अनुग्रह (कृपा) कातर प्रभु

भगवान् की कृपा की वायु सर्वत्र बह रही है, हम नाम की नाव पर बैठ कर निरन्तर स्मरण की पाल फहरा कर उनके नित्य धाम को जा सकते हैं.
वे अनुग्रह करेंगे ही इसमें रंचमात्र संशय नहीं।
कृपा की न होती जो आदत तुम्हारी तो सूनी ही रहती अदालत मुरारी/पुरारी।
जो रघुबीर अनुग्रह कीना।
तौ तुम मोहिं दरस हठि दीना।
अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता।बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता।


सन्त मिलन की आस है
तो हरिजन गुन गाव।
सन्त विशुद्ध मिलहिं परितेही।
चितवहिं राम कृपा करि जेहीं।।


अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक सर्वेश्वर परात्पर परमात्मा अपने अंशभूत जीव की बाट जोह रहे ,कि कब देहेन्द्रिय के प्रति राग त्याग कर वह अपने अंशी की ओर उन्मुख होकर उन्मुक्त होगा?
थोड़े से जप स्मराणादि साधन से उन्मुख हो जाने पर,
यज्ञानां जपयज्ञोस्मि वे प्रभु किसी हनुमानजी नारदादि सन्तों को भेजकर क्षण मात्र में अनुग्रह कर देते हैं और विभीषण ,ध्रुव आदि भक्त सब कुछ पा जाते हैं।
वे परम आनंद मूर्ति हैं। निष्काम भाव से भजने पर दीनानाथ तो कृपा करने के लिए तैयार ही हैं।
गाय जैसे अपने बछड़े को वात्सल्य भाव दुग्ध पान कराती हुई व्याघ्रादि से बचाती है, वैसे भक्तवत्सल भगवान् भी माया रूपी बाघिन से बचा ही लेते हैं।
और जीव सदा सर्वदा के लिए
भगवद् आश्रय का अधिकारी हो जाता है। शुकवाणी ऐसी ही है-


सत्याशिषो हि भगवन् तव पादपद्मम्। आशीः तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः।
अपि एवमर्य भगवान् परिपाति दीनान् ।वाश्रेव वत्सकम् अनुग्रहकातरः
अस्मान् ।।

|| हरिः शरणम् ||

तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई

भगवान् की प्राप्ति, भगवद् दर्शन, भगवान् का चरणाश्रय
और उनकी अविचल,निष्काम प्रेमा भक्ति तो केवल कृपासाध्य ही है, चाहे वह कृपा करें अथवा उनके प्राणप्यारे सन्तसाधु भक्त। अच्छा, भक्त शब्द का एक दूसरा अर्थ है विभक्त विभाजित खण्डित टूटा हुआ। मतलब कि जो शरीर संसार से उसके भोगों से टूटा हुआ विखण्डित विरक्त और प्राप्य परमात्मा से जुड़ गया, वह भक्त है।
अनेकजन्मसंसिद्वः ततो याति, परां गतिम्। अर्थात् यह भगवच्चरणाश्रय वाली भगवान् की प्रेमा भक्ति नाना जन्मों में शनैः शनैः सिद्ध होती हुई यानी कि पकते-पकते ,तब जाकर परिपक्व होकर पूर्णमदः पूर्णमिदं ,पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।पूर्णस्य पूर्णमादाय ,पूर्णम् एव अवशिष्यते पर पहुंच जाती है, और संसार से टूटा(भक्त) भगवान् से जुड़ जाता है।
जयन्त, देवर्षि नारद को नहीं देखता, नाना ब्रह्मशिव आदि लोकों से निराश उसको महामुनीन्द्र नारद जी देख लेते हैं और सन्त कृपा से वह भगवन्त कृपा का अधिकारी बन जाता है।
तद् विद्धि प्रणिपातेन,परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति तं ज्ञानं ज्ञानिनः तत्वदर्शिनः।।

इत्यादि श्रीभगवान् के उक्त वचनों का सार भी यही है कि, उस परम आत्म तत्व को जिज्ञासा, गुरु के प्रति अत्यन्त आदर और सेवा(भक्ति) से पाया जा सकता है। तत्व दर्शी ज्ञानी ही उस तत्व का उपदेश करते हैं, जिन्हें वह हरिः ओ3म् तत् सत् प्राप्त है।
इसलिये संसार के लोभ, भोग को त्याग कर तत् साधु ,साधु-प्रीति ही करनी होगी। और कोई रास्ता नहीं, माया-मोह के पार जाने के लिए।नहीं तो नरकादि लोक और पुनः जन्म निश्चित है।
कामक्रोधमदलोभ सब नाथ नरक के पन्थ। इन्ह परिहरि रघुबीरहिं भजहु भजहिं जेहिं सन्त।।
और सद्गुरु बताते हैं कि बाबा तुलसी ने स्पष्ट ही कर दिया है कि भगवत् प्राप्ति में अपना किया हुआ यज्ञ योग जप दान आदि साधन तो अवश्य ही करना चाहिए, किन्तु संसार लोभ छोड़कर।
भगवत् प्राप्ति और प्रीति मात्र हेतु जपपूजादि साधन बनेंगे तो काम बनेगा यानी की ,कृपाप्राप्त सन्तो की कृपा

होगी और संसृति चक्र छूटेगा।
लोभ पास जेहि गर न बँधाया।
सो नर तुम समान रघुराया।।
यह गुन साधन ते नहिं होई।
तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई।।

।। हरिः शरणम् ।।

नृग उद्धरन

मानव जीवन का चरम प्राप्तव्य भगवान् के चरण ही हैं, क्योंकि इसके बिना तो न संसारमोह छूटेगा, और न ही दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्ति ही होगी।
उनके समान विपत्तियों को हरनेवाला और दुःसह भव सागर को पार कराने वाला दूसरा कोई नहीं।
क्योंकि जब गजराज अपना बल क्षीण हुआ समझ कर, कमल पुष्प लेकर आपके शरण हुआ, तब भगवान् उसकी दीनता पर द्रवित होकर, सुदर्शन चक्र लेकर, गरुड़ को छोड़ ,बिना पादुका ,पैदल ही आ जाते हैं।
इसी तरह द्रौपदी के वस्त्र हरण काल में भी आप ,स्वयं वस्त्रावतार लेकर उसकी रक्षा करते हैं।
वस्तुतः जब तक किसी को अपने बल पर भरोसा रहता है, तब तक उस सीमा तक ,भगवान् कुछ नहीं करते, लेकिन ज्यौं ही अपने शरीर संसार की अहंता-ममता टूटती है , ससीम जीव की ,असीम परमात्मा रक्षा के लिये आकर ,उसे निर्भय कर देते हैं।
अतः निज बुधि बल भरोस मैं नाहीं की समर्पित अवस्था में ही, प्रभु करुणा करने के लिए बाध्य हो जाते हैं, माया मोह का बाध तत्क्षण ही हो जाता है।
और बात यह भी है कि, कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं, की साधु-अवधारणा और ,सर्वं खलु ब्रह्म की वैदिक दृष्टि भी विखण्डित होगी, यदि जगन्नाथ विपत् और प्रतिकूलता में सहायक न हों।
हाँ ,आवश्यक यह है कि, शरीर संसार में अहंता ममता त्याग कर, सब कुछ प्रभु का ही है, ऐसा मानकर, दानादि की क्रिया हो ,भगच्चरणों का सेवन हो , तो महादानी राजा नृग की तरह हम जीवों का भी उद्धार हो ही जायेगा-

इहै जानि सुर नर मुनि कोबिद
सेवत चरन।
तुलसिदास प्रभु! केहि न अभय कियो नृग-उद्धरन।

।। हरिः शरणम् ।।

श्रीरामचरणानुराग

जितने -जितने अधिक अंश में भगवच्चरणानुराग होता चलता है, उतने -उतने अंश में संसार के प्रति प्रीति घटती जाती है। भगवच्चरणों में अनुराग और भगवद् दर्शन हि जीव का चरम लक्ष्य है। इसके बिना तो यदि संसारी वस्तुओं में प्रेम बना रहा, तो उस अप्राप्त भोग को भोगने फिर आना ही होगा-
ऐसे ही जन्म समूह सिराने।
गोस्वामी जी कहते हैं कि हमारे अनेक जन्म इस तरह भोगों को भोगने के चक्कर में जा चुके हैं, फिर भी चक्कर चल ही रहा है।
नाना जन्मों में अनेक माता पिता बन्धु बान्धव रिश्ते नाते बन चुके हैं, लेकिन सच्चे प्रेम की अनुभूति के बिना सब बेकार गया, अनेक शरीरों की यात्रा निर्बाध जारी है।
जब तक अपने रिश्ते नाते से शुरू कर के, व्यक्ति-व्यक्ति में उस प्रेम तत्व साक्षात् राम कृष्ण नारायण की अनुभूति नहीं होगी ,बात बनेगी नहीं।
हमारे गुरुदेव कहते हैं, कि इस अनुभूति के लिए हम ऐसा समझें कि माता-पिता गुरु अतिथि तो वेदाज्ञप्त देवता ही हैं,( मातृदेवो पितृदेवो आचार्यदेवो भव)।
किन्तु अब बात इससे आगे की अनभूति की है, वह यह कि हमारे पुत्र हैं , तो भगवान् ही पुत्र के रूप में आए हैं।
बधू है ,तो भगवान् ही बधू के रूप में आए हैं। इस तरह अपने सगे सभी सम्बन्धों में भगवान् की अनुभूति होनी चाहिए।और उसके आगे भी यही अनभूति-दृष्टि बने ,तो काम बने ,लेकिन संसार के भोगों से थका हारा होकर भी ऐसी दृष्टि और अनुभूति क्यों नहीं?
तब गुरु देव समाधान देते हैं- शरीर की मलिनता की शुद्धि तो जल में स्नान से प्रतिदिन होती है, किन्तु आत्मा की रोज-रोज की और नाना शरीरों की जमी गन्दगी कैसे छूटेगी?
इसके लिये सत् शास्त्रों और सूर कबीर तुलसी की वाणियों के सरस रस में आत्मा का दिन-प्रतिदिन प्रक्षालन करना होगा। यहीं पुराणों शास्त्रों का निचोड़ा गया अमृत जल बहता है, जिनकी हरिकथा की अविरल धारा में आत्मा को रोज बिना नागा नहवाना होगा ,तब आत्मा की शुद्धि होकर सभी रूपों में हरिदर्शन होने लगेगा, और माया की भी नहीं लगेगी। इसलिए मानसकार ने कहा-


बिनु सतसंग न हरिकथा,
तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गए बिनु राम पद ,
होइ न दृढ़ अनुराग।।

जित देखूँ तित श्याममयी है।

।। हरिः शरणम् ।।

वे करैं आप समान

देखिये , सनातन काल से ,युगों-युगों से हमारी ऋषि परम्परा ने कृपा करुणा परवश होकर, मानव जीव को बार-बार के जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होने का मार्ग दिखाया है।
शिवावतार श्रीमदाद्य भगवान् शङ्कराचार्य ने बड़ा साहित्य रचकर मुमक्षुओं का पथ प्रशस्त किया है। अच्छा, हमारे गुरुओं की वाणी ने मानव शरीर ही नहीं ,प्रत्युत पशु शरीरों में भी पड़े बद्ध जीवों को हरिनाम सुनाकर, उसी शरीर से मुक्त कर दिया, जिसको साधक जन पवित्र ग्रन्थ “भक्तमाल” में देख सकते हैं।
आचार्य शङ्कर कहते हैं-
बद्धो हि को यो विषयानुरागी
मतलब कि, पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश के-गन्धरसरूप और स्पर्श शब्दादि विषयों यानी कि स्त्री पुत्र धनादि में आसक्ति यदि बनी रही,तो चौरासी का चक्कर कहाँ छूटेगा?
तब आचार्य तत्काल उत्तर भी दे देते हैं-
मुक्तो हि को यो विषयाद् विमुक्तः।
अर्थात् उक्त पंचमहाभूतों के शब्दादि विषयों से ,जो विरक्त हो गया, वही मुक्त है।
अब सवाल उठता है कि, मुक्ति कैसे होगी?
तब यह गुन साधन ते नहिं होई, तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई , मानसकार समाधान करते हैं।
देखिये ,सन्त सद् गुरु ही ऐसे नित्य मुक्त भक्त हैं, जिनके माध्यम से भगवान् की कृपा आती है।और आती ही नहीं, बल्कि बरसती है।


हरै शिष्य धन सोक न हर ई।
सो गुरु घोर नरक महँ पर ई।।


ऐसे गुरुओं की भरमार है, कलियुग जो है न, वह तो काम बिगाड़ेगा ही।
इसलिये गुरु अपनाना हो तो ,पहले ऐसे लोगों की रहनी-सहनी को लम्बे समय तक ,निरखे और तब उनका पादाश्रय लेकर आगे बढ़े।


पानी पीवै छानकर।
गुरू करै जानकर।।


हमारे सद्गुरु तो कम से कम ऐसा ही कहते हैं, नहीं तो हरि नाम का आश्रय लें।
और यदि भगवान् से जुड़े, संसार के भौतिक पदपदार्थों से नहीं जुड़े रहनेवाले सन्त जन का चरणाश्रय मिल गया तो ,का बन गया।और वे सन्त तो ,जीव को अपने समान ही, साधु बनाकर अविगत गति दे देते हैं, इसीलिये तो-


पारस में अरु सन्त में ,
एकै अन्तर जान।
पारस तो सोना करै,
वे करैं आप समान।।

।।हरिः शरणम्।।

संसार चक्र से छूटना

बड़ा कठिन है संसृति के चक से छूटना, और भगवदीय स्वरूप को आत्मसात् करना। ईश्वरीय चैतन्य और सततसुख रूपता को छोड़, यह जीव बार- बार संसार की नाना योनियों में भटक कर माया में अटक कर पुनर्जन्म और ध्रुव मृत्यु में चलता ही रहता है। सो मायाबस भयौ गोसाईं, बँध्यौ कीर मर्कट की नाईं। तब आखिर इस माया से मुक्ति मिलेगी कैसे?


बात ये है कि, अविनाशी ईश्वर का अविनाशी अंश, यह जीव अपने ही तीन कर्मों की रस्सी से बँधा है । यह तीन कर्म हैं- क्रियमाण( जो वर्त्तमान में चल रहा है), संचित (जो इस शरीर से होकर जुटता जाता है) और प्रारब्ध (पूर्व पूर्व शरीरों का जुटा हुआ)। अब ये तीन-तीन कर्मों की रस्सी बनी हुई है। जो परस्पर एक दूसरे तीसरे से मिलकर एक मोटी और जल्दी न टूटने वाली रस्सी बन चुकी है। यह बेचैन बेचारा जीव रूपी बछड़ा गले में पड़ी इसी खूब कसी कर्म डोर से माया के खूँटे में लपेट कर बँध गया है। पार्थः वत्सः , मतलब कि जैसे अर्जुन बछड़ा है,और और वेदादि शास्त्र के अमृत मय ईश्वरीय वचन दूध के समान हैं, उसे पीने को आतुर यह(जीव बछड़ा) होकर जोर से मचल रहा है,लेकिन विवश। बिना परमात्मा रूप धेनु से निःसृत वेदशास्त्र रूप अमृत दुग्धपान किए यह बार बार मृत और जात( मृत्युजन्म) के चक्कर में फँसा ही रहेगा।
तब भगवान् अपने सखाओं रूपी निष्कामी तुलसी कबीर मलूकदास सदृश सन्त सद्गुरु को इस माया के खूँटेऔर स्वयं की कर्म डोर से बँधे बछड़े को छोड़ने का आदेश देते हैं।


फलतः कर्मों की रस्सी जल जाती है, माया का अटूट खूँटा सदा सर्वदा के लिये टूट जाता है, और यह जीवबछड़ा , जो अब तक बिछुड़ा और उदास रहता था, भगवद् अमृत दुग्ध को पीकर उन्मुक्त हो जाता है ।
सन्त सद्गुरु उनकी अपनी वाणियों में सदा सर्वदा विराजते हैं। हम उनकी वाणी का आश्रय लें।और उन्हीं की तरह संसार चक्र से छूट जायें। नान्य पन्थाः विद्यते अयनाय ,अर्थात् मानव जीवन का और कोई सुन्दर मार्ग नहीं चलने के लिए।


सभी सन्त गुरु भगवान् के सखा और तत् स्वरूप हैं-
वे सभी सन्त, साधु –
त्रेता में बानर भये,
द्वापर में भये ग्वाल।
कलजुग में साधू भये,
तिलक छाप अरु माल।।


ब्रजरज में विराजित षड् गोस्वामी बन्धुओं में एक श्री जीव गोस्वामी ने अपनी श्रीमद् भागवत की संस्कृत भाषा भाषोक्त टीका में ऊपर उक्त दोहे का भाव संस्कृत में दिया है।
अतः परम पूज्य साधु सन्तो गुरु जनों की कृपा हो,और संसार चक्र छूट जाय।

।। हरिः शरणम् ।।

अन्तः प्रभुस्मरण

भगवान् कहते हैं , माम् अनुस्मर युद्ध च। मतलब कि मेरा स्मरण करो ,और साथ ही निर्धारित कर्तव्य कर्म, युद्ध भी करो। क्योंकि सर्वकारण कारण, मेरा स्मरण करते हुए कर्तव्य कर्म करोगे तो ही ,सफल हो सकते हो और बात ये भी है कि, कर्म में ही तुम्हारा अधिकार भी है, फल में कदापि नहीं।
वस्तुतः यह मानव का जीवन, संसार से बड़े संघर्ष का है, अतः समग्र जीवन में प्रभु स्मरण करते हुए ,प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में इसी श्वास की गति से , भगवन् नाम का मानसिक जप करते हुए ,अपना सभी काम करना चाहिए, सन्तभगवन्त का निर्दिष्ट मार्ग ही यही है।
इस कलि का दूषण और मायिक जगत् की निवृत्ति, आत्मस्वरूप की उपलब्धि का महत्तर मानवीय कर्म उसी सर्वकारणकारण की हर साँस में स्मृति से ही सम्भव है, अन्यथा तो हम जीव ठहरे मायाधीन, और वे मायाधीश।
अज्ञान की निवृत्ति, ज्ञान का प्रकाश भगवद् स्मृति से होती है, नष्टो मोहः स्मृतिः लब्धा त्वत् प्रसादात् मया अच्युत!।
भगवत् प्राप्त सन्त सद्गुरु भी यही कहते हैं,कि प्रेम रूप परमात्मा जब हमारे ही हृदय में विराजता है, तब किसी को जनाने की जरूरत नहीं। वह गोय (गोपनीय) सर्वान्तर्यामी है, शरीर की किसी क्रिया मात्र से प्रभु नाम का सुमिरन ,किसी को प्रकट न होने दें-


सुमिरन ऐसा कीजिए,
दूजौ लखै न कोय।
होठ न फरकत देखिये,
प्रेम राखिये गोय।।
जो तेरे घट प्रेम है,
तो कहि-कहि काह जनाव,
अन्तरजामी जानते,
अन्तरगत के भाव ।।


ऐसे परम सिद्ध योगी बाबा मलूकदास की वाणी में बही प्रेमरसधारा का पान ,उन्हीं की कृपा और प्रभुकरुणा से हो जाय,यही अकिंचन की अभिलाषा है।

।। हरिः शरणम् ।।

भगवन्नाम से सर्वसिद्धि

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।
अपने बस करि राखे रामू।।

भगवान् के रामकृष्ण नारायण नामों का स्मरण जीव को सब कुछ सुलभ करा देता है और सर्व सिद्धि ही ,बल्कि आराध्य परमात्मा भी ,भक्त के वश में हो जाते हैं।और मानवजीवन का सर्वोच्च प्राप्य भी भगवत् प्राप्ति ही है। प्रभु का मान भले टल जाये, भक्त का मान न टलते देखा। लेकिन सारी संसारी कामना त्याग कर ,केवल और केवल भगवत् प्राप्ति ही जीव का लक्ष्य बन जाय। तो जाहिर है ,सब मम प्रिय, सब मम उपजाए, जैसे भगवान् भक्त के वशवर्ती हो जायँ।


महावीर हनुमानजी महाराज सतत भगवन्नाम का स्मरण करते रहते हैं।
वेद कहते हैं- तस्मिन ज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवति। मतलब कि भगवद् दर्शन हो जाने पर ,जीव मुक्त होकर ,जन्म मरण के चक्र से निकल कर, समस्त ब्रह्माण्ड में अविगत भगवान् के साथ गतगति हो जाता है।
अतः सतत नाम स्मरण करके ,सनातन धर्म की सनातन सरणि पर चलें, और
सब कुछ प्राप्त कर लें।


जयति काल गुण कर्ममाया मथन, निश्चल ज्ञान,व्रतसत्य रत,धर्म चारी।
सिद्ध सुर वृंद योगीन्द्र सेवित सदा,दास तुलसी प्रणत भय तमारी।


भक्तिविनम्रमूर्ति हनुमानजी महाराज कृपा करें।

।। हरिः शरणम् ।।

शरणागति

मत् समः पातकी नास्ति
पापघ्नी त्वत् समा नहि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि
यथा योग्यं तथा कुरु।

कलिकाल में देवाधिदेव महादेव के अवतार भगवत् पाद आचार्य शङ्कर जीव को नाना पाप ताप परिताप पूर्ण मानते हुए, और स्वयं जीव की सीमा ,मायाबद्धता तथा अल्पज्ञता समझते हुए सविनय निवेदन करते हैं।
बाबा ‘तुलसी’ की विनय पत्रिका तो ऐसे भावों से भरे पदों का समग्र संग्रह है।
चाहे शिवावतार शङ्कर हों या गोस्वामी जी ,सूर ,मीरा ,नानक,दादू ,
मलूक
,सभी की वाणियों में ऐसी भावना की प्रेममयी रसधार बहती दीखती है।


“भक्तमाल”ग्रन्थ के रचनाकार परम सिद्ध भक्त नाभादास की भी ऐसी भावमयी आतुरता में रता वाणी बहती है –
बातन ही हौं पतित पावन
पतित-पावन बिरद तिहारो।
सोई करौ परमान
पाहन नाव पार करौ ‘नाभा’
कै हरि! पकरौ कान
मो ते काम परै जानहुगे
बिनु रन सूर कहावन
बातन ही हौं पतित-पावन।।

भाव ये कि मुझ जैसे पातकी को भवसागर पार करा दोगे ,तो बड़े सूरमा कहाओगे। और नहीं तो कान पकड़ कर कहो मैं असमर्थ हूँ। तब तुम्हारा सर्वसमर्थ नाम कहाँ रहेगा?
ऐसी शरणागति भक्ति !
धन्य नाभा-भारती की आरति
परिपूरिता विश्वासश्रद्धा, जो परमात्मा को को भी उद्धार के लिए विवश कर देती है।
सभी सन्तों भक्तों को प्रणाम।

|| हरिः शरणम् ||

अंतःकरण चतुष्टय की नाम-जप से शुद्धि

मनबुद्धिचित्ताहङ्कार अन्तः इन्द्रियाँ हैं। इनका शासन वाक्पाणिपायूपस्थ कर्म इन्द्रियों और श्रोत्रत्वक्चक्षुषी जिह्वा जैसी ज्ञान इन्द्रियों, सभी पर चलता है। इन चतुः अन्तरिन्द्रियों के विना अन्य प्रकट दशों इन्द्रियाँ अपना सम्यक् कार्य सम्पादित नहीं कर सकतीं। इन चारों में उत्तरोत्तर की सूक्ष्मता है और सूक्ष्मता है तो श्रेष्ठता भी। अतः बुद्धि तभी ठीक रहेगी, जब , मन निर्मल होगा। मन निर्मल तभी होगा, जब सभी इन्द्रियों में अपने को मन कहने वाले साक्षान् नारायण के किसी नाम का सतत मनन होगा। अतः बुद्धि चित्त और अहं भाव सभी की शुद्धि, मनः शुद्धि के विना असम्भव है।और मनःशुद्धि तो नाम जप चिन्तन मनन से ही सम्भव है। इसलिये अहमादि वृत्तियों में सर्वप्रथम मनः शुद्धि के लिये समर्पित भाव से नामजप को साधन बताया गया है । मनःशुद्धि से सब ठीक हो जाता है।

राम राम राम जीह, जौ लौं तू न जपिहै। तौ लौं तू कहूँ जाय त्रिविध ताप तपिहै।

|| हरिः शरणम् ||