मनबुद्धिचित्ताहङ्कार अन्तः इन्द्रियाँ हैं। इनका शासन वाक्पाणिपायूपस्थ कर्म इन्द्रियों और श्रोत्रत्वक्चक्षुषी जिह्वा जैसी ज्ञान इन्द्रियों, सभी पर चलता है। इन चतुः अन्तरिन्द्रियों के विना अन्य प्रकट दशों इन्द्रियाँ अपना सम्यक् कार्य सम्पादित नहीं कर सकतीं। इन चारों में उत्तरोत्तर की सूक्ष्मता है और सूक्ष्मता है तो श्रेष्ठता भी। अतः बुद्धि तभी ठीक रहेगी, जब , मन निर्मल होगा। मन निर्मल तभी होगा, जब सभी इन्द्रियों में अपने को मन कहने वाले साक्षान् नारायण के किसी नाम का सतत मनन होगा। अतः बुद्धि चित्त और अहं भाव सभी की शुद्धि, मनः शुद्धि के विना असम्भव है।और मनःशुद्धि तो नाम जप चिन्तन मनन से ही सम्भव है। इसलिये अहमादि वृत्तियों में सर्वप्रथम मनः शुद्धि के लिये समर्पित भाव से नामजप को साधन बताया गया है । मनःशुद्धि से सब ठीक हो जाता है।
राम राम राम जीह, जौ लौं तू न जपिहै। तौ लौं तू कहूँ जाय त्रिविध ताप तपिहै।
|| हरिः शरणम् ||