तमोगुण भी बन्धन

सत्वगुण और रजोगुण तो बन्धन कारक है ही, तमोगुण इन सभी से अधिक बन्धन का कारण होता है। वृहदारण्यक उपनिषद् में इसीलिये ऋषि ने तम(अन्धकार) से निवृत्ति और प्रकाश की प्राप्ति की बात कही है -असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा अमृतं गमय

उक्त मन्त्र में परमात्मा से, असत्य से सत्य, तम से ज्योति एवं मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलने की प्रार्थना की गई है।और वस्तुतः मृत्यु से अमरत्व और कुछ नहीं ,वरन् विषयों से विनिवृत्त होकर ,जीवन्मुक्त हो जाना है।नहीं तो अनेक जन्मों के समूहालम्बीकृत गुण बन्ध के पाशविक पाश से पार पाना असम्भव है।
सर्वशास्त्र-मयी “गीता” के चतुर्दश अध्याय मे ही तमोगुण से जीवात्मा के बन्धन का स्वरुप बताया गया है।यह तमोगुण प्रमाद -आलस्य और निद्रादि के द्वारा जीवात्मा के मुक्ति-मार्ग में बाधक बनता है।और जन्म-मृत्यु रूप संसार में ही फंसाये रहता है, यही उसका”जीवात्मा को बांधना” है।
जिस प्रकार रजोगुण को कामना आसक्ति से उत्पन्न बताया था, उसी तरह अज्ञान और तमोगुण भी है।इसके मध्य भी बीजवृक्षवत् सम्बन्ध है।तात्पर्य ये है कि, अज्ञान से तमोगुण बढ़ता है और तमोगुण से अज्ञान।देह को आत्मा से पृथक् करके दृष्टि रखने में ही सारी समस्याओं का समाधान है, नहीं तो यह तमोगुण सभी देहाभिमानियों को अज्ञान से आवृत(विवेकरहित) करके प्रमादालस्य निद्रा(भ्रम , अनवधानता सुस्ती, नींद आदि)से जकड़ कर रखता है।और जिससे जीवात्मा इस जन्म में तो कष्ट पाता ही है, उसकाअन्य जन्म भी मूढ योनियों(कीट-पतंग,पशु-पक्षी, वृक्ष-लता प्रभृति)में होता है।
तम: च अज्ञानजं विद्धि
मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभि:
तन् निबध्नाति भारत।।
रजसि प्रलयं गत्वा
कर्मसंगिषु जायते।
तथा प्रलीन: तमसि
मूढयोनिषु जायते।।

इस प्रकार रजोगुण बढ़े होने की दशा में मृत्यु प्राप्त करके मनुष्य योनि में जन्म के बाद, तमोगुण के बढ़ने पर तिर्यगादि निम्न योनियों में उत्पन्न होता है।

भगवान् सहायक हों और हमें सद्बुद्धि दें, जिससे हम इन गुणों के बन्धन से मुक्त हो सकें।

।। हरिश्शरणम् ।।

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रजोगुण भी बन्धन

गीता के चतुर्दश अध्याय में सत्वगुण को जिस तरह बन्धन बताया गया है, उसी तरह रजोगुण को भी संसार बन्धन कारक कहा गया।यदि साधक सत्व गुणाधीन है, तो उसे केवल ज्ञानाहंकार से मुक्ति का प्रयास करना चाहिए।धीरे धीरे वह उसके पार जा सकता है।
अब रजोगुण को देखें, तो यह बात स्पष्ट होती है कि यह तो कामना परक है ही।वस्तुतः इस रजोगुण की वृद्धि से ही काम और आसक्ति का उद्भव होता है। एक तरह से कहें ,तो इसमें कामनाओं की शृंखला बन जाती है।एक की पूर्ति होते ही, दूसरी-तीसरी और अनेकानेक कामनाओं से आवृत हो जाता है, साधक।नि:सन्देह इसे
बीज-वृक्ष न्याय कहें तो अधिक सटीक बात होगी।
जैसै, वृक्ष बीज से उत्पन्न होता है और पुनः उसी वृक्ष से अधिसंख्य नवीन बीज उत्पन्न हो जाते हैं।कालान्तर में अन्य नूतन वृक्ष उत्पन्न हो जाते हैं, और इस प्रकार, यह क्रम निरन्तर चलता रहता है।कभी बीज कारण है, तो वृक्ष कार्य और कभी वृक्ष कारण है, तो बीज कार्य।यह अन्योन्य आश्रय से बीजवृक्षवत् ,रजोगुण एवं कामनासक्तिवत् चलता ही रहता है।अतः भगवान् ने कहा-

रजो रागात्मकं विद्धि
तृष्णासंगसमुद्भवम् ।
तन् निबध्नाति कौन्तेय
कर्म-संगेन देहिनम् ।।
अर्थात्- हे अर्जुन!अनुराग रूप रजोगुण को तू काम और आसक्ति से उत्पन्न जानो
(काम एष: क्रोध एष:रजोगुण समुद्भव:)यह रजोगुण जीव को कर्मों और उसके फलों के सम्बन्ध से दृढतापूर्वक बांध देता है।
सांसारिक विषयासक्ति को निरन्तर दृढतर करनेवाला होने से ही”तृष्णासंगसमुद्भवम्”कहा गया है।इसी तरह”कर्मसंग”का अभिप्राय है कि इन कर्मों और फलों की चक्की में पिसता हुआ, मनुष्य इनका कर्ता-भोक्ता, स्वयं को मानने की निर्बाध दृढ परम्परा में फंसा रहता है।यही कर्मसंग से जीव का जन्म-मृत्यु बन्धन है।
इससे मुक्ति का एकमात्र उपाय भगवत् शरणागति ही है।

।।हरिश्शरणम् ।।

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सत्वगुण भी बन्धन

गीताशास्त्र में भगवान् ने प्रकृति के तीनों गुणों की चर्चा की है।उन्होंने स्वयं को बीज स्थापन करनेवाला पिता तथा, प्रकृति को माता(योनि)कहा है-
सर्वयोनिषु कौन्तेय
मूर्तय:सम्भवन्ति या:।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं
बीजप्रद: पिता। ।। (गीता अध्याय 14, श्लोक 4)
तदनन्तर उन्होंने तीनों गुणों, सत्,रज और तम को शरीर धारी के शरीर को बांधने वाला कहा है-
सत्वं रजस्तम इति
गुणा:प्रकृतिसम्भवा:।
निबध्नन्ति महाबाहो
देहे देहिनमव्ययम्।।(गीता अध्याय 14, श्लोक 5)

इनमें सत्वगुण यद्यपि निर्मल(शुद्ध स्वच्छ)होने से प्रकाशक है ।अनामय (नीरोगता) प्रदान करने वाला भी है।किन्तु सुख सम्बन्ध से बंधन कारक भी है। साथ ही साथ “मैं ज्ञानी हूँ “ऐसा अभिमान उत्पन्न करके ज्ञान सम्बन्ध के कारण बांधता है।और गुणातीत अवस्था के मार्ग पर जाने नहीं देता –
तत्र सत्वं निर्मलत्वात्
प्रकाशकम् अनामयम् ।
सुखसंगेन बध्नाति
ज्ञानसंगेन चानघ ।।(गीता अध्याय 14, श्लोक 6)

।।हरिश्शरणम्।।

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नशा से नाश

“बद्धो हि को यो विषयानुरागी ”
आचार्य भगवत् पाद शङ्कर ने
विषयवासनाओं में फंसे हुए लोगों को बद्ध कहा है। वासनाएं मनुष्य को आकृष्ट कर, बारम्बार के जन्म-मृत्यु पाश में जकड़े रहती हैं, उससे बाहर निकलने नहीं देती।इन्हीं वासनाओं के भ्रम जाल की सुन्दर, आकर्षक, लेकिन शरीर क्षय करने वाली एक विशेष वस्तु है, नशा।यह केवल और केवल मनुष्य के शरीर, स्वास्थ्य को उत्तरोत्तर खराब ही करती है।हालांकि औषधि रूप में सेवन हो तो कोई बात नहीं किन्तु अनावश्यक यदि सेवन हो रहा है, तो वर्तमान ही भविष्यत् जन्म के लिये भी कष्टाय ही होगी।
एक स्वामी जी ने पद्मपुराण का एक श्लोक उद्धृत करते हुए, नशीली वस्तुओं से दूर रहने का निर्देश दिया था-
विजया कल्पमेकं च दश कल्पं च नागिनी।
मदिरा कल्पसहस्राणि धूमसंख्या न विद्यते ।।
अर्थात्- भांग खाने वाला एक कल्प ,संखिया खाने वाला दश कल्प,शराब पीने वाला हजारों कल्प तथा धूम्रपान करनेवाला कितने कल्पों तक नरक गामी होगा, इसकी संख्या नहीं है।
यदि हमें अपने शरीर को रोग मुक्त रखना है, तो इनके सेवन से बचना होगा, भगवान् सद्बुद्धि दें, और हमारी सहायता करें।
।।हरिश्शरणम्।।
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चतुर्विध यज्ञ

गीताशास्त्र में भगवान् ने चार प्रकार के यज्ञों का वर्णन किया है।चतुर्थ अध्याय का नामकरण ज्ञान-कर्म-सन्यास किया गया है, जिसमें आत्मसंयम रूपी यज्ञ को बताते हुए इसके अन्तर्गत चार यज्ञ वर्णित हैं-
द्रव्य-यज्ञास्तपो यज्ञा:
योगयज्ञा:तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञा: च
यतयः संशितव्रताः।।
अर्थात्-कितने लोग द्रव्य सबन्धी यज्ञ करनेवाले होते हैं।और कितने ही तपस्या रुपीयज्ञ करनेवाले हैं।इसी प्रकार कितने लोग योगरूप यज्ञ करनेवाले और कितने कितने ही अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतों से युक्त संयमी जन स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ करनेवाले होते हैं।
द्रव्ययज्ञ – न्याय से द्रव्य को अहंकार, आसक्ति और स्वार्थ त्याग करके यथायोग्य लोकसेवा में लगाना द्रव्य यज्ञ है।जैसे कि-बुभुक्षित को भोजनादि,अनाथ,रोगी, दुखी, असमर्थ को यथायोग्य अन्न,वस्त्र, जल,औषधि, पुस्तकादि द्वारा सेवा तथा विद्वान्, सदाचारी महात्माओं की गौ,भूमि,ग्रन्थ, वस्त्र आदि से यथाशक्ति सहायता करना।इसी प्रकार अन्य प्राणियों को भी बिना किसी फल की इच्छा किए सुख पहुंचाने के उद्देश्य से सामर्थ्य के अनुसार द्रव्य व्यय करना “द्रव्ययज्ञ” है।
तपोयज्ञ-परमात्मा की प्रति के उद्देश्य से अन्तरिन्द्रियों को पवित्र करने के लिए निष्काम निर्लिप्त भाव से व्रतोपवास,स्वधर्म पालन हेतु कष्ट सहना।मौन व्रत धारण करना।एक या दो वस्त्रों से ही जीवन व्यतीत करना।शरीर निर्वाह हेतु सात्विक भोजन और शास्त्र निर्देशानुसार तितिक्षा सम्बन्धी क्रियाओं का पालन करना, ये सभी तपोयज्ञ हैं।
योगयज्ञ-इस पद का अभिप्राय चित्तवृत्ति निरोधरूप आठों प्रकार के योगों के अनुष्ठान से है।ये आठ योग इस प्रकार हैं-यम,नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
स्वाध्याय ज्ञान यज्ञ-जिन शास्त्रों में भगवान् के तत्व का तथा उनके साकार-निराकार, सगुण-निर्गुण स्वरूप का वर्णन है -ऐसे शास्त्रों का अध्ययन करना।भगवन्नाम जप स्तुति और उनकी लीला-गुणोंका कीर्तन करना।वेद वेदांग का नियम पूर्वक अध्ययन करना स्वाध्याय है।ऐसा स्वाध्याय अर्थ ज्ञान के सहित होने से तथा ममता, आसक्ति और फलेच्छा के अभाव पूर्वक किए जाने से ‘स्वाध्याय यज्ञ” है।
इस प्रकार के यज्ञ कार्य में लगा हुआ साधक निश्चय ही जीवन्मुक्त है।
।।हरिश्शरणम्।।
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त्रिगुणातीत

गीता के चतुर्दश अध्याय मे भगवान् ने चार श्लोकों मे प्रकृति के तीनों गुणों का तात्विक विवेचन किया।इसमें सारतः उन्होंने, स्पष्ट रूप से, आप्तकाम, मुक्तकाम,जीवन्मुक्त अथवा गुणातीत ब्राह्मी स्थिति को परिभाषित किया-
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च
मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि
न निवृत्तानि कांक्षति।।
उदासीनवदासीनो
गुणै:यो न विचाल्यते।
गुणा:वर्तन्त इत्येव
योवतिष्ठति नेंगते।।
समदु:खसुख: स्वस्थ:
समलोष्टाश्मकाञ्चन:।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर:
तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति:।।
मानापमानयोः तुल्य:
तुल्यो मित्रारिपक्षयो:
सर्वारम्भपरित्यागी
गुणातीत:स उच्यते।।

भगवान् बोले-हे अर्जुन!(जो मनुष्य) (सत्वगुण के कार्य रुप)
प्रकाश (ज्ञान)को और (रजोगुण की कार्य रुप) प्रवृत्ति(अर्थात् कर्म करने की स्फुरणा) को
तथा (तमोगुण की कार्यरुप)
मोह-भ्रान्ति को भी न तो प्रवृत्त होने पर(यानी उनके प्राप्त होने पर)बुरा समझता है और न निवृत्त होने पर(अर्थात् उनका अभाव हो जाने पर)(उनकी)कामना करता है।जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ, गुणों के द्वारा चलायमान नहीं होता(और) “गुण ही गुणों में बरतते हैं” ऐसा(समझता हुआ)जो(परमात्मा में एकीभाव से)स्थित रहता है(एवम्)(उस स्थिति से कभी)कम्पित विचलित नहीं होता है।जो निरन्तर आत्मभाव में स्थित हुआ दु:खसुख को समान समझने वाला, मिट्टी-पत्थर-
सोने में समान भाव वाला, प्रिय-अप्रिय को एक जैसा मानने वाला, धैर्यवान् तथा अपनी बुराई-बड़ाई में एक सा रहने वाला है, और जो मान-
अपमान में एक सा है।मित्र-शत्रु
पक्षों के प्रति समान है तथा सभी क्रियाओं में कर्तापने के
अभिमान से रहित है -(मनुष्य)
“गुणातीत” (गुणों से परे या
उनसे अप्रभावित कहा जाता है।
यही गुणातीत ब्राह्मी स्थिति है।

।। हरिश्शरणम् ।।

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योगी भवार्जुन

गीता के षष्ठ अध्याय में भगवान् ने अर्जुन को योगी बनने का निर्देश दिया।योगी की महत्ता समझाते हुए कहते हैं-
तपस्विभ्योधिको योगी
ज्ञानिभ्योपि मतोधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी
तस्माद् योगी भवार्जुन।।
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है।वह शास्त्र ज्ञाताओं से भी बड़ा माना गया है।और सकाम कर्म करने वाले लोगों से भी योगी बढ़कर है।इसलिए हे अर्जुन!
तू योगी बन।
योगी से तात्पर्य ऐसे पुरूष से है, जो कर्म, भक्ति और ज्ञान आदि सभी साधनों की पराकाष्ठा रूप समत्व योग प्राप्त हुआ हो।इसी तरह तपस्वी का मतलब विषयभोगों को त्याग कर मन,इन्द्रिय और शरीर सम्बन्धी सभी कष्टों को सहने वाला साधक।
यहां वस्तुतः ज्ञानी से तात्पर्य शास्त्रझ और कर्मी से तात्पर्य शास्त्र विहित यज्ञ, दानादि शुभ कर्मी,स्वर्गादि सकामी से है।
यह भी ध्यातव्य है कि कर्मी में तपस्वी तथा ज्ञानी का अन्तर्भाव नहीं है।क्योंकि इन तीनों की अपनी अपनी विलक्षणता है।यथा-कर्मी में
क्रिया की प्रधानता है, तपस्वी
में मन और इन्द्रियों के संयम की तथा ज्ञानी में शास्त्रीय बौद्धिक आलोचना की।
इस क्रम में आगे सभी योगियों में श्रद्धालु योगी को सर्वोत्तम की संज्ञा दी गई है-श्रद्धावान् भजते
यो मां स मे युक्ततमो मत:।

।।हरिश्शरणम्।।

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गीता माँ

गीता माँ
“भक्तिरसायनकार”
आचार्य मधुसूदन सरस्वती ,जिन्होंने भक्तसमुदाय का “गीतागूढार्थदीपिका”लिखकर महदुपकार किया था, अपने एक लघु कलेवर ग्रन्थ”गीता-
ध्यानम्” से बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की।आपने अपने इस ध्यानम् में प्रथम पद्य में गीता को माँ कहा है-पार्थाय प्रतिबोधितां,भगवता नारायणेन स्वयं, व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्ये महाभरतम्।अद्वैतामृत-
वर्षिणीं भगवतीमष्टा-
दशाध्यायिनीम् अम्ब त्वाम्
अनुसन्दधामि भगवद्-
गीते भव-द्वेषिणीम्।।
साक्षान्नारायण ने जिसका अर्जुन को उपदेश दिया है, जिसे पुरातन मुनि व्यास ने महाभारत के मध्य गूँथा है, जो अद्वैत ज्ञान रुपी अमृत की वर्षा करनेवाली है, जो दिव्य गुणों से सम्पन्न है, जो अठारह अध्यायों वाली है और जो (जन्म)भव की शत्रु है, ऐसी तुझको, हे माँ !
भगवद्गीते ! मैं सतत ध्यान
करता हूँ।
अस्तु ,इसमें “गीता”के लिए
“अम्ब” का सम्बोधन सार-
गर्भित है।सारे नाते छोड़ कर
गीता को माँ कहना बड़ा अर्थ
छोड़ जाता है। संसार के सभी प्राणियों का व्यवहार, कम या अधिक, छल-कपट,राग-द्वेष
और स्वार्थ प्रेरित होता है, किन्तु माँ का अपनी सन्तान के साथ बर्ताव नि:शेष निरपवाद
रूप से स्नेह ,त्याग, बलिदान, ममता एवं अगाध सहिष्णुता से
परिपूर्ण होता है।सभी व्यक्ति, हमारी दो-चार त्रुटियों के बाद ,जहाँ हमें दण्डित करने लगते हैं, लेकिन माँ, हमारे जघन्य दोषों और नृशंस दुष्कर्मों की अनदेखी कर हमारे सुख स्वास्थ्य के लिए आजीवन कामना करती है।वह औरों को क्षति पहुंचा दे ,स्वयं भी कष्ट उठा ले ,किन्तु अपने बालक पर फूल की चोट भी सहन नहीं करती।माता का हृदय ममता का बना होता है।”पूत कपूत हो,पर माता कुमाता नहीं बन सकती” विषय-विलास-वासना
के विषम पथ पर जन्म-जन्म से भटकते हुए ,अपनी सन्तान को,
कर्म-भक्ति-ज्ञान की संजीवनी से,वह गीता माँ, अवश्य ही
मुक्ति द्वार तक ले जायेगी।

।।हरिश्शरणम्।।

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गीता माँ

गीता माँ
“भक्तिरसायनकार”
आचार्य मधुसूदन सरस्वती ,जिन्होंने भक्तसमुदाय का “गीतागूढार्थदीपिका”लिखकर महदुपकार किया था, अपने एक लघु कलेवर ग्रन्थ”गीता-
ध्यानम्” से बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की।आपने अपने इस ध्यानम् में प्रथम पद्य में गीता को माँ कहा है-पार्थाय प्रतिबोधितां,भगवता नारायणेन स्वयं, व्यासेन ग्रथितां पुराणमुनिना मध्ये महाभरतम्।अद्वैतामृत-
वर्षिणीं भगवतीमष्टा-
दशाध्यायिनीम् अम्ब त्वाम्
अनुसन्दधामि भगवद्-
गीते भव-द्वेषिणीम्।।
साक्षान्नारायण ने जिसका अर्जुन को उपदेश दिया है, जिसे पुरातन मुनि व्यास ने महाभारत के मध्य गूँथा है, जो अद्वैत ज्ञान रुपी अमृत की वर्षा करनेवाली है, जो दिव्य गुणों से सम्पन्न है, जो अठारह अध्यायों वाली है और जो (जन्म)भव की शत्रु है, ऐसी तुझको, हे माँ !
भगवद्गीते ! मैं सतत ध्यान
करता हूँ।
अस्तु ,इसमें “गीता”के लिए
“अम्ब” का सम्बोधन सार-
गर्भित है।सारे नाते छोड़ कर
गीता को माँ कहना बड़ा अर्थ
छोड़ जाता है। संसार के सभी प्राणियों का व्यवहार, कम या अधिक, छल-कपट,राग-द्वेष
और स्वार्थ प्रेरित होता है, किन्तु माँ का अपनी सन्तान के साथ बर्ताव नि:शेष निरपवाद
रूप से स्नेह ,त्याग, बलिदान, ममता एवं अगाध सहिष्णुता से
परिपूर्ण होता है।सभी व्यक्ति, हमारी दो-चार त्रुटियों के बाद ,जहाँ हमें दण्डित करने लगते हैं, लेकिन माँ, हमारे जघन्य दोषों और नृशंस दुष्कर्मों की अनदेखी कर हमारे सुख स्वास्थ्य के लिए आजीवन कामना करती है।वह औरों को क्षति पहुंचा दे ,स्वयं भी कष्ट उठा ले ,किन्तु अपने बालक पर फूल की चोट भी सहन नहीं करती।माता का हृदय ममता का बना होता है।”पूत कपूत हो,पर माता कुमाता नहीं बन सकती” विषय-विलास-वासना
के विषम पथ पर जन्म-जन्म से भटकते हुए ,अपनी सन्तान को,
कर्म-भक्ति-ज्ञान की संजीवनी से,वह गीता माँ, अवश्य ही
मुक्ति द्वार तक ले जायेगी।

।।हरिश्शरणम्।।

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प्रणव (ओम्)

प्र-प्रकृष्ट रूप से या आत्यन्तिक अन्तिम रुप से,
नव -नवीनतम ,जो है, उसे प्रणव कहते हैं। इसे ही ओम् भी,कहकर सर्वादि सिद्ध किया गया है। यह ओम् या प्रणव पवित्र घोष का अभिव्यंजक है।”शब्दो वै ब्रह्म “की अवधारणा मे यह ब्रह्म है।सृष्टि का आद्यक्षर भी।
वर्णों की दृष्टि से इसमें तीन अक्षरों का समावेश है-अ ,उ तथा म ।इन्हीं का सन्धिगत समष्टिगत रुप ओम् है ।निर्गुण निराकार ब्रह्म का प्रतीक होने के साथ साथ यह सगुण ब्रह्म का भी बोधक है।
अकार विष्णु का प्रतिनिधि(अक्षराणामकारोस्मि)
उकार शिव उन्नति परमोन्नति का प्रतिनिधि और मकार ब्रह्मा का बोधक है ,जिसके द्वारा काल गणना होती है। इस तरह त्रिदेवों के तीनों कार्यों-सृजन, पालन और संहार को भी ओम् सूचित करता है।
इस तरह यह नाम रूपात्मक विश्व का बोधक बन जाता है।संसार के सभी पदार्थों की अभिव्यक्ति वर्णों/अक्षरों से होती है।संस्कृत.ही नहीं सभी भाषाओं के सभी वर्णों और ध्वनियों का उच्चारण स्थान या तो मुख का सबसे भीतरी भाग-कण्ठ – है अथवा सबसे बाहरी भाग ओष्ठ, नासिका।
इसतरह विचार करने पर “अ”का उच्चारण स्थान कण्ठतथा “उ”का ओष्ठ माना गया है। “म” भी ओष्ठ और नासिका से उच्चरित होता है।इस प्रकार समूहालम्बनात्मक दृष्टि से ओम् मे बाहरी/भीतरी दोनों ध्वनियों का समावेश है।
दूसरे शब्दों में ओम् मे सभी के समाहित होने से, उसी मे सभी सांसारिक अभिव्यक्त विषयों, पदार्थों की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश की समष्टि दृष्टिगत होती है।
वस्तुतः “ओम्’ और ब्रह्म (सगुण, निर्गुण)एक ही हैं।
।।हरिश्शरणम्।।

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