मानो, मानव का जीवन है भगवत्कथा। और संसार की सब कथा है व्यथा।।
यह मनुज तन मिला पूर्ण सत्संग हित।ये कथा ही है सत्संग और सब अहित।
मान लो प्रेमियों जीव जीवन कथा। क्या गवाँओगे अवसर वृथा ही वृथा।
मानो, मानव का जीवन है भगवत्कथा।और संसार की सब कथा है व्यथा।।
श्यामाश्याम की कथा कर्ण कुहरों भरो।
मत करो व्यर्थ जीवन अहं ना करो।।
जानकी के अनुज की कथा में बहो।
जानकीनाथ गुन सुन, उनको गहो।।
मानो मानव का जीवन है भगवत्कथा।
और संसार की सब कथा है व्यथा।।
नहीं होता किसीका आगे पतन।भक्त भगवत कथा में लगे जब ये मन।।
भक्त भगवत कथामृत में रहें जब मगन।
लक्ष्य पूरित हो नर तन हरी के शरन।।
मानो मानव का जीवन है भगवत्कथा।
और संसार की सब कथा है व्यथा।।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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Author: Prof. Shishir Chandra Upadhyay
मिलत रहत संसारो
मन भजै रटै कैसे हरिनाम ये प्राकृतदेह विचारो।
कैसे सतत हरी सुमिरै नर बात बुद्धि में धारो।
विन्ध्येश्वरीदास गुरुकिरपा निश्चय होय हमारो।
सब आधार छाँड़ि पकरो गुरुपादपद्म स्वीकारो।
सन्त शरण चरणाश्रय मिलतहिं देहगेह विस्मारो।
प्राकृत देह बने अप्राकृत, गुरुकृपा नाम आधारो।
स्वस्वरूपनिष्ठित परिनिष्ठित गुरू ही ईश्वर सारो।
नामनिष्ठ गुरु देखि सहज तच्चरणकमल
स्वीकारो।
विकल अवस्था गमन आगमन नहीं देह मनुकारो।
होय कृपा पंकजपदगुरु कै जात गलत संसारो।
नाम चलत है इसी देह से राम राम रतनारो।
बनै जाय यह पंचभूतनिर्मित अप्राकृत सारो।
यहै रहस्य यदाश्रय श्रयणे गलै कर्म सब छारो।
तबै लक्ष्य परिपूर्ण एहि तन समझो चाहे निकारो।
विना अनन्य आश्रय गुरुपद मिलत रहत संसारो।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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प्रेम के अधीरे
चली थी चलेगी उमर धीरे धीरे।
बनो रामचरणों के प्रेम के अधीरे।।
न जाने है कितने जनमों का जाना। लगा ही रहेगा ये आना ये जाना।।जाना उसी ने सरेण्डर हुआ जो। गुरू भागवत के अण्डर हुआ जो।।सभझो भी तुलसी कबीरों की रहनी। रैदास मीरा और सूरों की सहनी।। बिना इनके चरणों भजन ना बनेगा। इन्ही के शबद से ही सब कुछ मिलेगा।। नहीं तो भजन की पहेली न सुलझे। नहीं अब भी समझे रहो तूँ भी उलझे।।
आचार्य शंकर की निकली है बानी।
सत्य प्रेम करुणा में रससिक्त सानी।।
(गतवति वायौ देहापाये भार्या विभ्यति तस्मिन् काये)
देह तो चली जल अगिनि के हवाले।
हटे प्राण वायू कौन इसको सँभाले।
पत्नी जो करती देह से स्नेह मानो।
अटल प्रेम आत्मा से मानो औ जानो।
यही बात निकली वेदव्यास मुख से।
अरे मनुज मानो रहोगे तूँ सुख से।।
(प्रेष्ठो भवान् तुनुभृतां किल बन्धुरात्मा)
परम प्रेम हे कृष्ण सभी के शरीरों में।
हटा अपनी माया रखो हमें धीरों में।।
सभी का शरीरों से सत् प्रेम होता।
असली है सत् प्रेम सब में जो सोता।।
ऊलझी ये करमों की डोरी न सुलझे।
पड़ो सन्त चरणों में रहोगे न उलझे।।
ये गीता की बानी पुराणों की बानी।
करो प्रेम सबसे निरतिशय ही मानी।
चली थी चलेगी उमर धीरे धीरे।
बनो रामचरणों के प्रेम के अधीरे।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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राम नाम के सहारे
बात समझ में तब आयेगी महात्माओं की जब निरन्तर नाम चलेगा।नहीं तो काम ने छला है, और छलता रहेगा।
यह आवागमन चलता रहेगा।
संसार विवर्त विकार है, उस पुरुष विशेष का।यह विकार ही कामना काम है। काम रहेगा संसार रहेगा। राम रहेगा संसार हटेगा।
बात वैज्ञानिक है।मान लीजिए, अपना क्या है?आत्मा आत्मरूप छोड़कर।
आत्मदेव के रहते सारी पूजा खानपान सम्मान,नहीं तो कोई हो शङ्कराचार्य ही क्यों नहीं,हो कब तक शरीर रखा जा सकता है।इसलिए आत्मवत् सर्वभूतेषु, जानकारी में आ जाये,तब सब मिल गया,वासुदेवः सर्वम् भी सध जायेगा।नहीं तो एक चांस और व्यर्थ गया।
अव्यर्थ साधन है, रामनाम।नहीं तो राम के शरीर से हटने के बाद,उस राम की सत्यता का सत्यापन? कैसा समाज है?
जब पिण्ड से बाहर हुए जीवराम,ब्रह्माण्ड में पहुंचे,कर्मवश,तब सूक्ष्मशरीरराम को रामनाम सत्य बताया जाना ही द्योतक है, इस बात का कि राम तो त्रिकालाबाधित सत्य हैं।स्थूल में सुना है, तो सूक्ष्म में भी वही सत्य हैं, एकमात्र।
राम सत्य संकल्प प्रभु हैं।उन्ही से ही जैसा भी हो सारी साज सज्जा है,नहीं तो सज्जनों! साज गया, आवाज गई, नामी गया,नाम गया।कौन नाम लेने वाला है।सब भूल जाते हैं, एक ही दिन में,जब तक सूरज चाँद रहेगा, अमुक जी का नाम रहेगा, बस एक दिनी वन डे है।मीरारैदास कबीर,सूर तुलसी नाम का सिक्का चल रहा है।चलते रहेंगे सब रामनाम के सहारे।और सहारे सब हारे।समझ आयेगी इसी राम नाम के सहारे।नहीं तो सन्त तो कहते रहेंगे।सन्तों की अच्छी बाते हैं अच्छा लगना स्वाभाविक ही है।लेकिन समझ (ज्ञान)तो राम नाम के सहारे।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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क्षणिकाः
रसना रस राम राम कौशल्या के सूनु राम।
बार बार रटत राम होत जनम पूर्ण काम।
कृपा के निकेत और रघुपति के दूत तुम,बन्धु हो विपन्नों के परम विराम हो।दुखित जनों के कष्ट हरते हे! कपीराज वायु के सुपुत्र तुम्हें सतत प्रणाम हो।।
निश्चय ही सिद्ध होता सब असम्भव कार्य है।धरे ध्यान कृपा उनकी मिलता क्या नहीं है।वे ही वानरेश करें रक्षा साधु सन्तों की।हैं कृपालु चित्त कृपाशीलता ही कार्य है।
श्रेष्ठ शिखर विन्ध्याचल का है, जहँ शिखर राजती नित्य भवानी। आर्यशरण्या जगन् मातृका ,रक्षा वरदा है वरदानी।
करते अमंगल का ध्वंस विध्वंस मुदा। महाबली क्लेशहर्ता शरणागतरक्ष सदा।
भूमिसुतासीतापति राम में अनुरक्त रहते। स्मरते वायुसूनु तुम्हे कृपा आलय कहते।
जिनकी कृपा के लेशमात्र होते पूरे काम। आद्याशक्ति विन्ध्यस्थित दुर्गा भजूँ आठों याम।
भक्तों के सकल कष्ट सतत तुम हरते। पंचानन केसरी कपि क्या न तुम करते। पारावारकृपा के प्रभु तुम्हें हम भजते।
राम राम स्मरते तुम श्वास श्वास रहते। जनरक्षा प्रतिक्षण मंगल ही करते।
वायुसूनु शिवस्वरूप रामदूत जयते।
विन्ध्याचल सविशेष कान्त उन्नत अधित्यका राजित।अष्टभुजा माँ
सरस्वती किया तूँने कंस पराजित।
शुम्भ निशुम्भ दैत्य द्वय दुर्धर,किया विनाश मात्र क्षण में।धरती गगन सकल त्रिभुवन हे वैष्णवि! चरती कण कण में।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
नमस्तस्यै नमो नमः
सर्वाधाराभूतस्था सर्वानन्देतति कथ्यते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
जय सियाराम
मार्कण्डेयपुराण के अन्तर्गत वर्णित दुर्गासप्तशती में कुल तेरह अध्याय हैं। पंचम अध्याय में नाना रूपो़ में देवी की स्तुति करते हुए उन्हें प्रत्येक रूप में अवस्थित बताया गया है। हर मन्त्र के अन्त में नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः कहा गया है। चार बार आये हुए इस नमन का बड़ा रहस्य है।इस प्रकार के-
नमः तस्यै नमः तस्यै नमः तस्यै और नमो नमः के प्रति स्थूल सूक्ष्म कारण और कारणातीत का दर्शन एक आध्यात्मिक अनुभूति है। बिना तद् आकार आकारित चित्तवृत्ति के ,ऐसे स्तर की प्राप्ति सम्भव नहीं है।
किन्तु इन चार प्रणामों का निवेदन, इसलिये भी है कि,साधक सद् रजस्तम से ऊपर,उसके पार चला जाये। त्रिगुण में रहना यह तो है त्रिप्रणाम है।और चतुर्थ नमो नमः द्वारा गुणातीत चतुर्थ स्तर में अवस्थिति है। विशुद्ध सत्व प्राप्ति की स्थिति है। क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता,तो ब्रह्माण्ड गुरु श्रीकृष्ण – त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भव अर्जुन, जैसी बात कहते ही क्यों।
चतुर्थ प्रणाम तुरीय चैतन्य में निरन्तर स्थिति की अवस्था है,जो सत् चित् और आनन्द दशा है, जिसकी प्राप्ति नही करनी है, क्योंकि यह स्वतः प्राप्त है। ज्यों ही साधक त्रिगुण के पार हुआ कि, स्व स्वरूप मिल गया।और त्रिगुण मायिक प्रकृति का बाध तो नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै से हो जाता है।अब नमो नमः तो स्वतः गृहीत है,यही नित्य लीला लीन सच्चिदानन्दावस्था है।
तव च का किल न स्तुतिरम्बिके,सकल शब्दमयी किल ते तनुः।इति विचिन्त्य शिवे शमिताशिवे,जगति जातम् अयत्नवाशादिदम्।स्तुतिजपार्चनचिन्तनवर्जिता न खलु काचन काल कलास्ति मे,ऐसा दर्शन देने और स्वयं ऐसी दशा के अनुभोक्ता परम अभिनव और नाम से भी अभिनव अभिनवगुप्त पादाचार्य ही हो सकते हैं, जो तुरीय चैतन्य की अभिनव तदाकाराकारितचित्तवृत्ति की दशा के साधक हैं।हम जैसे अविद्या माया ग्रस्तों जैसे नहीं। अतः स्वस्वरूपावगति यानी कि स्वात्मज्ञान की प्राप्ति ही,नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः का उपनिषद् है।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
शान्ति दे ब्रह्मानी।
श्रीरामचरणरति गति अनन्त मति विमल हृदय चिर सदय शान्ति दे ब्रह्मानी।
आकल्प काल कल- कल चल-चल चिर कर्मभूत यह भ्रमण रोक हे वानी।
ज्ञान उपासन भगति त्रिवेणी पावित पय आचमन स्नान हो कल्यानी।
विधि लिखे भाल पर भोग काल तव कृपाग्रस्त हो अस्त जाय ब्रह्मानी।
हो सतत नाम जप हरिस्मरण गल प्रबल कर्म विधिवानी।
बने न नूतन कर्मभोग्य हो योग्य दास रोको इसकी मनमानी।
है चला जहाँ से वह सत चित आनन्द अचल अविकल दें दानी।
इस देहपिण्ड में सुप्रतिष्ठ यह निष्कल हो अकलंक कृपा की खानी।
हे शारद तव करुणा वत्सलता स्नेह वारि वारिद बरसे वरदानी।
श्रीरामचरणरति गति अनन्त मति विमल हृदय चिर सदय शान्ति दे ब्रह्मानी।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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नान्यः पन्था विद्यतेयनाय
श्रवण मनन निदिध्यासन अर्थात् भगवान् के नामगुणादि का श्रवण,मनन और बार बार उसी पर, दृढ-दृढतर-दृढतम हो जाना ही वास्तविक मनोरंजन है। इसके अलावा संसार मनोरंजन तो छलावा है।यह भी सही है कि,ऐसा मनोरंजन,ऐसे महात्मा सन्त सद्गुरू ही दे सकैं,जो ऐसा ही मनोरंजन करते हुए, परम सरल शान्त चित्त हो गए हैं।
नारायण, देखिये-
जिसको समाज की लोकभाषा में मनोरंजन कहा जाता है, वह मनोरंजन हो ही नहीं सकता। क्योंकि इन्द्रियाणां च मनश्चास्मि, कहनेवाले ब्रह्माण्ड गुरु ने गीता में,सभी इन्द्रियों में स्वयं को मन कहा है।जब मन,श्रीरामकृष्ण हरि हैं, तब इन्हीं में अपने का रंजन,मनोरंजन सिद्ध होगा,अन्यत्र नहीं।और आत्मनि एवात्मना तुष्टः, जैसे गीतावाक्य की संगति भी सही होगी।मनोरंजन पारमात्मिक है।
मनोरञ्जन सर्वथा आत्मिक है।
मनोरञ्जन, मनोरञ्जन नहीं है, जो संसार भोग धन मान कामना परक है।इसलिये, मनुष्य का मनोरंजन-मन्मना भव मद् याजी,जैसे परमगुरुगीत गीतावाक्य में निहित है, जो किसी का भी वास्तव हित है।
नारायण, मन का रंजन अर्थात्,रंगना ,सब कुछ अनुकूल हो जाना तो परम शिव की परम कल्याण की प्राप्ति ही है।नहीं तो-
यजुर्वेद क्यों कहता-तन् मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।मेरा मन परम कल्याण में दृढ हो जाय।यह मन परम कल्याण अर्थात् ,परमात्मपरक हो जाय। और यह भी है कि यह मन तो , सरकते दरकते संसार में दर-दर भटकाते ही रहेगा, जब तक कि-
एकमेव केवल अपने कहे जाने योग्य परमात्मा में स्थिर नहीं होगा।
मन को स्थिर करने के लिये श्रीकृष्ण ने-
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते,
कहकर भगवन्नाम जप अभ्यास करने का आदेश किया है। यह नामजपाभ्यास ही संसार में भटके मन को वहाँ से हटाकर, स्वतः संसारवैराग्य दे देगा।
संस्कृत व्याकरण शास्त्र में एक संज्ञा होती है, जिसका नाम है(अभ्यास संज्ञा)
वहाँ भी अभ्यास का मतलब है, एक बार कहे गये शब्द को दुबारा कहना। योगशास्त्र में भगवान् पतञ्जलि ने भी- अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः,कहकर मन की स्थिरता का कारक इन्हीं अभ्यास और वैराग्य को ही बताया है। इस प्रकार से मानव मन का रंजन यानी कि मनोरंजन एकमात्र भगवन्नामावलम्बन करके भव भंजन कर देना ही है।
दूसरे दृष्टिकोण से मनुष्य का यही राम रामकार्य है।जब रामकृष्णनारायण ही आनन्दरूप हैं, तब मन इन्ही भगवान् के नामगुण कीर्तन में विश्रान्त होकर मन के आनन्द (रंजन) का कारण बनता है, बन रहा है, और बनेगा भी,यह त्रिकाल में अबाधित सत्य है। ऐसा ही मनोरंजन राम काज है, जिससे परम सन्तोष और परम कल्याण का ग्रहण हो।
रामकाज का अर्थ, ब्रह्मचर्यादेव परिव्रजेत् भी है। और गार्हस्थ्य पालन कर सन्तति परम्परा विस्तार भी है-भै गलानि मोरे सुत नाहीं।
इस तरह,इस प्रकार के रामकाज में,तो
गृहस्थ होकर, सृजन सन्तति प्राप्ति,तक ही स्वपरिणीता को सकाम भाव से देखने का निर्देश है।अन्यथा.. कामिनी और काञ्चन में सकामता का भाव संसार ही देंगे, क्षणिक मनोरंजन ही देंगे।
एक मृग के कारण भरत जैसे महायोगी, ब्रह्मादि लोक तक विचरणशील,महात्मा भी पतन को प्राप्त हो जाते हैं।
हमारे जैसे लोभी विषयी की बात क्या है। अतः मनोरञ्जन एकमात्र रामकथा ही है।
मनोरंजन एकमात्र भगवन्नामगुण चिन्तन ही है।
काम कथा या संसार कथा नहीं। और इस मनोरञ्जन के लिए तो सदा, सतत श्रीरामनामामृत पान करना पड़ेगा।वे लोग ही इस संसार में धन्य-धन्य हैं, सब प्रकार से कृती पण्डित और ज्ञानी हैं, जो निरन्तर नामनिष्ठ जीवन जी रहे हैं। अन्था, अन्य कोई मार्ग भी नहीं है, इस कलिकाल में।
नान्यः पन्था विद्यते अयनाय।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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वृन्दावन की होरी
हरी हर वृन्दावन की होरी।हरी हर वृन्दावन की होरी।
पानीघाट कल ह्वै गइ होरी सदगुरु दियौ थपोरी।
आज मलूकपीठ मां होरी रस बरस्यौ नहिं थोरी।
प्रतिपद तिथि दोहजार इक्यासी विक्रम खाक चौक होगी होरी।
गावत सदगुरु मोद बढ़ावत
शिष्य जनन को अति हरषावत। शिशिर हेमन्त गै आय बसन्तहिं मन कीन्ह्यौ है चोरी। हरी हर वृन्दावन की होरी। हरी हर वृन्दावन की होरी।
हरिगुरुसन्तः शरणम्
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करो हे ईश तुम पूरी
मुझे लगता यही मित्रों दयानिधि रीझते मानो।
जो उनकी सृष्टि का सेवक न चाहे कुछ भी पहचानो।
बने अनचाह जो जन हैं।
सफल उनका मनुज तन है।
रही यदि कामना कोई।
करम बस आयेगा वो ई।
कृपानिधि का कृपानुग्रह।
नहीं अब कुछ रहा आग्रह।
बड़ाअभिलाष यह मेरा।
न होये करमबस फेरा।
बने निष्काम यह जीवन।
मिला मानव का सुन्दर तन।
कराओ जगत सेवा विभु।
स्वयं के चरण की तूँ प्रभु।
न हो धन मान की आशा।
यही है मेरी अभिलाषा।
तरसता मनुज बनने को।
अरे भटकाया अपने को।
अनगिनत जन्म का भटका।
लो अपने चरण में अटका।
जगत सेवा की मजदूरी।
करो हे ईश तुम पूरी।
यही सेवा की मजदूरी।
करो हे महागुरु पूरी।
करो हे महागुरु पूरी।
करो हे ईश तुम पूरी।
हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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