आर्ष आचरण

अर्थों का अर्थ समझ लो जब,तब शब्द प्रयोग अवश्य करो। जब परम्परा अधुनातन हो,तब आर्ष आचरण करो करो। आर्ष आचरण मतलब कि ऋषि प्रोक्त मार्ग पर चलना। इस मार्ग पर चलने के लिए, जिज्ञासा, साधु और सन्यास शब्दों पर विचार कर लेना होगा। जिज्ञासा का तात्पर्य है,जानने की इच्छा।ज्ञातुम् इच्छा। ज्ञा धातु से ‘ सन् ‘ प्रत्यय करके जिज्ञासा शब्द निष्पन्न है।इसी तरह अनेक शब्द हैं- हर्तुम् इच्छा जिहीर्षा, मर्तुम् इच्छा मुमूर्षा, गन्तुम् इच्छा जिगमिषा। ऐसे ही तितिक्षा शब्द है। त्यज् धातु में सन् प्रत्यय लगकर तितिक्षा बना। त्यक्तुम् इच्छा तितिक्षा।त्याग की इच्छा, को तितिक्षा समझें।किसका त्याग? हानि-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश, अनुकूल-प्रतिकूल आदि संसार-द्वन्द्वों का का त्याग। अब यह भी समझो कि यह सारे द्वन्द्व प्रारब्धवश होते हैं।हाँ यह अवश्य है कि, किसी भी आने वाले, बुरे प्रारब्ध को हरिहरगुरुकृपया नष्ट भी,किया जा सकता है। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी। लेकिन उक्त भगवद् वचनों के अनुसार सर्वारम्भपरित्यागी, द्वन्द्वातीतो द्वयातिगः गुणातीतः हुए बिना,एक बार फिर मानव जन्म निरर्थक हो जायेगा।इसलिये द्वन्द्वों से दूर, जब हमारे “अंशी ” हैं, तब हम “अंशभूत” भी द्वन्द्वों से दूर अविकल स्व-स्वभावगत आत्मगत होने पर ही संसृति-चक्र से छूट पाते हैं।सारी की सारी वेदसन्त-मर्यादा, तो इसी मानव देह के लिए है।अतः “तितिक्षा ” का तात्पर्य, निर्द्वन्द्व हो जाना है।अब साधु-“साधु” स्वरूप भी इसी तितिक्षा और कहिये अपने आत्म स्वरूप में स्थित होने पर स्वतः प्राप्त है। ” साध् संसिद्धौ” धातु में “उ”(उणादि प्रत्यय) लगकर, साधु शब्द निष्पन्न है। साध्नोति परकार्यम् इति।जो अपना नहीं, दूसरे शरीरों का कार्य सिद्ध करे,वह साधु है।परमारथ के कारने साधुन्ह धरा शरीर।।परमार्थ का तात्पर्य,पर अर्थ( प्रयोजन) की सिद्धि और परम अर्थ(प्रयोजन) माने कि, अपने सहित सबके परम हित “मोक्ष” के लिए सतत-रत होना है। इस परार्थ या परमार्थ की उपलब्धि में सत् अर्थात् सत्य के पग पर चलकर उस सत्यात्म परमात्मा की अनुभूति प्राप्ति होगी। इसीलिए ” सन्यास” होता है।यह सन्यास चतुर्थ आश्रम है।सत्+न्यास मिलकर सन्यास बना है।न्यास शब्द के नकार के बाद में होने से सत् का त् दकार होकर पर यानि कि न् हो जाता है। इसी को संस्कृत में परसवर्ण सन्धि कहा है। सत् में सत् हेतु सत् द्वारा अवस्थित होना ही,वस्तुतः सन्यास है। एतावता, आत्म अंशी के अंशाश होने से हमें तितिक्षा, साधुता और सन्यास भाव स्वतः प्राप्त है, किन्तु अभावों के कोश इस संसार की ही निरन्तर स्मृति होने से उक्त स्वभावगत भाव को विस्मृत किये बैठे एक और जन्म की तैयारी है।अतः हरिगुरुकृपा,श्रीरामनामामृत आदि का पान ही लोक परलोक की सिद्धि करेगा। इसलिये आर्ष आचरण करो करो।

गुरुहरी शरणम्।

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नाम ही विराजा

अक्षय विधाता, अपने करम।
आरोग्य धन ऊर्जा हैं भरम।
सीताराधा रामकृष्ण उमा।
शिव आदि नामों में चित घुमा।

मिटेगा फेरा फेर-फेर आने का।
अस्थिर धन यौवन अस्थिर है मन।
मैं हरिहर का निश्चित हूँ जन।
हर छन-छन जिह्वा रट नाम।
कीर्तन कर-कर करो काम।


संसार के अनित्य सभी सुख।
कहाँ कौन नहीं भोग रहा दुख।
नम मन मिला मानव तन।
आनत आरत नाम जप मन।

सभी दिव्य चिन्मय जनों का उपदेश।
रटो राम कोई हो भेष देश।
भागी से भाग कहाँ जाना है।
अंशी में अंश मिल जाना है।

तुलसीकबीररैदासमीरा वचन।
पिओ विश्वास श्रद्धा भाव प्रवचन।
रहो अलमस्त नाम की मस्ती।
अस्थिर शरीर संसार की बस्ती।


ध्रुव प्रह्लाद अम्बरीष राजा।
सकल कल-कल नाम ही विराजा।

गुरुहरी शरणम्

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वनदुर्गा विन्ध्यवासिनी

सौवर्णाम्बुजमध्यगां त्रिनयनां सौदामनीसन्निभाम्।
ग्रैवेयाङ्गगदहारकुण्डलधराम्
आखण्डलाद्यैः स्तुताम्।
ध्यायेद् विन्ध्यनिवासिनीं
शशिमुखीं पार्वस्थपञ्चाननाम् ।।

स्वर्ण कमल राजित कमला
त्रिनयन विद्युतनिभ विमला।
शंखचक्रवर अभय धारिता
चन्द्रकला दीपित अमला।।
गले सुशोभित उज्वल माल
कर्ण विराजत कुण्डल जाल।
इन्द्र देव अस्तुति करते हैं
बगल खड़े केसरि रहते हैं।।
चन्द्रमुखी विन्ध्याचल रानी
ध्यानी ध्यावत मुनि विज्ञानी।।

ऊपर उक्त संस्कृत वाणीमयध्यान श्रीवनदुर्गा विन्ध्यनिवासिनी का है।
नीचे अनुवाद किया गया है।

श्रीधाम विन्ध्याचल में वर्तमान मन्दिर पर
तीनों देवियों महालक्ष्मी महाकाली और महासरस्वती की मूर्ति प्रतिष्ठित है।
यह त्रिदेवियों का “लघुत्रिकोण” है।
एक “वृहत् त्रिकोण” भी है। विन्ध्याचल
नगर से दक्षिण पूर्व दिशा में दो देवियों का विग्रह क्रमशः “महाकाली” और पर्वत की गुफा में ” महासरस्वती” रूप में राजित है।

दुर्गासप्तशतीवर्णित प्राधानिक रहस्य में इन तीन स्वरूपों में ” महालक्ष्मी ” को सब देवियों की ” आदि ” कहा गया है।
वस्तुतः इन “देवीत्रितयी” में प्रति एक का नाम “विन्ध्यनिवासिनी” ही है।
अब ध्यान योग्य बात ये है कि, विन्ध्याचल
में प्रतिष्ठित “लघुत्रिकोण” में महालक्ष्मी ही
“विन्ध्यनिवासिनी” रूप में पूजायमाना हैं।
हालाँकि अन्य दोनों स्वरूप भी इन्ही का विस्तृत रूप होने से “विन्ध्यनिवासिनी” मान्य हैं। यद्यपि”वृहत् त्रिकोण” में विराजमान महाकाली और महासरस्वती भी विन्ध्यवासिनी हैं,तथापि –
प्राधानिक रहस्य में-
सर्वस्याद्या महालक्ष्मीः त्रिगुणा परमेश्वरी।
कहकर ऋषि ने महालक्ष्मी रूप को विशेषतया “विन्ध्यवासिनी” रूप कहा है । अतः महालक्ष्मी रूप ही प्रधान है।
वर्तमान में यह “महालक्ष्मी रूपा” जो “विन्ध्यवासिनी” मन्दिर पर हैं, उनकी मूर्ति ” श्रीयन्त्र” पर अधिष्ठित है ।
ऐसी ऐतिहासिक मान्यता है कि, काशी
के महाराजा ने वर्तमान “महालक्ष्मी” विन्ध्यनिवासिनी की मूर्ति आज से लगभग दो से तीन हजार वर्ष पूर्व स्थापित की थी।
ध्यातव्य है कि,यह स्वरूप “यन्त्रस्थ” है।
“श्रीयन्त्रोपरिस्थिता विन्ध्याचलनिवासिनी”
वचन प्रामाण्य “औशनस”उपपुराण में उल्लिखित है।
अतः ऊपर ” सौवर्णाम्बुजमध्यगाम्..”
इत्यादि वनदुर्गा ध्यान से भिन्न ध्यान
भगवती कृपा से “दास” द्वारा भगवती ने ही लिखवाया है,जो इस प्रकार है-

कुङ्कुम-चर्चित-रक्त-भाल-विलसद् –
दिव्याम्बरालङ्कृताम्, शङ्खं चक्रवराभ- यानिदधतीं प्रख्यैः चतुर्भिः भुजैः।
श्रीयन्त्रे विलसन् -मृगेन्द्र-सुमहत् -पीठस्थितां मातरं,दक्षिण-वाम-गणेश-
योगिनि-गतां विन्ध्ये वसन्तीं नुमः।।

भाषानुवाद-
रोली रचित रजत मस्तक है दिव्यवस्त्र आभूषण साजत, चारि भुजा राजित मुद्रा वर अभय शंख अरु चक्र विराजत।यन्त्रश्री शोभित मृगेन्द्र-पीठस्थ-विन्ध्य-
नगराज राजिनी, दक्षिण वाम गणेश योगिनी-युक्त-मूर्ति भव अभय दायिनी।

यह विन्ध्यनिवासिनी ध्यान हरिः ओ३म् तत् सत् कृपया लिखित होने से तद् युगल चरणारविन्दों में सतत सादर समर्पित।
गुरुहरी शरणम्।
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अधिमासः पुरुषोत्तममासः

अधिमास या पुरुषोत्तम मास का प्रति तीन वर्षानन्तर आना अवश्यंभावी है।
नारायण! हमें जिस प्रदेश में अपने प्रारब्ध वशात् निवास करने का अनुग्रह वात्सल्यगुणसागर! करुणानिधि! भगवान् ने प्रदान किया है,उसमें चान्द्र पंचांग का व्यवहार होता है। पंचांग द्विविध- चान्द्र और सौर भेद से होता है।
चन्द्रमा की घटती कला से कृष्ण पक्षादि मास द्वारा हमारे पंचांग का प्रारंभ है।
पुनः द्वितीया चन्द्रोदय से चन्द्रमा की पूर्णिमा पर मासान्त द्रष्टव्य है। लेकिन
सौर पंचांगों का प्रारंभ मेषादि बारह राशियों पर सूर्यनारायण के आगमन से होता है।इस सौर पंचांग में तीस दिनों का ही प्रायः मास सुनिश्चित है।
अब हमारे यहाँ प्रचलित चान्द्र पंचांग का आधार चूँकि, कलाक्षयत्वेन घटने बढ़ने
क्षय लोप होने में है, अतः सम्पूर्ण वर्ष में
तीन सौ चौवन दिन होते हैं।
सौर पंचांग मेष आदि राशि पर सूर्य के आने पर होने से कुल निर्धारित काल तीन सौ पैसठ दिन और छः घण्टे होते हैं।
इस तरह उक्त चान्द्रऔर सौर पंचागों में ऐकरूप्य लाने के लिए, तीन वर्षानन्तर चान्द्र पंचांग में एक मास बढ़ा दिया गया है। यह तो ज्योतिः शास्त्र आधारित अधिमास का परिगणन हुआ।
नारायण! इसके अतिरिक्त भविष्य पद्म और हरिवंश आदि पुराणों में इस मास के आगमन और माहात्म्य का सविस्तर वर्णन है।
हिरण्यकशिपु को प्राप्त वरदान में किसी मास में भी मृत्यु न होने का वरप्राप्त होने से, भगवान् ने एक मास अधिक करके,पुरुषोत्तम नृसिंह रूप धर कर उसका वध कर दिया।
इस मास में किसी भी मेषादि राशि पर सूर्यसंक्रमण नहीं होता।अतः कोई संक्रांति नहीं होती।
ग्रेगेरियन कैलेण्डर भी घटते बढ़ते तीस इकतीस दिनों और चौथे वर्ष उनतीस दिनों के फरवरी मास में पूर्ण होता है।
हमारे इस अधिमास में कोई संक्रांति नहीं होने से मांगलिक संस्कार वर्जित हैं।

किन्तु दीपदान का अनन्त फल,पुराणों में वर्णित है,जिससे दारिद्र्य क्षय हो जाता है,खूब लक्ष्मी की वृद्धि भी होती है।

” दीपदाने$धिमासेस्मिन् ,रमावृद्धिकरं नृणाम्।”-भविष्य पुराण।

नारायण! समस्त वेदवर्णित तीर्थ स्नान
योगयज्ञतन्त्रमन्त्र और कृच्छ्र चान्द्रायण व्रतादि, गयाश्राद्ध,सूर्यचन्द्रग्रहण व्यतीपात आदि का फल इसी मास में दीपदानेन प्राप्यते।
विद्याप्राप्ति, विवाहेच्छु को वरस्त्री प्राप्ति और मुक्तिकामी को मुक्ति लाभ भी इसी मास में सश्रद्ध दिये गए धूपदीपादि से होना सुनिश्चित है।
कृष्णार्थी प्राप्नुयात् कृष्णं,
मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात्

गुरुः शरणम्। शरणम्।


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श्रीराम नाम वरानने

नारायण यदि दानवव्यवहार,किसी का भी हो,तो इतिहास साक्षी है, कोई भी शक्ति, किसी भी निष्कामी भक्त को परास्त नहीं कर सकता। प्रह्लाद ध्रुव मार्कण्डेय प्रबल उदाहरण हैं।
अतः गणेश दुर्गा शिव विष्णु सूर्य आदि पंचदेवों के उपासक साधक की प्रथम शर्त ही शरणागति और निष्काम भक्ति की है।
संसार सुख तो भक्त को स्वतः सुलभ होगा। और यदि नित्य भगवान् से अनित्य संसार और संसारी भोग राग माँगा जायेगा, तो बार-बार संसार में आना जाना लगा रहेगा।जबकि यह मानव शरीर बड़े भाग मानुष तन पावा और सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन गावा,है। इसलिये केवल इसी एकमात्र विवेकसम्पन्न मानव शरीर का चरम लक्ष्य,इसी शरीर से अभी पा लो।और वह चरम लक्ष्य है, पुनः किसी मानव दानव पशु की माता के गर्भ में न जाना। किसी अच्छे बुरे भोग के लिये, दूसरा कोई भी शरीर नहीं धारण करना।
केवल भगवतीभगवान् की अनुपम श्रीनखमणिचन्द्रिका की सायुज्य प्राप्ति कर लेना।

केवल और केवल भगवान् की आज्ञा से भगवदीय कार्य के लिये, धर्मस्थापन के लिये, शरीर प्राप्ति हो, जैसे तुलसीसूरकबीररैदासमीरा आदि निष्कामी भक्तों को धरती पर भगवदाज्ञा से आना पड़ा।
” चारि जुगन के भगत जे, तिनके पग की धूरि।सरबस, आइ बिराजिहौं, मेरौ जीवन मूरि।
भक्ति भक्त भगवन्त गुरु चारि नाम वपु एक।तिनके पद बंदन किये,नासैं बिघ्न अनेक।
सहस नाम सम सुनि शिव बानी।जपि जेई पिय संग भवानी। तुम पुनि राम राम दिन राती सादर जपहु अनंग अराती।

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।सहस्र नाम तत् तुल्यं श्रीराम नाम वरानने।।

गुरुःशरणम्।हरिः शरणम्।

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साधनापथ



साधना का पथ कठिन लेकिन सरल से भी सरल है।
सृष्टि का प्रत्येक कोना आत्म अंशी का महल है।
हो गई “गुरु” की कृपा यदि जीव जीवन ही सफल है।
जब हुए निष्काम हम माया मरी सुन लो अटल है।
साधना का पथ कठिन लेकिन सरल से
भी सरल है।
थी चली यात्रा जहाँ से बढ़ रहे प्रतिपल विपल है।
कठिन पनघट की डगर फिर हम गहें संकल्प बल है।
काल कहता “ध्रुव” कहानी कल हुआ था आज कल है।
राम का अभिराम का सब नाम का ही आत्मबल है।
साधना का पथ कठिन लेकिन सरल से भी सरल है।


गुरुः शरणम्।हरिः शरणम्।
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सद्गुरु बैद


बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।भागः जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्प्यते।इत्यादि श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय5मन्त्र 9) वाक्य,और (कठोपनिषद् अ.1.20तथा श्वेताश्वतर 3.20) अणोरणीयान् महतो महीयान् इत्यादि ,वाक्य यह बात प्रमाणित करते हैं,कि हमारा शरीरपिण्डस्थ जीव, बाल के अग्रभाग के सैकड़ों टुकड़े और उन टुकडों के भी सैकड़ों खण्ड करने पर जो भी अवशिष्टरूप बचता है, वही चर्म चक्षुओं से अदृश्यमान “जीवात्मा” है।वह तो सूक्ष्म से सूक्ष्मतम है।और वही चेतन जीवात्म तत्व,परमात्मा का अंश होने से विशाल से विशालतम भी है।


मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्।यत् कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्। वह परात्पर माधव तो कर्तुम् अकर्तुम् अन्यथाकर्तुम् है। हम उन्ही के अंश मात्र हैं। इसीलिये आत्म अनुभूति होने पर हम” अहं ब्रह्मास्मि” और”तत्वमसि” हैं।हम सूक्ष्म से सूक्ष्मतम विशाल से विशालतम हैं तब, जब कि आवागमन से मुक्त हो जायें। यही मुक्तमुक्ति(मोक्ष)है। धर्मार्थकाममोक्ष आदि सभी पुरुषार्थों में अन्तिम पुरुषार्थ “मोक्ष” की प्राप्ति हो जाने पर किसी भी “भोग” के लिये कोई शरीर धारण नहीं करना पड़ेगा और भोग तो कर्मभोग है,वह भोग चाहे भूः आदिलोकों से लेकर ब्रह्मलोक तक का हो या यमादि नरकलोकों का भोग।

प्रश्न विचारणीय यहाँ यह कि,मोक्ष कैसे?
जिससे सारे भोगों से छुटकारा मिले।
तो ऐसी स्थिति में सद्गुरु कृपातः शरणागताभक्ति,ही एक ऐसी ही, जिससे, मोक्ष हो सकता है।
यह ऐसी भक्ति है, जिसमें भक्त संसार दुःख से दुःखी होकर,सन्तसद्गुरु चरणों में गिर पड़ता है।और जब गुरु भगवान् की कृपा,अकारणकरुणावरुणालय भगवान् से जोड़ देती है, तब संसार बन्धन नष्टभ्रष्ट हो ही जाता है।मुक्ति होती है, केवल और केवल भक्ति से।


भक्ति का नशा चढ़ते ही, सारे शरीर संसार का नशा चूर-चूर हो जाता है- “देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद”, वाली भक्ति। “मामेव ये प्रपद् यन्ते मायामेतां तरन्ति ते”, वाली भक्ति। आत्मीयों! ऐसी ही भक्ति के भाव प्रभाव से निश्चित रूप से इस नश्वर जगत्
और जगत् की वस्तुओं में मनबुद्धि चित्त का राग नहीं रह जाता।वह राग रागात्मक मायात्मक जगत् के कर्ता कारयिता से जुड़कर इच्छित लक्ष्य “मोक्ष” की प्राप्ति करा देता है।
समर्पणभक्ति का प्रभाव पड़ते ही,तत्क्षण सच्चिदानन्दानुभूति होती है। संसार माया की पकड़, अकड़ या “अहमादिवृत्ति” क्षीण होती जाती है।मनुष्य शरीर मिलने का प्रयोजन सिद्ध हो जाता है।
लेकिन पहले ,सदाचरण,मनुष्योचित आचरण और क्रमशः सद्गुरु प्राप्ति होती है।उसके बाद सद्गुरु कृपा के प्रसाद से सब कुछ मिल जाता है।
श्रीमदाद्य रामानन्दाचार्य भगवान् की कृपा से तुलसी सूर कबीर रैदास मीरा जैसों को सामीप्य,सायुज्य, सालोक्य,सारूप्य और सार्ष्टि मुक्ति मिली है, और इसी कराल कलिकाल में।
ऐसी मुक्ति ही तत्वतः अणिमा,गरिमा लघिमा प्राकाम्या ईशित्व वशित्व सिद्धियों की प्राप्ति भी करा देती है।
और जीव कृतकृत्य हो जाता है – अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्मा परमात्मा की अनुभूति होने लगती है। और, सगुण साकार रामकृष्णनारायण सीताराधालक्ष्मी विन्ध्यवासिनीदुर्गा कामाख्या आदि की करुणा कृपा का अंशाश भी अनुभव होने लगता है।

लेकिन इन सभी के विपरीत, यदि भगवदीय गुणों की अनुभूति इस जीव को इस मानव पिण्ड में नहीं हुई,तो शरीर और आकृति भले ही मानव जैसा दीखे,वह उक्त मानवीय भगवदीय गुणों के बिना दानव ही है।
“जे आचरहिं ते नर, न घनेरे”
वेद सन्त आज्ञा का आचरण होने लगा तभी नर(मनुष्य) और न(नहीं आचरण हुआ) तो घनेरे(राक्षस) क्योंकि-
“आचारः परमो धर्मः” मनुष्यता का आचरण ही श्रेष्ठ धारणीय धर्म है।
और नारायण! “साधन धाम मोक्ष करि द्वारा” यह देवदुर्लभ( सुर दुरलभ सब ग्रन्थन गावा) नर तन (शरीर) है।
“पाइ न जे परलोक सँवारा”।ऐसा शरीर मिलने पर भी जनम जनम की बिगड़ी नहीं बनी तो दोष हमारा ही है। पूज्य
गोस्वामी जी जैसे सन्तो ने वेदतुल्य श्रीराचरितमानस जैसे ग्रन्थों से दृष्टि दे दी है।हम अणु परमाणु की तरह नहीं दीखने वाले जीवात्मा और परमात्मा कीअनुभूति करके ही ” आवागमन मुक्त” लोक ” वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति कर पाते हैं।
अतः सन्त सद्गुरू की वाणी और आज्ञाओं का पालन और दृढ विश्वास पूर्वक होने पर सारी मुक्ति का मार्ग मिलेगा। इसलिये सदाचार वेदाचार सन्त संग ही संसारसागर के “रोग” की असली दवाई है। तुलसीसूरकबीररैदासमीरा बैद्य डाक्टर हैं, और इनके वचन,इस भवरोग की औषधि,विश्वास करना पड़ेगा।बिना विश्वास के कोई दवा काम नहीं करेगी।

” सद्गुरु बैद बचन बिस्वासा”

“गुरुहरी शरणम्”

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भू से ऊपर

हमारे ऋषियों ने एक अनावृत तथ्य यह रखा है कि पृथ्वी आदि पंच तत्वों से ऊपर उठे बिना जीव को लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा।
भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्य आदि सात लोकों में भी क्रमशः गति होती है।
सत्य लोकावाप्ति हो जाने पर गुरु भगवत् कृपातः फिर नीचे गिरने की कथंचित् ही स्थिति नहीं बनती।
इसी तरह शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा पंच विषय वाली धरती है।हम मानव पिण्ड में इसका सूक्ष्म अनुभव कर सकते हैं।यह धरती इन्ही अपने शब्दादि गुणों/विषयों के कारण अत्यंत गुरु है। हम इन्ही विषयों में पड़कर बार-बार इस धरती पर नाना शरीरों में चंक्रमण करते रहते हैं।यही इसके गुरुत्वाकर्षण का रहस्य सूझता है।

शब्द आकाश का मूल गुण, स्पर्श वायु का मूल गुण,रूप अग्नि का मूल गुण,रस जल का मौलिक गुण और गन्ध धरती का मूल गुण है।
शब्दादि पंच में एक उसका मूल गुण तथा
उसके बाद अपने पूर्वज वर्ती का क्रमशः गुण अन्तरित हुआ है।
आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी तक आते आते,इसीलिये क्रमशः एक,दो,तीन,चार और पाँच गुण धरती के होते हैं।
आसान नहीं इन गुणों/विषयों की आसक्ति से बचना।
सभी के अन्तः में एक और विशिष्ट गुण
सत्व,रजः और तम भी शिष्ट अनुस्यूत है।
जिसके कारण क्रमशः, सुख दुःख और
मोह होता है।

इन भोगरूप शब्दादिक की असारता का बोध भी जीवनदुःखों से ऊबने के कारण और किसी भक्तसन्त के चरणाश्रय से पैदा होता है।
शरीर भी त्रिविध- स्थूल,सूक् ष्म और कारण रूप है।
स्थूलशरीर पृथ्वी आदि हैं।

सूक् ष्म शरीर मनोबुद्ध्यहमादि है।

औरकारणशरीर पूर्वप्रारब्ध है।

अब शनैः-शनैः इन स्थूलसूक् ष्मादि में राग ही, मूलतः विराग भी बनता जाता है।
यह विराग स्थूल से सूक् ष्म शरीर की ओर बढ़ता है।क्योंकि-
स्थूलादि पंच और मन आदि सूक् ष्म
भोगों से व्याकुलित व्यथित होते हैं।इसी भोग वैकल्य में,आत्मदेव भगवत् कृपा से अपने ही अंगो से घृणा होती है।और मन आदि की अशुचि,जब शुचिता की ओर बढ़ती है, तब यही हमारी पार्थिव देह भारभारी घृण्य हो गई-

शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा।

इसी में विवेक वैराग्य सम्पुष्ट होता है। तब आत्म गत भाव को परख कर परमात्मा किसी सन्त सद्गुरु का चरण पकड़ाते हैं।और बार बार के नाना देहों में जाकर आने जाने से मुक्ति का भाव उपजता है।
सिद्धों(मुक्तों) की संगति ही मुक्ति का परमोपाय है।और वह भी क्रमशः अनेक जन्मों में शनैः शनैः भोगनिरास होते होते
आत्मोपलब्धि का प्रबल भाव बनता है,तब जाकर परमसाधुता सज्जनता से
जीव, जीवन्मुक्त और मुक्त हो पाता है-

अनेकजन्मसन्सिद्धः ततो याति परां गतिम्।

पंचविषया पृथ्वी से ऊपर जाने पर शब्द स्पर्श रूप रस को धारण करने वाला “जल” तत्व है। इस जल का प्रधान गुण तो”रस” है, जबकि रूपस्पर्शशब्द इस जल को अपने पूर्वजों से प्राप्त है।इस रस का बड़ा आकर्षण होता है।भोजन अन्न पानादि के भोग पर सभी आकृष्ट होकर लक्ष्य से भटक जाते हैं।इससे ऊपर जाना प्रत्येक मनुष्य का परम कर्तव्य है।अतः खाने पीने की भोगसामग्री में पड़कर व्यर्थ में जीवन नष्ट नहीं करें।यही ध्यान करके सन्तों ने कहा- जितं सर्वं जिते रसे।मतलब कि यह वह सीढ़ी है जिससे खानपान में विचार करके हम उन्नत हो सकते हैं, अन्यथा नीचे की योनियों में जाना सुनिश्चित है।
जल से ऊपर उठकर त्रिविषय अग्नि तत्व
शब्दस्पर्शरूप मात्र बचता है। और इसके भी ऊपर की स्थिति वायु है।
यह वायु दो विषयों शब्द और स्पर्श मात्र गुण वाला है।यही वायु तत्व है जो हमारी चेतना या प्राण का स्वरूप माना गया है।
इसी प्राणिक/वायु चेतना से ऊपर जाकर एक शब्दगुण वाले आकाश में गति होती है, जिससे धीरे धीरे हम पृथ्वी आदि के गुरुत्वाकर्षण से अलग आत्मसत्ता की अनुभूति कर पाते हैं।
इस सारी प्रक्रिया में सन्तभगवन्त की कृपा करुणा और स्वयं की मुक्ति का भाव दृढ होना ही परम सार है।
धीरे धीरे धैर्य पूर्वक सन्तचरण की सीढ़ी ऊपर उठा ही देती है।
नहीं तो देवता या सारी धरती का राजा बनकर भी संसृतिचक्र टूटने वाला नहीं।

छोट बिबुध दरबार तें भूनृप कै दरबार। जापक पूजक दोउ कौ असह अनादर भार।

बिबुध भूपती दोउ हैं, मलिन चित्त सुन लीजिये। द्वन्द मान अपमान में पड़े जुगल कह लीजिए।

भगवत पूजन बिबुध भी भूनृप करत सँम्हार। भोग बुद्धि दोऊ कहो पहने संसृति हार।
मान और अपमान में जो सम भाव विचार। वही मनुज वैराग्य जुत होता बेड़ा पार।

बिना गुरू कै ग्यान कहँ जो बैराग बिमल मति।मिलै शान्ति उन्ह आर्तजन, रहत अचार विचार गति।
रहत अचार विचार सनातन होत कृपा श्रीराम की। तब मिल सन्तन संग ढिंग कथा लुप्त हो काम की।
देवता हो या भूमिनृप कामाहत दोऊ सुनो। देव श्रेष्ठ हैं जान मान, भू से ऊपर उन जन गुनो।

गुरुहरी शरणम्।
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अक्षय तृतीया

न क्षीयते शुभं कर्म यस्मिन् दिव्यदिने सदा।सा सिद्धाक् षयतृतीया कथिता स्वैः मुनिभिः मता। अतः साधो विचार्यैव कुरु कर्म विचारितम्। विचारिते वेदविहिते कर्तव्ये कर्मणि जनैः।प्राप्यते हि तल्लक्ष्यं पुनर्जन्म न जायते।
💐💐💐💐💐
अनेकजन्मसंसिद्धः ततो याति परां गतिम्।

यह जीवात्मा अक्षय है।
शरीरक्षय है। शरीर से जुड़े संसार और सभी पद पदार्थ अनित्य क्षय हैं।अतः अक्षय तृतीया तो अध्यात्म की सन्देशदात्री ऋषिप्रणीत ऐसी शुभ घड़ी है,जिसमें इस शरीर और संसार से जुड़े, समस्त वस्तुओं से वैराग्य का ज्ञान होना ही चाहिए।

अक्षय तृतीया, वस्तुतः वह दिन है जिससे इस शरीर के नित्य क्षरण का बोध होना चाहिए।
यह ऐसा काल है जो कालकवलित होते संसार का ध्यान कराने वाला है।
नाशवान् शरीर और उससे जुड़े संसार की वस्तुओं सम्बन्धों की अनित्यता का सन्देशदायक है।
और कहें तो, हमारे अद्वैत वेदान्त के चरम विचारदर्शन “नित्यानित्यवस्तुविवेक” का ज्ञान करा कर पुनर्जन्ममृत्युचक्र का ही आत्यन्तिक नाश करा देने वाला दिन है।

क्या नित्य(अक्षय) है और क्या अनित्य (क् षय)है, यही जानकर,संसार के राग मोहमाया में प्रवृत्ति से निवृत्ति मानव जीव की सार्थता है। इसीलिए आज अक्षय तृतीया इस लक्ष्य को लक् षित करने के कारण अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
क्योंकि संसारप्रवृत्ति से निवृत्ति ही जीव के चिरप्रतीक्षित निर्वृति(आनन्द) का सूत्रधार है।

अक्षय्या या तृतीया सा परमनिर्वृतिदायिनी। अतः विवेकं लब्ध्वैव
नित्यानित्यं सुखी भवेत्।

गुरुहरी शरणम्।
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भजस्व माम्


अनित्यम् असुखं लोकम् इमं प्राप्य भजस्व माम्।
मलमूत्र का बर्तन, यह पृथ्वी आदि पंच तत्वों का शरीर भगवान् का भजन करने के लिए मिला है। इसे काम क्रोधादि में पड़कर,ऐसे तैसे खाने पीने और ऐन्द्रिक सुखों(सुखाभासों)में गँवाना ठीक नहीं।

जैसे यह शरीर विनाशी है,वैसे ही संसार भी। मानिए शरीर संसार दो,नहीं बल्कि एक ही हैं।अब प्रतिक् षण नष्ट होते हुए इस,शरीर की प्राप्ति, भगवत् प्राप्ति हेतु ही है।भगवत् प्राप्ति नहीं होगी,तो बार बार,नानाजन्म धारने होंगें।
सोचिये,जिस भगवत् तत्व,प्राणरूप,श्वास प्रतिश्वास के रहते सम्पूर्ण शरीर क्रियाशील,है उसकी ओर हमारी (स्वयं की) दृष्टि नहीं जाती,वह कैसा अद्भुत है।
दृष्टि नहीं जाने का कारण, भगवान् की प्रचण्ड माया है,जिससे बड़े बड़े ऋषिमुनि भी नहीं बच पाये थे।
माया,अज् ञान ,अभिमान, ये सभी एकार्थक हैं। अतः –
सद्गुरु बैद बचन विश्वासा।
अर्थात् हरि कृपा से हरिरूप गुरु प्राप्ति हो जाने पर ही भगवान् का भजन बनेगा।
सूर,कबीर,तुलसी आदि की वाणी वह औषधि है,जिसका सेवन करने से ही,यह माया,अज् ञान और अभिमान जाता है।
जा रहा है,जायेगा और गया भी।
अब इसमें बात इतनी सी है कि हम राम कृष्ण नारायण सीता राधा दुर्गा आदि नामों का स्मरण जप करें।सभी पूर्वाचार्यों ने शरीर को संसार मुखी से भगवन् मुखी
बनाने का एकमात्र उपाय यही कहा है।

जननि जननं जातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः।

गोविन्दं भज मूढमते!

राम न सकहिं नाम गुन गाई।

भजन करत बिनु जतन प्रयासा ।संसृति मूल अविद्या नासा।।
संसृति मूल सूलप्रद नाना।
सकल सोकदायक अभिमाना।।

भजन करत सोइ मुकुति गोसाईं।अनइच्छित आवै बरिआईं।।

राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।।

श्रीराम जय राम जय जय राम।
महामन्त्र जेहि जपत महेसू।कासी मुकुति हेतु उपदेसू।।

इसीलिए भगवान् ने स्वयं की प्राप्ति के लिए,स्वयं(आत्मानम्) को भजने के लिये आदेश किया।
भजस्व माम्।

श्रीराम जय राम जय जय राम।

गुरुहरी शरणम्

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