“सकुचि दीन्ह रघुनाथ”

ध्यान रखें यह ऋषियों की,वेदपुराणों और अजन्मा भगवान् के द्वारा जन्म लेने वाले रामकृष्ण की धरती है।
यहाँ किसी का “भोगवाद” नहीं चला, चल भी नहीं सकता।

हमारे सनातन धर्म में दान का अर्थ हमारे पूर्वजन्म के शरीर के प्रारब्धकर्म से मिली धरतीधनादि को देने से है। जब हम अत्यंत श्रद्धा पूर्वक, किसी भी वस्तु,पदपदार्थ,जमीन ,मकान दुकान, रूपयापैसा,जो हमारे अधिकार में है, उस पर अपना अधिकार स्वयं समाप्त कर, किसी दूसरे को, इन सबका अधिकार सौंपते हैं।
तब वह ” दान” कहा जाता है।यह हमारा धर्म शास्त्र है।

भगवान् ने बिना श्रद्धा के,किये दान को “असत्” कहा और ऐसा दान इस लोक और परलोक दोनों में कोई फल देने वाला नहीं होगा,ऐसा बताया है।
“अश्रद्वया हुतं दत्तं तपः तप्तं
कृतं च यत्।असद् इति उच्यते पार्थ! न तत् प्रेत्य नेह च।।”

अतः दान की सनातन धर्मनिष्ठ विधि व्यवस्था जानकर ही दान में प्रवृत होना
चाहिए।

किसी “विधर्मी” की मीठी-मीठी बातों से सावधान रहना चाहिए ।हमारी आत्मा रामकृष्णनारायण हैं।हमें उनकी वाणी का अक्षरशः पालन करना चाहिए।और
भगवान् की कथा नित्य ही सुननी चाहिए,क्योंकि केवल वही हमारे अन्तः इन्द्रिय मनबुद्धिचित्ताहङ्कार के मालिन्य
की सफाई करती है।
हम अपने शरीर घर द्वार की सफाई जैसेकि रोज-रोज करते हैं।उसी तरह उक्त “अहमादि” की मलिनता (गन्दगी)को जैसी हरिकथा शुद्ध कर देती है, वैसी और कोई नहीं।
“हरिकथा” और कुछ नहीं रोज-रोज का “सत्संग” ही है।
हरिकथा सुनने से श्रीहरि चित्त में आ विराजते हैं।”हरिः चित्तं समाश्रयेत्”और

“बिनु सत्संग न हरि कथा ,तेहि बिनु मोह न भाग।मोह गये बिनु रामपद होइ न दृढ़ अनुराग।”
संसार के त्रिविध गुणों ,सद् रजःतमः से
मलिन बनता रहता मन और चित्त कभी भी भस्मसात् हो चुके समस्त शुद्धसाधन
वाले कलियुग में विशुद्ध नहीं हो सकता।
केवल और सन्तसंगहरिकथा ही मलिन जीव के अन्तःकरण को परिमार्जित करती है।
इसलिये नित्य भगवत्कथा से मन को नहलाना धुलाना होगा। तब विवेक जागेगा।बस समझिये हो गया काम।

और दान तो श्रद्धा से, किसी जोर दबाववश नहीं हो,ऐसा वेद भी कहते हैं।

“भय मानते हुए, कि यह सब मेरा नहीं प्रभु का है, दान करो। सम्पति,सामर्थ्य के अनुसार दान करो । लजाते सकुचाते हुए दान करो ।”

“भिया देयं,श्रिया देयं,ह्रिया देयम्”

“तैत्तिरीय” उपनिषद् की ब्रह्मानन्दवल्ली

विभीषण को जब श्रीमान् रावण,लात मारकर राज्य से भगा देते हैं, तब वह श्रीभरत जी सेवित श्रीराम के चरणों में जाकर गिर पड़ता है।
भगवान् उसे उठाकर गले लगाते हैं, बगल में सादर बैठाते हैं।और तत्क्षण “लंकेश” ही कह देते हैं।
” कहु लंकेस सहित परिवारा
कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।
खल मंडली बसहु दिन राती।
सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
अब देखिये, भगवान् तो सबके अन्तर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। भगवत्ता, जिसे छिपा कर वह मर्यादा में रहते हैं,एकाएक प्रकट हो जाती है।
बिना लंका का राज्य मिले ही लंकेश कह डालते हैं।

अपना दर्शन संसार में अमोघ (कभी व्यर्थ न होने वाला ) कहते हैं।और लंका के सिंहासन के अनिच्छुक विभीषण का “राजतिलक” ही कर डालते हैं। आकाश
से देवता फूल बरसाते हैं। इसलिये कि “रावण का काम तमाम” होना सिद्ध हो गया।
“जदपि सखा तव इच्छा नाहीं।मोर दरस अमोघ जग माहीं।।अस कहि राम तिलक तेहिं सारा।सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।”

और नारायण! दान के विषय में स्वयं परमात्मा “वेद” की मर्यादा रखते हुए, सकुचाते लजाते हुए लंका का राज्य सौंप देते हैं।
अतः अपना कुछ भी नहीं है ।प्रारब्धवश जो कुछ कहने के लिए मेरे हिस्से का स्वतः उत्तराधिकार वश या स्वयं श्रम करके हमने पाया है,उसे ईश्वर का माने।

“दानम् एकं कलौ युगे” इस व्यास वचन को विचार करके,श्रद्धा से दान दें।

क्योंकि सतयुग, त्रेता,द्वापर में क्रमशः तप,ज्ञान,यज्ञ(तपः परं कृतयुगे,त्रेतायां ज्ञानम् उच्यते।द्वापरे यज्ञम् एव आहुः दानम् एकं कलौ युगे) “धर्म”की धुरी रहा है।और कलियुग में दान ही धर्म की धुरी है।
इसीलिये भगवान् भी स्वयं की श्वास से प्रकट ” जाकी सहज स्वास स्रुति चारी”यस्य निःश्वसिता वेदाः” वेद की मर्यादा की रक्षा करते हुए संकुचित होते हुए, विभीषण को दान करते हैं।
“यह दान वैदिक मर्यादा का दान है।”
“अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्ड की अनन्त सम्पदायें सब भगवान् की हैं।”
तब भी नरलीला में भगवान् नागरिक मर्यादा सिखाने के लिए लजाते शर्माते लंका का राज्य विभीषण को देते हैं –

जो संपति सिव रावनहिं दीन्हि दिएँ दस माथ।सोइ संपदा बिभीनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ।।

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।


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नामवाणी निकट श्यामश्यामा प्रकट

बिना नाम जपे संसार में गुजारा नहीं।
जिन्होंने इस संसार को गुजर जाने को बाध्य किया,वे बड़े-बड़े नामजापक अनुकरणीय हैं, जिन्होंने माया को ठेंगा दिखा दिया। व्याख्येय विषय की मीमांसा
रामकृष्णनारायण नामोच्चारण से प्रारंभ की जा रही है।
नारायण! यह शरीर पाँच तत्वों -” क्षिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम शरीरा।” है।
यह जड़ तत्व हैं। इनमें कोई स्पन्दन नहीं। निर्लेप, निर्गुण, निराकार, आत्मा जो परमात्मा का अंश है, उसके शरीर में स्थित रहने से यह क्रियाशील रहता है।
“गगन समीर अनल जल धरनी।इनकै नाथ! सहज जड़ करनी।”ये शब्द समुद्र ने सुन्दरकाण्ड में रघुनाथ जी से कहे थे।

वस्तुतः शास्त्र और सन्त सारे ब्रह्माण्ड को भगवान् की “माया” द्वारा रचित मानते हैं,जो कि परमसत्य है। इस माया का वर्णन श्रीकागभुशुण्डि जी ने गरुड जी के समक्ष,उन्ही के उत्तर के रूट में “उत्तर काण्ड” में किया है-
“सुनहु तात यह अकथ कहानी।समुझत बनइ न जात बखानी।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
चेतन अमल सहज सुखराशी । सो मायाबसभयउ गोसाई ।बन्ध्यौ कीरमर्कट की नाईं ।जड़ चेतनहिं ग्रन्थि परि गई।
जदपि मृषा छूटत कठिनई।तब ते जीव भयउ संसारी।छूट न ग्रन्थि न होइ सुखारी।”
यह जीवात्मा जो पंचतत्व के “पिण्ड” में बैठा है, निश्चित रूप से अविनाशी, चेतना पूर्ण निर्मल,स्वाभाविक सुखपूर्ण, रहनेवाले “ईश्वर” का “अंश” है। वह “ईश्वर” हमारा “अंशी” है।और हम उसके “अंश” मात्र। सत् रज और तम यही कुल तीन गुण हैं। लेकिन यह यह गुण – अविद्यामाया ( प्रकृति) के हैं।
सत् रज और तम गुणों का क्रमशः तीन – सुख-दुःख-मोह, यह कार्य है।
इस जड़ ” पिण्ड” शरीर में उक्त सुख दुःखादि , इन्हीं के कारण, अनुभव में आता है।
यह माया भगवान् की है।
इस माया के दो रूप हैं।
1-अविद्या माया (इसीसे संसार में चेतना है)
2-विद्यामाया(भगवान् की चिर संगिनी, कभी भी क्षण मात्र के लिए भी वियुक्त न होनेवाली सरस्वती,लक्ष्मी और उमा)
मूलरूप में “विन्ध्यवासिनी” जो, दुर्गा-सीता-राधा रूप में कार्यविशेष से “अवतरित” हुई, भगवान् की चिरसंगिनी
“विद्या माया” है।
अतः माया के विषय में यह दो रूप अवश्य जानना चाहिए।

अब देखिये, गोस्वामी जी की पंक्तियों की यह अर्धाली – सो माया बस भयउ गोसाईं।बन्ध्यौ कीर मर्कट की नाईं।
मतलब कि ऐसे निर्विकार चेतन,परमात्मा का अंशभूत यह जीव सुख में रहना चाहिए, किन्तु उक्त प्रकृति यानी कि ” अविद्या माया” के सद् रज तम आदि गुणों में जकड़ कर बँध जाता है।
जैसेकी कीर(तोता) और मर्कट(बन्दर) पिंजर-डोर में बँध जाते हैं।वैसे ही यह मनुष्य भी माया के मायिक गुणों से बने संसार की भूलभुलैया में अपना ईश्वरीय आत्मस्वरूप भूल कर बँधा है।

नारायण!त्रिविध गुणों(मायिक गुणों)के कारण इस संसार में बन्धन और बार-बार जन्म होता है।
सृष्टि चलाने के लिए ही यह माया (अविद्या माया) और उसके गुणों की आवश्यकता भी है,लेकिन बस उतने मात्र के लिए ही।और सबसे बड़ी बात कि, यह ज्ञान , कि यह माया के गुण हैं, इसे बताते हैं ‘सन्तसद्गुरु’। ये सद्गुरु हैं –
सूर ,कबीर, तुलसी,नानक, मीरा, रैदास, जो अपने “आत्मानुभूत” वाणियों के माध्यम से”ग्रन्थाकाररूप”में जीवित हैं।

इनके पहलेभी- नारदव्यास,शुक,सनकादि, के रूप में अपने स्वानुभूत परमात्मचिन्तन ग्रन्थों( कृतियों ) भक्तिसूत्र ,भागवत आदि पुराणों के रुप में वे आज भी जीवन्त अनुभव किये जा रहे हैं।
बिना इन सन्तसद्गुरुओं का आश्रय लिये
भगवान् की दुस्तर माया और त्रिविध गुणों के झंझावात रूप शरीरसंसार से विरति सम्भव नहीं।
“हरि माया अति दुस्तर,तरि न जाइ बिहगेस।” उत्तरकाण्ड।
मायाधीश भगवान् कृष्ण ने मायाधीन
इस जीवात्मा को इससे बचने और माया की गाँठ(फाँस) से बचने के लिए अर्जुन के माध्यम से जीवजगत् को सन्देश दिया

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
माम् एव ये प्रपद्यन्ति मायामेतां तरन्ति ते।
और कहा कि-
मद् भक्तानां तु ये भक्ताः ते मे भक्ततमाः मताः। गोस्वामीजी ने भी उत्तर काण्ड में कहा- “मोरे मन प्रभु अस बिस्वासा।राम तें अधिक राम कर दासा।”

भगवान् की त्रिवधगुणमयी माया से पार पाना अत्यंत कठिन है। जो नामरूप लीलाधाम के द्वारा मेरे भक्तपरायण हो जाते हैं, वे ही इससे मुक्त हो पाते हैं। नारदशुकसनकादि हनुमानजी जैसे भक्तों के जो भक्त बन जायें, तो ही सब समस्या का समाधान है।क्योंकि “भक्तभक्त” मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं। और इस भक्त का भक्त बनकर अविद्यामाया के पार जाकर मानवजन्म सफल होगा।

और रह गई ईश्वरीय माधुर्य गुणों की तो, यह करुणा दया, क्षमा, सहजता सरलता,वात्सल्य आदि रूपों में निरन्तर वर्षाधारा की तरह , उन्ही ईश्वर की अभिन्न (शक्ति) विन्ध्यवासिनी-दुर्गा-सीता और उमा-राधा रूपों के माध्यम से बरबस कृपा बरसा रही है।
इसीलिये बरसाने में यही “शक्ति” बरसाने वारी कही जा रही है।किन्तु केवल भक्तों का भक्त बनकर,उनके माध्यम से ही अनुभूति का विषय बन जाती है। भक्त
नारद ने ध्रुव प्रह्लादादि के लिये माध्यम बनना स्वीकारा,क्योंकि इन भक्तों की किंचित् प्रवृत्ति भगवान् के प्रति थी। सब जानते हैं,कि –
जगदम्बा के परमनिष्कामी भक्त पूज्य
परमहंस रामकृष्णदेव ,जब युवा सन्यासी विवेकानन्द को माँ काली का अनुभव कराते हैं, तब यह उदाहरण रूप में बहुश्रुत और सार्वजनिक हो जाता है ।

और यदि कोई भी अवगुण यदि मुझमें है, तो संसार के ,शब्द ,स्पर्श,रूप,रस,गन्ध आदि पाँच विषयों में आकृष्ट होने से है।
इस आकर्षण से बचना, भक्तचरणाश्रय से ही हो पाता है।
ये विषय, क्रमशः उन्ही -आकाश, वायु, अग्नि, जल,पृथ्वी के हैं।
अब रह गई ईश्वरीय करुणा आदि गुणों के पाने की, तो यह सब उस” अंशी ” ईश्वर का “अंश” होने से हम सभी मनुष्य शरीरों में स्वतः है।अनुभव में नहीं आता बिना माध्यम के।
“अस प्रभु अछत हृदय अविकारी।
सकल जीव जग माहिं दुखारी।।”

कलिकाल में केवल नारायण हरि राम कृष्ण लक्ष्मी सीता राधा उमा दुर्गा नामों का सतत जप अभ्यास करके जन्म-मृत्यु का बन्धन कटेगा, माया की गाँठ छूटेगी।
गोस्वामीजी अन्त में कह डालते हैं,देववाणी में –
“हरिं नरा भजन्ति येतिदुस्तरं तरन्ति ते”
अति दुस्तर ” अविद्या माया ” का स्तर बड़ा ऊँचा है, विकट है। और विकट है तो इस मानव जीव के जीवन का बहुत बड़ा संकट है।

किन्तु इसके लिए शुकसनकादि नानकमलूकमीरा तथा तुलसीकबीरादि की वाणियों का अवलम्ब लेना होगा, जिनमें भगवन् नाम को ही मानव जीवन के चरमलक्ष्य मायामुक्ति और भगवद्दर्शन
का एकमेवोपाय कहा गया।
इसीलिये व्रज के सिद्धरसिक गा-गाकर धन्यातिधन्य कृतकृत्य हैं-

“सत्य है यह विकट संसार जायेगा कट
नाम वाणी निकट श्यामश्यामा प्रकट”
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तरूपा
नारायणि नमोस्तुते


गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

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राम जपो

देखो बड़ी बातें कह देना लिख देना और कुछ है ।
किन्तु रामकृष्णनारायण नामों का सतत मनवचनकर्म में अनुभव करना दूसरी बात।
रामकृष्णनारायण नामों का चौबीसों घंटे जब सतत स्मरण करोगे तब आदमी बनोगे। मैं तो आदमी बनने की तलाश इन्हीं नामों में कर रहा हूँ। आज से अभी से इनके लीला कथा चरित अमृत में डूब जाना पड़ेगा।
तब आत्मस्मृति होगी।
आत्मस्मृति होते ही जगद् में जगत् के कण-कण में आमने सामने इधर उधर छोटे बड़े सभी में तत् तत्व आत्मतत्व का इन्हीं चर्मचक्षुओं से दर्शन होने लगेगा। सब काम बन जायेगा।
और नहीं तो रोज चौबीसों घंटे सतत नाम स्मरण नहीं होगा।कुछ उखड़ने वाला नहीं। यह त्रिगुणात्मक माया सब उखाड़ देगी।
राम राम राम जीह जौ लौं तू न जपिहै।
तौ लौं तू कहूँ जाय त्रिविध ताप तपिहै।

गुरुः शरणम् ।हरिः शरणम्।

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विनयप्रेम से परमसत्ता-बोध

नारायण!इस संसार में,सबको धरनेवाली इस धरती पर कामनाओं का अन्त नहीं। सारी धरती का सारा साम्राज्य भी किसी एक को दे दिया जाय तब भी कमी बनी रहेगी। भगवान् के ध्रुव प्रह्लाद आदि भक्त, तो भगवान् से भगवान् को ही माँगते हैं।
नचिकेता यमराज से परमात्मसत्ता की जिज्ञासा करता है।
नारद शुकसनकादि की वाणियों का सार भी यही है।हमें इन्हीं का सहारा लेना पड़ेगा, जहाँ नारदजी “भक्ति”की सर्वोच्चता निष्कामता को स्वीकारते हैं। क्योंकि एक कामना पूरी होते ही दूसरी कामना मुँह बाये खड़ी रहेगी।और हम भगवान् “दास”नहीं, बल्कि “कामनादास” बने रहेंगे।
अतः भगवान् की कृपाकरुणा से मिले मानव शरीर के जन्म को सार्थक करना है तो, कामनाओं का दास नहीं भगवान् दास बनकर ही पुनः जन्म का बन्धन कटेगा।

भगवद् विग्रह या भगवान् के अर्चावतार का अर्चन इसलिये कि, “भोग” के लिये न जन्मना पड़े,बल्कि भगवदाज्ञा से भगवान् के परिकर बन कर भगवान् के ही साथ उनकी उद्घोषणा ” धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे” में योग के लिये और
भगवद् रसलीलाविलासार्थ “रसो वै सः” की रसानुभूति हेतु जन्म हो।इसके लिए वेदादिशास्त्र और उनके आचारक साधु-सन्त या उनकी वाणियों का आश्रय और कहिये कि उन्ही चरण रज लेनी होगी -“विना महत्पादरजोभिषकम्”
इसकी सिद्धि दीखती नहीं।
जब नारद जी अपने “भक्तिसूत्र” में “भक्ति”की सार्थकता बताते हैं। तब इसे कामनारहित ही कहते हैं।
“सा न कामयमाना निरोधरूपत्वात्” वे तो
कामना त्याग को भक्ति का मूलाधार बताते हैं। इसका संकल्प लेते ही-
भक्तवत्सल भगवान् लौकिक अलौकिक सभी सुख दे देते हैं। निष्कामता में कहीं भी सन्तोष ढूँढना नहीं है।सिद्धरूप में वह
सन्तोष स्वतः प्राप्त है। इसके लिए कमर कस करके,संसार में-
प्रभु प्रदत्त कार्य को विनय और प्रेम पूर्वक करना होगा। जिसमें अहं भूमिका
समय और अनुशासन की भी है।
सभी में मनुष्यों में प्रभु सत्ता देखकर दण्डवत् प्रणाम करना होगा।कम से कम
लीलापुरुषोत्तम ने आज से 52सौ साल पहले यही उपदेश किया था-
दण्डवत् प्रणमेद् भूमौ
आश्वचाण्डालगोखरान्।
भागवत महापुराण

अ+अश्व=आश्व चाण्डाल गो खर
अश्व,चाण्डाल, गो और खर(गदहा)”आ”
(तक) को देखकर भगवद् भाव से दण्डवत् प्रणाम करे। नारायण! सीखना होगा।
इसीलिये तीन-तीन बार रघुनाथ जी का दर्शन करने वाले-
“रामचरित मानस” जैसे अद्वितीय ग्रन्थ की रचना करनेवाले परम पूजनीय प्रातः स्मरणीय “गोस्वामीजी” जी ने
कहा-
जड़ चेतन जग जीव जत
सकल राममय जानि।
बन्दौं तिनके पदकमल सदा जोरि जुग पानि।
सियाराममय सब जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।

यही तो मनुष्य जीवन की मर्यादा है।मानवीय जीवन का संविधान है।
इसके बिना किसी को कुछ नहीं मिला है और न ही मिलेगा।
“विनय” और”प्रेम” मानव के सर्वोच्च अस्त्र-शस्त्र हैं।
विनय प्रेमबस भई भवानी।
खसी माल मूरति मुसुकानी।

इसलिये रामकृष्णनारायण नाम जपना जिससे”अतिविनयी” और “अतिप्रेमी” प्रभु की “प्रेमाभक्ति” पाकर जीवन सार्थक हो जाय।अपने और प्रभु के नित्य सम्बन्ध की “स्मृति” होकर मानव-जन्म सफल हो।
विनय और प्रेम के बिना जगत् की वास्तविकता और ” परमसत्ता” का बोध
नहीं होगा,नहीं होगा।

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।

“मानव शरीर प्राप्ति, घर वापसी”


यह मनुष्य जीवन घर वापसी है। घर कौन? परमात्मा।
जीवात्मा का अपना घर परमात्मैव।
लेकिन जब तक छोटा/बड़ा ऊँचा/नीचा इस चमड़े के नेत्र से दीखता रहेगा।
तब तक भोगने वाला कर्म होता रहेगा।
और पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् चलता रहेगा, नाना शरीरों की यात्रा जारी रहेगी।
हे हरि कवन जतन भ्रम भागै।

यह जाति विद्या पद पदार्थ जमीन मकान दुकान का महत्व और रूपयौवनादि का अभिमान बना रहेगा।
कोई भक्ति, पूजा-पाठ जप तप आराधना तीर्थ समाधि योग ध्यान गंगास्नान काम नहीं आयेगा।
भक्ति केवल शरणागतिभाव है,जिसे अपने नेत्रों से दीख रहे भेददर्शन को मिटाने से मिलेगा।
सिया राम मय सब जग जानी
करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।
को अपनाये बिना सब आराधना अभिमान मात्र है।
स्कन्द -पुराणे –
जातिः विद्या महत्वं च रूपं यौवनमेव च।
पञ्चैते यत्नतः त्याज्याः
एते वै भक्तिकङ्टकाः।।

अपने को अपने में देखो
सभी में वही एकः देवः सर्वभूतेषु गूढः।

जब अपनी पहचान होगी तब भेदबुद्धि भ्रम मिटेगा।
अपनी पहचान गीता, रामायण जैसे शास्त्र सतत सेवन करने और रोज भागवत -रामकथा सुनने से ही होगी।
दुनिया के तीर्थों में जाकर भी मनुष्य भी नहीं बन पाओगे यदि निष्कामी साधु सज्जन सन्त का संग नहीं मिला।
भगवान्/भगवती से प्रार्थना मात्र इतनी की जैसे विभीषण को हनुमान् जी मिले,क्योंकि इसमें कारण केवल सीताराम जी का अनुग्रह ही था।
” अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता,बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा तौ तुम मोहिं दरस हठि दीन्हा।”

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।बन्दौं सबके पदकमल सदा जोरि जुग पानि।

पहले अपने को पहचानो
तब समझ में आयेगा कि,जो मैं हूँ वही सामने दीख रहा सब कुछ है।
नारायण नारायण नारायण
सीताराम सीताराम सीताराम
राधेकृष्ण राधेकृष्ण राधेकृष्ण

दुर्गा सीता राधा उमा रटते रहो
चैबीसों घण्टें।सब दृष्टिदोष मिटेगा। सब में भगवान्/भगवती दीखेंगे।
मनुष्य जीवन सफल होगा।

गुरुः शरणम् ।हरिः शरणम्।।

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भरतहिं जानि राम परिछाहीं


भरत तो राम की परछाईं हैं। जिस प्रकार करुणा,दया,शरणागतवात्सल्य और प्रेम
श्रीराम में है,वह केवल भरत में सम्भव है।
क्योंकि भरत श्रीराम की परछाईं हैं,और
कोई भी परछाईं अपने “मूल”से भिन्न हो ही नहीं सकती।
नारायण! जो रूप-स्वरूप धारण करके व्यक्ति चलता है, परछाईं ठीक उसके पीछे-पीछे अनुगमन करती चलती है।
“मूल” की मौलिकता,”प्रतिच्छाया” से एकदम अभिन्न होती है।
श्रीभरत की रामप्रतिच्छायिता होने से वे अपने मूल श्रीराम जी से पूर्णतः एक हैं। तात्पर्यतः उनका भी निश्चयेन छायात्वेन “गोद्विजधेनुदेवहितकारित्व” सिद्ध है।
मतलब कि मर्यादा और लोकमंगल की प्रतिस्थापना करने के लिए “रामावतार”
हुआ है, तो भरत इससे विपरीत कैसे हो सकते हैं? इसलिये –
कोई भी भय देवताओं को अपने मन में कदापि नहीं रखना चाहिए,”गुरुबृहस्पति” का “गुरुमत”यही मूल्य स्थापित करता है।

राक्षसों के अनाचार से पीड़ित शिव और ब्रह्मादि देवताओं सहित गोरूपिणी धरती जब व्याकुल होकर भगवान् की शरण ग्रहण करती है, तब शरणागतवात्सल्य में अभिससिंचित श्रीहरि की गो-गिरा तो निर्भयता का”कवच” ही बन जाती है-
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा।
तुम्हहिं लागि धरिहहुँ नरबेसा।।

इधर “रामलीला “के भरत-राम संवाद में भगवान् श्रीराम, भरत की विह्वल दशा देख कर अत्यंत संकुचित हो जाते हैं-
“अंतरजामी प्रभुहिं सँकोचू”

जब प्रभु संकोच में तब उनकी परछाईं जैसे भरत भी अभिन्न होने से भगवान् के अत्यान्तात्यन्त अनुग्रह आशीष का स्मरण करते हुए दोनों हाथ जोड़कर विनयावनत
हो जाते हैं-
कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।
यदि गुरु वशिष्ठ प्रसन्न हैं और प्रभु भी हमारे ही अनुकूल तब मेरा अब कोई भी आग्रह नहीं।
मेरा दुर्भाग्य माता कैकेयी की मोहासक्त “कुटिलता” विधाता की “विषमता” और काल की “कठिनता”है।
मेरा पैर ही खींचकर इन सभी ने मुझे कष्ट दिया है और हे मेरे प्रभु!आपने तो अपने और रघुकुल की मर्यादा “रघुकुल रीति सदा चलि आई।प्रान जाहिं पर बचन न जाई” का मार्ग छोड़ा ही नहीं।संसार तो भला,भला कहाँ?(दुःखालयमशाश्वतम्)है।

आपका स्वभाव कल्पवृक्ष के समान है, क्योंकि,उसमें सन्मुख-विमुख होने का कोई मतलब नहीं है,वृक्ष की परिधि तो वृत्ताकार है।जो भी उसकी छाया अथवा शरण ग्रहण करता है , उसकी इच्छा भला अपूर्ण कहाँ?
“कहौं कहावौं का अब स्वामी ।कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।।गुरु प्रसन्न साहिब अनुकूला।मिटी मलिन मन कलपित सूला
मोर अभागु मातु कुटिलाई बिधि गति बिषम काल कठिनाई।।पाउ रोपि सब मिलि मोहिं घाला।प्रनतपाल पन आपन पाला।।जगु अनभल भल एक गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाई।।
“देउ देवतरु सरिस सुभाऊ।
सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।

गुरु और आप जैसे स्वामी को पाकर अब कोई सन्देह और क्षोभ मन में नहीं रहा।
जो जनहित हो,आप वही करें ।सेवक भरत का आपकी सब प्रकार से सेवा ही सर्वोच्च है।सेव्य को यदि सेवक संकोच में डाल दे,तो उसकी बुद्धि बिगड़ी हुई है।
सेवक अपने सेव्य की सेवा पर अडिग रहे।अपने सुख-लाभ का लोभ छोड़े।
” लखि सब बिधि गुरु स्वामि सनेहू।
मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू ।।
अब करुनाकर कीजिअ सोई ।
जन हित प्रभु चित छोभु न होई।।
जो सेवकु साहिबहिं सँकोची।
निज हित चहइ तासु मति पोची।।
सेवक हित साहिब सेवकाई।
करै सकल सुख लोभ बिहाई।।
भरत सेवक और भगवान् सेव्य हैं।सेवक तो सेव्य का अनुगामी होता है,इसीलिये वह सेव्य की छाया की तरह चलता है।

इसी सूर्यवंश परम्परा में महाराज दिलीप,जब गोसेवाराधना धर्म में थे ,तब उनकी सेवा इसी तरह थी।महाराज दिलीप नन्दिनी के पीछे-पीछे उसकी छाया(परछाईं)की तरह चलते हैं।महाकवि कालिदास ने गुरु वशिष्ठ प्रदत्त “नन्दिनी”
की सेवा करते हुए दिलीप का वर्णन किया है-” जब जहाँ वह बैढती तब,तहाँ राजा बैठते और जब उठ कर चलती तब वह उसके पीछे-पीछे चलने लगते थे।”
” स्थितः स्थिताम् उच्चलितः प्रयाताम्।
निषेदुषीम् आसनबन्धधीरः”
इस प्रकार “छायासेवा”की सरणि भरत की अपनी मान्य पूर्व परम्परा है।इसलिये ” भरतहिं जानि राम परिछाहीं”
भरत ने आगे गुरुसम्मत अनेक प्रस्ताव प्रभु राम के समक्ष रखे हैं-
1- यदि भगवान् अयोध्या लोटें तो सभी अवधवासियों,विधवा माताओं,पुरजन,
परिजन,मेरा स्वयं का स्वार्थ सिद्ध होगा।
अनाथ अयोध्या प्रभु राम से सनाथ होगी।

“स्वारथु नाथ फिरें सबही का”

2- यदि आप द्वारा प्रदत्त “आदेश का पालन” किया जाये तो वह करोडों तरह से नीक(सुन्दर)ही होगा।यही स्वार्थ और परमार्थ रूप(दानव-वध से धरती का भार रहित होने रूप) सम्पूर्ण पुण्यफल और सारी शुभ गतियों का सार-सर्वस्व है।
और यही सभी विकल्पों का सुन्दर शृंगार भी –
“किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।
यह स्वारथ परमारथ सारू।
सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू।।”

3- प्रभु! के समक्ष सेवक भरत की विनती
यदि “उचित” समझी जाय तो यह कि “राज्याभिषेक” की समस्त सामग्री सजी सजाई है, आप “राजतिलक” करायें।
आप इस “सामग्री” को कृतार्थ करें, यदि आपका “मन” माने।
” देव एक बिनती सुनि मोरी।
उचित होइ तस करब बहोरी।।
तिलक समाज साजि सब आना।
करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।

4- अनुज शत्रुघ्नलाल जी सहित मुझे वन भेज कर सभी को सनाथ कर दें।
” सानुज पठइअ मोहि बन,
कीजिअ सबहिं सनाथ।”
5- शत्रुघ्नलाल जी और भैय्या लक्ष्मण को अयोध्या भेज दें,मैं आपके साथ वन चलूँ।
” नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ,
नाथ चलौं मैं साथ।।”
6- आप श्रीजानकी सहित अयोध्या प्रस्थान करें,और हम तीनों भाई वन चले जायँ।
” नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई।
बहुरिअ सीय सहित रघुराई।।”

हे प्रभु!जिन विकल्पों ,विधियों में से जिसमें भी आपकी प्रसन्नता हो, आप वही करें,क्योंकि-
आप तो सकलार्तिहर, करुणासागर हैं।
“जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई।
करुना सागर कीजिअ सोई।”

मेरे ऊपर ऐसा विचित्र भार पड़ा है,कि मुझे न तो धर्म का और न ही नीति का
ज्ञान रह गया है।मैनें सेवक होकर आपसे जितनी तरह की बातें की हैं, उन सभी में नीति और धर्म विचार का लेशमात्र भी नहीं है।
स्वार्थ से सनी मेरी बातें हैं, आर्त का चित्त विचित्त होता है। मैं सेवक होकर आपको उत्तर दूँ ,यह ठीक नहीं। आपका आदेश सर्वोपरि है। किसी भी सेवक के लिये स्वामी का “आदेश” होऔर वह यदि “उत्तर” दे दे तो लज्जा भी लजा जाय।
“देव दीन्ह सबु मोहि अभारू।
मोरे नीति न धरम बिचारू।।
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू।
रहत न आरत के चित चेतू।।
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई।
सो सेवक लखि लाज लजाई।।”
भरत सब प्रकार से अपार अवगुणसागर
है।स्वामी का यह परम प्रेम है कि लोग
उसे “साधु पद” से सराह रहे हैं।
अब अच्छा तो यही है कि आप जैसे “संकोची” स्वामी का मन जाने नहीं पाये। अर्थात् आपके “मनोनुकूल” जो हो,वही सभी(अवधवासियों,सभी परिजनपुरजन
माताओं ,गुरुदेवताओं ,दनुजों) के लिये भी श्रेष्ठ होगा।
“अस मैं अवगुन उदधि अगाधू।
स्वामि सनेह सराहत साधू।।
अब कृपाल मोहि सो मत भावा।
सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।।”

हे प्रभु! आपके चरणों की सौगन्ध है, भरत सत्यभाव से कहता है कि जगमंगल का हेतु आपकी आज्ञा का पालन ही है।
जिसे जो-जो आदेश हो, आप कहें,वही सबको शिरोधार्य है। सभी झूँठ,अनाचार समाप्त हो जायेंगे।
” प्रभु पद सपथ कहउँ सतिभाऊ।
जग मंगल हित एक उपाऊ।।”
” प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि,
जो जेहि आयसु देब।
सो सिर धरि धरि करहिं सबु,
मिटिहिं अनट अवरेब।।”
अनन्तर प्रभु राम शान्त रहते हैं।भरत के वचनों से देवमण्डली और तपस्वी वनवासी हर्षित हैं।अवधवासी असमंजस
में हैं, इसलिये कि जाने क्या निर्णय हो।
” भरत बचन सुनि सुनि सुर हरषे।
साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।
असमंजस बस अवध नेवासी।
प्रमुदित मन तापस बनबासी।।
चुपहिं रहे प्रभु राम सँकोची।
प्रभु गति देखि सभा सब सोची।।

नारायण! ज्ञानी-विज्ञानी वन-तापस मण्डली तो यह जानती थी कि प्रभु, धरती का भार, उतारने और भक्तों के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाने के लिए मानुष तन धर कर आए हैं –
“विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह,
मनुज अवतार।निज इच्छा निरमित तनु,
माया गुन गो पार।”
अतः सभी का भला होगा,इसमें कुछ भी अन्यथा नहीं है,क्योंकि भरत श्रीराम की परछाईं हैं- और परछाईं अनुसरण करती है “जिमि पुरुषहिं अनुसर परिछाहीं” भरत तद्वत्” “श्रीरामवत्” हैं। किसी का भी अनभल नहीं होने वाला।
इसलिये देवगुरु वृहस्पति ने देवराज को सान्त्वना दे दी थी कि, हे देवताओं मन को स्थिर करो,भरत जब रामपरछाईं हैं तब रामवत् ” भरत” से भय करना ठीक नहीं है-

” मन थिर करहु देव डरु नाहीं।
भरतहिं जानि राम परिछाहीं।।”

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम् ।

भरत चरन अनुराग

अपनी मर्यादा शिक्षण लीला में रघुनाथजी ने वनवास लीला के माध्यम से भरत का ऐसा चारुचारित्र्य चित्र उतार दिया कि स्वयं भरत का नामस्मरण ही भवसागर तारनतार बन गया।
लोक सुजस परलोक सुख सुमिरत नाम तुम्हार।
आगे भगवान् ने कहा कि शिवजी को साक्षी मान मैं सत्य स्वभाव से कहता हूँ कि, हे भरत! यह सारी धरती तुम जैसे त्यागी वीतरागी के निर्दिष्ट मार्ग के अनु- सरण से सुखी और टिकी है,सभी सुख की अनुभूति कर रहे हैं,क्योंकि”कस्य सुखं न करोति विरागः”। इसमें कोई कुतर्क नहीं करो,क्योंकि किसका किससे वैर है और किसका किससे प्रेम है, यह छिपा नहीं रहता-
कहहुँ सुभाउ सत्य सिव साखी,भरत भूमि रह राउरि राखी।तात कुतरक करहुँ जनि जाएँ,बैर प्रेम नहिं दुरइ दुराएँ।

ऋषियों और मुनियों के समीप पशु-पक्षी
निर्भ्रान्त चले जाते हैं, लेकिन उनके प्राणों के ही बाधक,बधिकों को दूर से देखकर वे भाग जाते हैं।कौन मेरा हितकर और कौन अहितकर,पशु-पक्षी भलीभाँति जानते हैं।
और मनुष्य शरीर तो परम विवेक सम्पन्न, गुणों और ज्ञान-विज्ञान, का निधान है-
मुनि गन निकट बिहग बन जाहीं,बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।हित अनहित पसु पच्छिउ जाना,मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।
तात भरत!मैं तुम्हें शैशव से ही अच्छे से जानता हूँ।तुम अपने हृदय में असमंजस क्यों रखते हो।”राजा”ने मुझे त्याग कर अपने संकल्पित “सत्य” की रक्षा कर ली।
शरीर त्याग कर प्रेम-प्रण का रक्षण किया
“तात तुम्हहिं मैं जानउँ नीके ,करौं काह असमंजस जीके।राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी, तनु परिहरेउँ प्रेम पन लागी।”
“रानी कैकेयी के प्रति प्रेम-प्रण की रक्षा सत्यसंकल्प की रक्षा, और प्रेमविग्रह चित्स्वरूप प्राणाधार मेरे(राम के) त्याग से स्वाभाविक प्राणत्याग करके “पिताजी”ने अपने पति-पिता-राज-धर्म सबकी रक्षा कर ली” उनके वचनों के विपरीत जाना मेरे लिये शोचनीय है।और इससे भी अधिक मेरे लिये तुम्हारा संकोची स्वभाव है। और सबसे बड़ी बात यह कि गुरु का मेरे लिए यह आदेश है कि, जो भरत चाहें वही,मुझे करना है-
तासु बचन मेटत मन सोचू,तेहिं ते अधिक तुम्हार सँकोचू।ता पर गुरु मोहि आयसु दीन्हा,अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।
भगवान् का भरत पर ऐसा अनुग्रह देखकर, सारी उपस्थित सभा सानन्द हो गई, क्योंकि भगवान् ने कहा कि हे भरत! तुम अपने मन में प्रसन्नता धारण करो,कोई संकोच मत करो,मैं सत्यसन्ध हूँ, जो कुछ भी तुम कहोगे,अवश्य ही मैं वही करने का वचन देता हूँ –
मनु प्रसन्न करि सकुच तजि,कहहु करौं सोइ आजु।सत्यसन्ध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाज।
अब इधर इन्द्रादि देव भयभीत हो गए।
सोचा कि राक्षस विनाश का बना बनाया खेल बिगड़ सकता है।परस्पर विचारने लगे कि भगवान् तो भक्त के वशीभूत रहते हैं।अम्बरीश-दुर्वासा की घटना का स्मरण होने लगा,कि भक्त अपने प्रति कृतापराध को तो क्षमा करते हैं, किन्तु भक्तापराध को कदापि नहीं।सभी निराश होने लगे,और मन ही मन श्रीराम जी के शरण में चले गए।किन्तु उन्होने सोचा –
” भक्तापराध तो भक्त शरणागति से ही कटेगा, इतिहास साक्षी है।”
माथा पीटने लगे और परस्पर एक दूसरे के कान में कहने लगे कि अब तो देवकार्य
भरत के हाथों है ।लम्बे समय तक विषाद में देवता रहे।”भक्तदृष्टसत्यरक्षण”और भक्त-रक्षण हेतु भगवान् ने “नृसिंहावतार”
धारण कर सबको बचाया था।
भक्तभरत-स्मरण और भक्तशरणागति ही एकमात्र उपाय है-
सुरगन सहित सभय सुरराजू।
सोचहिं चाहत होन अकाजू ।।
बनत उपाय करत कछु नाहीं।
राम सरन सब गे मन माहीं।
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं।
रघुपति भगत भगति बस अहहीं।।
सुधि करि अंबरीस दुरबासा।
भे सुर सुरपति निपट निरासा।
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा
नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।।
लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा।
अब सुर काज भरत के हाथा।।
देवताओं को कोई भी अन्योपाय नहीं सूझता,सिवाय भगवान् के भक्त की सेवा। राम जी अपने सेवक की सेवा से ही सर्वाधिक प्रसन्न होते हैं।
आन उपाय न देखिअ देवा।
मानत रामु सुसेवक सेवा।।
यदि राम जी को वश में करना हो तो सभी
लोग,हृदय से भरत जी का सप्रेम स्मरण करें। श्रीभरत जी ने अपने गुणों और शील स्वभाव से श्रीराम जी को वश में कर लिया है-
हियँ सप्रेम सुमिरहु सब भरतहिं।
निज गुन सील राम बस करतहिं।।

अब तो गुरु बृहस्पति ने देवताओं के विवेक की सराहना की है। क्योंकि देवों ने
विवेकपूर्वक ,भरतभक्ति करने का जो निश्चय कर लिया है।
इन देवताओं का तो सौभाग्य ही जग गया है, क्योंकि सारे “सुमंगल के मूल” भरत के चरणों में अनुराग पर अडिग हो चुके हैं।इन्ही भरत के चरणाश्रय से रामाश्रय मिलेगा और रावणादिक आसुरी शक्तियाँ भी विनष्ट हो जायेंगीं-

सुनि सुरमत सुरगुरु कहेउ,
भल तुम्हार बड़ भागु।
सकल सुमंगल मूल जग,
” भरत चरन अनुरागु।।”

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्।
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सुमिरत नाम तुम्हार

जासु नाम सुमिरत एक बारा,उतरइ नर भवसिंधु अपारा । जिन भगवान् के नाम का एक बार भी आर्त-स्मरण करने पर मनुष्य मात्र इस असारभवसागर से पार हो जाता है, ऐसे रघुनाथ जी भरतजी के नामस्मरण को सारे लोकालोक सुखों का साधन मानते हैं ।
यह त्रिकालाबाधित और त्रिभुवन व्यापक मत श्रीरामजी का है कि, इन सभी में जितने भी पुण्यात्माधर्मात्मा हैं,हुए हैंऔर जो भविष्य में होने वाले हैं, उन सभी में भरत जैसा कोई नहीं है।जो भी किंचित् धर्मात्मापुण्यात्मा का स्वरूप है,वह सभी भरत से निम्नवत् हैं।
तीनि काल तिभुवन मत मोरे,पुन्यसिलोक तात तर तोरे।
इसके पहले की लीला है कि
नारायण! श्रीरामजी भरत की बड़ाई उनके सम्मुख करते हुए संकुचित हो जाते हैं ,क्योंकि भरत लघुभ्राता हैं।
अब चूँकि भरत तो रामजी की परछाईं ही हैं, इसलिये रामेच्छा भरतेच्छा और भरतेच्छा,रामेच्छा है।तब श्रीरामजी ने कहा कि जो भरत कहें ,उसी में सभी का भला है ,ऐसा कह चुप हो जाते हैं-
लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई ,करत बदन पर भरत बड़ाई ।भरतु कहहिं सोइ किएँ भलाई ।अस कहि राम रहे अरगाई।अब-

गुरु समाधान का क्षण आ जाता है , और भरत से वशिष्ठ जी ने कहा कि कोई संकोच की बात नहीं, कृपाकरुणासागर अपने भाई से अपने हृदय की बात कह दें तो अच्छाई है-
तब मुनि बोले भरत सन,सब सँकोच तजि तात।कृपासिंधु प्रिय बन्धु सन कहहु हृदय कै बात।
रामहिं भजहिं ते चतुर नर, जैसे राम के अभिन्न भक्तभरत ,गुरु और प्रभु की ऐसी समग्र अनुकूलता देख कर,स्वयं पर ही सारा निर्णय-भार समझ कर , विचार करने पर भी कुछ कह नहीं पाते।शरीर रोमांचित है।सभामध्य खड़े होते हैं और नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की धारा बह चलती है।

कहतेहैं कि मुनिश्रेष्ठ ने हमारे कुछ कहने से पहले ही ,मुझे वन औरआप सभी को अयोध्या लौटने का मत व्यक्त कर दिया है ,जिसका निर्वाह हो जाय तो मेरे लिये यही सर्वस्व है-
सुनि मुनि बचन रामरुख पाई ,गुरु साहिब अनुकूल अघाई।लखि अपनें सिर सबु छरु भारु।कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े।नीरज नयन नेह जल बाढ़े।कहब मोर मुनिनाथ निबाहा।एहिं ते अधिक कहौं मैं काहा।
हमारे नाथ का शीलस्वभाव ऐसा है कि वह तो अपराधियों पर भी क्रोध नहीं करते ।मुझ जैसे छोटे भाई पर स्नेह ऐसा कि खेल-खेल में भी कोई रोष नहीं करते थे।शैशव से हमने आपका संगत्याग नहीं किया(सतां सङ्गो हि भेषजम् )आपने मेरा मन रखने के लिए मेरे हारने पर भी ,मुझे जिता दिया करते थे।आपकी कृपारीति मुझे सर्वथा ज्ञात है-
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ, अपराधिहु पर कोह न काऊ।मो पर कृपा सनेहु बिसेषी ,खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।सिसु पन ते परिहरेउँ न संगू,कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।मैं प्रभुकृपा रीति जिय जोही ,हारेहु खेल जितावहिं मोही।

विधाता मुझे मिलते दुलार को नहीं सह सका और जननी कैकयी को माध्यम बना कर हम दोनों में भेद डाल दिया।
“बिधि न सकेउ सकि मोर दुलारा, नीच बीचु जननी मिस पारा।”
लेकिन यह कहते मेरी शोभा नहीं है।क्या कभी कोई अपने को साधु और पवित्र कहे,तो वह कभी पवित्र माना जा सकता है?जब तक कि दूसरे लोग उसे साधु न कहें। माता कैकेयी ने मन्दता का परिचय दिया और मैं सच्चरित्र हूँ,यह बात हृदय में लाना भी दुराचार है ।क्या कभी मोटे चावल की बाली में सुन्दर सालि (चावल)
फल सकता है? क्या कभी काले घोंघे में मोती उत्पन्न हो सकती है?इसमें किसी का दोष नहीं है ,मेरा दुर्भाग्य ही अथाह सागर बन गया है।
हृदय में बारम्बार विचारने पर मेरा भला तो यही है कि गुरु और सीताराम प्रभु,की जो इच्छा हो, उसी में मेरी भी इच्छा-
” यहउ कहत मोहि आजु न सोभा,अपनी समुझि साधु सुचि को भा।मातु मंदि मैं साधु सुचाली,उर अस आनत कोटि कुचाली।फरइ कि कोदव बालि सुसाली , मुकता प्रसव कि संबुक काली।सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू,मोर अभाग उदधि अवगाहू।हृदय हेरि हारेउँ सब ओरा,एकहिं भाँति भलेहिं भल मोरा।गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू,लागत मोहिं नीक परिनामू।
भरत, व्याकुल होकर सन्तसभा गुरुजनों और भगवान् के निकट सत्यभाव से बोले कि,मेरा कथन सत्यप्रेमकरुणापूर्ण है या जगत् प्रपंचपूर्ण असत्य,इसे गुरु वशिष्ठ और रघुश्रेष्ठ राम जी ही भली भाँति जान सकते हैं।
“अन्तर्यामी सद्गुरु और परमात्मा से छिपा हुआ क्या है?”
ज्यौं जग अन्तर भासता,तो कहि-कहि काहि जनाव।अन्तर्यामी जानता अन्तरगत के भाव।
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाये।
कहहु कवन सिधि लोक रिझाए।।
भरत ने कहा -साधु सभा गुरु प्रभु निकट कहहुँ सुथल सतिभाउ।प्रेम प्रपंचु कि झुठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ
जननी की कुबुद्धि सारा संसार जानता है और राजा दशरथ प्रेम(राम)प्रण को स्वयं रखनेवाले सिद्ध हैं, न कि शरीर रखनेवाले
प्रतिक्षण को अपने में समेटे-लपेटे सर्वगत परमात्मा के प्रेमी ने क्षणमात्र में क्षणदा ही त्याग दी।राम राम कहि राम कहि राउ गयेउ सुरधाम।
भूपति मरन प्रेमपन राखी,जननी कुमति जगतु सब साखी।
माताओं का कष्ट देखा नहीं जाता।अवध वासी तो असह्य वेदना में जल रहे।मैं भरत ही सारी अनर्थ की जड़ हूँ और इसे समझ कर सारी वेदना का शूल सहूँगा।इन सारी घटनाओं के साक्षी त्रिशूलधारी हैं
“देखि न जाइ बिकल महतारी,जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।मही सकल अनरथ कर मूला,सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।बिनु पानहिन्ह पयादेहिं पाएँ,संकरु साखि रहेउँ एहिं धाएँ।

मार्ग में मिले निषाद का प्रगाढ़ अपूर्व प्रेम दृष्ट है,यह मेरा ही दुर्दृष्ट है कि मेरे वज्रवत् हृदय में छेद नहीं हो गया।सब अपने नेत्रों से हमने देख लिया है।मैं जीता जी जड़ हो चुका हूँ, रुका हूँ तो केवल प्रेम(राम)की आशा में रुका हूँ। मैं चूक चुका हूँ।आप सद्गुरु भगवान् सभी जड़चेतन के सहायक हैं।आप तो ऐसे हैं कि आप युगल को देखकर तामस शरीर सर्पबिच्छू भी अपनी विषम विषवितरण का वैषम्य छोड़ देते हैं-
बहुरि निहारि निषाद सनेहू,कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई,जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।
जिन्हहिं निरखि मग साँपिन बीछी, तजहिं बिसम बिसु तामस तीछी।
ऐसे रघुनन्दन सीतालक्ष्मण सहित जिसे अहित (शत्रु)लगते हों उनकी क्या गति होगी? ” रामं बिना का गतिः?”
ऐसे राजा दशरथ,जो तृणवत् शरीर छोड़ दें श्रीराम विरह में,उनका पुत्र तो दैवी सहायता से ही असहनीय को सह सका।
“तेइ रघुनंदनु लखनु सिय,अनहित लागे जाहि।तासु तनय तजि दुसह दुख देउ सहावइ काहि।”
ऐसी त्यागतपःमूर्ति भरतजी की व्याकुल और आर्ति,प्रीति,विनय,नय सरस वाणी सुनकर सारी शोकसभा “सारी” बोलने पर उतारी हो गई,मानो कमल समूह पर पाला पड़ गया-
“सुनि अति बिकल भरत बर बानी।
आरति प्रीति बिनय नय सानी।।
सोक मगन सब सभा खभारू।
मनहुँ कमल बन परेउ तुसारु।।”
मुनिवशिष्ठ ने पूर्व सच्चरित कथापुराण के माध्यम से विशिष्ट वचनों से प्रबोधन किया है।और रघुनन्दन राम जो कि दिनकरकुलोत्पन्न कुमुदिनी वन के लिए आह्लादकारी अपनी आह्लादिनी शक्ति से सर्वदा संयुक्त चन्द्रमा हैं, औचित्यपूर्ण वाणी बोलते हैं-
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी।
भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।।
बोले उचित बचन रघुनंदू।
दिनकर कुल कैरव बन चंदू।।
भगवान् ने कहा हे भरत! तुम ग्लानि मत करो। इसलिए कि जीवात्मा की समग्र गति अपने अंशी परमात्मा के आधीन है।तीनों लोकों(धरती,स्वर्ग, पाताल)और
वर्तमान-भूत-भविष्यत् कालों में भी मेरी दृष्टि में जितने भी पुण्यात्मा जीव हैं, वे सभी के सब तुम्हारे नीचे हैं। जो भी वासनाव्यसनी तुम्हारे लिए हृदय में भी कुटिलता धारण करेंगे, उन सबकी इस लोक की वैभव-सम्पदा यशादि नष्ट हो जायेंगे, अन्य लोकों में भी सुगति प्राप्ति नहीं होगी-
तात जाय जियँ करहु गलानी,ईस अधीन जीव गति जानी।तीनि काल तिभुवन मत मोरे,पुन्यसिलोक तात तर तोरे।उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई, जाइ लोकु परलोकु नसाई।
माता कैकयी का दोष भी नहीं, क्योंकि सारी व्यवस्था भगवान् की त्रिभुवन मोहिनी माया के अधीन है।जो लोग माँ को दोषी मानते हैं, उन्हें साधुसभा यानी कि सत्संग, सन्तसंग सेवन के लिए प्राप्त नहीं हुआ,ऐसे लोग जड़मति हैं-
दोसु देहिं जननिहिं जड़ तेई,जिन्ह गुरु साधु सभा नहिं सेई।
और इतना ही नहीं भरत!तुम तो विश्व भरण पोषण कर जोई,ताकर नाम भरत अस होई,जैसे नामानुरूप स्वरूप को धारण करने वाले हो।
जो लोग तुम्हारे नाम का स्मरण मात्र कर लेंगे ,उनका अखिल पापभार संभार नष्ट हो जायेगा।लोक में सुन्दर यश फैलेगा और परलोक में भी में सुखप्राप्ति होगी-

मिटिहहिं पाप प्रपंच सब
अखिल अमंगल भार।
लोक सुजसु परलोक सुख,

” सुमिरत नाम तुम्हार “

गुरुः शरणम्। हरिः शरणम्

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भयउ न भुअन भरत सम भाई


रामलीला का प्रकाश फैलाती हनुमान् चालीसा की शीसा से प्रक्षेपित सुन्दर पंक्ति”रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई।” का अर्थ श्रीभरत जी को “प्रमाण” प्रमाणित कर देती है।
“श्रीहनूमान् जी महाराज, रघुनाथ जी को इतने प्रिय हैं, जैसे कि भरत।” वस्तुतः
भरत तो महामहिमा के मानदण्ड हैं प्रमाण हैं और ऐसे मानदण्ड कि वैसी रचना रची ही नहीं रमारमेश राम ने।

भरत-श्रीराम की कथा तो नारायण! अद्भुत ऐसी कि “विस्मय” ही स्थायी भाव बन जाता है।
काव्यशास्त्र में , साहित्यशास्त्र में वर्णित सुन्दरता का सौन्दर्य है “अद्भुतरस”

गुरु वशिष्ठ स्वयं “विस्मयस्थायी” भाव से ओतप्रोत होकर “अबला मति” बन गए।
और विस्मयस्थायी का “अद्भुतरस” जैसे कि बहता हुआ प्रतीत होने लगता है।
यह भरत का महामहिमात्व है,जो गुरु को ही अस्थिर और विस्मयवश करके शत्रुघ्नलाल सहित भरत को वनवास और
वनवासी सीतारामलक्ष्मण को अवध जाकर राजकाज सँभालने का अद्भुत निर्णय सुना देता है।स्वयं गुरु भी चकित।
लेकिन गुरु तो गुरु ही ठहरे, बुद्धिविद्युत्
पुनःसंयत संचरण शील होकर अपना पूर्व निर्णय वापस ले लेती है।और वशिष्ठ जी ने भगवान् से कहा कि मेरी चमत्कृत बुद्धि अब परिवर्तित निर्णय पर अडिग हो चुकी है कि आपको भरत की रुचि के अनुकूल शिव को स्वयं साक्षी मानकर शिवनिर्णय
ही करना होगा,जो कि कल्याणविधान करनेवाला सिद्ध होगा-
मोरे जान भरत रुचि राखी।जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।
और इतना ही नहीं, भरत का विनयनय
ऐसा अद्भुत है कि, वेदशास्त्र-सन्त और राज्य नय, सबका आनयन करके ही सुविचारित सम्मिश्र मिश्रित आश्रित निर्णय देना होगा।
भरत बिनय सादर सुनिअ,करिअ बिचारु बहोरि।करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।
अब गुरु का गुरुअनुराग भरत पर देखकर स्वयं सच्चिदानन्द ही विशेषानन्द से भर जाते हैं।वह भरत को “धर्मधौरेय” तो मानते ही हैं और उससे भी आगे मन वचन और कर्म से अपना सेवक भी।गुरु की आज्ञा को दृष्टिगत करके मंगल के मूल मंजुल वचन बोलते हैं-
“गुरु अनुरागु भरत पर देखी।राम हृदय आनंदु बिसेषी।।भरतहिं धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।बोले गुरु आयसु अनुकूला।बचन मंजु मृदु मंगलमूला।।
ऐसे लोगों का परम सौभाग्य है,जो कि गुरुचरणकमलों के परमानुरागी होने से लोक और वेदशास्त्र सम्मत आचरण करते हैं।और जिस पर कुलगुरु ही प्रेमासक्त हों,उसका भाग्य वर्णनातीत है-
” जे गुरु पद अंबुज अनुरागी,ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।राउर जा पर अस अनुरागू ,को कहि सकइ भरत कर भागू”

और इसीलिये रघुनाथ जी पिताश्री दशरथ के चरणों की दुहाई(साक्षी) देते हैं।जैसे कि शपथपत्र(affidavit)देते हुए दिखाई पड़ते हैं। कहते हैं कि भरत जैसा भाई तो चौदह भुवनों में कोई हुआ ही नहीं है-

नाथ सपथ पितु चरन दोहाई।

” भयउ न भुअन भरत सम भाई।”

गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।।

भरत भगति बस भइ मति मोरी

गुरु वशिष्ठ स्वीकारते हैं कि मेरी बुद्धि तो इस समय भरत जैसे लोकपावन भक्त के वशीभूत हो गई है।
भरत की महिमा रूपी समुद्र के तीर पर यह बुद्धि किंकर्तव्यविमूढ कोमला अबला जैसी चकित थकित श्रमित होकर स्थिर हो गई है।इससे पार भी जाना चाहती है, हृदय खोजता है किन्तु यत्न सूझता नहीं।
अब तो पार जाने के लिए किसी जहाज की जरूरत है।और भरत की बड़ाई का व्यास विस्तार बड़ा ही अगम है।यह तो वर्णनातीत हो चुका है।तलैया की छोटी सी सीपी में समुद्र समायेगा नहीं। और भरत की महिमासमुद्र के पार कोई जायेगा नहीं
गा चह पार जतनु हियँ हेरा।पावति नाव न बोहितु बेरा।।औरु करिहि को भरत बड़ाई ।सरसी सीपि कि सिन्धु समाई।।
यह समस्या गुरु के सामने इसलिये आई कि उन्होंने शत्रुघ्नलाल और भरत जी को वन निवास और सलक्ष्मणसीताराम जी को अयोध्या चलकर राजकाज सँभालने का प्रस्ताव,भरत के सामने रख दिया।भरत ने अविलम्ब इसे यथावत् लागू करने का आग्रह गुरु से कर डाला। समस्या के समाधान का यह पक्ष दानवी शक्ति के विनाश की बाधा बनती प्रतीत होने लगी। गुरु वशिष्ठ यह सोचकर अपने प्रस्तुत प्रस्ताव से पीछे हटने लगे,क्योंकि रामवन गमन का प्रमुख हेतु” राक्षसविनाश” और देवताओं के जीवन में “भवितव्यप्रकाश” बाधित होता सा दीख पड़ा।
आ जाते हैं भरत के साथ श्रीराम के पास गुरु वशिष्ठ जी। भगवान् प्रणाम करके सुन्दर आसन पर गुरु को बैठाते हैं।वशिष्ठ जी देशकाल अवसर का विचार कर भगवान् की भगवत्ता के अनुरूप उन्हें धर्मनीतिनिपुण,सर्वान्तर्यामी,सर्वज्ञ और असंख्येयकल्याणगुणगणनिलय बताते हैं।
अयोध्यावासियों, समस्त माताओं,भरत सहित,जिसमें “सहित” हो ऐसा साहित्य रचने हेतु आग्रह करते हैं-
भरतु मुनिहि मन भीतर भाए।सहित समाज राम पहिं आए।।प्रभु प्रनाम करि दीन्ह सुआसनु।बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।।बोले मुनिबरु बचन बिचारी।देस काल अवसर अनुहारी।।सुनहु राम सरबग्य सुजाना।धर नीति गुन ग्यान निधाना।।
सब के उर अन्तर बसहु,जानहु भाउ कुभाउ।पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।। और अब देखिये जैसे
आर्त जनों की वैचारिक दृष्टि मानो कि विलुप्त ही हो जाती है,जुआरी को अपना दाँव ही याद रहता है।
“आरत कहहिं बिचारि न काऊ।सूझि जुआरिहिं आपन दाऊ।। नारायण
क्या वाक्चातुर्य है प्रभु का वह तो ऐसी परिस्थिति में गुरु-निर्णय का नय-भार गुरु पर गिरा देते हैं।
“गुरोराज्ञा गरीयसी”आज्ञा गुरूणां हि अविचारणीया”
सभी का हित तो गुरु आज्ञा के अधीन है।
गुरु वशिष्ठ जी का आदेश ही सभी के लिए श्रेयस्कर है।गुरु आदेश ही गुरु है।

“सेवक राम”सहित सभी का हित जिसमें हो जाये , वही आदेश मिलने में सभी को आनन्द होगा।
“सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ।नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।।सब कर हित रुख राउरि राखें।आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई।माथे मानि करौं सिख सोई।।पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं।सो सब भाँति घटिहि सेवकाई।।”
वशिष्ठ जी अब अपनी बुद्धि के शक्तिहीन
हो जाने का रहस्य समझ जाते हैं।
” मुनि मति तीर ठाढ़ि अबला सी ” क्यों हो जाती है।वह इसलिये कि भरत तो तपोनिष्ठा ,त्याग, शील,संयम,और प्रेम में श्रीराम की (ट्रू कापी)छायाप्रति हैं।
और इसीलिये लगता है भरत के इन्हीं स्नेहादि गुणों ने गुरु के गुरुविचार को ठहरने ही नहीं दिया –
कह मुनि राम सत्य तुम भाषा।भरत सनेह बिचारु न राखा।।
और बारम्बार गुरु ने इन्ही अलक्षित गुणों की सराहना की और कहा कि इन्ही गुणों का कारण उनकी बुद्धि भरत की दिव्य “प्रेमा-भक्ति” के वशीभूत अबला सी हो गई थी-

“तेहि ते कहउँ बहोरि बहोरी।
भरत भगति बस भइ मति मोरी।।”

गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।