भक्ति : सुगम मार्ग

देवर्षि नारद ने भक्तिसूत्र मे भक्ति मीमांसा की है-भक्ति ईश्वर के प्रति परम प्रेम स्वरूप है,अमृत स्वरूप है।उसकी प्राप्ति से मनुष्य सिद्ध बनता है और परितृप्त हो जाता है।उसे पाकर मनुष्य और किसी की आकांक्षा नहीं करता, किसी के लिए शोक नहीं करता, किसी के प्रति द्वेष भी नहीं रखता।अन्य विषयों मे आनन्द काअनुभव नहीं करता और किसी सांसारिक विषय में उत्साहित नहीं होता।उसे जानने पर तो मनुष्य मस्त और स्तब्ध हो जाता है ‘आत्माराम’ हो जाता है।
“सा तु अस्मिन् परमप्रेमरूपा ।अमृतरुपा च ।यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति।यत्प्राप्य न किंचिद् वांछति, न शोचति, न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साही भवति।यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति, स्तब्धो भवति, आत्मारामो भवति।”
आगे सावधान भी करते हैं-“भक्ति को किसी वासना (कामना)की पूर्ति का साधन नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि वह भक्ति तो समस्त वासनाओं के निरोध का कारण स्वरूप है।”
“सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात् ।”
इस प्रकार समस्त वासनाओं और कामनाओं का त्याग ही वास्तविक भक्ति का स्वरूप है।और जब भक्ति का उदय होता है, उसके लक्षण क्या हैं, इस पर कहते हैं-
तदर्पिताखिलाचारिता तद्विस्मरणे परमव्याकुलितेति।
अर्थात् जब समस्त चिन्ताएं, इन्द्रियों की क्रियाएँ और समस्त कर्म उन (एकोपास्य) के प्रति अर्पित हो जाते हैं और क्षणमात्र के लिए भी उनकी विस्मृति हृदय में परम व्याकुलता उत्पन्न कर देती है, तब यथार्थ भक्ति का उदय मानना चाहिए।
हमारे स्वामी विवेकानंद ने भी ऐसी ही बात कही-
भक्तिमार्ग स्वाभाविक पथ है और आनन्ददायक भी है।ज्ञान मार्ग एक प्रबल वेगवती पर्वतीय नदी को बलपूर्वक ठेलकर उसके उद्गम स्थान की ओर ले जाने के सदृश है।ज्ञान मार्ग कहता है समुदय प्रवृति का निरोध करो,जबकि भक्तिमार्ग कहता है, स्रोत मे शरीर को बहा दो,चिरकाल के लिए सम्पूर्ण आत्मसमर्पण कर दो ।यह भक्तिमार्ग लम्बा तो है, किन्तु अपेक्षाकृत सरल और सुखकर है।
।।हरिश्शरणम्।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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