भगवान् की प्राप्ति, भगवद् दर्शन, भगवान् का चरणाश्रय
और उनकी अविचल,निष्काम प्रेमा भक्ति तो केवल कृपासाध्य ही है, चाहे वह कृपा करें अथवा उनके प्राणप्यारे सन्तसाधु भक्त। अच्छा, भक्त शब्द का एक दूसरा अर्थ है विभक्त विभाजित खण्डित टूटा हुआ। मतलब कि जो शरीर संसार से उसके भोगों से टूटा हुआ विखण्डित विरक्त और प्राप्य परमात्मा से जुड़ गया, वह भक्त है।
अनेकजन्मसंसिद्वः ततो याति, परां गतिम्। अर्थात् यह भगवच्चरणाश्रय वाली भगवान् की प्रेमा भक्ति नाना जन्मों में शनैः शनैः सिद्ध होती हुई यानी कि पकते-पकते ,तब जाकर परिपक्व होकर पूर्णमदः पूर्णमिदं ,पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।पूर्णस्य पूर्णमादाय ,पूर्णम् एव अवशिष्यते पर पहुंच जाती है, और संसार से टूटा(भक्त) भगवान् से जुड़ जाता है।
जयन्त, देवर्षि नारद को नहीं देखता, नाना ब्रह्मशिव आदि लोकों से निराश उसको महामुनीन्द्र नारद जी देख लेते हैं और सन्त कृपा से वह भगवन्त कृपा का अधिकारी बन जाता है।
तद् विद्धि प्रणिपातेन,परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति तं ज्ञानं ज्ञानिनः तत्वदर्शिनः।।
इत्यादि श्रीभगवान् के उक्त वचनों का सार भी यही है कि, उस परम आत्म तत्व को जिज्ञासा, गुरु के प्रति अत्यन्त आदर और सेवा(भक्ति) से पाया जा सकता है। तत्व दर्शी ज्ञानी ही उस तत्व का उपदेश करते हैं, जिन्हें वह हरिः ओ3म् तत् सत् प्राप्त है।
इसलिये संसार के लोभ, भोग को त्याग कर तत् साधु ,साधु-प्रीति ही करनी होगी। और कोई रास्ता नहीं, माया-मोह के पार जाने के लिए।नहीं तो नरकादि लोक और पुनः जन्म निश्चित है।
कामक्रोधमदलोभ सब नाथ नरक के पन्थ। इन्ह परिहरि रघुबीरहिं भजहु भजहिं जेहिं सन्त।।
और सद्गुरु बताते हैं कि बाबा तुलसी ने स्पष्ट ही कर दिया है कि भगवत् प्राप्ति में अपना किया हुआ यज्ञ योग जप दान आदि साधन तो अवश्य ही करना चाहिए, किन्तु संसार लोभ छोड़कर।
भगवत् प्राप्ति और प्रीति मात्र हेतु जपपूजादि साधन बनेंगे तो काम बनेगा यानी की ,कृपाप्राप्त सन्तो की कृपा
होगी और संसृति चक्र छूटेगा।
लोभ पास जेहि गर न बँधाया।
सो नर तुम समान रघुराया।।
यह गुन साधन ते नहिं होई।
तुम्हरी कृपा पाव कोइ कोई।।
।। हरिः शरणम् ।।