छठ दम शील विरत बहु कर्मा।निरत निरन्तर सज्जन धर्मा।।

छठवीं साधन भक्ति में चार बातें कही गई हैं, और यह गाँठ बाँधकर समझना होगा, कि भक्ति की प्राप्ति में एक-एक अलग-अलग साधन स्वयं में भक्तिदाता है। इन्द्रियनिग्रह(दम), शील(स्वभाव),
निन्दनीय कार्यों से विरति और सज्जन
(मानव) धर्म का परिपालन।अब-
इन्द्रिय माने कि कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों का तत् तत् विषयों के प्रति लगाव का प्रतिरोध करना। 5कर्म और 5ज्ञान इन्द्रियों को अयोग्य योजन से बचाना।
नेत्रों से देखने योग्य रूपों को देखना,कानों से श्रवणीय को सुनना।
जिह्वा से ग्रहणीय ,भगवद् नैवेद्य वस्तुओं
का भोजन और नासिका से आघ्राणीय तत्वों का ग्रहण।
शास्त्र कहते हैं-जितं सर्वं जिते रसे।अर्थात् रसना के आस्वाद आकर्षण से यदि हम बचेंगे, तो अन्य इन्द्रियों के विषयों के बचाव करने में सरलता होगी।इसीलिये कहा गया है कि-
जिह्वा पर विजय से प्रायः अन्यों पर भी विजय हो जाती है।
नाना इन्द्रियों का जो -विषय है, उसे भगवत्-भागवत् पारतन्त्र्य पूर्वक ग्रहण करना। कौन सी खाने पीने की वस्तु मनुष्य के लिये ग्राह्य है और कौन सी नहीं इस पर बारम्बार विचार कर, उसे लेना।और इसीलिये शास्त्र वचन है-
आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः। अर्थात् आहार विहार की शुद्धि से मन की सात्विकता प्राप्त होती है और उसके बाद,करणीय कार्यों की अविचल स्मृति आ जाती है।हमने माता के गर्भ में प्रतिज्ञा कर रखी है, अब एक बार जन्म हो जाय तो किसी अन्य मातृगर्भ में जाने लायक कोई काम नहीं करूंगा।यह स्मरण होते ही हम,कार्याकार्य विचार पूर्वक कोई भी काम करने लगते हैं।जिसमें सन्त सन्त भगवन्त ही अवलम्बन हैं। और वह स्मृति अर्जुन जैसी हो जाये, तो क्या कहना।
इसी से अर्जुन ने कहा-नष्टो मोहः स्मृतिः लब्धा,त्वत् प्रसादात् मया अच्युत!
विषयों के ऐन्द्रिक लगाव में चार अन्तः
इन्द्रियों -मनबुद्धि चित्ताहंकार की बड़ी भूमिका होती है। मननात् मनः सबसे महत्वपूर्ण है, यही वस्तुतः सभी इन्द्रियों का मुख्य प्रयोजक है।
यदि इसे वश में करेंगे, तभी विषयाभिरुचि मिटेगी।
भगवान् ने इसे अभ्यासेन न तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते कहकर नियन्त्रित करने का द्विविध उपाय कहा है।
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन् निरोधः में भी वही बात है।
अब अभ्यास नामजप का करना है।
इसके बिना यह मन अस्थिर ही रहेगा।
मन्मना भव मद् याजी मद् भक्तः मां नमः कुरु ,तो यही निर्देश करता है। इसके सधते ही सब सध जाते हैं।
इन्द्री द्वार झरोखे नाना।
जहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।
आवत देखहिं बिषय बयारी।
तुरतहिं देहिं कपाट उघारी।।
इन्द्रियों का यह स्वभाविक विषय राग तो, नाना शूकरकूकर इन्द्रादि शरीरों से चला आ रहा है।
अतः मन को ,रामनाम, कृष्ण नाम,राधा नाम,दुर्गा नाम जप में बाँधकर ही बाँधा जा सकता है, अन्यथा नहीं।और यदि हरि गुरु सन्त कृपा से नाम जप चल गया, तो संसृति का चक्र भी गया।बस “दम” सध गया और चौरासी का फेरा गया।
स्थितप्रज्ञ के लक्षण में ,दूसरे अध्याय में भगवान् यही बात कहते हैं-
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
और रामानुजाचार्य भगवान् इसकी व्याख्या में कहते हैं-
वश्येन्द्रियं मनःआत्मदर्शनाय प्रभवति।
मतलब कि निर्मल मन होने पर ही आत्म दर्शन या भक्तिलाभ होता है।
शील स्वभाव तो क्षमा दया करुणा से परिपूरित होना ही चाहिए, जो जीवात्मा को परमात्मा से सहज मिला है।
भगवान् तो कारुण्यामृतसागरः हैं।हमारा सहज शील स्वभाव वही है।
विरत बहु कर्मा से तात्पर्य निषिद्ध आचरणों के त्याग से है। यदि हमारा सहज स्वभाव, सत्यप्रेमकरुणा है, तो हम असत्य ,द्रोह,हिंसा में क्यों पड़े हैं। हमें नाम जप से मन को स्थिरऔर चित्त को निर्मल बनाना होगा।
भक्ति प्राप्ति के मार्ग मे हमारे शास्त्रों ने पाँच बाँते निषिद्ध की हैं।इन्हें भक्ति के पाँच काँटे ,कहा गया है।इनके रहते तो भक्ति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ये पाँच अभिमान हैं, जाति,विद्या, पद, रूप और यौवन-
जातिःविद्या महत्वं च रूपं यौवनमेव च।
एते तु यत्नतः त्याज्याः,एते वै भक्तिकङ्टकाः।।
और अब हमें इस तरह अपने अहन्ता ममता को भगवान् से जोड़ना होगा।मैं भगवान् का ही हूँ।और भगवान् ही मेरे।
अहन्ता भगवान् की।और ममता तो भगवान् का जीव के लिए, उद्घोष ही है।
यह अभिमान जाय जनि भोरे।
मैं सेवक रघुपति पति मोरे।
भगवान् भी यही कहते हैं-
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः
जब भगवान् मेरे,हे राम!तवास्मि।तब कोई भय नहीं।हम निर्भय हो गए। वे
धीरे-धीरे प्रत्यक्ष भी होगें। तब जब हम जैसे भोगों के पीछे पागल हैं, भगवान् के लिये ही पागल हो जायँ। और रह गया सज्जन धर्म तो, मनुष्य धर्म ही सज्जन धर्म है ।वह भी नामजप के अभ्यास होने से पालन होने लगेगा।
जैसे अग्नि ,ऊँची-ऊँची लपटों से वायु की सहायता से सब कुछ जला डालता है, वैसे ही नामजप से निर्मल हृदय में अनुभूत भगवान् सारे पापों को जलाकर अपनी शरणागति भक्ति दे देते हैं।
यथाग्निःउद्धतशिखः कक्षं दहति सानिलः
तथा चित्तस्थितो विष्णुः योगिनां सर्वकिल्बिषम्।। विष्णु पु.6/7/74
इस प्रकार शबरी को माध्यम बनाकर
भगवान् ने छठी साधन भक्ति निर्दिष्ट की

छठ दम शील बिरत बहु कर्मा।
निरत निरन्तर सज्जन धर्मा।।

।। हरिः शरणम् ।।

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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay

I am Professor of Sanskrit subject in K.B.P.G College, Mirzapur, Uttar Pradesh, India, since 1991.

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