जनजन के हृदय-देश राजे।
श्रीसीताराम सदा साजे।
सीता सहित चले सीतापति।
शालग्राम शिला बन कर।
अनाहूत उमड़े प्रेमी जन
श्रद्धाविश्वास उठे युग कर।
गुरुजन परिजन परिवारी जन।
रामानुज चलें राम-रंजन।
जनकसुता जनजन की शक्ती।
चली देन मर्यादा भक्ती।
गुणावेश में गुणाकेश कर्षित
सब कृष्ण रूप लख कर।
सब हृदयभूमि बह प्रेम-धार
धर राधा-प्रेम-युगल बन कर।
हम भी हर्षित तुम भी हर्षित
सब सीताराम कृपा कर्षित।।
उमड़ी घुमड़ी यह भगत भीर।
आँखन अँसुवन की प्रेम नीर।।
💐💐💐💐💐
सादर विनावनत
करता स्वागत।
करो स्वीकार।
शरणागताकार।
मानो सत्य सत्य।
मैं तेरा तूँ मेरी गत्य।
शालग्रामशिला मात्र यह नहीं
मान मन मम नारायण सत।
जो त्रेता उतरी करुणमूर्ति
रतिराम “भक्ति” रामायण रत।
अब काम! चलो गह द्वार-राम।
हो धन्य धन्य तुम भी कृतार्थ।
शुचि शिला चली यह शालग्राम।
बन राम राम है यही स्वार्थ।।
हरिगुरू शरणम्
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शालग्रामराम
जनजन के हृदय-देश राजे।
श्रीसीताराम सदा साजे।
सीता सहित चले सीतापति।
शालग्राम शिला बन कर।
अनाहूत उमड़े प्रेमी जन
श्रद्धाविश्वास उठे युग कर।
गुरुजन परिजन परिवारी जन।
रामानुज चलें राम-रंजन।
जनकसुता जनजन की शक्ती।
चली देन मर्यादा भक्ती।
गुणावेश में गुणाकेश कर्षित
सब कृष्ण रूप लख कर।
सब हृदयभूमि बह प्रेम-धार
धर राधा-प्रेम-युगल बन कर।
हम भी हर्षित तुम भी हर्षित
सब सीताराम कृपा कर्षित।।
उमड़ी घुमड़ी यह भगत भीर।
आँखन अँसुवन की प्रेम नीर।।
💐💐💐💐💐
सादर विनावनत
करता स्वागत।
करो स्वीकार।
शरणागताकार।
मानो सत्य सत्य।
मैं तेरा तूँ मेरी गत्य।
शालग्रामशिला मात्र यह नहीं
मान मन मम नारायण सत।
जो त्रेता उतरी करुणमूर्ति
रतिराम “भक्ति” रामायण रत।
अब काम! चलो गह द्वार-राम।
हो धन्य धन्य तुम भी कृतार्थ।
शुचि शिला चली यह शालग्राम।
बन राम राम है यही स्वार्थ।।
हरिगुरू शरणम्
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अध्यात्म तले
अध्यात्म नदी का जल बन कर
प्रभु के चरणों में बहना है।
अध्यात्म तले ही सोना है।
अध्यात्म तले ही जगना है।
यह हृदयदेश सुन्दर प्रदेश।
जहँ राजमान श्रीशक्तिमान।
जिनकी है चार भुजा शोभित।
है चार पुरुष का अर्थ कथित।
मनसा वचसा नारायण भज।
कर्मणा कुसंस्कार अब तज।
अज्ञान तमस तब दूर भगे।
जब ज्योतित आत्मप्रकाश जगे।
वह आत्मप्रकाश स्वयं ज्योतित।
अनुभवकारयिता कर्तासित।
हम वही दिव्यचेतनायुक्त।
गुणयुक्त भवार्णव सदामुक्त।
सद्गुरु नारायण करुणाकर।
कर कृपादृष्टि अब अपना कर।
यह कामक्लेश ना रहें शेष।
शरणागति दो हे भाववेश।
अब मुझे और ना कहना है।
तव अविरल स्मृति में रहना है।
अध्यात्म नदी का जल बन कर।
प्रभु के चरणों में बहना है।
अध्यात्म तले ही सोना है।
अध्यात्म तले ही जगना है।
गुरुहरी शरणम्।
इन्द्रियों से इन्द्रियातीत
लम्बेलम्बे श्वास प्रश्वास में चलते प्राणवायु स्वरूप परमात्मा का अनुभव करो जो
सारी चेतना का मूल है।पंचवायु, पंचभूत पंचविषयप्रपंच,पंचदेवों की उपासना
ज्ञान और भक्ति है।
श्रोत्र त्वक् चक्षु जिह्वा नासिका इन्ही
प्राण अपान उदान समान व्यान से ही चलितचालित है । वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ आदि पंच कर्मेन्द्रियसंघात भी इन्ही पंचवायु द्वारा संचरित हैं।
मन बुद्धि चित्त अहंकार ही चतुर्भुज भगवान् हैं जिनके कारण दशेन्द्रियाँ अपने शब्दादि विषयों में समुचितचेष्टाशील हैं।
और सारी चेष्टा के अनन्त मूल
श्वासप्रश्वासप्राण को मत भूल।
इसी में चराचरजगत् स्पन्दित है
इन्द्रियातीतवृत्ति भी आक्रन्दित है।
हरिः शरणम् गुरुः शरणम्।
जब नाम चले
सारे सनातन धर्म में बात कही एक सार।
जपो जपो रामनाम और सबही है असार।
कही आदि शंकर ने रामानुज ने भी कही।
मध्व आचार्य आचार्य निम्बार्क भी यही।
वल्लभ भी विशुद्ध नाम रटनकी बातकही
जनमि प्रयागराज रामानन्दाचार्य कही।
रामकृष्णहरीनामरती मति विशुद्ध सही।
पन्द्रह सौ ईसवी में धन्य बंगाल धरती।
जो है महाप्रभू चैतन्य को धरती।
हुआ कलिकाल धन्यधन्य हुए लोग सभी।
माधव युगल भाव लेकर आए वे जभी।
कहा कृष्णनामसंकीर्तन है आत्मास्नान।
हर एक नाम अमृत पूर्ण आस्वादन।
आनँद समुद्र ओर छोर नहीं पारावार।
रामनाम कृष्णनाम जीवन का आरपार।
विद्या रूप भामिनी का पती यही नाम है।
श्रेयस्चक्रवाक की है चन्द्रिका को कामहै।
चित्त रूपी दर्पण को शुद्ध करे नाम है।
भवमहादावानल बुझाए कृष्ण नाम है।
श्रीमच्चैतन्य की नामरससिक्त वाणी,
जो “शिक्षाष्टक” में यही भाव लेकर बही-
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम्।श्रेयःकैरव –
चन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वा –
दनम्।सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्।।1।।
नाम्नाम् अकारि बहुधा निजसर्वशक्तिः
तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।
एतावती तव कृपा भगवन् ममापि
दुर्दैवम् ईदृशम् इह अजनि नानुरागः।।2।।
हे राम मेरे कृष्ण तुमने नाम में शक्ती भरी।
स्मरण में भी काल तुमने है नहीं नीयत करी। बस करो इतनी लघु कृपा मिट जाय
दुर्दिन-बन्ध का।तव नाम रटते मिले ज्योति, हटे भवाभव अन्ध का।
नारायण! चैतन्य महाप्रभु के शिक्षाष्टक के पद्यद्वय। करते सदैव ये दृढानुराग वैसा न करै कोई अद्वय।
देखिये,
मन्त्रजप में विधि अनिवार्य है।नामजप विधि से परे कार्य है।
जिह्वा पर स्वादानुभव हो चाहे मत हो जपते-जपते नामी प्रकट-प्रत्यक्ष हो जाता है।
तब इन्द्रियातीत स्वाद आता है,मायातीत जगद् अनुभूत होता है, यह पार्थिव शरीर
अपार्थिव, सच्चिदानन्दरूप ही शेष रहता है। इसलिये
श्रीमन्नारायण गुरु कृपया हो नाम राग अनुराग पले।भौतिकशरीर के धर्म भोग सब नष्ट भ्रष्ट जब नाम चले।
हरिः शरणम् । गुरुः शरणम्।
विरत मति दो
नारायण ! मैं अपनी अपनी कोई बात नहीं थोप रहा । मेरा मनगढ़न्त विचार नहीं।
श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु के परिकर ने व्रजभू में एक महत्वपूर्ण बात कही थी।विचारणीय है विषय।विवेच्य है आशय।
विचरती मेरी मति ने कही।
मेरा विचार तो है प्रभु यही।
क्या सही क्या न सही।
हमें क्या बार बार किसी
भोग के लिए मिलेगी मही।
नहीं नहीं नहीं नहीं।
राधामाधव युगल भाव को लेकर इसी कलिकाल में बंगाल की धरती पर पन्द्रह सौ ईसवी में अवतीर्ण हुए चैतन्य महाप्रभु जी ने आठ पद्य मुमुक्षुओं के मंगल हेतु रचे थे।
किसी भी स्वतन्त्र ग्रन्थ का प्रणयन नहीं किया था। महाप्रभु जी के आठ श्लोक सभी प्रणयी भक्तों में “शिक्षाष्टक” नाम से
प्रसिद्ध हैं।उन्होंने भगवन्नाम संकीर्तन से नाना प्रकार के हमारे सदृश अनेक विमुख
विषयी जीवों का उद्धार किया।नारायण !
यह समस्त संसार भगवद् विमुख प्राणियों
के लिए बार-बार आवागमन का कारण बनता है। महाप्रभु जी इस संसार में किसी वस्तुव्यक्तिपदपदार्थ में कोई राग स्वीकारते नहीं।
राग का कारक और कारण कौन है? कौन है जो नाना इन्द्रियों में चेतनासंचरण करते हुए अनुकूल और प्रतिकूल स्थितियों का अनुभव कराता है?
वह तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् परमात्म सत्ता भगवन्नामधारिणी ही तो है, जिससे यह पिण्ड शरीर सबको ज्ञान का विषय बनाता है। वही प्रज्ञानं ब्रह्म है।
सगुण साकार व्यावहारिकी और नित्य लीलाललाम दृश्यमान भगवान् अवध और व्रज में भक्तों हेतु उतर कर अजस्र आनन्दरस में उन्हें सरस कर दे रहे हैं।
यही रसधार बहाई महाप्रभु ने और अनुभूति भी कराई।और भगवद्विरह में व्याकुल होकर नाम ही रटने की शिक्षा आचरित करके मानव में आनन्द ही मानो रचित कर दिया।अपने शिक्षाष्टक में प्रभु ने कहा- भगवद् विरह मे एक पल भी युगों जैसा हो गया है । नेत्र वर्षा ऋतु की अवतारणा करते हैं। इस गोविन्दविरह में मुझे सारा संसार सूना-सूना दीखता है।
“शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्दविरहेण मे”
इन्हीं महाप्रभु जी के परिकर ने श्रीधाम वृन्दावन में एक बड़ी बात कही थी।
जो आज भी व्रजरज के कण-अण में भक्तों द्वारा अनुभूयमान है।इसी तरह की
ऐसी ही दृष्टि दी थी कुरुक्षेत्र रणक्षेत्र में अनित्यसम्बन्धों के चक्कर में चकराने वाले अर्जुन को भगवान् ने।उन्होंने मान और अपमान को तिरोहित करने का आदेश किया था-“मानापमानयोस्तुल्यः
तुल्यः मित्रारिपक्षयोः” कहकर।
यही भक्त की दृष्टि विचारधारा, संसार से मुक्ति का सूत्रवत् सूत्रपात करती है-अब मूल बातयह कि श्रीमच्चैतन्य महाप्रभु के परिकर ने श्रीधाम वृन्दावन में क्या कहा –
“सम्मानं कलयातिघोरगरलं
नीचापमानं सुधा।”
सम्मान को घोर विष और अपमान को विषवत् समझो।
पूज्य गोस्वामी जी ने भी सूत्र दिये थे-
सुत वित लोक ईषणा तीनी।
केहि कर मति इन्ह कृत न मलीनी।
लोकेषणा सम्मान का प्रतिस्फुटन है।ये सब बाध्यकारी भोग के लिए स्वस्वरूप
से विच्युत करके जीव को नाना प्रकार के नरकस्वर्गादि लोकों में ढकेलने वाले हैं।
मानापमान माना कि द्वन्द्व हैं।
लेकिन दोनों ही अन्तर्द्वन्द्व हैं।
मन की “मथनी” रूपिका है।
नाना शरीरों की भूमिका है।
दोहावली में बाबा ने कहा।
एक मृगा के कारने भरत धरी दुइ देह। उनकी क्या होगी गती जिनके नाना नेह।
यह दशा ब्रह्मर्षि की देखी।
तब अपनी क्या कहें लेखी।
अस प्रभु अछत हृदय अविकारी।सकल जीव जग दीन दुखारी।
वही स्मरण करायें कृपा मनुहार यहीं। अपने साधन का कोई अहंकार नहीं।
ऐसे प्रभु का अपने में गुरुकृपया जब होगा दर्शन।
तब कटे हमारे जैसे विषयी जीवों का विषयस्पर्शन।
अतः सर्वत्र दीखे वही।
चाहिए न और कुछ सही।
हे अचाह मुझे बनाओ अचाही।
कराओ अपने में रमण सदा ही।
पाकर तुम्हें शान्त अक्षय होंगे हम सदा ही
हम तुम्हारे रहें त्रिकाल सत्य सदा ही।
अपनी स्मृति में अक्षुण्ण अविरत रति दो।
आपात रमणीय संसार से विरत मति दो।
हरिः गुरुः शरणम्।
भृकुटि विलास सृष्टि लय होई।सपनेहुँ संकट परै कि सोई।।
सुन्दरी शूर्पणखा, स्वर्णमृग मारीच और भिक्षुक रावण इन सभी का अपना मूल “असुरत्व” है।ये सभी अपने असुरत्व के विपरीत,क्रमशः सुन्दरता, स्वर्णाकारता और साधुता को धारण करते हैं।
जगदम्बा जानकी ने किसी पर अविश्वास नहीं किया था।वह वास्तविकता भी जानती थी।किन्तु “परात्पर ब्रह्म” की परा “शक्ति” सगुण साकार मानव लीला कर रही थीं। मानवीय स्वभाव के अनुरूप सहज विश्वास और “कबीर की साखी” “कबिरा आप ठगाइए और न ठगिये कोय।आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय” के मानवीय-वैचारिक आदर्श को जो प्रदर्शित कर रही थीं।इसीलिये संकट का नाटक कर रही थीं। अब देखिये
“जीति को सकै अजय रघुराई।माया ते असि रचि नहिं जाई।”कह कर “जननी” अपनी सगुण साकार लीला विलास में पूरा विश्वास दिखाते हुए उसे युक्तिसंगत भी सिद्ध करती हैं।
लेकिन “भगवत्ता” और सृष्टि की “सूत्रधारिता” इसी से खुल जाती है। क्योंकि “माया ते असि रचि नहिं जाई” कहकर “विद्यामाया”और भगवान् की “चिरसंगिनी” “अवियुक्त” माया ने संसारी माया को प्रकट प्रत्यक्ष कर दिया। नि:सन्देह “अजय” “रघुराई” कहते ही “परात्पर ब्रह्म” के अपरस्वरूप “सगुण साकार” दशरथ नन्दन”श्रीराम”की भी “मानवाकारता” पर से पड़ा पर्दा “माँ” ने एक झटके से हटा कर “उन्हे” सर्वकारण कारण जतला दिया।
संसार रचयिनी “अविद्यामाया” को भी
रचने और संचालित करने वाली “यह” “विद्यामाया” जो ठहरीं।
इसलिये मानव लीलावश “माता”ने तो शूर्पणखामारीचरावण की अनभिज्ञता का “नाटक” ही किया।नारायण!यह तो वस्तुतः”रामरामा” सबको नचावनवारी हैं।
सबहिं नाचावत राम गोसाईं। अरे नारायण
जिसकी भृकुटि विलास से सृजन पालन संहार कर्त्री अविद्या माया क्षणार्ध में तत्पर हो जाती है।और सृजनादि कार्यों में लग जाती है,उसे क्या स्वप्न में भी कोई संकट विपत्ति अथवा विपरीत मति हो सकती है?
भृकुटि विलास सृष्टि लय होई ।
सपनेहुँ संकट परै कि सोई।।
गुरुः शरणम् हरिः शरणम्।
द्वितीयाद् वै भयं भवति
द्वितीयाद् वै भयं भवति ।
(बृहदारण्यक,उ.1/4/2)
जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, सब कुछ आत्मीय है।तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ,
इस संसार की रचना करके,वह परमात्मा सभी जड-चेतन प्राणियों में प्रवेश कर गया। इसका मतलब है कि,इस हमारे पिण्डभूत शरीर में और इसके बाहर भी सब दृश्यमान जगत् परमात्मा में परमात्मा का और परममात्मभाव से विद्यमान है।
हमें अपने से भिन्न किसी को नहीं मानना चाहिए। यदि हम अपने से भिन्न दृष्टि रखते हैं, तब नाना सांसारिक भयों में रहेंगे ही। अतः अपने इस मनुष्य शरीर के पहले के नाना शरीरों का चिन्तन करते हुए, सर्वव्यापक परमात्मा को सर्वत्र अनुभव में लाना चाहिए। और ऐसा अभ्यास करते-करते सभी में हरिः ओ३म् तत् सत् दीखने लग जायेगा। सारी समस्या का निदान हो गया। जब सभी में वही है, तब भय कैसा?और क्यों?
वस्तुतः सबका सबसे भागवत सम्बन्ध ही है। तह सम्बन्ध तो स्वाभाविक/प्राकृतिक/स्वतः सिद्ध है। यही भगवान् की अर्जुनोपदिष्ट वाणी में “योग” कहा गया।जीवपरमात्मनित्ययोग ही योग है।
अन्य संसार के गृहस्थादि आश्रमों के विभिन्न सम्बन्ध माने हुए,अनित्य और कल्पित हैं।
निश्चित रूप से बाकी सब सम्बन्ध माने हुए अस्वाभाविक/अप्राकृतिक/थोपे हुए सम्बन्ध हैं। अतः यदि सबमेंभगवान् मान कर सभी से भागवत्सम्बन्ध स्वीकार कर लें, जो कभी न कभी किसी जन्म में और मानव जन्म में ही ,प्रायः आभासित होते हैं, समझो मानवजीवन सफल है ।
नहीं तो भेद दृष्टि से कुछ नहीं मिलेगा। पुनः एक बार यह ईश्वरीयकृपाकरुणा को,हम ठुकरा देंगे।
सब छोटे बड़े को,पेड़ पौधे तक कोभी भगवत् स्वरूप में प्रणाम करो।
भेद देखना मनुष्य की दुर्बलता और सारी समस्या,की जड़ है।
तत्र को मोहः को शोकः एकत्वम् अनुपश्यतः(ईशोपनिषद् -7)
सभी में अपना आत्मस्वरूप वह एक ही परमात्मा देख लेने पर कोई अज्ञान नहीं,कोई दुःख नहीं और कोई भय नहीं।
इसीलिये परमात्मद्रष्टा ऋषियों ने इस मन्त्र का दर्शन किया-
“द्वितीयाद् वै भयं भवति”
इस देववाणी और वेदवाणी का सार समझो।
जीवन धन्यधन्य होगा।
अन्यथा ईर्ष्या राग द्वेष तो पूर्व शरीरों की कमाई, सब गुड़ गोबर कर देगी।
हरिः शरणम् गुरुः शरणम्।
किम् आश्चर्यम् अतः परम्
इससे बड़ा इस मनुज शरीर का कोई भी आश्चर्य नहीं है कि,नर तन पाइ विषय मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।
मन मनन करता रहे संसारविषभोगों का।
है सतत न्यौता यही भव भवज रोगों का।
मन जब भगवान् या भगवती के किसी नामरूप में चला जाये।सब मतलब सिद्ध।
नंबर एक, हम क्या हैं, जान जायेंगे।
नंबर दो, सामने प्रत्यक्ष संसार की वास्तविकता समझ में आ जायेगी।
नंबर तीन ,सब रोनाधोना,मिट जायेगा।
नंबर चार, आनन्द ही आनन्द शेष बचेगा।
अतः आनन्द ही आनन्द में रहना है, तब इस अपने पिण्ड शरीर का और प्रत्यक्ष संसार का रहस्य जानना चाहते हो,तो सरल उपाय है-
सरल बनो,साधुस्वभाव के हो जाओ। किसी सुरक्षा उपकरण की जरूरत नहीं।No, need to security.
साधु सन्त के तुम रखवारे।
असुर निकन्दन राम दुलारे।
अतुलितबलधाम,अन्जनी कुमार, रामदूत, श्रीहनुमानजी महाराज कृपा करेंगे।
करना क्या है, केवल भगवन् नाम का जप, राम जपो राम जपो राम जपो भाई।
(श्रीविनयपत्रिका)
शरीर पूरा होने पर,जब दूसरे लोग, अपने कर्तव्य कर्मवश राम-राम , नाम रटें, तो वह सूक्ष्म शरीर, (प्राण) जो लम्बे समय से,उस पार्थिव पिण्ड में था,राम नाम को
सूक्ष्म शरीर से सुनता तो है, लेकिन भारी विपत्ति, रामनाम स्वयं नहीं ले सकता।
अस्तु ” राम राम राम , जीह जौ लौं तू न जपिहै,तौ लौं तू कहूँ जाय ,तिहूँ ताप तपिहै।”(श्रीविनयपत्रिका)
इसीलिये इस मानव देह का सबसे बड़ा आश्चर्य ही है, कि जिन भगवान् की करुणा से यह नरतन, बर्तन मिला है, उसमें संसार का वैषयिक भोग ही बसा है,क्योंकि “महदाश्रय” नहीं मिला, और महदाश्रय(महापुरुष)इसलिये अनुपलब्ध कि, “रामनाममहाराज” चित्त में नहीं आते। रामनाम सरल सुलभ है। हमने
ऐसे भारत देश में जन्म लिया है, जहाँ की सभ्यतासंस्कृति,अनादि है,सनातन है।
जहाँ गली-गली में हनुमानजी के मन्दिर मिलेंगे ,अनगढ़ पत्थर शिवरूप में पूजे जा रहे हैं।और “शिव” हैं कि अहर्निश रामनाम
सादर जपते हैं।
“तुम पुनि राम राम दिनराती।सादर जपहु अनंग अराती” (श्रीराचरितमानस)
हमें राम राम रटना ही तो है,मन में,और
हमारी जीभ हमारे वश में है।
जो हम चाहते हैं, एड़ी चोटी लगा देते हैं, उसे पाने,खाने के लिए।और खाद्याखाद्य खाकर सन्तुष्ट भी हो जाते हैं।फिर खाने की जरूरत बनी रहती है।
अरे! खाओ चबाओ पीओ राम नाम, अनुभव करके देखो। जिह्वा हमारी है, हमारे वश में है।
दुर्भाग्य! है कि, ऐसा मानव शरीर पाकर भी, नापजप हर क्षण,न करके संसार का चिन्तन करते-करते पुनः गिरना, पुनः दूसरे शरीर पाने की यात्रा की ओर हम
इस “रथशरीर” को आगे बढ़ा देते हैं।
रामकृष्णनारायण दुर्गारमा सरस्वती काली नामों को चौबीसों घण्टे जप कर,ही संसार, पर काबू पाओगे।
संसार की संपदा भी मिलेगी।
परलोक भी बनेगा ,लेकिन,कैसी प्रचण्ड माया है।लुभाये,भुलाये बैठी है।
नारायण !भाग जायेगी “माया” लेकिन केवल “नामजप”से।
इसके बिना हम दुर्दशाग्रस्त होकर नरकों और नारकीय शरीरों की प्राप्ति बार-बार करते जा रहे हैं।
राम बिमुख संपति प्रभुताई।
जाइ रही पाई बिनु पाई।।
सुलभं भगवन् नाम ,जिह्वा च वशवर्तिनी।तथापि नरकं यान्ति किम् आश्चर्यम् अतः परम्।।
गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।
जीवन-पाथेय-महदाज्ञा
तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्
ईशावास्यं इदं सर्वम्
भगवच्चेतना,यत्र-यत्र-सर्वत्र व्याप्त है।
उसके सिवाय कुछ है ही नहीं।
आवश्यकता है, अनुभूति की।
वह परमात्मा इस,ब्रह्माण्ड को रचकर,
इसमें प्रवेश कर गया।और यह समस्त जीवजगत् “उसीका” आवास है।
अतः जड़-चेतन-प्राणि-मात्र की हिंसा अथवा उनके प्रति हिंसा का भाव रखना ईश्वर के प्रति हिंसा है।
मनुष्य शरीर मनुष्य बनने के लिए मिला है।”मनुर्भव”।
किसी भी अच्छे-बुरे भोग भोगने ओर किसी भी अन्य शरीर में जाने के लिये नहीं मिला है।
अतः हरि गुर सन्त वाणियों का महदाश्रय ग्रहण करें।
नारद-शुक-सनकादि-व्यास
अपनी-अपनी वाणियों में आज भी अपने “ग्रन्थरूप”
में विराजे हैं।
“बिना महत्पादरजोभिषकम्”
तुलसी-कबीर-सूरमीरा-रैदास
आज भी” जीवन्त”हैं।भगवत् स्वरूप होकर सार्वकालिक हैं। अपने-अपने “आत्मानुभूति” परक भगवत् कथा-लीला-गुण-रूप ग्रन्थों में प्रत्यक्ष होकर दीख रहे हैं।
हाँ,इन सबका, किसी एकं का सहारा तो लेना ही होगा।
दुर्लभ हैं,तीन चीजें इस भवाटवी में, असारसंसार के “मायाजाल”में।
1-मनुष्यता।मानवीय(भगवान् के ) गुणों -करूणाक्षमादया की अभिव्यक्ति,स्वीकार्यता,
ग्राह्यता, अभिज्ञान(पहचान)
और तदनुरूप नैत्यिक व्यवहार।
2-मोक्षेच्छा।जन्म-मृत्यु के बन्धन से छूटने की इच्छा।
3- सन्तसद्गुरु का चरणाश्रय
यह सभी दुर्लभतम चीजें भगवान् की कृपानुग्रह के विना मिलेंगी भी नहीं।
मनुष्य का शरीर ही –
“हरिः ओ३म् तत् सत्” की करुणा से प्राप्त है।हम जैसे मलिनचित्तजीव की ऐसी योग्यता कहाँ?
कबहुँक करि करुना नर देही,देत ईस बिनु सनेही।
आद्याचार्य भगवत् शङ्कर ने अपने “विवेकचूडामणि” में ऐसी विवेकवाणी व्यक्त की-
दुर्लभं त्रयम् एव इदं, देवानुग्रह-हेतुकम्।मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः।
अतः मनुष्य जीवन निरर्थक न होने पाये,इसके लिये “हिंसात्याग” कर हरि गुरु सन्तों की बात मान कर, तत्क्षण “शुभ” हेतु प्रयास करें।
मातु-पिता हरि गुरु की बानी।
बिनहिं बिचार करै शुभ जानी।।
महद् आज्ञा का उल्लंघन, पतनोन्मुख करेगा।
अतः कालिदास कहें -” गुरूपदेश आज्ञा, विचार किये विना,पालनयोग्य है।
आज्ञागुरूणां हि अविचारणीया”अथवा
तुलसी,-“अनुचित उचित बिचार तजि जे पालहिं पितु बैन,ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन”
इसे जीवन का पाथेय बनायें।
हरिः शरणम् गुरुः शरणम्