प्रणाम-चतुष्टय

मार्कण्डेयपुराण का पञ्चम अध्याय उत्तर चरित्र नाम से साधकों-भक्तों में प्रसिद्ध है।
उत्तर चरित्र के नाम की अन्वर्थता इस बात में भी प्रतीत होती है कि मानव-जीवन में प्राप्तव्य योग की उपलब्धि कैसे हो,क्योंकि यही जीवन जीवनान्त मुक्ति का द्वार है।
इसी मुक्ति की प्राप्ति को लक्षित करती हुई ऋषि-वाणी प्रवाहित होती है-

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

उक्त मन्त्र में सर्वव्यापी भगवान् की सर्वभूतव्याप्ता माया को कुल चार बार प्रणाम किया जा रहा है:-

1-नमस्तस्यै

2-नमस्तस्यै

3-नमस्तस्यै 

4-नमो नमः

इन चार प्रणामों में से तीन में एकरूप दिखाई पड़ता है- तस्यै नमः।
उस जगदम्बा को प्रणाम है और चतुर्थ में नमः नमः की आवृत्ति अर्थात् बारम्बार प्रणाम है।
यह तो उक्त मन्त्र का साधारण अर्थ है।
असाधारण और आध्यात्मिक अनुभूति वाले साधकों, महात्माओं ने इसे एक दूसरा अर्थ भी दिया है। वस्तुतः प्रथम नमस्तस्यै द्वारा भगवती के सक्षात् प्रत्यक्ष-गोचर स्थूल स्वरूप या स्थूल मूर्ति को प्रणाम निवेदन है और यह स्थूल प्रणति भी इस मानवीय शरीर के चर्म-चक्षु-गत अन्नमय शरीर द्वारा होता है। आत्माधार यह शरीर ही प्राथमिक दृष्टि से मूर्ति या भगवद्विग्रह को आधार बनाकर स्वयं की श्रद्धा को उपपादित करता है।
स्वामी विवेकानन्द जी ने भी यह बात स्वीकारी है कि उन्हें आधार और साधन युक्त साधना में प्रवृत्त करनेवाले उनके गुरु न मिले होते तो वे जीवन का चरम न जान पाते।  निःसन्देह इस त्रिगुणात्मक शरीर को साधना के परम में पहुँचाने के लिए प्रथमतया स्थूल आधार की सहायता चाहिए , जो माता के स्थूल विग्रह द्वारा और स्थूल मुद्रादि के प्रकटीकरण पूर्वक ही सम्भव है।  इस प्रकार यह प्रथम प्रणाम स्थूल द्वारा, स्थूल का कायिक-वाचिक रूप में होता है।  ध्यान रहे कि इसी प्रथम चरण के प्रणाम से साधक को सालोक्य मुक्ति भी मिल सकती है।
द्वितीय नमस्तस्यै द्वारा वैज्ञानिक भाषा में हम स्थूल से सूक्ष्म की ओर अग्रसर होते ।त्रिविध शरीर का दूसरा सूक्ष्म भाग ही सूक्ष्म शरीर है। इसमें साधक की पञ्च-ज्ञानेन्द्रियाँ , मन -बुद्धि चित्ताहंकार भी आ जाता है। स्थूल शरीर का कारण रूप यही सूक्ष्म शरीर है ,जिससे पुनः -पुनः यह जीवात्मा स्थूल शरीरों को धारण करता रहता है।
अतः द्वितीय नमस्तस्यै का स्वारस्य सूक्ष्म शरीर के प्राणमय और मनोमय तत्वों के द्वारा जगन्माता के प्रणाम में विहित होता है। इसके द्वारा समीप्य – मुक्ति भी सम्भव हो जाती है।
अब तृतीय नमस्तस्यै पर विचारने पर इस सूक्ष्म शरीर का भी मूल कारण ,कारण शरीर प्रतीत होता है। इस कारण शरीर द्वारा भी श्रीमाता को प्रणाम निवेदित होता है। इसका रहस्य गत विज्ञानमय जीवात्मा स्थिर होता है। यह विज्ञान मय शरीर रुप जीवात्मा ही परमात्मा का चिदंश है। इसके द्वारा तद्बुद्धिगत भाव में प्रणाम निवेदन के द्वारा सारूप्य-मुक्ति की सम्भावना होती है।
अब चतुर्थ प्रणाम नमो नमः को विचारें तो यह कारणातीत शरीर का प्रणाम सिद्ध होता है।क्योंकि कारण का कारण तो कारणातीत ही स्वतः सिद्ध है। सर्वकारणकारण में तो एकत्व ही सिद्ध हो जाता है ,उसे शक्ति या शिव के रूप में पृथक् करके नहीं देखा जा सकता है।और शास्त्रकार यहीं शिवाशिवयोरभेदः की बात स्वीकारते दीखते हैं।
अतःयह चतुर्थ नमो नमः का प्रणाम भी तुरीय शुद्ध-बुद्ध ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयस्वरूप सिद्ध होता दीखता है ,जहाँ नमस्तस्यै या नमस्तस्मै नहीं, वरन् केवल नमो नमः बन गया है। इस अन्तिम तुरीय चतुर्थ प्रणाम की परिणति परम आनन्दमयशरीर के लिए सर्वलयगत सायुज्य मुक्ति में है।
इस प्रकार जगन्माता के स्थूल, सूक्ष्म ,कारण और कारणातीत स्वरूप प्रणामों की शृंखला अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड जननी को समर्पित है, जिसके भृकुटि विलास में सृष्टि और लय समाहित है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2018/11/07/प्रणाम-चतुष्टय/

भगवद् रति

संसार के तमाम झंझावातों में चतुरस्र घिरा हुआ मानव कभी -कभी बहुत दुःखी हो जाता है।वह ऐसे विह्वल क्षणों में बार -बार अपने प्रारब्ध या पूर्वजन्म कृत दुष्कृतों का स्मरण करता है, जो उसे वर्तमान में ऐसी विकट परिस्थिति में डाल रखे हैं।
ऐसी परिस्थिति में सन्तों महात्माओं का एक सूत्र वाक्य स्मरण होना स्वाभाविक है-

दुःखे तु क्षीयते पापः।
सुखे पुण्यः प्रणश्यति।।

मतलब कि दुःख की विद्यमान घड़ी में ऐसा समझना चाहिए कि पाप नष्ट हो रहा है और सुखानुभूति काल में पुराकृत पुण्य का नाश हो रहा है।इस सनातन सत्य पर विचारते हुए यह भी अनुभव होना चाहिए कि यह मानव शरीर ही ऐसा है जो बार-बार के जन्म-मृत्यु के पाश से मुक्त करने का एकमात्र साधनोपाय है-

साधन धाम मोक्ष करि द्वारा।
पाइ न जे परलोक सँवारा।।

सारी विभीषिकाओं और झंझावातों में कर्मानुसार बारम्बार जन्मते और मरते हुए एक ऐसा अन्तिम सुखालब्धी प्रारब्ध बन जाता है, जिससे भगवान् की माया से रचित संसार की असारता का ज्ञान होने लगता है। और इसी कारण समग्र अनेक जन्मो के समूहीभूत पुण्य प्रसाद स्वरूप भगवच्चराणविन्दों में स्वतः प्रीति उत्पन्न होती है। यह भगवच्चराणविन्दों की रति प्रीति और प्रेम ही उनकी अविद्या माया के क्लेश को काटनेवाली और साक्षाद् आनन्दातिरेक का एकमेवाधार है-

माम् एव ये प्रपद्यन्ते।
मायाम् एतां तरन्ति ते।।

और
कलिपावनावतार बाबा तुलसीदास का आत्मज्ञान रसमय हो जाता है-

वेद पुरान सन्त मत एहू।
सकल सुकृत फल राम सनेहू।।

भगवान् सच्चिदानन्द कृपा करें।

।।हरिश्शरणम्।।

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मानापमानयोः तुल्यः

गीता के चतुर्दश अध्याय के पचीसवें मन्त्र में भगवान् ने एक कठिन बात बड़ी सरलता से कही है, जिसका पालन करना अत्यन्त दुरूह है।उन्होंने कहा कि मनुष्य को मान और अपमान दोनों ही दशाओं में समान भाव से रहना चाहिए। लेकिन ऐसा प्रायः होता नहीं और मान- प्रतिष्ठा-बड़ाई होने पर मन में होता है कि हम तो इसके योग्य हैं, मुझे तो यह मिलना ही चाहिए था।अथवा हम इससे भी कहीं अधिक सम्मान के पात्र हैं, मुझे तो कम ही मिला।इसके विपरीत होन की दशा भी विचित्र है।

अपमान होने की स्थिति में सामर्थ्य वश प्रतीकार या स्वयं के शरीरादि को त्यागने तक की मनःस्थिति बन जाती है।
एक अनुकूल दशा है तो दूसरी प्रतिकूल,जिसे हमारे पूर्वज ऋषियों ने सुख और दुःख नाम दिया है। इस सम्मानजनित सुख की अवस्था से ऊपर भी एक सुखानुभूति है जिसे प्रतिष्ठा अथवा यश-कीर्ति से अभिहित किया गया है। मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में वस्तुतः आधार-आधेय सम्बन्ध है।
सन्तशिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास इस लोकप्रतिष्ठा को हेय मानते हुए,उससे सावधान करते हैं-

सुत वित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।।

मतलब कि तीन मानवीय एषणाएँ हैं-सुतेषणा,वित्तेषणा और लोकेषणा।

गहन विचार करने पर यह भी प्रतीत होता है कि अन्तिम एषणा या कामना रहने पर अन्य दो तो अवश्य ही आ जायेंगी।क्योंकि लोकप्रतिष्ठा होने पर प्रचुर वित्त और पुत्रादि रूप में ,चाहे शिष्य-प्रशिष्य और सेवकादि ही क्यों न हों,अवश्य जुड़ जाते हैं।इस प्रकार एक ,मानजनित कारण से लोकेषणा तथा अन्य सुतवित्तादि स्वतः उपस्थित हो जाते हैं।
अब बात यह भी विचारने की है कि इस मान-सम्मान और लोकप्रतिष्ठा से होने वाली आनन्दानुभूति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही जाती है। अब यह भी सत्य है कि इससे अहंकार का परिपोषण होने लगता है।यह अहंकार-अहंभाव या व्यर्थ का मिथ्याभिमान मनुष्य को पतन के गर्त में डाल कर तिर्यग् योनियों में भटकाता रहता है। और इस अहंभाव का मूलकारण प्रकृति के रजोगुण और तमोगुण तो ही हैं।
यही अहम् और मम(मैं-मेरा) का भाव बार-बार संसार जनक बनता है।
इसीलिये गोस्वामी जी “बड़े भाग मानुष तन पावा” और ” पाइ न जे परलोक सुधारा” की बात करते हुए मानवशरीर की दुर्लभता सिद्ध करके एक प्रसंग में इस मानापमान से ऊपर होने का सर्वोत्तम और सत्य उपाय बताते हैं-

गुन तुम्हार समुझहिं निज दोषा।
जेहिं सब भाँति तुम्हात भरोसा।।

इसमें भक्त भगवान से कहता है कि, हे भगवान्! मुझमें जो कुछ भी गुण है, वह तो आपका ही है और अवगुण हमारा।
मायिक पर्दे के कारण हम वास्तविक स्थिति और स्वस्वरूप को जान नहीं पाते।
इसी मानापमान में उलझ कर नीचे गिर जाते हैं।

” क्वचिदन्यतोपि” की सरणि में मेरे द्वारा सन्त मुख से यह भी सुना गया है कि मान-सम्मान से पुण्य क्षय होता है और अपमान से पापक्षय। अब संसार में कौन होगा जो पुण्य क्षय करना चाहेगा?
अतः मानापमान के संसारभाव से ऊपर उठकर ,सारे सद्गुणों को ईश्वरीय मानते हुए सम्मान प्राप्ति की दशा में उस परम पिता के प्रति कृतज्ञ होना ही सबसे उत्तम आनन्द का मूल है।

और इसी कारण गीता के द्वादश अध्याय में पहले ही भगवान् ने अर्जुन को लक्ष्य कर सारी मानवजाति को निन्दा और स्तुति के समय समान भाव में रहने का अमूल्य उपदेश दिया है-

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी।
सन्तुष्टो येन केनचित्।।

अतः समस्त मानव जाति हेतु इस सरल सी बात पर बुद्धि दृढ होनी चाहिए कि सारे गुणगण भगवान् के और अवगुण हमारे।
तभी यह जन्म सार्थक सिद्ध हो सकता है।
श्रीअनन्तानन्त श्रीभगवान् कृपा करें।

।। हरिश्शरणम्।।

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भगवत् कृपा

राम भजत सोइ मुक्ति गोसाईं।
अन इच्छित आवै बरिआईं।।

राम नाम रटते रटते जीवन के विषादों से मुक्ति मिलती है।
दूसरी पंक्ति का अर्थ बड़ा विचित्र है-

अन इच्छित अर्थात् जिसकी कभी इच्छा या कल्पना नहीं हुई, ऐसी लौकिक या पारलौकिक कामनाएं भी अकस्मात् पूरी हो जाती हैं।
यह कामनाएं सिद्धियों के रूप में प्रकट हो जाती हैं। यानी कि व्यक्ति सिद्ध भावापन्न हो जाता है।
और यह सारा कुछ सब कुछ राम नाम को जिह्वा पर धारण करने पर होता है।

क्योंकि नाम और नामी में कोई भेद नहीं ।
हम जिस व्यक्ति का नाम लेकर उसे पुकारते हैं, वही व्यक्ति उस नाम से उपस्थित होता है।
तब राम नाम लेने पर राम क्यों नहीं आयेंगे।इसमें कोई सन्देह नहीं है ,वे अवश्य आयेंगे।
और एक बात और होगी ,वह ये कि
बुद्धिमतां वरेण्य हनुमानजी महाराज भी स्वतः प्रकट रहेंगे।
क्योंकि जहाँ-जहाँ श्रीरामजी का स्मरण होगा, वहाँ-वहाँ भक्तराज शिवावतार भी रहेंगे। और नामजापक तो लोकालोक सिद्धियों को पा लेगा।

क्योंकि ये ” यत्र-यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र-तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम् ” जो हैं।
अतः – अन इच्छित आवै बरिआईं।

भगवान् कृपा करें कि उनकी विस्मृति क्षण मात्र के लिए भी न हो।

।।हरिश्शरणम् ।।

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अतीत-नित्य-चित्

भगवान् अतीत, नित्य और चिन्मात्र हैं। अतीत का मतलब आत्यन्तिक रूप से इत यानी कि गत। अर्थात् शब्दातीत,स्पर्शातीत
रूपातीत,रसातीत और गन्धातीत। इसीलिये गीताशास्त्र में वे कहते हैं कि मैं विषयातीत हूँ। मुझमें संसार तो है लेकिन मैं संसार में नहीं हूँ।
श्रुति कहती है कि मन और वाणी जहाँ ,जीव को पहुँचा कर लौट आते हैं ,ऐसे परब्रह्म के आनन्द को जान लेने वाला, निर्भय हो जाता है-

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।
आनन्दं ब्रह्मणः विद् वान् न विभेति कदाचन- तैत्तिरीय उपनिषद् ।

अब इस ऋषि वाणी का मतलब यह निकला कि संसार भयंकर और परमात्मा अभयंकर। संसार के सारे सुख-दुःखादि द्वन्द्व, भयमूलक हैं ,जिनसे मुक्ति का एक मात्र उपाय “द्वन्द्वातीतो द्वयातिगः” की शरण ग्रहण ही है।
अब मुक्ति का सन्दर्भ बन्धन से और भय का सम्बन्ध अभय से है। कहीं से बँधा है,अतः मुक्ति और भय है तो अभयता साकांक्ष हो जाती है।
बन्धन-मुक्ति और भयाभय की जन्म जन्मान्तर प्रवृत्ति का प्रवाह चलता रहता है।लेकिन मन की वृत्ति मायिक होने से वही कहानी दोहराई जाती है-

सो माया बस भयौ गोसाईं।
बन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं।।
और इसीलिये किसी ने यह भी कह दिया-
माया तू ठगिनी हम जानी।

लेकिन हम हैं कि ठगिनी को पहचान कर भी उसी में फँसे हुए हैं।
यह माया तो सर्वकारणकारण,जगद् के आधार, जगन्नियन्ता परम प्रभु की ही है।इसी से ये मायाधीश और हम अकिंचन जीव , मायाधीन।

हम माया के अधीन जीव जब तक परिणामी जगत् में आनंद खोजते हैं, तब तक शरीरान्तर भटकाव में ही रहते हैं।

इस भटकाव से बचने और नित्य आनंद की प्राप्ति के लिए हम भक्ति-स्तोत्र साहित्य एवं नाम-जपादि का आश्रय लेते हैं। और यह सब कुछ शब्द स्वरुप है।
इस शब्द की साधना ऐसे रूपारूप अर्थ में जाकर समाप्त होती है, जहाँ सब का विलय हो जाता है। तत्वतः शब्द से शब्दातीत की अवस्था। और यही अवस्थान है आनंद का ।
सृष्टि का अनुक्रम भी ऐसा ही है, जहाँ उस परमात्मा से आकाश और आकाश से शब्द तत्व उपजता है।लेकिन आनन्द के लिए शब्दातीत अथवा अर्थ की अपरिमित अवस्था की अनुभूति ही अनिवार्य है।
अतः शब्द साधन का चरम, अशब्द में लय है।
आकाश शरीर वाले परमात्मा और उनके गुणस्वरूप शब्द के अनुकम्प से वायु तत्व का सृजन है जो अस्थिचर्ममय देह में त्वचा द्वारा अनुभूयमान होता हुआ सम्पूर्ण शरीर में जीवनी शक्ति प्राण है।
इसी प्राण वायु रूप के प्रकारान्तर अन्य अपान, समान ,व्यान और उदान हैं, जिनसे शरीर व्यवस्थित बना रहता है। किन्तु इससे भी अतीत जाना होगा, क्योंकि प्राणाधार तो एकमेवाद्वितीय ही है।

आगे की मीमांसा में नेत्रेन्द्रिय से अग्राह्य क्रमशः आकाश और वायु द्वारा अग्नि की सृष्टि होती है,जो प्रत्यक्ष दृष्ट ” रूप ” है।

लेकिन इस रूप तत्व की साधना भी पूर्व की तरह रूपातीत को चरम बनाती है।
क्रमिक रूप से चलती यह सृजन यात्रा निराकार आकाश- वायु और साकार अग्नि से जल तत्व पर पहुँचती है ,जो शरीर में रस रूप में रसनेन्द्रिय द्वारा ग्राह्य है।और इसके भी पार” रसो वै सः ” की अनुभूति इसका परिणाम है।
अनन्तर की अन्तिम यात्रा का क्रमिक विकास, आकाश-वायु-अग्नि और जल से पृथ्वी तत्व पर आता है ,जो शरीर में गन्ध गुणस्वरूप में प्रतिष्ठित है, जहाँ कि इससे भी अतीत यानी कि गन्धातीत स्थिति की प्राप्ति ही गन्धोपासना का लक्ष्य है।
इस प्रकार शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध के परं पार होने पर अतीत, नित्य, चिन्मात्र आनन्दकारी सत्ता की प्राप्ति अपनी आत्मा में ही अनुभूत है, अन्यत्र नहीं।

जो आनंद सिन्धु सुखरासी।
सीकर ते त्रैलोक सुपासी।।
सो सुखधाम राम अस नामा।
अखिल लोक दायक विश्रामा।।

।।हरिश्शरणम्।।

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भक्ति भक्त स्वरूप

अनेक स्थलों पर भक्ति की चर्चा आती है और भगवान् ने तो भक्त के ही चार स्वरूप बता दिया है-चतुर्विधा मां भजन्ते जना: सुकृतिनोर्जुन।आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।
आर्त,जिज्ञासु ,अर्थ को चाहने वाले और ज्ञानी ये चार प्रकार के मेरे भक्त हैं जिनमें ज्ञानी भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है(तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त: एकभक्तिर्विशिष्यते।प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रिय:)अनन्य प्रेम वाला ज्ञानी भक्त मुझमें एकीभाव से स्थित है, क्योंकि वह तत्व दर्शी मुझसे प्रेम करता है और मैं उससे।
आगे कहते हैं-उदारा:सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थित: स हि युक्तात्मा मामे-
वानुत्तमां गतिम्।।
सभी भक्त उदार तो हैं, किन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा ही
स्वरूप है।वह उत्तम गतिस्वरुप
मुझमें अच्छी प्रकार स्थित है।
अन्त मे इस प्रकरण का संहरण करते हुए और भी स्पष्ट कर दिया-
बहूनां जन्मनामन्ते
ज्ञानवान्मां प्रपद्यते
वासुदेव:सर्वमिति
स महात्मा सुदुर्लभः।।
बहुत जन्मो को धारण करते हुए
अन्त मे तत्वज्ञ पुरष ही सब कुछ मुझे ही मानने वाला महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।
।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/07/11/भक्ति-भक्त-स्वरूप-2/

भक्ति और ज्ञान में अभेद

भक्ति शब्द सेवार्थक है ,तो ज्ञान का सम्बन्ध बुद्धि-विवेक से। दोनों एक दूसरे के परिपूरक और एकत्व विधायक भी।
श्रीमदाद्य भगवत्पाद आचार्य शङ्कर ,जब भक्ति का मतलब आत्मस्वरूप के परिज्ञान से करते हैं, तब भक्ति और ज्ञान एक दूसरे से अभिन्न प्रतीत होते हैं।
नारद भक्तिसूत्र में चर्चा है कि” भक्ति को किसी भी वासना की पूर्ति का साधन नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि वह तो सारी वासनाओं के निरोध का कारणस्वरूप है।”
“सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्।”
और सेवार्थक भज् धातु इस बात को भी निश्चित करती है कि, जब सेवक की अपने सेव्य के प्रति समस्त क्रियाएँ समर्पित हों जायें तथा और उसके विस्मरण से व्याकुलता उत्पन्न हो जाय, तभी भक्ति का उदय समझे।
“नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता तद् विस्मरणे परमव्याकुलितेति।”
तब इस प्रकार स्वकीय ज्ञान का पर्यवसान अपने सेव्य में होना ही भक्ति का स्वरूप निश्चित होने से ज्ञान एवं भक्ति में एकत्व सिद्ध होता है।
कलिपावनावनावतार गोस्वामीजी भी भक्ति और ज्ञान में अभेद मानते हुए दोनों के द्वारा भवमुक्ति स्वीकारते हैं-

भगतिहिं ज्ञानिहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भवसम्भव खेदा ।।

और भक्ति-ज्ञान की अखण्ड परिपूत अवस्था में भक्त तुलसी अपने आराध्य में
कैसे रससिक्त हैं।वे कहते हैं-

रामचरित जे सुनत अघाहीं।
रसविशेष जाना तिन नाहीं।।
वे कहते हैं “ज्ञान “तो एकमात्र मेरे प्रभु श्रीराम हैं और जीव माया के वशीभूत।
ज्ञान अखण्ड एक सीतावर।
मायावस्य जीव सचराचर।।

माया के द्वारा रचित सारे भेदाभेद यद्यपि व्यर्थ हैं, किन्तु बिना हरिसेवा के यह मायिक भेद जा भी नहीं सकता।
मुधा भेद यद्यपि कृत माया।
बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया ।।
भगवान् स्वयं अपने श्रीमुख से कहते हैं-
भगतिवन्त अति नीचउ प्रानी।
मोहिं प्रान प्रिय अस मम बानी।।
मतलब कि निम्न कुल और कर्मादि वाला प्राणी भी यदि मेरी भक्ति में प्रीति में एक निष्ठ हो ,तो वह मेरा अतिप्रिय है।
इसीलिये भगवान् ने गीता में एक बात कही है-
अपि चेत् सुदुराचारो,
भजते मामन्यभाक्।
साघुरेव स मन्तव्यः,
सम्यग् व्यवसितो हि सः।।

तात्पर्यतः ज्ञान स्वरूप परमात्मा में किन्हीं कारणों से जिस किसी ने भी आत्मस्वरूप को जान लिया है, वह अनन्यपरायण व्यक्ति जन्मजन्मान्तर के प्रारब्ध को छिन्न करके मुक्त हो जाता है।
यही भक्ति (सेवा)और ज्ञान(परमात्मा) के ऐक्य का परम रहस्य है।
अतः श्रद्धा -भक्ति और सदाचार पूर्वक अवतार-चरित्रों में सञ्जीवनी मानते हुए कलि के एकमेवाद्वितीय धर्म श्रीरामकृष्ण के नामजप का आश्रयण विश्वास पूर्वक
करना चाहिए-
बिनु विश्वास भगति नहिं,
तेहिं बिनु द्रवहिं न राम।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ,
जीव न लह विश्राम।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/06/21/भक्ति-और-ज्ञान-में-अभेद/

जड चैतन्यव्यतिरेक कैसे हो

अब प्रश्न है कि जड चैतन्यव्यतिरेक कैसे हो?
अथवा इन गुणों से पार कैसे पाया जाय?

उत्तर साफ है कि इसमें सर्वप्रथम भगवत् कृपा ही मूल कारण है, जिससे आत्मजिज्ञासा और सद्गुरु का मिलन प्राप्त होता है।सद्गुरु गुणों से पार जाने का साधन, युक्ति, उपाय बताते हैं।तब साधक उसके अनुकूल साधन करके अविद्या को पार कर सकता है।वेदान्त ग्रन्थों मे अविद्यासे पार पाने या गुणों के चक्कर से छूटने के लिये व्यवस्था दी गई है-

“वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणान् यच्छेन्द्रियाणि च।आत्मानमात्मना यच्छ न भूयः कल्पसेध्वने:।”वाचं नियच्छात्मनि तं नियच्छ,बुद्धौ धियं यच्छ च बुद्धि-साक्षिणि।तं चापि पूर्णात्मनि निर्विकल्पे,विलोप्य शान्तिं परमां भजस्व।”

अर्थात् वाणी को स्वतंत्रता से रोक कर,मन मे लय करे ।मन को संकल्प विकल्प से हटा कर बुद्धि मे लय करे।बुद्धि को साक्षी आत्मा मे लय करे।आत्मा को पूर्ण चैतन्य मे लय करके शान्त हो जाय।

ओ3म् शान्ति:शान्ति:शान्ति:।

यही बात सर्वोत्कृष्ट उपदेष्टा भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रकारान्तर से सरलीकृत, समूहालम्बीकृत करके इस सन्दर्भ पर पूर्ण विराम लगा दिया कि सर्वथा मत्परायण होकर ही मायापारगम्यता सम्भव है-

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।

|| हरिश्शरणम् ||

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जगत् प्रकाश्य प्रकाशक रामू

यह जगत् प्रकाश्य है और इसके प्रकाशक श्रीराम हैं। कलिपावनावनावतार गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री राम को परमात्मरूप में चित्रित किया है। इसलिए वे उक्त बात कहते हैं कि यह संसार इन्हीं भगवान् के द्वारा प्रकाशित हो रहा है।
परमात्मा स्वयं प्रकाश स्वरूप है, जिनके प्रकाश से संसार प्रकाशित है।
और मनुष्य शरीर में इसी तरह आत्मा भी है,जिससे समग्र शरीर प्रकाशित है।
बात केवल अनुभव की है, कि हम इस प्रकाश का कितना ,कैसे और किस रुप में अनुभव करते हैं।
क्योंकि अनुभव (Perception) ही किसी भी अस्तित्व का अद्वितीय प्रमाण है। यह अनुभूति स्वयं ज्योति या स्वयं प्रकाश है। किसी भी इन्द्रियातीत ज्ञान से परे जाने के लिए इसी प्रकाशरूप आत्मा की आवश्यकता होती है।
यह अनुभूति ,अस्तित्व, भाव सभी एकार्थक सिद्ध हैं।क्योंकि सभी में पृथक् प्रत्यय अवश्य लगे हैं, कि धातु सभी में एक है, जिसका अर्थ सत्तात्मक है। आत्मा का अर्थ है आत्मीयते ,अर्थात् जो सबका मानदण्ड या प्रमाण हो।किन्तु उसका कोई प्रमाण नहीं हो।
इस प्रकार शरीर है तो उसमें और उससे अनेक अनुभव क्रियाएँ भी हैं। कोई अनुभव क्रिया संज्ञाविहीन नहीं है।प्रत्येक अनुभूति क्रिया का स्वरूप ही संज्ञात्मक है।और उपर्युक्त धात्विज अर्थ के अनुसार जब सत्ता और अनुभव एक वस्तु है तथा जिसका कोई कारण नहीं है, वही अनन्त है।इसीलिये अनुभूति स्वयमेव अपना चरम प्रमाण और अनन्तस्वरूप है।
अनुभूति,अस्तित्व या भाव जब स्वसंवेद्य है ,तब यह स्वयं ज्ञाता स्वरूप है।
यह स्वयं ज्ञातृत्व मन का धर्म नहीं, किन्तु इसके रहने से मन रहता है।यही एकमेव अनुभूति ही स्वप्रकाश रूप आत्मा है।और यह आत्मा है परमात्मा का अंश।इसीलिये वेद में –द्वासुपर्णा सयुजा सखाया..इत्यादि के द्वारा जीवात्मा को प्रारब्धवश भोगी और परमात्मा को आनन्दमात्र स्वरूप चित् सिद्ध किया है।
वास्तव में एकमेवाद्वितीय आत्मा ही अनेक शरीर गामी जीवात्मा पद वाच्य है, जहाँ पंचप्राण एकीभूत हैं और उसका नियामक आत्मा ही है। यही जीवात्मा परमात्मा है। अन्य को अन्य समझना भ्रमादि वश है,जो मायिक है।
यह अनुभूति ,भाव ,स्वयं ज्योति ही केवल मायिक नहीं अतः यही अमायिक राम हैं।इन्हें आत्मा में ही उपासित किया जा सकता है और केवल आत्मोपासना से ही मुक्ति प्रकट होगी।इसीलिये आदि शङ्कर ने अपने आत्म स्वरूप के आन्तरिक अनुसन्धान को भक्ति कहा-
“स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते”
और इसलिये एक सुन्दर सा दोहा इस समस्त विचार को समेटता है-

कस्तूरी कुण्डल बसै ,मृग ढूँढै बन माहिं।
ऐसे घट-घट राम हैं ,दुनिया दखै नाहिं।।

बालकाण्ड में भगवान् शिव ,माता पार्वती से उनके प्रश्न के उत्तर में इन्ही अनुभव ही एकमात्र प्रमाणवाले श्रीराम को बताते हैं-

विषय करन सुर जीव समेता।
सकल एक ते एक सचेता।।
सब कर परम प्रकाशक जोई।
राम अनादि अवध पति सोई।।

अर्थात् शब्द,स्पर्श, रूपादि विषयों का प्रकाश इन्द्रियों द्वारा होता है और इन्द्रियों का प्रकाशन तत् तत् स्थानीय देवों द्वारा।
क्योंकि-
इन्द्री द्वार झरोखे नाना।
जहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।।
सभी पञ्च ज्ञानेन्द्रियों और छठवें मन आदि सभी में तत्तत् स्थानिक देवों का निवास है। और इन ऐन्द्रिक देवों का भी प्रकाशक जीवात्मा स्वयं है।इस तरह ये विषय, इन्द्रियाँ, तद्गत देवता गण और जीवात्मा सभी क्रमशः एक की सहायता से एक चिद्रूप होते हैं।
इन सभी का जो प्रकाशक है,वह “परम” अर्थात् परमात्मा है, जो परमात्मा और कोई नहीं प्रत्युत अनादि अनन्त अयोध्या के नरेश भगवान् श्री राम हैं।

अब कहते हैं-

जगत् प्रकाश्य प्रकाशक रामू।
मायाधीश ग्यान गुन धामू।।
जासु सत्यता ते जड़ माया।
भास सत्य इव मोह सहाया।।

मतलब कि इस प्रकाश्य जगत् के प्रकाशक मायाधीश स्वयं भगवान् श्रीराम हैं।ये ज्ञान और गुणों के धाम हैं।इन्हीं की आंशिक आत्मा रूप सत्ता, अस्तित्व, भाव, भावना, अनुभूति,और स्वयं ज्योति की सहायता पाकर मोह(अज्ञान)वश माया भी सत्य जैसी दीख रही है।
क्योंकि-

रजत सीप महुँ भास जिमि,
यथा भानु कर वारि।
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ,
भ्रम न सकै कोउ टारि।।

जैसे सीप में चाँदी और सूर्य की किरणों में जल की प्रतीति होती है, यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालों में असत्य है, फिर भी इस भ्रम को कोई हटा नहीं पाता।
और इसलिये-

जो आनंद सिन्धु सुखराशी।
सीकर तें त्रैलोक सुपासी।
सो सुख धाम राम अस नामा।
अखिल लोक दायक विश्रामा।।

आनन्द के सागर ,सुख की राशि और जिनके सीकर (एक जलकण) मात्र से तीनों लोकों का पोषण होता है, ऐसे ब्रह्माण्ड के चरम विश्राम स्थान श्री राम की स्वयं प्रकाश रूप में स्वात्मा में अनुभूति ही वरेण्य है। अनन्त जन्मो से भटके और नाना शरीरों में अटके इस मन को उन्हीं प्रभु चरणों में डालना होगा तभी एकाश्रित होकर यह आत्मदेव के रूप में उनके दर्शन का साधन हो पायेगा। भगवान् सहायता करें।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandrablog.wordpress.com/2018/05/27/जगत्-प्रकाश्य-प्रकाशक-रा/

यक्ष – युधिष्ठिर संवाद

का वार्ता किमाश्चर्यं कः पन्थाः कश्च मोदते।
इति मे चतुरः प्रश्नान् पूरयित्वा जलं पिब ।।

सबसे बड़ी बात क्या है?
सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
संसार में चलने का मार्ग क्या है?
संसार में कौन आनन्दित होता है?

1-मासर्तु वर्षाःपरिवर्तनेन
सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन।
अस्मिन् महामोहमये कटाहे
भूतानि कालः पचतीति वार्ता।।

इस संसार रूपी महा मोहमय कड़ाही में मास,वर्ष आदि ऋतुओं के परिवर्तन से, सूर्यरूप अग्नि के ईंधन से रात्रिऔर दिन का काल प्राणियों को पकाता है।इस बात का अहसास मनुष्य को नहीं होता, यही सबसे बड़ी बात है।

2-अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम्
शेषाः जीवितुमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतःपरम् ।।

प्रतिदिन प्राणी संसार को त्याग कर यमलोक सिधार रहे हैं।इसे देखने के बाद भी अन्य लोग जीने की इच्छा पाल कर सोचते हैं, हम ऐसे ही रहेंगे।इससे बड़ा आश्चर्य क्या है?

3-श्रुतयो विभिन्ना स्मृतयो विभिन्नाः
नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् ।
धर्मस्य तत्वं नहितं गुहायां
महाजनो येन गतः स पन्थाः।।

श्रुतियाँ अनेक ,स्मृतियाँ भी अनेक हैं।कोई
एक भी ऐसे ऋषि नहीं हैं, जिनका ही केवल एक वचन प्रमाण रूप माना जा सके।और धर्म का तत्व भी बड़ा गूढ़ है।अतः श्रेष्ठ जन जिस मार्ग पर चले हैं, वही मार्ग ग्रहण करना चाहिए।

4-दिवसस्याष्टमे भागे शाकं पचति स्वे गृहे।
अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते।।

हे जलचर प्राणी! दिन के आठवें भाग यानी कि सुबह शाम जो अपने घर में शाक आदि पूर्ण अन्न भोजन करता है।साथ ही जिस पर कोई ऋण न हो और जिसे जीविका वश अन्यत्र प्रवास नहीं करना पड़ता, वही इस संसार का सबसे सुखी प्राणी है।

।।हरिश्शरणम्।।

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