साधु समाज प्रयाग

अकारण वरुणा के मूर्त विग्रह स­­­न्त सद्गुरु का सामीप्य और उनकी कृपा जब किसी जीव पर बरसती है, तो वह धन्य-धन्य हो जाता है । इतिहास-पुराण इस बात का साक्षी है कि पापनिष्ठ “अजामिल” पर कृतज्ञता प्रकाशित करने के लिए सन्त-महात्माओं ने उसकी पत्नी की गर्भस्थ संतति का नाम ही “नारायण” निर्धारित कर दिया और इसी पुत्र नाम के उच्चारण के बहाने से बारंबार नारायण-नारायण रटती हुई उस दुराचारी की रसना सार्थक हुई और “अजा” (माया) से मिला वह “अजा” से अमिल (विहीन) होकर सद्गति को प्राप्त हो गया । श्री राम कथा के एक प्रसंग में जगदंबा श्री जानकी जी के प्रति अपराध बनने से व्यथित इन्द्रपुत्र “जयन्त” भगवान श्री राम के तृणमय बाणों से बचने के लिए जब तीनों लोकों में शरण नहीं पाता तब नामनिष्ठ कोमलचित महात्मा नारद जी की अकारण कृपा दृष्टि का पात्र बनकर माता की अनन्य शरणागति से सन्तकृपा द्वारा ही प्राणों की रक्षा कर पाता है ।

असम्भव को सम्भव करने का यह सारा श्रेय उन “पर दुख-दुखी संत सुपुनीता” सन्त महात्माओं का ही है । निश्चित रूप से, भगवत्प्राप्त विशुद्धहृदय साधु सन्तों का दुर्लभ-दर्शन भगवान की कृपा का फल है अथवा यह कहें कि भगवान जिस किसी जीव पर कृपा करना चाहते हैं, उसके लिए अपने भक्तों को ही माध्यम बनाते हैं, जिससे वह सदा-सदा के लिए मायिक बन्धनों से मुक्त हो जाता है देखिये – 


राम राज बैठे त्रैलोका । हरषित भये गये सब शोका ।
बयरु न कर काहू सन कोई, राम प्रताप बिषमता खोई ।।

इन सारी पंक्तियों का एक आशय यह भी है कि जिस किसी नाम-रूप-लीला-धाम निष्ठ महात्मा की चित्तवृत्ति में अविस्मृत रूप में भगवान् बैठ जाते हैं, वही वीतशोक होकर प्रमुदित रहता है और श्री राम कृपा से निर्वैर होकर सभी द्वंद्वों और विषमताओं से मुक्त भी हो जाता है । कलिपावनावतार गोस्वामी जी कहते हैं –

          गिरिजा सन्त समागम सम न लाभ कछु आन। बिनु हरि कृपा न होइ सो, गावहिं वेद पुरान॥

वस्तुतः भगवत्स्वरूप सन्त सद्गुरु में सत्-चित् और आनंद का ऐसा प्रवेश और समावेश होता है कि वह किसी भी योनि में भटकते हुए “जीव” को अपना आश्रय प्रदान कर सतत मोद और मंगल से परिपूर्ण करने में समर्थ है । निःसंदेह सन्त समागम से बड़ा कोई लाभ नहीं है और यह समागम भी भगवत्कृपा से ही बनता है । इस स्वरूप की प्राप्ति को वेद शास्त्र नेति-नेति (इतना ही नहीं बल्कि इससे भी आगे और कुछ) कहकर प्रमाणित करते हैं ।

नारायण! विभिन्न तीर्थों में जाने का तो परिश्रम करना पड़ता है और वहां जाकर शुद्धान्तःकरण से सविधि धर्माचरण करना पड़ता है, तब जाकर मोक्षादि परम पुरुषार्थों की सिद्धि होती है । इसमें भी धर्मार्थकाम तो इसी शरीर से उपलब्ध होते हैं किन्तु अंतिम पुरुषार्थ रूप “मोक्ष” की प्राप्ति शरीर त्याग के बाद होती है । किन्तु “तीर्थी कुर्वन्ति तीर्थानि” वाला यह सरल चित साधु समाज ऐसा चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग है जिसकी शरणागति-त्रिवेणी में स्नान करके जीवमात्र इसी शरीर के रहते हुए जीवन्मुक्त हो जाता है –

         सुनि समुझहिं जन मुदित मन,मज्जहिं अति अनुराग। लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग॥

वाद-विवाद नहीं

बड़ा ही विचित्र समय है,जब हम सबको किसी कुतर्क में न पड़ कर समष्टि की रक्षा भावना से निर्दिष्ट नियमों का पालन करना चाहिए। ऐसी वैश्विक विभीषिका का सामना जब हम कर रहे हैं, तब अपने घरों में रह कर ईश्वरीय चिन्तन करते हुए समय व्यतीत करना श्रेयस्कर है।
यही बातें विभिन्न सन्दर्भों में सर्वत्र कही गई हैं। ब्रह्मसूत्र कहता है-   ‘ तर्काप्रतिष्ठानात् ‘
मतलब की तर्क से तत्व और लक्ष्य प्राप्ति सम्भव नहीं। ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया ‘ का उद्घोष नचिकेता संवाद में सन्निहित है।  वादे-वादे जायते तत्वबोधः का सिद्धांत श्रद्धालु जिज्ञासु शिष्य और गुरु के द्वारा
शंका निवारण के लिए सही है।
अतः वर्तमान काल में और आज के सन्दर्भ में हो अथवा यह तो सार्वकालिक श्रेष्ठ मत है कि हम सभी को तर्क-कुतर्क से दूर होकर ईश्वरीय चिन्तन-मनन और भजन अपने-अपने भाव से अपने घरों के मन्दिरों से करना होगा।
गोस्वामीजी इसी भाव का स्मरण करते हैं
अस विचारि जे तग्य विरागी।
रामहिं भजहिं तरक सब त्यागी।।
और
अस बिचारि मतिधीर,
तजि कुतर्क संसय सकल।
भजहु राम रघुवीर ,
करुनाकर सुन्दर सुखद।।

http://shishirchandra.com/2020/04/02/वाद-विवाद-नहीं/

नाम महाराज की वन्दना – २

साधक नाम जपहिं लय लाए।
होहिं सिद्ध अनिमादिक पाए।।

साधक को अनेक सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त हो जाती हैं ,यदि वह भगवान् नामों का भाव पूर्वक जप करे।
ऐसी बात कहने के बाद गोस्वामी जी नाम महाराज वन्दन में आगे कहते हैं-

चहूँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।
कलि विशेष नहिं आन उपाऊ।।

मतलब कि चारों युगों और वेदों तक में नाम का माहात्म्य बताया गया है, किन्तु कलियुग में तो इसके सिवाय अन्य विशेष कोई ऐसा उपाय भी नहीं है। सगुन और निर्गुन भगवत् स्वरूपों में एक को दारुगत( लकड़ी की भाँति) और दूसरे को अग्नि सहित दारु के समान मानना चाहिए।दोनों प्रकट और अप्रकट का अन्तर है, लेकिन प्रकट और सगुन नाम का अपार प्रभाव है-

निरगुन ते एहिं भाँति बड़,
नाम प्रभाउ अपार।
कहौं नाम बड़ राम ते,
निज विचार अनुसार ।।

नाम का जप करते रहने पर अनायास ही भक्ति महरानी आ विराजती हैं, और भक्त को मोद और आनंद की प्राप्ति होती है-

नाम सप्रेम जपत अनयासा।
भगति होहिं मुद मंगल वासा।।

नाम का स्मरण करते-करते तो यह भव सागर रूपी अगाध समुद्र सूख ही जाये-

नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं।
करहुँ विचार सुजन मन माहीं।।

जो भक्त भगवान् के नाम का स्मरण करते हैं, सहज ही उनके अज्ञान का विनाश हो जाता है-

सेवक सुमिरत नाम सप्रीती।
बिनु श्रम प्रबल मोहदल जीती।।

ऐसा भक्त अपने अन्तःकरण में आनंद का अनुभव करते हुए विचरण करता है।और नामस्मरण की प्रसन्नता को तो स्वप्न में भी नहीं सोचा जा सकता है-
फिरत सनेह मगन सुख अपने।
नाम प्रसाद सोच नहिं सपने।।
भगवान् उमामहेश्वर ने सत कोटि राम चरित्र में रामनाम को परब्रह्म से बड़ा और समस्त सुख का मूल जानकर उसे अपने हृदय में धारण कर रखा है-
ब्रह्म राम ते नाम बड़,
वर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महँ,
लिय महेश जिय जानि।।
और क्या कहें भगवान् शिव तो रामनाम का प्रसाद ग्रहण करते-करते अमंगल वेश धारण करने पर भी मंगलदान की खान ही हो गए हैं-
नाम प्रसाद संभु अविनाशी।
साजु अमंगल मंगल राशी।।
शुक, सनकादि और नारदादि सिद्ध-योगीजन नाम के प्रसाद से ही ब्रह्म सुख का अनुभव करते भगवान् के अति प्रिय हो गए हैं-
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी।
नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।।
नारद जानेउ नाम प्रतापू ।
जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू।।

और क्या कहें इस नाम कोही जपते-जपते प्रह्लाद जी भक्तशिरोमणि हो गए। ध्रुव जी ने बड़े कष्ट पूर्वक नामजप से अन्तरिक्ष में अचल और अनुपम स्थान पा लिया।और भक्तराज हनुमानजी महराज का तो कहना ही क्या, उन्होंने तो इसी नाम स्मरण से भगवान् को वश कर रखा है-
नाम जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू।
भगत सिरोमनि भे प्रहलादू।।
ध्रुव सगलानि जपेउ हरि नाऊँ।
पावा अचल अनूपम ठाऊँ।।
सुमिरि पवनसुत पावन नामू।
अपने बस करि राखे रामू।।
अपवित्र अजामिल और गज, गणिका आदि भी इसी के कारण मुक्ति धाम को प्राप्त कर गए-
अपतु अजामिल गज गनिकाऊ।
भये मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।।
भगवान् श्रीराम का नाम कलि काल में कल्पवृक्ष के समान अभीष्ट की सिद्धि करने वाला है। इसके प्रभाव से मानव का समस्त शोक नष्ट हो जाता है। इसकी महिमा अनन्त है। और इस नाम की बड़ाई और वर्णन कहाँ तक करें , स्वयं प्रभु भी अपने नाम के गुणों का वर्णन नहीं कर सकते-
कहौं कहाँ तक नाम बड़ाई।
रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।
इस प्रकार बालकाण्ड में गोस्वामी जी ने भगवान् के नामजप-स्मरण की पूर्णता बताते-बताते अन्त में किसी भी देशकाल परिस्थिति और भाव स्वभाव की दशा में इसे सर्वत्र आनन्द और मंगल का मूल कहा है-
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।।

भगवान् की कृपा और उनके चरणों के अनुग्रह से उनके नाम की सतत स्मृति बनी रहे, ऐसी कृपा-करुणा सन्त-भगवन्त दोनों ही करें।

।। हरिः शरणम् ।।

http://shishirchandra.com/2019/11/12/नाम-महाराज-की-वन्दना-२/

नाम महाराज की वन्दना – १

कलिपावनावतार गोस्वामीजी बालकाण्ड के प्रारम्भ में ही, ” नाम ” की वन्दना करते हैं।वे कहते हैं कि, मैं श्रीरघुनाथजी के राम-नाम की वन्दना करता हूँ , जो कृशानु(अग्नि) भानु(सूर्य)और हिमकर
(चन्द्रमा) के हेतु हैं ,क्योंकि ये ती अक्षर
क्रमशः ” ” “ ” और “” उक्त तीनों के
बीज रूप हैं।यही नाम ब्रह्माविष्णुशिव का
रूप , वेदों का प्राण,निर्गुण-सगुण-ब्रह्म और सारे गुणों का कोश है-

वन्दौ नाम राम रघुवर को।
हेतु कृशानु भानु हिमकर को।।
विधि हरि हरमय वेद प्रान सो।
अगम अनूपम गुन निधान सो।।

यह नाम ही ऐसा है, जिसका उलटा रूप मरा-मरा कहते हुए अशुद्ध निषिद्ध कर्म करनेवाले वाल्मीकि जी विशुद्ध हो गए। साथ ही यह जान कर कि एक बार भी जपा गया रामनाम, भगवान् के हजार नामजप का फलदायक है, जगदम्बा पार्वती सदैव अपने पति(शिवजी) के साथ राम नाम जपा करती हैं-

जानि आदिकवि नाम प्रतापू।
भयेउ शुद्ध करि उलटा जापू।।
सहस नाम सम सुनि शिव बानी।
जपि जेई पिय संग भवानी ।।
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।

इन्ही नाम महाराज का जप करते हुए भगवान् शिव ने काशी-क्षेत्र को मुक्ति दायक बना दिया और उनके पुत्र श्रीगणेशजी ने लोकालोक में सर्वत्र प्रथम पूजनीयता प्राप्त कर ली-

महामन्त्र जेहि जपत महेसू।
काशी मुक्ति हेतु उपदेसू ।।
महिमा जासु जानि गनराऊ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।

ब्रह्म-जीव सम सहज सँघाती और नारायण सम सरिस सुभ्राता ये दोनों “” और “” जीवात्मा-परमात्मा की स्वाभाविक एकता को दिखाते हैं। और तो और ये “भक्तिस्त्री” के कर्णाभूषण दोनों अक्षर जगत् के लिये हितकारी सूर्य-चन्द्र हैं-

भगति सुतिय कलकरन विभूषन।
जग हित हेतु विमल विधु-पूषन ।।

ये ही सुन्दर गति(मुक्ति) रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान हैं। कच्छप और शेषनाग के समान धरती को धारण करने वाले तथा भक्तों के मन रूपी कमल में बिहरने वाले भ्रमर एवं जिह्वा रूपी यशोदा के लिए कृष्ण-बलराम हैं-

स्वाद तोष सम सुगति सुधा के।
कमठ शेष सम धर वसुधा के ।।
जनमन मंजु कंज मधुकर से।
जीह जसोमति हरिहलधर से।।

इस रामनाम का “” अक्षर छत्र के समान और “” अक्षर मुकुट-मणि के समान सभी वर्णों के ऊपर होकर विराजता है। रेफस्य ऊरध्वगमनम् और मोनुस्वारः –

एक छत्र एक मुकुटमनि,
सब बरननि पर जोउ ।
तुलसी रघुवर नाम के,
बरन विराजत दोउ ।।

नाम (राम) लेने पर नामी(रूप) प्रकट हो जाता है। इस नाम-रूप में कौन छोटा या बड़ा है, यह कहना अपराध है, क्योंकि नाम-नामी में अभेद। संसार का भी सहज ही नियम है कि, नाम लेने पर नामी आ जाता है, इसे साधु-महात्मा-भक्तजन बखूबी जानते हैं-
को बड़ छोट कहत अपराधू।
सुनि गुनि भेद समुझिहहिं साधू।।
इस प्रकार का ” राम” नाम का मणि रूपी दीपक जिह्वा रूपी देहरी के दरवाजे पर, यदि सतत विराजमान हो तब लोकालोक की प्राप्ति सहज ही हो जाय। संसार का गूढतम रहस्य प्रकाशित हो जाय और समस्त सिद्धियाँ भी प्रकट हो जायें-

राम नाम मनि दीप धरि,
जीह देहरी द्वार ।
तुलसी भीतर बाहरेउँ,
जो चाहसि उजियार।।

जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ।
नाम जीह जपि जानहिं तेऊ।।
साधक नाम जपहिं लय लाये।
होहिं सिद्ध अनिमादिक पाए।।

भगवान् कृपा करें जिससे सतत नाम-स्मरण चलता रहे, क्योंकि यही भगवान् अपने श्रीकृष्णावतार में ‘ माम् अनुस्मर युध्य च’ कहकर संसार के जीवन युद्ध को जीतने का रहस्य प्रकट करते हैं।

।। हरिः शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2019/09/25/नाम-महाराज-की-वन्दना/

मुक्तसङ्गः समाचर।

गीता के तीसरे अध्याय में भगवान् एक बड़ी बात कहते हैं। यह बात सभी मनुष्यों हेतु कही गई है- मुक्तसंग(आसक्ति) से मुक्त होकर आचरण करो।
पूरा श्लोक है-
यज्ञार्थात् कर्मणः अन्यत्र,
लोकः अयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय,
मुक्तसङ्गः समाचर।।
भावार्थ ये है कि- यज्ञ यानी कि – यज्ञः वै विष्णुः( भगवान्) के प्रीत्यर्थ(तन्निमित्त) कर्मो के सिवाय किए गए अन्यत्र कर्म ही संसार बन्धन के कारण होते हैं। कामना सक्त या फलासक्त होकर जब कर्म किए जाएंगे तो वह निश्चित रूप से जन्ममृत्यु के चक्कर में डाले रहेंगे। अतः यज्ञार्थ अथवा भगवदर्पण बुद्धि से कामनाओं से अनासक्त होकर कर्म किया जाना चाहिए।
विशेष ध्यान यह भी रहे कि संग(आसक्ति)मतलब कि विषयासक्ति से मुक्त रहते हुए ,प्रत्येक मुक्तिकामी मनुष्य को आचरण करना चाहिए। गीता के उक्त सन्देश से सम्बन्धित एक प्रसिद्ध पौराणिक आख्यान आता है।

यह आख्यान सती मदालसा का है।विभिन्न आख्यानों के अनुसार मदालसा को कुल चार पुत्र हुए थे। जब प्रथम तीनों पुत्र सन्यासी हो गये , तब चौथे पुत्र की उत्पत्ति के पूर्व उनके पति ने सती से आग्रह किया कि चौथा पुत्र ऐसा होना चाहिए, जो हमारा उत्तराधिकारी बन सके ,नहीं तो राज्य-कार्य कैसे चलेगा। इस पर मदालसा ने अपनी सहमति व्यक्त की और पुत्र होने पर स्वयं उसके नामकरण की बात कही।
समयानुसार पुत्र होने पर मदालसा ने इस चतुर्थ पुत्र को सकाम शिक्षा देते हुए इसका नाम ” अलर्क ” रखा। बड़े होने पर अलर्क का राज्याभिषेक हुआ और उसने शासन संभाल लिया।
कालान्तर में कुसंगति से इनका राज्य छिन गया और ये जंगल में चले आये। यहीं अलर्क को अपनी माता द्वारा दिये गए यन्त्र की याद आई, जिसे माँ ने अत्यंत संकट में खोल कर देखने के लिए कहा था। जब यन्त्र खोला गया तो उसमें एक सूक्ति लिखी थी। जिसके अनुसार ,संग को
सब प्रकार से त्याग देना चाहिए।संग का मतलब यहाँ भी विषयासंग या फलासंग ही है। आगे का भाव ये है कि, यदि यह संग त्याग संभव न हो , तो यह आसंग साधुओं-सज्जनों से जोड़ देना चाहिए।क्योंकि वीतरागी साधुओं का संग तो इस मानवीय-जीवन के चरम लक्ष्य की परम औषधि है-
सङ्गः सर्वात्मना त्याज्यः,
स चेत् त्यक्तुं न शक्यते।
स सद्भिः सह कर्तव्यः,
सतां सङ्गो हि भेषजम्।।

अतः मनुष्य मात्र को भगवान् एवं भक्तिमती सती मदालसा के उक्त वचनों को आत्मसात् करते हुए श्रेष्ठ मानव जीवन के लिये मुक्तसंग होकर आचरण करना चाहिए। भगवान् एवं उनके प्यारे भक्तजन
अनुग्रह करें और अनासक्त मानव जीवन बन सके।

।। हरिः शरणम् ।।

http://shishirchandra.com/2019/08/12/मुक्तसङ्गः-समाचर।/

गावत नर पावहिं भव थाहा

कलिपावनावतर गोस्वामी जी का “मानस” एक ऐसा ग्रन्थ है ,जिसमें सारी समस्याओं का समाधान है। मनुष्य को मनुष्य बनाने और और इस शरीर के बाद पुनः अन्य शरीर का जन्म न हो, इस बड़े कार्य का अत्यन्त सरल उपाय सुझाया गया है।
बाबा ने बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक अनेक चौपाइयों और प्रसंगों में भगवान् के नाम-लीला गुणों का स्मरण कलि-प्रभाव नाश और संसार मुक्ति के रूप में स्मरण किया है।
उत्तरकाण्ड में भगवन्नाम और गुणों का स्मरण करने पर संसार सागर से पार होने का प्रमाण उपस्थित करते हैं।
कलियुग केवल हरि गुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव थाहा।।
भैय्या! प्रारम्भ में ही आदिपूज्य गणेशजी का स्मरण करते हुए नाम उच्चारण को उनकी आदि पूज्यता का कारण ही कह दिया है-
महिमा जासु जानि गनराऊ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।
भक्तश्रेष्ठ हनुमानजी महाराज ने तो भगवान् का नाम रटते-रटते जैसेउन्हें अपने वश में ही कर रखा है-
सुमिरि पवनसुत पावन-नामू।
अपने वश करि राखे रामू।।
नारायण! भगवान् किसी भी नाम का स्मरण मात्र तत्काल कष्टों से, विपत्ति से मुक्ति का सद्यः उपाय है, अनेकानेक पुराणों की अनेकानेक कथायें इस बात की साक्षी हैं। अरे भाई ! सज्जनों को इस बात स्वयं अनुभव करके देखना चाहिए कि नाम-जप कैसे दुःखभवसागर को ही सुखा देने में सर्वसमर्थ है-
नाम लेत भव-सिन्धु सुखाहीं।
सुजन विचार करौं मन माहीं।।
और क्या कहें इस कलिकाल में जब पूजा पाठ की विधि और सामग्रियां जब निर्दुष्ट नहीं रह गई हैं, तब नामाश्रय से बड़ा कोई उपाय नहीं।और क्या कहें नारायण भी अपने नाम का महत्व बता पाने में असमर्थ हो जाते हैं-
कहहुँ कहाँ तक नाम बड़ाई।
राम न सकहिं नाम गुन गाई।।
चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।
कलि विशेष नहिं आन उपाऊ।।
एक जगह महाभाष्यकार पतञ्जलि ने किसी भी एक शब्द का सम्यक् अर्थ जानकर उसके समुचित प्रयोग को लोक और परलोक में परम कल्याण करने वाला बताया है, तब भगवन्नाम का जप स्मरण क्यौं नहीं उपकारी और मुक्तिकारी सिद्ध होगा?
नारायण! एक पुराण में चर्चा है कि एक ही बार श्रीभगवान् ” हरि ” के नाम के अक्षर द्वय का उच्चारण मनुष्य को मुक्ति का अधिकारी बना देता है-
सकृद् उच्चारितं येन,
हरिः इति अक्षरद्वयम्।
बद्धः परिकरः तेन,
मोक्षाय गमनं प्रति।।
और यदि कोई बार -बार अपराध करे और यह सोचे कि नाम का उच्चारण करके वह बारम्बार इससे मुक्त होता रहेगा, तो यह बहुत बड़ा नामापराध बनेगा, जिससे मुक्ति सद्यः सम्भव नहीं।
अतः भगवान् कीऔर सन्त-महात्माओं की कृपा बने ,जिससे नित्य निरन्तर श्री भगवान् के नामों का उच्चारण होता रहे, और नामाश्रयी नारदादि ऋषियों तथा भक्त श्रेष्ठ हनुमानजी महाराज की कृपा करुणा का पात्र होया जा सके।

।।हरिः शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2019/07/04/गावत-नर-पावहिं-भव-थाहा/

ताहि भजन तजि भाव न आना

” मानस “ के सुन्दरकाण्ड में भगवान् और भक्त के अत्यन्त मार्मिक हृदय के मनोरम उद्गार यत्र तत्र सर्वत्र विकीर्ण हैं। और हो भी क्यों नहीं क्योंकि सुन्दरकाण्ड का सौन्दर्य भक्तिमती भगवती सीता और भक्तपरायण भगवान् की भावभूमि पर आधारित है।
यह भक्त और भगवान् की अद्भुत आत्मीयता है ,जब भगवान् के द्वारा लंका निर्दहन के बारे में पूछने पर हनूमान् जी कहते हैं कि –
सो सब तव प्रताप रघुराई।
नाथ न कछू मोर प्रभुताई।।
हे भगवन्! लंका जल गई उसमें मेरा क्या ,वह तो सब आपका प्रताप था मेरी कोई बड़ाई नहीं। और क्या कहूँ, उसके लिये अगम क्या है, जिस पर आपकी कृपा हो जाय, जैसे कि बडवानल को रूई भी जला सकती है-
तव प्रभाव बडवानलहि ,
जारि सकै खलु तूल ।।
इस पर भी हनुमान् जी महाराज भगवान् से अनपायनी(निश्चल) भक्ति का वरदान माँगते हैं और भगवान् भी ” एवमस्तु ” कह कर तत्काल अनुमोदन कर देते हैं।
इस घटना के बाद भक्त – भक्ति और भगवान् के स्व- स्वभाव पर सुन्दर काण्ड की बड़ी सुन्दर पंक्ति आती है-
उमा राम स्वभाव जेहि जाना।
ताहि भजन तजि भाव न आना।।
मतलब कि हे भगवती पार्वतीजी जो लोग भगवान् के अत्यन्त-अत्यन्त कोमलतम स्वभाव को जानते हैं ,उन्हें भजन-भक्ति के अतिरिक्त दूसरा भाव आ ही नहीं सकता।
भाव तो आध्यात्मिकता की आधारशिला ही है ,जिस पर भगवद्-भक्ति टिकी रहती है। भक्त और भगवान् को परस्पर ही समझा जा सकता है। और देवाधिदेव महादेव ने इसीलिए एक दूसरे प्रसंग में संसार को स्वप्नवत् और भजन-भाव को ही सत्य-सार -रूप कह दिया है-
उमा कहहुँ यह अनुभव अपना।
सत हरिभजन जगत् सब सपना।।

भगवान् और उनके भक्त कृपा करें और उनकी निश्चल भक्ति प्राप्त हो।

।।हरिः शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2019/06/18/ताहि-भजन-तजि-भाव-न-आना/

संपत् नारायणस्मृतिः

संसार का ही नहीं प्रत्युत स्वर्गादि लोकों का भी श्रेष्ठ मानव शरीर , सांसारिक सुखों को ही महत्व बुद्धि से ग्रहण करता है। अब ऐसी स्थिति में जब उसे मालूम है कि एक के बाद एक अस्थिर संसार-भोगों और पदार्थों को प्राप्त करने और त्यागते रहने पर भी स्थायी सुख और आनंद की प्राप्ति अभी तक नहीं हुई। इसका कारण वह न खोजता है और खोजना चाहता है।
केवल सांसारिक सुखों की मृगमरीचिका में उसकी दशा उस भौंरे की तरह है जो रात बीतने और सुख के सुप्रभात और सूर्य की आशा में है। किन्तु हाथी रूपी काल का एक प्रहार ,उस कमल कोशी सुखान्वेशी भ्रमर पर ऐसा होता है कि, कि स्वयं नष्ट होकर, पुनः एक दूसरी योनि की यात्रा पर चल पड़ता है।और यही क्रम दुहराया जाता रहता है।विश्रांति और आनंद नहीं मिलता-

रात्रिः गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कजालिः।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे
हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार।।

अब वास्तविक बात तो यह है कि अविनाशी भगवान् का अंशमात्र यह जीवात्मा मनुष्य उस अविनाशी परमात्मा को छोड़कर, जिस विनाशी संसार में और उसके भोगों में सुखान्वेषण कर रहा है, वह वस्तुतः उसमें है ही नहीं।
वास्तविक बात तो यह है कि जब यह अविनाशी जीवात्मा विषयों और भोगों को ही सम्पत्ति और इन विषयसुखों के वियोग को विपत्ति मानता है, तब वह एक मानवीय और वास्तविक संपत्ति- सुखों से दूर ही रहता है।
निश्चित रूप से यदि विषय भोग के समय भी भगवद् स्मरण बना रहे,और यह स्मृति रहे कि सारे अनुभवों के मूल स्वयं परमात्मा हैं ,और यदि वे इस शरीर से हट जाँय ,तो कौन प्राणन की क्रिया करेगा?
कौन देखेगा? सुनेगा?
ऐसी स्मृति होते रहने पर संसार या संसारेतर कोई भी विपत्ति स्पर्श नहीं कर सकती-

दुख में सुमिरन सब करै,
सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै,
तो दुख काहे को होय।

भगवान् श्रीराम ने सुन्दरकाण्ड में एक संकल्प ज्ञापित किया है कि यदि मन वचन और कर्म से कोई जीव सतत मेरा स्मरण बनाये, रखेगा तो बताओ प्रत्यक्ष क्या कहें, अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्षवत् सपने में भी उस व्यक्ति को कोई विपत्ति नहीं आयेगी।
इसका अनुमोदन भक्तश्रेष्ठ हनूमान् जी महाराज तत्काल करते हुए कहते है कि-
हे भगवन् विपत्ति तो तभी है ,जब जिस काल में आपका स्मरण, भजन नही होगा।

कह हनुमन्त विपति प्रभु सोई।
जब तव सुमिरन भजन न होई।।

ऐसा ही संकल्प पुराण भी व्यक्त करते हैं।जब भगवान् व्यास जी उस विपत्ति को विपत्ति कहते हैं जब भगवान् का स्मरण नहीं होता।और संपत्ति तो उसी को कहते हैं, जब नित्य निरन्तर भगवद्स्मृति बनी रहती है-

विपदो नैव विपदः,संपदो नैव संपदः।
विपद् विस्मरणं विष्णोःसंपन्नाराणस्मृतिः।

अतः साधु, महात्मा और भगवत् प्रेमी भक्त कृपा करें , कि भगवत् स्मृति बनी रहे।

।।हरिश्शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2019/05/24/संपत्-नारायणस्मृतिः/

यहाँ रोम रोम स्याम है

संसार में जो कुछ दीख रहा है, सब ब्रह्ममय है। हमारे वेदादि शास्त्र ऐसी ही दृढ बात व्यक्त करते हैं। संसार जो कुछ दृश्य है,वह प्रतिक्षण बदल रहा है, केवल एक जो नहीं बदल रहा है, वह सर्वकारण कारण एकमात्र परमेश्वर।
अब इस सर्वकारण कारण में जिसका मन लग जाय,सन्तकृपा या भगवन्त कृपा से , उसको तो किसी से कोई प्रयोजन नहीं, होगा-
हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।
ऐसे भगवत्प्रेमी का किसी से कोई न विरोध होगा और न ही भोग,मोक्ष या रिद्धि सिद्धि की कामना-
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध।।
और
चहौं न सुगति सुमति संपति कछु
रिधि सिधि विपुल बड़ाई।
हेतुरहित अनुराग रामपद बढ़ु अनुदिन
अधिकाई।।
अब भगवदनुरागी गोपियों की दशा भी ऐसी भगवद् दृष्टि मय हो जाती है कि वे किसी अन्य ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकतीं, वे कहती हैं कि मनचोर ने हमारा मन चुरा लिया है , क्योंकि हमारी ही प्रार्थना पर जब से उन्होंने मेरी ओर देख क्या लिया है, हमको उनके सिवा कुछ दीखता ही नहीं-
मधुकर स्याम हमारे चोर।
मन हर लियो माधुरी मूरति
निरखि नयन की ओर।।
और परब्रह्म के पूर्णावतार श्रीकृष्ण की दृष्टि हो अथवा उनके प्रेमी भक्तों की , जब किसी जीवात्मा पर वह प्रेममयी करुणा दृष्टि पड़ जाये तो उसे जित देखूँ तित श्याममयी है और तो और – रोम -रोम श्याम ही सूझता है। भगवान् की कृपा के आकांक्षी को सभी ओर प्रभु ही दीखते हैं-

यो मां पश्यति सर्वत्र ।
सर्वं च मयि पश्यति।।
तस्याहं न प्रणश्यामि।
स च मे न प्रणश्यति।।

यही दशा दिशा भगवत् प्रेम में व्याकुल गोपी-मन की है, जिन्हे भगवान् के अतिरिक्त स्वयं अपने शरीर में अथवा और भी कहीं, दूसरा कोई सूझता ही नहीं-
स्याम तन स्याम मन स्याम है हमारो धन,
आठों याम ऊधो हमें स्याम ही सों काम है।
स्याम हिये स्याम हिये स्याम बिनु नाहिं तिये,
आँधे की सी लाकरी अधार स्याम नाम है।
स्याम गति स्याम मति स्याम ही है प्रानपति
स्याम सुखदाई सों भलाई सोभाधाम है।।
ऊधो तुम भये बौरे पाती लै के आए दौरे,
जोग कहाँ राखैं यहाँ रोम रोम स्याम है।।

सन्त भगवन्त कृपा करैं और ऐसी दृष्टि प्राप्त हो जाये।

।।हरिः शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2019/05/01/यहाँ-रोम-रोम-स्याम-है/