नाम महाराज की वन्दना – १

कलिपावनावतार गोस्वामीजी बालकाण्ड के प्रारम्भ में ही, ” नाम ” की वन्दना करते हैं।वे कहते हैं कि, मैं श्रीरघुनाथजी के राम-नाम की वन्दना करता हूँ , जो कृशानु(अग्नि) भानु(सूर्य)और हिमकर
(चन्द्रमा) के हेतु हैं ,क्योंकि ये ती अक्षर
क्रमशः ” र ” “आ ” और “म” उक्त तीनों के
बीज रूप हैं।यही नाम ब्रह्माविष्णुशिव का
रूप , वेदों का प्राण,निर्गुण-सगुण-ब्रह्म और सारे गुणों का कोश है-

वन्दौ नाम राम रघुवर को।
हेतु कृशानु भानु हिमकर को।।
विधि हरि हरमय वेद प्रान सो।
अगम अनूपम गुन निधान सो।।

यह नाम ही ऐसा है, जिसका उलटा रूप मरा-मरा कहते हुए अशुद्ध निषिद्ध कर्म करनेवाले वाल्मीकि जी विशुद्ध हो गए। साथ ही यह जान कर कि एक बार भी जपा गया रामनाम, भगवान् के हजार नामजप का फलदायक है, जगदम्बा पार्वती सदैव अपने पति(शिवजी) के साथ राम नाम जपा करती हैं-

जानि आदिकवि नाम प्रतापू।
भयेउ शुद्ध करि उलटा जापू।।
सहस नाम सम सुनि शिव बानी।
जपि जेई पिय संग भवानी ।।
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।

इन्ही नाम महाराज का जप करते हुए भगवान् शिव ने काशी-क्षेत्र को मुक्ति दायक बना दिया और उनके पुत्र श्रीगणेशजी ने लोकालोक में सर्वत्र प्रथम पूजनीयता प्राप्त कर ली-

महामन्त्र जेहि जपत महेसू।
काशी मुक्ति हेतु उपदेसू ।।
महिमा जासु जानि गनराऊ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।

ब्रह्म-जीव सम सहज सँघाती और नारायण सम सरिस सुभ्राता ये दोनों “र” और “म” जीवात्मा-परमात्मा की स्वाभाविक एकता को दिखाते हैं। और तो और ये “भक्तिस्त्री” के कर्णाभूषण दोनों अक्षर जगत् के लिये हितकारी सूर्य-चन्द्र हैं-

भगति सुतिय कलकरन विभूषन।
जग हित हेतु विमल विधु-पूषन ।।

ये ही सुन्दर गति(मुक्ति) रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान हैं। कच्छप और शेषनाग के समान धरती को धारण करने वाले तथा भक्तों के मन रूपी कमल में बिहरने वाले भ्रमर एवं जिह्वा रूपी यशोदा के लिए कृष्ण-बलराम हैं-

स्वाद तोष सम सुगति सुधा के।
कमठ शेष सम धर वसुधा के ।।
जनमन मंजु कंज मधुकर से।
जीह जसोमति हरिहलधर से।।

इस रामनाम का “र” अक्षर छत्र के समान और “म” अक्षर मुकुट-मणि के समान सभी वर्णों के ऊपर होकर विराजता है। रेफस्य ऊरध्वगमनम् और मोनुस्वारः –

एक छत्र एक मुकुटमनि,
सब बरननि पर जोउ ।
तुलसी रघुवर नाम के,
बरन विराजत दोउ ।।

नाम (राम) लेने पर नामी(रूप) प्रकट हो जाता है। इस नाम-रूप में कौन छोटा या बड़ा है, यह कहना अपराध है, क्योंकि नाम-नामी में अभेद। संसार का भी सहज ही नियम है कि, नाम लेने पर नामी आ जाता है, इसे साधु-महात्मा-भक्तजन बखूबी जानते हैं-
को बड़ छोट कहत अपराधू।
सुनि गुनि भेद समुझिहहिं साधू।।
इस प्रकार का ” राम” नाम का मणि रूपी दीपक जिह्वा रूपी देहरी के दरवाजे पर, यदि सतत विराजमान हो तब लोकालोक की प्राप्ति सहज ही हो जाय। संसार का गूढतम रहस्य प्रकाशित हो जाय और समस्त सिद्धियाँ भी प्रकट हो जायें-

राम नाम मनि दीप धरि,
जीह देहरी द्वार ।
तुलसी भीतर बाहरेउँ,
जो चाहसि उजियार।।

जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ।
नाम जीह जपि जानहिं तेऊ।।
साधक नाम जपहिं लय लाये।
होहिं सिद्ध अनिमादिक पाए।।

भगवान् कृपा करें जिससे सतत नाम-स्मरण चलता रहे, क्योंकि यही भगवान् अपने श्रीकृष्णावतार में ‘ माम् अनुस्मर युध्य च’ कहकर संसार के जीवन युद्ध को जीतने का रहस्य प्रकट करते हैं।

।। हरिः शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2019/09/25/नाम-महाराज-की-वन्दना/

मुक्तसङ्गः समाचर।

गीता के तीसरे अध्याय में भगवान् एक बड़ी बात कहते हैं। यह बात सभी मनुष्यों हेतु कही गई है- मुक्तसंग(आसक्ति) से मुक्त होकर आचरण करो।
पूरा श्लोक है-
यज्ञार्थात् कर्मणः अन्यत्र,
लोकः अयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय,
मुक्तसङ्गः समाचर।।
भावार्थ ये है कि- यज्ञ यानी कि – यज्ञः वै विष्णुः( भगवान्) के प्रीत्यर्थ(तन्निमित्त) कर्मो के सिवाय किए गए अन्यत्र कर्म ही संसार बन्धन के कारण होते हैं। कामना सक्त या फलासक्त होकर जब कर्म किए जाएंगे तो वह निश्चित रूप से जन्ममृत्यु के चक्कर में डाले रहेंगे। अतः यज्ञार्थ अथवा भगवदर्पण बुद्धि से कामनाओं से अनासक्त होकर कर्म किया जाना चाहिए।
विशेष ध्यान यह भी रहे कि संग(आसक्ति)मतलब कि विषयासक्ति से मुक्त रहते हुए ,प्रत्येक मुक्तिकामी मनुष्य को आचरण करना चाहिए। गीता के उक्त सन्देश से सम्बन्धित एक प्रसिद्ध पौराणिक आख्यान आता है।

यह आख्यान सती मदालसा का है।विभिन्न आख्यानों के अनुसार मदालसा को कुल चार पुत्र हुए थे। जब प्रथम तीनों पुत्र सन्यासी हो गये , तब चौथे पुत्र की उत्पत्ति के पूर्व उनके पति ने सती से आग्रह किया कि चौथा पुत्र ऐसा होना चाहिए, जो हमारा उत्तराधिकारी बन सके ,नहीं तो राज्य-कार्य कैसे चलेगा। इस पर मदालसा ने अपनी सहमति व्यक्त की और पुत्र होने पर स्वयं उसके नामकरण की बात कही।
समयानुसार पुत्र होने पर मदालसा ने इस चतुर्थ पुत्र को सकाम शिक्षा देते हुए इसका नाम ” अलर्क ” रखा। बड़े होने पर अलर्क का राज्याभिषेक हुआ और उसने शासन संभाल लिया।
कालान्तर में कुसंगति से इनका राज्य छिन गया और ये जंगल में चले आये। यहीं अलर्क को अपनी माता द्वारा दिये गए यन्त्र की याद आई, जिसे माँ ने अत्यंत संकट में खोल कर देखने के लिए कहा था। जब यन्त्र खोला गया तो उसमें एक सूक्ति लिखी थी। जिसके अनुसार ,संग को
सब प्रकार से त्याग देना चाहिए।संग का मतलब यहाँ भी विषयासंग या फलासंग ही है। आगे का भाव ये है कि, यदि यह संग त्याग संभव न हो , तो यह आसंग साधुओं-सज्जनों से जोड़ देना चाहिए।क्योंकि वीतरागी साधुओं का संग तो इस मानवीय-जीवन के चरम लक्ष्य की परम औषधि है-
सङ्गः सर्वात्मना त्याज्यः,
स चेत् त्यक्तुं न शक्यते।
स सद्भिः सह कर्तव्यः,
सतां सङ्गो हि भेषजम्।।

अतः मनुष्य मात्र को भगवान् एवं भक्तिमती सती मदालसा के उक्त वचनों को आत्मसात् करते हुए श्रेष्ठ मानव जीवन के लिये मुक्तसंग होकर आचरण करना चाहिए। भगवान् एवं उनके प्यारे भक्तजन
अनुग्रह करें और अनासक्त मानव जीवन बन सके।

।। हरिः शरणम् ।।

http://shishirchandra.com/2019/08/12/मुक्तसङ्गः-समाचर।/

गावत नर पावहिं भव थाहा

कलिपावनावतर गोस्वामी जी का “मानस” एक ऐसा ग्रन्थ है ,जिसमें सारी समस्याओं का समाधान है। मनुष्य को मनुष्य बनाने और और इस शरीर के बाद पुनः अन्य शरीर का जन्म न हो, इस बड़े कार्य का अत्यन्त सरल उपाय सुझाया गया है।
बाबा ने बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक अनेक चौपाइयों और प्रसंगों में भगवान् के नाम-लीला गुणों का स्मरण कलि-प्रभाव नाश और संसार मुक्ति के रूप में स्मरण किया है।
उत्तरकाण्ड में भगवन्नाम और गुणों का स्मरण करने पर संसार सागर से पार होने का प्रमाण उपस्थित करते हैं।
कलियुग केवल हरि गुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव थाहा।।
भैय्या! प्रारम्भ में ही आदिपूज्य गणेशजी का स्मरण करते हुए नाम उच्चारण को उनकी आदि पूज्यता का कारण ही कह दिया है-
महिमा जासु जानि गनराऊ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।
भक्तश्रेष्ठ हनुमानजी महाराज ने तो भगवान् का नाम रटते-रटते जैसेउन्हें अपने वश में ही कर रखा है-
सुमिरि पवनसुत पावन-नामू।
अपने वश करि राखे रामू।।
नारायण! भगवान् किसी भी नाम का स्मरण मात्र तत्काल कष्टों से, विपत्ति से मुक्ति का सद्यः उपाय है, अनेकानेक पुराणों की अनेकानेक कथायें इस बात की साक्षी हैं। अरे भाई ! सज्जनों को इस बात स्वयं अनुभव करके देखना चाहिए कि नाम-जप कैसे दुःखभवसागर को ही सुखा देने में सर्वसमर्थ है-
नाम लेत भव-सिन्धु सुखाहीं।
सुजन विचार करौं मन माहीं।।
और क्या कहें इस कलिकाल में जब पूजा पाठ की विधि और सामग्रियां जब निर्दुष्ट नहीं रह गई हैं, तब नामाश्रय से बड़ा कोई उपाय नहीं।और क्या कहें नारायण भी अपने नाम का महत्व बता पाने में असमर्थ हो जाते हैं-
कहहुँ कहाँ तक नाम बड़ाई।
राम न सकहिं नाम गुन गाई।।
चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।
कलि विशेष नहिं आन उपाऊ।।
एक जगह महाभाष्यकार पतञ्जलि ने किसी भी एक शब्द का सम्यक् अर्थ जानकर उसके समुचित प्रयोग को लोक और परलोक में परम कल्याण करने वाला बताया है, तब भगवन्नाम का जप स्मरण क्यौं नहीं उपकारी और मुक्तिकारी सिद्ध होगा?
नारायण! एक पुराण में चर्चा है कि एक ही बार श्रीभगवान् ” हरि ” के नाम के अक्षर द्वय का उच्चारण मनुष्य को मुक्ति का अधिकारी बना देता है-
सकृद् उच्चारितं येन,
हरिः इति अक्षरद्वयम्।
बद्धः परिकरः तेन,
मोक्षाय गमनं प्रति।।
और यदि कोई बार -बार अपराध करे और यह सोचे कि नाम का उच्चारण करके वह बारम्बार इससे मुक्त होता रहेगा, तो यह बहुत बड़ा नामापराध बनेगा, जिससे मुक्ति सद्यः सम्भव नहीं।
अतः भगवान् कीऔर सन्त-महात्माओं की कृपा बने ,जिससे नित्य निरन्तर श्री भगवान् के नामों का उच्चारण होता रहे, और नामाश्रयी नारदादि ऋषियों तथा भक्त श्रेष्ठ हनुमानजी महाराज की कृपा करुणा का पात्र होया जा सके।

।।हरिः शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2019/07/04/गावत-नर-पावहिं-भव-थाहा/

ताहि भजन तजि भाव न आना

” मानस “ के सुन्दरकाण्ड में भगवान् और भक्त के अत्यन्त मार्मिक हृदय के मनोरम उद्गार यत्र तत्र सर्वत्र विकीर्ण हैं। और हो भी क्यों नहीं क्योंकि सुन्दरकाण्ड का सौन्दर्य भक्तिमती भगवती सीता और भक्तपरायण भगवान् की भावभूमि पर आधारित है।
यह भक्त और भगवान् की अद्भुत आत्मीयता है ,जब भगवान् के द्वारा लंका निर्दहन के बारे में पूछने पर हनूमान् जी कहते हैं कि –
सो सब तव प्रताप रघुराई।
नाथ न कछू मोर प्रभुताई।।
हे भगवन्! लंका जल गई उसमें मेरा क्या ,वह तो सब आपका प्रताप था मेरी कोई बड़ाई नहीं। और क्या कहूँ, उसके लिये अगम क्या है, जिस पर आपकी कृपा हो जाय, जैसे कि बडवानल को रूई भी जला सकती है-
तव प्रभाव बडवानलहि ,
जारि सकै खलु तूल ।।
इस पर भी हनुमान् जी महाराज भगवान् से अनपायनी(निश्चल) भक्ति का वरदान माँगते हैं और भगवान् भी ” एवमस्तु ” कह कर तत्काल अनुमोदन कर देते हैं।
इस घटना के बाद भक्त – भक्ति और भगवान् के स्व- स्वभाव पर सुन्दर काण्ड की बड़ी सुन्दर पंक्ति आती है-
उमा राम स्वभाव जेहि जाना।
ताहि भजन तजि भाव न आना।।
मतलब कि हे भगवती पार्वतीजी जो लोग भगवान् के अत्यन्त-अत्यन्त कोमलतम स्वभाव को जानते हैं ,उन्हें भजन-भक्ति के अतिरिक्त दूसरा भाव आ ही नहीं सकता।
भाव तो आध्यात्मिकता की आधारशिला ही है ,जिस पर भगवद्-भक्ति टिकी रहती है। भक्त और भगवान् को परस्पर ही समझा जा सकता है। और देवाधिदेव महादेव ने इसीलिए एक दूसरे प्रसंग में संसार को स्वप्नवत् और भजन-भाव को ही सत्य-सार -रूप कह दिया है-
उमा कहहुँ यह अनुभव अपना।
सत हरिभजन जगत् सब सपना।।

भगवान् और उनके भक्त कृपा करें और उनकी निश्चल भक्ति प्राप्त हो।

।।हरिः शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2019/06/18/ताहि-भजन-तजि-भाव-न-आना/

संपत् नारायणस्मृतिः

संसार का ही नहीं प्रत्युत स्वर्गादि लोकों का भी श्रेष्ठ मानव शरीर , सांसारिक सुखों को ही महत्व बुद्धि से ग्रहण करता है। अब ऐसी स्थिति में जब उसे मालूम है कि एक के बाद एक अस्थिर संसार-भोगों और पदार्थों को प्राप्त करने और त्यागते रहने पर भी स्थायी सुख और आनंद की प्राप्ति अभी तक नहीं हुई। इसका कारण वह न खोजता है और खोजना चाहता है।
केवल सांसारिक सुखों की मृगमरीचिका में उसकी दशा उस भौंरे की तरह है जो रात बीतने और सुख के सुप्रभात और सूर्य की आशा में है। किन्तु हाथी रूपी काल का एक प्रहार ,उस कमल कोशी सुखान्वेशी भ्रमर पर ऐसा होता है कि, कि स्वयं नष्ट होकर, पुनः एक दूसरी योनि की यात्रा पर चल पड़ता है।और यही क्रम दुहराया जाता रहता है।विश्रांति और आनंद नहीं मिलता-

रात्रिः गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कजालिः।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे
हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार।।

अब वास्तविक बात तो यह है कि अविनाशी भगवान् का अंशमात्र यह जीवात्मा मनुष्य उस अविनाशी परमात्मा को छोड़कर, जिस विनाशी संसार में और उसके भोगों में सुखान्वेषण कर रहा है, वह वस्तुतः उसमें है ही नहीं।
वास्तविक बात तो यह है कि जब यह अविनाशी जीवात्मा विषयों और भोगों को ही सम्पत्ति और इन विषयसुखों के वियोग को विपत्ति मानता है, तब वह एक मानवीय और वास्तविक संपत्ति- सुखों से दूर ही रहता है।
निश्चित रूप से यदि विषय भोग के समय भी भगवद् स्मरण बना रहे,और यह स्मृति रहे कि सारे अनुभवों के मूल स्वयं परमात्मा हैं ,और यदि वे इस शरीर से हट जाँय ,तो कौन प्राणन की क्रिया करेगा?
कौन देखेगा? सुनेगा?
ऐसी स्मृति होते रहने पर संसार या संसारेतर कोई भी विपत्ति स्पर्श नहीं कर सकती-

दुख में सुमिरन सब करै,
सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै,
तो दुख काहे को होय।

भगवान् श्रीराम ने सुन्दरकाण्ड में एक संकल्प ज्ञापित किया है कि यदि मन वचन और कर्म से कोई जीव सतत मेरा स्मरण बनाये, रखेगा तो बताओ प्रत्यक्ष क्या कहें, अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्षवत् सपने में भी उस व्यक्ति को कोई विपत्ति नहीं आयेगी।
इसका अनुमोदन भक्तश्रेष्ठ हनूमान् जी महाराज तत्काल करते हुए कहते है कि-
हे भगवन् विपत्ति तो तभी है ,जब जिस काल में आपका स्मरण, भजन नही होगा।

कह हनुमन्त विपति प्रभु सोई।
जब तव सुमिरन भजन न होई।।

ऐसा ही संकल्प पुराण भी व्यक्त करते हैं।जब भगवान् व्यास जी उस विपत्ति को विपत्ति कहते हैं जब भगवान् का स्मरण नहीं होता।और संपत्ति तो उसी को कहते हैं, जब नित्य निरन्तर भगवद्स्मृति बनी रहती है-

विपदो नैव विपदः,संपदो नैव संपदः।
विपद् विस्मरणं विष्णोःसंपन्नाराणस्मृतिः।

अतः साधु, महात्मा और भगवत् प्रेमी भक्त कृपा करें , कि भगवत् स्मृति बनी रहे।

।।हरिश्शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2019/05/24/संपत्-नारायणस्मृतिः/

यहाँ रोम रोम स्याम है

संसार में जो कुछ दीख रहा है, सब ब्रह्ममय है। हमारे वेदादि शास्त्र ऐसी ही दृढ बात व्यक्त करते हैं। संसार जो कुछ दृश्य है,वह प्रतिक्षण बदल रहा है, केवल एक जो नहीं बदल रहा है, वह सर्वकारण कारण एकमात्र परमेश्वर।
अब इस सर्वकारण कारण में जिसका मन लग जाय,सन्तकृपा या भगवन्त कृपा से , उसको तो किसी से कोई प्रयोजन नहीं, होगा-
हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।
ऐसे भगवत्प्रेमी का किसी से कोई न विरोध होगा और न ही भोग,मोक्ष या रिद्धि सिद्धि की कामना-
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध।।
और
चहौं न सुगति सुमति संपति कछु
रिधि सिधि विपुल बड़ाई।
हेतुरहित अनुराग रामपद बढ़ु अनुदिन
अधिकाई।।
अब भगवदनुरागी गोपियों की दशा भी ऐसी भगवद् दृष्टि मय हो जाती है कि वे किसी अन्य ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकतीं, वे कहती हैं कि मनचोर ने हमारा मन चुरा लिया है , क्योंकि हमारी ही प्रार्थना पर जब से उन्होंने मेरी ओर देख क्या लिया है, हमको उनके सिवा कुछ दीखता ही नहीं-
मधुकर स्याम हमारे चोर।
मन हर लियो माधुरी मूरति
निरखि नयन की ओर।।
और परब्रह्म के पूर्णावतार श्रीकृष्ण की दृष्टि हो अथवा उनके प्रेमी भक्तों की , जब किसी जीवात्मा पर वह प्रेममयी करुणा दृष्टि पड़ जाये तो उसे जित देखूँ तित श्याममयी है और तो और – रोम -रोम श्याम ही सूझता है। भगवान् की कृपा के आकांक्षी को सभी ओर प्रभु ही दीखते हैं-

यो मां पश्यति सर्वत्र ।
सर्वं च मयि पश्यति।।
तस्याहं न प्रणश्यामि।
स च मे न प्रणश्यति।।

यही दशा दिशा भगवत् प्रेम में व्याकुल गोपी-मन की है, जिन्हे भगवान् के अतिरिक्त स्वयं अपने शरीर में अथवा और भी कहीं, दूसरा कोई सूझता ही नहीं-
स्याम तन स्याम मन स्याम है हमारो धन,
आठों याम ऊधो हमें स्याम ही सों काम है।
स्याम हिये स्याम हिये स्याम बिनु नाहिं तिये,
आँधे की सी लाकरी अधार स्याम नाम है।
स्याम गति स्याम मति स्याम ही है प्रानपति
स्याम सुखदाई सों भलाई सोभाधाम है।।
ऊधो तुम भये बौरे पाती लै के आए दौरे,
जोग कहाँ राखैं यहाँ रोम रोम स्याम है।।

सन्त भगवन्त कृपा करैं और ऐसी दृष्टि प्राप्त हो जाये।

।।हरिः शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2019/05/01/यहाँ-रोम-रोम-स्याम-है/

सत्संगति संसृति कर अन्ता

सत्संगति से जन्म-मृत्यु रूप चक्र का विनाश होगा। क्योंकि असत्संगति से तो असद् रूप संसार में ही आने जाने का क्रम चलता रहता है। तब यह मान लिया जाय कि सत्संगति से ही मुक्ति होगी।
अब प्रश्न होता है कि सत् की संगति कैसे हो? तब इसका सरल उत्तर है कि जो सत् के मार्ग पर चलने वाले साधु ,सज्जन, सन्त,महात्मा, सद्गुरु हों ,उन्हीं की शरण लेनी होगी। इन्हीं सन्तों का सामीप्य मुक्ति का सर्वात्मना साधन है।
अब प्रतिप्रश्न होता है कि वे कौन से कारण अथवा उपाय हैं, जिनसे ऐसे स्वयं मुक्तात्मा विमलात्मा पुरुषों का साहचर्य हो।
तब इसका उत्तर श्रीमदाद्य शङ्कर देते हुए स्वीकारते हैं कि ऐसे सद्गुरुदेव की प्राप्ति और मुक्ति अनेकानेक जन्मों में अर्जित पुण्यों द्वारा सम्भव है-

मुक्तिः नो शतकोटि जन्मसु कृतैः
पुण्यैः विना लभ्यते।।

सैकड़ों-करोड़ों जन्मों में एकत्रित होती हुई सदाचार सम्पनता द्वारा, जब इसकी परिपूर्ण और परिपक्वावस्था आती है ,तब जाकर सन्त-सद्गुरु-मिलन और मुक्ति हो पाती है।
उत्तरकाण्ड में बाबा तुलसी अपने उपास्य भगवान् श्रीराम के श्रीमुख से यही सिद्ध करते दीखते हैं, जब भगवान् कहते हैं-
पुण्य-पुंज बिनु मिलहिं न सन्ता।
सत्संगति संसृति कर अन्ता ।।
इन सभी बातों को समझने में एक तत्व और प्रकट होता है, जब एक दूसरा कारण भी ,सन्त- सद्गुरु की प्राप्ति का उसी जगह दीखता है। वह दूसरा कारण है- श्रीभगवान् हरि की कृपा-
अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता।
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता।।

” मानस ” के सुन्दरकाण्ड में हनुमान् जी से विभीषण का कथन है, कि उन्हे यह विश्वास हो गया कि बिना भगवत्कृपा के हनुमान् जैसे तत्वज्ञ सन्त का मिलन सम्भव नहीं है।
उक्त सन्दर्भों में कोई विरोध नहीं, क्योंकि जब सदाचार-सम्पन्न जीवन होगा तभी विवेक की पुष्टि होगी ,और जहाँ विवेक की पुष्टि का कारण भी सत्संग है,वहीं रामकृपा का आश्रय सन्त सद्गुरु की कृपा दीखती है-

बिनु सतसंग विवेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
और –
जब द्रवैं दीनदयाल राघव साधु संगति पाइये।
इस तरह पुण्यार्जन से यदि सद्गुरु प्राप्ति को माना जाय तो इसका मतलब है कि, हमें स्वयं चल कर अन्वेषण पूर्वक सन्त के पास जाना होगा। और सन्त स्वयं चल कर मुक्ताकांक्षी के पास पहुंचें , तो हरि-कृपा।
इसमें यह बात दृढतर होती है कि बिना पहुंचे हुए सन्त- सद्गुरु की शरण ग्रहण किए कौन है ,जो बद्ध-जीव को उस पार पहुंचा दे,जहाँ माया का घेरा नहीं और संसृति-संसार का अँधेरा नहीं।
अतः श्रीमदाद्य शङ्कर की वाणी से विराम लेता हूँ, जहाँ सन्त-शिरोमणि के चरण-शरण में मुक्ति लिखी है-

सन्तं महान्तं समुपेत्य देशिकं,
तेन उपदिष्टार्थ- समाहितात्मा।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2019/04/19/सत्संगति-संसृति-कर-अन्ता/

अर्थे शुचिः स शुचिः

चैत्र शुक्ला प्रतिपदा विक्रम संवत् 2076 का आज का दिन हिन्दू नववर्ष का प्रथम दिवस है, जब विधाता ने सृष्टि की संरचना पूर्व-पूर्व के अनेक” कल्पों “की भाँति प्रारम्भ करने का संकल्प लिया-
” धाता यथा पूर्वम् अकल्पयत् “

आज हम सभी परस्पर मंगलकामी होकर भगवद्-भाव और वस्तुतः भगवत्-सम्बन्ध की स्मृति के आलोक में आर्ष-वाणी का जयघोष लिए “वसुधैव कुटुम्बकम् “ की भावना से पौनःपुन्येन मंगल की आशंसा कर रहें हैं।इन सभी मंगलों के मूल में मुझे अपने पिता का स्मरण हो रहा है।वे कहते थे कि संसार में मंगल का आदान-प्रदान तभी सम्भव है, जब जीवन में शुचिता और सदाचार-सम्पन्नता आ जाए।इस सदाचार सम्पन्नता और शुचिता का सम्बन्ध कमाए हुए धन से है। वे एक सिद्धांत वाक्य कहा करते थे- अर्थे शुचिः स शुचिः।
मतलब कि अर्जित किए जाने वाला धन भी वैदिक सदाचार पूर्वक हो ,क्योंकि जीवन में पवित्रता(शुचिता)का आधार और आधान तभी संभव है, जब वह धन अन्यायोपार्जित न हो। अर्थ की शुचिता नहीं होगी,तो यह स्वयं और आनेवाली पीढियों पर भी भारी पड़ेगा।अतः मनुष्य मात्र को इस पर बहुत ध्यान देना चाहिए।
उनकी उक्त अर्धाली आर्ष है,जिसे इस प्रकार समझना चाहिए-सभी प्रकार की पवित्रता(शुचिता)में अर्थ(धनसंपत्ति)
की शुचिता सर्वश्रेष्ठ है।जो अर्थ को न्याय पूर्वक पवित्र भाव से अर्जित करता है, वह पवित्रतम है।मिट्टी-पानी और साबुन से होनेवाली पवित्रता तो वाह्य शरीर की शुद्धि मात्र है-
सर्वेषामेव शौचानाम् अर्थशौचं परं स्मृतम्।
योर्थे शुचिः स शुचिः न मृद्वारिशुचिः शुचिः।
वस्तुतः धृति-क्षमा-दम-अस्तेय-शौच-इन्द्रियनिग्रह-धी-विद्या-सत्य और अक्रोध आदि दश-धर्म-लक्षणों में पंंचम स्थानी यह शौच शब्द मानव जीवन के लिये अत्यंत और अत्यंत ही महत्व का है।
मित्रों! शुद्ध एवं सात्विक तरीकों से अर्जित धन से वाह्याभ्यन्तर शुचिता प्राप्त होगी अन्यथा नहीं।
इस सम्बन्ध में महाभारत में एक प्रसंग आता है, जहाँ ” भीष्म पितामह ” ने इस अर्थ की उत्कृष्टता और निकृष्टता की चर्चा की है।वे कहते हैं- मनुष्य तो अर्थ का दास है।अर्थ किसी का दास नहीं।ऐसा समझ कर हे महाराज! मैं भी अर्थ से बँधा हूँ।मुझे कौरवों ने इसी कारण से बाँध रखा है।यह अर्थ का ही दोष है कि मेरी बुद्धि भी मलिन हो गई है-

अर्थस्य पुरुषो दासः,दासः तु अर्थो न कस्यचित्।
इति मत्वा महाराज ,बद्धः अस्मि अर्थेन कौरवैः ।।

पितामह इसी अर्थ को कोस रहे हैं, जो कौरव-राज और राज्य से प्राप्त है, क्योंकि इसी से उनकी बुद्धि विकृत हो गई।और द्रौपदी के चीरहरण जैसे जघन्य कर्म को भी देखना और सहना पड़ा।
इस प्रकार हम सभी को इस मानव रूप में और मानव जीवन में भगवत्-प्रीतिपूर्वक
भगवदर्पण बुद्धि से विवेक तथा न्याय से अर्थोपार्जन करना श्रेष्ठ है।और इसमें काल
कर्म-स्वस्वभाव के गुणों की भी महत्तर भूमिका है, जिससे जीव यन्त्र वत् माया के पति का ध्यान नहीं करता हुआ केवल माया( धन-सम्पत्ति)के येन केन प्रकारेण उपार्जन मे लगा रहता है। जब तक किसी सन्त-महात्मा, परंसिद्ध साधक की करुणा पूर्ण दृष्टि इस जीव पर नहीं पड़ती, तब तक कामनाओं(अर्थों) का दास बना हुआ यह मानवाकृति मनुष्य- गतागतं कामकामा लभन्ते – को चरितार्थ करता रहता है।
नारायण! माया का पर्दा ही ऐसा है, जो उसे अपनी आवरण और विक्षेप शक्तियों के अधीन करके मोह-पाश में जकड़ कर सारे अर्थों में अशुद्ध (अशुचि) किये हुये है। और इससे छुड़ाए कौन?

तो – तुलसिदास यह जीव मोह-रजु जो बाँधे सोइ छोरै।

 कल के दिन हमारे मलूकपीठ वाले सद्गुरु आचार्य राजेन्द्रदास जी महाराज इसी सन्दर्भ में मलूकदास जी के एक दोहे का स्मरण कर रहे थे। भाव यों था कि मायिक कष्टों से निवृत्ति के लिये जीव को बड़ी सावधानी से ” माया ” नहीं ,वरन् मायाधीश की अनन्यशरण ग्रहण करनी होगी ,और तब तो मायाका आवरण छिन्न हो जायेगा तथा वह स्वयं चेरी(दासी) बन जायेगी, जिससे ” अर्थ ” की शुचिता और अशुचिता का निरास उस ” महारास ” के ” रस ” में डूब जाने पर ” भाव ” की परम परम दशा में सुलभ हो जायेगा-

माया को सब कोइ भजै, माधव भजै न कोय ।
माया तजि माधव भजै, तो माया चेरी होय ।।

।। हरिश्शरणम् ।.

https://shishirchandra.com/2019/04/07/अर्थे-शुचिः-स-शुचिः/

भक्ति और उसके पाँच काँटे

ज्ञान, कर्म और भक्ति को शास्त्र और सन्त महात्मा मुक्ति का साधन मानते हैं। इन सभी को सरलतया समझें तो कर्म का मतलब जहाँ भगवदर्पण बुद्धि से किया जाने वाला कार्य है , तो ज्ञान का अर्थ परमात्म अनुभव और भक्ति माने आत्मा का अनुभव।

आत्मानुभूति भक्ति, परमात्मा की अनुभूति ज्ञान और परार्थकृत कर्म को कर्म संज्ञा दी जा सकती है।
मुक्ति के इन त्रिविध साधनों में अत्यंत सहज और महत्वपूर्ण साधन भक्ति ही है।

मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी।
स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते।।

ऐसा विचार व्यक्त करने वाले आचार्य शङ्कर ने एक बड़ी बात इस सन्दर्भ में. और कही है कि, इस भक्ति की प्राप्ति में अत्यन्तात्यन्त समस्या अहंबुद्धि है,जो इस बन्धन से मुक्त नहीं होने देती।वे कहते हैं कि, जब तक अहंकार की शक्ति बढ़ी-चढ़ी रहती है, तब तक कोई विद्वान् उसका सहसा नाश भी नहीं कर सकता, क्योंकि जो पुरुष निर्विकल्प समाधि में अविचल-भाव से स्थित हो गए हैं उनमें भी अनन्तानन्त जन्मों के प्रारब्ध वश और अक्षीण वासनावश अहं निवृत्ति कठिन है।

आरूढ -शक्तेः अहमो विनाशः
कर्तुं न शक्यः सहसापि पण्डितैः।
ये निर्विकल्पाख्यसमाधि-निश्चलाः
तान् अन्तरानन्तभवा हि वासना।।

इस अहंकार को पाँच प्रकारों में सन्त जन बाँटते हैं, जो कि भक्ति-मार्ग के पाँच बड़े-बड़े काँटे हैं, इनकी निवृत्ति के बिना स्वस्वरूपानुसन्धान या भक्ति सम्भव नहीं है।और भक्ति के बिना मुक्ति कहाँ?

ये पाँच काँटे इस प्रकार हैं-

जातिः विद्या महत्वं च,
रूप -यौवनम् एव च।
पञ्चैते यत्नतः त्यज्याः।
एते वै भक्तिकण्टकाः।।

जात्याभिमान, विद्याभिमान, पद या ऐश्वर्य वश होने वाला महत्वाभिमान,रूपाभिमान एवं यौवनावस्था का अभिमान।
और इसकी मीमांसा करें तो ये बातें केवल और केवल देहाभिमान वश होती हैं। यह प्राप्त हुई देह प्रारब्धानुसार है अथवा भगवत्कृपा वशात्।
इन सबके अतिरिक्त प्राप्त हुई आयु, कर्म(व्यवसाय), वित्तादि, विद्या और मृत्यु का देश-काल-प्रकार, यदि प्रारब्ध वशात् गर्भस्थ शिशु में जन्म-पूर्व ही निश्चित हो जाते हैं, तब अभिमान क्यों?

आयुः कर्म च वित्तं च विद्यानिधनमेव च ।
पञ्चैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः।

अतः सन्त-भगवन्त का आश्रय लेते हुए भक्ति की प्राप्ति और तत्प्राप्ति से मुक्ति की पुष्टि करणीय है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2019/03/10/भक्ति-और-उसके-पाँच-काँटे/

गुरुमुख होना

बचपन से ही एक बात सुनता आ रहा हूँ, अमुक गुरुमुख हो गये और अब ध्यान भजन पूजन ही उन गुरुमुख सज्जन का अभिन्न अंग है। निरन्तर गुरुमुखता की यह बात सुनते-सुनते बड़ा लम्बा कालखण्ड अखण्ड ब्रह्माण्ड का अविकल कालांश बन चुका है। और बचपन से अब तक की प्रौढ अवस्था तक इस रहस्यपूर्ण गुरुमुख होने के अर्थ में बड़ा परिवर्तन भी हो चुका है।लेकिन बचपने में इसका जो एक मौलिक अर्थ समझ में आया वह परम और परम लक्ष्य यही लगा था कि इसका मतलब है जीवन से मुक्ति।
यह जीवन्मुक्तता आखिर में है क्या? तो लगता है कि तब और अब के ज्ञान का परिमार्जन होकर एक ऐसी दृष्टि और दृढतर बुद्धि का विकसन ,जिससे भेद मिट जाय, यही कहीं जीवन्मुक्तता तो नहीं। और यही सही भी है।यह सारी मुक्ति का दायक गुरु ही है, जिसकी कृपा से या गुरुमुखता से यह जगत् ही जगत् नाथ के रूप में दीखने लगता है।
अच्छा, रहा गुरुमुख होने का अर्थ, तो वह अत्यन्तात्यन्त और सर्वसाधारण है,जो मेरे मन में आता है। मतलब कि जो विषयी जीव, विषय-मुख अर्थात्-
शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध-मुख है वह इनमें और इनसे विरत होकर परमानन्द के अविच्छिन्न स्रोत परम ज्ञान-स्वरूप ” गुरु ” की ओर अभिमुख हो जाय। और यह गुरु दूसरा कोई नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा ही है। वस्तुतः संसाराभिमुख और विषयवश नीचे और नीचे की सीढ़ी पर फिसलते हुए जीव पर किसी गुरु-भगवान् की करुणा पूर्ण दृष्टि पड़ जाय, तो उसे विवेकानंद बनने में देर भी नहीं।
हमारे सत् शास्त्र इस गुरुमुखता और तत् कृपा से प्राप्त स्वरूप को अद्वितीय एवं वैकुण्ठ-दुर्लभ कहते हैं-

चिन्तामणिः लोकसुखं सुरद्रुः सर्वसम्पदम्
प्रयच्छति गुरः प्रीतःवैकुण्ठं योगिदुर्लभम्।।

और गुरुमुखता से प्राप्त होने वाली अनेकानेक सिद्धियों की चर्चा टीकाकार वंशीधर जी ने की है ,जो इस प्रकार है-

सत्कीर्तिः विमलं यशः
सुकविता पाण्डित्यम् आरोगिता।
वादे वाक्पटुता कुले चतुरता
गाम्भीर्यम् अक्षोभिता।
प्रागल्भ्यं प्रभुता विधौ निपुणता
यस्य प्रसादेन वै।
तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं
सर्वार्थ-सिद्धि-प्रदम्।।

और इस गुरुमुखता और गुरुप्रसादता का आनन्द कहाँ तक कहें, अनेक उक्तियाँ हैं।
वाणी यहीं विरमती है-

हरौ रुष्टे गुरुः त्राता, गुरौ रुष्टे न कश्चन।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गुरुमेव प्रसादयेत्।।

।।हरिश्शरणम्।।
http://shishirchandra.com/2019/02/23/गुरुमुख-होना