उपवास का विशुद्धार्थ

नारायण महात्माओं की दृष्टि तो साधु गुरुशास्त्रसम्मत होती है।अतः इस दृष्टिकोण से उपवास का अर्थ ‘दास’की विचारसरणि में त्रिविध है।वह है, सिद्धार्थ मूलार्थ और गूढार्थ। सिद्धार्थ शास्त्र सम्मत कहनी है। उप अर्थात् समीप में वास माने बसना,इसमें विप्रतिपत्ति नहीं है।यही है सिद्धार्थ।यह समीपता,इस बात की स्वयं अनुभूति है, कि हम प्रतिक्षण अपने अंशी(परमात्मा)के समीप ही बस रहे हैं।

अब जगत जिस अर्थ को ग्रहण करता है, वह है अल्प मात्रा में सात्विक फलमूलादि लेकर भगवत् चिन्तन पूर्वक नारायण की “उनकी”समीपता का अनुभव करना।यही वस्तुतःमूलार्थ है, जो स्पष्ट ही है। अल्पाहारपूर्वक देशकाल की मर्यादा में रहना और भगवच्चिन्तन करना ही प्रमुख मूल अर्थ है।

अब गूढार्थ विचारें तो यह है? जीवात्मापरमात्मयोग। यह भी “कृपालु” महात्मा बताते रहते हैं। यह सिद्धार्थ मूलार्थ और गूढार्थ परस्पर अभिन्न ही समझना चाहिए।
अब उपवास के “तुरीय”और अपर चतुर्थ अर्थ पर भी एक विचार कर लिया जाय। हालाँकि यह चौथा अर्थ भी पूर्वोक्त त्रिविध अर्थों से अभिन्न ही है। यह सूक्ष्मार्थ है।

यह क्या है, वह यह है कि, यह जीवपरमात्मा का सम्बन्ध परस्पर अपृथक् है,ऐसी दृष्टि शनैः शनैः विकसित हो जाय,माने कि अभेद दृष्टिकोण बने। इसीलिये नारायण! मायाकृत प्रारब्ध भोगी मनुष्य के पीछे नारायण ने अपनी “माया” लगा दी है दौड़ा दी है।
ताकि वह ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः मेरा सनातन सदातन अंशभूत जीव परेशान थक हार कर जन्मजन्मान्तर से ऊब कर मुझे देखे और कहे,अनुभव करे कि हे राम! तवास्मि
इसीलिये सनातन ऋषियों ने “उपवास” का विधान रचा है।
यह है,उपवास का सूक्ष्मार्थ।
नारायण! यह योगमाया या माया संसार वर्धन के लिये अथवा कहिये, सृजन पालन और संहार के लिये है। माया ही संसार रचती पालती है। निग्रह का कार्य वस्तुतः भगवान् का है। संसार ऐसे ही चलता रहता है। लेकिन जब हमारे स्वामी(भक्तसन्तगुरु) चाहैं,तब माया अविद्या भ्रम और इसके रचित आवरण विक्षेप सभी कुछ,क्षण मात्र में नष्टभ्रष्ट हो जायें। नहीं तो कठिन है डगर पनघट की।

गोस्वामी जी ने संसार की समस्त नारी मात्र को “नारि विष्णु या विश्व माया प्रकट” कहकर इनसे अति सावधान रहने का संकेत किया है।गृहस्थाश्रमी को स्वस्त्री छोड़कर नारीमात्र के लिये, मातृदृष्टि का आदेश है। यह भी उपवास का सूक्ष्मार्थ ही है।
वस्तुतः इसलिये सारतः तत्वज्ञान के लिये, जीवपरमात्माभेद के लिए, और माया अविद्या की निवृत्ति के लिये ” उपवास ” शब्द प्रयोज्यमाण है।
नारायण! यही उपवास का विस्तृत समग्रार्थ है।यह उपवास शब्द संकेत है, आहार शुद्धि का भी,क्यों?
क्योंकि शास्त्रवचन ही प्रमाण है- “आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः,सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
आहार शुद्धि के बिना, अविद्या माया संसार की स्मृति रहने से बारम्बार संसार आवागमन बना रहता है।इसलिये उपवास का अर्थ सन्तचरणों से सत्संग से जान कर ही आचरण में प्रवृत्ति होने पर संसार राग नष्ट होगा और उपवास के चरम फल की प्राप्ति होगी।यह नाना इन्द्रियों की आहार शुद्धि भी उपवास का सूक्ष्मार्थ ही है। इसलिए “दास” की गुरुपीठ का,मलूकपीठ का उद्घोष है-
अर्थ विशुद्ध उपवास जु पाया।
जेहिं जरि जाय मूल यह माया।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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न पुनः जन्म जायते 

धारकोद्धारकः धर्मः सिद्धः साध्यश्च कीर्तितः।अग्नौ दाहकत्वे सति तदग्निः सिद्धपूर्वतः। अन्यथा यदि  शीतत्वं तदग्निः स्यात् कथं वद। एवं मनुष्यता धर्मः मनुष्ये यदि वर्तते।तन्मनुष्यः भवेन् नूनं साध्यधर्मो निगद्यते।मनुना मानवेन्द्रेण मनुधर्मः प्रकीर्तितः।तावत् प्राथमं कृत्यं मानुषे यत् शरीरकम् ।विवेकशीलता धर्मः ख्यातः साधुमानितः।
यदि विवेचिनी बुद्धिः मनुष्ये पूर्वसिद्धिता।
तदा विचारः कर्तव्यः सर्वस्मिन्कार्यकारके।

विचार्यैव कार्यं कर्तव्यं सर्वकाले पदे-पदे।
विचार्य कार्यकरणे मर्यादा भवति ध्रुवम्।।

मर्यादा यदि जायेत गुणा आयान्ति निश्चितम्। करुणा क्षमा सुशीलत्वं सारल्यं तोषकारिता। यद्येषः गुणगणः मनुष्ये व्यवहार्यते।तदेषः मनुजः नूनं वक्तुं शक्यमिति ध्रुवम्।अन्यथा वैपरीत्ये सति  मानुषो नैष कीर्तितः।
मानुषो धर्मश्च मर्यादा शिक्षिता साधुसम्मता।भगवता रामचन्द्रेण प्राकृतं योनिमास्थितम्।अतः परीक्ष्य कर्तव्यं सर्वकर्मसमुत्थिते।सार्थं जन्म हि तस्यैव न पुनः जन्म जायते।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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साधक स्वतन्त्र नहीं, स्वतन्त्र साधक नहीं

यद् यद् आचरति श्रेष्ठः तत् तत् एव इतरो जनः।
सः यत् प्रमाणं कुरुते लोकः तद् अनुवर्तते।


जिन जिन श्रेष्ठ लोगों रामकृष्ण आदि ने आचरण किया,वही वही इतर(अन्य)जन भी,यदि व्यवहार करते हैं,तो वही धर्म का मानदण्ड(प्रमाण)है अतः मनुष्य लोक(लोग) वही अनुवर्तन करें।
भगवान् श्रीराम ने जो मानव शरीर धर कर मानव बनने की मर्यादा(सीमा) बताई, वह धर्म है। आचरण की शिक्षा ही सर्वश्रेष्ठ शिक्षा है।
वेद शास्त्र सन्त सम्मत मत स्वीकार करके आचरण(धर्म) में लाकर ही,मनुष्य बना जा सकता है। मनमाना स्वच्छन्द आचरण करके कदापि नहीं। अन्यथा यह मानव शरीर असाधन होगा, साधना साधन नहीं। और वेदशास्त्र सन्त साधु प्रतिपादित मार्ग पर चलने की, हम सभी जीवों की परतन्त्रता है।
भगवत् भागवत् पारतन्त्र्य ही साधन साधना और धर्म मार्ग है।स्वतन्त्र स्वच्छन्द विषय भोग में जाने पर इस भगवत्प्रदत्त मानव शरीर का प्रयोजन नष्ट हो जायेगा।
इसलिये, वेद गुरु सन्त मत में असन्देह विश्वास(श्रद्धा) करते हुए भगवत् भागवत् पारतन्त्र्य में रहकर ही धर्म(साधन) बनेगा।अन्यथा इससे इतर- शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध जैसे विषयों की लालसा और मान पूजा बड़ाई ने तो हमें अपने मानवीय- करुणा दया त्याग सौशील्य वात्सल्य सन्तोष आदि विभिन्न मानव गुणों से बहुत दूर कर दिया है।
अतः नारायण!साधक(धर्मपथ प्रवृत्त) स्वतन्त्र नहीं होता है।और स्वतन्त्र, साधक नहीं होता।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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मिलेगा ध्रुव सुनो तन नई से नई

मिला मानव का तन चाहना ना गई।

मिलेगा ध्रुव सुनो तन नई से नई।।



व्यासदेव भगवान् ने किया नहीं है भेद।
नारायण गुरु एक हैं तत्व अभेद अभेद।।

नारायण गुरु एक हैं जान सको जो जान।
नहीं जान पाए अगर पा न सके कुछ मान।।

गुरू एक हरि एक हैं मत देखो तुम भेद।
भेद देखते हो पुनः परौ धरनि कै छेद।।


सीख मिली संस्कृत भये गुरू कृपा ते जान।

जौ रहस्य यह ना खुला जान न पाए जान।।


गुरु आचरण गुरू चरण पकड़ सकौ जो पकड़।

नहीं पकड़ पाए अगर जा न सकैगी अकड़।।


जा न सकैगी अकड़ और होगा वर्तित संसार।

मिला मनुज तन गिर पड़ो गुरु चरणों में सार।।

“अष्टावक्र” गुरू भयौ चौबिस गुरू बनाय।
लख चौरासी “निगुरु” पड़ जागै सोवै खाय।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।।
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चले रहै अभिचार 

सारे भौतिक जगत् का आधार ही आध्यात्मिक है।
भौतिक संगत तभी तक है, जब तक आत्मिक। संगत
असंगत विसंगत सुसंगत कुसंगत/गति सभी में गमन या संसार चलनशीलता है,इसी को हमारी तुच्छ बुद्धि , भौतिकता माया अविद्या मानती है।
इस माया अविद्या संसार के आकर्षण से प्रभावित होकर नाना कल्प बीत चुके हैं।अनुभव तब होगा,जब कोई इसका अनुभोक्ता अनुभव करा दे। परिवर्तन संसारासक्ति पूर्वक नाना शरीर धारण करना इस शरीर का लक्ष्य ही नहीं है।
नाना ब्रह्माण्डीय ऊर्जाओं के अनुकूलतम संघात इस देह से पृथक् आत्म तत्व है, इसी बात को जाने समझे लोगों और उनकी परा वाणियों से स्वयं में आत्मत्व का अनुभव ऐदं प्राथम्येन इस पिण्ड में रहने का प्रयोजन है।
दूसरा भी परम चरम प्रयोजन है, पुनः कर्म वासनाजनित शरीर न धारण करना।
अतः भौतिक और आध्यात्मिक जगत् को आधार आधेय समझ कर एक साथ समझ कर आगे चलना होगा।नहीं तो-तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्रावित् ,में संगति नहीं बनेगी। संगत गति सत्संग में,रहो भले दिन चार।या पाले संसार के चले रहै अभिचार।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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जीव अविनाशी

ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
जब जानै तो प्रकटे काशी।।

जीवन मुक्त सदा सन्यासी।
फिरै न फेरा करम विनाशी।।

गुरू कृपा कर मुक्तिप्रकाशी।
आनँद मग्न सदा सुखराशी।।

मातृ शरीर फिरत माया सी।
देखि रहै मन मनहिं उदासी।।

मानै जब सब अपनी मा सी।
मोह अविद्या तबहिं तरासी।।

साधु सन्त चरणन गिरि जासी।
होवै तब सुख शिवगिरिजासी।।

ऐसी दृष्टि देत गुरु काशी।
अविगत गति गत माया नासी।।

जय करुणाविग्रह की राशी।
गुरुपदकमल दिव्य प्रतिभासी।।

मनहिं ध्यानरत गुरु गंगा सी।
देवि सरस्वति युति यमुना सी।।

गुरु पद अम्बुज रति सुखराशी।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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सिद्धसिद्धम्

सर्वकामकारको रामः।जगद्बन्धसंहारो रामः।।पञ्चभूतनिस्तारो रामः।भवनिधि- पीडाहारो रामः।।कौशल्यासुखमूलो रामः।दशरथहृदयविहारो रामः।।भरतप्रेमविस्तारो रामः।लक्ष्मणसेवाधारो रामः।।शत्रुहननसौशील्यो रामः।हनूमान-
हृद्वासो रामः।।रावणमदनविनाशो रामः।
सेवक-भक्त-सुखाशो रामः।।

प्रतिकूलमपि भावितं कृतं सानुकूलवद्
ग्राहितं मतम्।ततः ततं सुखसारमद्भुतं श्रीरघूत्तमचरित्रमुतत्तमम्।।
मोहमहासन्दोहहानिता।जायते तव कृपाकारिता।।
येषां समेषां यदि जातु जातं, वैकुण्ठलोकप्रतिवासवासनम्।साकेतसंप्राप्य निवासलोकान् जनान् न्नतोयं कृतबद्धसाञ्जलिः।।

विषयविषविषाक्तः कण्टको यो विलग्नः,
हरिगुरिगुरुकृपातो सार्यते केवलं तत्।
परपरक-कमपि वन्द्यं विश्वविश्वासहेतुम् ,
रमणरामरम्यं श्रद्धया  सिद्धसिद्धम्।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।


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सदानन्दः जीवः

न कोई अल्पज्ञ है, न सर्वज्ञ।
जो आप वही हम। जीव का जीवन नाना वन -वन नाना शरीर बन तब नहीं भटकता जब वह तुलसी कबीर मीरा रैदास जैसे भक्तों का चरणानुराग पा जाता है।
मैं क्या कोई भी रसो वै सः की एक कणी का स्वाद पा जाये,तब प्रेम मद छाके पग परत कहाँ के कहाँ, की दशा में चला जाता है।
सोचिये,जिन भगवान् की माया का विस्तार यह प्रपंच भौतिक जगत् है, वह कितनी सारहीन और मादक है, मोह में भोगों में इस जीव को डाले हुए हैं, वह जीव “उन्ही”की कृपा से गुरुमाध्यम से थोड़ी भी भगवद्रस मदिरा पी ले,तो उस भाग्यशाली जीव का क्या कहना। वह तो संसार के निर्माण करवाने वाले भगवान् में ऐसा भावित आकृष्ट होगा कि, संसार रस भोग भाग ही जाये। अरे नारायण! जब वह अपने प्रेमपाश में फँसा लें तब माया मोह निवृत्त। सदा आनन्द ही आनन्द।
इसलिए-
सदानन्दः जीवः जनितमायाजितकृपाकारणपरः।न पारं यातुं तत् परमगुरुकरुणान्धितधिया। अतः साध्यः सः प्रतिसमयसर्वत्रप्रसृतः।मुदा दद्यान् मुक्तिं हृदयकृपयाविष्टमनसा।।

हरिगुरुसन्तः शरणम्।

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परमात्मा सुलभ, महात्मा दुर्लभ


किसी व्यक्ति विशेष द्वारा कोई दिन विशेष घोषित करने पर सम्भव है, जिस क्रिया विशेष हेतु वह घोषित है,तद्दृष्टि जाने से तत् सृष्टि हो जाय।
किन्तु कोई लेख/विचार विशेष,केवल और केवल आवेश विशेष का परिणाम होता है।जब आवेश होता है, तब वह लिखवा लिया जाता है।बिना आवेश के कोई भी गद्य/पद्य उपहास पात्र बनता है, मम्मट ने तो यही माना है।आज इक्कीस जून दोहजार चौबीस, योग दिवस है।आज योग करने का महत्व विशेष है।
यानी कि आज से लेकर आगे सतत ऐसी  प्रक्रिया में इस आसनादि को जारी रखना चाहिए। यही आज का सन्देश है।
योग तो शुद्ध रूप से आत्मिक प्रयोग है। दिखावे के लिए ही सही हो,लेकिन प्रेरणादायक और जागृति करने वाला तो  होता है।
          सूक्ष्म विचारणा में,देखिये तो यह 
योगी भी अभिमानी होता है। अभिमान पुनः जन्मने का कारण है। अतः योग के समस्त आठों सोपान दम्भ में रखनेवाले हैं। तब क्या योग और तत् शास्त्र क्या दुरुपयोग हैं? ऐसा नहीं मानना चाहिए।वस्तुतः योगादिशास्त्र मानव धर्म पालन के अन्यतम चरण हैं। हम इसके द्वारा ईश्वर प्रणिधान,सत्य पालनादि को व्यवहार में लाकर एक अदद मनुष्य तो बन ही   सकते हैं,जोकि चरमप्रयोजन सिद्धि का  प्रथम प्रयोजन है।
योगः चित्तवृत्ति निरोधः इत्यादि वाक्यों से यह जानिये,कि यह चिद् वृत्ति,जो संसार राग मे,मायिक बन्धनों में हमें जकड़ रखे है,वह निवृत्त/नष्ट हो जाय। वह हमारा असली स्वरूप नहीं है। हमारा असली स्वरूप संसार भोग नहीं है, बल्कि संसार योग है। आमूल चूड यह जगत् ईश्वरीय आवास है। “ईशावास्यम् इदं सर्वम्”
अब योग की सार्थता यही है कि, यह जीव जगत् वासुदेवः सर्वं दीखने लगे। और योग के वर्तमान, आसन प्राणायाम आदि को करके हमें ऐसी योग दृष्टि नहीं मिलेगी। तब इसके लिये परमयोगीश्वर ब्रह्माण्ड गुरु की वाणी का प्रसाद ग्रहण  करना पड़ेगा, जहाँ जाकर योग की गुत्थी  सुलझेगी। नारायण!नारायण ने कहा- वासुदेवः सर्वमिति स महात्मातिदुर्लभः। और दूसरी ओर कहा- तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।
मतलब समझें कि किसी भी समाधि योगी की कृपा से उसी की तरह हमें भी समाधि में भगवान् सुलभ हैं।
लेकिन सर्वत्र भगवद् दृष्टि वाले सन्त/महात्मा दुर्लभ हैं।
  अब समग्र गवेषणा से तथ्य निकला कि,सन्त दुर्लभ और भगवन्त सुलभ हैं।

योग से,और कहिये किसी योगी के निर्देशन में भगवत् तो दर्शन हो जायेगा।लेकिन कहिए कि इस योगदर्शन से जन्म बन्ध विनिर्मुक्ति हो जाये तो हम जैसे दास को यह सम्भव नहीं लगता। यह सम्भव है, केवल सर्वत्र सर्वं खलु इदं ब्रह्म वाले महात्मा की चरणरज में अभिषेकस्नान  होने से।
अतः आज जिस योग का प्रयोग योगा के रूप में योग दिवस के रूप में मनाया जा रहा है, हो सकता है, यह क्रिया,मनुष्य बनने में मदद करे। लेकिन वास्तविक रूप में परम कल्याण और आत्म कल्याण तो,सियाराम मय सब जग जानी। करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी,वाले दृष्टिकोण के दुर्लभ सन्त महात्मा दे पायेंगे।और इस शरीर का चरम यही है कि, भवबन्ध टूटै।
अतः सद्गुरु शरणागति ही मुक्ति का एकमेव उपाय है। आज का योग मुक्ति नहीं देगा।अभिमान ऊपर से बढ़ायेगा।अतः,अर्जुन की तरह श्रीकृष्ण चरणों में गिर पड़ो,बस काम बन जायेगा।
भवबन्धन खोलें वही जिन्हे न माया मोह। यह संसार पड़ा हुआ कंचन कामिनि कोह।।


हरिगुरुसन्तः शरणम्।
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श्रीरामकृष्णावतरण की अलौकिकता

भगवान् श्रीराकृष्ण की जन्मलीला अलौकिक है। वे ही लोक के कारण और कार्य भी हैं।वस्तुतः वे ही लोक के कर्ता कारयिता हैं और करणसामग्री भी हैं।
अस्थिरसंसार सरक रहा है।दरक रहा है। एकमात्र वे ही स्थिर हैं।जगत् के गमन की अनुभूति इन्ही के साक्षिभाव से है।ये साक्षीरूप अनुभव में न आवैं,रमारमण में रमण नहीं हो तो भ्रमण भावी भव भुवन में कर्मबद्ध पुनर्भव कराता रहेगा।
समाधि सिद्ध सिद्धवाणियां प्रसिद्ध हैं।
रामो विग्रवान् धर्मः

दशरथ को भगवान् ने अपने पिता रूप में स्वयं वरण करके विप्रधेनुसुरसन्त हित लीन्ह मनुज अवतार।

असामान्य जन्म है, अजन्मा का। सामान्य रूप से माता के गुण,पुत्र में होते हैं, यह लोकवेद सिद्ध सिद्धांत है।
लेकिन यशोदाकौशल्यादि माताओं में श्रीकृष्णरामादि के लीला गुणगण यथा-माखन चोरी से खाना,मिट्टी खाना,
सौशील्य, आदि प्रकट होते हैं। यही भगवान् के जन्म की अलौकिकता और अप्राकृतता है।

हरिः शरणम्।
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