सन्यास तथा योग द्वारा मोक्षसिद्धि

श्रीमद्भगवद्गीता का आरम्भ से लेकर छ: अध्याय पर्यन्त का अद्वितीय-गुरुशिष्योपदेश कर्मयोग नाम से प्रख्यात है।इसके उपसंहारात्मक षष्ठाध्याय को
आत्मसंयम योग एवं ध्यानयोग नाम दिया गया है।ध्यानयोग में शरीर, इन्द्रिय, मन तथा बुद्धि का संयम परमावश्यक है।
शरीरेन्द्रियमनबुद्धि – इन्हें आत्मा नाम से संयुक्त रूप से अभिहित किया गया है।इस अध्याय में इन्हीं के संयम का वर्णन होने से यह ” आत्मसंयमयोग ” भी है।
पहले मन्त्र में ही सन्यासी का निर्वचन करते हुए कहा गया है कि, जो मनुष्य कर्मफल का आश्रय न लेकर करनेयोग्य
(कार्य)शास्त्र विहित कर्म ही करता है, वह सन्यासी है और वही योगी भी। जो अग्नि होत्रादि अनुष्ठानों को त्यागने वाला(निरग्नि)तथा मात्र क्रियाओं का त्याग करनेवाला(अक्रिय)है ,वह सन्यासी-योगी नहीं –
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य:।
स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय:।। 6/1 ।।
तात्पर्य यह कि फलेच्छा के बिना कर्तव्य कर्म करनेवाला सन्यासी और योगी दोनों है।इसी भाव का प्रकटीकरण अग्रिम पंक्ति में है, जहाँ सन्यास और योग का एकत्व सिद्ध है-
यं सन्यासमिति प्राहु: योगं तं विद्धि पाण्डव
नह्यसन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन।।6/2।।
आगे चलकर भगवान् इसी भाव को प्राप्त महात्मा को सर्वसंकल्पसन्यासी “योगारूढ” कहते हैं,क्योंकि वह न तो इन्द्रिय विषयों में और न ही कर्मों में आसक्त है-
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्यते।
सर्वसंकल्पसन्यासी योगारूढस्तदोच्यते।।
इस प्रकार सन्यासी और योगी का ऐक्य बताने के बाद स्वयं अपने ही द्वारा अपने उद्धार या जीवन्मुक्ति का उद्धोष होता है-
जीवात्मा का स्वात्मा ही उसका मित्र और शत्रु दोनों है।अतः अपने आप ही अपना उद्धार करे,अधोगति में न डाले।
“अपने द्वारा अपना उद्धार” के उपदेश में जीवात्मा को आश्वस्त किया गया है कि उत्थान-पतन स्वयं जीव के हाथ में है।
जो आत्मोद्धार के लिए चेष्टारत है,वही स्वयं का मित्र है, क्योंकि वह अपने इष्ट और कल्याण हेतु प्रयत्नशील है।
दूसरी तरफ यदि वह ऐसा नहीं करता, तो वह अपना स्वयं शत्रु है, क्योंकि वह अपने को अधोगति के गड्ढे में ढकेल रहा है-
उदधरेद् आत्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैवात्मनो बन्धु:
आत्मैव रिपु: आतत्मन:।। 6/5 ।।
इसी बात की पुष्टि सातवें मन्त्र में करते हैं-
बन्धु: आत्मा आत्मन:तस्य
येनात्मैवात्मना जित:।
अनात्मन: तु शत्रुत्वे
वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।6/6।।
जिस जीवात्मा द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह अपने आप ही मित्र है।किन्तु जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए तो वह आप ही शत्रु की भाँति आचरण करता है।
इस प्रकार गीता का उक्त उपदेश मनुष्य मात्र के लिये है, जो मानवजीवन का चरम लक्ष्य(मोक्ष) को अपनाना चाहते हैं।
“बुद्ध” ने इसी मर्म को हृदयंगम करते हुए ” अप्पदीपो भव ” “अत्ता हि अत्तनो नाथ:”
तथा ” अत्ता हि अत्तनो गति: ” की बात कही थी।भगवान् मुक्तिमार्ग में सहायक हों।

।। हरिश्शरणम् ।।

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अहंकार निवृत्ति द्वारा मोक्षसिद्धि

आदि शङ्कर ने अपने ” विवेकचूडामणि” में अहंकार को मुक्तिमार्ग का सबसे प्रबल प्रतिबन्धक बताया है।कलिकाल के साक्षात् शङ्करावतार आचार्य ,अहं पदार्थ को बारम्बार शरीर धारण का मूल कारण मानते हैं –

सन्त्यन्ये प्रतिबन्धा:
पुंस: संसारहेतवो दृष्टा:।
तेषामेकं मूलं प्रथम-
विकारो भवत्यहङ्कार:।।229।।

यह अहंकार क्या है ,यह भी विचारणीय है। प्रथमतया शरीर-संसार में आत्मबुद्धि या परिवर्तन शील शरीर संसार को अपना मानने लगना ही अहंकार है।
भगवद्गीता में आचार्य शङ्कर ने अहंकार का व्याख्यान किया है।तृतीयाध्याय के सत्ताइसवें मन्त्र में वर्णन है-

प्रकृतेः क्रियमाणानि
गुणैः कर्माणि सर्वश:।
अहङ्कारविमूढात्मा
कर्ता अहमिति मन्यते।।

सम्पूर्ण कर्म वस्तुतः प्रकृति के गुणों के द्वारा ही किए जाते हैं, किन्तु अहंकार से मोहित अन्त:करणवाला (मनुष्य)” मैं करने वाला हूँ ” ऐसा मानता है।
यही मैंपना इस जीव की बहुत बड़ी समस्या है। जो निरन्तर अभ्यास अनेक शरीरों में आत्मबुद्धि के कारण बनता गया है, उसका निराकरण गुरु-भगवान् के बिना सम्भव भी नहीं होता।
शाङ्कर भाष्य में अहंकार की परिभाषा है –
” कार्य-करण-सङ्घातात्म-प्रत्यय: अह-ङ्कार: ”

पंच महाभूत पृथ्वी इत्यादि और इनके विषय का नाम कार्य है। इसीप्रकार पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पंच कर्मेन्द्रियाँ और मन बुद्धि तथा अहं को करण कहा गया है।
सृष्टि की प्रक्रिया के वर्णन क्रम में परमात्मा से आकाश-शब्दगुणात्मा की उत्पत्ति होती है, श्रोत्रेन्द्रिय ग्राह्य है।
आकाश से/में वायु जन्मता है, जो स्पर्श गुणात्मा और त्वचा से ग्राह्य है।इस वायु में अपने पूर्वज का शब्द गुण भी रहता है।
वायु से अग्नि का उद्भव है, जिसका मूल गुण रूप है, किन्तु इसमें भी अपने पूर्वज का स्पर्श-शब्द भी विद्यमान है।
अग्नि से जल की उत्पत्ति है, जिसका मौलिक गुण रस है।पूर्व की भाँति इसमें रूप-स्पर्श-शब्द भी रहता है।
जल से पृथ्वी का उद्भव है,जिसका अपना गुण गन्ध है।किन्तु इसमें भी अपने पूर्वजों का रस-रूप-स्पर्श-शब्द आदि भी रहता है।
इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर जगत् की सृजनात्मक प्रक्रिया श्रुति-सम्मत कही गई। इस जड़चेतनगुण -दोष-मय संसार की संरचना में प्रकृति के त्रिविध गुणों का संचरण है।
मनुष्य जीव अपने पूर्व-पूर्व शरीरों में मन बुद्ध्यादि से अपने को आत्मारोपित करके जनन-मरण के चक्रव्यूह में पड़ा रहता है।
यही जीवात्मा का देहाध्यास या देहाभिमान कहा गया है।इस देह की कारा से मुक्त होकर अपनी आत्मा में ही आत्मदर्शन करना होगा
अहंकार आदि विकारी वस्तुओं के समस्त विकारों जाननेवाला नित्य और अविकारी ही होना चाहिये।मनोरथ, स्वप्न और सुषुप्ति काल में इन स्थूल-सूक्ष्म दोनों शरीरों का अभाव बार-बार स्पष्ट देखा जाता है। अतः अहं पदार्थ शरीर संसारादि आत्मा नहीं हो सकते।
आचार्य शङ्कर ने इसीलिए कहा-

अतोभिमानं त्यज मांसपिण्डे
पिण्डाभिमानिन्यपि बुद्धिकल्पिते।
कालत्रयाबाध्यमखण्डबोधं
ज्ञात्वा स्वमात्मानमुपैहि शान्तिम्।

इसलिए इस मांस-पिण्ड और इसके बुद्धिकल्पित अभिमानी जीव में अहंबुद्धि छोड़ो और अपने आत्मा को तीनों कालों में अबाधित और अखण्ड ज्ञान स्वरुप जानकार शान्तिलाभ करो।

आगे उपसंहारात्मक वचन में ,वे कहते हैं कि इस लिबलिबे मांस-पिण्ड के आश्रित रहने वाले कुल ,गोत्र , नाम ,रूप और आश्रम वाले शरीर में अभिमान त्यागो।
तथा कर्तापन, भोक्तापन आदि लिंग देह के धर्मों को भी त्यागकर अखण्ड आनन्द स्वरूप हो जाओ-

त्यजाभिमानं कुलगोत्रनाम-
रुपाश्रमेष्वार्द्रशवाश्रितेषु ।
लिङ्गस्य धर्मानपि कर्तृतादीन्
त्यक्त्वा भवाखण्डसुखस्वरुप:।।298।।

इस प्रकार आत्मा को देह से पृथक् देखने का अभ्यास करते-करते ,देहाभिमान छूटता है, और देहाभिमान त्याग से वैराग्य का उदय होता है, तथा वैराग्य परिपुष्ट होते-होते क्रमशः मोक्षसिद्धि होती है।
भगवान् मुक्ति में सहायक हों।

।।हरिश्शरणम्।।

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वासना का त्याग ही मुक्ति है

वेदान्तादि शास्त्रों में वासना के त्याग को मुक्ति संज्ञा दी गई है। वासना का शाब्दिक अर्थ मन के बस जाने से प्रतीत होता है।
मन का शरीर-संसार में बस जाना ही वासना है वस्तुतः। यह वासना अनादि है।
अनादि से तात्पर्य ,निरन्तर अनेकानेक जन्मों से इसकी प्रबल प्रवहमानता है।
आदि शङ्कर ने इसे तीन रूपों में बाँट दिया है- 1.लोकवासना ,2.देहवासना तथा3.शास्त्रवासना।
ये तीनों वासनाएँ एक दूसरे से परस्पर संयुक्त हैं। लोक(संसार) वासना सीधे देह और तदिन्द्रियों से जुड़ी है ।यह देह ,मन के संयोग से लोक और लोकाधिष्ठित वस्तु,व्यक्ति-स्थान में बसा, रमा रहता है।
इस देहेन्द्रिय जन्य लोक में बसने में एक तत्व अत्यन्त सहायक सिद्ध होता है, जो शास्त्र है। इस शास्त्र के विहित, नियमों परिनियमों के द्वारा देह इन्द्रिय से लेकर समस्त दृशादृश्य (लोक) जगत् के अनात्म वस्तुओं में अहंता-ममता का बना रहना ही , परस्पर लोक-देह-शास्त्र की वासना है।विवेकचूडामणि में शङ्कराचार्य –
लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम्
शास्त्रानुवर्तनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं कुरु।।271।।
इन्हीं देहादिवासनाओं रहना देहाध्यास है।
इस देहाध्यास को अत्यन्त प्रयत्न पूर्वक दूर करना चाहिए, भक्तिमार्ग में इसके लिए भगवन्नाम-लीला-रुप-गुण-चिन्तन परम पाथेय है। जबकि उसी से जुड़े ज्ञान-मार्ग में देहाध्यास दूर करने के लिये चित्त-वृत्तियों को रोककर निरन्तर आत्मस्वरूप में लगाने का निर्देश है।इससे योगी का मन नष्ट हो जाता है।जिससे वासनाक्षय तथा अध्यास का निरास होता है-
स्वात्मन्येव सदा स्थित्या मनो नश्यति योगिनः।
वासनानां क्षयश्चात: स्वाध्यासापनयं कुरु।।278।।
इन्द्रियों से होने वाले कर्मयोग, मन से होनेवाले भक्तियोग तथा बुद्धि से होने वाले ज्ञान योग द्वारा क्रमशः इन्द्रिय-मन और बुद्धि के अन्तर्मुखी होते जाने पर वाह्य वासनाओं की क्षीणता और वहि:प्रज्ञतानिरास की सिद्धि होती है,जिससे आत्मा की प्रतिबन्धशून्यता अनुभूत होती है-
यथा यथा प्रत्यगवस्थितं मन:
तथा तथा मुञ्चति वाह्यवासना:।
नि:शेषमोक्षे सति वासनानाम्
आत्मानुभूति: प्रतिबन्धशून्या।।277।।
इसके पहले आचार्य ने बता दिया है कि इन्ही लोक-शास्त्र-देह वासनाओं से जीव को ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता-
लोकवासनया जन्तो:शास्त्रवासनयापि च।
देहवासनया ज्ञानं यथावन्नैव जायते।।272।।
कलिपावनावनावतार तुलसी ने जिन –
सुत वित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।।
कह कर जिन लोक -वित्त और सन्तानादि एषणाओं द्वारा मतिमलिनता की बात कही है, उनका संगमन आचार्य शङ्कर के उक्त प्रस्थान से किया जा सकता है।
शङ्कर की देहवासना ,तुलसी की सुतेषणा से,शास्त्रवासना वित्तेषणा से संगमित की जा सकती है और लोक तो लोक है ही।
इस प्रकार आत्म -वस्तु का ज्ञान हो जाने पर भी जो ‘मैं कर्ता और भोक्ता हूँ ‘ इस रूप से दृढ होकर जनन-मरणरूप संसार का कारण होती है, उस वेगवती अनादि वासना को प्रत्यक् (आन्तरिक)दृष्टि से आत्मस्वरूप में स्थित होकर सप्रयास त्यागना चाहिए।क्योंकि इस संसार में वासना की तनुता(क्षीणता)ही मुनियों द्वारा मुक्ति कही गई है-
ज्ञाते वस्तुन्यपि बलवती वासनानादिरेषा।
कर्ताभोक्ताप्यहमिति दृढा यास्य संसारहेतु:
प्रत्यग्दृष्ट्यात्मनि निवसता सापनेया प्रयत्नान्
मुक्ति:प्राहु:तदिह मुनयो वासनातानवं तत्।।268।।
अनात्मा में देहेन्द्रिय जन्य विषयादि वासनाओं से मन को हटाकर भगवान् परमात्मा स्वयं में मन को अधिष्ठित करायें ,यही चिराचिर प्रार्थना है।

।।हरिश्शरणम्।।

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स्त्री-सम्मान से मोक्षसिद्धि

शारद नवरात्र संवत् 2074 की अष्टमी से लेकर चतुर्दशी पर्यन्त सप्ताह व्यापी मार्कण्डेयपुराण की कथा ने पूर्णता प्राप्त की। कथा के वाचक(व्यास) थे ,वृन्दावन धाम के मलूकपीठाधिपति आचार्य राजेन्द्र दास जी महाराज।व्यास-समास क्रम से चलने वाली कथा का महत्वपूर्ण बिन्दु था ,मनुष्य के कामक्रोधादि षड् रिपुओं का मर्दन किया जाना, और जिसका मूल है भगवती की एकमात्र प्रसन्नता।
भगवती की प्रसन्नता किसे प्राप्त होती है, इस बात के भी मूल में उतरने पर ,यह तत्व उभर कर आया , नारी-मात्र का सम्मान।वह इसलिये कि समस्त नारियाँ जगदम्बा की ही स्वरूप हैं –
विद्या समस्ता:तव देवि भेदा:
स्त्रिय:समस्ता: सकला जगत्सु।
दुर्गा. स.11/06

त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतु: ।
दुर्गा. स 11/05

कहा भी गया है और कहने वाले स्मृतिकार मनु महाराज-
यत्र नार्य: तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवता:
यत्र एता: तु न पूज्यन्ते
तत्र सर्वा: क्रिया : अफला:।।

अर्थ स्पष्ट ही है, जहाँ नारी सम्मानित होगी, वहीं देवता रमण करेंगे और इसलिये कि,वह नारी तो स्वयं देवी है। जहाँ ऐसा नहीं होगा, वहाँ किसी क्रिया का सुफल प्राप्त नहीं होगा।
अतः सभी से आग्रह है कि एकमात्र उक्त नारी-सम्मान को जीवन में आचरण में ढालें ,मुक्ति सुनिश्चित है।

।।हरिश्शरणम्।।

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माया का अभिज्ञान होने पर मुक्ति

आज शारदीय नवरात्र विक्रम सं 2074 पंचमी तिथि सोमवार का दिन, जब रामकथा के अमर गायक सन्त मुरारी बापू की रामकथा-प्रवाह का पाँचवाँ दिवस देदीप्यमान है।यह बड़े आनंद का विषय और शक्तिपीठ विन्ध्याचल धाम की अपार पारमाण्विक ऊर्जा का विद्युत् चुम्बकीय तत्व है, जिसने श्रीरामकथामन्दाकिनी को विन्ध्यक्षेत्र में विन्ध्यपर्वतमाला से आलिंगित होकर बहने के लिये बाध्य कर दिया।
आरम्भ में ही “व्यासपीठ” ने नवमी पर्यन्त कथा को ” मानस-श्री-देवी ” शीर्षक से समाख्यात किया है। इसके बीज ,मानस के बालकाण्ड की भवानी-पूजन की पंक्ति ” देवि पूजि पद कमल तुम्हारे।सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। तथा अयोध्याकाण्ड की भगवान् श्रीराम की वनगमन पंक्ति ” उभय बीच सिय(श्री) सोहति कैसे।
ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।। में विकीर्ण हैं।
अब रामायण की पंक्तियों पर सबसे पहले विचार करें, तो वाल्मीकि के राम ऐसी परिस्थितियों में सबसे पीछे आयुधों से सज्जित होकर चलते हैं, जबकि श्रीसीताजी मध्य में तथा आगे-आगे लक्ष्मण जी ।इस वर्णन के स्वरुप की समीक्षा में श्रीराम परमात्म रूप,श्रीसीता मायारुप तथा लक्ष्मणजी जीवात्मरूप हैं।वाल्मीकि के राम राजा राम हैं ,जो सभी(प्रजा) जीवात्माओं के आधार भूत हैं।अतः सायुध पीछे चलते हैं।लक्ष्मण आगे चलकर जीव भाव में रहते हैं, जबकि माया रूपिणौ सीता अपनी छत्रछाया में उन्हें आवृत कर चलती है।
तुलसी के राम का स्वरुप ही भिन्न है।जहाँ तापसवेशधारी श्रीराम आगे चलते हैं और लक्ष्मण जी पीछे।मध्य में सीता जी चल रही हैं, जिससे ब्रह्म(राम)और जीव (लक्ष्मण) के मध्य माया( सीता) का स्वरूप बन गया है-
आगे राम लखन बन पाछे।
तापस वेश विराजत काछे।।
उभय बीच सिय(श्री) सोहति कैसे।
ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।।
उक्त चौपाई में गोस्वामी जी ने अद्वैत वेदान्त का सूत्र रख दिया है जिसके बिम्ब में परब्रह्म के प्रतीक सर्वात्मा श्रीराम का आगे रहना समीचीन है, क्योंकि सर्वकारण कारण अग्रगण्य रहेगा ही ,जब वही समग्र ब्रह्माण्ड का सर्जक ” ब्रह्म ” है ,तब उसके आगे कौन हो सकता है? वही सर्वाधार, जगत् का नियन्ता, जगदात्मा होने से सबके आगे है।
शेषावतार लक्ष्मण जीवात्म प्रतिनिधि हैं, क्योंकि वे अपने निधि श्रीराम के प्रति आतुर, आकुल और विह्वल भाव से अभिभूत हैं।रामकार्य(सृष्टि विस्तार आधार) हेतु सारी धरती को अपने ऊपर धरते हैं।
इस सारी संरचना का प्रपंच विस्तार करनेवाली माया शक्ति श्री सीता महरानी हैं, जिनके भृकुटि विलास से सृजन पालन और संहार का सम्पूर्ण कार्य सम्पादित हो रहा है-भृकुटि विलास सृष्टि लय होई।
अद्वैत वेदान्त में माया को द्विधा- अविद्या और विद्या माया बताकर सृजन प्रक्रिया समझाई गई है।इसमें विद्या माया ईश्वर की संगिनी है, जबकि जगद्विस्तारिणी अविद्या माया है, जिसे आचार्य शङ्कर ने ‘ कार्यानुमेया ‘
‘ अनादि ‘ ‘अविद्या ‘ ‘ त्रिगणात्मिका’नाम दिया है। उक्त प्रसंग में भगवती सीता भगवान की चिरसंगिनी विद्यामाया हैं, जब कि उन्हीं का अपर रूप कारयित्री शक्ति अविद्या माया भी है।इस प्रकार यह स्वरुप से एक ही माया कार्य रूप में द्विधा विभक्त है।
मानसकार आगे इस दृष्टिकोण को विस्तार देते हुए कहते हैं कि, सीता माता प्रभु राम के पद चिह्नों के बीच में पैर रखती चलती हैं, जबकि लक्ष्मण जी उन पद चिह्नों के बगल दाहिने ओर पैर रखते हुए चल रहे हैं-
प्रभु पदरेख बीच बिच सीता।
धरति चरन मग चलत सभीता।।
सीय रामपद अंक बराएँ।
लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।।
राम मायाधीश हैं, अतः उनकी माया सीता उनके प्रति पूर्ण आदरबद्ध होकर भयपूर्वक उनके पदचिन्हों के मध्य में पैर रखती हैं।उधर जीवप्रतीक लक्ष्मण जी सीताराम के पैरों को बचाकर उनके दक्षिण ओर खाली स्थान पर पैर रखते हुए चल रहे हैं। दक्षिण शब्द अनुकूलता को संकेतित करता है, जोकि ब्रह्म-जीव के अनुगमन और अनुकूलता को सार्थक बना रहा है।
अन्त में गोस्वामी जी ने इस प्रसंग की पूर्णता इस बात में की है, जिसमें जीव ब्रह्म का ऐक्य होकर जीवन की पूर्णता सिद्ध होती है।वे कहते हैं कि, जिन-जिन लोगों ने यह(ब्रह्म-माया-जीव) स्वरूप को निहारा, उन -उन लोगों ने सानन्द विना श्रम के भव सागर का दुस्तर मार्ग पार कर लिया-
जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय,
सिय समेत दोउ भाइ।
भव मगु अगम अनंद तेहि,
बीनु श्रम रहे सिराइ।।
इस प्रकार माया की पहचान करके मायाधीन जीवात्मा, मायाधीश की शरणागति से अपना आत्मस्वरूप प्राप्त कर सकता है।और इसके परिणाम स्वरूप देह बन्धन की ” कारा ” से मुक्त भी हो सकता है।
केन्द्रीभूत उक्त चौपाई- ब्रह्म जीव बिच माया जैसे – के आलोक में आलोचक समीक्षक विद्वज्जन काशी नगरी को ब्रह्मभूत, प्रयाग को जीवात्मभूत एवं विन्ध्याचल धाम को मायाभूत प्रतीकों से जोड़ने का सार्थक तर्क देते हैं। मेरी दृष्टि में ऐसी अन्त: दृष्टि हो पाने और इसे आचरण में उतार लेने पर हम अपने अहंभाव(जीवभाव) को काटकर अपने अज्ञत्व से जीवन्मुक्त हो सकते हैं।
भगवत्कृपा सहायिनी हो।

।।हरिश्शरणम्।।

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श्रद्धा से अमृतत्व प्राप्ति

संस्कृत भाषा का श्रद्धा शब्द बड़े आदर प्रीति पूर्वक व्यवहार में है।इसके अर्थ के विषय में विचार करने पर इसका सामान्य अर्थ सत्यनिष्ठा प्रतीत होता है।
आचार्य सायण (वेदभाष्यकार)ने इसका अर्थ आस्तिक्य बुद्धि किया है।अस्ति का भाव आस्तिक्य है।मतलब ,जगत् के समस्त प्रतिक्षण दृश्यमान परिवर्तन का प्रेरक एक अद्वितीय तत्व स्वीकारना ,ही आस्तिक्य बुद्धि है।
वेदान्त के प्रवेशिका ग्रन्थ “वेदान्तसार” के कर्ता सदानन्द योगीन्द्र ने गुरुओँ द्वारा उपदिष्ट वैदिक वाक्यों में विश्वास को श्रद्धा कहा है-
” गुरूपदिष्टवेदान्त-वाक्येषु विश्वास:एव श्रद्धा ”
अर्थात् गुरुओं के द्वारा बताए गये वैदिक वचनों में विश्वास रखना ही श्रद्धा है।
विश्वास ही श्रद्धा है।
“भवानी-शङ्करौ वन्दे श्रद्धा-विश्वास-
रूपिणौ”
बाबा तुलसी ने माँ को श्रद्धा और पिता को विश्वास कह डाला है।भगवती माँ है और भगवान् शिव पिता।एक स्थान पर दोनों एकाकार हैं। शिवाशिवयोरभेद: ।
अर्थात् जो शिव हैं वही शिवा हैं और जो शिवा हैं वही शिव हैं।
इस प्रकार मंथन से एक बात निकलती है कि श्रद्धा-विश्वास एक सिक्के के दो पहलू हैं।वस्तुतः श्रद्धा विश्वास ईश्वर के अस्तित्व और सर्वातिशायित्व का बोधक सिद्ध हुआ।
इसी बात की पुष्टि करते हुए “सर्व –
वेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह” मे आचार्य शङ्कर ने कहा-
गुरुवेदान्तवाक्येषु बुद्धिर्या निश्चयात्मिका।
सत्यमित्येव सा श्रद्धा निदानं मुक्तिसिद्धये।।210 ।।

गुरु और वेदान्त वाक्यों में जो निश्चयात्मिका सत्यस्वरूपिणी बुद्धि है,
वही श्रद्धा है।यह श्रद्धा ही मोक्षसिद्धि का मार्ग है।
आगे कहते हैं कि जैसे-जैसे देव ,गुरु,मन्त्र, तीर्थ, महात्मा और ओषधि आदि में श्रद्धा बलवती होती जाती है, वैसे-वैसे श्रद्धालु पुरुषों को सिद्धि प्राप्त होती जाती है।
दैवे च वेदे च गुरौ च मन्त्रे,
तीर्थे महात्मन्यपि भेषजे च।
श्रद्धा भवत्यस्य यथा यथान्त:
तथा तथा सिद्धिरुदेति पुंसाम्।।213।।

और श्रद्धा उत्पत्ति के विषय में कहते हैं कि यथार्थ बोलने वाले लोगों में श्रद्धा उपजती है-
यथार्थवादिनां पुंसां श्रद्धाजननकारणम्।
वेदेस्येश्वरवाक्यत्वाद् यथार्थत्वेन न संशय:।।213।।
गीता के चतुर्थ अध्याय में भगवान् ने श्रद्धावान् ,साधनपरायण ,जितेन्द्रिय को तत्वज्ञान प्राप्त करने वाला बताया है,जिसे पाकर मनुष्य अचिर ही परम शान्ति मुक्ति पा जाता है-
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं ,
तत्पर: संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां
शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।39।।

इस प्रकार ऐसे उद्धरणों से श्रद्धा युक्त व्यक्ति की शान्ति और मुक्ति सुविदित है।
भगवान् साहाय्य हों।

।।हरिश्शरणम्।।

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प्राण शक्ति समुच्चय से मुक्ति

गीता शास्त्र का आरम्भिक छ: अध्याय कर्मयोग के नाम से विख्यात है। इसके चतुर्थ अध्याय में भगवान् ने अपने अवतरित होने के रहस्य का वर्णन किया है।व्याख्या करनेवाले लोगों ने इस अध्याय को ज्ञान-कर्म-सन्यास-योग कहा है।
भगवान् कहते हैं कि मैंने इस अविनाशी योग को अपने पूर्व अवतार में,सूर्य के लिये प्रदान किया था।सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु को और मनु ने सूर्य वंश के प्रवर्तक अयोध्या नरेश इक्ष्वाकु से कहा। इस प्रकार परम्परा प्राप्त यह योग राजर्षियों ने जाना, किन्तु काल क्रम से पृथ्वी पर यह लुप्तप्राय हो गया-
इमं विवस्वते योगं
प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह
मनुरिक्ष्वाकवेब्रवीत्।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं
राजर्षयो विदु:।
स कालेनेह महता
योगो नष्ट:परन्तप।।4/1,2।।
पतञ्जलि ने अपने योगसूत्र में कहा-तप:स्वाध्याय ईश्वरप्रणि-
धानानि क्रियायोग:।मतलब कि शारीरक तप ,मनोनिग्रह तथा ओम् का ध्यान सम्मिलित रूप में क्रियात्मक योग है(तस्य वाचक: प्रणव:)।
आचार्य ने आगे यह भी कहा कि ध्यान योग के क्रमिक उच्चतर अवस्था में योगी प्राण गति के श्वास-प्रश्वास में विच्छेद करके मुक्ति पा सकता है-
तस्मिन् सति श्वास-प्रश्वासयो:
गतिच्छेद: प्राणायाम:
योगसूत्र-2:9
योगी जनों ने ध्यान में अपनी प्राणशक्ति को षट्चक्रों में ऊर्ध्व-अध: प्रवाहित करते हुए
आधे मिनट के काल में ही , स्वाभाविक रूप से एक वर्ष की आध्यात्मिक उन्नति पाई है।
भगवान् ने गीता के चौथे अध्याय में कहा-
अपाने जुह्वति प्राणं
प्राणेपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुध्वा
प्राणायामपरायणाः।
अपरे नियताहाराः
प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।।29।।
अपान वायु में प्राण वायु के हवन द्वारा और प्राण वायु में अपानवायु के हवन द्वारा योगी प्राण और अपान दोनों की गति को रोक कर प्राणों पर नियंत्रण पा लेता है।
आगे पाँचवें अध्याय में श्लोक27एवं 28में इसका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि वह ध्यान परायण योगी मुनिवत्
मुक्ति के चरम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपनी दृष्टि को भौहों के मध्य में स्थित करके नासिका तथा फेफड़ों में विचरने वाले प्राण और अपान को सम करते हुए वाह्यविषय भोगों से अपने ध्यान को हटाने में तथा इच्छा, भय,क्रोध को निकाल बाहर करने में समर्थ हो जाते हैं।ऐसे लोग सर्वदा बन्धनरहित हैं।
वाग्वैखरी -शब्दझरी …भुक्तये न तु मुक्तये- इत्यादि वचनों से आचार्य शंङ्कर ने सिद्ध किया है कि वाह्यकर्मकाण्ड अज्ञान का विनाश नहीं कर सकता।अपने
“अपरोक्षानुभूति” में वे कहते हैं एकमात्र अनुभूत ज्ञान ही अज्ञान को नष्ट करेगा।
इस प्रकार योग मार्गी अपने प्राणों की गति पर नियमन करके शब्द,स्पर्श, रूप,रस और गन्ध के पाँच वाह्यप्रवाहों को अन्त:प्रवाही बना कर इन्द्रियों से सम्बन्ध विच्छेद कर सकता है, जिससे इच्छानुकूल दिव्यपराचेतना से अपने मन को जोड़ लेता है।
ऐसी आत्मस्थ जीवन की श्रेष्ठ पद्धति योगी को अपने अहं की कारा से निकाल कर समष्टि और सर्व व्यापकता की गहनता में प्रविष्ट करा देती है और मुक्ति के समुन्नत विशालकाय प्रासाद में प्रवेश मिलता है।
यही मुक्ति की चरमावस्था है।
भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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कर्मयोग से बन्धमुक्ति

श्रीमद्भगवद्गीता का ,आरंभ से लेकर छ:अध्याय तक का तत्व विवेचन “कर्मयोग” के नाम से व्याख्यायित है।
इममें भगवान् ने कर्मयोग की सम्यक् मीमांसा की है।दूसरे अध्याय के चालीसवें मन्त्र में इस कर्मयोग की विशेषता बताई गई है।

वे कहते हैं कि इस कर्मयोग में आरम्भ अर्थात् बीज का नाश नहीं होता-नेहाभिक्रमनाशोस्ति

अभिक्रम शब्द का अर्थ है -आरम्भ।आरम्भ के नाश न होने से तात्पर्य है, बीजारोपण किये गए कर्मों से।
कर्मयोग से तात्पर्य है निर्लिप्त भाव से ,फलाकांक्ष न होकर कर्मों का सम्पादन करना।कठिन तो बहुत है कि कर्म करें, और फल कामना ,न करें।किन्तु अभ्यास से ऐसा सम्भव है ,तब जब कि, हम निश्चित कर लें कि “मा फलेषु कदाचन” का अर्थ ही फलकामना से विरत करने वाला है।

अतः सुनिश्चित है कि हम आसानी से इस बात पर दृढ हो जायें कि, फल हमारे हाथ में नहीं, वह तो प्रारब्ध एवं ईश्वर के आधीन है। जब फलप्राप्ति में स्वाधीनता नहीं है, तब फलों की चाहत में पड़े रहकर, द्वन्द्वों और राग-द्वेष के कारण अन्य जन्मों /शरीरों को क्यों निमन्त्रित करें।

इस प्रकार भगवान ने कहा कि कर्मयोग(निष्काम कर्मयोग)के मार्ग पर एक बार चल पड़ने पर, आरम्भ का नाश नहीं होगा अर्थात् वह व्यर्थ नहीं जायेगा, बल्कि अगले जन्म में (प्रारब्ध शेष रहने पर )पुनः इस कर्मयोग की यात्रा आरम्भ हो जायेगी, जहाँ से यह टूटी थी।

इसके अलावा, कर्मयोग के क्षेत्र में-प्रत्यवायो न विद्यते-मतलब कि प्रयासों का उल्टा फल भी नहीं होगा, क्योंकि उल्टा -पुल्टा फल तो तब होगा, जब वह फलाकांक्ष कर्म करेगा।
स्वल्पमपि अस्य धर्मस्य,
त्रायते महतो भयात्।।2/40।।

दूसरी और तीसरी अर्धाली में भगवान् इस कर्मयोग के आचरण से स्वत:प्राप्तव्य फल का निर्देश करते हुए कहते हैं कि, इस योग की साधना का अल्प प्रयास ही महान् ” भय ” से रक्षा करेगा।
इसके पहले उन्तालीसवें मन्त्र में कह आए हैं कि, ” बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ, कर्मबन्धं प्रहास्यसि ”
अर्थात् इस कर्मयोग पर चल कर तुम कर्मबन्धन को काट डालोगे।मतलब कि जन्मबन्ध से विनिर्मुक्त हो जाओगे।
इस प्रकार गीता गीत यह कर्मयोग का मार्ग ,जन्म-मृत्यु रूपी महान् भय से छुटकारा दिला देगा,मोक्ष प्राप्त होगा अथवा जीवात्मा को परमात्मा से मिला देगा।भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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नाम जप से भव बन्ध-मुक्ति

ईश्वर के स्त्री रूप अथवा पुरुष रुप में से किसी रूप का ध्यान और उनके नाम का स्मरण कलि काल में ,मुक्ति का साधन कहा गया है। निर्विवाद रूप से प्रमाणित है कि इस कलियुग में नर शरीर धारण का लक्ष्य ही भवबन्धन से मुक्ति है।इसके इतर धर्मार्थकाम की उपलब्धि पूर्वतः प्राप्त होने पर भी क्या विचित्रता है कि, मनुष्य मानव जीवन के चरम प्राप्तव्य मोक्ष को भूलकर कामादि के लिये ही सतत प्रयास रत रहता है।
बड़े-बड़े महापुरुषों ने बड़ी चतुराई से इस पर अपने विचार दिये हैं।देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र में शङ्कराचार्य ने कहा-
मुझे मोक्ष की आकांक्षा नहीं और न ही लोकवैभव अपेक्षित है।और किसी ज्ञान विज्ञान की आवश्यकता नहीं है, जिससे लेशमात्र सुख की कामना की जाये। अपेक्षित एकमात्र यही है कि, मेरा जन्म जब भी हो तो मृडानी -रुद्राणी -शिव-शिव भवानी नाम-जप होता रहे।
इस प्रकार की कामना में शुद्ध रूप से नामजप के फलस्वरूप पुनः जन्म को निवारित करने का भाव ही व्यक्त होता है।
बाबा तुलसी के शब्दों में तो इस भवबन्ध से मुक्ति का उपाय मात्र भगवन्नाम स्मरण ही है-

कलियुग केवल नाम अधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।
एक जगह कहते हैं-
नहिं कलि करम न भगति विवेकू।
राम नाम अवलम्बन एकू।।
अर्थात् कलिकाल में किसी अन्य धर्म-व्रत-कर्म की आवश्यकता नहीं है, मात्र नाम का आश्रय लेकर मुक्ति मिल सकती है।
भगवान् शिव ,पार्वती के साथ निरन्तर राम नाम जपते हैं।कृष्णं, जो मंगलकारी और अमंगलकारी है-
मंगल भवन अमंगल हारी।
उमा सहित जेहिं जपत पुरारी।।

कहाँ तक कहें, जिस नाम जप के कारण भगवान् गणेश को आदि पूज्यता प्राप्त हो गई-
महिमा जासु जानि गनराउ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।

एक बात सर्वविदित है कि, नाम और नामी में अभेद होता है।
ज्योंही नामस्मरण होता ,त्यों ही नामी के रूप,लीला, गुण,धाम की स्मृति उपस्थित हो जाती है और नामजापक अलौकिक रसमाधुरी में खोकर आत्म विस्मृति को प्राप्त हो जाता है।
यहाँ तक कि भगवत् स्मरण में निरत भक्त के कामक्रोधादि विनष्ट हो जाते हैं, और ऐसा व्यक्ति सभी में अपने प्रभु का दर्शन करने के कारण प्राणी मात्र से वैर-विरोध भूल जाता है-
उमा जे रामचरनरत,
विगत काममदक्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत,
केहिं सन करहिं विरोध।।

नाम जापक व्यक्ति की ,निरन्तर नामजप निरति के कारण,”सर्वं
खलु इदं ब्रह्म ” कीअवधारणा स्थिर होती जाती है।और लगता है भगवान् ने गीता में इसीलिए अनन्यभाव से स्मरण करनेवाले साधु को वचन भी दे डाला है कि, उसके अप्राप्त की प्राप्ति(योग)और प्राप्त वस्तुओं की सुरक्षा (क्षेम) की गारंटी मैं लेता हूँ-

अनन्या: चिन्तयन्तो मां,
ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां,
योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

अन्त में आदिकवि वाल्मीकि को सन्दर्भित कर गोस्वामी जी ने तो यहाँ तक कह डाला कि उलटा ही नाम का जप करके ,वे महाकवि ब्रह्मवत् पूजनीय हो गये-
उलटा नाम जपत जग जाना।
बालमीकि भये ब्रह्म समाना।।

तब इस कलिकाल में क्या कहें, नाम जप ही मुक्ति का उत्तम साधन सिद्ध होता है-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव
नास्त्येव गतिरन्यथा।।

इत्यादि पुराणवचनों से इस नाम संकीर्तन प्रकरण को भगवदर्पण
किया जा रहा है। भगवान् साहाय्य हों।

।।हरिश्शरणम्।।

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मोक्ष साधन हेतु मानव शरीर की स्वतंत्रता

मनुष्य शरीर के लिये धर्म, अर्थ, काम (भोग)और मोक्ष इन चारों को चार पुरुषार्थ माना गया है।ये चार अर्थ यानी कि चार प्रयोजनों के लिए मानव शरीर की प्राप्ति ,भगवत् कृपा और स्वयं के प्रारब्ध से हुई मानी गई है।
परन्तु यदि इन प्रयोजनों की गहराई में जायें, तो ऐसा लगता है कि प्रारंभ के तीन प्रयोजनों हेतु, मानव परतन्त्र है, जबकि अन्तिम और चरम प्रयोजन हेतु स्वतंत्र।
एक श्लोक पञ्चतन्त्र में आता है, जिसमें शिशु के गर्भस्थ होते ही पाँच चीजों को स्थिर या निश्चित कर दिया जाता है-

आयु:कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतान्यपि सृज्यन्ते
गर्भस्थस्यैव देहिनः।।

अर्थात् शरीरोत्पत्ति के पूर्व गर्भ में ही पाँच चीजें निश्चित हो जाती हैं-1-आयु,2-कर्म(पेशा)
3-वित्त (चलाचल संपत्ति),4-विद्या(अध्ययन)और 5-निधन।
इस प्रकार उक्त पद्य के आलोक में विचार करें तो चार पुरुषार्थों में ,आचारादि धर्मों का पालन,अर्थादि संपत्ति की प्राप्ति और इसके अनुसार कामोपभोग का निश्चयीकरण यदि पूर्व शरीर द्वारा गर्भ में ही तय हो जाते हैं, तब इनकी प्राप्ति में पूर्वत:परतंत्रता ही मानी जायेगी।
किन्तु मानवीय शरीर मुक्ति(मोक्ष) प्राप्ति में स्वतन्त्र प्रतीत होता है।उत्तर काण्ड में मानसकार ने भगवान् श्री राम के मुख से कहलवाया है-

साधन धाम मोक्ष करि द्वारा।पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।
सो परत्र दुख पावै
सिर धुनि धुनि पछताइ।
कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं
मिथ्या दोष लगाइ।।
एहि तन कर फल विषय न भाई
स्वर्ग-उ स्वल्प अंत दुखदाई।।

जो न तरै भवसागर।
नर समाज अस पाइ।
सो कृत निन्दक मन्दमति।
आत्माहन गति जाइ।।

बाबा तुलसीदास की उक्त पंक्तियों से साफ हो जाता है कि नर तन से ही चरमपुरुषार्थ मोक्ष साध्य है।और इसी अन्तिम पुरुषार्थ में पुरूष की अपनी स्वतंत्रता है कि वह जन्मादि बन्धनमुक्त होना चाहता है अथवा नहीं।

इस बात को गीताशास्त्र में भगवान भी बताते हैं, जब उन्होंने कहा-

कर्मणि एव अधिकार:ते

अर्थात् कर्मणि, इस एकवचन के प्रयोग से प्रतीत होता है कि एक मात्र कर्म, मुक्ति कर्म में ही मानव शरीर की स्वतंत्रता है।

दूसरे क्षण अगली पंक्ति है-

मा फलेषु कदाचन।

अर्थात् अन्य प्राप्तव्य परिणामों(फलों) की प्राप्ति पूर्व शरीर से सुनश्चित होने से उनके लिए परतंत्रता है।

अतः उक्त पर्यालोचन से यह बात उभर कर सामने आई कि मानव शरीर को अर्थ भोगादि ,शरीर संसारादि के लिए नियोजित नहीं करना चाहिए क्योंकि वह तो पूर्व कर्मों से, मिलना ही है।
इस शरीर का चरम फल तो मोक्ष है।भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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