भक्तजनैरनुभूयते

यदि समस्तमिदं जगतीतलं
तव स्वरूपमहो प्रभु दृश्यते।
तदनु कारणमामनुते मनः
तव कृपाकरुणा परिसिद्ध्यति।।

यदि मयि प्रति ते द्रवते मनः,
तदिह चेतयते मम चेतना।
त्वमिह सिद्ध्यसि हेतुरवश्यता
जननि रामरमे शिववासने।।

यदि विनिश्तितबुद्धिरभून्मता
भवसि कालकलाकुलिता कले।
सकलसज्जनसज्जितधारणे,
धरणि धाम्नि धराधरिता कृपा।।

अधरधारितहास्यविशेषता,
सविधि ये परिभूय परिस्थिता।
परमपारपरे परितः स्थितिः,
तव विलोक्य जनाः विवशीकृताः।।

स्ववशहारविहारविचित्रता,
जनितमादनमोदमदा मता।
तव सुदर्शनदर्शनदिव्यता,
समनुभूय जगत् परिभाव्यते।।

यदि जने भविता करुणाकृपे
हृदि गतं रसनं स्रवते शुभे।
तव स्वभावविभावविभाव्यते,
सकलभक्तजनैरनुभूयते।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्

https://shishirchandrablog.in/2023/11/03/भक्तजनैरनुभूयते/

पूछ लीजिए ज्ञान

रावण रजोगुण काम अहम् का दास था। राम विशुद्ध सत्व प्रजाकाम और कर्ता कारयिता होकर भी मर्यादा धर्म के विग्रह थे।

शंकर सहस विष्नु अज कोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।

ब्राह्मण वंशी होकर वेदज्ञ होकर भी यदि विद्या मद दम्भ दर्प और अतिमानिता है, तो समझो वह ब्राह्मण क्या, एक अदद मनुष्य भी नहीं।

अतः रावयति अर्थात् जन्म जन्मान्तर तक रोने धोने वाले संसार में ढकेलने वाले असद् भाव को धारण करनेवाला रावण है। वह प्रवृत्ति मार्ग से भगवत् प्राप्ति कामी था।प्रवृत्ति मार्ग से भगवत् प्राप्ति शास्त्र निषिद्ध है। श्रीराम दूत हनुमानजी महाराज जैसे ज्ञानिनाम् अग्रगण्यं की प्रथम अवहेलना ही,उसके पुनः पुनः वध की अवाध परम्परा सिद्ध करती है।

जो अपराध भगत कर करई। रामरोष पावक सों जरई।।

कोई जाति ब्राह्मण होने पर भी दानवता प्रतिमूर्ति होने पर ,बधार्ह ही है। और रही बात कुशासन मूर्तिमन्त लोभवन्त दुःशासन दुर्योधनों जैसों की,तो भगवान् ने द्रौपदी की करुणा से द्रवित होकर वस्त्रावतार ही ग्रहण कर लिया था।

यतः कृष्णः ततो जयः।

अधर्मी रावण भी और दुर्योधन भी। एक अभिमानमूर्ति और दूसरा राज्य लोभ मूर्ति।हमारी अपनी छोटी बुद्धि, अपनी सीमा में यही निर्णय कर पाती है कि, काम बड़ा अधर्म है और लोभ किंचित् छोटा अधर्म।काम का सन्यास यही कि, भगवत् काम हो जाय। और लोभ का सन्यास यही की भगवत् चरणारविन्द लोभी हो जाय।

हम जन्म जन्मान्तर की अपनी मलिन वासना से सही निर्णय पर नहीं पहुँच पाते।सुविचारित सुसंगत का तो, निर्णय सती बुद्धि करती है, असती कभी नहीं। अतः रावण को सहज भाव से दुर्योधनादि कंस की श्रेणी में रखना अयुक्तिक है।

इसलिये आज रावण को ब्राह्मण वंशीय कहकर महिमा मण्डित पण्डित वेदज्ञ कहकर कालिक परम्परा में जातिगत आक्षेप ठीक नहीं। शास्त्र सन्त और सद्गुरु जात्यापेक्षी नहीं हैं।सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म ही वस्तुतः ब्राह्मणत्व है,जाति नहीं।

नैव जातिः ब्राह्मणत्वम्, अपितु ब्रह्मवित्वं ब्राह्मणत्वम्। सर्वोपकारित्वं ब्राह्मणत्वम्।

इसलिये जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

http://shishirchandrablog.in

सद्गुरु संग पवाइये

नारायण नारायण नारायण कामलीलासक्त हम जैसे लोग जब, वेद देव सन्त समर्थ सद् गुरु चरणाश्रय ग्रहण करें तभी सन्मार्ग मिले।अत्यन्तवैराग्यवान् गुरुभगवान् ही कामादि हटायेंगे, जिनका कि हट चुका है। विषयविष बन्ध निर्मुक्तसाधु भक्त का पादाश्रय ही स्वर्गापवर्गासक्त भाव हटायेगा। जगत् का मान सम्मान पद पदार्थों की रुचि तो बारम्बार पार्थिव देहों में जीव को डालेगा ही।कालकर्म और ऐन्द्रिक ग्राहकों ने मुझे आजन्म घेर लिया है।जब मैं उनके हाथ बिकना,स्वीकार नहीं करता, तब वे मुझे बाँधकर,दाम दिखाते हैं।मतलब कि जैसे तैसे लालच दिखाकर अपने वश में करना चाहते हैं।कालकरमइन्द्रियविषय गाहकगन घेरो।हौं न कबूलत,बाँधि कै मोल करत करेरो – विनयपत्रिका पद 146

हे प्रभु जहाँ सत्संग कथा माधव की होती है, वहाँ मन जाता ही नहीं।लोभ मोहादि से मुझे प्रेम है।जहँ सतसंग कथा माधव की, सपनेहुँ करत न फेरो।लोभ मोह मद काम कोह रत,तिन्ह सों प्रेम घनेरो -वही पद -143

इसलिये हे नाथ साधुसद्गुरु संग देकर संसारद्वन्द्व भगाइये और अपनेचरणकमलों में ही राग दे दीजिये, तभी पार्थिव विकृति हटेगी और स्वस्वरूप की अवगति होगी,अन्यथा मैं संसार सागर में बारम्बार डूब ही जाता हूँ- सेवत साधु द्वैत भय भागै।श्रीरघुबीर चरन लय लागै।।देह जनित बिकार सब त्यागै।तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै।।

वही 136/11स्वप्न में भी द्वैतदर्शन में सुख नहीं है, सुखाभास छोड़कर।ब्रह्मविद् ब्राह्मण देवता गुरु हरि सन्तों के बिना संसार से पार पाना असम्भव है-सपनेहुँ नहीं सुख द्वैत दरसन,बात कोटिक को कहै।द्विज देव गुरु हरि संत बिनु संसार पार न पाइये ।यह जानि तुलसीदास त्रासहरन रमापति गाइये-वही 136/12

अतः हम मायाधीन जीव।मायाधीश आप सिवासीव।हमें चाहे जैसा मान अपनाइये। विरागीसज्जन सद्गुरु संग पवाइये।

।हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्।http://shishirchandrablog.in

विषयविषसम

नारायण नारायण नारायण अत्यन्त वैराग्य सम्पन्न महापुरुष का चरणाश्रय ही वैराग्य दे सकता है। यस्य निर्विषयं मनः और अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः जैसे वाक्य कथन में मानदण्ड हैं।विवेकवैराग्यख्यात जन ही वैराग्य बाँटते हैं, लेकिन किसी किसी सौभाग्यशाली को,गुरुहरि कृपा ही कारणता दीखती है, विषयविष के परित्याग में।ऐसे लोगों का जीवन धन्य धन्य है, जिन्हे हरिकथासंग प्राप्त हो।

क्योंकि हरिकथा इस कराल कलिकाल में मरणधर्मा मानव की अमरता है। तव कथामृतं तप्तजीवनम्।और वे धन्यातिधन्य हैं, जिन्हे पूज्य गोस्वामी जी जैसे सन्तों की वाणी में तृप्ति और आनन्दानुभूति होने लगे।ऐसे सन्तचरित्र और उनकी वाणी का प्रसाद, वर्तमान समय में तो, कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणाः इत्यादि व्यासवचन की सत्यता सिद्ध करते हैं।

भक्तसन्तों की उपस्थिति में यह स्वतः ही ध्रुव प्रमाण है।रमाविलासविलास राम अनुरागी तजत वमन इव नर बड़ भागी एवं गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताहीं राम कृपा करि चितवा जाही जैसी वैराग्य विवेकसम्पन्नता हरिगुरुकृपा ही देती है। जिससे इस मायिक संसार में सुखाभासता की चरम प्रतीति होने लगती है। आपातरमणीय संसार के भोगों की निःसारता और सर्वकारणकारण भगवान् की सच्चिदानन्दमयता में सतत आत्मिक अनुभूति आने लगती है।

जब नेति नेति वह,,अपनी आत्मा में आनन्दनिर्झरझर्झर झरने लगा, तो चरम प्राप्य तो यही है।एक विशेष बात यह भी कि,मायिक उपाधियों से मुक्त परमपरमात्मा की अपरोक्षानुभूति मायोपाधि शून्यता दशा में ही अनुभवैक गम्य है। क्योंकि- आप मायाधीश मायाधीन जीव हम। करो निर्मल चित्त तुच्छ विषयविषसम।

हरिःशरणम्।। गुरुः शरणम्।।

http://shishirchandrablog.in

सकलसुखसङ्गो विजयते

कृष्ण चेतना ही प्रत्येक कण-कण और प्राणिमात्र में है।अनुभूति कराने वाले साधक के मिले बिना उसका अनुभव असम्भव है। हमारी नाना जन्मो योनियों की संसारी वासना को सिद्ध साधक क्षण भर में,हटाकर मायाबन्ध को नष्ट कर देता है, जैसे परमहंसदेव श्रीरामकृष्ण ने बहुतों का किया।और आज भी अनुभवप्रत्यक्ष सिद्ध सद्गुरु किसी जीव को उसके वेदाचरण से अभिभूत होकर,उसका मायिक बन्धन तोड़ रहे हैं, तोड़ते आगे भी रहेंगे।आवश्यकता केवल वेद,महापुरुष और सन्त आचरित मार्ग पर चल पड़ने की है।जैसा -जैसा श्रेष्ठ जन आचरण करते चलते हैं, उसी तरह बाद में उत्पन्न लोगों को भी करना ही चाहिए।ऐसे महत्पुरुष जो चलने का मार्ग दिखायें,उसी का अनु करण हो।यद् यद् आचरति श्रेष्ठः,तत् तत् एव इतरः जनः।स यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तद् अनुवर्तते।। -ब्रह्माण्डगुरु श्रीकृष्ण।चेतनाशक्ति, चेतनाधर्ता की है। जब सबमें वही है तब अलग क्या है। बिनु सत्संग न हरिकथा। मतलब कि हरि कथा ही सत्संग है। और सत्संग अमृत के बिना अनेक जन्मों की संसार वासना जायेगी नहीं- जौ कछु काल करिय सतसंगा। जब मन से बे मन से नाम स्मरणकीर्तन उच्चारण होता है, और भगवत्कथा पीयूषरस का पान होता है, तब भगवान् /भगवती स्वयं जीव के उद्धार का संकल्प करते हैं। अतः हमें अहंकार मात्र ही है, कि हम अमुक साधन करके भोग/मोक्ष पा लेंगे।गुरोराज्ञा गरीयसी जान कर जीव मात्र को बड़ों के आदेश का पालन करना चाहिए।ऐसे ही सन्त सद्गुरु और बड़ों की वैराग्य पूर्ण रहनी-सहनी का समादर करके ही तमसो मा ज्योतिः गमय प्राप्य है। यही संसार यात्रा का सुगम मार्ग और लक्ष्य पर ले जाने की सरणि है।शरण्य,भगवान् हैं। प्रत्येक मनुष्य जीव अपनी श्वासप्रश्वास में उनका अनुभव कर सकता है।लेकिन यही अनुभव मात्र सद्गति नहीं दे सकता। हरि गुरु सन्त की संगति ही भवबन्धन भंग का एकमेवोपाय है।

सतां सङ्गःसङ्गः भवविभवभङ्गः भुवि नृणाम्।

समाकृष्टः जातः सकलसुखसङ्गो विजयते।

गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।

https://shishirchandrablog.com

शिक्षक/गुरु

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम का समग्र जीवन प्रतिकूलता में अनुकूलता की अनुभूति है।

सौभाग्य से और वैदिक आचार व्यवहार के पालन से कोई सौभाग्यशाली श्रीराचरित्र का अनुसन्धान करे,तो वह मनुष्य और देवतुल्य हो जायेगा।

प्रथम शिक्षा आचरण द्वारा शिक्षण है,जिसे प्रभु राम ने पालन करके दिखाया।

पल-पल प्रभु का अविस्मृत स्मरण बना रहे, जिससे, अहंता, ममता की खटाई मनुष्यता अवरुद्ध न कर सके।

सृष्टि के प्रत्येक कण-कण में तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ,परमात्मा ही विराजते हैं।अतः सदा तद्भावभावितः रहना प्रत्येक मनुष्य प्राणी का कार्य है।

पन्द्रहवीं शती में बंगाल की पवित्र धरती पर, अवतीर्ण परम पूज्य परमहंस श्रीरामकृष्ण देव का मानना था,कि प्रत्येक शिक्षक को आत्मिक अनुभूति अवश्य ही करनी चाहिए,क्योंकि इसके बिना, मर्यादित आचरण सम्भव नहीं है।
और प्रत्येक शिक्षक/आचार्य से चरित्र शिक्षण ही ऐदं प्राथम्येन अपेक्षित होता है।
सद्गुरु/शिक्षक/परमात्मा एक कोटिक हैं। वह कौन शिक्षक है,जिसे आत्म अनुभूति न हुई।

आते न वे परमेश जो ,गुरुदेव के आकार में।रहता अँधेरा ही अँधेरा मोह का संसार में।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।

सभी देवतुल्य शिक्षक और शिक्षकधर्मा
आत्मीय जनों को सन्तत सादर नमन।

http://www.shishirchandrablog.in

भक्तचरन सुखलाई

मन रम रामचरन सुखदाई।भज मन भक्तचरन सुखलाई।
नारायण सुन्दर प्रभु-प्रभुता
भजत मैल मन जाई।
जिन्ह सन्तन कै मिटी मलिनता, तेहिं चरनन परि जाई।मन रम रामचरन सुखदाई। भज मन भक्तचरन सुखलाई। भक्त हनूमत हृदय बसत तुम राम राम कहि जाई। जाकर रिनिया मेरे प्रभु भे, भगत राज कहि जाई।रम मन राम चरन सुखदाई। भज मन भक्तचरन सुखलाई।
राम-राम रटि मीरा कौ मिलि कृष्णचरन सुख भाई।जिन चरनन अस्मरन करत ही, द्रौपदि लाज बचाई।मन रम रामचरन सुखदाई।भज मन भक्तचरन सुखलाई।
अम्बरीष राजा जेहि चरनन परत भगति सुख पाई। प्रभु भव भंजन सेवक रंजन हेतु जनम जेहि भाई।ऐसो प्रभु भगतन कै चरनन्हि पर गिर काम बिहाई।
रम मन रामचरन सुखदाई।
भज मन भक्तचरन सुखलाई।।


गुरः शरणम्। हरिः शरणम्।

http://shishirchandrablog.com

आनन्द के घन

मोहबन्धन स्वयं टूटा है किसी का, मिलें सद्गुरु बन्ध टूटे,टूटता है, जिस किसी का।

आते न वे परमेश जो गुरुदेव के आकार में।रहता अँधेरा ही अँधेरा मोह का संसार में।

ईश, गुरु में भेद क्या होता कभी है।आत्मदर्शन तुष्ट होवे जीव जब देखे तभी है।

मोह का तम शीर्ण हो चुकता समझ लो।

गुरुब्रह्मासूर्य दीपक है चमकता जब समझ लो।

सन्त वैदिक आचरण करते रहो बस।

सत्य संकल्पित पथों पर चलो हँस हँस।

ध्यान रखते फाँस कटते,कट चुके बन्धन कृपातः।

गुरु देव ही समझो सदा,शिवविष्णुधातः।

हम हमारा, तुम तुम्हारा, भाव यह,जब तक चलेगा।

सृजन विसृजनबन्ध भी चलता रहेगा। कर्म बनते तब तलक हैं, पापमूलक,पुण्यमूलक।

नरक स्वर्गादिक रहेंगे तब तलक ही भोगमूलक।

जय पराजय दुःख सुख के पार जाना ही पड़ेगा।

ईश गुरु चरणारविन्दों में सतत जब गिर, अड़ेगा।

इसलिये आदर्श सद्गुरु,दर्पणों में दर्प धो लो।

इसलिये आदर्श सद्गुरु वचन अमृत प्रेम घोलो।।

इसलिये तुम राम की गंगा बहाओ।

नाम नद में डूबकर उस पार जाओ।।

नाम से वह राम चिन्मय ठहर जाता।

नित्यलीला शाश्वती करता रता है।।

और अन्तिम धाम की प्रभुपद निराली।

पा गया पाकर न लौटा हाँथ खाली।।

जो अकुण्ठित सच्चिदानँद नन्दनन्दन।

गुरुकृपा माध्यम मिलें आनन्द के घन।।

गुरुः शरणम् । हरिःशरणम्।

http://shishirchandrablog.in

संसृति की चक्रनाशि!

मेरी माँ!माया मत दे,माया का साया हटा।
शरणागतदुःखजगत क्षण में है कटा कटा। माया ने जगत् में बहुत है भटकाया। दूसरे शरीरों की राहों को दिखाया।
खोया सब अनेक बार, कुछ भी नहीं पाया। यहीसंसार की त्रिगुणा है माया। छूटते न मोहपाश,विघ्नअन्तराया।कृपा करो विद्या माया(विन्ध्यवासिनी)
बरसे मेघ- दया दाया।
जपतप व्रतअनुष्ठान, तीर्थाटन साधन महान।सबका फल दे दोअम्ब!तुम ही हो स्वावलम्ब।विस्मृत सुखदुखाभास। मेरा न अपना प्रयास।जानता न पूजापाठ।खोलो भवबन्ध गाँठ। दे दो अविस्मृत स्वरूप।
धाम लीला नाम रूप। अविच्छिन्न अविचल स्मृति माँ मैं तेरा।तूँ भी कह मेरा है,मिट जाये फेरा। अपनाओ मैं कुपूत, तुम नहीं कुमाता। मेरी हो गुरू, तात पिता और माता। भागी है, भागेगी दासी अविद्या माया। करुणामयि कृपामूर्ति अब तो करो दाया।रामकृष्ण दुर्गा रटे,नष्ट पाप पुण्य राशि।जीवन के त्रिविध रंग,अन्तर प्रत्यन्तर भाषि। भासती अनुभव कराती आतम प्रकाश राशि।मायातीत रंग चढ़ै संसृति की चक्रनाशि!

गुरुहरी शरणम्

http://shishirchandrablog.com

संसृति की चक्रनाशि!

मेरी माँ! माया मत दे, माया का साया हटा।
शरणागतदुःखजगत क्षण में है कटा कटा। माया ने जगत् में बहुत है भटकाया। दूसरे शरीरों की राहों को दिखाया।
खोया सब अनेक बार, कुछ भी नहीं पाया। यही संसार की त्रिगुणा है माया। छूटते न मोहपाश,विघ्नअन्तराया। कृपा करो विद्या माया(विन्ध्यवासिनी)
बरसे मेघ- दया दाया।
जपतप व्रतअनुष्ठान, तीर्थाटन साधन महान। सबका फल दे दोअम्ब!तुम ही हो स्वावलम्ब।विस्मृत सुखदुखाभास। मेरा न अपना प्रयास। जानता न पूजापाठ।खोलो भवबन्ध गाँठ। दे दो अविस्मृत स्वरूप।
धाम लीला नाम रूप। अविच्छिन्न अविचल स्मृति माँ मैं तेरा।तूँ भी कह मेरा है,मिट जाये फेरा। अपनाओ मैं कुपूत, तुम नहीं कुमाता। मेरी हो गुरू, तात पिता और माता। भागी है, भागेगी दासी अविद्या माया। करुणामयि कृपामूर्ति अब तो करो दाया।रामकृष्ण दुर्गा रटे,नष्ट पाप पुण्य राशि।जीवन के त्रिविध रंग,अन्तर प्रत्यन्तर भाषि। भासती अनुभव कराती आतम प्रकाश राशि।मायातीत रंग चढ़ै संसृति की चक्रनाशि!

गुरुहरी शरणम्

http://shishirchandrablog.com