अभिन्न हैं

कामना भेद से ,विभिन्न इच्छाओं की पूर्णता के लिये सनातन धर्म की उपासना
पद्धति में अनेक देवी-देव मूर्तियाँ(स्वरूप)
हो सकते हैं, किन्तु कामनाओं के पार
निष्काम और मात्र प्रेमी-प्रेमास्पद ,
भक्त-भगवद् भाव में तो सभी भगवत्
तत्वों (स्वरूपों) में अभेद ही है।
भेदवादी अनुरक्त भक्त जन तो भगवती और भगवान् में भी भेद ही करते हैं ।यह भेदभाव उनकी अनुरक्ति का फल है अथवा अहंकार का यह वही जानें।लेकिन मेरी अपनी अन्तर्जगत् की यात्रा का दृष्टिकोण ये है कि कभी न कभी यदि अनुरागवश ऐसी भेददृष्टि है ,तो शीघ्र ही माँ उन्हें अभेद गति(ज्ञान)अवश्य ही देंगी।
लेकिन यदि अहं वशात् होगा तो जन्म
जन्मांतर में लम्बे अन्तराल के बाद भेददृष्टि समाप्त होगी।
त्रिदेवोपासना के क्रम में सृजन पालन और संहार हेतु तीन देवों और
देवियों की उपासना भक्त जगत् में प्रसिद्ध
ही है। किन्तु इनकी समूहालम्बनात्मक सृष्टि में ईश्वर का केवल दो ही स्वरूप एक
मातृरूप और दूसरा पितृरूप ही ठहरता है।
संस्कृत के सुकुमार महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध महाकाव्य रघुवंश में भगवान् शिव और पार्वती के एकत्व रूप की स्थापना कर दी है, जिसमें वह इन्हें जगत् के पिता-माता मानते हैं।साथ ही वे यह भी कहते हैं कि ये जगन्माता और पिता शब्द और अर्थ की तरह परस्पर सम्पृक्त हैं-
वागर्थौ इव सम्पृक्तौ,
वागर्थप्रतिपत्तये।
जगत: पितरौ वन्दे,
पार्वतीपरमेश्वरौ।।

यही अन्तर्दृष्टि समेटे मानसकार ने
गिरा-अरथ जलबीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न की अवतारणा कर दी है।इस मान्यता में भी शब्दार्थ को सीताराम माना गया है।किन्तु विशेषता यह है कि ये दोनों जल और जल की लहर मात्र हैं ,जिनका
अभेद तो अन्धा भी जानता है।
अर्थ: शम्भु: शिवा वाणी ।माता शिवा
शब्द हैं तो पिता शिव अर्थ।ऐसा वचन
लिंग पुराण का है।शिव में भी उसका इकार मातृ तत्व है तो शकार शम् यानी कि मंगल।वकार से समूल ब्रहाण्ड में उसकी व्याप्ति प्रतीत होती है।और कुल मिलाकर ऐसी शिव मान्यता में शिवाशिवयो: अभेद:
अर्थात् शिव ही शिवा हैं और शिवा ही शिव।
उपरि उक्त व्याख्यान में शिव को अर्थ और शिवा को शब्द तत्व कहा है।विचारें तो बात यह है कि किसी अर्थ को लेकर सृजित शब्द जैसे कि” कमल ” कमल को ही बताता है , किन्तु शब्द अपना शब्दत्व खोकर श्रोता बोद्धा को अर्थ के रूप में ही अवभासित होता है।
यदि अर्थ से भिन्न शब्द होगा तब वह उस कथ्य अर्थ की प्रतीति नहीं करा सकता।
वस्तुतः अर्थ अदृश्य है तो शब्द दृश्य।
शब्द का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता किन्तु अर्थ की आत्मिक अनुभूति मात्र।अतः यदि शब्द शरीर है, तब अर्थ उसकी आत्मा।
और लिपिगत होने पर ही शब्द दिखाई भी देता है, यदि यह शब्द लिपियों में न होकर केवल मात्र उच्चरित होता रहे तो यह भी अदृश्य ही रहेगा नेत्रेन्द्रिय द्वारा।और केवल और केवल आत्मा में ही अर्थ रूप में ही ग्राह्य होगा।
बद्धाकाश यानी कि शरीर के मुखेन्द्रिय द्वारा चला हुआ शब्द, मुक्ताकाश में चलते हुए पुनः बद्धाकाश श्रवणेन्द्रिय द्वारा अनन्त आत्माकाश द्वारा धारित और अनुभूत होता है। किन्तु यह तथ्य है कि अर्थ और शब्द अभिन्न ही हैं।
नाद, ध्वनि और शब्द की ओंकार से चली यह अनन्त महायात्रा निरन्तर अनुभूयमान है परमात्मा से आत्मा और आत्मा से परमात्मा की ओर ।कोई ओर छोर भी पता नहीं ,पता है तो केवल इस शब्दार्थ रूपी माता और पिता की और उनके अभेद रूप की।
जगद् व्यवहार में पिता-माता से उत्पन्न मूर्ति भी उससे अभिन्न ही होती है। और उत्पन्न सन्तानादि मूर्ति का सतत क्रम जागतिक परम्परा को अक्षुण्ण रखती है।
सामासिक रूप में शब्द रूप माँ और अर्थ रूप पिता के विना किसी कल्पना, भावना या ” भाव ” रूपी मूर्ति का सृजन एकदम असम्भव है। एकत्व से जन्मी यह भावमयी मूर्ति परमात्म तत्व या (महामाये
विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषी) परात्परा माँ
वस्तुतः एक और सर्वथा एक है। भाव की ऐसी शब्दार्थ धारा सर्वोच्च की सर्वोच्च साधना की सर्वोच्चता है।
न काष्ठे विद्यते देव:,
न पाषाणे न हिरण्मये।
भावे हि विद्यते देव:,
तस्माद् भावावलम्बनम्।।
और
भावेन लभते सर्वं,
भावेन देवदर्शनम्।
भावेन परमं ज्ञानं,
तस्माद् भावावलम्बनम्।।

इत्यादि रुद्रयामल तन्त्रोक्त वचनों का भाव साररूप में स्वीकारते हुए तथा वाह्यपूजाधमाधमा पर सम्यक् विधि निषेध
पालन का पारावार पार कर जाने वाले साधकों के लिए तो आत्म परमात्म तत्व अभिन्न रूप से एक ही है, चाहे वह मातृ शक्ति हो या पितृशक्ति ।
राम कृष्ण तू सीता व्रजरानी राधा इत्यादि वचनों का मर्म भी यही है।
अन्त में उस अनन्त सत्ता को
सर्वरुपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत् तथा
सियाराम मय सब जग जानी करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी ,नित्य सिद्ध स्वीकारते हुए सभी भगवद् भक्तों अभक्तों भी को प्रणाम निवेदित करते हुए वाणी लेती है।

।।हरिश्शरणम्।।

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विवेक से विरक्ति तक

कहत कठिन समझत कठिन
साधन कठिन विवेक ।
होइ घुनाक्षर न्याय ज्यों
पुनि प्रत्यूह अनेक ।।

गोस्वामी जी इस दोहे के द्वारा विवेक प्राप्ति की कठिनता की ओर संकेत करते हैं। सत्यासत्य का विचार ही विवेक है।
” ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या ” इसका दृढ विश्वास और अनुभव कि चराचर दृश्य जगत् स्वप्नवत् मिथ्या है।यह अव्यक्त उपासना के भाव से ही सिद्ध होता है।
वस्तुतः भक्तिभाव से ब्रह्मा शिव नारद सनकादि से निरन्तर सेव्यमान करुणानिधान भगवान साकेत लोकवासी
साकार निराकार पदवाच्य पूर्णकाम तारक- मन्त्र नाम श्री सीताराम जी को जानना ही विवेक है।
विवेक कहने में बहुत कठिन है।इस स्थूल जगत् में जिसमें कि चराचर मोहित है, मिथ्या कह कर समझा देना सरल कार्य नहीं है।और उसका समझना भी अत्यंत कठिन है। तब साधन की कठिनता का कहना ही क्या है।विरला ही पुरुष इसे पाता है। जैसे करोड़ों घुनों में कोई ही भाग्यशाली घुन होता है, जो लकड़ी को काटता हुआ ” राम ” नाम लिख कर मुक्ति पा जाता है ।
घुन लकड़ी के भीतर काट-काट कर भाँति-भाँति की चित्र विचित्र रचना करता है।यदि कभी ऐसा करते-करते उसके द्वारा
लकड़ी में रामनाम लिख जाता है तो वह
घुन सदा के लिये सांसारिक झंझटों से मुक्ति पा जाता है। यही घुणाक्षर न्याय है।
मनुष्य की दशा भी ऐसी ही है।
कोई -कोई विरले मनुष्य होते हैं ,जिन्हें
सन्त-भगवन्त कृपा से रामनाम अवलम्ब मिल जाता है, जिससे वह ब्रह्मज्ञान को पाकर नित्य मुक्त सिद्ध हो पाता है।
जगदम्बा पार्वती ने यह बात शिव के समक्ष रखी थी-

नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी।
कोउ एक होइ धरम व्रत धारी।।
धरमशील कोटिक महँ कोई।
विषय विमुख विरागरत होई।।
कोटि विरक्त मध्य श्रुति कहहीं।
सम्यक् ज्ञान सकृत कोइ लहहीं।।
ज्ञानवन्त कोटिक महँ कोई।
जीवन मुक्त सकृत जग होई।।
तिन सहस्र महँ सब सुख खानी।
दुर्लभ ब्रह्मलीन विज्ञानी ।।

इसलिये भगवत् शरणागति ही माया मुक्ति का एकमेव उपाय जानकर रामनमाश्रयी हो जाये-

सुर नर मुनि कोउ नाहिं ,
जेहि न मोह माया प्रबल
अस विचारि मन माहिं ,
भजिय सदा सीतारमन।।

।।हरिश्शरणम्।।

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भक्ति, सत्संग और सन्त

भक्ति ,सत्संग और सन्त शब्दों का अर्थ
क्रमशः सेवा, सत्य की संगति और सन्त महात्मा के रूप में ग्रहण किया जाता है।
किन्तु भक्ति को यदि भंग होने में ग्रहण करें तो उसका अर्थ होगा, शरीर संसार के मोह का भंग हो जाना।
और जब शरीर संसार से मोहभंग होगा तब सत् अर्थात् निरन्तर साथ रहने वाले
(परमात्मा) का संग स्वतः अनुभूयमान होने लगेगा।और भक्ति ,प्रीति और सेवा
परक होकर आत्मक्रीड आत्माराम बन कर सर्वानंद हो जाती है।
इसी तरह सन्त: पद संस्कृत भाषा में
” सत् ” (सत्य) शब्द का बहुवचन है।
और हिन्दी भाषा में सन्त रूप में व्यव-
हृत होता है, जिसका लोक सिद्ध अर्थ सरल साधु आदि ग्राह्य है। किन्तु मूल में जाने पर सत् को सतत या निरन्तर अर्थ में लेने पर ,निरन्तर सदा एक रूप रहनेवाला परमात्मा ही सिद्धार्थ निश्चित है।
कुल मिलाकर सभी एकार्थक निर्णीत हो जाते हैं।
वैसे भक्ति का पौराणिक नव स्वरूप भगवान् के गुणों का श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन,अर्चन ,वन्दन,दास्य और आत्मनिवेदन कहा गया है।
इनमें भगवन्नाम का संकीर्तन करने पर स्मरण तथा श्रवण भक्ति स्वत: बन पड़ती है।यह नाम कीर्तन कलिकाल में भव रोग का भेषज और तापत्रय हरने वाला है-

जासु नाम भव भेषज, हरन घोर त्रय शूल।
सो कृपालु मोहि तो पर सदा रहहु अनुकूल

भगवान् श्रीरामने श्रमणा शबरी को उपदेश करते समय नवधा भक्ति बखानी है-

इसमें सन्तों का संग, भगवत्कथा में रति,गुरु पदपंकज सेवा, हरि गुन गायन,
हरिनाम जप, इन्द्रिय निग्रह पूर्वक हरि स्मरण, प्रभुमय जगद्-दर्शन, परम सन्तोष पूर्वक परदोष अदर्शन, हरिविश्वास के कारण हर्ष-विषाद से दूरी को भक्ति का अलग-अलग सोपान बताया गया है।

सन्तों का संग सत्संग या भगवद्भक्त का संग प्राथमिक भक्ति है- प्रथम भगति सन्तन कर संगा ।और भगवान् की कथा को सुनने की वस्तुतः योग्यता ऐसे ही लोगों की है, जिन्हें सन्तसंग सोहता हो-

रामकथा के ते अधिकारी।
जिन्हके सतसंगति अति प्यारी।।
भगवान् शिव ने रामकथा को कलिमलमथनं स्वीकारा है और मन की मलिनता दूर करने का उपाय कहा है-

रामकथा गिरिजा मै बरनी।
कलिमल समनि मनोमल हरनी।।

सन्त महात्माओं ने गुरुभगवान् में ऐक्य स्वीकारते हुए गुरू पद पंकज सेवा को भक्ति माना ,जिसमें सेवक जीव की मुक्ति इसी भावना के अधीन है-

सेवक सेव्य भाव बिन
भव न तरिअ उरगारि।
भजहु राम पद पंकज
यह सिद्धांत बिचारि।।

इसी तरह एक भक्ति जो सर्वोच्च स्थान प्राप्त है,वह हरिनाम कीर्तन ही है और हो भी क्यों नहीं इस रसना(जिह्वा) की सार्थकता हरिभजन में जो है-

क्षणभंगुर जीवन की कलिका
कल प्रात को जाने खिली न खिली।
मलयाचल की शुचि शीतल मन्द
सुगन्ध समीर चली न चली।
कलि काल कुठार लिए फिरता
तन नम्र है चोट झिली न झिली।
भज ले हरिनाम अरी रसना
यह अन्त समय में हिली न हिली।

यह हरिनाम स्मरण भक्ति सत्संग प्रियता भी गुरुभगवान् की साक्षात् कृपा का ही परिणाम है ,किसी को भी रंच मात्र अहंकार नहीं करना चाहिए।और जिन्हें श्रीरामचरणों में रति हुई उनका काम मद क्रोधादि गल जाता है, वे सियाराम मय सब जग जानी हो जाते हैं, किसी से कोई विरोध भी नहीं करते-

उमा जे रामचरन रत
विगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत
केहि सन करहिं विरोध।।

भगवदुक्त सातवीं भक्ति में यही भाव भी है ,जिसमें भक्त को यत्र तत्र सर्वत्र अपने प्राणप्रिय भगवान ही दीखते हैं।
लेकिन भगवान अपने श्रीमुख से एक विशेष बात इस प्रसंग में कह जाते हैं वह ये है कि सन्त उनसे भी श्रेष्ठ हैं-

सातवँ सम मोहि मय जग देखा।
मो ते सन्त अधिकतर लेखा ।।

यह भाव भगवान् का वैसा ही प्रतीत होता है, जब भागवत्-पुराण प्रसंग में दुर्वासा से यहाँ तक कह देते हैं कि वे निरपेक्ष,शान्त,
निर्वैर,और समदर्शिता प्राप्त भक्तों के पीछ-पीछे चलते हैं, जिससे किसी तरह उन भक्त महात्माओं की चरण धूलि उन पर पड़े और वे पवित्र हो जायें।मतलब कि सन्त महात्मा उनसे बढ़कर हैं-

निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनूव्रजामि अहं नित्यं पूययेत्यंघ्रिरेणुभि:।।

सुखसन्तोष और जीवन में आनुकूल्य तभी प्राप्त है जब सत्संग सन्तसंग और सत्यस्वरूप भगवान् में रति हो जाये-

सत्संगति दुर्लभ संसारा।
निमिष दण्ड भरि एकौ बारा।।
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं।
सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं।।
राम भगति मनि उर बस जाके।
दुख लवलेश न सपनेहुँ ताके।।

यही बात अन्यत्र स्वीकारते हुए सन्त शिरोमणि स्वामी तुलसीदास जी भक्ति को अनुपम सुख का मूल और सम्पूर्ण गुणों का आकर मानते हैं, जिसे बिना सत्संग के प्राप्त करना असंभव है-

भगति तात अनुपम सुखमूला।
मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।
भक्ति स्वतंत्र सकल गुश खानी।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।।

अत: भक्त की प्रार्थना भगवान् से दैन्य ,दास्यभाव की प्राप्ति में पूर्ण होती है, क्योंकि ही दैन्य भाव के आचार्य एकमात्र भगवान् ही हैं और इस भाव से ही भवसिन्धु पार गमन संभव है- नाम लेत भव सिन्धु सुखाहीं। सुजन विचार करौं मन माहीं।
अन्त में मानसकार की दैन्य भक्ति से वाणी विराम लेती है ,भगवान् भक्ति का सातत्य बनाये रखें-

मो सम दीन न दीन हित ,
तुम्ह समान रघुवीर ।
अस विचारि रघुवंश मनि,
हरहु विषम भव- पीर।।

।।हरिश्शरणम्।।

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उपासक-उपास्य-उपासना

उपासक कौन है? जीवात्मा।
उपास्य कौन ? परमात्मा ।
उपासना क्या है? शरीर-संसार।
मतलब कि इस मनुष्य जीवात्मा का मनुष्यत्व इसमें है कि वह अपने उपास्य भगवान् की पूजा उसे प्राप्त शरीर-संसार के द्वारा करे।
शरीर के श्रवणेन्द्रिय से हरिकथा का श्रवण, त्वगिन्द्रिय से भगवत्-भागवत् मूर्तियों का स्पर्श, नेत्रेन्द्रिय से भगवद् रूपों का दर्शन, रसनेन्द्रिय(जिह्वा) द्वारा भगवन्
नाम कीर्तन का आस्वादन, और नासिका द्वारा समस्त सुगन्धित द्रव्यों में भगवद् गन्ध का आघ्राण ही इस मानव शरीर का अन्यतम ध्येय होना चाहिए। इस शरीर को संसार के विषयों के भोग में प्रयोग नहीं करना चाहिए।तात्पर्य ये कि संसार के समस्त शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादिकों को अपने अनन्य भगवान् में नियोजित करना चाहिए।
यह शरीर-संसार सब भगवत् प्रदत्त है, और हमेशा नित्य अपना भी नहीं है ,बल्कि यह कब किसका हुआ है कोई हमें बता दे? यह अस्थिर क्षणभंगुर अस्थाई नाशवान् और पराया है।
अतः शरीर संसार से प्रेम करने का मतलब है अनित्य से प्रेम करना जो हमारा न कभी रहा है और न कभी होगा अमृतवत् प्रतीयमान यह शरीर और संसार तो वस्तुतः विषतुल्य है जिसमें व्यर्थ ही कामिनी-कांचन में आसक्त हो हम मानव जीवन को औने-पौने में गवाँ देते हैं।

मन पछितैहैं अवसर बीते हरि पद भजु,
करम ,बचन अरु ही ते।सहसबाहु ,दसबदन आदि नृप बचे न काल बली ते।
हम हम करि धन धाम सँवारे, अन्त चले उठि रीते।
सुत बनितादि जानि स्वारथ रत ,न करु नेह सब ही ते।
अन्तहु तोहिं तजेगें पामर! तू न तजै अब ही ते ।
अब नाथहिं अनुरागु जागु जड़ ,त्यागु दुरासा जी ते।
बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ बिषय भोग बहु घी ते।

इत्यादि बातें अपनी विनयपाती में भक्त ने कही हो या ” नर तन पाइ विषय मन देहीं।
पलटि सुधा ते शठ विष लेहीं।उनके मानस में आया हो ,सभी तो संसार की असारता को पुष्टि ही करते हैं।
मलूकपीठाधीश्वर सद्गुरु राजेन्द्रदास जी महाराज ने ऐसा ही संकेत करते हुए एक दिन, भगवत्प्राप्त सन्त मलूकदास जी का वचन उद्धृत किया जिसमें शरीर -संसार के प्रति वैषयिक अनुराग हेतु मनुष्य को सावधान रहने की चेतावनी दी गई है-

दर्पण आगे ठाढ़ि ह्वै,
नित्य सँवारै पाग।
ऐसी देहियाँ देखि कै
चोंच सँवारै काग ।।
सुन्दर देही देखि कै,
उपजत है अनुराग।
मढ़ी न होती चाम जों,
तो जीवत खाते काग।।

भैया शरीर संसार की दशा ही ऐसी है इसलिए जो आपका कभी नहीं रहा ऐसे के प्रति अनुराग त्याग कर सर्वदा हर लोक में हर देश में हर वेश में अपने साथ रहनेवाले और कभी अपना साथ न छोड़नेवाले एकमात्र भगवान् से प्रेम करना श्रेष्ठ है। देहाभिमान त्याग कर अनमोल मानव जीवन को इधर उधर में व्यर्थ नहीं गँवायें-

कबीवाणी है-
जब मैं था तब हरि नहीं,
अब हरि हैं मै नाहिं।
प्रेम गली अति साँकरी,
ता मैं दोउ न समाहिं।।
रात गँवाई सोइ के,
दिवस गँवाया खाय।
हीरा जनम अमोल सा,
कौड़ी बदले जाय ।।

इसलिए भगवन्नाम का जिह्वा पर और हृदय में आश्रयण संसार सागर से पार उतारने वाला है।यह भगवान् ही अपने हैं और उनकी भक्ति ही सार्वत्रिक सुख का आस्पद है, जो सद्गुरु की कृपा से प्राप्य है- भक्त की यही मान्यता है-

राम भगति मनि उर बस जाके।
दुख लवलेश न सपनेहुँ ताके।।
तात भगति अनुपम सुख मूला।
मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।

और बात तो ये है कि अपने अनन्य और नित्य आश्रय भगवान् का भक्त उनसे बार बार यही माँगता है कि उसे चाहे अग्नि में जला दिया जाये ,जल में डुबा दिया जाये चाहे शूल पर चढ़ा दिया जाये विष ,बिच्छू, सर्प,हाथी, सिंह, शस्त्र से संत्रास दिया जाये,किन्तु उसे इन सभी का नाम मात्र भी कष्ट नहीं होगा, कष्ट तब होगाऔर भयंकर कष्ट होगा, जब किसी भक्त विमुख का मुख दीख जायेगा।
” भक्तमाल” की रसबोधिनी टीका के कर्ता परम भागवत प्रियादास जी कुछ ऐसा ही विचार है।उन्ही के शब्दों में-

अगिनि जरावो लैके जल में बुड़ावौ
भावै सूली पै चढावौ घोरि गरल पियायबी।
बीछू कटवावौ कोटि साँप लपटावौ,हाथी
आगे आगे डरवावौ ईति भीति उपजायबी।
सिंह पै खवावौ चाहे भूमि गड़वावौ तीखी,
अनी बिधवावौ मोहिं दुख नहीं पायबी ।
ब्रजजन प्रान कान्ह बात यह कान करौ
भक्त सों विमुख ताको मुख न दिखायबी।।

इसलिए मानव द्वारा सदा सर्वदा साथ नहीं त्यागने वाले भगवान् में आश्रयानुराग पूर्वक प्रेम और बारम्बार साथ छूटने वाले संसार का त्यागपू्र्वक विराग ही सार तत्व है। यही उपास्य -उपासक-उपासना का उपनिषद् है। भक्त की दृष्टि में निरन्तर भगवान् का स्मरण ही सम्पाद्य सम्पत्ति और सुख है, जबकि विस्मरण ही दुख है
” विपद् विस्मरणं विष्णोः सम्पन्नारायण-
स्मृति: ” इत्यादि भागवद् वचन से वाणी विराम लेती है।

।।हरिश्शरणम्।।

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द्वारिका पुरी गुजरात से श्रीमद्भागवत कथा

कल्याणानां निधानं कलिमलमथनं
पावनं पावनानाम् ।
पाथेयं यन् मुमुक्षो: सपदिपरपदप्राप्तये
प्रस्थितस्य।
विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं
सज्जनानानाम्।
बीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां
भूतये रामनाम।
-हनुमन्नाटक

द्वारिका पुरी गुजरात से श्रीमद्भागवत कथा
सत्संग कथामृत का पान कराते हुए श्रीमन् मलूक पीठ के अधिपति श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज ने उक्त सुन्दर सा श्लोक उद्धृत किया। पद्य में नाम महिमा का बड़ा हृदस्पर्शी चित्रण किया गया है।
कहते हैं इस नाट्य काव्य के कर्ता स्वयं हनुमानजी ही हैं। ग्रन्थ के प्रारम्भ में मंगल पद्य के रूप में यह उद्धृत है –

भगवान् श्री राम का नाम कल्याण का एकमात्र कोश(निधान) है। संसार के अन्य सभी साधन -सेवा कार्यों में यदि रामनाम का स्मरण उच्चारण होता रहे तो वह सभी साधन अवश्य ही सिद्धिदायक होंगे।अन्यथा की स्थिति में साधनसेवा में अहंभाव आ जाता है और यह बहुत बड़ा अपराध बनता है।अतः संसार के समस्त कार्यों को हरिनाम स्मरण पूर्वक करना चाहिए जिसमें देहाभिमान नहीं होगा और साथ ही कार्य भी सिद्ध होगा।
इसे कलिमलमथनं कहा गया ,मतलब कि यह कलिकाल के समस्त मालिन्य रूप पाप तापों को नष्ट करनेवाला है। कलियुग केवल नाम अधारा सुमिरि सुमिरि नर उतरैं पारा।
यह पावनं पावनानां है। पावनों को भी पावन पवित्र करनेवाला है। जो पावन है उसे भी पावन करनेवाला अर्थात् जप-तप पूजा-पाठादि शुभ कर्मों को कदाचित् सभी विघ्नों अन्तरायों से बचाने वाला है श्री राम का नाम।
पाथेयं यन् मुमुक्षो: अर्थात् मोक्ष पथ के अनुगामी लोगों के लिये यह पाथेय(रास्ते में लिया जानेवाला भोज्य) है।
कोई भी राहगीर जब चलता है तब रास्ते में शुद्ध पवित्र खाद्य रूप में पाथेय(अल्पाहार) अवश्य लेकर चलता है।
यह पाथेय जैसे मार्ग को सुगम और सिद्धि दायक बनाता उसी तरह मोक्ष मार्ग पर चलने वाले लोगों के लिए रामनाम पाथेय है जिससे लक्ष्य प्राप्ति अवश्य ही होती है।

यह सारे श्रेष्ठ कवियों का एकमात्र विश्रामस्थान है जहाँ आश्रय लेकर सभी कविजनों की वाणी पवित्र हो जाती है।
यह सज्जनों का जीवन भी है। सज्जन कौन हैं? जो रामनमाश्रयी है वही सज्जन कहलाने का अधिकारी भी है अन्यथा नहीं। सुन्दर काण्ड में सन्देह का निराकरण राम नाम से ही होता है।
लंका निशिचर निकर निवासा ।
इहाँ कहाँ सज्जन करि बासा।।

जब हनुमानजी महराज को सन्देह होता है कि यहाँ राक्षसों के बीच सज्जन कहाँ से आ गया, तब वह राम नाम ही जिसने सारे सन्देह का निराकरण कर दिया है।

राम नाम तेहिं सुमिरन कीन्हा ।
हृदय हरषि तेहिं सज्जन चीन्हा।।

जिसने रामनाम स्मरण किया है , वही सज्जन है, ऐसा हर्ष श्री हनुमानजी महाराज को होता है।अतः यह नाम स्मरण सज्जनों का प्राण(जीवन) होने से, सज्जन पुरुष का प्रमाणपत्र बन जाता है।इसलिए का कि- जीवनं सज्जनानाम् ।
यह धर्म रूपी वृक्ष का बीज है।मतलब कि जिस प्रकार बीज के बिना वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति और पोषण संवर्धन की कोई संभावना नहीं है ,उसी प्रकार राम नाथ के बिना धर्म की कल्पना नहीं की सकती।
अन्तिम कड़ी में कहते हैं कि-
प्रभवतु भवतां भूतये रामनाम
अर्थात् यह रामनाम आप सभी सज्जनों के अभूतपूर्व प्रभूत भूति-कल्याण की सिद्धि में सर्वथा समर्थ है।
इसलिये भैया ! राम नाम संकीर्तन सभी को, मानवमात्र को अवश्य कर्तव्य है ।इसी स्मरण के द्वारा हनुमानजी महाराज ने भगवान् को अपने वश में कर रखा था-

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।
अपने बस करि राखे रामू।।

अन्त में हरि अनन्त हरिकथा अनन्ता का स्मरण करते हुए गुरु नानक देव की नाम निष्ठ वाणी से वाणी विराम लेती है-

नाम लिया सब कुछ लिया सकल शास्त्र का भेद।
बिना नाम नरके गया पढ़ि पढ़ि चारिउ वेद।

।।हरिश्शरणम्।।

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