साधो कार्य जोईसोई विधि

विन्ध्याचल माता में कैसी है मनोगति 
परम विरक्तों संग हुई  कृष्णमयीमति।
समरथ सद्गुरु का हार्दिकअन्तःविलास
सर्वत्रगतगति क्या धरती क्या आकाश।
अहमादिवृत्तिशून्य साधु दृष्ट हाव भाव
जिसे चाहें हो जाये लोकरति का अभाव।
क्योंकी  है विस्मृत विनष्ट संसार व्यथा
सदालीन भक्तमालभागवतश्रीरामकथा।
कृपा हो दास पर देख लो प्रभु करुणदय 
खिले हृत्कमल होय भक्ती का अरुणोदय।
अकिंचन-जन-प्रिय सिद्धभाव-लासवास  
दीन दयित देखो पूज्यगुरुश्रीराजेन्द्रदास।
समरथ गुरुद्वय”भक्तमाली-पहाड़ीबाबा” 
देवानुग्रह आपको मिले ज्यौं नदीद्वाबा।।
बाबा ने खाकचौक किया पदवीप्रतिष्ठ
हरेराम सिद्ध-सन्निधि पाकर हुए बलिष्ठ।। 
पाए जीवनान्त साधना का तपःपुंजबल
बहता रहता तेजःसरिता-जल अविरल।।
श्रीगणेशदास गुरू सरल थे साधुविग्रह   मिले गुरु-मातु-पिता बरसा करुणानुग्रह।।
परमसिद्ध सन्तबाबा हो गए हैं मलूकदास
केशीघाट वंशीवट विलसित समाधिवास।
अन्तरतम ऊर्जित बल परम परिनिष्ठित
आप श्रीमलूककृपा हैं मलूकपीठाधिष्ठित।
श्रीकृष्णकरुणाकृत त्रिवेणी का आगम  
बाबा-पहाड़ीगणेशदास-श्रीमलूकसंगम।
ऐसा साधु-संग-नदी-संगम सुधारसकर
विस्मृतसंसारस्मृति भवसागर पारकर।
देकर के प्रेमा भगति आनँद की महानिधि 
विन्ध्येश्वरिदास साधो कार्य जोईसोई विधि

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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भावमयी कल्पना

पुरा कालेन नीता शुभा कल्पना।दिव्यदिव्या-मनःकूल-रूपं गता।।
यत्-कवेर्भाव-भावान्विता भावना।तत्क्रिया-कारिता विन्ध्यमातुःकृपा।।
यत् समाधेर्वैश्यस्य श्रीर्नाशिता।
भूपति-सुरथस्य राज्यं विराज्यं गता।।
विन्ध्य-नग-राज-राज्ञी समासाधिता।सर्वकामान् पुरे पूरयन्ती स्थिता।।
विन्ध्यगङ्गानदी-सङ्गमे राजिता।
विन्ध्यमाता मुदा कामदा राजते।।
एकरसानन्द-विद्या-संस्था-स्तुता।
दिव्य-चण्डी-शती-पाठ-पूजा परा।।
पुरा कालेन नीता शुभा कल्पना।
दिव्य-दिव्या-मनःकूल-रूपं गता।।
अथ हर्ष-प्रकर्षं परां प्रौढिताम्।
श्रीकृपा-कारणाज्जातकामास्सदा।।
पुरा कालेन नीता शुभा कल्पना।
दिव्य-दिव्या-मनःकूल-रूपं गता।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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रामकाज

राम काज कीन्हे बिनु मोहिं कहां विश् राम।
भगवान् का माधुर्य गुण ही कृपा करुणा अनुग्रह अवतार लीला विस्तार का परम चरम सारभूत है।नहीं तो, उनके ऐश्वर्य स्वरूप को देख सकने की भी सामर्थ्य किसी देवी देवता को नहीं है।
अतः करुणासागर दीनदयाल और कृपानुग्रहविग्रह जैसे अपने ही नामों को सार्थक करने हेतु और रसिकों सन्तों भक्तों को आनन्द देने के लिए, उन अजन्मा का भी मानव जन्म हुआ है।


जब, करुणा कृपा अनुग्रह की नितान्त आवश्यकता को और कहिए अनिवार्यता को मनुष्य जीवन में दर्शाने के लिए भगवान् मनुज रूप धरते हैं, तब उनकी रसमयी लीला के लालायित अंजनी के लाल भी अपने लोभ का संवरण नहीं कर पाते हैं, और रामकाज लगि तव अवतारा सुनते ही,रामकाजरसिक वे पर्वताकारा हो जाते हैं।


अरे नारायण! सज्जन संरक्षण और दुर्जन विनाशन के मूल में भी उनकी कृपा और करुणा ही बरसती है, जब मारने गई मातृरूप पूतना का स्तन पान करते हुए उसके समस्त जन्मों का कालुष्य भी पीकर,माता से भी बढ़कर अनन्त मुक्ति लाभ से उसे कृतार्थ कर देते हैं। यह उनकी करुणा उत्स का निर्झर भी राम काज है।
राम काज तो नारायण! आनन्द ही आनन्द देना है, क्यों? क्योंकि इस आत्मा की मौलिकता देह लौलिकता न होकर,जो आनन्द सिन्धु सुखरासी है।

और-
आनन्द,आनन्द तो सत् चित् आनन्द में ही मिलेगा। नहीं तो सब सुखाभास हो सकता है। एतावता, ब्रह्माण्ड के सबसे बड़े नायक की स्वभाव सिद्ध करुणा का प्रवाह अंशभूत अपने में आ जाय,जो कि पूर्वसिद्ध ही है, यही अपना वास्तविक स्वरूप है, यह भी रामकाज है नहीं तो और सब मायिक- राक्षस काज।रामकाज और राक्षस काज में निष्कामता और सकामता का विपरीत परस्पर विरोधी अन्तर है।

हरिगुरुसन्तः शरणम्
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संसार-कथा-व्यथा 

मानो, मानव का जीवन है भगवत्कथा। और संसार की सब कथा है व्यथा।।

यह मनुज तन मिला पूर्ण सत्संग हित।ये कथा ही है सत्संग और सब अहित।

मान लो प्रेमियों जीव जीवन कथा। क्या गवाँओगे अवसर वृथा ही वृथा।

मानो, मानव का जीवन है भगवत्कथा।और संसार की सब कथा है व्यथा।।

श्यामाश्याम की कथा कर्ण कुहरों भरो।
मत करो व्यर्थ जीवन अहं ना करो।।

जानकी के अनुज की कथा में बहो।
जानकीनाथ गुन सुन, उनको गहो।।

मानो मानव का जीवन है भगवत्कथा।
और संसार की सब कथा है व्यथा।।

नहीं होता किसीका आगे पतन।भक्त भगवत कथा में लगे जब ये मन।।

भक्त भगवत कथामृत में रहें जब मगन।
लक्ष्य पूरित हो नर तन हरी के शरन।।

मानो मानव का जीवन है भगवत्कथा।
और संसार की सब कथा है व्यथा।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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मिलत रहत संसारो 

मन भजै रटै कैसे हरिनाम ये प्राकृतदेह  विचारो।
कैसे सतत हरी सुमिरै नर बात बुद्धि में धारो।
विन्ध्येश्वरीदास गुरुकिरपा निश्चय होय  हमारो।
सब आधार छाँड़ि पकरो गुरुपादपद्म स्वीकारो।
सन्त शरण चरणाश्रय मिलतहिं  देहगेह  विस्मारो।
प्राकृत देह बने अप्राकृत, गुरुकृपा नाम आधारो।
स्वस्वरूपनिष्ठित परिनिष्ठित गुरू ही ईश्वर सारो।
नामनिष्ठ गुरु देखि सहज तच्चरणकमल
स्वीकारो।
विकल अवस्था गमन आगमन नहीं देह मनुकारो।
होय कृपा पंकजपदगुरु कै जात गलत  संसारो।
नाम चलत है इसी देह से राम राम रतनारो।
बनै जाय यह पंचभूतनिर्मित अप्राकृत सारो।
यहै रहस्य यदाश्रय श्रयणे गलै कर्म सब छारो।
तबै लक्ष्य परिपूर्ण एहि तन समझो चाहे निकारो।
विना अनन्य आश्रय गुरुपद मिलत रहत संसारो।


हरिगुरुसन्तः शरणम्
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प्रेम के अधीरे

चली थी चलेगी उमर धीरे धीरे।
बनो रामचरणों के प्रेम के अधीरे।।

न जाने है कितने जनमों का जाना। लगा ही रहेगा ये आना ये जाना।।जाना उसी ने सरेण्डर हुआ जो। गुरू भागवत के अण्डर हुआ जो।।सभझो भी तुलसी कबीरों की रहनी। रैदास मीरा और सूरों की सहनी।। बिना इनके चरणों भजन ना बनेगा। इन्ही के शबद से ही सब कुछ मिलेगा।। नहीं तो भजन की पहेली न सुलझे। नहीं अब भी समझे रहो तूँ भी उलझे।।
आचार्य शंकर की निकली है बानी।
सत्य प्रेम करुणा में रससिक्त सानी।।

(गतवति वायौ देहापाये भार्या विभ्यति तस्मिन् काये)

देह तो चली जल अगिनि के हवाले।
हटे प्राण वायू कौन इसको सँभाले।
पत्नी जो करती देह से स्नेह मानो।
अटल प्रेम आत्मा से मानो औ जानो।
यही बात निकली वेदव्यास मुख से।
अरे मनुज मानो रहोगे तूँ सुख से।।

(प्रेष्ठो भवान् तुनुभृतां किल बन्धुरात्मा)

परम प्रेम हे कृष्ण सभी के शरीरों में।
हटा अपनी माया रखो हमें धीरों में।।

सभी का शरीरों से सत् प्रेम होता।
असली है सत् प्रेम सब में जो सोता।।

ऊलझी ये करमों की डोरी न सुलझे।
पड़ो सन्त चरणों में रहोगे न उलझे।।

ये गीता की बानी पुराणों की बानी।
करो प्रेम सबसे निरतिशय ही मानी।

चली थी चलेगी उमर धीरे धीरे।
बनो रामचरणों के प्रेम के अधीरे।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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राम नाम के सहारे

बात समझ में तब आयेगी महात्माओं की जब निरन्तर नाम चलेगा।नहीं तो काम ने छला है, और छलता रहेगा।
यह आवागमन चलता रहेगा।
संसार विवर्त विकार है, उस पुरुष विशेष का।यह विकार ही कामना काम है। काम रहेगा संसार रहेगा। राम रहेगा संसार हटेगा।
बात वैज्ञानिक है।मान लीजिए, अपना क्या है?आत्मा आत्मरूप छोड़कर।
आत्मदेव के रहते सारी पूजा खानपान सम्मान,नहीं तो कोई हो शङ्कराचार्य ही क्यों नहीं,हो कब तक शरीर रखा जा सकता है।इसलिए आत्मवत् सर्वभूतेषु, जानकारी में आ जाये,तब सब मिल गया,वासुदेवः सर्वम् भी सध जायेगा।नहीं तो एक चांस और व्यर्थ गया।
अव्यर्थ साधन है, रामनाम।नहीं तो राम के शरीर से हटने के बाद,उस राम की   सत्यता का सत्यापन? कैसा समाज है?
जब पिण्ड से बाहर हुए जीवराम,ब्रह्माण्ड में पहुंचे,कर्मवश,तब सूक्ष्मशरीरराम को रामनाम सत्य बताया जाना ही द्योतक है, इस बात का कि राम तो त्रिकालाबाधित सत्य हैं।स्थूल में सुना है, तो सूक्ष्म में भी वही सत्य हैं, एकमात्र।
राम सत्य संकल्प प्रभु हैं।उन्ही से ही  जैसा भी हो सारी साज सज्जा है,नहीं तो सज्जनों! साज गया, आवाज गई, नामी गया,नाम गया।कौन नाम लेने वाला है।सब भूल जाते हैं, एक ही दिन में,जब तक सूरज चाँद रहेगा, अमुक जी का नाम रहेगा, बस एक दिनी वन डे है।मीरारैदास  कबीर,सूर तुलसी नाम का सिक्का चल रहा है।चलते रहेंगे सब रामनाम के सहारे।और सहारे सब हारे।समझ आयेगी इसी राम नाम के सहारे।नहीं तो सन्त तो कहते रहेंगे।सन्तों की अच्छी बाते हैं अच्छा लगना स्वाभाविक ही है।लेकिन समझ   (ज्ञान)तो राम नाम के सहारे।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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क्षणिकाः

रसना रस राम राम कौशल्या के सूनु राम।
बार बार रटत राम होत जनम पूर्ण काम।

कृपा के निकेत और रघुपति के दूत तुम,बन्धु हो विपन्नों के परम विराम हो।दुखित जनों के कष्ट हरते हे! कपीराज वायु के सुपुत्र तुम्हें सतत प्रणाम हो।।

निश्चय ही सिद्ध होता सब असम्भव कार्य है।धरे ध्यान कृपा उनकी मिलता क्या नहीं है।वे ही वानरेश करें रक्षा साधु सन्तों की।हैं कृपालु चित्त कृपाशीलता ही कार्य है।

श्रेष्ठ शिखर विन्ध्याचल का है, जहँ शिखर राजती नित्य भवानी। आर्यशरण्या जगन् मातृका ,रक्षा वरदा है वरदानी।

करते अमंगल का ध्वंस विध्वंस मुदा। महाबली क्लेशहर्ता शरणागतरक्ष सदा।
भूमिसुतासीतापति राम में अनुरक्त रहते। स्मरते वायुसूनु तुम्हे कृपा आलय कहते।

जिनकी कृपा के लेशमात्र होते पूरे काम। आद्याशक्ति विन्ध्यस्थित दुर्गा भजूँ आठों याम।

भक्तों के सकल कष्ट सतत तुम हरते। पंचानन केसरी कपि क्या न तुम करते। पारावारकृपा के प्रभु तुम्हें हम भजते।
राम राम स्मरते तुम श्वास श्वास रहते। जनरक्षा प्रतिक्षण मंगल ही करते।
वायुसूनु शिवस्वरूप रामदूत जयते।

विन्ध्याचल सविशेष कान्त उन्नत अधित्यका राजित।अष्टभुजा माँ
सरस्वती किया तूँने कंस पराजित।
शुम्भ निशुम्भ दैत्य द्वय दुर्धर,किया विनाश मात्र क्षण में।धरती गगन सकल त्रिभुवन हे वैष्णवि! चरती कण कण में।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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नमस्तस्यै नमो नमः

सर्वाधाराभूतस्था सर्वानन्देतति कथ्यते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
जय सियाराम
मार्कण्डेयपुराण के अन्तर्गत वर्णित  दुर्गासप्तशती में कुल तेरह अध्याय हैं। पंचम अध्याय में नाना रूपो़ में देवी की स्तुति करते हुए उन्हें प्रत्येक रूप में अवस्थित बताया गया है। हर मन्त्र के अन्त में नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः कहा गया है। चार बार आये हुए इस नमन का बड़ा रहस्य है।इस प्रकार के-
नमः तस्यै नमः तस्यै नमः तस्यै और नमो नमः के प्रति स्थूल सूक्ष्म कारण और कारणातीत  का दर्शन एक आध्यात्मिक अनुभूति है। बिना तद् आकार आकारित चित्तवृत्ति के ,ऐसे स्तर की प्राप्ति सम्भव नहीं है।
किन्तु इन चार प्रणामों का निवेदन, इसलिये भी है कि,साधक सद् रजस्तम से ऊपर,उसके पार चला जाये। त्रिगुण में रहना यह तो है त्रिप्रणाम है।और चतुर्थ नमो नमः द्वारा गुणातीत चतुर्थ स्तर में अवस्थिति है। विशुद्ध सत्व प्राप्ति की स्थिति है। क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता,तो  ब्रह्माण्ड गुरु श्रीकृष्ण – त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भव अर्जुन, जैसी बात कहते ही क्यों।
चतुर्थ प्रणाम तुरीय चैतन्य में निरन्तर स्थिति की अवस्था है,जो सत् चित् और  आनन्द दशा है, जिसकी प्राप्ति नही करनी है, क्योंकि यह स्वतः प्राप्त है। ज्यों ही साधक त्रिगुण के पार हुआ कि, स्व स्वरूप मिल गया।और त्रिगुण मायिक प्रकृति का बाध तो नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै से हो जाता है।अब नमो नमः तो स्वतः गृहीत है,यही नित्य लीला लीन  सच्चिदानन्दावस्था है।
तव च का किल न स्तुतिरम्बिके,सकल शब्दमयी किल ते तनुः।इति विचिन्त्य शिवे शमिताशिवे,जगति जातम् अयत्नवाशादिदम्।स्तुतिजपार्चनचिन्तनवर्जिता न खलु काचन काल कलास्ति  मे,ऐसा दर्शन देने और स्वयं ऐसी दशा के अनुभोक्ता परम    अभिनव और नाम से भी अभिनव अभिनवगुप्त पादाचार्य ही हो सकते हैं, जो तुरीय चैतन्य की अभिनव  तदाकाराकारितचित्तवृत्ति की दशा के साधक हैं।हम जैसे अविद्या माया ग्रस्तों जैसे नहीं। अतः स्वस्वरूपावगति यानी कि स्वात्मज्ञान की प्राप्ति ही,नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः का उपनिषद् है।


हरिगुरुसन्तः शरणम्


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शान्ति दे ब्रह्मानी।

श्रीरामचरणरति गति अनन्त मति विमल हृदय चिर सदय शान्ति दे ब्रह्मानी।
आकल्प काल कल- कल चल-चल चिर कर्मभूत यह भ्रमण रोक हे वानी।
ज्ञान उपासन भगति त्रिवेणी पावित पय  आचमन स्नान हो कल्यानी।
विधि लिखे भाल पर भोग काल तव  कृपाग्रस्त हो अस्त जाय ब्रह्मानी।
हो सतत नाम जप हरिस्मरण गल प्रबल कर्म विधिवानी।
बने न नूतन कर्मभोग्य हो योग्य दास रोको इसकी मनमानी।
है चला जहाँ से वह सत चित आनन्द  अचल अविकल दें दानी।
इस देहपिण्ड में सुप्रतिष्ठ यह निष्कल हो अकलंक कृपा की खानी।
हे शारद तव करुणा वत्सलता स्नेह वारि वारिद बरसे वरदानी।
श्रीरामचरणरति गति अनन्त मति विमल हृदय चिर सदय शान्ति दे ब्रह्मानी।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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