क्षणिकाः

रसना रस राम राम कौशल्या के सूनु राम।
बार बार रटत राम होत जनम पूर्ण काम।

कृपा के निकेत और रघुपति के दूत तुम,बन्धु हो विपन्नों के परम विराम हो।दुखित जनों के कष्ट हरते हे! कपीराज वायु के सुपुत्र तुम्हें सतत प्रणाम हो।।

निश्चय ही सिद्ध होता सब असम्भव कार्य है।धरे ध्यान कृपा उनकी मिलता क्या नहीं है।वे ही वानरेश करें रक्षा साधु सन्तों की।हैं कृपालु चित्त कृपाशीलता ही कार्य है।

श्रेष्ठ शिखर विन्ध्याचल का है, जहँ शिखर राजती नित्य भवानी। आर्यशरण्या जगन् मातृका ,रक्षा वरदा है वरदानी।

करते अमंगल का ध्वंस विध्वंस मुदा। महाबली क्लेशहर्ता शरणागतरक्ष सदा।
भूमिसुतासीतापति राम में अनुरक्त रहते। स्मरते वायुसूनु तुम्हे कृपा आलय कहते।

जिनकी कृपा के लेशमात्र होते पूरे काम। आद्याशक्ति विन्ध्यस्थित दुर्गा भजूँ आठों याम।

भक्तों के सकल कष्ट सतत तुम हरते। पंचानन केसरी कपि क्या न तुम करते। पारावारकृपा के प्रभु तुम्हें हम भजते।
राम राम स्मरते तुम श्वास श्वास रहते। जनरक्षा प्रतिक्षण मंगल ही करते।
वायुसूनु शिवस्वरूप रामदूत जयते।

विन्ध्याचल सविशेष कान्त उन्नत अधित्यका राजित।अष्टभुजा माँ
सरस्वती किया तूँने कंस पराजित।
शुम्भ निशुम्भ दैत्य द्वय दुर्धर,किया विनाश मात्र क्षण में।धरती गगन सकल त्रिभुवन हे वैष्णवि! चरती कण कण में।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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नमस्तस्यै नमो नमः

सर्वाधाराभूतस्था सर्वानन्देतति कथ्यते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
जय सियाराम
मार्कण्डेयपुराण के अन्तर्गत वर्णित  दुर्गासप्तशती में कुल तेरह अध्याय हैं। पंचम अध्याय में नाना रूपो़ में देवी की स्तुति करते हुए उन्हें प्रत्येक रूप में अवस्थित बताया गया है। हर मन्त्र के अन्त में नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः कहा गया है। चार बार आये हुए इस नमन का बड़ा रहस्य है।इस प्रकार के-
नमः तस्यै नमः तस्यै नमः तस्यै और नमो नमः के प्रति स्थूल सूक्ष्म कारण और कारणातीत  का दर्शन एक आध्यात्मिक अनुभूति है। बिना तद् आकार आकारित चित्तवृत्ति के ,ऐसे स्तर की प्राप्ति सम्भव नहीं है।
किन्तु इन चार प्रणामों का निवेदन, इसलिये भी है कि,साधक सद् रजस्तम से ऊपर,उसके पार चला जाये। त्रिगुण में रहना यह तो है त्रिप्रणाम है।और चतुर्थ नमो नमः द्वारा गुणातीत चतुर्थ स्तर में अवस्थिति है। विशुद्ध सत्व प्राप्ति की स्थिति है। क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता,तो  ब्रह्माण्ड गुरु श्रीकृष्ण – त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भव अर्जुन, जैसी बात कहते ही क्यों।
चतुर्थ प्रणाम तुरीय चैतन्य में निरन्तर स्थिति की अवस्था है,जो सत् चित् और  आनन्द दशा है, जिसकी प्राप्ति नही करनी है, क्योंकि यह स्वतः प्राप्त है। ज्यों ही साधक त्रिगुण के पार हुआ कि, स्व स्वरूप मिल गया।और त्रिगुण मायिक प्रकृति का बाध तो नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै से हो जाता है।अब नमो नमः तो स्वतः गृहीत है,यही नित्य लीला लीन  सच्चिदानन्दावस्था है।
तव च का किल न स्तुतिरम्बिके,सकल शब्दमयी किल ते तनुः।इति विचिन्त्य शिवे शमिताशिवे,जगति जातम् अयत्नवाशादिदम्।स्तुतिजपार्चनचिन्तनवर्जिता न खलु काचन काल कलास्ति  मे,ऐसा दर्शन देने और स्वयं ऐसी दशा के अनुभोक्ता परम    अभिनव और नाम से भी अभिनव अभिनवगुप्त पादाचार्य ही हो सकते हैं, जो तुरीय चैतन्य की अभिनव  तदाकाराकारितचित्तवृत्ति की दशा के साधक हैं।हम जैसे अविद्या माया ग्रस्तों जैसे नहीं। अतः स्वस्वरूपावगति यानी कि स्वात्मज्ञान की प्राप्ति ही,नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः का उपनिषद् है।


हरिगुरुसन्तः शरणम्


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शान्ति दे ब्रह्मानी।

श्रीरामचरणरति गति अनन्त मति विमल हृदय चिर सदय शान्ति दे ब्रह्मानी।
आकल्प काल कल- कल चल-चल चिर कर्मभूत यह भ्रमण रोक हे वानी।
ज्ञान उपासन भगति त्रिवेणी पावित पय  आचमन स्नान हो कल्यानी।
विधि लिखे भाल पर भोग काल तव  कृपाग्रस्त हो अस्त जाय ब्रह्मानी।
हो सतत नाम जप हरिस्मरण गल प्रबल कर्म विधिवानी।
बने न नूतन कर्मभोग्य हो योग्य दास रोको इसकी मनमानी।
है चला जहाँ से वह सत चित आनन्द  अचल अविकल दें दानी।
इस देहपिण्ड में सुप्रतिष्ठ यह निष्कल हो अकलंक कृपा की खानी।
हे शारद तव करुणा वत्सलता स्नेह वारि वारिद बरसे वरदानी।
श्रीरामचरणरति गति अनन्त मति विमल हृदय चिर सदय शान्ति दे ब्रह्मानी।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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नान्यः पन्था विद्यतेयनाय

श्रवण मनन निदिध्यासन अर्थात् भगवान् के नामगुणादि का श्रवण,मनन और बार बार उसी पर, दृढ-दृढतर-दृढतम हो जाना ही वास्तविक मनोरंजन है। इसके अलावा संसार मनोरंजन तो छलावा है।यह भी सही है कि,ऐसा मनोरंजन,ऐसे महात्मा सन्त सद्गुरू ही दे सकैं,जो ऐसा ही मनोरंजन करते हुए, परम सरल शान्त चित्त हो गए हैं।
नारायण, देखिये-
जिसको समाज की लोकभाषा में मनोरंजन कहा जाता है, वह मनोरंजन हो ही नहीं सकता। क्योंकि इन्द्रियाणां च मनश्चास्मि, कहनेवाले ब्रह्माण्ड गुरु ने गीता में,सभी इन्द्रियों में स्वयं को मन कहा है।जब मन,श्रीरामकृष्ण हरि हैं, तब इन्हीं में अपने का रंजन,मनोरंजन सिद्ध होगा,अन्यत्र नहीं।और आत्मनि एवात्मना तुष्टः, जैसे गीतावाक्य की संगति भी सही  होगी।मनोरंजन पारमात्मिक है।
मनोरञ्जन सर्वथा आत्मिक है।
मनोरञ्जन, मनोरञ्जन नहीं है, जो संसार भोग धन मान कामना परक है।इसलिये, मनुष्य का मनोरंजन-मन्मना भव मद् याजी,जैसे परमगुरुगीत गीतावाक्य में निहित है, जो किसी का भी वास्तव हित है।
नारायण, मन का रंजन अर्थात्,रंगना ,सब कुछ अनुकूल हो जाना तो परम शिव की परम कल्याण की प्राप्ति ही है।नहीं तो-
           यजुर्वेद क्यों कहता-तन् मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।मेरा मन परम कल्याण में दृढ हो जाय।यह मन परम कल्याण अर्थात् ,परमात्मपरक हो जाय। और यह भी है कि यह मन तो , सरकते दरकते संसार में दर-दर भटकाते ही रहेगा, जब तक कि-
एकमेव केवल अपने कहे जाने योग्य परमात्मा में स्थिर नहीं होगा।
मन को स्थिर करने के लिये श्रीकृष्ण ने-
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते,
कहकर भगवन्नाम जप अभ्यास करने का आदेश किया है। यह नामजपाभ्यास ही संसार में भटके मन को वहाँ से हटाकर, स्वतः संसारवैराग्य दे देगा।
संस्कृत व्याकरण शास्त्र में एक संज्ञा होती है, जिसका नाम है(अभ्यास संज्ञा)
वहाँ भी अभ्यास का मतलब है, एक बार कहे गये शब्द को दुबारा कहना। योगशास्त्र में भगवान् पतञ्जलि ने भी- अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः,कहकर मन की स्थिरता का कारक इन्हीं अभ्यास और वैराग्य को ही बताया है। इस प्रकार से मानव मन का रंजन यानी कि मनोरंजन एकमात्र भगवन्नामावलम्बन करके भव भंजन कर देना ही है।
दूसरे दृष्टिकोण से मनुष्य का यही राम रामकार्य है।जब रामकृष्णनारायण ही आनन्दरूप हैं, तब मन इन्ही भगवान् के नामगुण कीर्तन में विश्रान्त होकर मन के आनन्द (रंजन) का कारण बनता है, बन रहा है, और बनेगा भी,यह त्रिकाल में अबाधित सत्य है। ऐसा ही मनोरंजन राम काज है, जिससे परम सन्तोष और परम कल्याण का ग्रहण हो।
रामकाज का अर्थ, ब्रह्मचर्यादेव परिव्रजेत् भी है। और गार्हस्थ्य पालन कर सन्तति परम्परा विस्तार भी है-भै गलानि मोरे सुत नाहीं।
इस तरह,इस प्रकार के रामकाज में,तो
गृहस्थ होकर, सृजन सन्तति प्राप्ति,तक ही स्वपरिणीता को सकाम भाव से देखने का निर्देश है।अन्यथा.. कामिनी और काञ्चन में  सकामता का भाव संसार ही देंगे, क्षणिक मनोरंजन ही देंगे।
एक मृग के कारण भरत जैसे महायोगी, ब्रह्मादि लोक तक विचरणशील,महात्मा भी पतन को प्राप्त हो जाते हैं।
हमारे जैसे लोभी विषयी की बात क्या है। अतः मनोरञ्जन एकमात्र रामकथा ही है।
मनोरंजन एकमात्र भगवन्नामगुण चिन्तन ही है।
काम कथा या संसार कथा नहीं। और इस मनोरञ्जन के लिए तो सदा, सतत श्रीरामनामामृत पान करना पड़ेगा।वे लोग ही इस संसार में धन्य-धन्य हैं, सब प्रकार से कृती पण्डित और ज्ञानी हैं, जो निरन्तर नामनिष्ठ जीवन जी रहे हैं। अन्था, अन्य कोई मार्ग भी नहीं है, इस कलिकाल में।

नान्यः पन्था विद्यते अयनाय।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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वृन्दावन की होरी

हरी हर वृन्दावन की होरी।हरी हर वृन्दावन की होरी।
पानीघाट कल ह्वै गइ होरी सदगुरु दियौ थपोरी।
आज मलूकपीठ मां होरी रस बरस्यौ नहिं थोरी।
प्रतिपद तिथि दोहजार इक्यासी विक्रम खाक चौक होगी होरी।
गावत सदगुरु मोद बढ़ावत
शिष्य जनन को अति हरषावत। शिशिर हेमन्त गै आय बसन्तहिं मन कीन्ह्यौ है चोरी। हरी हर वृन्दावन की होरी। हरी हर वृन्दावन की होरी।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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करो हे ईश तुम पूरी

मुझे लगता यही मित्रों दयानिधि रीझते मानो।

जो उनकी सृष्टि का सेवक न चाहे कुछ भी पहचानो।

बने अनचाह जो जन हैं।

सफल उनका मनुज तन है।

रही यदि कामना कोई।

करम बस आयेगा वो ई।

कृपानिधि का कृपानुग्रह।

नहीं अब कुछ रहा  आग्रह।

बड़ाअभिलाष यह मेरा।

न होये करमबस फेरा।

बने निष्काम यह जीवन।

मिला मानव का सुन्दर तन।

कराओ जगत सेवा विभु।

स्वयं के चरण  की तूँ  प्रभु।

न हो धन मान की आशा।

यही है मेरी अभिलाषा।

तरसता मनुज बनने को।

अरे भटकाया अपने को।

अनगिनत जन्म का भटका।

लो अपने चरण में  अटका।

जगत सेवा की मजदूरी।

करो हे ईश तुम पूरी।
यही सेवा की मजदूरी।

करो हे महागुरु पूरी।

करो हे महागुरु पूरी।

करो हे ईश तुम पूरी।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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राधापतेः पादयोः

संसार रंगो रूपों में दीखता है।क्षण क्षण बदल रहा है।इसके रंगरूपों में यदि,गुरु  भागवत भक्तकृपा से मीरा की तरह कृष्ण ही दीखें,तो बात बने।नहीं तो संसार तो बिगड़ने बिगाड़ने के लिये होगा।विचाराचार केवल शुद्ध होगा हरिहर नाम जप स्मरण से,कलिकाल में कोई और रास्ता नहीं है।
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।।

काल की प्रतीक घड़ी पल पल चल रही  है।इसमें मूल्यवान नाम ही है, हरिहर का।और सत्य तो यह है कि श्वास प्रश्वास ही  वास्तविक घड़ी है।हर सांस में शिवाशिव  सीताराम राधाकृष्ण चलेगा, नियत और नियति की क्या चलेगी,वह खुद बखुद ही बदल जायेगी,जो भी पूर्वतः निश्चित शरीर   का प्रारब्ध भोग होगा। इसी बिगड़ी सुधार कार्य के लिये ही करुणानिधि ने करुणा करके,यह मानव शरीर दिया है।
कबहुँक करि करुणा नर देही।देत ईश बिनु हेतु सनेही। और नहीं तो फिर आने जाने का चक्कर बरकरार।
जो विद्या पढ़ी,रोजी रोटीवाली। क्या हो गया,उससे सिवाय अहंकार बढ़ने के।धन मान पद पदार्थ कामिनी कांचन की कामना और भी सुरसा की तरह वढ़ती ही गई।
और विचार करने पर लगा कि जगद् अनुराग प्रीति बढ़ने से हम जिस आत्म स्वरूप को जानने और जानकरके कर्मतः जन्म ग्रहण रोकने के लिये,मानव देह पिण्ड पाये थे,वह एक बार फिर बेकार ही गया।
  इसलिये पढ़ी गई रोटी वाली विद्या तो सा विद्या या विमुक्तये वाली विद्या नहीं बन पाई।
और कहिये कि, यह विद्या, अविद्या ही हो गई।
  अतः साधुसंगसंगति ही संसारसंग भंग करके, पढ़ी गई विद्या को अविद्या होने से,बचा लेगी,यही त्रिकालाबाधित सत्य है।इसीलिये, भगवच्चरणारविन्दमकरन्द गन्धग्रहण के ग्रहिष्णु साधकों से प्रीति बढ़े,इसी कामना के साथ-
विद्या यच्चरणेषु भावय यदि प्रीतिः मुकुन्दस्य वै। अन्यत् स्यात् कलये मनो विपदि तन् नूनं ह्यविद्यायते। सा विद्या नु भवेदितो यदि जगन्मुक्त्यै समाधीयते। साधुः साधय मां स्थिरमनाः राधापतेः पादयोः।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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कालपतिंवरा

भावुक भावपूर्ण भावना शब्दों में। घण्टाभक्त था शिव का नहीं अब्दों में।यही समस्या जीवात्मा कीअतिविकट है। भक्ति में भगवदतिरिक्त चाहना ही संकट है। हम धन मान कामिनी कांचन दास बने घूमते। गुरू भागवत कृपा हो जाय तो ही कटे फास सबके मते।
भक्त देता भक्ति असली, भक्तों की माला कहती। जैसे विषयी संग मिलती विषय जलधार बहती। ओङ्कार युक्त शिवाय वाचन कथ्य उपवीती सदा। अनुपवीती शिवाय नमः कहै यही योग्य सर्वदा।

तुम पुनि राम राम दिनराती।सादर जपहु अनंग अराती। सहस नाम सम सुनि पिय बानी जपि जेई पिय संग भवानी।

एक सौ छब्बीस साल के सन्त तुलसीदास कावैष्णव अतुल अतुलसीवाणी का प्रसाद श्रीरामचरितमानस तो जगद्विषाद और अवसाद सादन करता ही है।
मन्त्र महामणि विषय ज्वाल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।
सीता विनीता घृतचित्तवीता। भिन्नाप्यभिन्ना ननु रामशक्तिः।।कालस्य देशस्य परार्थचिन्ता।अचिन्तनीयप्रभवा विजेत्री।सा कालिका कालविधानकर्त्री, जीवांश्च सर्वान् परिपालयन्ती।मोदंविधात्री चिरकालशान्तिं,पायात् सदा काल पतिं वरा वै।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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बनेगा सब काम

किसी भी क्षेत्र के शाखा के विद्वान्/पारंगत की पढ़ी गई विद्या तो अविद्या  माया को ही पुष्ट करती है। इसलिये स्वयं की  विद्या रूपी वधू को अविद्या माया के आवरण से मुक्त करने और विद्या स्वरूप में स्थिर रहने के लिए, हरिनाम स्मरण/जप के सिवाय और कोई साधन नहीं।

इस नामरूपपति के बिना,पढ़ी हुई विद्या, अविद्या है।यह स्वगत विद्या, अविद्या न बने, मायात्व ग्रहण करके पतिहीना विधवा न बन जाय, इसके लिये इसके पति को हरिनाम की शरण ग्रहण करनी  चाहिए।
अतः सभी सनातनप्रेमियों को हरिनाम का साधनस्मरण करके अपनी पढ़ी गई  विधवाविद्या को सधवा बनाना पड़ेगा।

इसका प्रकाश और प्रमाण हमें श्रीचैतन्य महाप्रभु के जीवन से मिलता है।
बंगधरती पर पन्द्रह सौ ईशवी में अवतरे, श्रीमच्चैतन्य महाप्रभुजी के नामसंकीर्तन से,जंगली शेर भालू भी तरे।
अरे,नारायण मनुष्यों की बात ही छोड़िये। श्रीरामकृष्ण नाम संकीर्तन से महाप्रभुजी ने ऐसी,प्राणवायु फूँकी,जो इस संसार में जन्मे और मृत्युभँवर में फँसे नाना जीवों को सदा सदा के लिए, अनन्त प्राण ही दे दिया। और समझने की बात यह भी है कि, वस्तुतः इन कलिमलग्रस्त प्राणियों का उद्धार करने हेतु और श्रीजी के मादनाख्य भाव का अनुभव करने हेतु   श्रीकृष्ण ने महाप्रभु चैतन्यदेव के रूप में,कराल कलिकाल में अवतार ही ले  लिया था। सन्तमण्डली की यही सनातन मान्यता है। महाप्रभु जी ने तो  केवल नामसंकीर्तन मन्त्र ही सुनाया,बहुत विद्या भी नहीं पढ़ी और न ही बड़े ग्रन्थ ही रचे।

अपनी समग्र जीवनलीला में आपने केवल आठ संस्कृत छन्दों की रचना की, जो कि एक से बढ़ कर एक हैं। यह आठ पद्य सनातन धर्म जीवन की संजीवनी है।
इसकानाम शिक्षाष्टक है। यह ललित उदात्त भावगम्भीर पद्य रसिकभक्तजगत का हृदय ही है, जहाँ नाममहाराज राजते हैं। सम्पूर्ण पद्य इस प्रकार है-

चेतोदर्पणमार्जनम् भवमहादावाग्नि-
निर्वापणम्।श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणम्  विद्यावधूजीवनम्।आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्।सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्।
इस संस्कृत छन्द में श्रीकृष्णसङ्कीर्तन विशेष्य पद है।इस श्रीकृष्णसङ्कीर्तन, विशेष्य का मतलब है, कि हरिनाम को  सम्यक् भाव रस पूर्ण अवस्था में उच्च स्वर से कहा जाना है, क्योंकि उच्चैः भाषा तु कीर्तनम्।अब, इस नाम के संकीर्तन की विशेषताएँ क्या हैं। इसके लिये महाप्रभु जी ने नामकीर्तन के आठ  विशेषण दिये हैं। ये विशेषण हैं-
1-चेतोदर्पणमार्जनम्।
2-भवमहादावाग्निनिर्वापणम्।
3-श्रेयःकैरवचन्द्रिकाविरतणम्।
4-विद्यावधूजीवनम्।
5-आनन्दाम्बुधिवर्धनम्।
6-प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्।
7-सर्वात्मस्नपनम्। और
8-परम्।
इसमें विजयते,यह क्रियापद है।जिसका भाव है कि, यह नाम ही सर्वत्र,सब काल और सभी,समस्याओं पर परम विजय दिलाने वाला है।
अब क्रमशःआठों विशेषणों मीमांसा इस प्रकार है-
1- यह भगवन्नाम तो, चित्तरूपी दर्पण पर नाना जन्मों शरीरों की चढ़ी मढ़ी जमी  कामादि की मोटी काई को हटाकर, चित्त को साफ कर देता है। कामादिवासना हटने पर,संसार वासना नष्ट होगी और स्वात्मस्वरूप भगवत्स्वरूप दिखने  लगेगा। यही तो,इस जीव का चरम परम लक्ष्य ही है। 
2-भवति लीयते भूयते लयते यत्र  सर्वं जगज् जातम्। जहाँ संसार और सारी  संसारी वस्तुएं उत्पन्न और विनष्ट होती हैं, उसे भव कहा गया है। यह वस्तुएं यहाँ लगी हुई कामना/वासना की प्रचण्ड आग में जल जल कर समाप्त हो रही हैं। इस संसार की लगी कामादि की जला देने वाली आग बुझाने और इससे बचने बचाने का उपाय हरिनाम है।
3- सभी जीव जगत् और विशेषतया इस मनुष्य के लिये स्वीकार योग्य दो मार्ग हैं।
एक है श्रेय और दूसरा प्रेय। नचिकेता और यम संवाद में इस श्रेयप्रेयमार्ग का विस्तीर्ण वर्णन है। श्रेय मार्ग नाना लोकों की स्वर्गादि सुखसामग्री का भोग का मार्ग है। जिससे नाना शरीर धारण करके बार बार जन्म मृत्युभँवर में रहना होता है, चाहे वह स्वर्गलोक हो ब्रह्मा का लोक।
दूसरा मार्ग श्रेयमार्ग है।यह इन लोकों के भँवर से बचने का मार्ग है।इसका ही वरण वरदान रूप में नचिकेता ने किया था।
अब देखिये कि यह हरिनाम का कीर्तन श्रेयमार्ग यानी की पतनमुक्तिमार्ग पर चलने वाले जीवों को उसी तरह से है जैसे कुमुदिनी के लिये चन्द्रमा की चाँदनी।
चन्द्र के उदित हुए बिना कुमुदिनी का विकास उल्लास सम्भव ही नहीं है। इसी तरह यह भगवन्नाम संकीर्तनस्मरण मुक्ति कामी जीवों का सतत उदय और उल्लास है,जैसे कि कुमुदिनी के लिए चन्द्रमा।
  जगत् का चन्द्रमा तो अस्त होगा,और कुमुदिनी मुरझा जायेगी लेकिन यह नाम ऐसा चन्द्रप्रकाश है, जो जीव को श्रेयपथ पर जाने और चरम तक जाकर विशेष रूप से तर जाने का अनुमप प्रखर दीप्त  तेजःपुंज है।यह तो ऐसा है कि जीव को तार कर ही मानेगा। इसीलिये इस नाम को चन्द्रिकावितरणम् कहा।
4- यह विद्या रूप वधू का जीवन, माने कि पति/स्वामी है।
5-यह आनन्दाम्बुधिवर्धनं है। मतलब कि आनन्द का ऐसा महासागर जो आनन्द को कभी भी कम नहीं होने देगा। नाम को आनन्द का महासमुद्र कहा गया।इसीलिये गोस्वामी जी ने इस रामनाम को कहा-
जो आनन्दसिन्धुसुखराशी…
6- यह रामकृष्णनारायण नामाक्षर अक्षर  प्रतिपद उच्चारण करने पर, प्रत्येक ही  नामपद सतत वर्धमान सम्पूर्ण अमृत का आस्वादन है।
इसे पान करके मृत होने का प्रश्न कहाँ।
7- यह नामसंकीर्तन तो ऐसा है कि जो सारे मनुष्य और मनुष्येतर जीव जगत की आत्मा का स्नान ही है। जलस्नान तो शरीर शुचिता देगा,लेकिन यह नाम तो सारी आत्माओं को भी स्नान कराकर संसार सागर से तार देगा।
8- यह परम् है। अपरम् नहीं। वस्तुतः परं का मतलब है कि, यह पूर्ण परात्पर ब्रह्म है।
   नारायण ऐसे ही क्षीयमाण जीव जगत या कि अष्टधा प्रकृति से अविद्या से माया से पार जाने का एकमात्र साधन यही राम  हरिकृष्णनारायण नाम ही है।
तरेगा भवमहासागर अगर ले रहा सतत हरिनाम। अव्यर्थ अमोध रघुपति बान जैसा बनेगा सब काम।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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सियरामबिहारी

मंगल कौ तुम मंगल साजत हृदयराखि सियरामबिहारी।
वेगि हरो हनुमान महाप्रभु जौ कछु संकट होइ हमारी।


संकट एक दिखात हमै एहि आपनि माया भगाव बिहारी।
अब और नहीं सहि जात प्रभो निज दिव्य स्वरूप दिखाव बिहारी।


तव दिव्य स्वरूप को देखि छनै यह भागि चलै निज रूप उघारी।तब जानि परै यह पिण्ड शरीर है पूरन काम भयौ भर भारी।


एहि मानव देह कौ लक्ष्य इहै निज रूप गयौ हमसों जो बिसारी।बेगि दिखाव हमैं निज रूप हे राम कौ दूत हो अद्भुत कारी।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जौ कछु संकट होइ हमारी।
मंगल कौ तुम मंगल साजत हृदयराखि सियराम बिहारी।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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