छठ दम शील विरत बहु कर्मा।निरत निरन्तर सज्जन धर्मा।।

छठवीं साधन भक्ति में चार बातें कही गई हैं, और यह गाँठ बाँधकर समझना होगा, कि भक्ति की प्राप्ति में एक-एक अलग-अलग साधन स्वयं में भक्तिदाता है। इन्द्रियनिग्रह(दम), शील(स्वभाव),
निन्दनीय कार्यों से विरति और सज्जन
(मानव) धर्म का परिपालन।अब-
इन्द्रिय माने कि कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों का तत् तत् विषयों के प्रति लगाव का प्रतिरोध करना। 5कर्म और 5ज्ञान इन्द्रियों को अयोग्य योजन से बचाना।
नेत्रों से देखने योग्य रूपों को देखना,कानों से श्रवणीय को सुनना।
जिह्वा से ग्रहणीय ,भगवद् नैवेद्य वस्तुओं
का भोजन और नासिका से आघ्राणीय तत्वों का ग्रहण।
शास्त्र कहते हैं-जितं सर्वं जिते रसे।अर्थात् रसना के आस्वाद आकर्षण से यदि हम बचेंगे, तो अन्य इन्द्रियों के विषयों के बचाव करने में सरलता होगी।इसीलिये कहा गया है कि-
जिह्वा पर विजय से प्रायः अन्यों पर भी विजय हो जाती है।
नाना इन्द्रियों का जो -विषय है, उसे भगवत्-भागवत् पारतन्त्र्य पूर्वक ग्रहण करना। कौन सी खाने पीने की वस्तु मनुष्य के लिये ग्राह्य है और कौन सी नहीं इस पर बारम्बार विचार कर, उसे लेना।और इसीलिये शास्त्र वचन है-
आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः। अर्थात् आहार विहार की शुद्धि से मन की सात्विकता प्राप्त होती है और उसके बाद,करणीय कार्यों की अविचल स्मृति आ जाती है।हमने माता के गर्भ में प्रतिज्ञा कर रखी है, अब एक बार जन्म हो जाय तो किसी अन्य मातृगर्भ में जाने लायक कोई काम नहीं करूंगा।यह स्मरण होते ही हम,कार्याकार्य विचार पूर्वक कोई भी काम करने लगते हैं।जिसमें सन्त सन्त भगवन्त ही अवलम्बन हैं। और वह स्मृति अर्जुन जैसी हो जाये, तो क्या कहना।
इसी से अर्जुन ने कहा-नष्टो मोहः स्मृतिः लब्धा,त्वत् प्रसादात् मया अच्युत!
विषयों के ऐन्द्रिक लगाव में चार अन्तः
इन्द्रियों -मनबुद्धि चित्ताहंकार की बड़ी भूमिका होती है। मननात् मनः सबसे महत्वपूर्ण है, यही वस्तुतः सभी इन्द्रियों का मुख्य प्रयोजक है।
यदि इसे वश में करेंगे, तभी विषयाभिरुचि मिटेगी।
भगवान् ने इसे अभ्यासेन न तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते कहकर नियन्त्रित करने का द्विविध उपाय कहा है।
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन् निरोधः में भी वही बात है।
अब अभ्यास नामजप का करना है।
इसके बिना यह मन अस्थिर ही रहेगा।
मन्मना भव मद् याजी मद् भक्तः मां नमः कुरु ,तो यही निर्देश करता है। इसके सधते ही सब सध जाते हैं।
इन्द्री द्वार झरोखे नाना।
जहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।
आवत देखहिं बिषय बयारी।
तुरतहिं देहिं कपाट उघारी।।
इन्द्रियों का यह स्वभाविक विषय राग तो, नाना शूकरकूकर इन्द्रादि शरीरों से चला आ रहा है।
अतः मन को ,रामनाम, कृष्ण नाम,राधा नाम,दुर्गा नाम जप में बाँधकर ही बाँधा जा सकता है, अन्यथा नहीं।और यदि हरि गुरु सन्त कृपा से नाम जप चल गया, तो संसृति का चक्र भी गया।बस “दम” सध गया और चौरासी का फेरा गया।
स्थितप्रज्ञ के लक्षण में ,दूसरे अध्याय में भगवान् यही बात कहते हैं-
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
और रामानुजाचार्य भगवान् इसकी व्याख्या में कहते हैं-
वश्येन्द्रियं मनःआत्मदर्शनाय प्रभवति।
मतलब कि निर्मल मन होने पर ही आत्म दर्शन या भक्तिलाभ होता है।
शील स्वभाव तो क्षमा दया करुणा से परिपूरित होना ही चाहिए, जो जीवात्मा को परमात्मा से सहज मिला है।
भगवान् तो कारुण्यामृतसागरः हैं।हमारा सहज शील स्वभाव वही है।
विरत बहु कर्मा से तात्पर्य निषिद्ध आचरणों के त्याग से है। यदि हमारा सहज स्वभाव, सत्यप्रेमकरुणा है, तो हम असत्य ,द्रोह,हिंसा में क्यों पड़े हैं। हमें नाम जप से मन को स्थिरऔर चित्त को निर्मल बनाना होगा।
भक्ति प्राप्ति के मार्ग मे हमारे शास्त्रों ने पाँच बाँते निषिद्ध की हैं।इन्हें भक्ति के पाँच काँटे ,कहा गया है।इनके रहते तो भक्ति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ये पाँच अभिमान हैं, जाति,विद्या, पद, रूप और यौवन-
जातिःविद्या महत्वं च रूपं यौवनमेव च।
एते तु यत्नतः त्याज्याः,एते वै भक्तिकङ्टकाः।।
और अब हमें इस तरह अपने अहन्ता ममता को भगवान् से जोड़ना होगा।मैं भगवान् का ही हूँ।और भगवान् ही मेरे।
अहन्ता भगवान् की।और ममता तो भगवान् का जीव के लिए, उद्घोष ही है।
यह अभिमान जाय जनि भोरे।
मैं सेवक रघुपति पति मोरे।
भगवान् भी यही कहते हैं-
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः
जब भगवान् मेरे,हे राम!तवास्मि।तब कोई भय नहीं।हम निर्भय हो गए। वे
धीरे-धीरे प्रत्यक्ष भी होगें। तब जब हम जैसे भोगों के पीछे पागल हैं, भगवान् के लिये ही पागल हो जायँ। और रह गया सज्जन धर्म तो, मनुष्य धर्म ही सज्जन धर्म है ।वह भी नामजप के अभ्यास होने से पालन होने लगेगा।
जैसे अग्नि ,ऊँची-ऊँची लपटों से वायु की सहायता से सब कुछ जला डालता है, वैसे ही नामजप से निर्मल हृदय में अनुभूत भगवान् सारे पापों को जलाकर अपनी शरणागति भक्ति दे देते हैं।
यथाग्निःउद्धतशिखः कक्षं दहति सानिलः
तथा चित्तस्थितो विष्णुः योगिनां सर्वकिल्बिषम्।। विष्णु पु.6/7/74
इस प्रकार शबरी को माध्यम बनाकर
भगवान् ने छठी साधन भक्ति निर्दिष्ट की

छठ दम शील बिरत बहु कर्मा।
निरत निरन्तर सज्जन धर्मा।।

।। हरिः शरणम् ।।

मन्त्र जाप मम दृढ़ विश्वासा।पंचम भजन सो वेद प्रकासा।।

सत्संग, कथारति,विगतमान गुरुपद सेवा, निष्कपट प्रभुगुनगन गान के रूप में चार प्रकार की साधन भक्ति की उद्भावना के बाद भगवान् पंचम भक्ति कहते हैं-

मम(राम नाम) मन्त्र जप पर अत्यंत विश्वास रखते हुए,गुरुप्रणीत रीति से भजन करना चाहिए।
राम रामेति रामेति कर्णे कर्णे जपन् जनाः
इत्यादि स्वरूप की स्थिति में आ जाना-
“जप व्यक्तायां वाचि मानसे च” मतलब कि संस्कृत की “जप” धातु का अर्थ स्पष्ट वाणी से नामोच्चारण या मानसिक स्मरण भी होता है।अतः इसकेअनुसार श्रीराम नाम मन्त्र को मन में सतत स्मरण करें अथवा स्पष्ट रूप से व्यक्त वाणी के माध्यम से कहते हुए भजन( सेवन) करें, दोनों रीतियाँ भक्ति को पाने में सरल सरणि हैं।और सबसे बड़ी बात इसमें ये है कि ,इस क्रिया के तारतम्य में विश्वास भी हो।
और क्रमिक साधन भक्ति की ओर बढ़ रहे हैं, तो विश्वास अर्थात् श्वास प्रश्वास के प्रत्येक आगमन-निर्गमन में विशेषता होनी चाहिये। आसनादि पर बैठ कर वाचिक रूप से अथवा चलते-फिरते,किसी भी दशा में मानसिक रूप से, यह नाम जप का अभ्यास होना चाहिये।
इसमें वेदगुरुवाक्यों में विश्वास पूर्वक श्रद्धा की भी,प्रधानता है,क्योंकि विश्वास ही श्रद्धा और श्रद्धा ही विश्वास है।
यज्ञानां जपयज्ञोस्मि ,कहकर भगवान् नामजप को श्रेष्ठतम कहते हैं।
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ, की स्वाभाविक
चित्त की एकतानता, तन्मयता से सीताराम, राधेश्याम, उमाशंकर आदि नामों का किसी रूप में वाचिक या मानसिक जप ,भगवत् शरणागति भक्ति की प्राप्ति करा देता है।
गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न। बन्दौ सीताराम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न। इत्यादि भाव से सानुराग नाम जप हो।
और इसीलिये विनयवाणी है-
राम जपु राम जपु राम जपु बावरे।
घोर भवनीरनीधि नाम निज नाव रे।
नाम जपो नहीं तो संसार सागर है, डुबा ही देगा। यदि जपे,तो नामसन्ताप से कलि जलने के भय से छिपे। और जपते जपते नाव ही बन जायेगा तथा मानव जन्म सफल हो जायेगा।
एक ही साधन सब रिद्धि सिद्धि साध रे।ग्रसे कलि रोग ,जोग संजम समाधि रे।
राम नाम ही सो अन्त सब ही को काम रे।
यह रामनाम जप-भजनसेवन ही इस जन्म-मृत्यु का अन्त कराने वाला है।
इसलिये राम नाम जप कर,संसार का उच्छेद कर डालो।
यह नाम जप स्वतंत्र रूप से शरणागति भक्ति को प्राप्त करायेगा।
इसलिये भगवत् कृपा पाने के लिये और परम आत्यंतिक विश्राम वाली शरणागति गति हेतु श्रद्धा विश्वास से नाम जप में लगना चाहिए, क्योंकि-
बिनु बिश्वास भगति नहिं, तेहि बिनु द्रवहिं न राम।रामकृपा बिनु सपनेहु जीव न लह विश्राम।
असि बिचारि मति धीर,तजि कुतर्क संशय सकल,भजहु राम रनधीर करुनाकर सुन्दर सुखद।।
भगवती जगदम्बा जानकी “नाम पाहरू दिवस निसि,ध्यान तुम्हार कपाट” ही सर्वसाधनसाधन मानती हुई जप में ही जागृत हैं।और अनन्य नामजापक श्रीहनूमान् जी महाराज इसी रूप में दर्शन करते हैं-
कृसतनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदय रघुपति गुन श्रेनी।।
जगन्माता पार्वती भी, भगवान् चन्द्रमौलि को श्रीरामनाम जप लीन रूप में अवस्थित देखती हैं-
तुम पुनि राम -राम दिन राती।
सादर जपहु अनंग अराती।।
इस जप को भगवान् शिव, भगवती शिवा से भजन का सर्वस्व ही बताते हैं-
उमा रामस्वभाव जेहि जाना।
ताहि भजन तजि भाव न आना।।
उमा कहहुँ यह अनुभव अपना।
सत हरि भजन जगत सब सपना।।
और शङ्करावतार श्रीमत् शङ्कराचार्य
भी “नाममहाराज” को कलिभेषज मानते हुए, भजते हैं-
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते।।
इसीलिये शबरी के लिये प्रदत्त साधन भक्ति के लिए भगवान् ने कहा-

मन्त्र जाप मम दृढ़ विश्वासा।
पंचम भजन सो वेद प्रकासा।।

।। हरिः शरणम् ।।

चौथि भगति मम गुनगन करै कपट तजि गान ।

साधन भक्ति के रूप में प्रभु ने स्वयं अपने (श्रीभगवान् के) गुणों को गाने के लिए निर्देश दिया, और वह भी कपट छोड़कर।
अब कपट क्या? कुत्सितः पटः कपटः
माने कि खराब विचारों का वस्त्र त्याग कर। ये खराब विचार हैं, विषयाभिरुचि।
यह ममता अहन्ता ग्रस्तता ही ,वह आवरण(वस्त्र पट) है, जिससे संसार कुछ का कुछ दीखता है। तो यदि साधु गुरु संग का संयोग मिला है, और यदि यह संसार परिवर्तन शीलता के कारण जैसा है, वैसा नहीं दीखता है, तो गुरु वचनों पर श्रद्धा रखते हुएभगवन् नाम लीला गुण धाम का तत् प्रतिपादित रीति से,गान करना होगा।
भक्तिरसामृतसिन्धुकार ने उच्चैः भाषा तु कीर्तनम् ,कहकर जोर -जोर से नामलीला को गाने पर जोर दिया है।शुकभगवान् ने भी कहा कि, सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ,द्वापर में पूजा सपर्या से जो भगवत् प्राप्ति है, वह तो कलियुग में हरिगुन कीर्तन से सहज प्राप्त है-
कृते यद् ध्यायतो विष्णुं, त्रेतायां यजतः मखैः।द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद् हरिकीर्तनाद्।।12/3/52
बाबा ने भी यही कहा-
कलियुग सम युग आन नहिं,
जो नर कर विश्वास। गाइ राम गुन बिमल भवतर बिनहिं प्रयास।।
कलियुग केवल हरिगुन गाहा।
गावत नर पावै भव थाहा।।
एहि कलिकाल न साधन दूजा।
जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा।
रामहिं सुमिरिअ गाइअ रामहिं।
सन्तत सुनिअ रामगुन ग्रामहिं।।
और इस तरह गीता में अर्जुन भी यही भाव व्यक्त करते हैं-
स्थाने हृषिकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यति अनुरज्यते च।रक्षांसि भूतानि दिशो द्रवन्ति,सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः।।11/36
और भगवान् तो आनन्दसिन्धु,सुख के एक मात्र आश्रय हैं, जिनके कण मात्र आनंद से अनन्तान्त ब्रह्माण्ड सुखी तथा पालितपोषित है। वे तो धर्म की धुरी,धैर्य तथा नीति,रीति,प्रीति के पोषक हैं।सत्य, स्नेह शील के समुद्र हैं-

जो आनन्द सिन्धु सुखराशी, सीकर ते त्रैलोक सुपासी।सो सुखधाम राम अस नामा।अखिल लोकदायक विश्रामा।।
धरम धुरीन धीर नय सागर।सत्य सनेह शील सुख सागर।।
तो इस तरह के भगवान् से भक्ति कामी की प्रार्थना होगी ही-
सन्त सन्तापहर,विश्वविश्रामकर,राम कामारि,अभिरामकारी।शुद्ध बोधायतन,
सच्चिदानन्दघन,सज्जनानन्दवर्धन,
खरारी।। देहि सतसंग निज अंग श्रीरंग!
भवभंग-कारण शरणशोकहारी। ये तु भव -दंघ्रि पल्लवसमाश्रित सदा,भक्तिरत, विगतसंशय, मुरारी।।
और इस प्रकार आपकी भक्ति तो दैहिक दैविक,भौतिक तापों की परमौषधि है। चराचर में आपको ही देखनेवाले सन्त ही वैद्य हैं। वस्तुतः सन्त और भगवान् में कोई अन्तर नहीं-
प्रबलभवजनित त्रैव्याधि-भैषज भगति, भक्त भैषज्यमद्वैतदरसी।
सन्त भगवन्त अन्तर निरन्तर नहीं, किमपि मतिमलिन कह दासतुलसी।
ऐसी विनयवाणी बोलने वाले तुलसी का आश्रय लेकर, भगवान् के गुणगणों का निष्कपट भाव से गान करना चाहिए।क्योंकि वह सन्तसद्गुरु तो जीवन में इसीलिये मिले ही हैं कि अज्ञान मिटे-
आते न जो परमेश वे गुरुदेव के अवतार में, रहता अँधेरा ही अँधेरा मोह का संसार में। इस तरह की विवेकपूर्ण चित्त की स्थिति हो जाने पर भगवान् ने भक्ति का चतुर्थ साधन कहा-

चौथि भगति मम गुनगन करै कपट तजि गान ।

।। हरिः शरणम् ।।

गुरुपदपंकज सेवा तीसरि भगति अमान

जब भगवान् के प्राणप्यारे भक्तों का संग मिल जायगा, तब उन्हीं के अनुग्रह से प्रभु कथा श्रवण में भी चित्तवृत्ति जागृत् होगी।और निरंतर परिवर्तन शील जगत् एवं शरीर में भी वृत्ति हटने लगेगी।
धन्य हैं ऐसे शुकशनकादि व्यासनारदादि नित्य मुक्त सन्त ,जिनमें किसी भाग्यशाली की चित्तवृत्ति आवृत्त हो जाय।
प.पू. हमारे गुरुदेवश्री मलूकपीठाधीश महाराज ने एक ऐसी स्वयं प्रत्यक्ष कृत घटना का उल्लेख किया, जिसे स्मरण कर ,हृदय गद्गद हो जाता है।
उन्होंने एक ऐसे सन्त सद्गुरु के सान्निध्य का वर्णन किया जिनके पद पंकज सेवा का महान् सौलभ्य, उन्हें मिला। वे सिद्ध सन्त सद् गुरु थे,परम पूज्य शरणानन्दजी महाराज।
अपने महाराज जी तो बारह चौदह वर्ष की अवस्था से ही श्रीशरणानन्द महाराज की सपर्या में अनुरक्त थे। एक सज्जन अपने पाँच वर्षीय पुत्र के साथ श्रद्धेय शरणानन्दजी के दर्शनार्थ पधारे। गुरुदेव तो, दस पन्द्रह फीट दूर से ही निर्धारित समय तक दर्शन देते थे। उनकी दृष्टि हमेशा नीची ही रहती थी।जब बालक के पिता ने सद्गुरु को प्रणाम करने को कह ,तब बालक ने सामने बैठे हुए ही दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया। सद् गुरु भगवान् अपनी नीची निगाह उपर करके, उस बालक को देख भर लिया, और पंच वर्षीय बालक तत्काल समाधि दशा में चला गया। लोग परेशान हुए, लेकिन महाराज जी ने कहा कि पूर्व शरीर से इसे किन्हीं श्रीगुरु का पदपंकज मिला था,अतः इसकी चित्तवृत्ति निर्मल है।
इसे पूजा उपासना में विनियोजित करो,इसका और इसके साथ अन्य लोगों का भी लाभ होगा।
वस्तुत भगवान् ही गुरु रूप में आकर शिष्यों का आत्यंतिक दुख दूर करते हैं।
यह गुरु भक्ति ही हरिभक्ति है।और जब भगवान् स्वयं अमानी हैं, तो तद् रूप श्रीगुरु भी अमानी हैं, फोटोस्टेट जो ठहरे।
आदि शङ्कर ने इसीलिये संसार की सभी भोगसामग्री होने पर भी, गुरु चरणों में अनुरक्ति न होने पर आश्चर्य व्यक्त किया-
शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं ,
यशः चारुचित्रं धनं मेरुतुल्यम्।
मनः चेन् न लग्नं गुरोः अङ्घ्रिपद्मे,
ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततः किम्।।
और बाबा ने तो मानस के आरम्भ में ही अमानी सद्गुरु के चरणकमलों की नखमणि प्रभा के स्मरण मात्रसे संसार को देखने के नजरिये में ही बदलाव का अनुभूत वर्णन किया है-
बन्दौ गुरुपदपदुमपरागा।
सुरुचि सुवास सरस अनुरागा
अमियमूरिमय चूरन चारू।
समन सकल भवरुज परिवारू।।
श्रीगुरुपदनखमनिगन जोती।
सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती।।
यह मोहान्धकार को नष्टकर, हृदय को प्रकाशित करनेवाले हैं, जिसे भाग्यशाली भक्त ही पा पाते हैं-
दलन मोहतम सो सप्रकासू।
बड़े भाग उर आवै जासू।।
आँखें खुल जाती हैं, निर्मल हो जाती हैं और ब्रह्माण्ड का रहस्य भेदन हो जाता है, क्योंकि देनेवाले श्रीहरिगुरु – दिव्यं ददामि ते चक्षुः ,पश्य मे योगमैश्वरम् ,जो हैं-
उघरहिं विमल विलोचन ही के।
मिटहिं दोसदुख भव रजनी के।
सूझहिं रामचरित मनि मानिक।
गुपुत प्रकट जहँ जो जेहिं खानिक।।
श्रीगुरु रूप में श्रीहरि के वन्दनीय चरण कमल हैं, जिनकी वाणी महा अज्ञान के
समूह को छिन्न करनेवाली सूर्यप्रभा है-
बन्दौ गुरुपदकंज,कृपासिन्धु नररूपहरि।
महामोहतमपुंज,जासु बचन रविकरनिकर।
और इस तरह सन्त सद्गुरु को सृजन पालन संहारकर्ता त्रितयी कहकर, उनकी भक्ति को सर्वोच्च सिद्ध किया गया है, जो अमानी होकर ,दूसरों को मान देने वाले हैं- गुरुः ब्रह्मा गुरुः विष्णुः,गुरुः देवः महेश्वरः, गुरुः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः।। ।अमानी मानदो मान्यः
लोकस्वामी त्रिलोकधृत्।सुमेधा मेधजः धन्यः सत्यमेधा धराधरः।।
श्रीगुरु रूप ही अवतरित हरि की सन्निधि ऐसी दशा कर देती है कि हम अर्जुन की तरह होने लगते हैं, मानापमानयोः तुल्यः तुल्यः मित्रारिपक्षयोः।
और इस तरह शबरी को प्रदत्त वह तीसरी भक्ति की साधना पूरी होती दीखती है,जहाँ गुरु और तत् शिष्य एकाकार होते हैं-
सनमान निरादर आदरही।
सब सन्त सुखी विचरन्ति मही।।
और ऐसी निर्मल चित्त की दशा में ही वह तृतीया भगवत् प्रदत्ता भक्ति मूर्तिमती हो जाती है, जब भगवान् कहते हैं-

गुरुपदपंकजसेवा तीसरि भगति अमानि।

।। हरिः शरणम् ।।

दूसरि रति मम कथा प्रसंगा

जब भगवत् कृपा से सन्तों की संगति मिल जाये, तो वही अच्छी बात है-भली जो संगति साधु की।
मित्रों!जब सन्त समागम होता है, तब संसार भाव गलने लगता है।और साधु सन्त ,इसलिये कि वे परहित साधते हैं। स्वहित हो या परहित,इस असाध्य साधन की क्षमता भगवन् नाम और कथासुधासरिता में अवगाहन ही है।और क्या कहें,संसार में एकमात्र भगवान् और उनके प्राणप्यारे भक्त ही हैं ,जिनका स्वार्थ ही परमार्थ है-
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी।।
ये परम परमार्थी सन्त भगवान् की सुन्दर कथा का रस भक्तों के कर्णकुहरों में उड़ेल देते हैं, जो श्रवण रन्ध्र से प्रवेश कर सीधे हृदय देश में प्रवेश कर जाती है। लख चौरासी की मलिन चित्त की कामक्रोधादि वासना धुलने लगती है।
और धीरे-धीरे मन कहता है
श्रवणन और कथा नहिं सुनिहौं ,रसना और न गैहौं।
जानकी जीवन की बलि जैहौं।
नानायोनि समुत्पन्न चित्त की मलिन वासना जल्दी जाती नहीं, और इसलिये सन्त मुख से बहता कथा रस का जल ही उसे धोकर ,जब बार -बार शुद्ध करता रहता है, तब जीवन अनेक संशय का समाधान होता रहता है।
बाबा के शब्दों में यह कथा संशय रूपी पक्षी को उड़ाने वाली सुन्दर करतल ध्वनि है

राम कथा सुन्दर करतारी।
संशय विहग उड़ावन हारी।
कलियुग रूपी वृक्ष को काटने वाली कुल्हाड़ी भी है-
रामकथा कलिबिटप कुठारी।
सादर सुनु गिरिराज कुमारी।।
विद्वानों का परम आराम,सभी को मनोहर और कलि कालुष्य नाशक है-
बुध विश्राम सकलजनरंजनि।
रामकथा कलिकलुषविभंजनि।।
और भी है, यह कथा कलिरूपी सर्प के लिये मयूर के समान तथा विवेक रूपी आग जलाने हेतु ईंधन के समान है-

रामकथा कलि पंनग भरनी।
पुनि बिवेक पावक कहुँ अरनी।।

राम कथा यम गणों के मुँह में पोते जाने वाली कालिख जैसी यमुना है।जीव को मुक्ति देने वाली नगरी काशी भी है-
जमगन मुँह मसि जग जमुना सी।जीवन मुकुति हेतु जनु कासी।।
और हो भी क्यों नहीं, भगवान् की यह कथा शिवशिवा- कागभुशुण्डि -याज्ञवल्क्यभरद्वाज तक क्रमशः सुनी कही और गाई गई है।और इसलिये यह शिव को प्रिय है ,ऐसी कि जैसे नर्मदा और शैलसुता पार्वती-

शिव प्रिय मेकल सैलसुता सी।सकल सिद्धि सुख संपति रासी।।
प्रेमियों! जब भगवान् की कथा, सभी सिद्धियों सुख और संपत्ति की खान ही है, तब, निरन्तर इसे सुनकर दूषित चित्त को धो पोंछकर अन्तर हृदय के आसन पर प्रभु को आसानासीन करके स्वस्वरूप (आत्मस्वरूप) की स्मृति करनी होगी, जो कि
शङ्करावतार आचार्य शङ्कर की दृष्टि में वस्तुतः भक्ति ही है-
स्वस्वरूपागतिः एव
भक्तिरित्युच्यते।
और इस प्रकार शबरी के लिये साधन भक्ति का दूसरा प्रकार आकार ग्रहण कर साकार होता है और भगवान् कहते हैं-ः

दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रथम भगति सन्तन कर संगा

भील जाति जाता भक्तिमती शबरी श्रीरामकथा की अन्यतम पात्र है। जंगली जन जाति में उत्पन्न भगवत् परायणा शबरी को भगवान् स्वयं आकर साधन भक्ति का उपदेश देते हैं। जब भगवान् श्रीराम पैदा नहीं हुए थे, उसके पहले ही भगवन् नाम का उपदेश ,मतंग ऋषि ने करुणा कृपा करके उसे प्रदान कर दिया था।और कहा था कि,प्रतीक्षा करो प्रभु अवश्य पधारकर तुम्हें कृतकृत्य करेंगे।
एक ऐसे ऋषि मतंग जो ,तप,ब्रह्मचर्य, शम,दम ,त्याग, सत्यशुचिता,यमनियम की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे।उनका कथन अव्यर्थ था –
मृषा न होइ देव ऋषि बानी।
हमारे सद्गुरु मलूकपीठाधीश पुराणप्रसिद्ध सिद्ध बातें कहने में स्वभावतः सिद्ध हैं। वे बताते हैं कि, सन्त दर्शन का फल भगवान् दर्शन और भगवान् के भी दर्शन का फल सन्त दर्शन है।
जौं रघुबीर अनुग्रह कीना
तौ तुम मोहि दरस हठि दीना।
अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता।।
भगवान् कृपा करते हैं, तब सन्त बरबस आकर दर्शन देते हैं। और जब सन्त कृपा होती है, तब भगवान् भी अपने भक्त सन्त की वाणी सत्य करने के लिए स्वयं साक्षात् दर्शन देते हैं।
प्रयागराज में राजित भरद्वाज ऋषि ने भगवान् श्रीराम का दर्शन पाकर, उनके दर्शन का भी फल ऋषि दर्शन बताया था,जिसके फलस्वरूप उन्हें महामुनीन्द्र याज्ञवल्क्य का दर्शन हुआ था।
बड़े सौभाग्य से सत्याग्रही सन्तो का संग सुलभ होता है और निष्प्रयास संसारोच्छेद हुए बिना नहीं रहता-
बड़े भाग पाइअ सतसंगा।
बिनहिं प्रयास होइ भवभंगा।।
मनवाणीकर्म से परम परम उपकारी सन्त सहज ही कृपालु होते हैं-
पर उपकार बचन मन काया।
सन्त सुभाव सहज खगराया।
और जब सन्त मिलते हैं, तब सब जैसे सर्वस्व सुख ही मूर्तिमान मिल जाता है-
नहिं दरिद्र सम जग दुख माहीं
सन्त मिलन सम सुख जग नाहीं।।
बिना सत्संग के कौन सी भक्ति होगी? वात्सल्यगुण सागर भगवान् द्रवित हों ,वे तब द्रवित हों जब ,हम संसार चक्र के भ्रमजाल में स्वयं दुखी होकर आर्तनाद करें।
पाहि मुरारे! कृपयावारे!
और
बिनु सतसंग बिवेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई
वस्तुतः जब हमें आत्मोद्धार की छटपटाहट छापेगी, तब परमात्मा कृपा करेंगे, सन्तों की छापेमारी होगी।जिनके दर्शन परसन से पापराशि विशीर्ण होकर सत्याग्नि में भस्म हो जायेगी-
विनय पत्रिका (चिट्ठी पाती)
भी यही बोलती है-
बिनु सतसंग भगति नहिं होई
ते तब मिलैं द्रवैं जब सोई।
जब द्रवैं दीन दयाल राघव
साधु संगति पाइये।
जेहि दरस परस समागमादिक पापरासि नसाइये।
और निःसन्देह ,परदुखदुखी सन्त सुपुनीता का संग मिलने का काम भाव जागृत हो जाय तो , संसार भाव से अधोगति कराने वाला विषयी यह काम भी कृतार्थ होकर तार देगा।
और इसीलिये मतंग ऋषि की कृपाभाजन दीन हीन शबरी कृपालु श्रीराम की कृपा पात्र बन जाती है।
भगवान् ने करुणा करके भक्ति की प्राप्ति के लिए शबरी को माध्यम बना कर सभी जीवों को साधन के नौ सूत्र बताये हैं। इन्हीं में से पहली साधन भक्ति साधु सन्तों का संग है ,जो अकेले ही अनेक जन्मों की बिगड़ी बनाने में सामर्थ्य शील है-

प्रथम भगति सन्तन कर संगा

।। हरिः शरणम् ।।

तुलसी तजि कुसमाजु

संसार वासना या तृष्णा के त्याग की समानता में संसार का कोई सुख नहीं। इस जीवन में कामोपभोग का सुख और अन्यान्य दिव्य वस्तु व्यक्ति पदार्थों की प्राप्ति का सुख ,किसी भी दशा में वासना त्याग सुख के सोलहवें अंश के भी बराबर नहीं हो सकता।

 तात्पर्य ये कि, सोलहवाँ भाग तो उपलक्षण मात्र है।वस्तुतः काभोपभोग हेतु ,जब यह मानव जन्म ही नहीं मिला,है  तब  वासना त्याग सुख ही सर्वोपरि आनन्द की सीमा का स्पर्श करता है,जिसके बाद परम सुख शान्ति का अनुभव होता है। 

इसीलिये भगवान्  ने कहा-

त्यागात् शान्तिः अनन्तरम् 

वेद भी कहते हैं- त्यागेन एकेन अमृतत्वम् आनशुः ।

मतलब कि विषयों से , भोग त्याग से ही अमरता प्राप्य है।

 अब सोचिये, हम मन्दिर जाते इसलिये हैं कि, हमको संसार का कोई वस्तु व्यक्ति पद पदार्थ अभिलषित है।

 हम कैसे दुर्बुद्धि हैं कि उस ,असीम की पूजा उपासना के फलस्वरूप संसार की ससीम वस्तु चाहते हैं। क्या उस कण-कण में व्याप्त परमात्मा से कोई बात छिपी हो सकती है? 

 हमारा परम हित किसे पाकर  होगा, यह उन सर्वव्यापी को अभिज्ञात है।

अतः उत्तम पक्ष तो यही है कि, जेहि विधि नाथ! होइ हित मोरा। करौं सो बेगि दास मैं तोरा।

 और इसलिये विगतविषयतृष्णः कृष्णमाराधयामि ही वरेण्य पक्ष है,  जिसे नचिकेता, प्रह्लाद और ध्रुव जैसे भक्त धारण करके हमारी धारणा को बदल चुके हैं। 

 परमहंस रामकृष्ण देव ने कहा था कि जब भगवान् के हरि कृष्ण नारायण नामों का उच्चारण-स्मरण करते -करते  गला भर आवे ,तब समझो कि , भगवद् प्राप्ति और संसृति चक्र से मुक्त होने के मार्ग पर हम चल पड़े हैं।

 और सन्तों एवं भक्तों ने भी 

एतदालम्बनं श्रेष्ठं एतदालम्बनं परम् ,कहकर मानव को श्रेष्ठतम मार्ग सुझाया है।

 कलिपावनावतार बाबा तुलसी ने तो और भी आगे जाकर अपनी अनुभूति को अत्यंत अकिंचन भाव से कहकर  व्यक्त किया है।

 वह भगवद् विमुख जीव की नाना जन्मों से संसारोन्मुख दशा दिशा को क्षण मात्र में बदल कर सन्मुख होइ जीव मोहिं जबहीं ।जन्म कोटि अघ नासौं तबहीं ,ऐसा संकल्प भगवान् से कराकर सब बदल कर ,दूसरी कुण्डली ही लिखवा देते हैं।

  लेकिन एक शर्त भी  रखी है कि, कुसंग तो छोड़ना ही पड़ेगा।भगवान् ऋषभदेव तो स्त्री संग ही नहीं, वरन् स्त्री आसंग के संगी जनों के संग का भी परित्याग का निर्देश दिया है- त्यज योषितां संङ्गि-सङ्गम्।

 और बाबा तो बड़ी सहजता से, सरलता से कठिन संसार को पार करने का सुगम मार्ग बताते हुए क्षणभर में सर्वार्थ सिद्धि ही  देते दीखते हैं-

बिगड़ी जनम अनेक की 

अब ही सुधरै  आजु।

होहि राम को नाम जप

तुलसी तजि कुसमाजु।।

।। हरिः शरणम् ।।

तृष्णासुखक्षय

परम योगी महाराज भर्तृहरि ने जिन तीन शतकों -नीति शृंगार और वैराग्य की रचना करके , अपनी महत् प्रतिभा का प्रतिमान प्रस्तुत किया है, उनमें वैराग्य शतक अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 संसार के भोगों को वे भोगे रोगभयम् ,कहते हैं।और भोगों को भोगने की तृष्णा को, वह कहते हैं कि ,तृष्णा तो जीर्ण होती नहीं, हम ही जरा जर्जर होकर शरीर पूरा कर लेते हैं।

 तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा

भोगा न भुक्ताः वयमेव भुक्ताः

और तृष्णा गई नहीं ,वह तो भोगों को भोगते-भोगते और भी तरुण हो गई।

तृष्णैका तरुणायते।।

अब सोचिये, कामनाओं के भोग से काम की शान्ति नहीं।

प्रज्वलित अग्नि में घी डालने से, वह बढ़ेगी ही।

और  संसार में इस धरती का समस्त अन्नधनधान्य पुत्र स्त्री स्वर्ण रजतादि,किसी एक मनुष्य को मिल जाय तो भी ,उसकी तृष्णा शान्त नहीं होगी।

 यह भोगों की तृष्णा बहुत बड़ी दुर्मति है, जिसे छोड़े बिना,अनन्त सुख प्राप्ति असम्भव है।शरीर के सारे अंग उपांग जीर्ण जीर्णतर होते जाते हैं, किन्तु धनाशा और अधिक भोग भोगने की आशा में जीवन की आशा छूटती नहीं, शरीर छूट जाता है –

जीर्यन्ति जीर्यतः केशाः

दन्ताः जीर्यन्ति जीर्यतः।

धनाशा जीविताशा च

जीर्यतः अपि न जीर्यतः।।

  अतः मानव जन्म के अन्तिम  उद्देश्य की प्राप्ति में बाधक इस भोगवासना को तो छोड़ना ही पड़ेगा।

 श्रीरामकृष्ण परमहंस देव ने इन सभी भोग प्राप्ति की विकलताओं को छोड़ने के लिये अपने वचनामृत में भगवान् के किन्हीं नामों के जप स्मरण का निर्देश किया है।वह कहते हैं कि, जब नाम जप से भगवद् दर्शन की व्याकुलता जगेगी, तब सारे भोगों की तृष्णा स्वतः निवृत और नष्ट हो जायेगी।

 अपने वचनामृत में उन्होंने प्राचीन भारत की एक कथा का उल्लेख किया है। एक युवा सन्यासी भिक्षा के लिये जाता है।द्वार पर उस गृहिणी की युवा पुत्री आकर, भिक्षादान के लिए प्रस्तुत होती है। युवती के वक्ष पर उसके स्तनों को देखकर, सन्यासी युवक जोर -जोर से रोने लगता है।

रुदन सुनकर उसकी माता दौड़कर आती है।और रोने का कारण पूछती है। सन्यासी कहते हैं कि मैं भिक्षा नहीं लूँगा माँ। इसके शरीर पर दो बड़े फोड़े हो गए हैं, इसको कितनी पीड़ा  होगी।

 उसकी माँ हँसकर बताती है कि, यह इसके युवा होने और गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके विवाह के पश्चात् सन्तान उत्पन्न करने की अवस्था है।

जब इसकी सन्तान होगी ,तब उसके लिए करुणासागर भगवान् इन फोड़े जैसे दीखने वाले इसके स्तनों में दूध भर देंगे, और उसे पीकर  इसका सन्तान बड़ा होगा।

 भगवान् अत्यंत करुणा कृपा की मूर्ति हैं, जो आने वाली सन्तान के लिए पहले ही सजग होकर व्यवस्था कर देते हैं।ऐसा सुनकर कर युवा सन्यासी भगवान् के लिये व्याकुल होकर भिक्षापात्र फेंक कर वन में चला जाता है। धन्य भारत देश और यहाँ की त्याग तपोमयी संस्कृति, जहाँ भोग के लिए नहीं, योग के लिए स्थान है।और इसीलिये इस भोग तृष्णा से वितृष्ण होने का सन्देश भगवान् व्यास देते हैं-

यत् च कामसुखं लोके ,

यत् च दिव्यं महत् सुखं।

तृष्णासुखक्षयसुखस्यैते

नार्हतः  षोडशीं कलाम्।।

।। हरिः शरणम् ।।

नाम की फेंट कसी है

नाना जन्मों का अज्ञान जनित  देह और गेह की आसक्ति आसानी से जाती नहीं प्रभु!

 हरेः हरेः नाम हरेः नाम

हरेः नामैव केवलम्।

 कलौ नास्त्येव नास्त्येव

नास्त्येव गतिः अन्यथा।

कलि युग केवल हरी गुन गाहा। सुमिरि सुमिरि पावत भव थाहा।।

भगवान् वेदव्यास और हमारे आर्ष एवं प्राचीनतम परम्परा के संवाहक वेदादि शास्त्रों में परा प्रज्ञा से विकसित दृष्टि ने बड़ी सूक्ष्म बात कही है।

   जब भगवान् की करुणा कृपा से मनुष्य जन्म प्राप्त होता है, तब गर्भ गत जीव भगवान् से आर्त भावापन्न होकर प्रार्थना करता है।

  प्रार्थना इसलिये कि गर्भावस्था में जीवात्मा को सैकडों पूर्व -शूकर-कूकर से लेकर इन्द्रादि शरीर के भोगों की स्मृति रहती है।और इसीलिये वह ,जीव कातर होकर प्रभु से कहता कि, एक बार और मुझे मानव जन्म मिल जाय,मैं मातृगर्भ से निकल कर बाहर आ जाउँ , तो ऐसा कोई काम नहीं करुँगा , जिससे कोई भी भोग शरीर मिले।

 मैं आपके शरणागत हूँ।

मैं केवल भजन कीर्तन नाम जपादि ही करूँगा ।

यद् योन्यां प्रमुच्येहम्…।

अब जनि (जन्म) जाउँ 

भजहु चक्रपानी।

    विनयपत्रिका।

इत्यादि वचनों से संसार की भयावहता से व्यथित वह, पूर्व जन्मों शरीरों का स्मरण कर ,प्रार्थना करते हुए नाम जपादि द्वारा मुक्त होने का संकल्प व्यक्त करता है।

 गर्भ वास पूर्ण कर बाहर आते ही भगवान् की प्रचण्ड माया घेर लेती है। सभी पूर्व पराकृत स्मरण, भगवान् स्वयं भुलवा देते हैं, क्योंकि यदि स्मृति बनी रहे तो ,वह पागल हो जाय। 

  और सद्गूरु कृपा से निवेदन के भाव छलक पड़ते हैं, कल्याण भी हो ही जाता है।

अपराधसहस्रभाजनं

पतितं भीमभवार्णवोदरे।

अगतिं शरणागतिं हरे!

कृपया केवलं आत्मसात् कुरु।

बाबा मलूक की वाणी में उसकी प्रार्थना होती है-

दीनदयाल सुनी जब तें

तब ते मन में कछु ऐसी बसी है। तेरो कहाय के जाऊँ कहाँ,

अरु तेरे ही नाम की फेंट कसी है। तेरो ही आसरो एक 

मलूक को, तेरे समान न दूजो जसी है।ऐ हो मुरारि! पुकारि कहूँ या में मेरी हँसी नाहिं 

तेरी हँसी है।।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रभा का आभास

जगदाधार, सर्वकारणकारण,अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड नायक,सर्वेश्वर,परात् पर परमात्मा सर्वत्र विराजे हैं।

हम अपने अखण्ड पाखण्ड के पोषक, बाहरी आडम्बर के प्रदर्शक, स्वयं अपने में हरिः ओ3म् तत् सत् की अनुभूति नहीं कर पा रहे हैं,तो इससे बड़ा आश्चर्य क्या है?

 हृदय में आशा है संसार के धन,सम्पत्ति, मान, बड़ाई की। हम संसार के वैभव को अपना मानने की भूल कीये बैठे हैं। 

पददास, प्रतिष्ठा दास,मानदास,सम्मान दास,रूपया दास,बडा़ई दास,

कामदास, मोहदास, क्रोधदास बने हैं, क्योंकि जन्म-जन्म का अमिट मलिन संस्कार जो है।

 कुछ पूजा पाठ कर भी लेते हैं, तो दम्भ  बढ़ जाता है।

  अपनी किसी पूजा में अपने अन्तर में विराजित हृद्देश में सदा प्रतिष्ठित परमात्मा का अनुभव नहीं होता।

 कुछ करते  भी हैं तो संसार को जनाने रिझाने के लिये ।

अन्तरगत यदि भासता तो कहि-कहि काहि जनाव।

अन्तरजामी जानता अन्तर गत के भाव।।

प्रभु जानत सब बिनहिं जनाए। कहहु कवन सिधि लोक रिझाए।।

 हम बड़े विद्वान और ज्ञानी मानते हैं, अपने को ,वेद शास्त्र की सम्यक् व्याख्या भी कर लेते हैं तो क्या हुआ?

 इससे तो अपना पेट पाल सकते हैं, स्वर्गादि का वैभव और इन्द्रादि का पद भी पा सकते हैं, लेकिन करुणानिधान की करुणा से मिली इस देह को पुनः जन्म में ही ले जा रहे हैं-

श्रीमदाद्य भगवान् शङ्कर ने अपने “विवेकचूडामणि” में यही विवेक व्यक्त किया-

वाग् वैखरी शब्दझरी शास्त्र- 

व्याख्यान-कौशलम्।

वैदुष्यं विदुषां तद्वद् 

भुक्तये न तु मुक्तये।।

इसलिए –

मन क्रम बचन छाँड़ि चतुराई।

भजत कृपा करिहहिं रघुराई।

पहले स्वयं में आत्मानुभूति करनी होगी तब अपने से इतर सभी में उस प्रभा का 

आभास होने लगेगा।

।। हरिः शरणम् ।।