आत्मानुभूति

अस प्रभु हृदय अछत अविकारी।
सकल जीव जग माहिं दुखारी ।।

जब ऐसे अक्षय निर्विकारी परमात्मा प्रभु हृदय में विराजते हैं, तब यह सारा संसार दुखी क्यों है? इसके दुःख का कारण क्या है? आनन्द घन घनश्याम के हृद्देश में रहने पर हमें उस आनन्द की अनुभूति आखिर क्यों नहीं?
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
चेतन अमल सहज सुखरासी।।
यह जीवात्मा ऐसे अविनाशी चेतनमात्र निर्मल स्वभावसिद्ध सुखराशि स्वात्म मात्र पर्यवसित ईश्वर का अंश है ,फिर पुनः दुखी क्यों है?

आगे पंक्तियों में उत्तर साफ-साफ दे देते हैं

सो माया बस भयेउ गोसाईं।
बँध्यौ कीर मर्कट की नाईं।।
और
भूमि परत भा ढाबर पानी।
जिमि जीवहिं माया लिपटानी।।

यह मानव जगत् माया की अधीनता परवशता स्वीकार कर लेने से कीर (तोते)और मर्कट(बन्दर) अथवा अन्यान्य पशु जीवों की तरह पीने खाने के पदार्थों में आकृष्ट होकर स्वयं बँध गया है।
जैसै वर्षा का निर्मल जल आकाश से गिरता तो है स्वच्छ रूप में किन्तु भूमि पर आकर गन्दा हो जाता है, उसी तरह इस मनुष्य की भी गति है,कि माया रूपी आपातरमणीय किन्तु दुख परिणामी ठगिनी के वशीभूत हो जाता है और इसको आत्मविस्मृति हो जाती है।इस तरह आनन्दी परमात्मा का का अंश बेचारा बार बार जीव जगत् का चक्कर लगाता फिरता है। और बात ये भी है कि अनेकानेक जन्मों के पश्चात् स्वकीय कर्मों और करुणा के अविकल कोश अंशी परमात्मा की कृपा से प्राप्त यह मानव शरीर उसी की प्राप्ति का साधनभूत है। मुक्ति का एकमात्र परम मार्गस्वरूप है,किन्तु-

फिरत सदा माया कर फेरा।
काल कर्म स्वभाव गुन घेरा।।

काम,क्रोधादि और अहंकार के कारण माया की अधीनता स्वीकार करके संसार चक्र में पड़ा हुआ है।
अब बात ये भी है कि बिना अंशी को प्राप्त किये इस अंश रूप मनुष्य का परम कल्याण भी सम्भव नहीं।और यही अंशी ही एक है जो हृद्गत और समस्त चर अजर में व्याप्त उसकी अनुभूति कर सकता है।
जब तक स्वयं में उसकी अनुभूति नहीं होगी तब तक कहीं भी और कभी भी उसकी अनुभूति सम्भव नहीं।
और स्वयं में अनुभूति होने के लिए सन्त भगवन्त की कृपा करुणा अनिवार्य है।
इस कृपाकरुणा की प्राप्ति हेतु उस अंशी का सतत स्मरण परम अनिवार्य है।

क्योंकि –विपद् विस्मरणं विष्णोः सम्पद्
नारायणस्मृतिः।
उसको भूलना और उसकी स्वप्नवन्माया में भटकना ही विपत्ति का मूल और माया के गुणों बन्धनों में बँन्धन स्वीकारना तथा उस चिदानन्द घन का निरन्तर स्मरण रखना समस्त सुख शान्ति का मूल है और यही आत्मानुभूति भी है।
और इसलिये-
जब लगि उर न बसत रघुनाथा।
धरे चाप सायक कटि भाथा।।
ममता तमी तरुन अँधियारी ।
राग द्वेष उलूक सुखकारी ।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं।
जब लगि प्रभु प्रताप रवि नाहीं।।

इसलिये संसार की अहंता ममता को छोड़ और निर्मल मन से प्रभुस्मरण ही आत्मानुभूति और उनकी कृपा प्राप्ति का एकमेव उपाय है-
मन क्रम बचन छाँड़ि चतुराई।
भजत कृपा करिहहिं रघुराई।।

सन्त भगवन्त की हो और तत्क्षण आत्मानुभूति हो जाय।

।।हरिश्शरणम्।।

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मन का भटकाव/ठहराव

यह मन भी बड़ा विचित्र है। अनेक जन्मों और शरीरों के धारण का कारण यह मन ही तो है , जिसके भटकाव से चित्त अस्थिर है और कहीँ विश्रान्ति नहीं मिली।
विषयों का आसंगी यह बेचारा एक कामना के पूरा होते ही दूसरे की ओर दौड़ पड़ता है।और कबीर ने इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा-
माला फेरत जुग भया फिरा न मन फेर।
कर का मनका डारि दे मन का मनका फेर

माया के झाँसे में पड़ कर इसकी विवशता तो देखिये कि इसी के इधर-उधर विषयोँ में फिरते रहने से अनेक युग ही बीत गए और यह अब तक भटकाए ही जा रहा। कबीर ने कहा कि इसलिए कर में लिए हुए गोलाकार माले के मनके दाने को छोड़ कर अब मन के मनके को फिराने को सोचना चाहिए।क्योंकि जब तक यह विषयों में फिरता रहेगा और उन विषयों से नहीं फिरेगा यानी कि विमुख नहीं होगा, तब तक परम शान्ति और विश्रान्ति नहीं मिलेगी।
और यदि किसीने इस मन को मूड़ लिया या विषयों से मोड़ लिया, तो बार बार सिर मुड़ाने की जरूरत नहीं-
केसन कहाँ बिगारिया जे मुंडे सौ बार।
मन को काहे न मूड़िये, जाने विषय विकार

भगवान् ने गीता में इसीलिए इस मन को बन्धन /मुक्ति का कारण कह दिया-
मन एव मनष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः

और कबीरवाणी ये भी है कि यदि इस मन को वैराग्य अभ्यास के द्वारा भगवन् नाम और भजन में बाँधकर निर्मल कर लिया जाय तो यह गंगा की तरह परम पवित्र हो जायेगा और भगवान् भी उस भाग्यवान् के अनुगामी हो जायेंगे-

कबिरा मन निर्मल भया जैसै गंगा नीर।
पाछे पाछे हरि फिरैं कहत कबीर कबीर।।

लाखन में एक बात तुलसी बताये जात।
जन्म जो सुधारो चाहो तो राम नाम लीजिए।।
और यह भगवन् नाम जपने रटने की ही महिमा है माहात्म्य है कि मन निर्मल हो जायेगा केन्द्रित और नियन्त्रित हो जायेगा, एकत्व को प्राप्त हो जायेगा और कोई आत्मा से महात्मा भी हो जायेगा-

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्।
मनस्यन्यद् वचस्यन्यद् कर्मण्यन्यद् दुरात्मनाम् ।।

भगवान् श्रीराम ने इसीलिये स्पष्ट कहा था कि-
मोहि कपट छलछिद्र न भावा।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।।
और इसीलिए चैतन्य वाणी का नाद भी इसी भगवन् नाम को रटने,गद्गद वाणी और गलदश्रु होकर रोमांचित होकर जीवन धन्य बनाने को बैचैन है-

नयनं गलदश्रुधारया वदनं गद्गदया गिरा।
पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नामग्रहणे भविष्यति।।

और मन्मना भव मद्याजी मद्भक्तः मां नमस्कुरु का गीतानाद इन्ही विषयों में अटके भटके मन को बाँध कर मायाधीश के चरणों में समर्पण करके परमात्म भाव में अनन्त शान्ति पाने का मन्त्र है।
इसी भाव को कबीर ने स्मरण करते हुए मन के मरने या नाम में रमने पर माया के मरने तथा सद्यः मुक्ति और आत्मलाभ की बात कह डाली है-

मन मरा माया मरी हंसा बेपरवाह।
जाको कछू न चाहिए सो शाहन का शाह

अतः अपवित्र विषयों के राग से मुक्ति और मूलतः बन्धन मुक्ति हेतु नामजप में बँधने पर ही अन्तिम आत्यन्तिक शान्ति की प्राप्ति सम्भव है।

।।हरिश्शरणम्।।

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मनुष्य का नित्य वैरी काम

धर्म ,अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों के मध्य में पड़ा काम तो अराजक नहीं दीखता, क्योंकि उस पर धर्म का अंकुश जो है । और काम- क्रोधादि षड् रिपु वर्ग में परिगणित जो काम है,वह भी सृष्टि व्यवहार के लिये ही निर्धारित है, उस पर भी धर्म का अंकुश अनिवार्य है।
किन्तु धर्म मर्यादा को त्यागने वाला काम ,निश्चय ही पशु ( सर्वम् अविशेषेण सामान्येन पश्यति इति पशुः) आचरण में पतन करा देता है। पशु का मतलब, जिसका आचरण धर्म विहीन हो। इस प्रकार सब में अविशेष अर्थात् सामान्य बोध-व्यवहार वाला प्राणी पशु है ,जिसके लिये कोई आचार नियत नहीं है।जो केवल और केवल भोग के लिये ही शरीर धारण किए है,वह पशु है।
किन्तु अनेक जन्मार्जित पुण्य और प्रभु कृपा से प्राप्त देव दुर्लभ यह मनुष्य शरीर भी ,यदि उसी पशु प्रवृत्ति या भोगवृत्ति में पड़ जाये तो इससे बड़ा पाप क्या होगा?
अधर्म पूर्वक सेवित काम , मानव का सबसे बड़ा शत्रु है।और यह जगद् विदित तथ्य है कि मनुष्य और पशु में अन्तर करने वाला भेदक तत्व धर्म ही है।
अब श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय में अर्जुन की जिज्ञासा देखें, जब प्रश्न उठता है कि ,वह कौन है ,जो बल पूर्वक राजा की से प्रयुक्त सेवक की तरह,मनुष्य को पाप कर्म में लगा देता है?

अथ केन प्रयुक्तोयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:

इस पर भगवान् ने उत्तर दिया-

काम एषः क्रोध एषः रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्धि एनमिह वैरिणम्

मतलब कि रजोगुण से उत्पन्न होने वाला यह काम ,मनुष्य का सबसे प्रबल शत्रु है।
एक काम या कामना की पूर्ति होते ही, दूसरी आकर खड़ी हो जाती है। और उसके बाद यह अनेक रूप, आकार, प्रकार और परिमाण में वृद्धि को प्राप्त होता रहता है।हमेशा अविश्रान्त ही रहने वाला यह विषयसंगी कामशत्रु ,जब कभी पूरा नहीं होता तब, इसका आत्मज क्रोध आकर दस्तक देता है ।रजोगुणसमुद्भव यह काम ,अपूर्ण रहने पर जब क्रोध पुत्र को पैदा करता है, तब मेरे विचार से क्रोध तमोगुण को स्पर्श कर लेता है, और मनुष्य को असंतुलित करके एकदम से गिरा देता है। क्रोध पाप कर मूल।
भगवान् तो इन दोनों पिता-पुत्रों ,काम-क्रोध को महा अशन करने वाला, कहते हैं। महा अशन का मतलब कि बहुत खाने वाले और कभी भी तृप्त न होने वाले।
भगवान् आगे इसका स्वभाव बताते हुए कहते हैं कि ये नित्यवैरी काम, मनुष्य के ज्ञान को आच्छादित करके इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर अधिष्ठित होकर जीवात्मा को नाना प्रकार से मोह में फँसाए रखता है।

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्।।
गीता- 3/39-40 ।
इस तरह के ज्ञानविज्ञान नाशी कामक्रोध को ,स्वयं इन्द्रियों को वश में करके त्याग देना चाहिए –

पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्।
जहि शत्रुं महाबहो कामरूपं दुरासदम्।।
गीता- 3/ 41-43 ।
उधर मानस में भी जब विभीषण ,प्रभु राम से मिलने आते हैं, और वानर समुदाय शंका करता है यह कामी-क्रोधी राक्षस क्यों आया है?
जानि न जाइ निशाचर माया।
कामरूप केहि कारन आया।।
तब त्रिकालज्ञ भगवान् उस विभीषण को निर्मल मन वाला निर्दिष्ट करके अपनाने की बात करते दीखते हैं-
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।।

इस प्रकार कामक्रोधादि राक्षसी वृत्ति को त्यागना पड़ेगा और मनुष्य के स्वभाविक सन्त सरल स्वभाव को अपनाना होगा, तभी भगवान् की कृपा प्राप्त होगी और कल्याण भी सम्भव है-

मन क्रम बचन छाँड़ि चतुराई।
भजत कृपा करहहिं रघुराई।।

यह सरलता और सन्तस्वभावता शबरी के नवधा भक्ति प्रसंग में नवीं भक्ति है-

नवम सरल सब सन छल हीना।।

अतः मानव जीवन को अमानव या दानव पशु अधम बना देने वाले इन बाप बेटों से अत्यन्त सावधानी बरतनी चाहिए,क्योंकि ये आत्मा का नाश कर देने वाले नरकद्वार भी हैं-
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामःक्रोधःतथा लोभः तस्मादेतत्रयं त्यजेत्

गीता-अध्याय- 16 मन्त्र 21 ।
अतः भगवान् कृपा करें और उन बाप-बेटों काम-क्रोध से मुक्ति हो।

।।हरिश्शरणम्।।

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अजन्मा का जन्म

यो दुर्विमर्शपथया निजमाययेदं,
सृष्ट्वा गुणान् विभजते तदनुप्रविष्ट: ।
तस्मै नमो दुरवबोधविहारतन्त्र-
संसारचक्रगतये परमेश्वराय।।

जिन्होंने अपनी अचिन्त्यगति माया से इस संसार चक्र का निर्माण करके उसमें स्वयं प्रवेश कर लिया और गुणों के आधार पर, कर्म एवं कर्मफल का विभाजन भी कर दिया है, ऐसे दुरवबोध विहार लीला विस्तार करने वाले परमेश्वर को प्रणाम है।
स: अकामयत एकोहं बहु स्याम, की वैदिक अवधारणा , संसार के सृजन का मूलाधार है।उसकी कामना से आकाश बन गया और उसमें वायु चलने लगी,प्रकाश भी हो गया। गरमी की अनुभूति हुई तो जल भी बन गया। गीलेपन का अहसास हुआ और पृथ्वी भी बन गई।
यही तो उस अचिन्त्य की क्रीड़ा है।
इसी क्रीड़ा में सृष्टि प्रादुर्भूत हो जाती है।
भगवान् की क्रीड़ा का विस्तार समस्त ब्रह्माण्ड पर्यन्त है। सत् ,रज और तम के क्रमशः सुख,दुख मोहादि कार्यों का निरन्तर प्रवाह सृष्टि, स्थिति और विनाश में एक के बाद एक चलता रहता है।
काम ही सृष्टि का मूल है, जिसे रजोगुण से उद्भूत कहा गया है। इस काम पूर्ति की प्रक्रिया में सन्तोष और असन्तोष के बीच क्रोध भी जन्म ले लेता है, जिसका मूल तमोगुण है। और इस क्रोध और अहंकार की विनिवृत्ति के लिये अजन्मा को भी जन्म लेन की विवशता प्रतीत होती है।इस प्रकार अजन्मा के जन्म और उसकी क्रीड़ा का सातत्य सतत चलता है।
आज उसी क्रीड़ा के प्रादुर्भाव में बलवती प्रभु कामना को सत्य करनेवाला भारतीय नव वर्ष का प्रथम दिन है।
पौराणिक मान्यता में ब्रह्मा की सृष्टि का प्रथम दिन,चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि है।अनेक महापुरुषों का जन्मदिवस यह दिन सृष्टि में यत्र तत्र सर्वत्र नवीनता का संचार करनेवाला है।
शक्ति की उपासना का महत्वपूर्ण काल नवरात्र भी आज के दिन से प्रारम्भ होकर नव दिन पर्यन्त चलता है। भारतीय जनमानस का उत्सव पर्व आज ही के दिन से प्रारम्भ हो जाता है।
एक और महत्वपूर्ण घटना सृष्टि में आज के नवम दिन अवतरित होती है जब प्रभु श्रीराम का अवतरण अहंकार रावण के विनाश हेतु होता है।

नवमी तिथि मधुमास पुनीता।
सुकल पक्ष अभिजित हरिप्रीता।।
मध्य दिवस अति शीत न घामा।
पावन काल लोक विश्रामा।।

चैत्र मास की नवमी तिथि को सृष्टि रचना या जगद्विस्तार के नवम दिन ,जो अंक की दृष्टि से सबसे बड़ा अंक और पूर्णता का प्रतीक भी है, भगवान् श्री राम अयोध्या में अवतरित होते हैं। यह पूरा नवरात्र काल प्रथम दिन से नव दिनों तक शक्ति उपासना के साथ ही साथ प्रभुश्रीराम के जन्मोत्सव का काल भी है, जहाँ तमस के पर्याय राक्षसों का विनाश प्रभु अपनी शक्ति के साथ स्वयं करते हैं।
उन्हीं अजन्मा के जन्म और विभिन्न देवों की शक्ति के समूहीभूत शक्ति से उत्पन्न भगवती की स्मृति में अनन्त प्रणिपात करते हुए यह विचारशृंखला उन्हीं को समर्पित करता हूँ।

।।हरिश्शरणम्।।

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मायिक भ्रान्ति का नाश रामनामद्वारा

माया , मा मतलब नहीं ,या मतलब जो,अर्थात् जो नहीं, वह दीखे और जो दिखे,वह वह नहीं ।
तुलसी कृत रामचरितमानस में एक साथ ,श्रीरामकथा के तीन वक्ता-श्रोता हैं-
भगवान् शिव-पार्वती, याज्ञवल्क्य-भरद्वाज
कागभुशुण्डि-गरुड़।इस गूढ कथा में –
गो गोचर जहँ लगि मन जाई।
सो सब जानेहु माया भाई।।

अरण्यकाण्ड के दोहा सं.14 के बाद उक्त चौपाई आई है। इसमें इस माया के अविद्या और विद्या माया रूप से दो भेद –
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ।विद्या अपर अविद्या दोऊ।। कहा गया है।
मूलतः उक्त राम-कथा -रचि महेश निज मानस राखा पाइ सुसमउ शिवा सन भाखा,की उक्ति से शिव-पार्वती संवाद ही है।
ऊपर कही चौपाई के अनुसार – मन तथा, गो=इन्द्रिय , से चर= गम्य, जो भी पदार्थ हैं, वे सभी माया (अविद्या माया) हैं।
इस सुन्दर संसार की समस्त रचना प्रपंच विस्तार के मूल में यही माया,अविद्या माया ही है ।आखिर इस अविद्या माया की विद्यमानता नहीं हो तो, संसार भी रचा कैसे जा सके?
अतः इसकी उपस्थिति और इससे जन्य भ्रमादि भी आवश्यक ही है ।लेकिन , केवल और केवल बात इतनी सी ही है, कि
हमें इसके एक और दूसरे भेद यानी कि –
विद्या माया का स्मरण भी नित्य बनाये रखना होगा।
यह विद्या माया भगवान् की चिर संगिनी, नित्य, शुद्ध,बुद्ध और स्वयं चैतन्य है।यह अनादि परम पुरुष की परमा चित् है सर्वकारण कारण है।इसीलिये लगता हमारे आर्ष ग्रन्थों में यहाँ तक आते-आते ,
एक ब्रह्म की दृष्टि दृष्ट है।
मानसकार की, वेद- ऋषि-संमत दृष्टि भी यही बात बोलती है- तुम्ह जो कहा राम कोउ आना ।जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना।। राम कोई अन्य नहीं , ये तो वही हैं, जो वेदवर्णित मुनियों के ध्यान के मूल हैं।
बालकाण्ड के दोहा 114 के पूर्व उक्त चौपाई के बाद दोहा 115 के पश्चात्-
राम ब्रह्म व्यापक जग जाना।
परपानन्द परेस पुराना।।
इस पंक्ति से भगवान् श्रीराम को ब्रह्म सिद्ध कर दिया।यही परमात्मा और परम आनन्द सर्वव्यापी हैं। निर्गुण रूप में नित्य और विद्यामाया से विहित यही ,सगुण रूप में भक्त-भक्ति, जीव-प्रेम निष्ठा से राम रूम में अयोध्या में अवतरित होते हैं।
हरष विषाद ज्ञान अज्ञाना।
जीव धर्म अहमिति अभिमाना।।

यह जीव का अविद्या माया रचित या प्रेरित
हर्ष-विषाद,अज्ञानावृत ज्ञान का अहं वश अभिमान है, कि हम उन्हे समझ नहीं पाते
निज भ्रम नहिं समुझहिं अज्ञानी।
प्रभु पर मोह धरहिं जड प्रानी।।
और एक बात और है कि जो निर्गुण है वह सगुण कैसे हुआ, यह भ्रम नहीं होना चाहिए ,क्योंकि जैसे जल और ओले में कोई भेद नहीं दोनों जल ही हैं, वैसे ही निर्गुण (ब्रह्म)और सगुण ब्रह्म रूप राम में
भी कोई भेद नहीं।
इसलिये सभी के प्रकाशक और स्वयं प्रकाश्य सूर्य की भाँति इन श्रीराम को मायाधीश ज्ञान गुन का धाम मानना चाहिए।और स्वाभाविक भी है कि इनकी भक्ति- यज्ञ( सेवन नाम स्मरण पूजन संगति करण दान) से अथवा विवश होकर(विना इच्छा के)भी नाम ले लेने से अनेक जन्मार्जित पाप जल जाते हैं-
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं।
जनम अनेक रचित अघ दहहीं।।

और बात, संसार के बने रहने और मोह के कारण निरानन्द को भ्रमवश आनन्द मानने की करें तो वही ऊपर कही गई अविद्या माया आ जाती है, जिसके कारण सीपी में चाँदी और सूर्य किरणों में पानी( बिना हुए भी ) प्रतीति होती रहती है।
रजत सीप महुँ भास जिमि,
जथा भानु कर वारि।
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ,
भ्रम न सकै कोउ टारि।।
अतः इस अविद्या मायिक भ्रम को दूर करनेमें एकमात्र कारण और सभी के परम प्रकाशक स्वयं प्रकाश्य अनादि अवधपति विद्यामायाधीश को भजना ही श्रेषठतम है-
सब कर परम परम प्रकाशक जोई।
राम अनादि अवधपति सोई।।
जगत प्रकाश्य प्रकाशक रामू।
मायाधीश ज्ञान गुन धामू।।
और इनका सादर स्मरण मात्र तो ऐसा कि जैसे इस भवसागर रूप संसार सागर को कोई गाय द्वारा निर्मित छोटे से गड्ढे को बड़ी आसानी से पार कर ले-
इसलिए
उमा कहहुँ यह अनुभव अपना।
सत हरि भजन जगत सब सपना।।
और
सादर सुमिरन जे नर करहीं।
भव बारिधि गोपद इव तरहीं।।
और यही बात जैसा कि शिव-पार्वती संवाद है ,वही कागभुशुण्डि-गरुड संवाद भी है-
सुनु सुभ कथा भवानि,
रामचरितमानस बिमल।
कहा भुशुण्डि बखानि,
सुना बिहगनायक गरुड।।
सो संवाद उदार ,
जेहि बिधि भा आगे कसब।
सुनहु राम अवतार,
चरित परम सुन्दर अनघ।।
हरि गुन नाम अपार,
कथा रूप अगनित अमित।
मैं निज मति अनुसार,
कहहुँ उमा सादर सुनहु।।
बालकाण्ड दोहा,120,क-ख-ग

।। हरिश्शरणम् ।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/03/08/मायिक-भ्रान्ति-का-नाश-राम/

” शब्दार्थौ तद् रसो वै स: “

शब्द ही समग्र का आधार है,क्योंकि सृष्टि का आदि अक्षर जो ओङ्कार है। यह शब्द अक्षर होने से अविनाशी भी है। उच्चरित होने पर यह ध्वनि रूप या नाद रूप है। सीमातीत आकाश में इस नादात्मक ध्वनि रूप शब्द का श्रवण होने पर इसका अनु श्रवण भी श्रवणेन्द्रिय द्वार द्वारा ही होता है।और विचार करने पर इस शब्द की प्राप्ति में कोई अर्थ तत्व दिखाई देता है।
अतः मूलतः अर्थ की अनुभूति कराने के लिये होने वाली किसी एक शब्द की अनुगूँज प्रायः अनेक अर्थों की प्रकाशिका बन जाती है।
शब्द एक अर्थ अनेक। किसी अर्थ या प्रयोजन विशेष हेतु जब तक शब्द का उच्चारण नहीं होगा सामान्यतः कोई अर्थ लोकग्राह्य नहीं होगा। अर्थ का नेत्र गोचर कोई रूप नहीं है, शब्द का भी नहीं,किन्तु शब्द लिपिबद्ध होकर ,चक्षु – श्रवणेन्द्रिय गत हो जाता है।
निष्कर्ष में अर्थ के कथन में शब्द के उच्चारण की अनिवार्यता दृष्ट होने से ,शब्द में कोई शक्ति या बल दिखाई देता है, जिससे अर्थोपलब्धि होती है।
औपनिषदीय एवं वैयाकरण अवधारणा में यह अर्थ और शब्द दोनों ” ब्रह्म ” हैं। जिसको धारण करने की क्षमता “आकाश” तत्व में है। और इसीलिये ब्रह्म को आकाश शरीर वाला कहा गया(आकाशशरीरं ब्रह्म)
“आकाश “तत्व किसी भी स्पर्श, रूप ,रस और गन्ध से विहीन ,केवल अर्थ एवं शब्द का अनुग्राहक मात्र है। इसमें किसी सद्रजस्तमो गुणादि का लेश नहीं।
आकाश में शब्दोच्चारण होने पर ,उक्त सत्वादि के न्यूनाधिक्य की मात्रा के कारण
प्रत्येक मनुष्य को पृथक्- पृथक् गुणों की अनुभूति होती है,क्योंकि शब्द में तो गुणों का आधान है ही।
यह वही आकाश तत्व है, जो प्राणिमात्र के समस्त कर्मों का साक्षी चिन्मात्र और स्वयं निर्गुण स्वरूप है। यह साक्षी इसलिये भी है, क्योंकि इसी में अन्य चारों महाभूतों – वायु,अग्नि, जल,पृथ्वी सहित समग्र स्थावर जंगम प्रकृति प्रतिबिंबित है।
सृजन की प्रक्रिया का प्रथमाधार यह आकाश, ब्रह्मवत् या आत्मवत् सारे जगत् की क्रिया-प्रतिक्रिया, घात-प्रतिघात और चेष्टा-प्रतिचेष्टा का अमूर्त द्रष्टा है।
वर्तमान में आत्मप्रवंचना के प्राकृत रूप में शिक्षामन्दिरों में “नकल “की प्रक्रिया ने आज जब भयावह रूप ग्रहण कर लिया है, तब विवश होकर यह वही आकाश तत्व है,जो भौतिक रूप में चलते फिरते “कैमरे” का रूप लेकर हमारे शब्द, अर्थ, स्वरूप, क्रियाओं और चेष्टाओं को कैद करके ,हमारी भर्त्सना के लिये उठ खड़ा हुआ है।
ऋषियों की मीमांसा में ,अर्थ तत्व ही शब्द के रूप में आकाश से जन्मा है।यही मानवीय चेतना के अर्थानुकूल सीमित मानव घटाकाश( मुखविवर ) से असीमित आकाश द्वारा सीमित हृदयाकाश में जाकर तदनन्तर बुद्धि का विषय बन जाता है।इसमें अविकल सहायता षष्ठेन्द्रिय ” मन ” द्वारा प्राप्त होती है, जिसके विना उच्चरित कोई भी ध्वनित शब्द अश्रुत ही रहेगा।क्योंकि यदि आकाश गत संचरित वायु से ,शब्द को मन नहीं ग्रहण करेगा तो वह वर्णात्मक ध्वन्यात्मक शब्द कर्णेन्द्रिय गत नहीं होने से कदापि आत्मप्रत्यक्ष नहीं होगा।लेकिन कर्णेन्द्रिय गत होते ही मन:प्रत्यक्ष होकर वही शब्द कोई न कोई अर्थ ले लेता है।
” आत्मा” बुद्धि के साथ अर्थों के प्रति गमन है।और तब ” मन ” बोलने की इच्छा से युक्त हो जाता है।यह मन ही, शरीर में विद्यमान जठराग्नि पर बलाघात करता है, जिससे यह अग्नि, वायु को प्रेरित करके गतिशील बना देता है।अनन्तर हृद्गताकाश के अन्दर से संचरणशील वायु मुखाकाश द्वारा बाहर मुक्ताकाश में बिखर कर शब्द बन जाता है।और इत्थंभूत शब्द से, अर्थ विनिश्चय होता है।
इस प्रकार अर्थ से शब्द और शब्द से अर्थ की प्रसूति बीज-वृक्षवत् सृष्टि प्रक्रिया का अंग बना रहता है।
हृदय देश को स्पर्श करनेवाला शब्द भी है और अर्थ भी। इस प्रक्रिया का अत्यन्त महत्वपूर्ण साधन माध्यम वायु है।जबकि अग्नि तत्व के विना ,शब्दोच्चारण और अर्थानुभूति दोनों असम्भव ही है।
कुल मिलाकर शब्द और अर्थ ग्रहण में आकाश और वायु अप्रत्यक्ष अथवा आत्म प्रत्यक्ष ही रहते हैं ,जबकि अग्नि प्रत्यक्ष साधन बनता है।
एक साथ राज , योग और कवि कर्मनिष्ठ
” भर्तृहरि ” ने जब – विद्या नाम नरस्य रूपमधिकम् – कहा ,तब विद् अर्थात् वह ज्ञान ( ब्रह्म) ही आकाश-वायु-अग्नि लक्षण लक्षित होकर आत्मप्रत्यक्ष बनता हुआ विशेष- प्रकाशात्मक रूप बन जाता है।और तब भोगायतन ,यह मानव तन ,केवल भोगरूप न होकर , कर्मविशेष रूप होता है, और स्व-स्वरूप को आत्म विशेष रूप भी बना देता है।
और कुल मिलाकर यह शब्द और अर्थ का आत्मप्रत्यक्ष, गुरु -भगवत्कृपा वशात् सद्यः मुक्तिप्रदायक सिद्ध हो जाता है।
ऋषियों की ” सर्वं खलु इदं ब्रह्म ”
” रसो वै स: ” और काव्यलक्षण कर्ता आचार्य ” मम्मट ” की ” शब्दार्थौ तद् ”
की व्याप्ति एक ही विराट् में आत्मानुभूत होकर चिरन्तन विश्रान्ति पूर्ण सत् चित् और आनन्द का कारण होती है।
यही शब्द- अर्थ -तत् सत् हरि: और ओम् का नादानुसन्धान रसमयं जगत् भी है। गुरुभगवान् की कृपा से अविद्या जनित संस्कार क्षय हो और हम ” शब्दार्थौ तत्” एवं ” रसो वै स: ” का अमृतरसपान करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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भगवद्भजन से ही अन्त:करणशुद्धि

सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्त:-

करणप्रवृत्तय: ” सज्जनों के अन्त:करण की वृत्तियाँ सन्देह का निराकरण कराती हैं।” कविकुलगुरु कालिदास की अमरवाणी का यह अमर सन्देश अमर- वाणी उपासकों के लिये अत्यन्त आदरणीय है। वैचारिक परिणति में यह- मन-बुद्धि-चित्ताहंकार रूप में चार हैं।

इन सभी में मन अद्वितीय है, जो शरीर के भीतर और बाहर सभी जगह तादात्म्य बनाये रखता है।शरीर में विद्यमान पंच ज्ञानेन्द्रियों-कान,त्वचा,आँख, जिह्वा और नासिका से यदि मन का तादात्म्यीकरण नहीं होगा तो ये पाँचों अपने-अपने विषयों –शब्द,स्पर्श, रूप,रस,गन्ध का भान नहीं कर पायेंगे।क्योंकि व्यवहार जगत् में इसका जिसके साथ योग-संयोग पूर्णतया होगा, उसी का पूर्ण ज्ञान संभव है।

मानसकार ने ” शिव संकल्प कीन मन माहीं।यह तन सती भेंट अब नाहीं।। ” में जिस शिव के संकल्प का शिवयोग दर्शाया है, वह संकल्पात्मक मन का ही स्वरूप है। और शिव की ही लीलाविग्रह शिवा के लीला संशय का उच्छेदन उनकी नित्यसंगिनी दक्षसुता सती के योगाग्निध्वंस में परिणमित हो जाता है।इस घटना में दक्ष का अहंकार नाश भी हेतु बनता है और जन्मान्तर में पुनः शिव की लीलासंगिनी हिमालय -पुत्री रूप में आकर शिव-पाणि-गृहीता हो जाती है।
सती का भावचांचल्य सदाशिव के सदा मन:स्थैर्य को व्यक्त करके ,मानवीय मन को विकल्पों को छोड़ कर संकल्प पर ही टिकने का अमिट आदेश दे देता है।
चञ्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्। वाला अर्जुन का मन- अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते। का निर्देश पाकर एकमात्र संसाररागनिवृत्तिऔर नाम -अभ्यास-जपादि द्वारा ही वश में आ पाता है। यही मार्कण्डेय ऋषि का ” निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ “ और हमारे वैदिक ऋषियों का ” तन्मे मन: शिव-संकल्पमस्तु ।” भाव है।इसी अनुशीलन और इसी अनुशासन में ही जन्म जन्मान्तर के ग्राहक-अनुग्राहक मन की शुद्धि निहित है, जो सर्वानन्दावाप्ति करा देगा।
पंच ज्ञानेन्द्रियों , तद्विषयों ,मन ,बुद्धि और आत्मा की उत्तरोत्तर श्रेष्ठता शास्त्रों द्वारा सिद्ध है-

इन्द्रियेभ्य:परा ह्यर्था: ,
अर्थेभ्य: परं मन: ।
मनसस्तु परा बुद्धि: ,
बुद्धेरात्मा महान् पर:।।

ऊपर उक्त चारों अन्त:करणों में एक चित्त भी है, जिसे चेतना के रूप में शरीर के सभी अंगोपांगों में अनुभव किया जाता है।
इसी से सभी शरीरांगों में सर्वत: समग्र स्फुरण,स्फूर्ति,चेष्टागति हो रही है।
ऋषि मार्कण्डेय ने इसीलिये ” चेतना ” के रूप में भगवती का स्मरण-दर्शन किया है-

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

और ऊपर की मन:शुद्धि की तरह यहाँ भी चेतना या चित्शक्ति का शुद्धीकरण देवी के रूप में अवधारित करके सम्भव है।

तृतीय अन्तकरण ” अहंकार” है। इसमें सन्धि करने पर अहम् और कार दो पृथक् शब्द हो जाते हैं। अहं पद से” मैं “और कार से तद्भाव समझ में आता है।मतलब कि संसार एवं तद्विषयों में मैंपना या स्वयं कर्तृतादि का चिन्तन ही अहंकार है।
अहंता से अस्मिता, इदन्ता ,ममता आदि अपृथक् रूप से संयुक्त हैं।जिससे पुनः पुनःशरीर धारण करना पड़ता है।
” सोहमस्मि इति वृत्ति अखण्डा ” की गोस्वामी जी की अवधारणा का ध्रुवीकरण ही, जो चाहे अष्टांग योगादि जन्य हो अथवा भगवान् की भक्तिज्ञानश्रद्धालभ्य, इस अहंकार से मुक्ति दिला सकती है।
एक अन्तिम अन्तरिन्द्रिय ” बुद्धि ” है।
यह मन से श्रेष्ठतर और आत्मा से कमतर है। यह आत्मा के और मन के भी अत्यन्त निकट होने है। इसलिए इसी बुद्धि के नैर्मल्य द्वारा विवेकपूर्वक संपादित कार्य कार्यसिद्धि का कारण बनता है ,मन के मनमानी- पने से नहीं।
बुद्धिशुद्धि भी इसे गायत्री माँ मानने पर है,क्योंकि गायत्री का मनन चिन्तन इसी को गायत्रीमन्त्र रूप में मन्त्र मुग्ध भाव से जप कर बुद्धनैर्मल्य रूप में परिणमित देता है।और इसीलिये मार्कण्डेय ऋषि ने इस बुद्धि को नमन किया दैवी रुप में-

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

यह देवी गायत्री हो ,दुर्गा हो अथवा सीता ,यदि समाहित समर्पित बुद्धि से इसका मनन चिन्तन होगा, तो निश्चय ही यह बुद्धिनैर्मल्य देगीं ही।
सर्वसुरासुरमुनिमनुजदनुज-वृन्द-वन्दनीया सकलब्रह्माण्डजननी करुणानिधान श्रीराम की अतिशयप्रिया विदेहतनया श्रीजानकी जी के युगलपादपद्मों की वन्दना से गोस्वामी जी के शब्दोंमें निर्मलमतित्व की प्राप्ति वर्णित है-

जनकसुता जग जननि जानकी।
अतिशय प्रिय करुणानिधान की।।
ताके युग पदकमल मनावौं।
जासु कृपा निर्मल मति पावौं।।

नारायण यही रामगायत्री है ,जिसे उन्मुक्त भाव से किसी विधिविधान के विना भी स्मरण मनन चिन्तन करके मनुष्य मात्र की बुद्धि निर्मल हो जाती है।
सम्यक् आधीयते चित्तं यस्मिन्(यस्याम्) समाधि: की समाधि दशा इन्हीं भगवान् की अचिन्त्य शक्ति में ध्यान करके पाई जा सकती है, जिसका फल अविद्या, अस्मिता,राग,द्वेष,अभिनिवेश आदि पंच क्लेशों का शमन भी है।
इस प्रकार उक्त चतुर्धा विभक्त अन्तरिन्द्रियों का परिशुद्धीकरण इन सभी में भगवत्ता की अनुभूति से हो सकती है।और इसका भी एकमेव उपाय भगवद् भजन ही सत्य सिद्ध है-

उमा राम सुभाव जेहि जाना।
ताहि भजन तजि भाव न आना।।
तथा
कह हनुमन्त विपति प्रभु सोई।
जब तब सुमिरन भजन न होई।।
और
उमा कहहुँ यह अनुभव अपना।
सत हरि भजन जगत सब सपना।।

इत्यादि मानसकार की वाणी मानस में धरती हुई विरमती है।

।।हरिश्शरणम्।।

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भक्त रैदास

आज माघमास की वैक्रमाब्द 2076 की पूर्णिमा तिथि को सन्त रविदास का अनुस्मरण हो रहा है,क्योंकि भक्त समाज ,आज ही के दिन आपका प्राकट्य मानता है। श्रीरामानन्दाचार्य जी के द्वादश प्रधान शिष्यों में आपकी ख्याति है।
“श्रीभक्तमाल ” ग्रन्थ के प्रसिद्ध टीकाकार प्रियादास जी ने अपनी कवित्तमयी टीका में भक्त रैदास के जन्म की कथा कही है। इसके अनुसार गुरु रामानन्दाचार्य जी ने प्रतिदिन भिक्षाटन का कार्य एक ब्राह्मण बालक को सौंपा था और वह भिक्षान्न ब्राह्मण गृहों से संग्रह होता था, जिससे बने भोग को प्रतिदिन भगवान् को अर्पित किया जाता था।
इस बात की मनाही थी कि, अन्य किसी घर से अन्न ग्रहण नहीं किया जायेगा।पर भिक्षाटन करते समय इन बालक से एक वणिक् प्रतिदिन भिक्षान्न ग्रहण की प्रार्थना करते थे।जिसे ये गुरु आज्ञा के विपरीत मान कर स्वीकारते नहीं थे।एक दिन खूब जोर की वर्षा हो रही थी, और बालक ने उन वणिक् का ही अन्न स्वीकार कर लिया और उसी से बने भोग को भगवान् को अर्पित किया गया।किन्तु भगवान् ने वह भोग जब स्वीकार नहीं किया, तब गुरु श्री रामानन्दाचार्य जी को ज्ञात हो गया कि, बालक ने आज्ञा के विपरीत भिक्षाटन किया है। और उधर उस वणिक् को किसी ने बताया था कि, यदि श्री रामानन्दाचार्य जी उसकी भिक्षा स्वीकारें, तो उसे पुत्र प्राप्ति हो सकेगी।अतः वह तो कृतकार्य हुआ , किन्तु गुरु रामानन्दाचार्य जी ने इस ब्राह्मण बालक को मलिन जाति में जन्म लेन के लिए शाप दे दिया। ब्राह्मण बालक ने काशी में ही ” रघु” नामक चर्मकार के यहाँ जन्म ग्रहण किया। और अपनी पूर्व जन्म की जानकारी रहने से उस घर में दुग्धादि तक खानपान नहीं स्वीकारा।तब श्री रामानन्दाचार्य जी प्रकट हुए और वहीं पुनः शिष्य स्वीकारने की कृपा की ।
इसी घर में गुरु कृपा से पुनः जन्म प्राप्त रैदास ने गुरुभगवान् की कृपा से अल्पायु में ही भगवद् दर्शन किया और उपनिषद्, वेदान्त मय सिद्धान्तों को अपनी टूटी फूटी भाषा में दोहों ,पदों के माध्यम से अभिव्यक्ति दी।
उनका प्रसिध्द पद्य –

प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी।
जाकी अंग अंग बास समानी।।
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा।
जैसे चितवत चन्द चकोरा।।
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोत बरै दिन राती।।
प्रभु जी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भगति करै रैदासा।।

प्रायः पद का आशय पूर्णतया स्पष्ट ही है, किन्तु प्रभु को दीपक और स्वयं को उसकी बाती का भाव तो कुछ और ही है।
वस्तुतः इस अर्थ में औपनिषदिक बात पिरोई लगती ,जहाँ जीव-परमात्म का अभेद ही परिलक्षित होता है ।

एक दोहे में अपने गुरुभाई सन्त कबीर के भावों का स्मरण करते दीखते हैं, जहाँ अभिमान को त्याग देने का सन्देश है।

कबीर ने कहा-
लघुता ते प्रभुता मिले ।प्रभुता ते प्रभु दूरि।
चींटी लै शक्कर चली।हाथी के सिर धूरि।।
यही भाव रैदास वाणी में-
कह रैदास तेरी भगति दूरि है,
भाग बड़ो सो पावै ।
तजि अभिमान मेटि आपा पर ,
पिपलिक हवै चुनि खावै।

कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य मात्र को भगवान् की प्राप्ति और मुक्ति का समान अधिकार प्राप्त है किन्तु इसमें सबसे बड़ी बाधा देहाभिमान ही है। स्वयं पर सब कुछ करने और कर लेने का अभिमान रहते ,कुछ भी मिलना संभव नहीं ,जबकि भगवत् शरणागति हो जाने और सभी सांसारिक कार्य को भगवत् प्रीत्यर्थ करने लगने पर कुछ भी मिलना शेष नहीं रहता, और सभी कुछ मिल जाता है।
अतः इस अवसर पर प्रभु स्मरण करते हुए, सन्त रैदास की वाणी से वाणी विरमती है,जहाँ शरणागत भक्त सभी कामनाओं की पूर्ति में प्रभु श्रीराम का ही भरोसा मानता है-

प्रतिज्ञा प्रतिपाल चहुँ जुग,
भगति पुरवन काम ।
आस तोर भरोस है,
रैदास जै जै राम ।।

।।हरिश्शरणम्।।

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युक्त योगी

युंजान योगी और युक्त योगी ,ये दो प्रकार योगियों के हो सकते हैं। युंजान का तात्पर्य ऐसे साधक योगाभ्यासी से है, जो योग साधन -परायण है, अर्थात् योगक्रिया में विधिवत् लगे हुए हैं। इसी से आगे की अवस्था को प्राप्त करने वाला योगी ,सिद्ध योगी कहा जायेगा, जहाँ पहुंच कर अब उसे कुछ भी प्राप्तव्य नहीं रहता।मतलब कि भगवान् की भाषा में युक्त योगी।
ऐसे ही योगी को भगवान् ने छठें अध्याय के अन्त में युक्ततम योगी कह दिया है,जो अनन्यपरायण होकर एकमात्र भगवद् आसक्त होकर अन्तरात्मा से श्रद्धा पूर्वक भगवान् को भजते हैं-

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मत:

वहीं षष्ठाध्याय के अष्टम श्लोक में भगवान् ने युक्त योगी या पूर्वोक्त सिद्ध योगी का वर्णन किया है।इसमें उसके चार विशेषण दिये गए हैं-

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चन:

इसमें प्रथम विशेषण ज्ञान विज्ञान से तृप्त आत्मा वाला कहा गया।ज्ञान का अर्थ एक मत के अनुसार परोक्ष ज्ञान से है, अर्थात् जो प्रत्यक्ष न होकर आचार्य या शास्त्रों द्वारा उपदिष्ट हो।इसी प्रकार विज्ञान का तात्पर्य अपरोक्ष ज्ञान से है, जो दैनन्दिन जीवन में अनुभव एवं क्रियान्वयन के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से बिना सन्देह और भ्रम के प्राप्त हो।
अन्य विचारकों के अनुसार, परमात्मा के निर्गुण निराकार तत्व के प्रभाव तथा माहात्म्य आदि के रहस्य सहित यथार्थ बोध को ज्ञान और उनके सगुण साकार तत्व के महत्व तथा गुणादि के रहस्य सहित यथार्थ बोध को विज्ञान कहते हैं।
वस्तुतः ये दोनों बातें एक ही परिभाषा की दो भाषास्वरूप हैं।क्योंकि निर्गुण ब्रह्म तथा अदृश्य जगत् का ज्ञान परोक्ष ही तो है और अवतार रूप सगुण ब्रह्म एवं दृश्यमान जगत् की प्रकृतिलीला का ज्ञान प्रत्यक्ष।
अतः जिनको परमात्मा के साकार निराकार दोनों तत्वों का भलीभाँति ज्ञान हो गया है और उनका अन्त:करण उनके प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप यथार्थ ज्ञान से सम्यक् तृप्त हो गया है, जिसके कारण उसे अब कुछ भी जानना शेष नहीं रहा, वही तो
“ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा” है।
भगवत्प्राप्त योगी के लक्षणों में”कूटस्थ” का समावेश भी बड़ा सार्थक है।सुनारों या लोहारों के यहाँ प्रयुक्त होने वाले लोहे के”अहरन” या ” निहाई ” को कूट कहते हैं।उस पर सोना-चाँदी या लोहादि धातुएं रखकर हथौड़े से कूटी जाती हैं।और कूटते समय उस पर बार-बार करारी चोट पड़ती है, फिर भी वह हिलता डुलता नहीं और बराबर एक स्थान पर एकरूप व अचल बना रहता है।इस तरह, जो व्यक्ति नाना प्रकार के हर्ष-सुख तथा दारुणदु:ख एवं भीषण कष्टों आ जाने पर भी अपने अन्त:करण में तनिक भी विकार उत्पन्न नहीं होने देता और सदासर्वदा अचल भाव से परमात्मा में ही स्थित रहता है, वही कूटस्थ है।
संसार के समस्त पदार्थों को मायामय एवं क्षणिक समझ लेने के कारण , युक्तयोगी की दशा ही ऐसी हो सकती है।वह किसी भी वस्तु में अनासक्त होने से संसार के सभी भोग्य पदार्थों के प्रति एक भाव वाला हो जाता है ,चाहे वह मिट्टी हो या सोना या और कोई अन्य। इसीलिए ऐसे युक्ततम योगी को “समलोष्टाश्मकाञ्चन” कहा गया है।

भगवान् स्वात्म में चित्त स्थिर करने की कृपा करें। जन्मजन्मान्तर से निरंतर प्रवहमान हम सब की चित्तवृत्ति का प्रवाह रुक सके ,और ” योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: “की पातञ्जलिक अञ्जलि-जल का पान हो सके।

।।हरिश्शरणम्।।

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कालेन आत्मनि विन्दति

श्रीमद्भगवद्गीता की उक्ति है, काल आ जाने पर स्वयं में आत्म लाभ हो जायेगा।
इन पंक्तियों को स्वामी विवेकानंद जी अपने अनेकानेक व्याख्यानों में बराबर दुहराते रहते थे। मकर सक्रांति, जो उनके जन्म के वर्षों में बारह जनवरी को पड़ती थी, उनका आविर्भाव काल था। और उनके शरीर धारण के अवसर ,वर्तमान मकर संक्रांति का काल जो 12 से 15 जनवरी पर खिसक कर आ चुका है,मन , उस आत्मज्ञ ,आत्मस्थ,सत्ता पर बारम्बार केन्द्रित हो जा रहा है।
वे कहते थे पाप और पुण्य का सारा द्वन्द्व ,अनेकत्व भावना के सृजन से है।अथवा बहुत्व के भाव से यह सब आ पहुंचा है।मनुष्य जितना एकत्व की ओर बढ़ता जाता है, उतना ही ” हम-तुम ” का भाव कम होता जाता है।हमसे यह पृथक् है, ऐसा भाव मन में उत्पन्न होने से ही अन्यान्य द्वन्द्वों का विकास होता है।परन्तु सम्पूर्ण एकत्व का अनुभव होते ही, मनुष्य का शोक या मोह नहीं रह जाता-

तत्र को मोह: को शोक: एकत्वम् अनुपश्यत:
सब प्रकार की दुर्बलता को ही पाप कहते हैं-Weakness is sin . इसीसे हिंसा एवं द्वेषादि जन्मते हैं ।हृदय में आत्मा सर्वदा प्रकाशमान है, किन्तु इस ओर कोई ध्यान नहीं देता।केवल इस जड़ शरीर, हड्डी तथा मांस के अद्भुत पिंजरे पर ही ध्यान रखकर ” मैं मैं ” करता है।यही देहाध्यास है, यही सारी दुर्बलताओं का मूल है, यही समस्त व्यवहार जगत् का मूल भी।इसके परे परमार्थ भाव है।
“जब तक “मै शरीर हूँ ” यह ज्ञान है तब तक ये सत्य हैं।परन्तु जब”मैं आत्मा हूँ ” यह अनुभव होता है, तब यह सब व्यवहार -सत्ता का मिथ्यात्व भान होता है।
लोक जिसे पाप कहता है, वह दुर्बलता का फल है।इस शरीर को”मैं” जानना-यह दुर्बलता का रूपान्तर है।जब “मैं आत्मा हूँ”इसी भाव पर मन स्थिर होगा,तब पाप और पुण्य ,धर्माधर्म के पार पहुंचा जा सकेगा। ” श्रीरामकृष्ण कहते थे, ” मैं ” के नाश में ही दु:ख का अन्त है।”
उन्होंने कहा -यह अहं या मिथ्या भाव कहाँ है ,कोई मुझे बताये? जो वस्तुतः स्वयं है ही नहीं उसका मरना और जीना कैसा?इस अहं रूप मिथ्या भाव से सभी मोहित- Hipnotised हैं।इस पिशाच से मुक्त होते ही,यह स्वप्नवद् दूर हो जाता है और दिखाई देता है कि आब्रह्मस्तम्ब सभी में एक ही आत्मा विराज रही है।इसीको जानना होगा, प्रत्यक्ष करना होगा।”
जितने भी साधन भजन हैं, वे सभी इस आवरण को दूर करने के निमित्त हैं।इसके हटने से ही ज्ञात होगा कि चित्सूर्य अपनी प्रभा से स्वयं ज्योतिमान् है।क्योंकि आत्मा ही एकमात्र स्वयं ज्योति है, स्वयं वेद्य है।
इसीलिये श्रुति कहती है-
” विज्ञातारम् अरे केन विजानीयात् ”
– बृहदारण्यक उपनिषद् 2/4/14

जो कुछ यह मनुष्य जानता है, वह मन की सहायता से, किन्तु मन तो जड़ वस्तु है।उसके पीछे शुद्ध आत्मा रहने के कारण मन का कार्य होता है।अतः मन के द्वारा उस आत्मा को कैसे जाना जा सकता है?
इससे तो लगता है कि मन या बुद्धि कोई भी शुद्धात्मा के पास नहीं पहुंच सकती।
ज्ञान की पहुंच यहीं तक है।परन्तु जब मन विकल्प रहित या वृत्तिहीन होता है, तभी मन का लोप होता है और तभी आत्मा प्रत्यक्ष होती है।इसी को श्रीमदाद्य शङ्कर ने ” अपरोक्षानुभूति” कहा है।

फिर प्रश्न ये उठा कि यदि मन ही अहं है, तो मन का लोप तो ” मैं ” कहाँ रहा?
इस पर स्वामी जी का उत्तर था-वह जो अवस्था है, यथार्थ में वही अहं का स्वरूप है।उस समय का जो ” अहं ” रहेगा वह सर्वभूतस्थ ,सर्वगत,सर्वान्तरात्मा होता है।घटाकाश टूटकर महाकाश का प्रकाश होता है।क्या घट टूटने पर उसके अन्दर के आकाश का विनाश होता है? नहीं।
इसी प्रकार छोटा “अहं” ,जिसे शरीर में बन्द समझा जाता है, फैल कर सर्वगत अहं या आत्मा रूप से प्रत्यक्ष हो जाता है।अतः मन मरा या रहा, इससे यथार्थ अहं या आत्मा का क्या।
इन्ही बातों को सहजता से समझाने के लिए अनेक शास्त्र लिखे गये हैं। ये सभी साधनमात्र हैं, साध्य तो वही आत्मा है।हम आपातमधुर स्वर्ण रजत और स्त्रियों के क्षणभंगुर सौन्दर्य से मोहित होकर इस देव दुर्लभ मनुष्य जन्म को कैसे खो रहे हैं।जबकि यह शरीर ही आत्मज्ञान का अद्वितीय साधन है-साधन धाम मोक्ष करि द्वारा। पाइ न जे परलोक सँवारा ।हे! महामाया यह भी आपका ही आश्चर्य जनक प्रभाव है ,कि आपने बड़े बड़े ज्ञानियों के भी चित्त को भ्रमित कर रखा है।अस्तु-
जब तुम्हारी कृपा करुणा का प्रसाद मिलेगा, तब हे महामाये विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषी , वह काल अवश्य ही आ जायेगा और कर्म-ज्ञान-भक्ति की योग संसिद्धि अवश्य ही हो जायेगी-

न हि ज्ञानेन सदृशं
पवित्रमिह विद्यते।
तत् स्वयं योगसंसिद्ध:
कालेनात्मनि विन्दति।।गीता-4/38।

।।हरिश्शरणम्।।

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