राम कवन पूछौं प्रभु तोहीं।कहहु बुझाइ कृपानिधि मोहीं।

मानसकार ने श्री राम के सगुण और निर्गुण रूप की जिज्ञासा-
राम कवन पूछौं प्रभु तोहीं।कहहु
बुझाइ कृपानिधि मोहीं।” पर उत्तर दिया-राम अवध भूपति सुत सोई ।की अज अगुन अलख गति कोई।
इसी तरह और भी कहा-राम स्वरूप तुम्हार ,वचन अगोचर
बुद्धि पर।अविगत अलख अपार, नेति नेति नित निगम कह ।।अर्थात्-हे अवध भूपति के पुत्र आपका स्वरूप वाणी और बुद्धि के परे है, जिसको श्रुतियाँ नेति नेति करके निरुपित करतीं हैं।
और भी-चिदानन्द मय देह तुम्हारी ।विगत विकार जान
अधिकारी।राम ब्रह्म चिन्मय
अविनाशी।सर्वरहित सब उर पुर वासी।।राम ब्रह्म व्यापक जग जाना।परमानन्द परेस पुराना।।राम ब्रह्म परमारथ रूपा।अविगत अलख अनादि अनूपा।।राम सच्चिदानन्द दिनेशा ।नहिं तह मोहनिशा लवलेशा।। अर्थात्-जो राम के स्वरुप के जिज्ञासु हैं उन्हें विकार रहित होना पड़ेगा।यही निर्गुण निराकार ब्रह्म भक्तों के वशीभूत सगुण रूप मे भक्तार्तिनाश करता है, और ऐसी माता धन्य है, जिसने भगवद्भक्त पुत्र को जन्म दिया।”भक्त हेतु भगवान प्रभु
राम धरेउ तनु रूप ।करत चरित अति पावन ,प्राकृत
नर अनुरूप।।”अगुन अरूप
अलख अज जोई।भक्तप्रेम वश
सगुनहिं सोई।।” पुत्रवती युवती
जग सोई ।रघुपति भक्त जासु सुत होई।।
यही बात स्कन्द पुराण मे भी
आई है-“कुलं पवित्रं जननी कृतार्था ,वसुन्धरा पुण्यवती
च तेन ।अपार संवित्सुखसागरे
-स्मिन्। लीनं परब्रह्मणि यस्य
चेत:।।”हरिश्शरणम्।।

आयु: कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।पंचैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः

आयु: कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।पंचैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः।
अर्थात्-आयु ,जीवन-वृत्ति, चलाचल संपत्ति, विद्याध्ययन और शरीरान्त का प्रकार ,ये सभी पांच चीजें प्रारब्ध(पूर्व शरीर से कृत संचित कर्म)
द्वारा निर्धारित हो जाती हैं।
ऐसी बातों पर मैं सुविचारित
दृष्टिपात करता हूँ, तो यह लगता है कि, ज्योतिष आदि का सटीक निर्देश लेकर विज्ञ लोग कार्य करें।वर्तमान जीवन के क्रियमाण और संचित होते रहने वाले कर्मों से उपर्युक्त पाँचों मे परिवर्तन सम्भव है।किन्तु इसके लिए सद्गुरूशरण अनिवार्य है।और इन सभी के लिये कामना परक स्थिति से ऊपर उठना होगा।तभी हरिगुरू कृपा से उक्त पाचों मे परिवर्तन सम्भव है।हरिश्शरणम्।

हानि -लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि-हाथ

हानि -लाभ, जीवन-मरण,
यश-अपयश विधि-हाथ। इसी तरह-सुत वित लोक ईषणा तीनी।इत्यादि बातों पर विचार
करने पर स्पष्ट होता है कि-किसी भी कार्य का परिणाम अपने मन मे बसाकर कार्य करना ठीक नहीं है “मा फलेषु कदाचन”इसको ध्रुव कर देता है।दूसरी बात-जन्म-मृत्यु प्राकृतिक नियम है, हम प्रकृति(माया) के अधीन हैं, उसके बाहर नहीं(जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु:,ध्रुवं जन्म मृतस्य च)इसमें परिवर्तन केवल और केवल मायाधीश की शरणागति से ही सम्भव है(मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते)
तीसरी बात-यश अथवा लोकप्रतिष्ठा, तो यह भी विधिक व्यवस्था के कारण प्रकृति के ही आधीन है।
अतः जब उक्त लाभालाभादि
हमारे हाथ मे नहीं हैं, तो हम कोई भी कार्य कामनाओं को पाल क्यों करें। यह कामना परक कर्म ही सारे कष्टों का मूल है।इस तथ्य को जानकर कामना परक कर्म से सावधान रहे। अरे भाई “देनदार कोइ और है देत रहत दिन रैन”देने वाला जब देता है, तो छप्पर फाड़ के देता है। हरिश्शरणम्।।