वेदान्त दर्शन की प्राथमिक पुस्तक “वेदान्तसार”मे सदानन्द योगीन्द्र ने वेदान्त के अधिकारी का निरूपण किया है-
“साधनचतुष्टयसंपन्नो
प्रमाता अधिकारी”
चार साधनों से युक्त व्यक्ति आत्मज्ञान का अधिकारी कहा गया है –
1-वैराग्य
2-विवेक
3-षट्कसंपत्ति
4-मुमुक्षता
वैराग्य-इस लोक से लेकर ब्रह्मलोक तक जो भी भोग्य है, उसमें “काक विष्ठावत् “घृणा
होना वैराग्य है।
विवेक-ब्रह्म का सत्यत्व और
परिणामी जगत् का मिथ्यात्व दृढ रूप से स्वीकार कर लेना, नित्यानित्य वस्तु विवेक है।
षट्कसंपत्ति-इसमें छ: सम्मिलित हैं –
क-शम-मन को संकल्प विकल्प से रोक कर हृदयाकाश मे स्थित आत्मदेव की ओर ले जाना।
ख-दम -इन्द्रियों को उनके विषयों शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध से रोककर अपने-अपने गोलकों मे स्थिर करना।
ग-श्रद्धा-गुरु एवं शास्त्र के वाक्यों मे विश्वास करना।
घ-समाधान-हृदयाकाश मे ठहरे हुए मन द्वारा आत्मानुसन्धान।
ङ -उपरति-विषयों से हटे हुए मन को पुनः विषयों में जाने से रोकना।
च-तितिक्षा-बिना चिन्ता और विलाप के सुख दु:खादि सहन करना।
3- मुमुक्षता -संसार बन्ध से मुक्त होने की सतत इच्छा।
इस प्रकार उक्त साधनों पर अभ्यासी साधक आत्मोपलब्धि
का अधिकारी है ।
।।हरिश्शरणम्।।