संसार चक्र से छूटना

बड़ा कठिन है संसृति के चक से छूटना, और भगवदीय स्वरूप को आत्मसात् करना। ईश्वरीय चैतन्य और सततसुख रूपता को छोड़, यह जीव बार- बार संसार की नाना योनियों में भटक कर माया में अटक कर पुनर्जन्म और ध्रुव मृत्यु में चलता ही रहता है। सो मायाबस भयौ गोसाईं, बँध्यौ कीर मर्कट की नाईं। तब आखिर इस माया से मुक्ति मिलेगी कैसे?


बात ये है कि, अविनाशी ईश्वर का अविनाशी अंश, यह जीव अपने ही तीन कर्मों की रस्सी से बँधा है । यह तीन कर्म हैं- क्रियमाण( जो वर्त्तमान में चल रहा है), संचित (जो इस शरीर से होकर जुटता जाता है) और प्रारब्ध (पूर्व पूर्व शरीरों का जुटा हुआ)। अब ये तीन-तीन कर्मों की रस्सी बनी हुई है। जो परस्पर एक दूसरे तीसरे से मिलकर एक मोटी और जल्दी न टूटने वाली रस्सी बन चुकी है। यह बेचैन बेचारा जीव रूपी बछड़ा गले में पड़ी इसी खूब कसी कर्म डोर से माया के खूँटे में लपेट कर बँध गया है। पार्थः वत्सः , मतलब कि जैसे अर्जुन बछड़ा है,और और वेदादि शास्त्र के अमृत मय ईश्वरीय वचन दूध के समान हैं, उसे पीने को आतुर यह(जीव बछड़ा) होकर जोर से मचल रहा है,लेकिन विवश। बिना परमात्मा रूप धेनु से निःसृत वेदशास्त्र रूप अमृत दुग्धपान किए यह बार बार मृत और जात( मृत्युजन्म) के चक्कर में फँसा ही रहेगा।
तब भगवान् अपने सखाओं रूपी निष्कामी तुलसी कबीर मलूकदास सदृश सन्त सद्गुरु को इस माया के खूँटेऔर स्वयं की कर्म डोर से बँधे बछड़े को छोड़ने का आदेश देते हैं।


फलतः कर्मों की रस्सी जल जाती है, माया का अटूट खूँटा सदा सर्वदा के लिये टूट जाता है, और यह जीवबछड़ा , जो अब तक बिछुड़ा और उदास रहता था, भगवद् अमृत दुग्ध को पीकर उन्मुक्त हो जाता है ।
सन्त सद्गुरु उनकी अपनी वाणियों में सदा सर्वदा विराजते हैं। हम उनकी वाणी का आश्रय लें।और उन्हीं की तरह संसार चक्र से छूट जायें। नान्य पन्थाः विद्यते अयनाय ,अर्थात् मानव जीवन का और कोई सुन्दर मार्ग नहीं चलने के लिए।


सभी सन्त गुरु भगवान् के सखा और तत् स्वरूप हैं-
वे सभी सन्त, साधु –
त्रेता में बानर भये,
द्वापर में भये ग्वाल।
कलजुग में साधू भये,
तिलक छाप अरु माल।।


ब्रजरज में विराजित षड् गोस्वामी बन्धुओं में एक श्री जीव गोस्वामी ने अपनी श्रीमद् भागवत की संस्कृत भाषा भाषोक्त टीका में ऊपर उक्त दोहे का भाव संस्कृत में दिया है।
अतः परम पूज्य साधु सन्तो गुरु जनों की कृपा हो,और संसार चक्र छूट जाय।

।। हरिः शरणम् ।।

अन्तः प्रभुस्मरण

भगवान् कहते हैं , माम् अनुस्मर युद्ध च। मतलब कि मेरा स्मरण करो ,और साथ ही निर्धारित कर्तव्य कर्म, युद्ध भी करो। क्योंकि सर्वकारण कारण, मेरा स्मरण करते हुए कर्तव्य कर्म करोगे तो ही ,सफल हो सकते हो और बात ये भी है कि, कर्म में ही तुम्हारा अधिकार भी है, फल में कदापि नहीं।
वस्तुतः यह मानव का जीवन, संसार से बड़े संघर्ष का है, अतः समग्र जीवन में प्रभु स्मरण करते हुए ,प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में इसी श्वास की गति से , भगवन् नाम का मानसिक जप करते हुए ,अपना सभी काम करना चाहिए, सन्तभगवन्त का निर्दिष्ट मार्ग ही यही है।
इस कलि का दूषण और मायिक जगत् की निवृत्ति, आत्मस्वरूप की उपलब्धि का महत्तर मानवीय कर्म उसी सर्वकारणकारण की हर साँस में स्मृति से ही सम्भव है, अन्यथा तो हम जीव ठहरे मायाधीन, और वे मायाधीश।
अज्ञान की निवृत्ति, ज्ञान का प्रकाश भगवद् स्मृति से होती है, नष्टो मोहः स्मृतिः लब्धा त्वत् प्रसादात् मया अच्युत!।
भगवत् प्राप्त सन्त सद्गुरु भी यही कहते हैं,कि प्रेम रूप परमात्मा जब हमारे ही हृदय में विराजता है, तब किसी को जनाने की जरूरत नहीं। वह गोय (गोपनीय) सर्वान्तर्यामी है, शरीर की किसी क्रिया मात्र से प्रभु नाम का सुमिरन ,किसी को प्रकट न होने दें-


सुमिरन ऐसा कीजिए,
दूजौ लखै न कोय।
होठ न फरकत देखिये,
प्रेम राखिये गोय।।
जो तेरे घट प्रेम है,
तो कहि-कहि काह जनाव,
अन्तरजामी जानते,
अन्तरगत के भाव ।।


ऐसे परम सिद्ध योगी बाबा मलूकदास की वाणी में बही प्रेमरसधारा का पान ,उन्हीं की कृपा और प्रभुकरुणा से हो जाय,यही अकिंचन की अभिलाषा है।

।। हरिः शरणम् ।।

भगवन्नाम से सर्वसिद्धि

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।
अपने बस करि राखे रामू।।

भगवान् के रामकृष्ण नारायण नामों का स्मरण जीव को सब कुछ सुलभ करा देता है और सर्व सिद्धि ही ,बल्कि आराध्य परमात्मा भी ,भक्त के वश में हो जाते हैं।और मानवजीवन का सर्वोच्च प्राप्य भी भगवत् प्राप्ति ही है। प्रभु का मान भले टल जाये, भक्त का मान न टलते देखा। लेकिन सारी संसारी कामना त्याग कर ,केवल और केवल भगवत् प्राप्ति ही जीव का लक्ष्य बन जाय। तो जाहिर है ,सब मम प्रिय, सब मम उपजाए, जैसे भगवान् भक्त के वशवर्ती हो जायँ।


महावीर हनुमानजी महाराज सतत भगवन्नाम का स्मरण करते रहते हैं।
वेद कहते हैं- तस्मिन ज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवति। मतलब कि भगवद् दर्शन हो जाने पर ,जीव मुक्त होकर ,जन्म मरण के चक्र से निकल कर, समस्त ब्रह्माण्ड में अविगत भगवान् के साथ गतगति हो जाता है।
अतः सतत नाम स्मरण करके ,सनातन धर्म की सनातन सरणि पर चलें, और
सब कुछ प्राप्त कर लें।


जयति काल गुण कर्ममाया मथन, निश्चल ज्ञान,व्रतसत्य रत,धर्म चारी।
सिद्ध सुर वृंद योगीन्द्र सेवित सदा,दास तुलसी प्रणत भय तमारी।


भक्तिविनम्रमूर्ति हनुमानजी महाराज कृपा करें।

।। हरिः शरणम् ।।

शरणागति

मत् समः पातकी नास्ति
पापघ्नी त्वत् समा नहि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि
यथा योग्यं तथा कुरु।

कलिकाल में देवाधिदेव महादेव के अवतार भगवत् पाद आचार्य शङ्कर जीव को नाना पाप ताप परिताप पूर्ण मानते हुए, और स्वयं जीव की सीमा ,मायाबद्धता तथा अल्पज्ञता समझते हुए सविनय निवेदन करते हैं।
बाबा ‘तुलसी’ की विनय पत्रिका तो ऐसे भावों से भरे पदों का समग्र संग्रह है।
चाहे शिवावतार शङ्कर हों या गोस्वामी जी ,सूर ,मीरा ,नानक,दादू ,
मलूक
,सभी की वाणियों में ऐसी भावना की प्रेममयी रसधार बहती दीखती है।


“भक्तमाल”ग्रन्थ के रचनाकार परम सिद्ध भक्त नाभादास की भी ऐसी भावमयी आतुरता में रता वाणी बहती है –
बातन ही हौं पतित पावन
पतित-पावन बिरद तिहारो।
सोई करौ परमान
पाहन नाव पार करौ ‘नाभा’
कै हरि! पकरौ कान
मो ते काम परै जानहुगे
बिनु रन सूर कहावन
बातन ही हौं पतित-पावन।।

भाव ये कि मुझ जैसे पातकी को भवसागर पार करा दोगे ,तो बड़े सूरमा कहाओगे। और नहीं तो कान पकड़ कर कहो मैं असमर्थ हूँ। तब तुम्हारा सर्वसमर्थ नाम कहाँ रहेगा?
ऐसी शरणागति भक्ति !
धन्य नाभा-भारती की आरति
परिपूरिता विश्वासश्रद्धा, जो परमात्मा को को भी उद्धार के लिए विवश कर देती है।
सभी सन्तों भक्तों को प्रणाम।

|| हरिः शरणम् ||

अंतःकरण चतुष्टय की नाम-जप से शुद्धि

मनबुद्धिचित्ताहङ्कार अन्तः इन्द्रियाँ हैं। इनका शासन वाक्पाणिपायूपस्थ कर्म इन्द्रियों और श्रोत्रत्वक्चक्षुषी जिह्वा जैसी ज्ञान इन्द्रियों, सभी पर चलता है। इन चतुः अन्तरिन्द्रियों के विना अन्य प्रकट दशों इन्द्रियाँ अपना सम्यक् कार्य सम्पादित नहीं कर सकतीं। इन चारों में उत्तरोत्तर की सूक्ष्मता है और सूक्ष्मता है तो श्रेष्ठता भी। अतः बुद्धि तभी ठीक रहेगी, जब , मन निर्मल होगा। मन निर्मल तभी होगा, जब सभी इन्द्रियों में अपने को मन कहने वाले साक्षान् नारायण के किसी नाम का सतत मनन होगा। अतः बुद्धि चित्त और अहं भाव सभी की शुद्धि, मनः शुद्धि के विना असम्भव है।और मनःशुद्धि तो नाम जप चिन्तन मनन से ही सम्भव है। इसलिये अहमादि वृत्तियों में सर्वप्रथम मनः शुद्धि के लिये समर्पित भाव से नामजप को साधन बताया गया है । मनःशुद्धि से सब ठीक हो जाता है।

राम राम राम जीह, जौ लौं तू न जपिहै। तौ लौं तू कहूँ जाय त्रिविध ताप तपिहै।

|| हरिः शरणम् ||

श्रेष्ठ साधन – नाम जप



मोहनिशा सब सोवनहारा।देखहिं सपन अनेक प्रकारा।
मोह-अज्ञान-अविद्या या संसार के शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध की मोहासक्ति रूप रात्रि के वश में हम सभी अपना सत् चित् आनन्द स्वरूप भूल बैठे हैं। स्वर्णमय अग्नि के रूप में आसक्त पतिंगा और आहार का रस लेने को आतुर मछली छिपे हुए चारे के नीचे का लौह काँटा न जानकर अपना प्राण ही द देते हैं। अब हम जैसे जीवों की दशा तो इनसे भी खराब है, जो इन विषयों को प्रत्यक्ष विपत्ति रूप देख कर भी इन्हें नहीं त्यागते।अस्थिर संसार के अस्थिर वस्तु-व्यक्ति-पदार्थ ने नाना जन्मों में भटकाया ही है-ऐसे ही जन्म समूह सिराने। आकाशादि पंच भूतों का यह संसार है तो शरीर भी। दोनों में तत्वतः समानता है।इसी से शब्दादि विषय रमणीय लगते हैं।एक और विशिष्ट गुणत्रय, सत् ,रज और तम भी इनमें है, जिससे क्रमशः सुख -दुःख और मोह की अनुभूति होती है। वैसे यह त्रिगुण, श्रीभगवान् की भुवनमोहिनी अविद्या माया के हैं, जिनके अधीन यह जीवात्मा जन्म-मरण-बन्धन-ग्रस्त है। इसे खोलने ,मोहनाश करने और जीव-परमात्म सम्बन्ध से विस्मृत और संसार से विस्मित जीव के लिये श्रीहरि अपनी ममता प्रकट करते हैं- ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।

परमकरुणावरुणालय मायाधीश की मायाधीन के प्रति अभिव्यक्त यह ममता ही है, जो पाप-पुण्यों के फलरूप नरकस्वर्गादि लोकों के भोग में अविश्रान्त जीव को परम विश्राम देने के लिए, मानव शरीर दे देती है। यह शरीर और संसार साध्यरूप भगवान् का इन्हीं चर्मचक्षुओं से प्रत्यक्ष दर्शन करके कृतकृत्य होने का साधन है- साधनधाम मोक्ष करि द्वारा।

भगवच्चरणानुरागी जनों के लिए विषयभोग त्यागने नहीं होते ,वस्तुतः वे स्वयं नामजप के प्रभाव से छूट जाते हैं। नाम के जप में श्रीमन्नारायण की समग्र शक्ति निहित होती है और नामजप के लिये देशकालगत शुद्धि की आवश्यकता भी नहीं है, बल्कि यह अपवित्र को भी पवित्र करनेवाला है।श्रीचैतन्य महाप्रभु पाद ने कहा- नाम्नाम् अकारि बहुधा निज-सर्वशक्तिः तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।

नाम जपत मंगल दस दसहूँ को व्यवहार में लाकर जिह्वा को स्वाद मिले न मिले, नाम जपस्मरण करना चाहिए। सारे भगवत्स्वरूपों में अभेद मानते हुए किसी भी भगवत् स्वरूप का स्मरण और श्रीरामकृष्ण नारायण नाम का जप सभी यज्ञयोगादि से श्रेष्ठतम है- राम राम राम जपु जिय सानुराग रे। कलि ना विराग जोग संयम समाधि रे।

साधु समाज प्रयाग

अकारण वरुणा के मूर्त विग्रह स­­­न्त सद्गुरु का सामीप्य और उनकी कृपा जब किसी जीव पर बरसती है, तो वह धन्य-धन्य हो जाता है । इतिहास-पुराण इस बात का साक्षी है कि पापनिष्ठ “अजामिल” पर कृतज्ञता प्रकाशित करने के लिए सन्त-महात्माओं ने उसकी पत्नी की गर्भस्थ संतति का नाम ही “नारायण” निर्धारित कर दिया और इसी पुत्र नाम के उच्चारण के बहाने से बारंबार नारायण-नारायण रटती हुई उस दुराचारी की रसना सार्थक हुई और “अजा” (माया) से मिला वह “अजा” से अमिल (विहीन) होकर सद्गति को प्राप्त हो गया । श्री राम कथा के एक प्रसंग में जगदंबा श्री जानकी जी के प्रति अपराध बनने से व्यथित इन्द्रपुत्र “जयन्त” भगवान श्री राम के तृणमय बाणों से बचने के लिए जब तीनों लोकों में शरण नहीं पाता तब नामनिष्ठ कोमलचित महात्मा नारद जी की अकारण कृपा दृष्टि का पात्र बनकर माता की अनन्य शरणागति से सन्तकृपा द्वारा ही प्राणों की रक्षा कर पाता है ।

असम्भव को सम्भव करने का यह सारा श्रेय उन “पर दुख-दुखी संत सुपुनीता” सन्त महात्माओं का ही है । निश्चित रूप से, भगवत्प्राप्त विशुद्धहृदय साधु सन्तों का दुर्लभ-दर्शन भगवान की कृपा का फल है अथवा यह कहें कि भगवान जिस किसी जीव पर कृपा करना चाहते हैं, उसके लिए अपने भक्तों को ही माध्यम बनाते हैं, जिससे वह सदा-सदा के लिए मायिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है देखिये – 


राम राज बैठे त्रैलोका । हरषित भये गये सब शोका ।
बयरु न कर काहू सन कोई, राम प्रताप बिषमता खोई ।।

इन सारी पंक्तियों का एक आशय यह भी है कि जिस किसी नाम-रूप-लीला-धाम निष्ठ महात्मा की चित्तवृत्ति में अविस्मृत रूप में भगवान् बैठ जाते हैं, वही वीतशोक होकर प्रमुदित रहता है और श्री राम कृपा से निर्वैर होकर सभी द्वंद्वों और विषमताओं से मुक्त भी हो जाता है । कलिपावनावतार गोस्वामी जी कहते हैं –

          गिरिजा सन्त समागम सम न लाभ कछु आन। बिनु हरि कृपा न होइ सो, गावहिं वेद पुरान॥

वस्तुतः भगवत्स्वरूप सन्त सद्गुरु में सत्-चित् और आनंद का ऐसा प्रवेश और समावेश होता है कि वह किसी भी योनि में भटकते हुए “जीव” को अपना आश्रय प्रदान कर सतत मोद और मंगल से परिपूर्ण करने में समर्थ है । निःसंदेह सन्त समागम से बड़ा कोई लाभ नहीं है और यह समागम भी भगवत्कृपा से ही बनता है । इस स्वरूप की प्राप्ति को वेद शास्त्र नेति-नेति (इतना ही नहीं बल्कि इससे भी आगे और कुछ) कहकर प्रमाणित करते हैं ।

नारायण! विभिन्न तीर्थों में जाने का तो परिश्रम करना पड़ता है और वहां जाकर शुद्धान्तःकरण से सविधि धर्माचरण करना पड़ता है, तब जाकर मोक्षादि परम पुरुषार्थों की सिद्धि होती है । इसमें भी धर्मार्थकाम तो इसी शरीर से उपलब्ध होते हैं किन्तु अंतिम पुरुषार्थ रूप “मोक्ष” की प्राप्ति शरीर त्याग के बाद होती है । किन्तु “तीर्थी कुर्वन्ति तीर्थानि” वाला यह सरल चित साधु समाज ऐसा चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग है जिसकी शरणागति-त्रिवेणी में स्नान करके जीवमात्र इसी शरीर के रहते हुए जीवन्मुक्त हो जाता है –

         सुनि समुझहिं जन मुदित मन,मज्जहिं अति अनुराग। लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग॥

वाद-विवाद नहीं

बड़ा ही विचित्र समय है,जब हम सबको किसी कुतर्क में न पड़ कर समष्टि की रक्षा भावना से निर्दिष्ट नियमों का पालन करना चाहिए। ऐसी वैश्विक विभीषिका का सामना जब हम कर रहे हैं, तब अपने घरों में रह कर ईश्वरीय चिन्तन करते हुए समय व्यतीत करना श्रेयस्कर है।
यही बातें विभिन्न सन्दर्भों में सर्वत्र कही गई हैं। ब्रह्मसूत्र कहता है-   ‘ तर्काप्रतिष्ठानात् ‘
मतलब की तर्क से तत्व और लक्ष्य प्राप्ति सम्भव नहीं। ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया ‘ का उद्घोष नचिकेता संवाद में सन्निहित है।  वादे-वादे जायते तत्वबोधः का सिद्धांत श्रद्धालु जिज्ञासु शिष्य और गुरु के द्वारा
शंका निवारण के लिए सही है।
अतः वर्तमान काल में और आज के सन्दर्भ में हो अथवा यह तो सार्वकालिक श्रेष्ठ मत है कि हम सभी को तर्क-कुतर्क से दूर होकर ईश्वरीय चिन्तन-मनन और भजन अपने-अपने भाव से अपने घरों के मन्दिरों से करना होगा।
गोस्वामीजी इसी भाव का स्मरण करते हैं
अस विचारि जे तग्य विरागी।
रामहिं भजहिं तरक सब त्यागी।।
और
अस बिचारि मतिधीर,
तजि कुतर्क संसय सकल।
भजहु राम रघुवीर ,
करुनाकर सुन्दर सुखद।।

http://shishirchandra.com/2020/04/02/वाद-विवाद-नहीं/

नाम महाराज की वन्दना – २

साधक नाम जपहिं लय लाए।
होहिं सिद्ध अनिमादिक पाए।।

साधक को अनेक सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त हो जाती हैं ,यदि वह भगवान् नामों का भाव पूर्वक जप करे।
ऐसी बात कहने के बाद गोस्वामी जी नाम महाराज वन्दन में आगे कहते हैं-

चहूँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।
कलि विशेष नहिं आन उपाऊ।।

मतलब कि चारों युगों और वेदों तक में नाम का माहात्म्य बताया गया है, किन्तु कलियुग में तो इसके सिवाय अन्य विशेष कोई ऐसा उपाय भी नहीं है। सगुन और निर्गुन भगवत् स्वरूपों में एक को दारुगत( लकड़ी की भाँति) और दूसरे को अग्नि सहित दारु के समान मानना चाहिए।दोनों प्रकट और अप्रकट का अन्तर है, लेकिन प्रकट और सगुन नाम का अपार प्रभाव है-

निरगुन ते एहिं भाँति बड़,
नाम प्रभाउ अपार।
कहौं नाम बड़ राम ते,
निज विचार अनुसार ।।

नाम का जप करते रहने पर अनायास ही भक्ति महरानी आ विराजती हैं, और भक्त को मोद और आनंद की प्राप्ति होती है-

नाम सप्रेम जपत अनयासा।
भगति होहिं मुद मंगल वासा।।

नाम का स्मरण करते-करते तो यह भव सागर रूपी अगाध समुद्र सूख ही जाये-

नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं।
करहुँ विचार सुजन मन माहीं।।

जो भक्त भगवान् के नाम का स्मरण करते हैं, सहज ही उनके अज्ञान का विनाश हो जाता है-

सेवक सुमिरत नाम सप्रीती।
बिनु श्रम प्रबल मोहदल जीती।।

ऐसा भक्त अपने अन्तःकरण में आनंद का अनुभव करते हुए विचरण करता है।और नामस्मरण की प्रसन्नता को तो स्वप्न में भी नहीं सोचा जा सकता है-
फिरत सनेह मगन सुख अपने।
नाम प्रसाद सोच नहिं सपने।।
भगवान् उमामहेश्वर ने सत कोटि राम चरित्र में रामनाम को परब्रह्म से बड़ा और समस्त सुख का मूल जानकर उसे अपने हृदय में धारण कर रखा है-
ब्रह्म राम ते नाम बड़,
वर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महँ,
लिय महेश जिय जानि।।
और क्या कहें भगवान् शिव तो रामनाम का प्रसाद ग्रहण करते-करते अमंगल वेश धारण करने पर भी मंगलदान की खान ही हो गए हैं-
नाम प्रसाद संभु अविनाशी।
साजु अमंगल मंगल राशी।।
शुक, सनकादि और नारदादि सिद्ध-योगीजन नाम के प्रसाद से ही ब्रह्म सुख का अनुभव करते भगवान् के अति प्रिय हो गए हैं-
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी।
नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।।
नारद जानेउ नाम प्रतापू ।
जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू।।

और क्या कहें इस नाम कोही जपते-जपते प्रह्लाद जी भक्तशिरोमणि हो गए। ध्रुव जी ने बड़े कष्ट पूर्वक नामजप से अन्तरिक्ष में अचल और अनुपम स्थान पा लिया।और भक्तराज हनुमानजी महराज का तो कहना ही क्या, उन्होंने तो इसी नाम स्मरण से भगवान् को वश कर रखा है-
नाम जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू।
भगत सिरोमनि भे प्रहलादू।।
ध्रुव सगलानि जपेउ हरि नाऊँ।
पावा अचल अनूपम ठाऊँ।।
सुमिरि पवनसुत पावन नामू।
अपने बस करि राखे रामू।।
अपवित्र अजामिल और गज, गणिका आदि भी इसी के कारण मुक्ति धाम को प्राप्त कर गए-
अपतु अजामिल गज गनिकाऊ।
भये मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।।
भगवान् श्रीराम का नाम कलि काल में कल्पवृक्ष के समान अभीष्ट की सिद्धि करने वाला है। इसके प्रभाव से मानव का समस्त शोक नष्ट हो जाता है। इसकी महिमा अनन्त है। और इस नाम की बड़ाई और वर्णन कहाँ तक करें , स्वयं प्रभु भी अपने नाम के गुणों का वर्णन नहीं कर सकते-
कहौं कहाँ तक नाम बड़ाई।
रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।
इस प्रकार बालकाण्ड में गोस्वामी जी ने भगवान् के नामजप-स्मरण की पूर्णता बताते-बताते अन्त में किसी भी देशकाल परिस्थिति और भाव स्वभाव की दशा में इसे सर्वत्र आनन्द और मंगल का मूल कहा है-
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।।

भगवान् की कृपा और उनके चरणों के अनुग्रह से उनके नाम की सतत स्मृति बनी रहे, ऐसी कृपा-करुणा सन्त-भगवन्त दोनों ही करें।

।। हरिः शरणम् ।।

http://shishirchandra.com/2019/11/12/नाम-महाराज-की-वन्दना-२/