राम नाम सर्वस्वम्

सन्त शिरोमणि तुलसीदास की हरिभक्ति का दर्शन दास्यभाव में ” मानस ” सहित उनकी सम्पूर्ण रचनाओं में मूर्तिमंत विराजित है, किन्तु दोहावली के स्फुट दोहों में दृश्यमान रामनामानुराग भी साधकों को जीवन्मुक्त करने में सर्वथा समर्थ है। जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना,
श्रवन रंध्र अहि भवन समाना का समर्थक दोहा द्रष्टव्य है-

रसना सापिन बदन बिल,जे न जपहिं हरिनाम।
तुलसी प्रेम न राम सों, नाहिं विधाता बाम ||

तात्पर्य यह कि ऐसे लोगों की जिह्वा सर्पिणी और मुख बिल के समान है जो हरिनाम नहीं जपतेऔर जिन्हें श्रीरामनाम से प्रेम नहीं हो उनका क्या भला होगा?
कदापि नहीं।उनके लिए तो ब्रह्मा भी वाम(प्रतिकूल) हो जाते हैं अर्थात् उनका बड़ा दुर्भाग्य है।

चित्रकूट सब दिन बसत,प्रभु सिय लखन समेत।
रामनाम जप जापकहिं,तुलसी अभिमत देत ।। दोहावली- 04 ।

वे भगवान् श्रीराम , चित्रकूट पर्वत पर श्रीजानकी जी तथा लक्ष्मण जी के साथ नित्य निवास करते हैं।वहाँ रहते हुए सभी नाम जापकों को अभीष्ट सिद्धि भी हो जाती है।इसमें यह भी संकेत है कि इस कराल कलिकाल में स्वामी जी को वहीं भगवान् का दर्शन लाभ हुआ था। एक दूसरे भाव के अनुसार जिन्हें अपने चित्त रुपी मकान में सदा अन्तर्यामी रूप से विद्यमान प्रभु श्रीराम, सीता रूपिणी बुद्धि और अहंकार रूपी श्रीलक्ष्मण जी का दर्शन होता है, उनकी अभिलाषपूर्ति तो स्वत:सिद्ध है।

एक छत्र इक मुकुट मनि,सब बरनन पर जोउ।तुलसी रघुवर नाम के, बरन विराजत दोउ।। दोहावली -09 ।

राम नाम के दोनों अक्षर सभी वर्णों के ऊपर होकर विराजते हैं। “र”अक्षर सभी वर्णों पर शुद्ध व्यंजन रूप में रेफ बनकर छत्र की तरह तथा “म” अक्षर अनुस्वार होकर मणिवत् विराजता है।इसलिए सम्पूर्ण वार्ता को शोभित करने के लिये रामनाम अवश्यंभावी है-श्वांस श्वांस में राम कहु श्वांस वृथा जनि होय,श्वांस बिचारी पाहुना आवन होय न होय ।
दूसरे भाव में यदि वर्ण शब्द से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्णों का बोध करें तो पहला वर्ण “र” छत्र रूप से सर्वरक्षक तथा” म” मणि रूप में समस्त सुखों का मूल मान्य होगा- असन बसन पशु वस्तु विविध विधि सब मणि मंह रह जैसे।इस प्रकार रामनाम के सब वर्णों के ऊपर रहने का अभिप्राय है कि इस पर सभी वर्णों का समान अधिकार है।

अतः- तुलसी प्रीति प्रतीति सों ,रामनाम जपु जाग।किये होय विधि दाहिनो, देइ अभागेहि भाग।। दोहावली-36

प्रेम और विश्वास पूर्वक रामनाम जपने से प्रतिकूल विधि या दैव अनुकूल(दाहिनो) हो जाता है और अभागे का भाग्य खुल जाता है।मानस में इसकी पुष्टि करते हुए-

मन्त्र महामनि विषय व्याल के।
मेटत कठिन कुअंक भाल के।।
तथा-
नाम जीह जपि जागहिं जोगी।
विरति विरंचि प्रपंच वियोगी।।

इसी का पोषण करते हैं।

मंगल भवन अमंगलकारी उमा सहित जेहि जपत पुरारी, की मानस अभिव्यक्ति का सुन्दर उदाहरण अध्यात्म रामायण में भी दीखता है, जहाँ शिवाशिव राम नाम को जपते हैं और मुक्ति कामियों को नामोपदेश
करते हुए निवास करते हैं-

अहं भवन् नाम गृणन् कृतार्थ:
वसामि काश्याम् अनिशं भवान्या।
मुमूर्षमाणस्य विमुक्तयेहं
दिशामि मन्त्रं तव राम नाम।।

इसीलिए दोहावली के सत्ताइसवें दोहे में नाम को कल्पवृक्ष बताया गया है।यह सारे सुमंगल की कंदली अर्थात् बीजवत् है जिसके विना किसी सुखद वृक्ष की कल्पना सम्भव नहीं।इस रामनाम के स्मरण मात्र से सारी सिद्धियाँ करतल गत होकर राजती हैं और पग -पग पर परम आनन्द की अनुभूति होती रहती है।

राम नाम कलि कल्पतरु, सकल सुमंगल कन्द।
सुमिरत करतल सिद्धि सब, पग पग परमानन्द ।।

।।हरिश्शरणम्।।

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सभी भगवत् स्वरूप अभिन्न हैं

कामना भेद से ,विभिन्न इच्छाओं की पूर्णता के लिये सनातन धर्म की उपासना
पद्धति में अनेक देवी-देव मूर्तियाँ(स्वरूप)
हो सकते हैं, किन्तु कामनाओं के पार
निष्काम और मात्र प्रेमी-प्रेमास्पद ,
भक्त-भगवद् भाव में तो सभी भगवत्
तत्वों (स्वरूपों) में अभेद ही है।
भेदवादी अनुरक्त भक्त जन तो भगवती और भगवान् में भी भेद ही करते हैं ।यह भेदभाव उनकी अनुरक्ति का फल है अथवा अहंकार का यह वही जानें।लेकिन मेरी अपनी अन्तर्जगत् की यात्रा का दृष्टिकोण ये है कि कभी न कभी यदि अनुरागवश ऐसी भेददृष्टि है ,तो शीघ्र ही माँ उन्हें अभेद गति(ज्ञान)अवश्य ही देंगी।
लेकिन यदि अहं वशात् होगा तो जन्म
जन्मांतर में लम्बे अन्तराल के बाद भेददृष्टि समाप्त होगी।
त्रिदेवोपासना के क्रम में सृजन पालन और संहार हेतु तीन देवों और
देवियों की उपासना भक्त जगत् में प्रसिद्ध
ही है। किन्तु इनकी समूहालम्बनात्मक सृष्टि में ईश्वर का केवल दो ही स्वरूप एक
मातृरूप और दूसरा पितृरूप ही ठहरता है।
संस्कृत के सुकुमार महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध महाकाव्य रघुवंश में भगवान् शिव और पार्वती के एकत्व रूप की स्थापना कर दी है, जिसमें वह इन्हें जगत् के पिता-माता मानते हैं।साथ ही वे यह भी कहते हैं कि ये जगन्माता और पिता शब्द और अर्थ की तरह परस्पर सम्पृक्त हैं-
वागर्थौ इव सम्पृक्तौ,
वागर्थप्रतिपत्तये।
जगत: पितरौ वन्दे,
पार्वतीपरमेश्वरौ।।

यही अन्तर्दृष्टि समेटे मानसकार ने
गिरा-अरथ जलबीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न की अवतारणा कर दी है।इस मान्यता में भी शब्दार्थ को सीताराम माना गया है।किन्तु विशेषता यह है कि ये दोनों जल और जल की लहर मात्र हैं ,जिनका
अभेद तो अन्धा भी जानता है।
अर्थ: शम्भु: शिवा वाणी ।माता शिवा
शब्द हैं तो पिता शिव अर्थ।ऐसा वचन
लिंग पुराण का है।शिव में भी उसका इकार मातृ तत्व है तो शकार शम् यानी कि मंगल।वकार से समूल ब्रहाण्ड में उसकी व्याप्ति प्रतीत होती है।और कुल मिलाकर ऐसी शिव मान्यता में शिवाशिवयो: अभेद:
अर्थात् शिव ही शिवा हैं और शिवा ही शिव।
उपरि उक्त व्याख्यान में शिव को अर्थ और शिवा को शब्द तत्व कहा है।विचारें तो बात यह है कि किसी अर्थ को लेकर सृजित शब्द जैसे कि” कमल ” कमल को ही बताता है , किन्तु शब्द अपना शब्दत्व खोकर श्रोता बोद्धा को अर्थ के रूप में ही अवभासित होता है।
यदि अर्थ से भिन्न शब्द होगा तब वह उस कथ्य अर्थ की प्रतीति नहीं करा सकता।
वस्तुतः अर्थ अदृश्य है तो शब्द दृश्य।
शब्द का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता किन्तु अर्थ की आत्मिक अनुभूति मात्र।अतः यदि शब्द शरीर है, तब अर्थ उसकी आत्मा।
और लिपिगत होने पर ही शब्द दिखाई भी देता है, यदि यह शब्द लिपियों में न होकर केवल मात्र उच्चरित होता रहे तो यह भी अदृश्य ही रहेगा नेत्रेन्द्रिय द्वारा।और केवल और केवल आत्मा में ही अर्थ रूप में ही ग्राह्य होगा।
बद्धाकाश यानी कि शरीर के मुखेन्द्रिय द्वारा चला हुआ शब्द, मुक्ताकाश में चलते हुए पुनः बद्धाकाश श्रवणेन्द्रिय द्वारा अनन्त आत्माकाश द्वारा धारित और अनुभूत होता है। किन्तु यह तथ्य है कि अर्थ और शब्द अभिन्न ही हैं।
नाद, ध्वनि और शब्द की ओंकार से चली यह अनन्त महायात्रा निरन्तर अनुभूयमान है परमात्मा से आत्मा और आत्मा से परमात्मा की ओर ।कोई ओर छोर भी पता नहीं ,पता है तो केवल इस शब्दार्थ रूपी माता और पिता की और उनके अभेद रूप की।
जगद् व्यवहार में पिता-माता से उत्पन्न मूर्ति भी उससे अभिन्न ही होती है। और उत्पन्न सन्तानादि मूर्ति का सतत क्रम जागतिक परम्परा को अक्षुण्ण रखती है।
सामासिक रूप में शब्द रूप माँ और अर्थ रूप पिता के विना किसी कल्पना, भावना या ” भाव ” रूपी मूर्ति का सृजन एकदम असम्भव है। एकत्व से जन्मी यह भावमयी मूर्ति परमात्म तत्व या (महामाये
विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषी) परात्परा माँ
वस्तुतः एक और सर्वथा एक है। भाव की ऐसी शब्दार्थ धारा सर्वोच्च की सर्वोच्च साधना की सर्वोच्चता है।
न काष्ठे विद्यते देव:,
न पाषाणे न हिरण्मये।
भावे हि विद्यते देव:,
तस्माद् भावावलम्बनम्।।
और
भावेन लभते सर्वं,
भावेन देवदर्शनम्।
भावेन परमं ज्ञानं,
तस्माद् भावावलम्बनम्।।

इत्यादि रुद्रयामल तन्त्रोक्त वचनों का भाव साररूप में स्वीकारते हुए तथा वाह्यपूजाधमाधमा पर सम्यक् विधि निषेध
पालन का पारावार पार कर जाने वाले साधकों के लिए तो आत्म परमात्म तत्व अभिन्न रूप से एक ही है, चाहे वह मातृ शक्ति हो या पितृशक्ति ।
राम कृष्ण तू सीता व्रजरानी राधा इत्यादि वचनों का मर्म भी यही है।
अन्त में उस अनन्त सत्ता को
सर्वरुपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत् तथा
सियाराम मय सब जग जानी करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी ,नित्य सिद्ध स्वीकारते हुए सभी भगवद् भक्तों अभक्तों भी को प्रणाम निवेदित करते हुए वाणी लेती है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/12/31/सभी-भगवत्-स्वरूप-अभिन्न-ह/

विवेक से विरक्ति तक

कहत कठिन समझत कठिन
साधन कठिन विवेक ।
होइ घुनाक्षर न्याय ज्यों
पुनि प्रत्यूह अनेक ।।

गोस्वामी जी इस दोहे के द्वारा विवेक प्राप्ति की कठिनता की ओर संकेत करते हैं। सत्यासत्य का विचार ही विवेक है।
” ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या ” इसका दृढ विश्वास और अनुभव कि चराचर दृश्य जगत् स्वप्नवत् मिथ्या है।यह अव्यक्त उपासना के भाव से ही सिद्ध होता है।
वस्तुतः भक्तिभाव से ब्रह्मा शिव नारद सनकादि से निरन्तर सेव्यमान करुणानिधान भगवान साकेत लोकवासी
साकार निराकार पदवाच्य पूर्णकाम तारक- मन्त्र नाम श्री सीताराम जी को जानना ही विवेक है।
विवेक कहने में बहुत कठिन है।इस स्थूल जगत् में जिसमें कि चराचर मोहित है, मिथ्या कह कर समझा देना सरल कार्य नहीं है।और उसका समझना भी अत्यंत कठिन है। तब साधन की कठिनता का कहना ही क्या है।विरला ही पुरुष इसे पाता है। जैसे करोड़ों घुनों में कोई ही भाग्यशाली घुन होता है, जो लकड़ी को काटता हुआ ” राम ” नाम लिख कर मुक्ति पा जाता है ।
घुन लकड़ी के भीतर काट-काट कर भाँति-भाँति की चित्र विचित्र रचना करता है।यदि कभी ऐसा करते-करते उसके द्वारा
लकड़ी में रामनाम लिख जाता है तो वह
घुन सदा के लिये सांसारिक झंझटों से मुक्ति पा जाता है। यही घुणाक्षर न्याय है।
मनुष्य की दशा भी ऐसी ही है।
कोई -कोई विरले मनुष्य होते हैं ,जिन्हें
सन्त-भगवन्त कृपा से रामनाम अवलम्ब मिल जाता है, जिससे वह ब्रह्मज्ञान को पाकर नित्य मुक्त सिद्ध हो पाता है।
जगदम्बा पार्वती ने यह बात शिव के समक्ष रखी थी-

नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी।
कोउ एक होइ धरम व्रत धारी।।
धरमशील कोटिक महँ कोई।
विषय विमुख विरागरत होई।।
कोटि विरक्त मध्य श्रुति कहहीं।
सम्यक् ज्ञान सकृत कोइ लहहीं।।
ज्ञानवन्त कोटिक महँ कोई।
जीवन मुक्त सकृत जग होई।।
तिन सहस्र महँ सब सुख खानी।
दुर्लभ ब्रह्मलीन विज्ञानी ।।

इसलिये भगवत् शरणागति ही माया मुक्ति का एकमेव उपाय जानकर रामनमाश्रयी हो जाये-

सुर नर मुनि कोउ नाहिं ,
जेहि न मोह माया प्रबल
अस विचारि मन माहिं ,
भजिय सदा सीतारमन।।

।।हरिश्शरणम्।।

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भक्ति, सत्संग और सन्त

भक्ति ,सत्संग और सन्त शब्दों का अर्थ
क्रमशः सेवा, सत्य की संगति और सन्त महात्मा के रूप में ग्रहण किया जाता है।
किन्तु भक्ति को यदि भंग होने में ग्रहण करें तो उसका अर्थ होगा, शरीर संसार के मोह का भंग हो जाना।
और जब शरीर संसार से मोहभंग होगा तब सत् अर्थात् निरन्तर साथ रहने वाले
(परमात्मा) का संग स्वतः अनुभूयमान होने लगेगा।और भक्ति ,प्रीति और सेवा
परक होकर आत्मक्रीड आत्माराम बन कर सर्वानंद हो जाती है।
इसी तरह सन्त: पद संस्कृत भाषा में
” सत् ” (सत्य) शब्द का बहुवचन है।
और हिन्दी भाषा में सन्त रूप में व्यव-
हृत होता है, जिसका लोक सिद्ध अर्थ सरल साधु आदि ग्राह्य है। किन्तु मूल में जाने पर सत् को सतत या निरन्तर अर्थ में लेने पर ,निरन्तर सदा एक रूप रहनेवाला परमात्मा ही सिद्धार्थ निश्चित है।
कुल मिलाकर सभी एकार्थक निर्णीत हो जाते हैं।
वैसे भक्ति का पौराणिक नव स्वरूप भगवान् के गुणों का श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन,अर्चन ,वन्दन,दास्य और आत्मनिवेदन कहा गया है।
इनमें भगवन्नाम का संकीर्तन करने पर स्मरण तथा श्रवण भक्ति स्वत: बन पड़ती है।यह नाम कीर्तन कलिकाल में भव रोग का भेषज और तापत्रय हरने वाला है-

जासु नाम भव भेषज, हरन घोर त्रय शूल।
सो कृपालु मोहि तो पर सदा रहहु अनुकूल

भगवान् श्रीरामने श्रमणा शबरी को उपदेश करते समय नवधा भक्ति बखानी है-

इसमें सन्तों का संग, भगवत्कथा में रति,गुरु पदपंकज सेवा, हरि गुन गायन,
हरिनाम जप, इन्द्रिय निग्रह पूर्वक हरि स्मरण, प्रभुमय जगद्-दर्शन, परम सन्तोष पूर्वक परदोष अदर्शन, हरिविश्वास के कारण हर्ष-विषाद से दूरी को भक्ति का अलग-अलग सोपान बताया गया है।

सन्तों का संग सत्संग या भगवद्भक्त का संग प्राथमिक भक्ति है- प्रथम भगति सन्तन कर संगा ।और भगवान् की कथा को सुनने की वस्तुतः योग्यता ऐसे ही लोगों की है, जिन्हें सन्तसंग सोहता हो-

रामकथा के ते अधिकारी।
जिन्हके सतसंगति अति प्यारी।।
भगवान् शिव ने रामकथा को कलिमलमथनं स्वीकारा है और मन की मलिनता दूर करने का उपाय कहा है-

रामकथा गिरिजा मै बरनी।
कलिमल समनि मनोमल हरनी।।

सन्त महात्माओं ने गुरुभगवान् में ऐक्य स्वीकारते हुए गुरू पद पंकज सेवा को भक्ति माना ,जिसमें सेवक जीव की मुक्ति इसी भावना के अधीन है-

सेवक सेव्य भाव बिन
भव न तरिअ उरगारि।
भजहु राम पद पंकज
यह सिद्धांत बिचारि।।

इसी तरह एक भक्ति जो सर्वोच्च स्थान प्राप्त है,वह हरिनाम कीर्तन ही है और हो भी क्यों नहीं इस रसना(जिह्वा) की सार्थकता हरिभजन में जो है-

क्षणभंगुर जीवन की कलिका
कल प्रात को जाने खिली न खिली।
मलयाचल की शुचि शीतल मन्द
सुगन्ध समीर चली न चली।
कलि काल कुठार लिए फिरता
तन नम्र है चोट झिली न झिली।
भज ले हरिनाम अरी रसना
यह अन्त समय में हिली न हिली।

यह हरिनाम स्मरण भक्ति सत्संग प्रियता भी गुरुभगवान् की साक्षात् कृपा का ही परिणाम है ,किसी को भी रंच मात्र अहंकार नहीं करना चाहिए।और जिन्हें श्रीरामचरणों में रति हुई उनका काम मद क्रोधादि गल जाता है, वे सियाराम मय सब जग जानी हो जाते हैं, किसी से कोई विरोध भी नहीं करते-

उमा जे रामचरन रत
विगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत
केहि सन करहिं विरोध।।

भगवदुक्त सातवीं भक्ति में यही भाव भी है ,जिसमें भक्त को यत्र तत्र सर्वत्र अपने प्राणप्रिय भगवान ही दीखते हैं।
लेकिन भगवान अपने श्रीमुख से एक विशेष बात इस प्रसंग में कह जाते हैं वह ये है कि सन्त उनसे भी श्रेष्ठ हैं-

सातवँ सम मोहि मय जग देखा।
मो ते सन्त अधिकतर लेखा ।।

यह भाव भगवान् का वैसा ही प्रतीत होता है, जब भागवत्-पुराण प्रसंग में दुर्वासा से यहाँ तक कह देते हैं कि वे निरपेक्ष,शान्त,
निर्वैर,और समदर्शिता प्राप्त भक्तों के पीछ-पीछे चलते हैं, जिससे किसी तरह उन भक्त महात्माओं की चरण धूलि उन पर पड़े और वे पवित्र हो जायें।मतलब कि सन्त महात्मा उनसे बढ़कर हैं-

निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनूव्रजामि अहं नित्यं पूययेत्यंघ्रिरेणुभि:।।

सुखसन्तोष और जीवन में आनुकूल्य तभी प्राप्त है जब सत्संग सन्तसंग और सत्यस्वरूप भगवान् में रति हो जाये-

सत्संगति दुर्लभ संसारा।
निमिष दण्ड भरि एकौ बारा।।
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं।
सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं।।
राम भगति मनि उर बस जाके।
दुख लवलेश न सपनेहुँ ताके।।

यही बात अन्यत्र स्वीकारते हुए सन्त शिरोमणि स्वामी तुलसीदास जी भक्ति को अनुपम सुख का मूल और सम्पूर्ण गुणों का आकर मानते हैं, जिसे बिना सत्संग के प्राप्त करना असंभव है-

भगति तात अनुपम सुखमूला।
मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।
भक्ति स्वतंत्र सकल गुश खानी।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।।

अत: भक्त की प्रार्थना भगवान् से दैन्य ,दास्यभाव की प्राप्ति में पूर्ण होती है, क्योंकि ही दैन्य भाव के आचार्य एकमात्र भगवान् ही हैं और इस भाव से ही भवसिन्धु पार गमन संभव है- नाम लेत भव सिन्धु सुखाहीं। सुजन विचार करौं मन माहीं।
अन्त में मानसकार की दैन्य भक्ति से वाणी विराम लेती है ,भगवान् भक्ति का सातत्य बनाये रखें-

मो सम दीन न दीन हित ,
तुम्ह समान रघुवीर ।
अस विचारि रघुवंश मनि,
हरहु विषम भव- पीर।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/12/20/भक्ति-सत्संग-और-सन्त/

उपासक-उपास्य-उपासना

उपासक कौन है? जीवात्मा।
उपास्य कौन ? परमात्मा ।
उपासना क्या है? शरीर-संसार।
मतलब कि इस मनुष्य जीवात्मा का मनुष्यत्व इसमें है कि वह अपने उपास्य भगवान् की पूजा उसे प्राप्त शरीर-संसार के द्वारा करे।
शरीर के श्रवणेन्द्रिय से हरिकथा का श्रवण, त्वगिन्द्रिय से भगवत्-भागवत् मूर्तियों का स्पर्श, नेत्रेन्द्रिय से भगवद् रूपों का दर्शन, रसनेन्द्रिय(जिह्वा) द्वारा भगवन्
नाम कीर्तन का आस्वादन, और नासिका द्वारा समस्त सुगन्धित द्रव्यों में भगवद् गन्ध का आघ्राण ही इस मानव शरीर का अन्यतम ध्येय होना चाहिए। इस शरीर को संसार के विषयों के भोग में प्रयोग नहीं करना चाहिए।तात्पर्य ये कि संसार के समस्त शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादिकों को अपने अनन्य भगवान् में नियोजित करना चाहिए।
यह शरीर-संसार सब भगवत् प्रदत्त है, और हमेशा नित्य अपना भी नहीं है ,बल्कि यह कब किसका हुआ है कोई हमें बता दे? यह अस्थिर क्षणभंगुर अस्थाई नाशवान् और पराया है।
अतः शरीर संसार से प्रेम करने का मतलब है अनित्य से प्रेम करना जो हमारा न कभी रहा है और न कभी होगा अमृतवत् प्रतीयमान यह शरीर और संसार तो वस्तुतः विषतुल्य है जिसमें व्यर्थ ही कामिनी-कांचन में आसक्त हो हम मानव जीवन को औने-पौने में गवाँ देते हैं।

मन पछितैहैं अवसर बीते हरि पद भजु,
करम ,बचन अरु ही ते।सहसबाहु ,दसबदन आदि नृप बचे न काल बली ते।
हम हम करि धन धाम सँवारे, अन्त चले उठि रीते।
सुत बनितादि जानि स्वारथ रत ,न करु नेह सब ही ते।
अन्तहु तोहिं तजेगें पामर! तू न तजै अब ही ते ।
अब नाथहिं अनुरागु जागु जड़ ,त्यागु दुरासा जी ते।
बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ बिषय भोग बहु घी ते।

इत्यादि बातें अपनी विनयपाती में भक्त ने कही हो या ” नर तन पाइ विषय मन देहीं।
पलटि सुधा ते शठ विष लेहीं।उनके मानस में आया हो ,सभी तो संसार की असारता को पुष्टि ही करते हैं।
मलूकपीठाधीश्वर सद्गुरु राजेन्द्रदास जी महाराज ने ऐसा ही संकेत करते हुए एक दिन, भगवत्प्राप्त सन्त मलूकदास जी का वचन उद्धृत किया जिसमें शरीर -संसार के प्रति वैषयिक अनुराग हेतु मनुष्य को सावधान रहने की चेतावनी दी गई है-

दर्पण आगे ठाढ़ि ह्वै,
नित्य सँवारै पाग।
ऐसी देहियाँ देखि कै
चोंच सँवारै काग ।।
सुन्दर देही देखि कै,
उपजत है अनुराग।
मढ़ी न होती चाम जों,
तो जीवत खाते काग।।

भैया शरीर संसार की दशा ही ऐसी है इसलिए जो आपका कभी नहीं रहा ऐसे के प्रति अनुराग त्याग कर सर्वदा हर लोक में हर देश में हर वेश में अपने साथ रहनेवाले और कभी अपना साथ न छोड़नेवाले एकमात्र भगवान् से प्रेम करना श्रेष्ठ है। देहाभिमान त्याग कर अनमोल मानव जीवन को इधर उधर में व्यर्थ नहीं गँवायें-

कबीवाणी है-
जब मैं था तब हरि नहीं,
अब हरि हैं मै नाहिं।
प्रेम गली अति साँकरी,
ता मैं दोउ न समाहिं।।
रात गँवाई सोइ के,
दिवस गँवाया खाय।
हीरा जनम अमोल सा,
कौड़ी बदले जाय ।।

इसलिए भगवन्नाम का जिह्वा पर और हृदय में आश्रयण संसार सागर से पार उतारने वाला है।यह भगवान् ही अपने हैं और उनकी भक्ति ही सार्वत्रिक सुख का आस्पद है, जो सद्गुरु की कृपा से प्राप्य है- भक्त की यही मान्यता है-

राम भगति मनि उर बस जाके।
दुख लवलेश न सपनेहुँ ताके।।
तात भगति अनुपम सुख मूला।
मिलहिं जो सन्त होहिं अनुकूला।।

और बात तो ये है कि अपने अनन्य और नित्य आश्रय भगवान् का भक्त उनसे बार बार यही माँगता है कि उसे चाहे अग्नि में जला दिया जाये ,जल में डुबा दिया जाये चाहे शूल पर चढ़ा दिया जाये विष ,बिच्छू, सर्प,हाथी, सिंह, शस्त्र से संत्रास दिया जाये,किन्तु उसे इन सभी का नाम मात्र भी कष्ट नहीं होगा, कष्ट तब होगाऔर भयंकर कष्ट होगा, जब किसी भक्त विमुख का मुख दीख जायेगा।
” भक्तमाल” की रसबोधिनी टीका के कर्ता परम भागवत प्रियादास जी कुछ ऐसा ही विचार है।उन्ही के शब्दों में-

अगिनि जरावो लैके जल में बुड़ावौ
भावै सूली पै चढावौ घोरि गरल पियायबी।
बीछू कटवावौ कोटि साँप लपटावौ,हाथी
आगे आगे डरवावौ ईति भीति उपजायबी।
सिंह पै खवावौ चाहे भूमि गड़वावौ तीखी,
अनी बिधवावौ मोहिं दुख नहीं पायबी ।
ब्रजजन प्रान कान्ह बात यह कान करौ
भक्त सों विमुख ताको मुख न दिखायबी।।

इसलिए मानव द्वारा सदा सर्वदा साथ नहीं त्यागने वाले भगवान् में आश्रयानुराग पूर्वक प्रेम और बारम्बार साथ छूटने वाले संसार का त्यागपू्र्वक विराग ही सार तत्व है। यही उपास्य -उपासक-उपासना का उपनिषद् है। भक्त की दृष्टि में निरन्तर भगवान् का स्मरण ही सम्पाद्य सम्पत्ति और सुख है, जबकि विस्मरण ही दुख है
” विपद् विस्मरणं विष्णोः सम्पन्नारायण-
स्मृति: ” इत्यादि भागवद् वचन से वाणी विराम लेती है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/12/05/उपासक-उपास्य-उपासना/

द्वारिका पुरी गुजरात से श्रीमद्भागवत कथा

कल्याणानां निधानं कलिमलमथनं
पावनं पावनानाम् ।
पाथेयं यन् मुमुक्षो: सपदिपरपदप्राप्तये
प्रस्थितस्य।
विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं
सज्जनानानाम्।
बीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां
भूतये रामनाम।
-हनुमन्नाटक

द्वारिका पुरी गुजरात से श्रीमद्भागवत कथा
सत्संग कथामृत का पान कराते हुए श्रीमन् मलूक पीठ के अधिपति श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज ने उक्त सुन्दर सा श्लोक उद्धृत किया। पद्य में नाम महिमा का बड़ा हृदस्पर्शी चित्रण किया गया है।
कहते हैं इस नाट्य काव्य के कर्ता स्वयं हनुमानजी ही हैं। ग्रन्थ के प्रारम्भ में मंगल पद्य के रूप में यह उद्धृत है –

भगवान् श्री राम का नाम कल्याण का एकमात्र कोश(निधान) है। संसार के अन्य सभी साधन -सेवा कार्यों में यदि रामनाम का स्मरण उच्चारण होता रहे तो वह सभी साधन अवश्य ही सिद्धिदायक होंगे।अन्यथा की स्थिति में साधनसेवा में अहंभाव आ जाता है और यह बहुत बड़ा अपराध बनता है।अतः संसार के समस्त कार्यों को हरिनाम स्मरण पूर्वक करना चाहिए जिसमें देहाभिमान नहीं होगा और साथ ही कार्य भी सिद्ध होगा।
इसे कलिमलमथनं कहा गया ,मतलब कि यह कलिकाल के समस्त मालिन्य रूप पाप तापों को नष्ट करनेवाला है। कलियुग केवल नाम अधारा सुमिरि सुमिरि नर उतरैं पारा।
यह पावनं पावनानां है। पावनों को भी पावन पवित्र करनेवाला है। जो पावन है उसे भी पावन करनेवाला अर्थात् जप-तप पूजा-पाठादि शुभ कर्मों को कदाचित् सभी विघ्नों अन्तरायों से बचाने वाला है श्री राम का नाम।
पाथेयं यन् मुमुक्षो: अर्थात् मोक्ष पथ के अनुगामी लोगों के लिये यह पाथेय(रास्ते में लिया जानेवाला भोज्य) है।
कोई भी राहगीर जब चलता है तब रास्ते में शुद्ध पवित्र खाद्य रूप में पाथेय(अल्पाहार) अवश्य लेकर चलता है।
यह पाथेय जैसे मार्ग को सुगम और सिद्धि दायक बनाता उसी तरह मोक्ष मार्ग पर चलने वाले लोगों के लिए रामनाम पाथेय है जिससे लक्ष्य प्राप्ति अवश्य ही होती है।

यह सारे श्रेष्ठ कवियों का एकमात्र विश्रामस्थान है जहाँ आश्रय लेकर सभी कविजनों की वाणी पवित्र हो जाती है।
यह सज्जनों का जीवन भी है। सज्जन कौन हैं? जो रामनमाश्रयी है वही सज्जन कहलाने का अधिकारी भी है अन्यथा नहीं। सुन्दर काण्ड में सन्देह का निराकरण राम नाम से ही होता है।
लंका निशिचर निकर निवासा ।
इहाँ कहाँ सज्जन करि बासा।।

जब हनुमानजी महराज को सन्देह होता है कि यहाँ राक्षसों के बीच सज्जन कहाँ से आ गया, तब वह राम नाम ही जिसने सारे सन्देह का निराकरण कर दिया है।

राम नाम तेहिं सुमिरन कीन्हा ।
हृदय हरषि तेहिं सज्जन चीन्हा।।

जिसने रामनाम स्मरण किया है , वही सज्जन है, ऐसा हर्ष श्री हनुमानजी महाराज को होता है।अतः यह नाम स्मरण सज्जनों का प्राण(जीवन) होने से, सज्जन पुरुष का प्रमाणपत्र बन जाता है।इसलिए का कि- जीवनं सज्जनानाम् ।
यह धर्म रूपी वृक्ष का बीज है।मतलब कि जिस प्रकार बीज के बिना वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति और पोषण संवर्धन की कोई संभावना नहीं है ,उसी प्रकार राम नाथ के बिना धर्म की कल्पना नहीं की सकती।
अन्तिम कड़ी में कहते हैं कि-
प्रभवतु भवतां भूतये रामनाम
अर्थात् यह रामनाम आप सभी सज्जनों के अभूतपूर्व प्रभूत भूति-कल्याण की सिद्धि में सर्वथा समर्थ है।
इसलिये भैया ! राम नाम संकीर्तन सभी को, मानवमात्र को अवश्य कर्तव्य है ।इसी स्मरण के द्वारा हनुमानजी महाराज ने भगवान् को अपने वश में कर रखा था-

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।
अपने बस करि राखे रामू।।

अन्त में हरि अनन्त हरिकथा अनन्ता का स्मरण करते हुए गुरु नानक देव की नाम निष्ठ वाणी से वाणी विराम लेती है-

नाम लिया सब कुछ लिया सकल शास्त्र का भेद।
बिना नाम नरके गया पढ़ि पढ़ि चारिउ वेद।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2017/12/05/द्वारिका-पुरी-गुजरात-से-श/

धैर्य से आत्मानुभूति

त्याज्यं न धैर्यं विधुरपि काले
धैर्यात् कदाचित् स्थितिमाप्नुयात् स:
जाते समुद्रेपि हि पोतभंगे
सांयांत्रिको वांछति तर्तुमेव

कठिन से भी कठिन परिस्थितियों में मनुष्य को अपना धैर्य (सम्बल)नहीं छोड़ना चाहिए।समुद्र में नौका टूट जाने पर भी जहाज का चालक साहस और हिम्मत से उसमें से तैर कर पार करने की हर सम्भव चेष्टा करता है और पार भी कर जाता है।अतः धैर्य नहीं खोयें।
मानव जीवन भी इसी नाविक की तरह है, जहाँ संसार-सागर को पार करने हेतु दृढ इच्छा शक्ति, आत्मसम्बल और अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है।
और उपर्युक्त गुणों की अनुभूति मानवीय शरीर में /से ही सम्भव लगता है।
आखिर मानव जीवन ही संवेदनशीलता ,संभावना वलितता, पश्चात् ताप अनुतप्तता,सृष्टि के कण -कण की अभिज्ञान वेदनीयता से साक्षात् संयुक्त होता है।
यही आत्म(स्व ) और परात्म(परस्व) का आत्मालोचन ही तो है एक संवेदनशील मानव जीवन।
दूसरे शब्दों में अपनी और अन्यों की पहचान में जीवन के उत्स की उपासना का आजीवन तप:पूत जीवन ,मनुष्य का जीवन है।
और नहीं तो वैदिक ऋषियों का यह उद्घोष कैसे होता –

शतं पश्येम शरद: शतं जीवेम शरद:शतं शृणुयाम शरद: प्रब्रवाम शरद:शतम्।

सैकड़ों वर्षों तक बोलने सुनने समझने जानने और नीरोग जीवन जीने की आकांक्षा मानवीय वृत्ति-प्रवृत्ति में उसके अन्तस् में अनुभूयमान उसकी परमात्म शक्ति की आत्मवेदना द्वारा होता है, जिसके लिये धैर्य एक अनिवार्य गुण है।

यह धैर्य ही है, जिससे आत्मानुभूति का भी मार्ग प्रशस्त होता है, मानव शरीर का चरम और परम लक्ष्य है।क्योंकि लक्ष्य हीन जीवन(मानव जीवन) भटकाव और पुनः पुनः टूट-फूट अस्त-व्यस्त और अन्न की तरह पकने ,गिरने उदय-अस्त होने में चलता रहता है , पूर्णता प्राप्ति हेतु संघर्ष रह कर भी अपूर्ण ही रहता है, जिसके लिए शायद सत्य, प्रेम, करणा, दया और क्षमा अनिवार्य है।
सत्य, प्रेम, करुणा, दया और क्षमा की क्षमता का उदय होने पर नैतिक-मूल्यों के जीवन की दृढ आधार शिला नीचे बिछी दीखती है और हम ” मनुर्भव” के ऋषि सन्देश को अपनाते हुए मनुष्य तो बन पाने की और अग्रसर होते हैं, नहीं तो हम प्रोफेसर और न जाने क्या-क्या हैं, मनुष्य नहीं।

हमारी ऋषि-परम्परा हमें मानवीय मूल्यों गुणों से जोड़े इसी विश्वास के साथ विचार परम्परा का एक पड़ाव पूरा हुआ।

।।हरिश्शरणम्।।

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धर्मजीवन का सूत्र है शील

धर्म युक्त जीवन का मूल स्रोत , शील में दिखाई देता है या यों कहें कि शील ही धर्म है। दूसरे शब्दों में जिन्होंने “शील ” को अपना जीवन धर्म स्वीकार कर लिया ,वे ही मनुष्य कहलाने के सच्चे अधिकारी हैं।
इस शील शब्द के आत्मा में प्रवेश करके अर्थानुसन्धान करने पर , यह सत्य , ऋत , स्वभाव, चरित्र ,निष्ठा तथा
आचरण आदि अर्थों में प्रयुक्त दिखाई देता है।
” शीलं स्वभावे सद्वृत्ते ” कह कर अमर कोशकार अमरसिंह इसे पुष्ट करते दीखते हैं।और यही अर्थ सर्वत्र अप्रमाद रूप से प्रयुक्त दीखता है।
यह स्वभाव क्या है , अपना भाव या आत्मभाव। आत्मभाव या आत्मा का भाव और आत्मा तो गुणों से परे है।
किन्तु शरीर को अधिष्ठान बनाने वाला आत्मा जब , आत्मनिष्ठ होकर विचार करता है, तब धारण किये गये मनुष्य शरीर और की चरित्र की चरितार्थता समझ में आती है।
मनुष्य का चरित्र उसका सद्वृत्त है , जिसका साक्षात् सम्बन्ध उसके सत्य आचरण को परिलक्षित करता है।
” आचार: परमो धर्म: ” आचार: प्रथमो धर्म: ” नास्ति सत्यात् परो धर्म:” इत्यादि वचनों से आचरण को परम धर्म मानते हुए सत्य -शील -सदाचार ही मनुष्य को मनुष्य बनाने वाले गुण सिद्ध होते हैं।
और इसीलिए इण्टरमीडिएट में पढ़ी गई एक बात सत्य प्रतीत हुई थी, जो कि सरदार पूर्णसिंह के निबन्ध में मिली थी वह ये कि सभ्यता का आचरण ही ” आचरण की सभ्यता” है ।
जो लोग सदाचारनिष्ठ जीवन व्यतीत करते हैं , वही स्व स्वभाव में रहते हैं ,उन्हीं का जीवन धर्ममय है अथवा वे ही शीलवान् और चरित्रशाली हैं। शीलवान् व्यक्ति का जीवन ही वस्तुतः संयमित मनुष्य का जीवन हैऔर धन्यजीवन है ।

जिसके शरीर में सर्वप्रिय “शील ” की विद्यमानता है ,उसके लिए अग्नि भी शीतल जल के समान, समुद्र छोटे से स्रोत के समान, सुमेरु पर्वत भी तत्क्षण छोटी सी शिला के समान , मृगपति सिंह तो चंचल मृग के समान, सर्प मनोहर माला के समान और विषरस भी अमृतवर्षा के समान बन जाता है –

वह्नि: तस्य जलायते जलनिधि: कुल्यायते तत्क्षणात्।
मेरु: स्वल्पशिलायते मृगपति: सद्यः कुरंगायते।
व्यालो माल्यगुणायते विषरस: पीयूषवर्षायते।
यस्यांगेखिल- लोकवल्लभतमं शीलं समुन्मीलति।।
योगिराज और महाराज भर्तृहरि के इन्हीं जीवनमूल्य गत सुविचारों के साथ यह विचार परिचर्चा विराम लेती है।
भगवान् सहायक हों।

।।हरिश्शरणम्।।

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व्यष्टि और समष्टि

आत्म का समुच्चय होने पर समष्टि दीखती है।और समष्टि का अनुभव होने पर व्यष्टि तिरोहित हो जाता है।

व्यष्टि और समष्टि मानवीय जीवन की विचित्र पहेली बनी हुई है। यह बड़ा अद्भुत द्वन्द्व है जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सतत अनुभूत हो रहा है। इसी के झंझावात में अनेक शरीरों का संचित संस्कार ,मानव मन को उड़ाये जा रहा है और खोज रहा है शान्ति , आनन्द के अविचल उत्स को जहाँ जाकर इन सबसे मुक्ति मिल सके।
पर विडम्बना क्या है कि आनन्द की खोज का पथिक मानव बार -बार जिसे पाकर विश्रांति चाहता है, वह उससे कहीं दूर होता चला जाता है।
लगता है उसका कुछ खो गया है, जिसे खोजने का प्रयास जारी है ।
वह है क्या जिसे पाने के लिये सतत संघर्ष हो रहा है ।
इसके मूल में जाने पर यह भी लगता है कि ,जो अभी उपयोगी है ,वही दूसरे क्षण अनुपयोगी हो जाता है।फिर नये की तलाश और उसे पाकर भी ठहराव नहीं होता । द्वन्द्वों को नियति मानता चलता जाता है, उसी सुख को खोजते लेकिन मिलता नहीं उसे मन माफिक जिसे पाकर, कुछ भी पाना शेष न रहे।
यही जीवन के अन्तर्जगत् की रहस्यमयी यात्रा है ,जिसका अन्तिम पड़ाव पाने में अनेक जन्म खोने पड़ते हैं।
आखिर वह रास्ता क्या है जिस पर चल कर हमारी यात्रा पूर्ण हो जाय , तो वैचारिक संघर्ष , स्वयं अपने में , अपने पर , आकर टिकता है , क्योंकि यही पूर्ण जो स्वयं में ठहरा।
सारी समस्या के जड़ में स्पष्ट रूप से व्यष्टि को समष्टि से अलग देखने की है।
यही द्वैत है , जिसने अद्वैत को उत्पन्न किया है ।और जब सबको अभिन्न, अखण्ड ,आत्मीय, अनन्त स्वरूप में देखने की दृष्टि दृढतर हो जाती है तभी आनन्द असीम की उपलब्धि स्वतः सिद्ध प्रतीत होती है।
सारा जगत् परिवार वत् दृष्टिगोचर होने लगता है , मैं मिट जाता है,सारभेद समाप्त होता है जहाँ से, अभेद प्रारम्भ होता है वहीं से।
सनातन देश की सनातन परंपरा के सनातन ऋषियों की सनातन वाणी प्रवहमान हो उठती है-

अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

सारी धरती हमारे लिए कुटुम्ब दीखती है ,जब आनन्द का अविरल अविराम प्रवाह निष्यन्द बहने लगता है तब।

।।हरिश्शरणम्।।

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भक्ति

भक्ति ईश्वर के प्रति परमप्रेमस्वरूप है।अमृतस्वरूप है।उसकी प्राप्ति से मनुष्य सिद्ध बनता है अमरत्व प्राप्त करता है और परम तृप्ति का अनुभव करता है।इसे पाकर मनुष्य और किसी की आकांक्षा नहीं करता।किसी के लिए शोक नहीं करता।किसी से द्वेष भी नहीं करता।अन्य विषयों में नहीं रमता तथा किसी सांसारिक विषय में उत्साहित नहीं होता।उसे जानने पर मस्त और स्तब्ध हो जाता है ।आत्माराम हो जाता है।
यह बात मैं नहीं कह रहा मैं तो अनुभोक्तामात्र हूँ। देवर्षिनारद अपने भक्तसूत्र में –

” सा तु अस्मिन् परमप्रेमस्वरूपा ।अमृतरूपा च।यत् लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति।यत् प्राप्य न किंचिद् वांछति , न शोचति न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साही भवति।यज् ज्ञात्वा मत्तो भवति, स्तब्धो भवति।आत्मारामो भवति ।”
परमहंस रामकृष्ण देव कहते थे-
” यह जगत् एक विशाल पागलखाना है।यहाँ तो सभी पागल हैं- कोई रूपयों के लिए, कोई स्त्रियों के लिए, कोई नाम और यश के लिए।कुछ मनुष्य ऐसे हैं, जो ईश्वर के लिए पागल हैं।अन्यान्य वस्तुओं के लिए पागल न होकर ईश्वर के लिए पागल होना क्या अच्छा नहीं है? ”
ईश्वरीय अनुभूति होती ही है अपने स्वयं के स्वरूप को वस्तुतः जान लेने के बाद और यही भक्ति की परिभाषा है-
” स्वस्वरुपावगति: भक्ति : ”
इसको किसी कामना की की पूर्ति का साधन नहीं बनाया जा सकता।
यह भक्ति तो समस्त कामनाओं और वासनाओं के निरोध का कारणस्वरूप है।
” सा न कमयमाना निरोधरूपत्वात् ”

भक्तिसूत्र के तृतीय अनुवाक् में बात आती है – ” जब समस्त चिन्ताएँ ,इन्द्रियों की क्रियायें और समस्त कर्म उनके प्रति अर्पित हो जाते हैं और क्षणमात्र के लिए भी उनकी विस्मृति हृदय में परम व्याकुलता उत्पन्न कर देती है ,तभी यथार्थ भक्ति का उदय समझना चाहिये। ”
“नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता तद्विस्मरणे परमव्याकुलितेति। ”
-ना . भ . अनुवाक् 3 , सू. 19 ।

भक्ति का यह स्वरूप ही , प्रेम की सर्वोच्च अवस्था है ,क्योंकि अन्यान्य साधारण प्रेम में प्रेमी , अपने प्रेमास्पद से प्रेम का प्रतिदान चाहता है , किन्तु सच्चा भक्त अपने प्रेम में केवल उनके सुख से ही सुखी होता है।
मीरा और भगवदासक्ता गोपिकाएँ ,इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।
और जब सभी आश्रयों को छोड़कर चित्त उनके (ईश्वर के ) प्रति आसक्त होता है, तब उससे प्रतिकूल सभी विषयों से उदासीनता हो जाती है।और यही यथार्थत्वेन भक्ति का स्वरूप ठहरता है-

” निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यास: ।
तस्मिन् अनन्यता तद् विरोधिषु च
उदासीनता । ” ना.भ.सू .2/8-9 ।

ऐसे भक्त जहाँ रहते हैं, वह स्थान तीर्थ बन जाता है।वे जो कहते हैं शास्त्र हो जाता है, वे जो कुछ कार्य करते हैं ,वही सत्कर्म समझा जाता है।
” तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि।सुकर्मीकुर्वन्ति कर्माणि।सत् शास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि।तन्मया : । ”
और ऐसे भक्तों में जाति, कुल, विद्या,रूप,धन आदि का भेद नहीं रहता ,क्योंकि वे उनके (ईश्वर के)हैं।
सूर-कबीर-तुलसी-मीरा-रैदास आदि के चरित्र इसके प्रबल मानदण्ड हैं।
भक्तिसूत्र के नवम अनुवाक् में इसकी चर्चा इस प्रकार आई है –
” नास्ति तेषु जाति – विद्या -रूप -कुल -धन – क्रियादि – भेद:

।।हरिश्शरणम् ।।

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