दूसरि रति मम कथा प्रसंगा

जब भगवत् कृपा से सन्तों की संगति मिल जाये, तो वही अच्छी बात है-भली जो संगति साधु की।
मित्रों!जब सन्त समागम होता है, तब संसार भाव गलने लगता है।और साधु सन्त ,इसलिये कि वे परहित साधते हैं। स्वहित हो या परहित,इस असाध्य साधन की क्षमता भगवन् नाम और कथासुधासरिता में अवगाहन ही है।और क्या कहें,संसार में एकमात्र भगवान् और उनके प्राणप्यारे भक्त ही हैं ,जिनका स्वार्थ ही परमार्थ है-
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी।।
ये परम परमार्थी सन्त भगवान् की सुन्दर कथा का रस भक्तों के कर्णकुहरों में उड़ेल देते हैं, जो श्रवण रन्ध्र से प्रवेश कर सीधे हृदय देश में प्रवेश कर जाती है। लख चौरासी की मलिन चित्त की कामक्रोधादि वासना धुलने लगती है।
और धीरे-धीरे मन कहता है
श्रवणन और कथा नहिं सुनिहौं ,रसना और न गैहौं।
जानकी जीवन की बलि जैहौं।
नानायोनि समुत्पन्न चित्त की मलिन वासना जल्दी जाती नहीं, और इसलिये सन्त मुख से बहता कथा रस का जल ही उसे धोकर ,जब बार -बार शुद्ध करता रहता है, तब जीवन अनेक संशय का समाधान होता रहता है।
बाबा के शब्दों में यह कथा संशय रूपी पक्षी को उड़ाने वाली सुन्दर करतल ध्वनि है

राम कथा सुन्दर करतारी।
संशय विहग उड़ावन हारी।
कलियुग रूपी वृक्ष को काटने वाली कुल्हाड़ी भी है-
रामकथा कलिबिटप कुठारी।
सादर सुनु गिरिराज कुमारी।।
विद्वानों का परम आराम,सभी को मनोहर और कलि कालुष्य नाशक है-
बुध विश्राम सकलजनरंजनि।
रामकथा कलिकलुषविभंजनि।।
और भी है, यह कथा कलिरूपी सर्प के लिये मयूर के समान तथा विवेक रूपी आग जलाने हेतु ईंधन के समान है-

रामकथा कलि पंनग भरनी।
पुनि बिवेक पावक कहुँ अरनी।।

राम कथा यम गणों के मुँह में पोते जाने वाली कालिख जैसी यमुना है।जीव को मुक्ति देने वाली नगरी काशी भी है-
जमगन मुँह मसि जग जमुना सी।जीवन मुकुति हेतु जनु कासी।।
और हो भी क्यों नहीं, भगवान् की यह कथा शिवशिवा- कागभुशुण्डि -याज्ञवल्क्यभरद्वाज तक क्रमशः सुनी कही और गाई गई है।और इसलिये यह शिव को प्रिय है ,ऐसी कि जैसे नर्मदा और शैलसुता पार्वती-

शिव प्रिय मेकल सैलसुता सी।सकल सिद्धि सुख संपति रासी।।
प्रेमियों! जब भगवान् की कथा, सभी सिद्धियों सुख और संपत्ति की खान ही है, तब, निरन्तर इसे सुनकर दूषित चित्त को धो पोंछकर अन्तर हृदय के आसन पर प्रभु को आसानासीन करके स्वस्वरूप (आत्मस्वरूप) की स्मृति करनी होगी, जो कि
शङ्करावतार आचार्य शङ्कर की दृष्टि में वस्तुतः भक्ति ही है-
स्वस्वरूपागतिः एव
भक्तिरित्युच्यते।
और इस प्रकार शबरी के लिये साधन भक्ति का दूसरा प्रकार आकार ग्रहण कर साकार होता है और भगवान् कहते हैं-ः

दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रथम भगति सन्तन कर संगा

भील जाति जाता भक्तिमती शबरी श्रीरामकथा की अन्यतम पात्र है। जंगली जन जाति में उत्पन्न भगवत् परायणा शबरी को भगवान् स्वयं आकर साधन भक्ति का उपदेश देते हैं। जब भगवान् श्रीराम पैदा नहीं हुए थे, उसके पहले ही भगवन् नाम का उपदेश ,मतंग ऋषि ने करुणा कृपा करके उसे प्रदान कर दिया था।और कहा था कि,प्रतीक्षा करो प्रभु अवश्य पधारकर तुम्हें कृतकृत्य करेंगे।
एक ऐसे ऋषि मतंग जो ,तप,ब्रह्मचर्य, शम,दम ,त्याग, सत्यशुचिता,यमनियम की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे।उनका कथन अव्यर्थ था –
मृषा न होइ देव ऋषि बानी।
हमारे सद्गुरु मलूकपीठाधीश पुराणप्रसिद्ध सिद्ध बातें कहने में स्वभावतः सिद्ध हैं। वे बताते हैं कि, सन्त दर्शन का फल भगवान् दर्शन और भगवान् के भी दर्शन का फल सन्त दर्शन है।
जौं रघुबीर अनुग्रह कीना
तौ तुम मोहि दरस हठि दीना।
अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता।।
भगवान् कृपा करते हैं, तब सन्त बरबस आकर दर्शन देते हैं। और जब सन्त कृपा होती है, तब भगवान् भी अपने भक्त सन्त की वाणी सत्य करने के लिए स्वयं साक्षात् दर्शन देते हैं।
प्रयागराज में राजित भरद्वाज ऋषि ने भगवान् श्रीराम का दर्शन पाकर, उनके दर्शन का भी फल ऋषि दर्शन बताया था,जिसके फलस्वरूप उन्हें महामुनीन्द्र याज्ञवल्क्य का दर्शन हुआ था।
बड़े सौभाग्य से सत्याग्रही सन्तो का संग सुलभ होता है और निष्प्रयास संसारोच्छेद हुए बिना नहीं रहता-
बड़े भाग पाइअ सतसंगा।
बिनहिं प्रयास होइ भवभंगा।।
मनवाणीकर्म से परम परम उपकारी सन्त सहज ही कृपालु होते हैं-
पर उपकार बचन मन काया।
सन्त सुभाव सहज खगराया।
और जब सन्त मिलते हैं, तब सब जैसे सर्वस्व सुख ही मूर्तिमान मिल जाता है-
नहिं दरिद्र सम जग दुख माहीं
सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं।।
बिना सत्संग के कौन सी भक्ति होगी? वात्सल्यगुण सागर भगवान् द्रवित हों ,वे तब द्रवित हों जब ,हम संसार चक्र के भ्रमजाल में स्वयं दुखी होकर आर्तनाद करें।
पाहि मुरारे! कृपयावारे!
और
बिनु सतसंग बिवेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई
वस्तुतः जब हमें आत्मोद्धार की छटपटाहट छापेगी, तब परमात्मा कृपा करेंगे, सन्तों की छापेमारी होगी।जिनके दर्शन परसन से पापराशि विशीर्ण होकर सत्याग्नि में भस्म हो जायेगी-
विनय पत्रिका (चिट्ठी पाती)
भी यही बोलती है-
बिनु सतसंग भगति नहिं होई
ते तब मिलैं द्रवैं जब सोई।
जब द्रवैं दीन दयाल राघव
साधु संगति पाइये।
जेहि दरस परस समागमादिक पापरासि नसाइये।
और निःसन्देह ,परदुखदुखी सन्त सुपुनीता का संग मिलने का काम भाव जागृत हो जाय तो , संसार भाव से अधोगति कराने वाला विषयी यह काम भी कृतार्थ होकर तार देगा।
और इसीलिये मतंग ऋषि की कृपाभाजन दीन हीन शबरी कृपालु श्रीराम की कृपा पात्र बन जाती है।
भगवान् ने करुणा करके भक्ति की प्राप्ति के लिए शबरी को माध्यम बना कर सभी जीवों को साधन के नौ सूत्र बताये हैं। इन्हीं में से पहली साधन भक्ति साधु सन्तों का संग है ,जो अकेले ही अनेक जन्मों की बिगड़ी बनाने में सामर्थ्य शील है-

प्रथम भगति सन्तन कर संगा

।। हरिः शरणम् ।।

तुलसी तजि कुसमाजु

संसार वासना या तृष्णा के त्याग की समानता में संसार का कोई सुख नहीं। इस जीवन में कामोपभोग का सुख और अन्यान्य दिव्य वस्तु व्यक्ति पदार्थों की प्राप्ति का सुख ,किसी भी दशा में वासना त्याग सुख के सोलहवें अंश के भी बराबर नहीं हो सकता।

 तात्पर्य ये कि, सोलहवाँ भाग तो उपलक्षण मात्र है।वस्तुतः काभोपभोग हेतु ,जब यह मानव जन्म ही नहीं मिला,है  तब  वासना त्याग सुख ही सर्वोपरि आनन्द की सीमा का स्पर्श करता है,जिसके बाद परम सुख शान्ति का अनुभव होता है। 

इसीलिये भगवान्  ने कहा-

त्यागात् शान्तिः अनन्तरम् 

वेद भी कहते हैं- त्यागेन एकेन अमृतत्वम् आनशुः ।

मतलब कि विषयों से , भोग त्याग से ही अमरता प्राप्य है।

 अब सोचिये, हम मन्दिर जाते इसलिये हैं कि, हमको संसार का कोई वस्तु व्यक्ति पद पदार्थ अभिलषित है।

 हम कैसे दुर्बुद्धि हैं कि उस ,असीम की पूजा उपासना के फलस्वरूप संसार की ससीम वस्तु चाहते हैं। क्या उस कण-कण में व्याप्त परमात्मा से कोई बात छिपी हो सकती है? 

 हमारा परम हित किसे पाकर  होगा, यह उन सर्वव्यापी को अभिज्ञात है।

अतः उत्तम पक्ष तो यही है कि, जेहि विधि नाथ! होइ हित मोरा। करौं सो बेगि दास मैं तोरा।

 और इसलिये विगतविषयतृष्णः कृष्णमाराधयामि ही वरेण्य पक्ष है,  जिसे नचिकेता, प्रह्लाद और ध्रुव जैसे भक्त धारण करके हमारी धारणा को बदल चुके हैं। 

 परमहंस रामकृष्ण देव ने कहा था कि जब भगवान् के हरि कृष्ण नारायण नामों का उच्चारण-स्मरण करते -करते  गला भर आवे ,तब समझो कि , भगवद् प्राप्ति और संसृति चक्र से मुक्त होने के मार्ग पर हम चल पड़े हैं।

 और सन्तों एवं भक्तों ने भी 

एतदालम्बनं श्रेष्ठं एतदालम्बनं परम् ,कहकर मानव को श्रेष्ठतम मार्ग सुझाया है।

 कलिपावनावतार बाबा तुलसी ने तो और भी आगे जाकर अपनी अनुभूति को अत्यंत अकिंचन भाव से कहकर  व्यक्त किया है।

 वह भगवद् विमुख जीव की नाना जन्मों से संसारोन्मुख दशा दिशा को क्षण मात्र में बदल कर सन्मुख होइ जीव मोहिं जबहीं ।जन्म कोटि अघ नासौं तबहीं ,ऐसा संकल्प भगवान् से कराकर सब बदल कर ,दूसरी कुण्डली ही लिखवा देते हैं।

  लेकिन एक शर्त भी  रखी है कि, कुसंग तो छोड़ना ही पड़ेगा।भगवान् ऋषभदेव तो स्त्री संग ही नहीं, वरन् स्त्री आसंग के संगी जनों के संग का भी परित्याग का निर्देश दिया है- त्यज योषितां संङ्गि-सङ्गम्।

 और बाबा तो बड़ी सहजता से, सरलता से कठिन संसार को पार करने का सुगम मार्ग बताते हुए क्षणभर में सर्वार्थ सिद्धि ही  देते दीखते हैं-

बिगड़ी जनम अनेक की 

अब ही सुधरै  आजु।

होहि राम को नाम जप

तुलसी तजि कुसमाजु।।

।। हरिः शरणम् ।।

तृष्णासुखक्षय

परम योगी महाराज भर्तृहरि ने जिन तीन शतकों -नीति शृंगार और वैराग्य की रचना करके , अपनी महत् प्रतिभा का प्रतिमान प्रस्तुत किया है, उनमें वैराग्य शतक अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 संसार के भोगों को वे भोगे रोगभयम् ,कहते हैं।और भोगों को भोगने की तृष्णा को, वह कहते हैं कि ,तृष्णा तो जीर्ण होती नहीं, हम ही जरा जर्जर होकर शरीर पूरा कर लेते हैं।

 तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा

भोगा न भुक्ताः वयमेव भुक्ताः

और तृष्णा गई नहीं ,वह तो भोगों को भोगते-भोगते और भी तरुण हो गई।

तृष्णैका तरुणायते।।

अब सोचिये, कामनाओं के भोग से काम की शान्ति नहीं।

प्रज्वलित अग्नि में घी डालने से, वह बढ़ेगी ही।

और  संसार में इस धरती का समस्त अन्नधनधान्य पुत्र स्त्री स्वर्ण रजतादि,किसी एक मनुष्य को मिल जाय तो भी ,उसकी तृष्णा शान्त नहीं होगी।

 यह भोगों की तृष्णा बहुत बड़ी दुर्मति है, जिसे छोड़े बिना,अनन्त सुख प्राप्ति असम्भव है।शरीर के सारे अंग उपांग जीर्ण जीर्णतर होते जाते हैं, किन्तु धनाशा और अधिक भोग भोगने की आशा में जीवन की आशा छूटती नहीं, शरीर छूट जाता है –

जीर्यन्ति जीर्यतः केशाः

दन्ताः जीर्यन्ति जीर्यतः।

धनाशा जीविताशा च

जीर्यतः अपि न जीर्यतः।।

  अतः मानव जन्म के अन्तिम  उद्देश्य की प्राप्ति में बाधक इस भोगवासना को तो छोड़ना ही पड़ेगा।

 श्रीरामकृष्ण परमहंस देव ने इन सभी भोग प्राप्ति की विकलताओं को छोड़ने के लिये अपने वचनामृत में भगवान् के किन्हीं नामों के जप स्मरण का निर्देश किया है।वह कहते हैं कि, जब नाम जप से भगवद् दर्शन की व्याकुलता जगेगी, तब सारे भोगों की तृष्णा स्वतः निवृत और नष्ट हो जायेगी।

 अपने वचनामृत में उन्होंने प्राचीन भारत की एक कथा का उल्लेख किया है। एक युवा सन्यासी भिक्षा के लिये जाता है।द्वार पर उस गृहिणी की युवा पुत्री आकर, भिक्षादान के लिए प्रस्तुत होती है। युवती के वक्ष पर उसके स्तनों को देखकर, सन्यासी युवक जोर -जोर से रोने लगता है।

रुदन सुनकर उसकी माता दौड़कर आती है।और रोने का कारण पूछती है। सन्यासी कहते हैं कि मैं भिक्षा नहीं लूँगा माँ। इसके शरीर पर दो बड़े फोड़े हो गए हैं, इसको कितनी पीड़ा  होगी।

 उसकी माँ हँसकर बताती है कि, यह इसके युवा होने और गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके विवाह के पश्चात् सन्तान उत्पन्न करने की अवस्था है।

जब इसकी सन्तान होगी ,तब उसके लिए करुणासागर भगवान् इन फोड़े जैसे दीखने वाले इसके स्तनों में दूध भर देंगे, और उसे पीकर  इसका सन्तान बड़ा होगा।

 भगवान् अत्यंत करुणा कृपा की मूर्ति हैं, जो आने वाली सन्तान के लिए पहले ही सजग होकर व्यवस्था कर देते हैं।ऐसा सुनकर कर युवा सन्यासी भगवान् के लिये व्याकुल होकर भिक्षापात्र फेंक कर वन में चला जाता है। धन्य भारत देश और यहाँ की त्याग तपोमयी संस्कृति, जहाँ भोग के लिए नहीं, योग के लिए स्थान है।और इसीलिये इस भोग तृष्णा से वितृष्ण होने का सन्देश भगवान् व्यास देते हैं-

यत् च कामसुखं लोके ,

यत् च दिव्यं महत् सुखं।

तृष्णासुखक्षयसुखस्यैते

नार्हतः  षोडशीं कलाम्।।

।। हरिः शरणम् ।।

नाम की फेंट कसी है

नाना जन्मों का अज्ञान जनित  देह और गेह की आसक्ति आसानी से जाती नहीं प्रभु!

 हरेः हरेः नाम हरेः नाम

हरेः नामैव केवलम्।

 कलौ नास्त्येव नास्त्येव

नास्त्येव गतिः अन्यथा।

कलि युग केवल हरी गुन गाहा। सुमिरि सुमिरि पावत भव थाहा।।

भगवान् वेदव्यास और हमारे आर्ष एवं प्राचीनतम परम्परा के संवाहक वेदादि शास्त्रों में परा प्रज्ञा से विकसित दृष्टि ने बड़ी सूक्ष्म बात कही है।

   जब भगवान् की करुणा कृपा से मनुष्य जन्म प्राप्त होता है, तब गर्भ गत जीव भगवान् से आर्त भावापन्न होकर प्रार्थना करता है।

  प्रार्थना इसलिये कि गर्भावस्था में जीवात्मा को सैकडों पूर्व -शूकर-कूकर से लेकर इन्द्रादि शरीर के भोगों की स्मृति रहती है।और इसीलिये वह ,जीव कातर होकर प्रभु से कहता कि, एक बार और मुझे मानव जन्म मिल जाय,मैं मातृगर्भ से निकल कर बाहर आ जाउँ , तो ऐसा कोई काम नहीं करुँगा , जिससे कोई भी भोग शरीर मिले।

 मैं आपके शरणागत हूँ।

मैं केवल भजन कीर्तन नाम जपादि ही करूँगा ।

यद् योन्यां प्रमुच्येहम्…।

अब जनि (जन्म) जाउँ 

भजहु चक्रपानी।

    विनयपत्रिका।

इत्यादि वचनों से संसार की भयावहता से व्यथित वह, पूर्व जन्मों शरीरों का स्मरण कर ,प्रार्थना करते हुए नाम जपादि द्वारा मुक्त होने का संकल्प व्यक्त करता है।

 गर्भ वास पूर्ण कर बाहर आते ही भगवान् की प्रचण्ड माया घेर लेती है। सभी पूर्व पराकृत स्मरण, भगवान् स्वयं भुलवा देते हैं, क्योंकि यदि स्मृति बनी रहे तो ,वह पागल हो जाय। 

  और सद्गूरु कृपा से निवेदन के भाव छलक पड़ते हैं, कल्याण भी हो ही जाता है।

अपराधसहस्रभाजनं

पतितं भीमभवार्णवोदरे।

अगतिं शरणागतिं हरे!

कृपया केवलं आत्मसात् कुरु।

बाबा मलूक की वाणी में उसकी प्रार्थना होती है-

दीनदयाल सुनी जब तें

तब ते मन में कछु ऐसी बसी है। तेरो कहाय के जाऊँ कहाँ,

अरु तेरे ही नाम की फेंट कसी है। तेरो ही आसरो एक 

मलूक को, तेरे समान न दूजो जसी है।ऐ हो मुरारि! पुकारि कहूँ या में मेरी हँसी नाहिं 

तेरी हँसी है।।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रभा का आभास

जगदाधार, सर्वकारणकारण,अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड नायक,सर्वेश्वर,परात् पर परमात्मा सर्वत्र विराजे हैं।

हम अपने अखण्ड पाखण्ड के पोषक, बाहरी आडम्बर के प्रदर्शक, स्वयं अपने में हरिः ओ3म् तत् सत् की अनुभूति नहीं कर पा रहे हैं,तो इससे बड़ा आश्चर्य क्या है?

 हृदय में आशा है संसार के धन,सम्पत्ति, मान, बड़ाई की। हम संसार के वैभव को अपना मानने की भूल कीये बैठे हैं। 

पददास, प्रतिष्ठा दास,मानदास,सम्मान दास,रूपया दास,बडा़ई दास,

कामदास, मोहदास, क्रोधदास बने हैं, क्योंकि जन्म-जन्म का अमिट मलिन संस्कार जो है।

 कुछ पूजा पाठ कर भी लेते हैं, तो दम्भ  बढ़ जाता है।

  अपनी किसी पूजा में अपने अन्तर में विराजित हृद्देश में सदा प्रतिष्ठित परमात्मा का अनुभव नहीं होता।

 कुछ करते  भी हैं तो संसार को जनाने रिझाने के लिये ।

अन्तरगत यदि भासता तो कहि-कहि काहि जनाव।

अन्तरजामी जानता अन्तर गत के भाव।।

प्रभु जानत सब बिनहिं जनाए। कहहु कवन सिधि लोक रिझाए।।

 हम बड़े विद्वान और ज्ञानी मानते हैं, अपने को ,वेद शास्त्र की सम्यक् व्याख्या भी कर लेते हैं तो क्या हुआ?

 इससे तो अपना पेट पाल सकते हैं, स्वर्गादि का वैभव और इन्द्रादि का पद भी पा सकते हैं, लेकिन करुणानिधान की करुणा से मिली इस देह को पुनः जन्म में ही ले जा रहे हैं-

श्रीमदाद्य भगवान् शङ्कर ने अपने “विवेकचूडामणि” में यही विवेक व्यक्त किया-

वाग् वैखरी शब्दझरी शास्त्र- 

व्याख्यान-कौशलम्।

वैदुष्यं विदुषां तद्वद् 

भुक्तये न तु मुक्तये।।

इसलिए –

मन क्रम बचन छाँड़ि चतुराई।

भजत कृपा करिहहिं रघुराई।

पहले स्वयं में आत्मानुभूति करनी होगी तब अपने से इतर सभी में उस प्रभा का 

आभास होने लगेगा।

।। हरिः शरणम् ।।

मेरी हँसी नाहिं तेरी हँसी है

इस शरीर संसार में अहन्ता और ममता ही नाना क्लेशों और पाप ताप सन्ताप की जड़ है।शब्दस्पर्शादि विभिन्न विषयों में जन्म जन्मांतर से आबद्ध मनबुद्धि की शुद्धि जल्दी होती नहीं है। यह संसार या प्रकृति भिन्नाप्रकृतिरष्टधा इत्यादि भगवद् वचनों से आठ संख्या में है। इसमें पाँच स्थूल है, और तीन सूक्ष्म। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश स्थूल प्रकृति है।

जबकि मन,बुद्धि और अहंकार, ये तीन सूक्ष्म के अन्तर्गत आते हैं।

  यह शरीर और संसार इन्हीं से निर्मित है।शरीर और संसार दो नहीं, बल्कि एक ही हैं।जो इस घटाकाश शरीर पिण्ड में है, वही अनन्त अण्ड-ब्रह्माण्ड में भी।

  क्षितिजलपावकगगनशरीरा

  पंचरचित यह अधम शरीरा।

अब इन आठों प्रकृतियों में सबसे पहले विकार की उत्पत्ति मन,बुद्धि, अहंकार में होती है।और पुनः तदनन्तर पृथ्वी आदि में।यदि सद्गुरु सन्त भगवन्त कृपा का आश्रय मिले, तो ही इस सूक्ष्म अहमादि की विकृति दूर हो सकती है।

  हम जैसे मलिन अन्तःकरण के जीवों को पहले स्वयं आगे शास्त्रानुमोदित सन्मार्ग पर चलना होगा, और तब गुरु माध्यम से भगवत् कृपा हो सकती है।

 अहं ममाभिमानोत्थैः कामलोभादिभिः

मलैः। वीतं यदा मनः शुद्धम् अदुःखम् असुखं सुखम्।

श्रीमद्भागवत शास्त्र की उक्त शुकवाणी तो ऐसा ही कहती प्रतीत होती है।

 ऐसी सूक्ष्म शरीर की प्रकृति अहमादि की शुद्धि नहीं होने पर गोस्वामीजी जी अपनी विपत्ति भगवान् से कहते हैं-

मैं केहि कहौं विपति अति भारी।

श्रीरधुबीर धीर हितकारी।

मम हृदय भवन प्रभु तोरा।

तहँ बसे आइ बहु चोरा।

अति कठिन करहिं बरजोरा।

मानहिं नहिं बिनय बहोरा।

तममोहलोभ अहँकारा।

मदक्रोध बोधरिपु मारा।

कह तुलसिदास सुनु रामा।

लूटहिं तस्कर तव धामा।।

चिंता यह मोहिं अपारा।

अपजस नहिं होइ तुम्हारा।।

  अब ऐसी अहमादि सूक्ष्म प्रकृति की शुद्धि में भगवत् कृपा ही एक अवलम्

।। हरिः शरणम् ।।

भजिअ राम सब काम तजि

भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढ मते।

भूमि परत भा ढाबर पानी 

जिमि जीवहिं माया लिपटानी

आखिर  कोटिं त्यक्त्वा हरिं भजेत् को नाना ऋषि कल्प साधु महात्माओं की वाणी क्यों निर्दिष्ट करती है।

 बात ये है कि, बिना हरि मनन के मन ,मनमानी करता रहेगा ,इसलिये  हर काम करते हुए हरिनाम लेना चाहिए।

 परम योगीन्द्र अमलात्मा विमलात्मा व्यासनन्दन श्री शुकदेवजी महाराज इसी माया के भयवशात् बारह वर्षों तक गर्भ में ही रह गये,उनकी वे ही जानें।

जब जन्मे तब किसी की ओर देखा भी नहीं और विविक्त एकान्त वास हेतु विपिन प्रस्थान किया।  पीछे-पीछे भगवान् व्यास हा पुत्र! कहते हुए दौड़ पड़े। वृक्षों से भी आवाज आई- शुकोहम्।

तरवो विनेदुः। वृक्षों ने भी सर्वत्र एक परमात्मतत्व का गान किया है। व्यास जी लौट आए, ब्रह्माण्ड के सारे रहस्य को जानने वाले थे।

 राजा परीक्षित को तक्षक द्वारा डँसे जाने से सप्ताह के अभ्यन्तर मृत्यु होने का शाप मिलता है। और नाना नारदादि ऋषि-मुनियों के समक्ष राजा परीक्षित, तपःपूत शुकदेवजी महाराज से श्रीमद् भागवत की कथा सुनते हैं। प्रारंभ में ही राजा ने प्रश्न किया था कि प्रत्येक मुमूर्षु अर्थात्  मृत्यु की ओर अग्रसर मनुष्य जीव को बचने का क्या उपाय करना चाहिए?

 शुकवाणी होती है-

श्रोतव्यः कीर्तितव्यः च 

स्मर्तव्यः सः सदा  हरिः।।

मतलब कि, जीवात्मा का परम कर्तव्य है कि, वह भगवान् के किसी रामकृष्ण नारायण हरि नामों और उनकी कथाओं का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करे।

  क्योंकि जिन हरि कथा सुनी नहिं काना श्रवण रन्ध्र अह भवन समाना। और कथा सुनने का प्रतिदिन अभ्यास करते रहने पर भी जीव के समुद्र वत् कान कभी कथासुधारस से भरते नहीं ।

 रोज-रोज कथा सुनी जाने पर भी माया से व्यथित जीव की कथामृत पिपासा शान्त नहीं होती।

 भुवनभोहिनी अविद्या माया से और जन्म-मृत्यु से बचने के लिए दूसरा उपाय हरिकीर्तन बताया, जिससे स्वयं के अतिरिक्त अन्य नाना जीवों को भी सुगति मिले।

 तीसरा उपाय भगवद् स्मरण को बताया है, जो हर एक जगत् के कार्य करते हुए सम्भव है।

 यह श्रवण, कीर्तन और स्मरण इसलिये है कि माया तो विस्मरण कराने हेतु सजी धजी बैठी ही है।

कबीर सूर तुलसी की वाणी का आश्रय लेना होगा, जहाँ वेदशास्त्र का मन्थन कर , नवनीत(मक्खन) निकला है।

 रमैया की दुलहन ने लूटल बजार। ब्रह्मा को लूटल औ शिव को भी लूटल। लूटल सकल संसार। कबिरा बच गया साहब कृपा से शब्द(हरिनाम) डोर गहि उतरा पार।

 इसलिये श्रवणकीर्तनस्मरण पूर्वक हर काम करते हुए हरिभजन ही श्रेयस्कर और मृत्यु से बचने का एकमेवोपाय है, और सब अपाय ही। बाबा ने भी यही सम्मति दी-

हरि माया कृत दोषगुन

बिनु हरि भजन न जाहिं।

भजिअ राम सब काम तजि

अस बिचार मन माहिं।।

।। हरिः शरणम् ।।

चितवहिं रामकृपा करि जेहीं

स्वारथ एक जीव कर एहा।

होइ रामपदपंकज  नेहा।।

यह तन कर फल विषय न भाई।स्वर्गहु स्वल्प अन्त दुखदाई।।

मनुष्य शरीर धारण करने का का एकमात्र प्रयोजन श्रीरामचरणों में निष्काम प्रीति ही है। पृथ्वी लोक से लेकर ब्रह्म लोक तक के भोग  नियत अवधि वाले और परिणाम में दुःखप्रद हैं।

बड़ी विचित्र बात है, लेकिन सीधी सरल और वास्तविक-

हम शरीर नहीं हैं।

हम संसार नहीं हैं।

यह परिवर्तन शील, परिवर्तन शील को क्या देख सकता है?

मतलब कि  विकारों से उपजा यह शरीर ,बाल्यशैशव,युवा , प्रौढ़ और वृद्धत्व में परिवर्तित हो गया । संसार का प्रत्येक वस्तु व्यक्ति पद पदार्थ भी ,बड़ी तेजी से बदलता ही जा रहा है।

  तो अब इस शरीरसंसार का परिवर्तन यह शरीर संसार कभी भी देख नहीं सकता।

तब देखता कौन है?

यह अविकारी अविनाशी सदा अपरिवर्तित परमात्मा का एक छोटा पार्टिकिल आत्मा ही। नष्ट होते शरीर और संसार को देख कर भी उनमें अहन्ता-ममता बना रहना, बड़ा आश्चर्य जनक है।

  अरे भाई ! सभी में उस परम तत्व को देखे बिना तात्विक दृष्टि नहीं हो सकती।

 हम पूछते हैं कि इस शरीर से ,जब वह परमात्मतत्व हट जाता है, तब क्या हमारी ममता उस शरीर में रहती है?

 बिलकुल नहीं।

तो हमारे अपने सभी नाते एक उसी परमात्मा के नाते हैं। हम वस्तुतः प्रेम, जो भी परस्पर करते हैं, वह उसी परम आत्मा से ही करते हैं।

केवल हम पहचान नहीं पाते।

और यह भी केवल शरीर संसार में भोग दृष्टि से।

जब सनातन की योग दृष्टि से देखेंगे, तब विचार बुद्धि विवेक उपजेगा और तब सियाराम मय सब जग जानी हो जायेगा।

 भगवान् की प्रचण्ड माया ने हमें मोहित कर सब भुलवा दिया है।

ज्ञानिनाम् अपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।

बलाद् आकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।

 बिनहिं प्रयास होहिं भवभंगा  तो नारायण ! सद्गुरु साधु कृपासाध्य ही है।

 इस मनुष्य शरीर का परम परम सौभाग्य होता है, जब सन्त भगवन्त कृपा से नष्टो मोहः स्मृतिः लब्धा की स्थिति मिल जाती है।और इसीलिये दिनरात ” राम-राम ” रटने वाले भगवान् उमामहेश्वर इस स्वर्ण मय पर्वत रुप संसार में मोहासक्ति के सहज विनाश को कह पड़ते हैं, जो कि श्रीरामकृष्णनारायण सीता राधा दुर्गा काली की कृपा पूर्ण दृष्टि से देख लेने पर अकस्मात् सम्भव है।नहीं तो क्षणभंगुर संसार का वैभवभंग असम्भव है-

गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताहीं।

चितवहिं राम कृपा करि जाहीं।।

।। हरिः शरणम् ।।

जानत तुमहिं तुमहिं होइ जाई

मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य भगवद् दर्शन और प्राप्ति ही है।

 बड़ा रहस्य बन जाता है यह कार्य, क्योंकि कि विशुद्ध चित्त वाले श्रीहनूमान् नारद जैसे सन्त ऋषि का दर्शन भी कठिन है, और जो इस प्राप्तव्य की प्राप्ति करा दें।

 चाहे हनुमानजी महाराज हों या देवर्षि नारद, सभी भगवन् नाम के प्रतिवेशक( नाम को परोसने वाले) अद्वितीय हैं।

 स्वयं प्रभु भी राधा पुकारते पुकारते राधा ही हो जाते हैं, जबकि राधा भी कृष्ण-कृष्ण कहते कहते कृष्ण स्वरूप हो ,जाती है।

  यह अंशी-अंश( ईश्वर-जीव)

 राधामाधव, सीताराम तथा शिवाशिव एकाकार तदात्म ही हैं।

  अब जीव भूला क्यों?

ईश्वर अंश जीव अविनाशी।

चेतन अमल सहज सुखराशी

सो मायाबस भयौ गोसाईं।

बँन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं।

 तोते बन्दर की तरह मोह माया के जाले में जकड़ा है।

  यह जंजीर उन्हीं नाम महाराज के नाम से टूटेगी।

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।

अपने बस करि राखे रामू।।

  इनके माया की विचित्र लीला भी हे।

 यह परब्रह्म परमात्मा असंख्येय कल्याण गुण गण निलय ,सर्वाधार ,सर्वकारण कारण हैं। देवत्रितयी भी नहीं जान पाती, जब तक कि वे स्वयं जनाना न चाहें।

जग पेखन तुम देखन हारे

आप ही सम्पूर्ण जगत् के प्रेक्षणीय, दर्शनीय हैं।

विधिहरिशम्भु नचावन वारे

कोऊ न जानै मरम तुम्हारा।

जानि लेइ सो जानन हारा।।

वही जान सकता है जो, जानने की अन्तिम सीमा पर जाकर भी हार न माने।

  और,तब तो-

साधुसन्तमाध्यम से प्राप्ति प्रतीति होनी ही है।

और जानने के बाद यह अकिंचन जीव भी, तदाकारा आकारित ही बने तो कोई आश्चर्य नहीं।

सो जानहि जेहु देइ जनाई।

जानत तुमहिं-तुमहिं होइ जाई

।। हरिः शरणम् ।।