राधापतेः पादयोः

संसार रंगो रूपों में दीखता है।क्षण क्षण बदल रहा है।इसके रंगरूपों में यदि,गुरु  भागवत भक्तकृपा से मीरा की तरह कृष्ण ही दीखें,तो बात बने।नहीं तो संसार तो बिगड़ने बिगाड़ने के लिये होगा।विचाराचार केवल शुद्ध होगा हरिहर नाम जप स्मरण से,कलिकाल में कोई और रास्ता नहीं है।
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।।

काल की प्रतीक घड़ी पल पल चल रही  है।इसमें मूल्यवान नाम ही है, हरिहर का।और सत्य तो यह है कि श्वास प्रश्वास ही  वास्तविक घड़ी है।हर सांस में शिवाशिव  सीताराम राधाकृष्ण चलेगा, नियत और नियति की क्या चलेगी,वह खुद बखुद ही बदल जायेगी,जो भी पूर्वतः निश्चित शरीर   का प्रारब्ध भोग होगा। इसी बिगड़ी सुधार कार्य के लिये ही करुणानिधि ने करुणा करके,यह मानव शरीर दिया है।
कबहुँक करि करुणा नर देही।देत ईश बिनु हेतु सनेही। और नहीं तो फिर आने जाने का चक्कर बरकरार।
जो विद्या पढ़ी,रोजी रोटीवाली। क्या हो गया,उससे सिवाय अहंकार बढ़ने के।धन मान पद पदार्थ कामिनी कांचन की कामना और भी सुरसा की तरह वढ़ती ही गई।
और विचार करने पर लगा कि जगद् अनुराग प्रीति बढ़ने से हम जिस आत्म स्वरूप को जानने और जानकरके कर्मतः जन्म ग्रहण रोकने के लिये,मानव देह पिण्ड पाये थे,वह एक बार फिर बेकार ही गया।
  इसलिये पढ़ी गई रोटी वाली विद्या तो सा विद्या या विमुक्तये वाली विद्या नहीं बन पाई।
और कहिये कि, यह विद्या, अविद्या ही हो गई।
  अतः साधुसंगसंगति ही संसारसंग भंग करके, पढ़ी गई विद्या को अविद्या होने से,बचा लेगी,यही त्रिकालाबाधित सत्य है।इसीलिये, भगवच्चरणारविन्दमकरन्द गन्धग्रहण के ग्रहिष्णु साधकों से प्रीति बढ़े,इसी कामना के साथ-
विद्या यच्चरणेषु भावय यदि प्रीतिः मुकुन्दस्य वै। अन्यत् स्यात् कलये मनो विपदि तन् नूनं ह्यविद्यायते। सा विद्या नु भवेदितो यदि जगन्मुक्त्यै समाधीयते। साधुः साधय मां स्थिरमनाः राधापतेः पादयोः।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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कालपतिंवरा

भावुक भावपूर्ण भावना शब्दों में। घण्टाभक्त था शिव का नहीं अब्दों में।यही समस्या जीवात्मा कीअतिविकट है। भक्ति में भगवदतिरिक्त चाहना ही संकट है। हम धन मान कामिनी कांचन दास बने घूमते। गुरू भागवत कृपा हो जाय तो ही कटे फास सबके मते।
भक्त देता भक्ति असली, भक्तों की माला कहती। जैसे विषयी संग मिलती विषय जलधार बहती। ओङ्कार युक्त शिवाय वाचन कथ्य उपवीती सदा। अनुपवीती शिवाय नमः कहै यही योग्य सर्वदा।

तुम पुनि राम राम दिनराती।सादर जपहु अनंग अराती। सहस नाम सम सुनि पिय बानी जपि जेई पिय संग भवानी।

एक सौ छब्बीस साल के सन्त तुलसीदास कावैष्णव अतुल अतुलसीवाणी का प्रसाद श्रीरामचरितमानस तो जगद्विषाद और अवसाद सादन करता ही है।
मन्त्र महामणि विषय ज्वाल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।
सीता विनीता घृतचित्तवीता। भिन्नाप्यभिन्ना ननु रामशक्तिः।।कालस्य देशस्य परार्थचिन्ता।अचिन्तनीयप्रभवा विजेत्री।सा कालिका कालविधानकर्त्री, जीवांश्च सर्वान् परिपालयन्ती।मोदंविधात्री चिरकालशान्तिं,पायात् सदा काल पतिं वरा वै।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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बनेगा सब काम

किसी भी क्षेत्र के शाखा के विद्वान्/पारंगत की पढ़ी गई विद्या तो अविद्या  माया को ही पुष्ट करती है। इसलिये स्वयं की  विद्या रूपी वधू को अविद्या माया के आवरण से मुक्त करने और विद्या स्वरूप में स्थिर रहने के लिए, हरिनाम स्मरण/जप के सिवाय और कोई साधन नहीं।

इस नामरूपपति के बिना,पढ़ी हुई विद्या, अविद्या है।यह स्वगत विद्या, अविद्या न बने, मायात्व ग्रहण करके पतिहीना विधवा न बन जाय, इसके लिये इसके पति को हरिनाम की शरण ग्रहण करनी  चाहिए।
अतः सभी सनातनप्रेमियों को हरिनाम का साधनस्मरण करके अपनी पढ़ी गई  विधवाविद्या को सधवा बनाना पड़ेगा।

इसका प्रकाश और प्रमाण हमें श्रीचैतन्य महाप्रभु के जीवन से मिलता है।
बंगधरती पर पन्द्रह सौ ईशवी में अवतरे, श्रीमच्चैतन्य महाप्रभुजी के नामसंकीर्तन से,जंगली शेर भालू भी तरे।
अरे,नारायण मनुष्यों की बात ही छोड़िये। श्रीरामकृष्ण नाम संकीर्तन से महाप्रभुजी ने ऐसी,प्राणवायु फूँकी,जो इस संसार में जन्मे और मृत्युभँवर में फँसे नाना जीवों को सदा सदा के लिए, अनन्त प्राण ही दे दिया। और समझने की बात यह भी है कि, वस्तुतः इन कलिमलग्रस्त प्राणियों का उद्धार करने हेतु और श्रीजी के मादनाख्य भाव का अनुभव करने हेतु   श्रीकृष्ण ने महाप्रभु चैतन्यदेव के रूप में,कराल कलिकाल में अवतार ही ले  लिया था। सन्तमण्डली की यही सनातन मान्यता है। महाप्रभु जी ने तो  केवल नामसंकीर्तन मन्त्र ही सुनाया,बहुत विद्या भी नहीं पढ़ी और न ही बड़े ग्रन्थ ही रचे।

अपनी समग्र जीवनलीला में आपने केवल आठ संस्कृत छन्दों की रचना की, जो कि एक से बढ़ कर एक हैं। यह आठ पद्य सनातन धर्म जीवन की संजीवनी है।
इसकानाम शिक्षाष्टक है। यह ललित उदात्त भावगम्भीर पद्य रसिकभक्तजगत का हृदय ही है, जहाँ नाममहाराज राजते हैं। सम्पूर्ण पद्य इस प्रकार है-

चेतोदर्पणमार्जनम् भवमहादावाग्नि-
निर्वापणम्।श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणम्  विद्यावधूजीवनम्।आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्।सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्।
इस संस्कृत छन्द में श्रीकृष्णसङ्कीर्तन विशेष्य पद है।इस श्रीकृष्णसङ्कीर्तन, विशेष्य का मतलब है, कि हरिनाम को  सम्यक् भाव रस पूर्ण अवस्था में उच्च स्वर से कहा जाना है, क्योंकि उच्चैः भाषा तु कीर्तनम्।अब, इस नाम के संकीर्तन की विशेषताएँ क्या हैं। इसके लिये महाप्रभु जी ने नामकीर्तन के आठ  विशेषण दिये हैं। ये विशेषण हैं-
1-चेतोदर्पणमार्जनम्।
2-भवमहादावाग्निनिर्वापणम्।
3-श्रेयःकैरवचन्द्रिकाविरतणम्।
4-विद्यावधूजीवनम्।
5-आनन्दाम्बुधिवर्धनम्।
6-प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्।
7-सर्वात्मस्नपनम्। और
8-परम्।
इसमें विजयते,यह क्रियापद है।जिसका भाव है कि, यह नाम ही सर्वत्र,सब काल और सभी,समस्याओं पर परम विजय दिलाने वाला है।
अब क्रमशःआठों विशेषणों मीमांसा इस प्रकार है-
1- यह भगवन्नाम तो, चित्तरूपी दर्पण पर नाना जन्मों शरीरों की चढ़ी मढ़ी जमी  कामादि की मोटी काई को हटाकर, चित्त को साफ कर देता है। कामादिवासना हटने पर,संसार वासना नष्ट होगी और स्वात्मस्वरूप भगवत्स्वरूप दिखने  लगेगा। यही तो,इस जीव का चरम परम लक्ष्य ही है। 
2-भवति लीयते भूयते लयते यत्र  सर्वं जगज् जातम्। जहाँ संसार और सारी  संसारी वस्तुएं उत्पन्न और विनष्ट होती हैं, उसे भव कहा गया है। यह वस्तुएं यहाँ लगी हुई कामना/वासना की प्रचण्ड आग में जल जल कर समाप्त हो रही हैं। इस संसार की लगी कामादि की जला देने वाली आग बुझाने और इससे बचने बचाने का उपाय हरिनाम है।
3- सभी जीव जगत् और विशेषतया इस मनुष्य के लिये स्वीकार योग्य दो मार्ग हैं।
एक है श्रेय और दूसरा प्रेय। नचिकेता और यम संवाद में इस श्रेयप्रेयमार्ग का विस्तीर्ण वर्णन है। श्रेय मार्ग नाना लोकों की स्वर्गादि सुखसामग्री का भोग का मार्ग है। जिससे नाना शरीर धारण करके बार बार जन्म मृत्युभँवर में रहना होता है, चाहे वह स्वर्गलोक हो ब्रह्मा का लोक।
दूसरा मार्ग श्रेयमार्ग है।यह इन लोकों के भँवर से बचने का मार्ग है।इसका ही वरण वरदान रूप में नचिकेता ने किया था।
अब देखिये कि यह हरिनाम का कीर्तन श्रेयमार्ग यानी की पतनमुक्तिमार्ग पर चलने वाले जीवों को उसी तरह से है जैसे कुमुदिनी के लिये चन्द्रमा की चाँदनी।
चन्द्र के उदित हुए बिना कुमुदिनी का विकास उल्लास सम्भव ही नहीं है। इसी तरह यह भगवन्नाम संकीर्तनस्मरण मुक्ति कामी जीवों का सतत उदय और उल्लास है,जैसे कि कुमुदिनी के लिए चन्द्रमा।
  जगत् का चन्द्रमा तो अस्त होगा,और कुमुदिनी मुरझा जायेगी लेकिन यह नाम ऐसा चन्द्रप्रकाश है, जो जीव को श्रेयपथ पर जाने और चरम तक जाकर विशेष रूप से तर जाने का अनुमप प्रखर दीप्त  तेजःपुंज है।यह तो ऐसा है कि जीव को तार कर ही मानेगा। इसीलिये इस नाम को चन्द्रिकावितरणम् कहा।
4- यह विद्या रूप वधू का जीवन, माने कि पति/स्वामी है।
5-यह आनन्दाम्बुधिवर्धनं है। मतलब कि आनन्द का ऐसा महासागर जो आनन्द को कभी भी कम नहीं होने देगा। नाम को आनन्द का महासमुद्र कहा गया।इसीलिये गोस्वामी जी ने इस रामनाम को कहा-
जो आनन्दसिन्धुसुखराशी…
6- यह रामकृष्णनारायण नामाक्षर अक्षर  प्रतिपद उच्चारण करने पर, प्रत्येक ही  नामपद सतत वर्धमान सम्पूर्ण अमृत का आस्वादन है।
इसे पान करके मृत होने का प्रश्न कहाँ।
7- यह नामसंकीर्तन तो ऐसा है कि जो सारे मनुष्य और मनुष्येतर जीव जगत की आत्मा का स्नान ही है। जलस्नान तो शरीर शुचिता देगा,लेकिन यह नाम तो सारी आत्माओं को भी स्नान कराकर संसार सागर से तार देगा।
8- यह परम् है। अपरम् नहीं। वस्तुतः परं का मतलब है कि, यह पूर्ण परात्पर ब्रह्म है।
   नारायण ऐसे ही क्षीयमाण जीव जगत या कि अष्टधा प्रकृति से अविद्या से माया से पार जाने का एकमात्र साधन यही राम  हरिकृष्णनारायण नाम ही है।
तरेगा भवमहासागर अगर ले रहा सतत हरिनाम। अव्यर्थ अमोध रघुपति बान जैसा बनेगा सब काम।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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सियरामबिहारी

मंगल कौ तुम मंगल साजत हृदयराखि सियरामबिहारी।
वेगि हरो हनुमान महाप्रभु जौ कछु संकट होइ हमारी।


संकट एक दिखात हमै एहि आपनि माया भगाव बिहारी।
अब और नहीं सहि जात प्रभो निज दिव्य स्वरूप दिखाव बिहारी।


तव दिव्य स्वरूप को देखि छनै यह भागि चलै निज रूप उघारी।तब जानि परै यह पिण्ड शरीर है पूरन काम भयौ भर भारी।


एहि मानव देह कौ लक्ष्य इहै निज रूप गयौ हमसों जो बिसारी।बेगि दिखाव हमैं निज रूप हे राम कौ दूत हो अद्भुत कारी।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जौ कछु संकट होइ हमारी।
मंगल कौ तुम मंगल साजत हृदयराखि सियराम बिहारी।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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प्रभु मेरे दर्पण

अहो बत श्वपचोतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।तेपुः तपःते जुहुवुः सस्नुः आर्याः ब्रह्मानूचुः नाम गृणन्ति ये ते।
       श्रीमद् भागवत-3/33/7
अरे,नारायण भागवत पुराण में मैत्रेय के वचनों द्वारा,यह अद्भुतव्यासवाणी है।       इसके अर्थ में अवगाहन स्नान करके,क्या आनन्द आता है।

कितने आश्चर्य की बात है कि,भगवान् के हरिकृष्णनारायण नामों का उच्चारण करनेवाला चाण्डाल भी ब्राह्मणों से श्रेष्ठ है, क्योंकि उसकी जीभ पर तुम्हारे नाम का आस्वाद है। ऐसे व्यक्ति ने सारे तपों का तप कर लिया है।सारे यज्ञों को सविधि सम्पादित कर लिया है।समग्रतीर्थों में स्नान कर लिया है।सभी वेदों का भी स्वाध्याय भी पूर्ण कर  लिया है। इसकी मीमांसा देखने योग्य है।

यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्। तुभ्यम् इति पदे चतुर्थी विभक्तिः। कर्मणा यम् अभि- प्रैति स सम्प्रदानम्/सम्प्रदाने चतुर्थी। ये दो सूत्र भगवान् पाणिनि के हैं। प्रथम सूत्र यह बताता है कि,अपनी दान क्रिया द्वारा जो दान का कर्ता है,वह जिसका सर्वथा सामीप्य और अनुग्रह पाना चाहता है,वह   अनुग्राह्य दानग्राही सम्प्रदान संज्ञक है।
दूसरे सूत्र से सम्प्रदान संज्ञक में चतुर्थी विभक्ति हो जाती है-
जैसे- राजा विप्राय गां ददाति।

अब,देखिये श्लोक में – तुभ्यम् पद में सम्प्रदानत्व/चतुर्थी का क्या अर्थ घटता है। यहाँ स्पष्टतया,वाक्य में- 
नामजपकर्ता कर्ता है।वह अपने नामजप की क्रिया द्वारा तुभ्यम्,मतलब कि,  सम्प्रदानसंज्ञक श्रीभगवान् का सर्वथा सामीप्य/अनुग्रह चाहता है।अथवा नाम दान करके,उन नाम को  पाने वाले रामकृष्णनारायण को अभिप्रैति माने प्रसन्न करना चाहता है। इस तरह, नाम लेकर नामग्राही, भगवान् को ही नाम दान कर रहा है।और इस अपने नाम को ही लेकर/पाकर श्रीरामकृष्णनारायण प्रसन्न  होते ही हैं, निस्सन्देह।इतिहास पुराणों में  देवर्षिनारद-ध्रुवप्रह्लादादि  नाना प्रसंग  इससे भरे हैं।  
द्रष्टव्य है कि ,नामजपकर्ता कर्ता नाम के  सम्प्रदान से रामकृष्णनारायण को ही उनके इन्हीं नामों से प्रसन्न कर दे रहा है।वह नाम लेने वाला नाम दान कर रहा है।दाता जीवात्मा,और आदाता परमात्मा है। अपने ही नाम को पाकर,उस दाता को अपना सामीप्य देकर अभय कर दे रहा है। चाहे वह कोई हो। इस नाम की महिमा अद्भुत है। श्रीमद्वल्लभाचार्य ने सर्पयोनि में पड़े जीव का उद्धार कर दिया।देखिये  तो,चैतन्यदेव ने वनचारी सिंह जैसों कोभी नाम सुनाकर तार दिया। क्या है, हरिनाम   का ऐसा अतुलित बल,जो मनुष्येतर को जन्मपाश से मुक्त कर दे रहा है। मनुष्य की तो बात ही और है। 
वाह,क्या देववाणी का सारगर्भित अर्थ है।
भगवान् को कुछ भी नहीं चाहिए, अपने नाम के सिवाय।
आखिर, जगत् उन्हीं का बनाया है। सब  चराचर की समस्त वस्तु उन्ही की है।हमारी अपनी कौन सी वस्तु है, जिसे हम
उन्हें देकर,प्रसन्न कर सकते हैं।
नाम भी उनका,हम भी उनके,हमारा अपना क्या है। हाँ यह अवश्य है कि,
वे अपना नाम स्वयं/स्वतः नहीं ले सकते।
बस इसी में, नाम के उच्चारण में  इस दासभूत जीव का वैशिष्ट्य है। वैसे सब   उन्ही का उच्छिष्ट है,यह जीवजगतमात्र।

रामनाम सिवा क्या कर सकता हूँ अर्पण। बिम्ब आप प्रतिबिम्ब जीव प्रभुमेरे दर्पण।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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आता जाता नहीं

भगवान् के भक्तों का भाव वे समझें या उनके प्रेमी भक्त। समग्र आस्तिक समाज
हमारी दृष्टि में प्रेमी भक्त है।कौन किसका क्या कहाँ का भाव है, यह तो वही अमित भाव प्रभावशाली ही जान सकते हैं,जो भाव रूप बन कर शब्दों में बह जाते हैं।  वे रामजी जैसा जैसे जब  चाहें अपना अर्थ यानी कि अपने को,शब्द रूपा जगदम्बा जानकीरूप में नव नवाकार दे सकते हैं।
गिरा अरथ जल बीचि  सम,कहियत भिन्न, न भिन्न।बन्दौं सीताराम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न।
संसार के आवागमन से खिन्न यह जीव जगत् का अनुपम व्यक्त रूप मनुष्य जीव जिसमें,आत्मा परमात्मा का परम प्रकाश सर्वाधिक मात्रा में रहता है, वही सर्वदा के लिये कृतार्थ हो जाने वाली प्रकृति की अनुपम कृति है। श्रीसीताराम को यह ममता अपने इसी जीव और जीव मात्र पर भी है, जिन्हें गिलहरी पर भी दयाशील होते  देखा गया है।इन्हे दीन ही परमप्रिय  हैं,क्योंकि दीनबन्धु दीनदयाल और   दीनानाथ जो ठहरे।
भगवान् श्रीसीताराम कहने के लिए और  देखने के लिये श्रीसीता और राम रूप में अलग हैं। नहीं तो अचिन्त्य असीम युगल का,जब मन ही एक है, तब वे दो कैसे-

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
जानत प्रिया एक मन मोरा।।
सो मन रहत सदा तोहिं पाहीं।
जानु प्रीति रस एतनेहिं माहीं।।
हमरे नित्य किशोर अजन्मा।विहरत प्रान  एक तन द्वै मा।
मन एक तन दो हैं।यही मन का एक होना ही तो अपने श्रीसीताराम का शब्दार्थ शरीर युगल लीला का एकत्व है।
लिंगपुराण में व्यासवाणी है-
अर्थः शम्भुः शिवा वाणी।
वस्तुतः भगवान् अर्थ हैं और भगवती शब्द हैं। हर एक शब्द का अर्थ होता है और हर एक अर्थ का शब्द भी।
शब्दरूप विदेहतनया जब देह में आती हैं, तब उन्हीं से उनके अभिन्न अर्थरूप श्रीराम को जान पाते हैं। यह शब्दरूपा अमिता अनन्ता असीमा मैथिली इन्ही अमित अनन्त असीम अर्थ रामजी  को समझने का साधन हैं।
अर्थ साध्य है, और शब्द साधन हैं। युगल रूप में दोनों ही साधन भी हैं और साध्य भी।नारायण, तुलसीप्रसाद रूप श्रीमद् रामचरितमानस में यह भाव शब्दार्थ नित्य सम्बन्ध रूप में प्रवाहित है।जैस जल और उसकीं लहरें परस्पर एक होकर विभिन्न अलग अलग दीख जाती हैं, लेकिन होती तो एक ही हैं। उसी तरह हमारी विन्ध्याद्रिवासिनी  विन्ध्यवासिनी वैदेही, गिरा अर्थात् वाणी या शब्द हैं और हमारे रामजी अर्थ हैं।
हाँ, देखने में पृथक् लेकिन अनुभव में एकरूप ऐसे श्रीसीतारामयुगल के चरणों में अनुरक्ति तो इन्ही शब्द रूप आचार्या की कृपासाधन से साध्य है।अब प्रश्न यह कि संसार से यह जीव, खिन्न तो पहले  हो,जिसकी खिन्नता देख कर सन्त सद्गुरु भगवान् इसे दुस्तर माया के पार ले जाकर, श्रीरामानुराग दें। लेकिन यह भी देखने की बात है कि इनके प्रति  अनुराग देने वाले सन्त सद्गुरु बिरले हैं, जो इन्हीं की प्रकृति वाले अपार करुणा के गम्भीर समुद्र हैं। और ये ही इस जीव के अविद्या माया के विकट बन्ध को काट देते हैं। मन्त्रादि शब्द साधन देकर उन अपार पारावार अर्थ या परमार्थ की प्राप्ति करा देने में सर्वसमर्थ हैं।
नारद शुक सनकादि व्यास की सुदीर्घ परम्परा है, सद् गुरुओं की। चाहे श्रीमद् आद्य अनन्त श्रीसम्पन्न भगवान्  रामानन्दाचार्य हों अथवा तद् अनुग्रह लब्ध सूर कबीर तुलसी रैदास मीरा आदि,सभी तो उन्ही असीम की याचित/अयाचित कृपा की शब्दरूपी प्रसादी देकर कातर जीव को भवपार कराने की नौका ही प्रदान कर दिए हैं।
और कहिये कि इन्ही तुलसी जैसे तद्भक्तों की श्रीरामजी पर चढ़ी  तुलसीप्रसादी ही तो है, जो विनय की अगाध गहराई में ले जाकर अस्थिर जीव के जन्मकर्म जाल को सदा सदा के लिए ध्वस्त करके उसे स्थिर कर देती है।
अकारण करुणा वरुणालय सन्त सद्गुरू जो तद् भाव के आग्रही हैं, निष्काम हैं, प्रेमरस की वारुणी में मस्त रहनेवाले हैं,  कृपा करैं और दीनों पर द्रवित होकर कृपा बरसानेवारी बरसानेवारी पराम्बा  विन्ध्यनगविहारिणी की असीम करुणा   कृपारूपानन्तानन्द की मदिरा में सदैव ही  जीव डूबा रहे ,इनका इनकी  मस्ती ही चढ़ी रहै,जिससे भव की बस्ती का बसना दास का सदा के लिये छूट ही जाय।
कहाँ से कहाँ बहता हुआ आया कुछ भी  पता नहीं। जाने जानता जान सकता है, वही,जिसे सब जानता नहीं।
अब क्या करूँ साहब मैं का मैं पना जाता नहीं। हे गुरु प्रभु ऐसी कृपा कर  कि जिससे जीव आता जाता नहीं।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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सेव्य प्रभु बरना 

भजन अरथ सेवा ही करना।
सेवक जीव सेव्य प्रभु बरना।।
बने दीन तब जीव समझना।
दीनानाथ द्रवत दुख  हरना।।
चर अरु अचर जगत में रहना।
सबको ब्रह्मभाव चित गहना।।
भज गोविन्दं अरथ समझना।
जग गोविन्दभाव में धरना।।
ब्रह्म सिवा जग में कोऊ ना।
सेवक बन सेवा ही करना।।
गीता का उपदेश  समझना।
भक्त अनन्तर भक्त धारना।।
भक्तों के जो भगत रहैना।
वही भक्त ढिंग श्रेष्ठ कहैना।।
हनूमान ज्यौं सेवक बनना।
सेव्य राम की सेवा करना।।
सेवक हनुमत सेवा धरना।
कर्मश्रेष्ठ सब कुछ कौ गहना।।
भजन शब्द का अर्थ समझना।
अर्थ ग्रहण कर सेवा करना।।
सेवा में सब वस्तु अरपना।
स्वयं सेव्य के अर्पित रहना।।
भजन अरथ सेवा ही करना।
सेवक जीव सेव्य प्रभु बरना।।

  हरिगुरुसन्तः शरणम्
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चर अरु अचर दृष्टि गिरिधर दे


शारदे वरदे,मन मेरा अपने में कर दे।चर अरु अचर दृष्टि गिरधर दे।जगतअविद्या माया हर दे।हर हर हर हर चरण निकर दे। कर दे भेद दूर दर दर दे।मातः यही अभय वर वरदे।हंस स्वरूप जीव तव आसन।
मम जिह्वा पर कुरु अनुशासन।झंकृत वीणा की सुरलहरी।बजे निरन्तर हरी हरी।जनम जनम का तमस हृदय। हो जाय करुणया सार्द्र सदय। जीवन जीव कर्म नद तर दे।सदा दास को अपना कर दे।शारदे वरदे,मन मेरा अपने में कर दे।चर अरु अचर दृष्टि गिरिधर दे।विन्ध्य गुहा गिरि शिखर राजती।तारे तुम  क्या जोगि जती।तव उन्मुख सबको तूँ वर वरदे। अब तो देवि अमर कर दे।
शारदे वरदे,मन मेरा अपने में कर दे।
चर अरु अचर दृष्टि गिरिधर दे।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्


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प्रपत्ति भक्ति ही भक्ति है



भक्ति में चाहिए,नहीं,जैसा आप चाहें,यही भक्ति है।भावग्राही जनार्दनः।
भोजन ग्रहण से पूर्व,भगवान् को भोग लगाकर तत् प्रसाद को प्रसाद भाव से लेना सामान्य है।लेकिन इन्हे खट्टे बेर न मिल जायें,इसलिये स्वयं रसना पर परख कर स्वयं सेवित जूठे बेर खिलाना,अत्यंत भावपूर्ण और असाधारण है।
इसीलिये, न काष्ठे विद्यते देवः।न पाषाणे न हिरण्मये।भावे हि विद्यते देवः तस्माद् भावावलम्बनम्। भगवान्, काष्ठ,पत्थर और सोने की मूर्ति में,नहीं हैं।भगवान् की यह मूर्ति उनका अर्चावतार है। हम भाव से अर्चा/पूजा करें,साक्षात् भगवान् ही मानकर,यही श्रेयस्कर प्रेयस्कर दोनों है।इसी भाव पूजन से लोकालोक सब मिलेगा। हमें क्या चाहिए, यह हम क्या जानें अल्पज्ञ जीव।यह तो वही सम्यक् जान सकते हैं, जिनके बनाये हम सहित सारा संसार है।इसीलिये भगवत् पूजा तो कामना पूर्वक नहीं करना चाहिए, बल्कि निष्काम भाव से। भाव का भावार्थ है-
भवनं भावः वस्तुतः।
जो होता है, हो रहा है, हुआ है, अथवा होगा,वह सभी भाव है। भगवान् का ही सब कुछ है, लेकिन हम केवल और केवल भगवान् के ही हैं,यह बाद में आने वाला भाव है।
अतः यह अनु माने पश्चाद् भाव है,बाद में होता है, इसीलिये भाव के बाद अनुभाव है।अनुभाव इसलिये कहा जाता है, कि यह अनुभाव,भाव ही वास्तविक अनुभव कराता है। अनुभाव तो वाल्मीकि अवतार पूज्यपाद तुलसीदास का तुलसीप्रसाद श्रीरामचरितमानस है।क्योंकि कोई भी हो,यह तुलसीप्रसाद राचरितमानस हमारे जैसे कलिमलग्रस्त जीवों हेतु परम हितकर है।नहीं तो सभी व्यास मञ्चों से,जाने अनजाने कैसे चढ़कर प्रसाद रूप,मिलता। तुलसीग्रहण से प्रसन्न हो जाने वाले हमारे  ठाकुर जी को भाव पूर्वक यही तो चाहिए, नहीं तो माया उनकी और हम का अहम् देखिये कि, इसे अपना मानकर सोना चाँदी रूपया पैसा अन्न वस्त्र सब चढ़ाये जा रहे हैं,हम माया के स्वामी मायापति कदापि नहीं हैं।
हाँ,मायापति हमारे हैं।वे शरण्य,हम उनके शरण्य। वे भोक्ता,हम उनके भोग्य।जहाँ भेजो वहाँ जायेंगे।तुम्हारी चाहत,मेरी राहत।यही आत्मनिक्षेप और कार्पण्य ही शुद्धा प्रेमा प्रपत्ति भक्ति ही,भक्ति है।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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मत कहो कुहरा घना है। मत कहो कुहरा घना है

मत कहो कुहरा घना है,मत कहो कुहरा घना है। यह किसी की भी नहीं आलोचना है। यह किसी की भी नहीं आलोचना है।
प्रकृति का संघात सुन्दर, हो नहीं सकता असुन्दर। पांचभौतिक द्वन्द्व जगती,जहां माया नृत्य करती।शिशिर शीतल हिम हिमाकर।प्रखर कुहरा कहे आकर।कुहर कुहरा बन शिवाशिव।कह रहा द्रुत वेग आ शिव।सिन्धुसरिता घोष करती।नवसृजन उल्लास भरती।राष्ट्र का मन्दिर सुहाना।राष्ट्र हिन्दू चिर पुराना।राम मेरे आ गए हैं।दिव्यमन्दिर में भए हैं।प्रभुभाव की बहती नदी है।म्लेच्छ जग की त्रासदी है।होकर अमायिक जगत देखो।कृपा भगवत् भक्त लेखो।कृपा क्या होती निहारो।नरतन मिला उसको न जारो।मिलेगा सबको मिला है, इसी तन से।जप सदा श्रीरामसीता मनन मन से।फलित हो फलितार्थ जीवन जीव तब।गिर पड़ो पदरज गहो प्रभुभक्त के जब।
राम सबमें श्याम सबमें जिस किसी को दीखते हैं।प्रभुप्रेमव्याकुल इन चरित्रों से सभी हम सीखते हैं।
रावण डरेगा कंस डरता।क्या कभी प्रभुभक्त डरता। राम शाश्वत कृष्ण शाश्वत। हैं सभी अभिराम शाश्वत।राम राजा राज्य जीवन। बन गये जब थे गये बन।बने सबके राम प्रिय थे। कभी क्या किसके अप्रिय थे।राम धर नरतन अप्राकृत।संहिता व्यवहार की कृत।किया सबको शिरोधारण। गीध शबरी हृदय वारण।राम की जब जब कथा हो। दूर जाती तब व्यथा हो।हैं राम नीती राम प्रीती।धर हृदय सब जंग जीती।मोद का मोदक लिया है।राम रटता जो सिया है।क्या कहूँ यह सिद्ध गाथा।राम-पद में झुका माथा। आज हर्षित कृष्ण केशव।आज हर्षित राम माधव।राष्ट्र की नव चेतना है।राम ही कुहरा घना है। राम अभिनव कल्पना हैं।राम नव नव अल्पना हैं।इसलिये आवाज आती।हर दिशाएँ साज गाती।मत हो कुहरा घना है।मत कहो कुहरा घना है।यह किसी की भी नहीं आलोचना है।राम भारत राम वैभव।राम रटते कटेगा भव।
कुहरा रहे श्रीराम का।मृत्यु अन्तिम तब बने अभिराम का।इसीलिये-
मत कहो कुहरा घना है।
मत कहो कुहरा घना है।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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