जय जय जयना

कस्मादरविन्दमुखाद् अवतीर्णेयं सरस्वती।
पहुनामिथिलापूर्णावासः चोरयते चित्तम्।।

ए पहुना मिथिलै में रहुना।।

पहुना देखो एक रूप से मिथिलै में रहि गयना।
भयौ विवाह जनकतनया तैं ससुरारी कै भयना।।


ससुरारी में रामचन्द्र पहिरत शादी कै गहना।
सिया मिलन से भै अधीर सब धैर्य धार बहि गयना।।

बानी बनी मूक सब समझत कहि न जाइ कछु कयना।
देखत निरखत जनक दुलारी मूँदि गये द्वौ नयना।।

रास रसेश्वरि रसलीला लखि कोटि वारुँ रतिमयना।
शोभा कैसी मनहर देखो सियाराम कै हियना।।


चित्त चुराये भै हरषाये सियाराम कै बयना।
अवध जनक पुर वासी जड़वत् कछू न चाहैं लयना।।


सीताराम मिले दोनो मिलि गणित फेल ह्वै गयना।
एक एक दो एक बने यह गणितहुँ समुझि परयना।।


यह विवाह लीला अनन्त की दिव्य देखु द्वै नयना।
दास विन्ध्येश्वरि मोद भरे नाचत कहि जय जय जयना।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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आत्मप्रकाश


सौभाग्यम् दर्शनीयं किम् अस्याः देव्याः विचार्यताम्।

अस्मद्गुरुजननीयं देहत्यागे विशिष्यते।

नाम्ना व्रजलता सिद्धा रजव्रजे महीयते।।

त्यक्त्वा स्वं पार्थिवं देहं  श्रीमलूकगुरुसन्निधौ।

सिद्धां कोटिं विधास्यन्ती सा गता किम् नु स्वागता।।


एकाशीतिवैक्रमे वर्षे द्विसहस्रसितमाधवमासि पाञ्चभौतिकं त्यक्तं गात्रं द्वादश्यां तिथिरायाते।।

वृन्दाशालग्रामविवाहे सम्पन्ने वृन्दाविपिने।

श्रीधामनि व्रजलता रोपिता व्रजे माधवीसुधायुता।।

क्या देखिये विलसती शोभा देवी देहत्याग करे।

विन्ध्येश्वरि दासहिं  गुरुमाता गई पार्थिवहिं देह परे।।

नाम व्रजलता नित व्रजवासिनि किया दिव्यवैकुण्ठ प्रयाण।

श्रीमलूक पीठहिं त्यागा तन किया प्रसिद्ध स्थान प्रमाण।।

रही वृत्ति आजीवन इनकी नामरूपलीलागुण धाम।

यही कार्य कारण लगता है हुआ धन्य जीवन निष्काम।।

व्रज की लता आय उपजी थी निकट ओरछा राजाराम।

धन्य धन्य धन्यातिधन्य है देखो यह “आचार्य” ग्राम।।

निज स्वरूप भावानुरूप पति पाणिगृहीता “रामस्वरूप”।

मन निरमल अध्यापनजीवन चितप्रविष्ट”श्रीरामस्वरुप”।।

रहा पूर्ण पातिव्रत जीवन वृत्ति लगी पद-सीताराम।

पाण्डे कुल भी धन्य धन्य व्रजलता पता पा मुदित लगा।

ग्राम-निवासी रामकथासी  भक्ति ज्ञान वैराग्य जगा।।

रामकृष्णहरिनारायण पदकमल विमल व्रजलता-कार।

“राजेन्द्रदास” सुत सुन्दर जन, जन-जन का किया दिव्य उपकार।।


ऐसी माता कै चरणन चित ध्यान,धन्य  विन्ध्येश्वरि-दास।

भाग बड़े अनुभवत मोद भरि लेत आत्माराम प्रकाश।।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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राम राम है एक निबेरो

जानकीनाथ सहाय करैं तब राम से राम चहै नर नेरो।
नामहि राम रटै नर प्रतिछन देखि परैं हरि इत उत मेरो।
बनै दसा येहि गुरु किरपा कृत दास बुद्धि मन निश्चय मेरो।मानुष जनम सफलता एहि मैं राम नाम रसना रट तेरो।

यह इतिहास पुरान विदित मुनि वेदव्यास कहि गये चितेरो। वचन अन्यथा होत कबहुँ नहिं यदि विश्वास  राम पर तेरो। जरत करम गत पूर्व कुण्डली राम राम है एक निबेरो।


हरिः शरणम्।
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मन तैं

गोविन्ददेव मन्दिर प्रांगण रस बरसत बरबस पान करो।
अग्रमलूक पीठ गुरू गावत भगतमाल गुण हृदय धरो।।


दो हजार इक्यासी संवत विजयादशमी विजयोत्सव।
अग्रपीठ अध्यक्ष प्रतिष्ठित सद्गुर हमरे कृपा-प्रसव।।


आय विराजे रैवासा महि महिमाधिष्ठित धन्य धरा।
धरती गुंजित वायु सुपुंजित नभमण्डल आकाश परा।।


श्रीभक्तमालमाला पहिरि प्रिया-लाल रस मगन भयो।
नाचत गावत मोद भरत भरि शब्द अर्थ करि नयो-नयो।।


जनम पाय रस,बहत जहाँ ते सो रस रासबिहारि-बिहारिन बिच।
भक्त अनन्द पान रस हरषैं डूबैं होय मार्ग महि किच।।


नाम रूप कौ जगत विसमरत श्रीगुरुकृपा पाय जबहीं।
नामरूप श्रीहरि नारायण रामकृष्ण सुमिरत तबहीं।।


भक्त भगति भगवान् भागवत गुरु गुन गान होन लागत।
कोटि जनम कृत करम कुण्डली जरत जीव जब शरणागत।


विधि निषेध करि अचर आचरन वेदविहित होतै तन तैं।
अन्तः शुद्धि जात तेहि छन छिन गुण अवगुण सब मन तैं।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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ऐसो आनद

श्रीधामवृन्दावन शोभित स्वयं प्रकट प्रतिमा भई।रूपगोसाईंपाद पाय गोविन्ददेव राधा नई।

म्लेच्छ तमस तामिस्र बूझि छाँड़ो वृन्दावन।

मानसिंह कै महल महित जयपुर महि आवन।


जय जय राधे गोविन्द गावत लसत छत्र क्षत्री धरा।

भगत परीपूरन मना जा दरसे नहिं आव धरा।

जा कर  करि दरसन सुखद परम शान्ति कौ मूल।

पुण्य पाप नहिं रहे जाय आमूल चूल।

होय अनन्द अनन्त पाय गोविंद राधे पद।

फीको परै जाय मोच्छ मुद पावै ऐसौ आनद।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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महागौरीति चाष्टमम्



नवद्वारे मध्ये कृतनियतनिष्ठां सुनियताम्।

रमन्तीं वसुसंख्यां सुललितशृङ्गारसुभगाम्।।

महागौरीं देवीं द्युतियुतदिवाकरनिभाम्।

भजन्ते सानन्दं भजनरसिकाः भुवि नराः।।


हरिः शरणम्।
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रामनाम जो खायँ

राम मरैं तो हम मरैं नाहिं त मरै बलाय अबिनासी का बालका मरै न मारा जाय।
  — महात्मा कबीर।

करम भोग है जनम का भोगत भोगत जाय।

काल प्रवाह अनादि है ईश्वर इहै कहाय।।

हम शाश्वत शाश्वत गुरू हरिगुरुसन्त बताय।

काल गुरू कर्ता गुरू शून्य समुझि परि जाय।।

विन्ध्येश्वरि कै दास मुख बानी यहि निकसाय।

राम नाम श्रुति मुखन बिच राजत स्वान्तसुखाय।।


        
राम नाम हर श्वाँस में आवै निकसै भाय।

गुरु किरपा सब होत है रहै अनन्तै जाय।।

रहै अनन्तै जाय रामजन सांचो दास  कहाय।

दास कहाय तरै भवसागर निरमल होत सुभाय।।


राम नाम सौं नमत जो रहि सब ताहि  नवाय।

रहि सब ताहि नवाय कौन तेहि अस्थिर करिहै।।

तब चल मन नम रमो राम ढिंग रहै अनन्दै ठायँ।

रहै अनन्दै ठायँ सोइ मधु राम नाम जो खायँ।।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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इन्द्रपूजा विरोध या सुधार

पुण्यपुराकृत कर्म भोगवश इन्द्र पदवी किन्ही निष्कामी प्रेमी भक्तों के लिए हेय और तुच्छ है।”इन्द्र” इन्द्रियभोगी देशकाल बाधित व्यक्तित्व है।
जबकि गोपीजन अबाधित आनन्द सत्ता में विहार करने वाली तात्विक प्रेमाभक्ति होने से देशकालातीत तत्व।”सदृश श्वान मघवान युवानू” (सन्तप्रवर तुलसीदास)
अर्थात्-
इन्द्र-युवक और कुत्ता समान भोगभोगी लोलुप इन्द्रियोन्मुखी तत्व होने से विमुख जीव कोटि में हैं।जबकि गोपियाँ सन्मुख जीव।गोपियाँ वेद की ऋचाएं हैं, इसलिए की भगवान् ऐसे ही निष्कामी प्रेमियों के साथ मानव रूप धर कर श्वास-प्रश्वास पूर्वक क्रीडारत होते हैं।

और ऋचाएं गोपिकाएँ इसलिये भी हैं कि, तस्य निःश्वसिताः वेदाः है। भगवान् की निर्गत श्वास वायु सृष्टिरचना हेतु निर्दिष्ट ब्रह्मा जी के कानों में पड़कर मुखनिःसृत होकर वेद मन्त्र हो गई हैं। यह गोपिकाएं भगवान् के लिए भगवान् को चाहती हैं।
अनन्याः चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते के स्वरूप में यह गोपिकाएं भगवान् की अनन्य प्रेमी भक्ता हैं।यह भगवान् की चरम परम प्रेम का जीवन्त रूप हैं। ऋचा और गोपी दोनों स्त्री हैं।और पुरुष तो एकमात्र पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ही हैं। भक्तों के साथ लीला ललाम लीनता भगवान् की ही होती है,किसी भोगी विषयी पामर जीव के साथ नहीं। इन्द्र भोग का प्रतीक है तो गोपीजन परमचरम प्रेमयोग की।
श्वासरूप हैं गोपियाँ भगवान् की। इसलिये कि भक्त और भगवान् का सम्बन्ध अभिन्न है। भगवान् का अप्राकृत दिव्य देह विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन मनुज अवतार होने के साथ भक्तों के साथ क्रीडा प्रयोजन अपेक्षित प्रेक्षित है।
इसलिए वानर भालु ऋषि और ऋचाओं का गोप-गोपी रूप धर कर नित्य के साथ नित्य की लीला है।
क्योंकि नित्य, अनित्य के विजातीय होने से कैसे खेल सकता है।
इसलिये सृष्टि के आरम्भ में उपजी, नित्य ऋचाओं का गोपी भाव आश्चर्य जनक नहीं है। “गो” शब्द इन्द्रिय वाचक है।”प” शब्द पालन रक्षण के लिए प्रयोग होता है।इसलिए, इन्द्रिय रुप गो का पालन रक्षण इन्ही भगवान् द्वारा होना स्वाभाविक है।
सम्पूर्ण भागवतविमर्श का सारत्व भगवान् के लीलावतार द्वारा मानव शिक्षा का प्रायोगिक निदर्शन है।भक्त-भगवान् की लीला का अद्भुत स्वरूप  भागवत में दीखता है, क्योंकि अन्ततः चाहे मरण धर्मा ब्रह्मा हों या तद्वत् रूप विनाशी इन्द्र ,सभी एक अद्वितीय भगवान् की ही स्तुति करते हैं।इन्द वैदिक देवता होने पर भी प्रचण्ड मायावी दुर्धर्ष रावण की सभा में “इन्द्रं माल्यकरम्” (हनुमन्नाटक)
माली का काम करते दीखते हैं।भगवान् अंगी हैं और इन्द्र अंगरूप हैं। इसलिए अंगीरूप श्रीकृष्ण भगवान् की पूजा होनी चाहिये, अंगरूप इन्द्र की नहीं,इसी अव्यवस्था को मेटने हटाने की लीला है  इन्द्रपूजा के स्थान पर गोवर्धनपूजा की परम्परा की अवतारणा। ऐसी पौराणिक घटना को सज्जन प्रेमी वृन्दजनों को वेद और लोक के सामंजस्यरूप में अवश्य  देखना चाहिए किसी विरोध में नहीं।
किसी लोकादि कीर्ति की वासना कामना से प्रेरित होकर काम करने पर तो  एक मानवजीवन और व्यर्थ हो जायेगा।
वेद की विद्वान् वाली अवधारणा जो अभेद तत्वदर्शनवती है, उसी को विद्वान् की परिधि में रखना चाहिए,न कि कीर्तिकामी प्रचारपरायण व्यक्ति के लिए।वेद कहते हैं-“विद्वान् न विभेति कदाचन”

संसार प्रवाह और कामना वासना तो संसार में बार बार उलझायेगी।इसलिए   भगवान् आदि शङ्कर के अनुकूल सन्तवेदशास्त्र सिद्धान्त आचरण ही निष्कामी सद्गुरु पादाश्रय देगा, जिससे पुराणों और व्यासवाणी का यथार्थ जानकर मानव जीवन सफल हो सकता है अन्यथा भगवान् के साथ अनन्यता की अबोधदशा में “माया” चढ़ बैठेगी,यथार्थ ज्ञान नहीं होगा और ऐसे ही पौराणिक वर्णनों में विरोध अवरोध की दृष्टि बनी रहेगी। इसलिये विनय और प्रेम का आश्रय लेकर रामहिं भजहिं ते चतुर नर
का अनुप्रयोग सारी जड़ता से मुक्ति का एकमेव उपाय है।इन्द्रपूजा को परम्परा सुधार की प्रेमदृष्टि से देखना चाहिए, न कि वेद शास्त्र लोक विरोध दृष्टि से।


हरिः शरणम्।
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अद्भुत आनन्द


कैसी कमनीय रहनि कै सहनि
दर्शनीय दीखै चलनि बोलनि।    
रसमग्न होति भगवदीयकरनि
जया एकादशि तिथि निरखि।

देहपार्थिवतः निश्वासनिःसरनि
श्रीरामकृष्णलीला प्रविशनि।
विक्रम संवत् दोहजार गवनि 
इक्यासी चलनि शुक्रवासरनि।

भाद्रकृष्णा वैष्णव एकादशिनि
तिथि नित्यलीला-ललाम-लीनि।
रैवासाधाम अग्रपीठाधीश्वरनि
नामतः प्रसिद्ध श्रीराघवाचार्यनि।

नमत्यनेकधा जनः तच्चरणनि
पिण्ड त्यागि ब्रह्माण्डसंचरनि। 
दिव्य-देव-लोक-धाम-धामनि
अति-विराट-राज्यश्री-प्रसरनि।

अग्रपीठ श्रीमहान्तपदरिक्त भवनि
तदीयपदधारण हित निरधरनि।
श्री-मलूक-पीठ अधि ईश्वरनि
परमोदार-साधु-शिरोमणनि।

“दास विन्ध्येश्वरी”नत मन मननि
लखि लीला सिद्धसाधुभूषणनि।
सानँद लखत सबै सभ्यसन्तनि
राघव-राजेन्द्र-रमणीय-करनि।

विद्यमान अग्रपीठ अस्मद् गुरुनि
साधु-सदाचार-मूर्त-विग्रहनि।
मोदमान “दास” दिव्य दर्शननि
अद्भुत आनन्द रसमग्न रसनि।

हरिः शरणम्
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श्रीनन्दनन्दनस्तोत्रम्

बालं नवीनशतपत्रविशालनेत्रं बिम्बाधरं सजलमेघरुचिं मनोज्ञं
मन्दस्मितं मधुरसुन्दरमन्दयानं श्रीनन्दनन्दनमहं मनसा नमामि ॥१॥

मञ्जीरनूपुररणन्नवरत्नकाञ्ची-श्रीहार केसरिनखप्रतियन्त्र-संघम्।
दृष्ट्यार्तिहारिमषिबिन्दुविराजमानं, वन्दे कलिन्दतनुजा-तटबाल-केलिम् ॥२॥

पुर्णेन्दुसुन्दरमुखोपरि-कुञ्चिताग्रा: केशा: नवीनघननीलनिभा: स्फुरन्ति।
राजन्त आनतशिर:कुमुदस्य यस्य नन्दात्मजाय सबलाय नमो नमस्ते ॥३॥

श्रीनन्दनन्दनस्तोत्रं प्रातरुत्थाय य: पठेत् ।
तस्य नेत्रगोचरं याति सानन्दं नन्दनन्दन:॥४॥