उपासक-उपास्य-उपासना

उपासक कौन है? जीवात्मा।
उपास्य कौन ? परमात्मा ।
उपासना क्या है? शरीर-संसार।
मतलब कि इस मनुष्य जीवात्मा का मनुष्यत्व इसमें है कि वह अपने उपास्य भगवान् की पूजा उसे प्राप्त शरीर-संसार के द्वारा करे।
शरीर के श्रवणेन्द्रिय से हरिकथा का श्रवण, त्वगिन्द्रिय से भगवत्-भागवत् मूर्तियों का स्पर्श, नेत्रेन्द्रिय से भगवद् रूपों का दर्शन, रसनेन्द्रिय(जिह्वा) द्वारा भगवन्
नाम कीर्तन का आस्वादन, और नासिका द्वारा समस्त सुगन्धित द्रव्यों में भगवद् गन्ध का आघ्राण ही इस मानव शरीर का अन्यतम ध्येय होना चाहिए। इस शरीर को संसार के विषयों के भोग में प्रयोग नहीं करना चाहिए।तात्पर्य ये कि संसार के समस्त शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादिकों को अपने अनन्य भगवान् में नियोजित करना चाहिए।
यह शरीर-संसार सब भगवत् प्रदत्त है, और हमेशा नित्य अपना भी नहीं है ,बल्कि यह कब किसका हुआ है कोई हमें बता दे? यह अस्थिर क्षणभंगुर अस्थाई नाशवान् और पराया है।
अतः शरीर संसार से प्रेम करने का मतलब है अनित्य से प्रेम करना जो हमारा न कभी रहा है और न कभी होगा अमृतवत् प्रतीयमान यह शरीर और संसार तो वस्तुतः विषतुल्य है जिसमें व्यर्थ ही कामिनी-कांचन में आसक्त हो हम मानव जीवन को औने-पौने में गवाँ देते हैं।

मन पछितैहैं अवसर बीते हरि पद भजु,
करम ,बचन अरु ही ते।सहसबाहु ,दसबदन आदि नृप बचे न काल बली ते।
हम हम करि धन धाम सँवारे, अन्त चले उठि रीते।
सुत बनितादि जानि स्वारथ रत ,न करु नेह सब ही ते।
अन्तहु तोहिं तजेगें पामर! तू न तजै अब ही ते ।
अब नाथहिं अनुरागु जागु जड़ ,त्यागु दुरासा जी ते।
बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ बिषय भोग बहु घी ते।

इत्यादि बातें अपनी विनयपाती में भक्त ने कही हो या ” नर तन पाइ विषय मन देहीं।
पलटि सुधा ते शठ विष लेहीं।उनके मानस में आया हो ,सभी तो संसार की असारता को पुष्टि ही करते हैं।
मलूकपीठाधीश्वर सद्गुरु राजेन्द्रदास जी महाराज ने ऐसा ही संकेत करते हुए एक दिन, भगवत्प्राप्त सन्त मलूकदास जी का वचन उद्धृत किया जिसमें शरीर -संसार के प्रति वैषयिक अनुराग हेतु मनुष्य को सावधान रहने की चेतावनी दी गई है-

दर्पण आगे ठाढ़ि ह्वै,
नित्य सँवारै पाग।
ऐसी देहियाँ देखि कै
चोंच सँवारै काग ।।
सुन्दर देही देखि कै,
उपजत है अनुराग।
मढ़ी न होती चाम जों,
तो जीवत खाते काग।।

भैया शरीर संसार की दशा ही ऐसी है इसलिए जो आपका कभी नहीं रहा ऐसे के प्रति अनुराग त्याग कर सर्वदा हर लोक में हर देश में हर वेश में अपने साथ रहनेवाले और कभी अपना साथ न छोड़नेवाले एकमात्र भगवान् से प्रेम करना श्रेष्ठ है। देहाभिमान त्याग कर अनमोल मानव जीवन को इधर उधर में व्यर्थ नहीं गँवायें-

कबीवाणी है-
जब मैं था तब हरि नहीं,
अब हरि हैं मै नाहिं।
प्रेम गली अति साँकरी,
ता मैं दोउ न समाहिं।।
रात गँवाई सोइ के,
दिवस गँवाया खाय।
हीरा जनम अमोल सा,
कौड़ी बदले जाय ।।

इसलिए भगवन्नाम का जिह्वा पर और हृदय में आश्रयण संसार सागर से पार उतारने वाला है।यह भगवान् ही अपने हैं और उनकी भक्ति ही सार्वत्रिक सुख का आस्पद है, जो सद्गुरु की कृपा से प्राप्य है- भक्त की यही मान्यता है-

राम भगति मनि उर बस जाके।
दुख लवलेश न सपनेहुँ ताके।।
तात भगति अनुपम सुख मूला।
मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।

और बात तो ये है कि अपने अनन्य और नित्य आश्रय भगवान् का भक्त उनसे बार बार यही माँगता है कि उसे चाहे अग्नि में जला दिया जाये ,जल में डुबा दिया जाये चाहे शूल पर चढ़ा दिया जाये विष ,बिच्छू, सर्प,हाथी, सिंह, शस्त्र से संत्रास दिया जाये,किन्तु उसे इन सभी का नाम मात्र भी कष्ट नहीं होगा, कष्ट तब होगाऔर भयंकर कष्ट होगा, जब किसी भक्त विमुख का मुख दीख जायेगा।
” भक्तमाल” की रसबोधिनी टीका के कर्ता परम भागवत प्रियादास जी कुछ ऐसा ही विचार है।उन्ही के शब्दों में-

अगिनि जरावो लैके जल में बुड़ावौ
भावै सूली पै चढावौ घोरि गरल पियायबी।
बीछू कटवावौ कोटि साँप लपटावौ,हाथी
आगे आगे डरवावौ ईति भीति उपजायबी।
सिंह पै खवावौ चाहे भूमि गड़वावौ तीखी,
अनी बिधवावौ मोहिं दुख नहीं पायबी ।
ब्रजजन प्रान कान्ह बात यह कान करौ
भक्त सों विमुख ताको मुख न दिखायबी।।

इसलिए मानव द्वारा सदा सर्वदा साथ नहीं त्यागने वाले भगवान् में आश्रयानुराग पूर्वक प्रेम और बारम्बार साथ छूटने वाले संसार का त्यागपू्र्वक विराग ही सार तत्व है। यही उपास्य -उपासक-उपासना का उपनिषद् है। भक्त की दृष्टि में निरन्तर भगवान् का स्मरण ही सम्पाद्य सम्पत्ति और सुख है, जबकि विस्मरण ही दुख है
” विपद् विस्मरणं विष्णोः सम्पन्नारायण-
स्मृति: ” इत्यादि भागवद् वचन से वाणी विराम लेती है।

।।हरिश्शरणम्।।

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द्वारिका पुरी गुजरात से श्रीमद्भागवत कथा

कल्याणानां निधानं कलिमलमथनं
पावनं पावनानाम् ।
पाथेयं यन् मुमुक्षो: सपदिपरपदप्राप्तये
प्रस्थितस्य।
विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं
सज्जनानानाम्।
बीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां
भूतये रामनाम।
-हनुमन्नाटक

द्वारिका पुरी गुजरात से श्रीमद्भागवत कथा
सत्संग कथामृत का पान कराते हुए श्रीमन् मलूक पीठ के अधिपति श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज ने उक्त सुन्दर सा श्लोक उद्धृत किया। पद्य में नाम महिमा का बड़ा हृदस्पर्शी चित्रण किया गया है।
कहते हैं इस नाट्य काव्य के कर्ता स्वयं हनुमानजी ही हैं। ग्रन्थ के प्रारम्भ में मंगल पद्य के रूप में यह उद्धृत है –

भगवान् श्री राम का नाम कल्याण का एकमात्र कोश(निधान) है। संसार के अन्य सभी साधन -सेवा कार्यों में यदि रामनाम का स्मरण उच्चारण होता रहे तो वह सभी साधन अवश्य ही सिद्धिदायक होंगे।अन्यथा की स्थिति में साधनसेवा में अहंभाव आ जाता है और यह बहुत बड़ा अपराध बनता है।अतः संसार के समस्त कार्यों को हरिनाम स्मरण पूर्वक करना चाहिए जिसमें देहाभिमान नहीं होगा और साथ ही कार्य भी सिद्ध होगा।
इसे कलिमलमथनं कहा गया ,मतलब कि यह कलिकाल के समस्त मालिन्य रूप पाप तापों को नष्ट करनेवाला है। कलियुग केवल नाम अधारा सुमिरि सुमिरि नर उतरैं पारा।
यह पावनं पावनानां है। पावनों को भी पावन पवित्र करनेवाला है। जो पावन है उसे भी पावन करनेवाला अर्थात् जप-तप पूजा-पाठादि शुभ कर्मों को कदाचित् सभी विघ्नों अन्तरायों से बचाने वाला है श्री राम का नाम।
पाथेयं यन् मुमुक्षो: अर्थात् मोक्ष पथ के अनुगामी लोगों के लिये यह पाथेय(रास्ते में लिया जानेवाला भोज्य) है।
कोई भी राहगीर जब चलता है तब रास्ते में शुद्ध पवित्र खाद्य रूप में पाथेय(अल्पाहार) अवश्य लेकर चलता है।
यह पाथेय जैसे मार्ग को सुगम और सिद्धि दायक बनाता उसी तरह मोक्ष मार्ग पर चलने वाले लोगों के लिए रामनाम पाथेय है जिससे लक्ष्य प्राप्ति अवश्य ही होती है।

यह सारे श्रेष्ठ कवियों का एकमात्र विश्रामस्थान है जहाँ आश्रय लेकर सभी कविजनों की वाणी पवित्र हो जाती है।
यह सज्जनों का जीवन भी है। सज्जन कौन हैं? जो रामनमाश्रयी है वही सज्जन कहलाने का अधिकारी भी है अन्यथा नहीं। सुन्दर काण्ड में सन्देह का निराकरण राम नाम से ही होता है।
लंका निशिचर निकर निवासा ।
इहाँ कहाँ सज्जन करि बासा।।

जब हनुमानजी महराज को सन्देह होता है कि यहाँ राक्षसों के बीच सज्जन कहाँ से आ गया, तब वह राम नाम ही जिसने सारे सन्देह का निराकरण कर दिया है।

राम नाम तेहिं सुमिरन कीन्हा ।
हृदय हरषि तेहिं सज्जन चीन्हा।।

जिसने रामनाम स्मरण किया है , वही सज्जन है, ऐसा हर्ष श्री हनुमानजी महाराज को होता है।अतः यह नाम स्मरण सज्जनों का प्राण(जीवन) होने से, सज्जन पुरुष का प्रमाणपत्र बन जाता है।इसलिए का कि- जीवनं सज्जनानाम् ।
यह धर्म रूपी वृक्ष का बीज है।मतलब कि जिस प्रकार बीज के बिना वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति और पोषण संवर्धन की कोई संभावना नहीं है ,उसी प्रकार राम नाथ के बिना धर्म की कल्पना नहीं की सकती।
अन्तिम कड़ी में कहते हैं कि-
प्रभवतु भवतां भूतये रामनाम
अर्थात् यह रामनाम आप सभी सज्जनों के अभूतपूर्व प्रभूत भूति-कल्याण की सिद्धि में सर्वथा समर्थ है।
इसलिये भैया ! राम नाम संकीर्तन सभी को, मानवमात्र को अवश्य कर्तव्य है ।इसी स्मरण के द्वारा हनुमानजी महाराज ने भगवान् को अपने वश में कर रखा था-

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।
अपने बस करि राखे रामू।।

अन्त में हरि अनन्त हरिकथा अनन्ता का स्मरण करते हुए गुरु नानक देव की नाम निष्ठ वाणी से वाणी विराम लेती है-

नाम लिया सब कुछ लिया सकल शास्त्र का भेद।
बिना नाम नरके गया पढ़ि पढ़ि चारिउ वेद।

।।हरिश्शरणम्।।

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धैर्य से आत्मानुभूति

त्याज्यं न धैर्यं विधुरपि काले
धैर्यात् कदाचित् स्थितिमाप्नुयात् स:
जाते समुद्रेपि हि पोतभंगे
सांयांत्रिको वांछति तर्तुमेव

कठिन से भी कठिन परिस्थितियों में मनुष्य को अपना धैर्य (सम्बल)नहीं छोड़ना चाहिए।समुद्र में नौका टूट जाने पर भी जहाज का चालक साहस और हिम्मत से उसमें से तैर कर पार करने की हर सम्भव चेष्टा करता है और पार भी कर जाता है।अतः धैर्य नहीं खोयें।
मानव जीवन भी इसी नाविक की तरह है, जहाँ संसार-सागर को पार करने हेतु दृढ इच्छा शक्ति, आत्मसम्बल और अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है।
और उपर्युक्त गुणों की अनुभूति मानवीय शरीर में /से ही सम्भव लगता है।
आखिर मानव जीवन ही संवेदनशीलता ,संभावना वलितता, पश्चात् ताप अनुतप्तता,सृष्टि के कण -कण की अभिज्ञान वेदनीयता से साक्षात् संयुक्त होता है।
यही आत्म(स्व ) और परात्म(परस्व) का आत्मालोचन ही तो है एक संवेदनशील मानव जीवन।
दूसरे शब्दों में अपनी और अन्यों की पहचान में जीवन के उत्स की उपासना का आजीवन तप:पूत जीवन ,मनुष्य का जीवन है।
और नहीं तो वैदिक ऋषियों का यह उद्घोष कैसे होता –

शतं पश्येम शरद: शतं जीवेम शरद:शतं शृणुयाम शरद: प्रब्रवाम शरद:शतम्।

सैकड़ों वर्षों तक बोलने सुनने समझने जानने और नीरोग जीवन जीने की आकांक्षा मानवीय वृत्ति-प्रवृत्ति में उसके अन्तस् में अनुभूयमान उसकी परमात्म शक्ति की आत्मवेदना द्वारा होता है, जिसके लिये धैर्य एक अनिवार्य गुण है।

यह धैर्य ही है, जिससे आत्मानुभूति का भी मार्ग प्रशस्त होता है, मानव शरीर का चरम और परम लक्ष्य है।क्योंकि लक्ष्य हीन जीवन(मानव जीवन) भटकाव और पुनः पुनः टूट-फूट अस्त-व्यस्त और अन्न की तरह पकने ,गिरने उदय-अस्त होने में चलता रहता है , पूर्णता प्राप्ति हेतु संघर्ष रह कर भी अपूर्ण ही रहता है, जिसके लिए शायद सत्य, प्रेम, करणा, दया और क्षमा अनिवार्य है।
सत्य, प्रेम, करुणा, दया और क्षमा की क्षमता का उदय होने पर नैतिक-मूल्यों के जीवन की दृढ आधार शिला नीचे बिछी दीखती है और हम ” मनुर्भव” के ऋषि सन्देश को अपनाते हुए मनुष्य तो बन पाने की और अग्रसर होते हैं, नहीं तो हम प्रोफेसर और न जाने क्या-क्या हैं, मनुष्य नहीं।

हमारी ऋषि-परम्परा हमें मानवीय मूल्यों गुणों से जोड़े इसी विश्वास के साथ विचार परम्परा का एक पड़ाव पूरा हुआ।

।।हरिश्शरणम्।।

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धर्मजीवन का सूत्र है शील

धर्म युक्त जीवन का मूल स्रोत , शील में दिखाई देता है या यों कहें कि शील ही धर्म है। दूसरे शब्दों में जिन्होंने “शील ” को अपना जीवन धर्म स्वीकार कर लिया ,वे ही मनुष्य कहलाने के सच्चे अधिकारी हैं।
इस शील शब्द के आत्मा में प्रवेश करके अर्थानुसन्धान करने पर , यह सत्य , ऋत , स्वभाव, चरित्र ,निष्ठा तथा
आचरण आदि अर्थों में प्रयुक्त दिखाई देता है।
” शीलं स्वभावे सद्वृत्ते ” कह कर अमर कोशकार अमरसिंह इसे पुष्ट करते दीखते हैं।और यही अर्थ सर्वत्र अप्रमाद रूप से प्रयुक्त दीखता है।
यह स्वभाव क्या है , अपना भाव या आत्मभाव। आत्मभाव या आत्मा का भाव और आत्मा तो गुणों से परे है।
किन्तु शरीर को अधिष्ठान बनाने वाला आत्मा जब , आत्मनिष्ठ होकर विचार करता है, तब धारण किये गये मनुष्य शरीर और की चरित्र की चरितार्थता समझ में आती है।
मनुष्य का चरित्र उसका सद्वृत्त है , जिसका साक्षात् सम्बन्ध उसके सत्य आचरण को परिलक्षित करता है।
” आचार: परमो धर्म: ” आचार: प्रथमो धर्म: ” नास्ति सत्यात् परो धर्म:” इत्यादि वचनों से आचरण को परम धर्म मानते हुए सत्य -शील -सदाचार ही मनुष्य को मनुष्य बनाने वाले गुण सिद्ध होते हैं।
और इसीलिए इण्टरमीडिएट में पढ़ी गई एक बात सत्य प्रतीत हुई थी, जो कि सरदार पूर्णसिंह के निबन्ध में मिली थी वह ये कि सभ्यता का आचरण ही ” आचरण की सभ्यता” है ।
जो लोग सदाचारनिष्ठ जीवन व्यतीत करते हैं , वही स्व स्वभाव में रहते हैं ,उन्हीं का जीवन धर्ममय है अथवा वे ही शीलवान् और चरित्रशाली हैं। शीलवान् व्यक्ति का जीवन ही वस्तुतः संयमित मनुष्य का जीवन हैऔर धन्यजीवन है ।

जिसके शरीर में सर्वप्रिय “शील ” की विद्यमानता है ,उसके लिए अग्नि भी शीतल जल के समान, समुद्र छोटे से स्रोत के समान, सुमेरु पर्वत भी तत्क्षण छोटी सी शिला के समान , मृगपति सिंह तो चंचल मृग के समान, सर्प मनोहर माला के समान और विषरस भी अमृतवर्षा के समान बन जाता है –

वह्नि: तस्य जलायते जलनिधि: कुल्यायते तत्क्षणात्।
मेरु: स्वल्पशिलायते मृगपति: सद्यः कुरंगायते।
व्यालो माल्यगुणायते विषरस: पीयूषवर्षायते।
यस्यांगेखिल- लोकवल्लभतमं शीलं समुन्मीलति।।
योगिराज और महाराज भर्तृहरि के इन्हीं जीवनमूल्य गत सुविचारों के साथ यह विचार परिचर्चा विराम लेती है।
भगवान् सहायक हों।

।।हरिश्शरणम्।।

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व्यष्टि और समष्टि

आत्म का समुच्चय होने पर समष्टि दीखती है।और समष्टि का अनुभव होने पर व्यष्टि तिरोहित हो जाता है।

व्यष्टि और समष्टि मानवीय जीवन की विचित्र पहेली बनी हुई है। यह बड़ा अद्भुत द्वन्द्व है जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सतत अनुभूत हो रहा है। इसी के झंझावात में अनेक शरीरों का संचित संस्कार ,मानव मन को उड़ाये जा रहा है और खोज रहा है शान्ति , आनन्द के अविचल उत्स को जहाँ जाकर इन सबसे मुक्ति मिल सके।
पर विडम्बना क्या है कि आनन्द की खोज का पथिक मानव बार -बार जिसे पाकर विश्रांति चाहता है, वह उससे कहीं दूर होता चला जाता है।
लगता है उसका कुछ खो गया है, जिसे खोजने का प्रयास जारी है ।
वह है क्या जिसे पाने के लिये सतत संघर्ष हो रहा है ।
इसके मूल में जाने पर यह भी लगता है कि ,जो अभी उपयोगी है ,वही दूसरे क्षण अनुपयोगी हो जाता है।फिर नये की तलाश और उसे पाकर भी ठहराव नहीं होता । द्वन्द्वों को नियति मानता चलता जाता है, उसी सुख को खोजते लेकिन मिलता नहीं उसे मन माफिक जिसे पाकर, कुछ भी पाना शेष न रहे।
यही जीवन के अन्तर्जगत् की रहस्यमयी यात्रा है ,जिसका अन्तिम पड़ाव पाने में अनेक जन्म खोने पड़ते हैं।
आखिर वह रास्ता क्या है जिस पर चल कर हमारी यात्रा पूर्ण हो जाय , तो वैचारिक संघर्ष , स्वयं अपने में , अपने पर , आकर टिकता है , क्योंकि यही पूर्ण जो स्वयं में ठहरा।
सारी समस्या के जड़ में स्पष्ट रूप से व्यष्टि को समष्टि से अलग देखने की है।
यही द्वैत है , जिसने अद्वैत को उत्पन्न किया है ।और जब सबको अभिन्न, अखण्ड ,आत्मीय, अनन्त स्वरूप में देखने की दृष्टि दृढतर हो जाती है तभी आनन्द असीम की उपलब्धि स्वतः सिद्ध प्रतीत होती है।
सारा जगत् परिवार वत् दृष्टिगोचर होने लगता है , मैं मिट जाता है,सारभेद समाप्त होता है जहाँ से, अभेद प्रारम्भ होता है वहीं से।
सनातन देश की सनातन परंपरा के सनातन ऋषियों की सनातन वाणी प्रवहमान हो उठती है-

अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

सारी धरती हमारे लिए कुटुम्ब दीखती है ,जब आनन्द का अविरल अविराम प्रवाह निष्यन्द बहने लगता है तब।

।।हरिश्शरणम्।।

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भक्ति

भक्ति ईश्वर के प्रति परमप्रेमस्वरूप है।अमृतस्वरूप है।उसकी प्राप्ति से मनुष्य सिद्ध बनता है अमरत्व प्राप्त करता है और परम तृप्ति का अनुभव करता है।इसे पाकर मनुष्य और किसी की आकांक्षा नहीं करता।किसी के लिए शोक नहीं करता।किसी से द्वेष भी नहीं करता।अन्य विषयों में नहीं रमता तथा किसी सांसारिक विषय में उत्साहित नहीं होता।उसे जानने पर मस्त और स्तब्ध हो जाता है ।आत्माराम हो जाता है।
यह बात मैं नहीं कह रहा मैं तो अनुभोक्तामात्र हूँ। देवर्षिनारद अपने भक्तसूत्र में –

” सा तु अस्मिन् परमप्रेमस्वरूपा ।अमृतरूपा च।यत् लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति।यत् प्राप्य न किंचिद् वांछति , न शोचति न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साही भवति।यज् ज्ञात्वा मत्तो भवति, स्तब्धो भवति।आत्मारामो भवति ।”
परमहंस रामकृष्ण देव कहते थे-
” यह जगत् एक विशाल पागलखाना है।यहाँ तो सभी पागल हैं- कोई रूपयों के लिए, कोई स्त्रियों के लिए, कोई नाम और यश के लिए।कुछ मनुष्य ऐसे हैं, जो ईश्वर के लिए पागल हैं।अन्यान्य वस्तुओं के लिए पागल न होकर ईश्वर के लिए पागल होना क्या अच्छा नहीं है? ”
ईश्वरीय अनुभूति होती ही है अपने स्वयं के स्वरूप को वस्तुतः जान लेने के बाद और यही भक्ति की परिभाषा है-
” स्वस्वरुपावगति: भक्ति : ”
इसको किसी कामना की की पूर्ति का साधन नहीं बनाया जा सकता।
यह भक्ति तो समस्त कामनाओं और वासनाओं के निरोध का कारणस्वरूप है।
” सा न कमयमाना निरोधरूपत्वात् ”

भक्तिसूत्र के तृतीय अनुवाक् में बात आती है – ” जब समस्त चिन्ताएँ ,इन्द्रियों की क्रियायें और समस्त कर्म उनके प्रति अर्पित हो जाते हैं और क्षणमात्र के लिए भी उनकी विस्मृति हृदय में परम व्याकुलता उत्पन्न कर देती है ,तभी यथार्थ भक्ति का उदय समझना चाहिये। ”
“नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता तद्विस्मरणे परमव्याकुलितेति। ”
-ना . भ . अनुवाक् 3 , सू. 19 ।

भक्ति का यह स्वरूप ही , प्रेम की सर्वोच्च अवस्था है ,क्योंकि अन्यान्य साधारण प्रेम में प्रेमी , अपने प्रेमास्पद से प्रेम का प्रतिदान चाहता है , किन्तु सच्चा भक्त अपने प्रेम में केवल उनके सुख से ही सुखी होता है।
मीरा और भगवदासक्ता गोपिकाएँ ,इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।
और जब सभी आश्रयों को छोड़कर चित्त उनके (ईश्वर के ) प्रति आसक्त होता है, तब उससे प्रतिकूल सभी विषयों से उदासीनता हो जाती है।और यही यथार्थत्वेन भक्ति का स्वरूप ठहरता है-

” निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यास: ।
तस्मिन् अनन्यता तद् विरोधिषु च
उदासीनता । ” ना.भ.सू .2/8-9 ।

ऐसे भक्त जहाँ रहते हैं, वह स्थान तीर्थ बन जाता है।वे जो कहते हैं शास्त्र हो जाता है, वे जो कुछ कार्य करते हैं ,वही सत्कर्म समझा जाता है।
” तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि।सुकर्मीकुर्वन्ति कर्माणि।सत् शास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि।तन्मया : । ”
और ऐसे भक्तों में जाति, कुल, विद्या,रूप,धन आदि का भेद नहीं रहता ,क्योंकि वे उनके (ईश्वर के)हैं।
सूर-कबीर-तुलसी-मीरा-रैदास आदि के चरित्र इसके प्रबल मानदण्ड हैं।
भक्तिसूत्र के नवम अनुवाक् में इसकी चर्चा इस प्रकार आई है –
” नास्ति तेषु जाति – विद्या -रूप -कुल -धन – क्रियादि – भेद:

।।हरिश्शरणम् ।।

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सत्संग

सत् अर्थात् , जो अपरिवर्तनीय, नित्य, सदैव एक रूप और निरन्तर है, उसका संग , यानी कि उसके साथ सम्यक् गमन करना। यही सत्संग है।
कोई ऐसा तत्व, जो कभी भी नहीं बदलता ,नित्य निरन्तर और एक रूप है, वह ,केवल परमात्मा ही है।उसी का संग करना,यदि सत्संग है, तब वह तो चेतन रूप से सभी जीवों में विद्यमान ही है।
अब प्रश्न यह है कि, वह नित्य सत् परमात्मा यदि सभी में है और कभी किसी का साथ नहीं छोड़ता , तो हम जीव उसके संग की अनुभूति क्यों नहीं कर पाते।
तब इसका साधारण उत्तर यही मिलता है कि, परमात्मा का अधिष्ठान ,जो
शरीर है ,इसमें से उसकी स्वयं में अनुभूति का न होना ,और इसका कारण है, जन्म जन्म से शरीर-संसार के गुणों में सुखानुभूति( अनुकूलता) का निश्चय कर बैठना। यही निश्चय पुनः-पुनः शरीर धारण करने का कारण है।
वस्तुतः यदि विचारें तो यह बड़ी भूल है क्योंकि, जहाँ अनुकूलता यानि कि सुख है, वह , वही सत् तत्व ही है, जो आत्म या परमात्म तत्व है। तब बात मन , बुद्धि तथा चेतना पर टिकती है, जहाँ इन्द्रियाँ , इस सुखान्वेषी जीव को शब्द, स्पर्श, रूप, रस,गन्धादि विषयों की ओर बलात् खींच कर संसार संग में उलझाए रखती हैं। यही सत् अर्थात् सतत जीव का, असत् में अभिनिवेश है।
आत्मविस्मृत, संसार संगी जीव की अवस्था उस जल की तरह है, जो गर्म -गर्म तवे पर पड़कर, नष्ट होता रहता है और पुनः-पुनः शरीरान्तरगमन करता भटकता रहता है।
इसके विपरीत वही जल ,यदि देश काल और स्थान भेद से कमल या सीपी में पड़ जाय , तो मोती का स्वरूप या मोती ही बन जाता है।इस प्रकार एक ही जल अपने आधार या स्थान के भेद से उसका संग पाकर नष्ट अथवा सुरूपता को धारण कर लेता है-

संतप्तायसि संस्थितस्य पयसो
नामापि न ज्ञायते।
मुक्ताकारतया तदेव नलिनी-
पत्रस्थितं राजते।
स्वातौ सागरकुक्षि शुक्तिपतितं
तज्जायते मौक्तिकं।
प्रायेणाधममध्यमोत्तम-
गुणा संवासतो जायते।।

इस तरह जलबिन्दुवत् जीव का सद् असद् से संयोग या संग ही सारे सुख-दु:खों का मूल है।इसलिये मनुष्य मात्र का प्रयास इस बात के लिये होना चाहिये कि, वह सुखाभासी विषयों का ध्यान त्याग कर ,अविद्या माया के क्षेत्र से एक मात्र मुक्ति दिलाने वाले आत्मदेव-परमात्म देव का शरण ग्रहण करे।क्योंकि भैया, जल तो वही है लेकिन सूर्य की ऊष्मा ग्रहण करके,वाष्प संघात रूप से आकाश में जाकर , मेघ बन कर स्वच्छातिस्वच्छ होकर भी गंगाजल में गिरने के बाद उससे मिलकर वही गंगाजल बनकर हितकारी कल्याण कारी भी बन जाता है ,और जमीन पर गिर कर मिट्टी के सम्पर्क से गन्दा होकर ,किसी की पिपासा भी शान्त नहीं कर सकता –

भूमि परत भा ढाबर पानी।
जिमि जीवहिं माया लिपटानी।।

अतः असत् और क्षण -क्षण परिवर्तन शील
जगत् का संग त्याग प्रतिक्षण एक रूप निरन्तर विद्यमान आनन्द घन सद् रुप परमात्मा में संग ही श्रेष्ठ है, जिसके द्वारा जीव की आत्मविस्मृति का समापन और परम कल्याण होगा ।
यह सत्संग भगवान् और उनके अत्यंत प्रिय भक्तों के चरित्रों, गुणों का होना चाहिए, जिनके सत्संग का परिणाम आनन्द मात्र ही होता है।इसलिये परम भागवत ” भक्तमाल ” ग्रन्थ के कर्ता श्री नाभादास जी के कवित्त से वाणी विराम लेती है-

भक्ति तरु पौधा ताहि विघ्न डर छेरीहू कौ
वारिदै विचार वारि सींच्यो सत्संग सों।
लाग्योई बढ़न,गोंदा चहुँदिशि कढ़न सो
चढ़न अकाश ,यश फैल्यो बहुरंग सों।।
संत उर आलबाल शोभित विशाल छाया
किये जीव जाल ,ताप गये यों प्रसंग सों।
देखौ बढ़वारि जाहि अजाहू की शंका हुती,
ताहि पेड़ बाँधै झूमें हाथी जीते जंग सों।।

भक्ति वृक्ष जब साधक के हृदय में छोटे से पौधे के रूप में होता है, तब हानि का भय बकरी से भी होता है, अतः पौधे की रक्षा के लिए उसके चारों विचारों का आलबाल(थाला)लगाकर सत्संग रूपी जल से सींचा जाता है।तब उसमें चारों ओर से शाखा-प्रशाखाएँ निकाल आती हैं।
और वह आकाश की ओर चढ़ने बढ़ने लगता है। सरल साधुहृदय थाले में सुशोभित इस विशाल भक्तिवृक्ष की छाया अर्थात् सत्संग पाकर त्रिविध तापों से तपे जीवसमूह सन्तापरहित होकर परमानन्द पाते हैं।ऐसा कार्य करने पर इस भक्ति का बढ़ना भी दर्शनीय है और विचित्र होता है।क्योंकि जिसे छोटी बकरी का डर था, उसी में आज महासंग्राम विजयी काम, क्रोधादि जैसे बड़े-बड़े हाथी बँधे हुए झूम रहे हैं।और सत्संग जल से सिंचित भक्ति वृक्ष को ईषन्मात्र भी हानि नहीं पहुंचा सकते।

।।हरिश्शरणम् ।।

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नाम-नामी में अभेद

सृष्टि के समस्त का एक नाम अवश्य ही है।क्योंकि नाम ही व्यवहार का समग्र आधार है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जहाँ-जहाँ व्यवहार-आचरण करना होता है, वहाँ-वहाँ नाम अनिवार्यतया आना चाहिए, जिसके विना ,विचारों की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं।
नाम में चाहे राम हो या कृष्ण, चाहे सीता हो या राधा ,अयोध्या या मथुरा ,मधुर हो या लवण कोई भी हो सकता है, लेकिन बात केवल एक है कि,इनके बिना कौन क्या कर सकता है?
नाम शब्द, संस्कृत में अत्यधिक झुकने का अर्थ देता है, और यह झुकना हमेशा ही ,कुछ नहीं लेता सिवाय इसके कि कुछ अवश्य ही देता है। ” प्र ” उपसर्ग जोड़कर इसी नाम से प्रणाम हो जाता है, और यह प्रणाम असाधारण परिणाम दे जाता है
एक दूसरा विचार ये भी कि, नाम का अर्थ ” संज्ञा ” भी है। यह संज्ञा भी अद्वितीय और विचित्र है, क्योंकि अलग -अलग करके कहें, तो ” सम् ” माने सम्यक् ” ज्ञा ” माने ज्ञान ।इस प्रकार(संज्ञा) नाम के बिना(संज्ञान) ज्ञान होना सम्भव नहीं दीखता ।
” वाक्यपदीय” जैसे व्याकरण के दार्शनिक ग्रन्थ में ” भर्तृहरि ” ने इस असमंजस पर प्रकाश डाला है, कि कोई भी व्यक्ति शब्दों-नामों का कथन करके ही
अपने और दूसरों के आत्मिक विचारों का उद्घाटन और आदानप्रदान कर सकता है-
वे कहते हैं कि यह सारा संसार, अन्धकार के साम्राज्य में होता, यदि शब्दों के दीपक अपना प्रकाश न फैलाते-
इदमन्धन्तम: कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम्।
यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते।।
यह तो हुई महायोगी ब्रह्मवेत्ता भर्तृहरि की बात।अब आगे सम्पूर्ण पर दृष्टि डालें तो तो इन शब्दों और नामों में ही सारे वेदादि ग्रन्थ विरचित हैं।जिनका प्रतिपाद्य और लक्ष्य लोक और अलोक दोनों है।
इन वेदादिक शास्त्रों द्वारा हमें हमारे चरम की प्राप्ति होती दीखती है। इन सभी में लोकालोक कामनाओं की सिद्धि के मन्त्र , शब्दों-नामों के रूप में ही विद्यमान हैं।
दूसरे विचार की ओर चलें तो लगता है कि, जब हम कोई नाम पुकारते हैं, तब उस नाम के साथ उसका स्व स्वरूप प्रकट हो जाता है।क्योंकि वह नाम अपने गुण, लक्षण को लेकर उपस्थित होता है। इसका कारण है किसी भी नाम का अपने स्वरूप से अपृथक् होना।
वस्तुतः इसीलिए भैया, इस युग में नाम जप की महत्ता समझाई गई है।जब हम जिस किसी भगवत् ,भागवत् नाम का चिन्तन मनन करते हैं, तब वह नाम ही अभिन्न रूप से अपने गुणों ,कर्मों और समूल-प्रकृति के साथ अविकल रूप से उपस्थित होकर नाम-चिन्तक को सहयोग देता है।
अरे, लौकिक उदाहरण ही लें, तो स्मरण करें कि हमको जो कार्य पूर्ण करना होता है, हम तद्रूप तद्गुण नाम-वस्तु आदि का चिन्तन अन्वेषण करके अपना कार्य सिद्ध करते हैं।
तब , भगवत्-भागवत् स्वरूपों और नामों की बात ही और है।और एक बात और है कि, इस युग में जब प्रामाणिक वस्तु-व्यक्ति ,साधनादि पाना असंभव सा हो गया है, तब नाम-जप ही आत्मोद्धार का एकमात्र सबसे सबल परमोपाय है।
नाम-नामी और गुण-गुणी में तत्वतः अभेद तथा आधाराधेय सम्बन्ध सिद्धान्ततः और व्यवहारत: दोनों रूपों में समवायत्वेन है ।अतः-
कलियुग केवल नाम अधारा ।
महिमा जासु जानि गनराऊ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या
तपोयज्ञक्रियादिषु ।
न्यूनं सम्पूर्णतामेति
सद्यो वन्दे तमच्युतम्।।
जिस श्रीमन्नारायण के नामोच्चारण, स्मरणादि से सारे कामों की सिद्धि होती है, ऐसे ,अपने गुण-कर्म-स्वभाव से कभी भी च्युत नहीं होने वाले भगवान् को उनकी लीला उनके नाम-गुण-धाम को प्रणाम(प्र-नाम) है।
गीतोक्त गुर-वाणी – तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च , से वाणी विराम लेती है।

।।हरिश्शरणम्।।

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जीवन का श्रेष्ठतम कार्य है सेवा

मानव शरीर संसार के सभी प्राणियों में श्रेष्ठतम है। यह शरीर पाकर स्वयं में यह अनुभव न हो कि जीवन का महत्तर कार्य तो सेवा कार्य है, तो भला इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा।
यह बात साधारण सी है कि, मनुष्य को ही,यह अनुभव में आ भी सकता है कि, सेवा सर्वोत्तम कार्य है।
अब सेवा को विभाजित करें तो, यह दो प्रकार की हो सकती है, एक स्वयं की सेवा और दूसरी संसार के अन्य प्राणियों की।
यह सम्पूर्णसेवा का कार्य काम्यादि कर्मों के रूप में मानवीय जीवन का अभिन्न करणीय ,सिद्ध होता है।
काम्य या कामना परक कार्य वे हैं, जो किसी फल के उद्देश्य से सम्पादित किए जाते हैं।इसी के साथ निषिद्ध कार्य भी जुड़े हैं, जिन्हें मानव शरीर के लिये अनाचरणीय कहा गया है।
इसके अतिरिक्त नित्य कर्म हैं, जो कि अवश्य करणीय हैं।इसमें अपने शरीर के स्नानादि से लेकर नित्य सम्पाद्य ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और अतिथि चर्यादि मनुष्य यज्ञ भी अवश्य ही करणीय हैं। यह विवेक केवल सेवा भावना भावित व्यक्ति के जीवन में ही सम्भव है।
इसके अलावा किसी निमित्त को पाकर, जो अवश्य करणीयकार्य ,वेद विहित हैं,नैमित्तिक कर्म कहे जाते हैं।इन्हें भी सेवा के अंगभूत रूप में किया जाना चाहिए।
ज्ञानोपासना का कार्य भी मनुष्य द्वारा किया जा सकता है, जोकि उसके उसके मानसव्यापार से सम्बन्धित है।श्रुति ने इसे इस प्रकार अभिव्यक्ति दी है-
” जो सर्वकर्मा ,सर्वकाम,सर्वगन्ध,इस सब को सब ओर से व्याप्त करनेवाला, वाग्रहित और सम्भ्रम शून्य है, वह मेरा आत्मा हृदय कमल के मध्य में स्थित है।यही ब्रह्म है।इस शरीर से मरकर मैं इसी को प्राप्त होउँगा इस विषय में कोई भी सन्देह नहीं है, वही ब्रह्म भाव प्राप्त करनेवाला सच्चा सेवक है । ”
इस प्रकार स्वयं के सहित चराचर जगत् की सेवा का अमूल्य कार्य केवल और केवल विद्या विनय सम्पन्न मानव जीवन के सत्संगलाभ का विषय हो सकता है।
यह बातें लिखने का उपक्रम इसलिये हुआ कि ,एक आत्मीय ने एक दिन कह दिया कि, कुछ लोग सेवक के रूप में जन्मते हैं और कुछ लोग स्वामी के रूप में। मैंने कहा, भैया यह बात उस-उस व्यक्ति के पूर्व जीवन के ही सेवा कर्मों का प्रतिफल हो सकता है, जिसे प्रारब्ध अथवा भाग्य कहा जाता है।
किन्तु सूक्ष्म विचार करने पर यह बात विचार में आती है कि मनुष्य मात्र को ही ,यह अनुभव में आयेगा कि वह अपने को पर-सेवा-कार्य में किस-किस रूप में सन्निविष्ट करके जीवन की सफलता के धर्म का मर्म समझ सकता है।
अपने को सेवक रूप में माननेवाले और ,अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम के समक्ष अपनी अकिंचनता को स्थापित करने वाले महात्मा भरत का जीवन आदर्श श्रेष्ठ सेवक का जीवन धर्म है।
वे कहते हैं –
राम पयादेहिं पाँय सिधाए।
हम कहँ रथ गज बाजि बनाए।।
सिर भरि जाउँ उचित अस मोरा।
सबसे सेवक धरम कठोरा ।।
हमारे प्रभु पैदल चल कर गए हैं ,तो हम तो सिर के बल चलें, तभी ठीक होगा।क्योंकि सेवा का कार्य, बड़ा ही कठिन कार्य है।
महाराज भर्तृहरि भी सेवा कर्म को योगियों से भी श्रेष्ठ बतलाते हैं-
सेवा-धर्म: परमगहन:
योगिनामपि अगम्य: ।।
इसलिये भैया ,यह सेवा-सेवक-सेव्य का उच्चतम विचार करनेऔर करानेवाले अपने पूर्वाचार्यों और आत्मीय जनों का का मैं ऋणी हूँ ,जिन्होंने इस सनातन ऋषि-विचारगंगाधारा के पवित्र जल में मुझे स्नान करा दिया है।

।।हरिश्शरणम्।।

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सबसे महत्वपूर्ण मन है

मनुष्य का मन बहुत महत्वपूर्ण है।मन को श्रोत्रेन्द्रिय आदि पञ्च ज्ञानेन्द्रियों सेअत्यंत अतिरिक्त बताया गया है।किन्तु यह मन सभी से अलग रहकर भी जिस-जिस इन्द्रिय के साथ संयोग करता है उसी-उसी को ग्रहण करता है। बिना मन के कोई भी इन्द्रिय किसी अन्य ज्ञानेन्द्रिय-संयोग को पाकर भी उनके विषयों को ग्रहण नहीं कर सकता है।
भगवान् ने गीताशास्त्र में जीवात्मा द्वारा ज्ञानेन्द्रियों श्रोत्र, चक्षु,त्वचा, रसना और नासिका के साथ ” मन ” को आश्रय बना कर क्रमशः शब्द, रूप, स्पर्श, रस,गन्धादि विषयों के सेवन की बात कही है-

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातन:।
मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मन: चायं विषयानुपसेवते।।
15/7-9 ।
यह मन ,साधक की आत्म अनात्म सम्बन्धी विवेक ज्ञान को हर लेता है।तभी तो इसकी मनोनुकूल वस्तुएँ ” मनोहर ” कही जाती हैं।
वैशेषिक दर्शन 3/2/1 में मन का लक्षण किया गया है।ऋषि कहते हैं कि, आत्मा,इन्द्रिय और विषयों का मन से सम्पर्क होने पर ही विषयादि का ज्ञान होता हुआ दीखता है-

आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य
भाव: अभावश्च मनस: लिङ्गम्।।

मूलतः विचार करें, तो यह तात्विक बात है कि, ज्ञान का होना और न होना ही मन का लक्षण है।
यह मन जो विषयों का ज्ञान कराता है, जब-जब इन्द्रियों में स्वच्छंद विचरता है, तब-तब बुद्धि को विचलित, अस्थिर करता है, और बुद्धि को मानो हर लेता है ,जैसे कि जलधारा में वायु ,नौका को गन्तव्य से भटका देती है-

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।
गीता….-2/67 ।
मैत्रायणी उपनिषद् में इसीलिये मन को बन्धन और मुक्ति का कारण बताया गया है।जब उच्छृंखल होकर जब यह विषयों में
भटकाता है, तब अपने ” विकल्पात्मक ” स्वरूप के कारण यही संसार का कारण है।इसके विपरीत अपने ” संकल्पात्मक ” स्वस्वरूप में स्थित होकर जब यह,आत्मस्थ परमात्मस्थ होता है, तब स्वस्वरूप का ज्ञान करा कर नित्य ,शुद्ध बुद्ध आनन्द घन भगवत्प्राप्ति का कारण बन जाता है-

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं मतम्
– मैत्रायणी उपनिषद् 4/11
मन को निश्चल करने के लिये भगवान् ने गीताशास्त्र में अभ्यास और वैराग्य को साधन बताया-
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते
– गीता 6/35

यह मन कैसे संसारोपरति -वैराग्य ग्रहण करे,इसके लिये उन्होंने कहा कि, धीरे-धीरे अर्थात् सहसा नहीं, किन्तु धैर्य युक्त बुद्धि द्वारा यह सम्भव है।यह कार्य मन को आत्मा में संस्थित करके संभव है-

शनैः-शनैः उपरमेद् बुद्ध्या धृतिपरिगृहीतया
आत्मसंस्थं मन: कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।। 6/25 ।

उपर्युक्त मन्त्र में एक विधि ,मनोनिग्रह का समझाने के बाद महागुरु एवं ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च शिक्षक आगे दशमाध्याय में स्वयं को इन्द्रियों में ” मन ” बता देते हैं-

इन्द्रियाणां मन चास्मि ।- 10/22

और नवमाध्याय में -मन्मना भव मद्भक्तो,
मद्याजी मां नमः कुरू(34) तथा अठारहवें अध्याय में पुनः –
मन्मना भव मद्याजी मद्भक्तो मां नमस्कुरु
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्यतिजाने प्रियोसि मे
-18/65
वही बात कह कर सरलता से समझा दिया है, कि वे भगवान् जब स्वयं मन ही हैं, तो अपने को अर्थात् स्वात्मा को, स्वयं को उन्हीं में लगा कर मन को निश्चलता और आत्यन्तिक शान्ति मिल पायेगी।
” मयि एव मन आधत्स्व ,मयि बुद्धिं निवेशय ” कहते हुए बारम्बार इस बात को दृढ कर देते हैं ,मन के प्रति सतत सावधानी बरतनी है।और अस्थिर मन को
एकमात्र मुझको ही सौंप कर स्थिर किया जा सकता है।
यजुर्वेद में ऋषिभी यही देखते हैं-
“तन् मे मन: शिवसङ्कल्पमस्तु ”

भगवान् , जो स्वयं मन: स्वरूप हैं, साधक, भक्तों पर कृपा करें ,तभी ,सद्गुरु-शरण सन्निधि द्वारा यह सम्भव है।
एक बड़ी बात उन्होने पूर्वोक्त मन्त्र की अन्तिम अर्धाली में कह दी है, कि मैं इस बार प्रतिज्ञा करता हूँ , इस बात को सत्य जान लो कि , निश्चित रूप से मत्परायण होने पर तुम्हें मेरी प्राप्ति होगी,क्योंकि तुम
मेरे प्रिय हो।
इस प्रकार इस अस्थिर मन की स्थिरता सद्गुरु-भगवत्परायता में ही सुनिश्चित है, जिससे सारे प्रतिबन्ध शून्य हो पायेंगे,और
यह महत्वपूर्ण मन केवल और केवल सङ्कल्पात्मक होकर शिव बन जायेगा।
भगवान् सहायक हों।

।। हरिश्शरणम् ।।

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