सत्संगति संसृति कर अन्ता

सत्संगति से जन्म-मृत्यु रूप चक्र का विनाश होगा। क्योंकि असत्संगति से तो असद् रूप संसार में ही आने जाने का क्रम चलता रहता है। तब यह मान लिया जाय कि सत्संगति से ही मुक्ति होगी।
अब प्रश्न होता है कि सत् की संगति कैसे हो? तब इसका सरल उत्तर है कि जो सत् के मार्ग पर चलने वाले साधु ,सज्जन, सन्त,महात्मा, सद्गुरु हों ,उन्हीं की शरण लेनी होगी। इन्हीं सन्तों का सामीप्य मुक्ति का सर्वात्मना साधन है।
अब प्रतिप्रश्न होता है कि वे कौन से कारण अथवा उपाय हैं, जिनसे ऐसे स्वयं मुक्तात्मा विमलात्मा पुरुषों का साहचर्य हो।
तब इसका उत्तर श्रीमदाद्य शङ्कर देते हुए स्वीकारते हैं कि ऐसे सद्गुरुदेव की प्राप्ति और मुक्ति अनेकानेक जन्मों में अर्जित पुण्यों द्वारा सम्भव है-

मुक्तिः नो शतकोटि जन्मसु कृतैः
पुण्यैः विना लभ्यते।।

सैकड़ों-करोड़ों जन्मों में एकत्रित होती हुई सदाचार सम्पनता द्वारा, जब इसकी परिपूर्ण और परिपक्वावस्था आती है ,तब जाकर सन्त-सद्गुरु-मिलन और मुक्ति हो पाती है।
उत्तरकाण्ड में बाबा तुलसी अपने उपास्य भगवान् श्रीराम के श्रीमुख से यही सिद्ध करते दीखते हैं, जब भगवान् कहते हैं-
पुण्य-पुंज बिनु मिलहिं न सन्ता।
सत्संगति संसृति कर अन्ता ।।
इन सभी बातों को समझने में एक तत्व और प्रकट होता है, जब एक दूसरा कारण भी ,सन्त- सद्गुरु की प्राप्ति का उसी जगह दीखता है। वह दूसरा कारण है- श्रीभगवान् हरि की कृपा-
अब मोहिं भा भरोस हनुमन्ता।
बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं सन्ता।।

” मानस ” के सुन्दरकाण्ड में हनुमान् जी से विभीषण का कथन है, कि उन्हे यह विश्वास हो गया कि बिना भगवत्कृपा के हनुमान् जैसे तत्वज्ञ सन्त का मिलन सम्भव नहीं है।
उक्त सन्दर्भों में कोई विरोध नहीं, क्योंकि जब सदाचार-सम्पन्न जीवन होगा तभी विवेक की पुष्टि होगी ,और जहाँ विवेक की पुष्टि का कारण भी सत्संग है,वहीं रामकृपा का आश्रय सन्त सद्गुरु की कृपा दीखती है-

बिनु सतसंग विवेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
और –
जब द्रवैं दीनदयाल राघव साधु संगति पाइये।
इस तरह पुण्यार्जन से यदि सद्गुरु प्राप्ति को माना जाय तो इसका मतलब है कि, हमें स्वयं चल कर अन्वेषण पूर्वक सन्त के पास जाना होगा। और सन्त स्वयं चल कर मुक्ताकांक्षी के पास पहुंचें , तो हरि-कृपा।
इसमें यह बात दृढतर होती है कि बिना पहुंचे हुए सन्त- सद्गुरु की शरण ग्रहण किए कौन है ,जो बद्ध-जीव को उस पार पहुंचा दे,जहाँ माया का घेरा नहीं और संसृति-संसार का अँधेरा नहीं।
अतः श्रीमदाद्य शङ्कर की वाणी से विराम लेता हूँ, जहाँ सन्त-शिरोमणि के चरण-शरण में मुक्ति लिखी है-

सन्तं महान्तं समुपेत्य देशिकं,
तेन उपदिष्टार्थ- समाहितात्मा।।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2019/04/19/सत्संगति-संसृति-कर-अन्ता/

अर्थे शुचिः स शुचिः

चैत्र शुक्ला प्रतिपदा विक्रम संवत् 2076 का आज का दिन हिन्दू नववर्ष का प्रथम दिवस है, जब विधाता ने सृष्टि की संरचना पूर्व-पूर्व के अनेक” कल्पों “की भाँति प्रारम्भ करने का संकल्प लिया-
” धाता यथा पूर्वम् अकल्पयत् “

आज हम सभी परस्पर मंगलकामी होकर भगवद्-भाव और वस्तुतः भगवत्-सम्बन्ध की स्मृति के आलोक में आर्ष-वाणी का जयघोष लिए “वसुधैव कुटुम्बकम् “ की भावना से पौनःपुन्येन मंगल की आशंसा कर रहें हैं।इन सभी मंगलों के मूल में मुझे अपने पिता का स्मरण हो रहा है।वे कहते थे कि संसार में मंगल का आदान-प्रदान तभी सम्भव है, जब जीवन में शुचिता और सदाचार-सम्पन्नता आ जाए।इस सदाचार सम्पन्नता और शुचिता का सम्बन्ध कमाए हुए धन से है। वे एक सिद्धांत वाक्य कहा करते थे- अर्थे शुचिः स शुचिः।
मतलब कि अर्जित किए जाने वाला धन भी वैदिक सदाचार पूर्वक हो ,क्योंकि जीवन में पवित्रता(शुचिता)का आधार और आधान तभी संभव है, जब वह धन अन्यायोपार्जित न हो। अर्थ की शुचिता नहीं होगी,तो यह स्वयं और आनेवाली पीढियों पर भी भारी पड़ेगा।अतः मनुष्य मात्र को इस पर बहुत ध्यान देना चाहिए।
उनकी उक्त अर्धाली आर्ष है,जिसे इस प्रकार समझना चाहिए-सभी प्रकार की पवित्रता(शुचिता)में अर्थ(धनसंपत्ति)
की शुचिता सर्वश्रेष्ठ है।जो अर्थ को न्याय पूर्वक पवित्र भाव से अर्जित करता है, वह पवित्रतम है।मिट्टी-पानी और साबुन से होनेवाली पवित्रता तो वाह्य शरीर की शुद्धि मात्र है-
सर्वेषामेव शौचानाम् अर्थशौचं परं स्मृतम्।
योर्थे शुचिः स शुचिः न मृद्वारिशुचिः शुचिः।
वस्तुतः धृति-क्षमा-दम-अस्तेय-शौच-इन्द्रियनिग्रह-धी-विद्या-सत्य और अक्रोध आदि दश-धर्म-लक्षणों में पंंचम स्थानी यह शौच शब्द मानव जीवन के लिये अत्यंत और अत्यंत ही महत्व का है।
मित्रों! शुद्ध एवं सात्विक तरीकों से अर्जित धन से वाह्याभ्यन्तर शुचिता प्राप्त होगी अन्यथा नहीं।
इस सम्बन्ध में महाभारत में एक प्रसंग आता है, जहाँ ” भीष्म पितामह ” ने इस अर्थ की उत्कृष्टता और निकृष्टता की चर्चा की है।वे कहते हैं- मनुष्य तो अर्थ का दास है।अर्थ किसी का दास नहीं।ऐसा समझ कर हे महाराज! मैं भी अर्थ से बँधा हूँ।मुझे कौरवों ने इसी कारण से बाँध रखा है।यह अर्थ का ही दोष है कि मेरी बुद्धि भी मलिन हो गई है-

अर्थस्य पुरुषो दासः,दासः तु अर्थो न कस्यचित्।
इति मत्वा महाराज ,बद्धः अस्मि अर्थेन कौरवैः ।।

पितामह इसी अर्थ को कोस रहे हैं, जो कौरव-राज और राज्य से प्राप्त है, क्योंकि इसी से उनकी बुद्धि विकृत हो गई।और द्रौपदी के चीरहरण जैसे जघन्य कर्म को भी देखना और सहना पड़ा।
इस प्रकार हम सभी को इस मानव रूप में और मानव जीवन में भगवत्-प्रीतिपूर्वक
भगवदर्पण बुद्धि से विवेक तथा न्याय से अर्थोपार्जन करना श्रेष्ठ है।और इसमें काल
कर्म-स्वस्वभाव के गुणों की भी महत्तर भूमिका है, जिससे जीव यन्त्र वत् माया के पति का ध्यान नहीं करता हुआ केवल माया( धन-सम्पत्ति)के येन केन प्रकारेण उपार्जन मे लगा रहता है। जब तक किसी सन्त-महात्मा, परंसिद्ध साधक की करुणा पूर्ण दृष्टि इस जीव पर नहीं पड़ती, तब तक कामनाओं(अर्थों) का दास बना हुआ यह मानवाकृति मनुष्य- गतागतं कामकामा लभन्ते – को चरितार्थ करता रहता है।
नारायण! माया का पर्दा ही ऐसा है, जो उसे अपनी आवरण और विक्षेप शक्तियों के अधीन करके मोह-पाश में जकड़ कर सारे अर्थों में अशुद्ध (अशुचि) किये हुये है। और इससे छुड़ाए कौन?

तो – तुलसिदास यह जीव मोह-रजु जो बाँधे सोइ छोरै।

 कल के दिन हमारे मलूकपीठ वाले सद्गुरु आचार्य राजेन्द्रदास जी महाराज इसी सन्दर्भ में मलूकदास जी के एक दोहे का स्मरण कर रहे थे। भाव यों था कि मायिक कष्टों से निवृत्ति के लिये जीव को बड़ी सावधानी से ” माया ” नहीं ,वरन् मायाधीश की अनन्यशरण ग्रहण करनी होगी ,और तब तो मायाका आवरण छिन्न हो जायेगा तथा वह स्वयं चेरी(दासी) बन जायेगी, जिससे ” अर्थ ” की शुचिता और अशुचिता का निरास उस ” महारास ” के ” रस ” में डूब जाने पर ” भाव ” की परम परम दशा में सुलभ हो जायेगा-

माया को सब कोइ भजै, माधव भजै न कोय ।
माया तजि माधव भजै, तो माया चेरी होय ।।

।। हरिश्शरणम् ।.

https://shishirchandra.com/2019/04/07/अर्थे-शुचिः-स-शुचिः/

भक्ति और उसके पाँच काँटे

ज्ञान, कर्म और भक्ति को शास्त्र और सन्त महात्मा मुक्ति का साधन मानते हैं। इन सभी को सरलतया समझें तो कर्म का मतलब जहाँ भगवदर्पण बुद्धि से किया जाने वाला कार्य है , तो ज्ञान का अर्थ परमात्म अनुभव और भक्ति माने आत्मा का अनुभव।

आत्मानुभूति भक्ति, परमात्मा की अनुभूति ज्ञान और परार्थकृत कर्म को कर्म संज्ञा दी जा सकती है।
मुक्ति के इन त्रिविध साधनों में अत्यंत सहज और महत्वपूर्ण साधन भक्ति ही है।

मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी।
स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते।।

ऐसा विचार व्यक्त करने वाले आचार्य शङ्कर ने एक बड़ी बात इस सन्दर्भ में. और कही है कि, इस भक्ति की प्राप्ति में अत्यन्तात्यन्त समस्या अहंबुद्धि है,जो इस बन्धन से मुक्त नहीं होने देती।वे कहते हैं कि, जब तक अहंकार की शक्ति बढ़ी-चढ़ी रहती है, तब तक कोई विद्वान् उसका सहसा नाश भी नहीं कर सकता, क्योंकि जो पुरुष निर्विकल्प समाधि में अविचल-भाव से स्थित हो गए हैं उनमें भी अनन्तानन्त जन्मों के प्रारब्ध वश और अक्षीण वासनावश अहं निवृत्ति कठिन है।

आरूढ -शक्तेः अहमो विनाशः
कर्तुं न शक्यः सहसापि पण्डितैः।
ये निर्विकल्पाख्यसमाधि-निश्चलाः
तान् अन्तरानन्तभवा हि वासना।।

इस अहंकार को पाँच प्रकारों में सन्त जन बाँटते हैं, जो कि भक्ति-मार्ग के पाँच बड़े-बड़े काँटे हैं, इनकी निवृत्ति के बिना स्वस्वरूपानुसन्धान या भक्ति सम्भव नहीं है।और भक्ति के बिना मुक्ति कहाँ?

ये पाँच काँटे इस प्रकार हैं-

जातिः विद्या महत्वं च,
रूप -यौवनम् एव च।
पञ्चैते यत्नतः त्यज्याः।
एते वै भक्तिकण्टकाः।।

जात्याभिमान, विद्याभिमान, पद या ऐश्वर्य वश होने वाला महत्वाभिमान,रूपाभिमान एवं यौवनावस्था का अभिमान।
और इसकी मीमांसा करें तो ये बातें केवल और केवल देहाभिमान वश होती हैं। यह प्राप्त हुई देह प्रारब्धानुसार है अथवा भगवत्कृपा वशात्।
इन सबके अतिरिक्त प्राप्त हुई आयु, कर्म(व्यवसाय), वित्तादि, विद्या और मृत्यु का देश-काल-प्रकार, यदि प्रारब्ध वशात् गर्भस्थ शिशु में जन्म-पूर्व ही निश्चित हो जाते हैं, तब अभिमान क्यों?

आयुः कर्म च वित्तं च विद्यानिधनमेव च ।
पञ्चैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः।

अतः सन्त-भगवन्त का आश्रय लेते हुए भक्ति की प्राप्ति और तत्प्राप्ति से मुक्ति की पुष्टि करणीय है।

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2019/03/10/भक्ति-और-उसके-पाँच-काँटे/

गुरुमुख होना

बचपन से ही एक बात सुनता आ रहा हूँ, अमुक गुरुमुख हो गये और अब ध्यान भजन पूजन ही उन गुरुमुख सज्जन का अभिन्न अंग है। निरन्तर गुरुमुखता की यह बात सुनते-सुनते बड़ा लम्बा कालखण्ड अखण्ड ब्रह्माण्ड का अविकल कालांश बन चुका है। और बचपन से अब तक की प्रौढ अवस्था तक इस रहस्यपूर्ण गुरुमुख होने के अर्थ में बड़ा परिवर्तन भी हो चुका है।लेकिन बचपने में इसका जो एक मौलिक अर्थ समझ में आया वह परम और परम लक्ष्य यही लगा था कि इसका मतलब है जीवन से मुक्ति।
यह जीवन्मुक्तता आखिर में है क्या? तो लगता है कि तब और अब के ज्ञान का परिमार्जन होकर एक ऐसी दृष्टि और दृढतर बुद्धि का विकसन ,जिससे भेद मिट जाय, यही कहीं जीवन्मुक्तता तो नहीं। और यही सही भी है।यह सारी मुक्ति का दायक गुरु ही है, जिसकी कृपा से या गुरुमुखता से यह जगत् ही जगत् नाथ के रूप में दीखने लगता है।
अच्छा, रहा गुरुमुख होने का अर्थ, तो वह अत्यन्तात्यन्त और सर्वसाधारण है,जो मेरे मन में आता है। मतलब कि जो विषयी जीव, विषय-मुख अर्थात्-
शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध-मुख है वह इनमें और इनसे विरत होकर परमानन्द के अविच्छिन्न स्रोत परम ज्ञान-स्वरूप ” गुरु ” की ओर अभिमुख हो जाय। और यह गुरु दूसरा कोई नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा ही है। वस्तुतः संसाराभिमुख और विषयवश नीचे और नीचे की सीढ़ी पर फिसलते हुए जीव पर किसी गुरु-भगवान् की करुणा पूर्ण दृष्टि पड़ जाय, तो उसे विवेकानंद बनने में देर भी नहीं।
हमारे सत् शास्त्र इस गुरुमुखता और तत् कृपा से प्राप्त स्वरूप को अद्वितीय एवं वैकुण्ठ-दुर्लभ कहते हैं-

चिन्तामणिः लोकसुखं सुरद्रुः सर्वसम्पदम्
प्रयच्छति गुरः प्रीतःवैकुण्ठं योगिदुर्लभम्।।

और गुरुमुखता से प्राप्त होने वाली अनेकानेक सिद्धियों की चर्चा टीकाकार वंशीधर जी ने की है ,जो इस प्रकार है-

सत्कीर्तिः विमलं यशः
सुकविता पाण्डित्यम् आरोगिता।
वादे वाक्पटुता कुले चतुरता
गाम्भीर्यम् अक्षोभिता।
प्रागल्भ्यं प्रभुता विधौ निपुणता
यस्य प्रसादेन वै।
तं वन्दे शिवरूपिणं निजगुरुं
सर्वार्थ-सिद्धि-प्रदम्।।

और इस गुरुमुखता और गुरुप्रसादता का आनन्द कहाँ तक कहें, अनेक उक्तियाँ हैं।
वाणी यहीं विरमती है-

हरौ रुष्टे गुरुः त्राता, गुरौ रुष्टे न कश्चन।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गुरुमेव प्रसादयेत्।।

।।हरिश्शरणम्।।
http://shishirchandra.com/2019/02/23/गुरुमुख-होना

अन्त राम कहि आवत नाही

मानसकार के मन में यह बात कैसे आकर शब्दाकार हो गई, समझ में नहीं आती।

अब देखिए ,वे कितनी उँचाई से कहते हैं-
जनम जनम मुनि जतन कराहीं।
अन्त राम कहि आवत नाहीं ।।
बारम्बार यत्न-प्रयत्न करते रहने पर भी जीवन के अन्त समय में भगवन्नाम और स्वरूप की स्मृति नहीं हो पाती, और यह कार्य अनेकानेक जन्मों में ऐसे ही चलता रहता है। आखिर इसका कारण क्या है?
अब इस पर विचार करने से पूर्व एक दाक्षिणात्य कवि का भावस्मरण होता है, जिसमें वह भगवान् के चरण-कमलों को पिंजरा और और स्वयं के मन को राजहंस का स्वरूप मानते हैं। इस मन रूपी हंस को भगवत्कृपा प्राप्त हो जाये,कि वह आज ही तत्क्षण चरण कमल के पिंजर में प्रवेश कर ले,क्योंकि अन्त का क्या ठिकाना ? वात-पित्त-कफों से घिरे कण्ठ से नामोच्चारण ही न हो पाये।
इसी सन्दर्भ में अपने मलूक-पीठ वाले महराजश्री ने एक स्मरण बार -बार अपनी वाणी से व्यक्त किया है। वे अपने कथा-प्रसंगों में बताते हैं कि एक बात पूज्य-भगवत्पाद शङ्कराचार्य श्री निश्चलानन्द तीर्थ जी ने स्वयं उनसे कही थी-
प्रसंग यों है कि एक वणिक्-सज्जन ,जो कि अनन्तश्रीविभूषित करपात्रीजी के शिष्य थे, जब उनका महाप्रयाण काल आया ,उसी समय परिव्रजन में टहलते -टहलते आचार्य शङ्कर वहाँ पधारे।
उनके पुत्रों ने उन्हें रोक लिया और कहा – महाराज ! मेरे पिताजी ने कभी कोकाकोला का सेवन हमारी जानकारी में नही किया, जीवन भर भवच्चर्चा और नाम जप में गुरु-कृपा से लगे रहे,किन्तु अब अन्त समय में ये ” कोकाकोला ” क्यों बोल रहे हैं?
आचार्य शङ्कर ने तत्काल शालग्राम शिला-स्पृष्ट जल उनके मुँह में क्या डलवाया कि ,वे तत्क्षण भगवन्नाम का उच्चारण करने लगे।
अब सोचिये क्या प्रतिबन्ध रह होगा कि अन्त ” राम ” कहि आवत नाहीं।
इसके बाद यह बात चर्चा में आई कि मनुष्य-मात्र को भगवदपराध और भक्तापराध से अवश्य बचना चाहिए। इसके साथ ही भगवत्प्रेमी जनों को भगवान् के लीला-रूप धाम में चिन्तन करते हुए अहं की निवृत्ति पर विशेष ध्यान रखना होगा। यदि इन दो बातों का ख्याल रखा जाय तो ,सम्भव है अन्त समय में भी भगवत्स्मृति और नामोच्चारण हो सके।
इसमें अहंकार बड़ा अहम् है। क्योंकि इसी को भगवत्स्मृति का बड़ा अवरोधक मानते हैं। इसे पाँच प्रकार का कह गया है-
जाति, विद्या, पद ,रूप और यौवन। भक्त को इन पाँचों से अनिवार्यतः मुक्त होना ही होगा,क्योंकि नान्यः पन्था विद्यतेयनाय-
जातिः विद्या महत्वं च,
रूप-यौवन-मेव च।
एते वै यत्नतः त्यज्याः,
पञ्चैते भक्ति-कङ्टकाः।।
तो अब इस बात में कोई सन्देह नहीं कि भगवद्भक्त यदि भगवान् को ही जगत् का
निमित्तोपादान कारण मानते हुए उक्त अभिमान से मुक्त हो पाये तो भगवान् और उनके प्यारे-प्यारे भक्तोंकी कृपा से अवश्य ही परम -प्रयाण काल में नाम- लीला का स्मरण हो पायेगा, जैसा कि सन्त-सङ्कल्प से ” अजामिल” को भी मिला।

।। हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2019/01/20/अन्त-राम-कहि-आवत-नाही/

प्रेम ही भक्ति है

संस्कृत भाषा में एक धातु है – ” प्रीञ् ” इसका अर्थ होता है- तृप्ति , इसी धातु में ” मनिन् ” प्रत्यय जोड़कर “प्रेम ” शब्द बनता है। तब प्रेम का अर्थ हुआ परम तृप्ति, क्योंकि धातु अतिशय अर्थ में है।
इधर भक्ति शब्द की निष्पत्ति पहले ” भज् ” धातु से मानने पर इसका अर्थ तो ” सेवा ” है,क्योंकि सेवार्थक धातु है।
अब सेवा किसकी? तो इस पिण्ड शरीर में भिन्न-प्रभिन्न इन्द्रियों से शरीर-सुखार्थ की गई स्वयं की ही सेवा सबसे पहले है।क्योंकि इसके बिना तो शरीर-गति सम्भव नहीं। अब आती है ,इस पिण्ड-शरीर से संसार के अन्यान्य जीव-जगत् की सेवा का कार्य, जो साधु-कार्य है।
इस तरह स्वशरीर एवं पर शरीर की सेवा का कार्य ही भक्ति है। भक्ति से तृप्ति प्राप्त होती है। और अतिशय तृप्ति या आत्यन्तिक तृप्ति को यदि “प्रेम” यह अन्य नाम दे दें ,तो बात समझ में आती है कि इसी प्रेम-दशा में सेवा या भक्ति का अंकुर फूटता है।
वस्तुतः प्रेम से भी तृप्ति होती है और (भक्ति) सेवा से भी। प्रेम हो या सेवा ,दोनों केवल प्रेम या सेवा के लिए ही होने चाहिए।इसमें और कुछ दूसरा नहीं।
तुलसी का “मानस ” याद आता है, जब तमोभार से व्यथित “पृथ्वी” भगवान् श्रीविष्णु का शरण लेकर प्रार्थना करती है।
देवता भी साथ रहते हैं, महादेव भी।
देवाधिदेव ने यह बात भगवती पार्वती से अपने अनुभव की कही। उन्होने कहा कि भगवान् श्रीहरि तो अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड में सभी जगह व्यापक हैं। किन्तु मैं यह जानता हूँ कि, निश्छल प्रेम पूर्वक स्मरण किये जाने पर वे इस विपत्ति से अवश्य छुटकारा दिलायेंगे।वह अकारण कारुणा-वरुणालय और स्वयं प्रेम स्वरूप ही हैं-

तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ।
अवसर पाइ वचन एक कहेऊँ ।।
हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना ।।

तो भगवान् तो स्वयं प्रेम स्वरूप हैं।उनके समान अपने भक्तों के प्रति प्रेम या सेवा और किसी में सम्भव नहीं।
भगवान् भक्त के हैं और भक्त भगवान् के।
यही भाक्त (प्रेम) सम्बन्ध सतत और अटूट है। देवर्षि नारद अपने भक्ति-सूत्र में “भक्ति” को परम प्रेम स्वरूप ही कहते हैं।
भगवान् के प्रेमी और उनके भक्तों का यह प्रेम अनश्वर है।इसी प्रेमाविष्ट दशा में वह कर्म-बन्ध को तोड़कर तज्जन्य जन्म से विरहित होकर निश्चिन्त हो जाता है।
इसीलिए वह ” शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः ” श्रुति वाक्यतः अमृतमय दीखता है।
इस परम प्रेममय भक्ति से भक्त , अमृत और तृप्त होता है-

सा तु अस्मिन् परमप्रेमस्वरूपा।
अमृतस्वरूपा च।
यत् लब्ध्वा पुमान् सिद्धः भवति।
अमृतः भवति तृप्तः भवति।

वस्तुतः परम के प्रति प्रेम ही भक्ति पद वाच्य है।वह भक्ति ही प्रेम है या प्रेम ही भक्ति है।
अनन्यशरणागत बाबा तुलसी एक अवसर पर भक्ति की दृढ़ता प्रेम द्वारा मानते हैं, तो दूसरे क्षण परम प्रेम स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति को जोग,जप,ज्ञान और वैराग्य से न मानकर एकमेव प्रेम द्वारा ही मानते हैं।और एक मार्मिक प्रसंग में उत्तर काण्ड में गुरु वशिष्ठ द्वारा जन्म-जन्मान्तर से विषयासक्त जीव की वैषयिक-मलिनता का आत्यन्तिक विनाशीकरण एकमात्र प्रेम-भक्ति के जल से होता है।क्योंकि मल की शुद्धि मल से नहीं, बल्कि अत्यन्त शुद्ध जल से ही सम्भव है-

छूटहिं मल कि मलहिं के धोए।
घृत कि पाव कोइ बारि बिलोए।
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभयन्तर मल कबहुँ न जाई।।

अतः निष्काम प्रेमी और भगवद् भक्त श्रीभरत जी महाराज एवं भगवान् के अत्यन्तात्यन्त प्रिय हनुमान् जी महाराज
हम जैसे विषयासक्त जीवों पर करुणा भरी निगाह फेर दें तो उनके प्रेम और भक्ति का लवमात्र हममें आ जाये, जिससे यह मानव-जन्म सार्थक हो सके।

।। हरिश्शरणम् ।।

http://shishirchandra.com/2019/01/01/प्रेम-ही-भक्ति-है/

प्रवृत्ति एवं निवृत्ति

प्रवर्तनं प्रवृत्तिः किसी संसार व्यापार में प्रवृत्त होना या लगना प्रवृत्ति है। इन्द्रियादि के वशीभूत होकर उनके विषयों में जीव का अनेक शरीरों में संचरण निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।यही नैसर्गिक गति भी है। किन्तु अनेकानेक जन्मों से गतिशील यह प्रक्रिया एक न एक दिन तो अवश्य ही मानवीय वेदना और चेतना को को यह समझने के लिये मजबूर करती है कि आखिर यह गतानुगतिको लोकः न लोकः पारमार्थिकः की वस्तुस्थिति क्या है।
हालाँकि सनातन धर्मावलंबियों में यह बात बड़ी विधिक रूप से रखी गई है जिसमें मानवीय आयु को एक सौ वर्षों का होना कहा जाता है- जीवेम शरदः शतम्।
और वेदादि शास्त्र जीने ही नहीं बल्कि सोचने, समझने, सुनने और बोलने की शक्ति रहने के लिए बारम्बार ईश्वर से प्रार्थना करते दीखते हैं। यह तो हुई प्रवृति की बात, जिसमें सत् शास्त्रों और सद् गुरुजनों के निर्दिष्ट आचरणों पर चलते रहने से मन की वृत्ति एक ऐसे मुकाम पर आ जाती है कि आखिर यह कब तक?
और इसी संसारी प्रवृत्ति से ऊब कर यहीं, इसीके एक छोर से प्रारम्भ होता है, निवृत्ति का पथ। जगत् के भोग से वितृष्ण होने और जगत् को ही कृष्ण मान लेने की दृष्टि यदि भगवान् या उनके प्यारे भक्तों की कृपा से मिल जाय, तो यही तो निवृत्ति है।
इस निवृत्ति मार्ग पर चलने की हमारी सनातनी व्यवस्था का स्मरण ब्रह्माण्ड के परम शिक्षक सोलहवें अध्याय में करते हैं-
प्रवृतिं च निवृत्तिं च,
जनाः न विदुः आसुराः।
न शौचं नापि च आचारः,
न सत्यं तेषु विद्यते ।।
अब सोचिए किसमें प्रवृत्त होया जाय और किससे निवृत्त, यह आसुरी भाव यानी कि रजोगुणी और तमोगुणी लोग नहीं जानते।
ऐसे लोगों में पवित्रता नहीं और सत्य परायणता भी नहीं।
बचपन में एक श्लोक पढ़ा करते थे-
अकृत्वा परसन्तापं अगत्वा खलमन्दिरम्।
अनुल्लंघ्य सतां मार्गं यत् स्वल्पमपि तद् बहु ।
दूसरों के आनंद, सुख, वैभव को देख कर कोई द्वेष नहीं करना क्योंकि यह तो अपने अपने प्रारब्धवश उस परं का ही वैभव है ,इससे कुण्ठा क्यों? और यह भाव आए विना वैकुण्ठ की प्राप्ति भी असंभव ही है। दुर्जनों के मध्य न जाना , सदाचरण की प्रवृत्ति न छोड़ कर ,जो थोड़ा भी बने ,वही बहुत है।
अब सोचें तो प्रवृत्ति मार्ग यानी कि कर्मकाण्ड का व्यापक उपदेश हमारे वेद शास्त्र करते हैं, जिसमें अमुक -अमुक कामनाओं की प्राप्ति हेतु भिन्न-प्रभिन्न विधियाँ सनातन काल से चली आ रही हैं।
रही निवृत्ति की बात, तो यह तो वेदों के अन्तिम भाग वेदान्त शास्त्र का विषय है, जिसे ज्ञानकाण्ड भी कहते हैं।
यह निवृत्ति विषयक चर्चा बहुत थोड़ी है।
लेकिन अपनी ऊपर की बात का सन्दर्भ लें , तो उसमें एक मनुष्य की सौ वर्ष की आयु में चार आश्रमों का प्रतिपादन है।
इसे पचीस-पचीस वर्षों में बाँटा गया है-
प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम है, जिसमें गुरु के समीप जाना(उपनयन)है।
यहीं गुरुकृपा से वेदारम्भ होता है, जिससे आत्मा -अनात्मा का विचार सुदृढ हो जाता है। आगे संसार की रक्षा और सृष्टि की प्रक्रिया जारी रखने या वंश परम्परा को सुरक्षित रखने के लिए समावर्तन संस्कार होता है, जिससे गुरु आज्ञप्त होकर विवाह-संस्कार और पचीस वर्ष की गृहस्थ आश्रम परिपाटी पूरी होती है।
यही वह गृहस्थ आश्रम है, जो अन्य सभी तीनों का आधारभूत है-धन्यो गृहस्थाश्रमः।
क्योंकि इसके बिना तो किसी आश्रम की कल्पना भी सम्भव नहीं ।
इसके बाद का तृतीय आश्रम है, वानप्रस्थ, इसमें वनवासी-गिरिवासी की तरह अत्यंत अल्प आवश्यकता रखते हुए जीवन निर्वाह का व्रत पालन करना होता है । इसीमें गृहस्थोत्तर पचास वर्ष से आगे की व्यवस्था वन में निवास करते हुए तन्निष्ठ आचरण, कम से कम आवश्यकताओं से सरोकार रखने वाली
होती है, चाहे वन में जाकर हो अथवा कहीं भी रहकर। वस्तुतः वानप्रस्थी पना एक भाव है, यदि वन में जाकर भी संसार निवृत्ति नहीं, तो गृहस्थ ही ठीक।
साधु परम्परा में कहते हैं कि यह पचास से पचहत्तर का वानप्रस्थ तो पचास से आगे की गिनती ही संकेत कर देती है-
हर एक गिनती आगे जाने पर-
इक्यावन, बावन ,तिरपन ,चौवन,पचपन, छप्पन, सत्तावन और अठ्ठावन तक कम से कम पाँच बार वन -वन की प्रवृत्ति होती जाती है। मतलब कि पचास से आगे की गिनती में सात-आठ साल तक तो चलेगा,लेकिन उससे आगे नहीं-

क्यों? क्योंकि उससे आगे की गिनती तो सीधे शठ (दुष्ट) ही सिद्ध कर देगी-

उनसठ, साठ इकसठ, बासठ, तिरसठ, चौंसठ, पैंसठ, छासठ, सतसठ, अठसठ।

इससे आगे भी ख्याल नहीं तो वह डुबो तो देगा ही- उनहत्तर, सत्तर आदि ।
इस प्रकार पचास से पचहत्तर तक यदि भव सागर से तर (डूब) कर पार करके आगे इससे निकलने की प्रवृत्ति नहीं उपजी तो तर (डूब) ही जाना है।
मतलब कि पचहत्तर से आगे सौ वर्ष की आयु सन्यास आश्रम है, जहाँ सर्व कर्म सन्यास यानी कि एषणा त्रय( सुत-वित-लोक) त्याग ही ध्येय बन जाता है।
यही चतुर्थाश्रम और अन्तिम आश्रम है। यही निवृत्ति या वेदों के ज्ञान काण्ड की पराकाष्ठा है। और सोचिए यह सब हमारे सनातन धर्म में विभिन्न संस्कारों और आश्रमों के माध्यम से बड़े सहज रूप से समझा दिया गया है।
इस तरह हम मानव प्राणियों की वृत्ति की प्रवृत्ति और निवृत्ति को सरल रीति से ऋषियों ने कठिन रीति से भी-
उत्तिष्ठत, जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत।
उठो ,जागो और एक के बाद एक श्रेष्ठ मार्ग पर बढ़ते हुए निवृत्त हो जाओ।
सुलभ कर दिया है। भगवान् और उनके प्रेमी भक्त जन कृपा करें।

।। हरिश्शरणम्।।

http://shishirchandra.com/2018/12/21/प्रवृत्ति-एवं-निवृत्ति/

आत्मा की अनुभूति

आत्मा की अनुभूति का विचार आने पर एक अद्भुत आनन्द की लहर दौड़ जाती है। यह मानव जीवन इसीलिये मिला भी लगता है कि इसी शरीर( पिण्ड ) से ही आत्मानुभूति हो जाये।

यह जीवात्मा ही आत्मानुभूति यानी कि परमात्मा की अनुभूति कर भी सकता है।और उसकी अनुभूति स्वात्मा का ही विषय है, क्योंकि वस्तुतः दोनों एक ही हैं। एक परमात्मा अंशी है और दूसरा जीवात्मा उसका अंशमात्र।
दोनों की तुलना करने पर बहुत सूक्ष्म भेद प्रतीत होता है-
यह जीवात्मा एक असीम वृत्त में है, जिसकी परिधि कहीं नहीं है। लेकिन इसका केन्द्र एक स्थान में निश्चित है। इसी प्रकार परमात्मा भी एक असीम वृत्त है,जिसकी भी परिधि कहीं नहीं है। जीवात्मा का केन्द्र जैसे एक स्थान में निश्चित है, लेकिन इसका कोई केन्द्र निश्चित नहीं।वस्तुतः इस परमात्मा का केन्द्र सर्वत्र है।
और इसीलिये यह परमात्मा सभी हाथों द्वारा काम करता है, सभी नेत्रों द्वारा देखता है, सभी पैरों द्वारा चलता है, सभी शरीरों द्वारा श्वाँस-प्रश्वाँस करता है, सभी जीवों में वास करता है, सभी मुखों द्वारा बोलता है और सब मस्तिष्कों द्वारा विचार भी करता है- सर्वतोक्षिशिरोबाहु… इत्यादि श्रुति वाक्य प्रमाण हैं-
सहस्रशीर्षापुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं स्पृत्वात्यतिष्ठद् दशांगुलम्।।

इत्यादि वेद वाक्य भी उसी परमात्मा की अनन्तता के प्रमाणपत्र हैं, जिसका अंशी यह जीवात्मा है। यदि यह जीवात्मा भी अपनी आत्म चेतना को अनन्त गुनी कर ले ,तो यह भी परमात्म स्वरूप प्राप्त कर सकता है, यानी कि आत्मानुभूति कर सकता है।
अब शरीर में उस परमात्मा का वास उक्त श्रुति से हृदय देश में अंगुष्ठ प्रमाण सिद्ध है, ऐसा इसके अन्यतम भाष्यकारों -सायणाचार्य एवं उव्वट-महीधर आदि ने व्यक्त किया है।
सर्वशास्त्रमयी गीता – सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः (15/15) और – ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति( 18/61) भी परम आत्मा को हृदय देश में विराजमान मानती है।
अब जब ईश्वर हृदय देश में विराजित है, तब हृदय को ही महत्व देते हुए इसी के परि संस्कार और परिशुद्धि की आवश्यकता है। बुद्धि के परिसंस्कृत होने पर सैकड़ों विज्ञानों का आविष्कार हुआ है और आगे, प्रायः भोग-सामग्रियाँ ही एकत्रित होती रहेंगी, जिनसे नानात्व में विचरते हुए, भटकाव ही सम्भव है।
अन्तिम ध्येय तक पहुँचाने की क्षमता हृदय में ही है।बुद्धि द्वारा अगम्य विषय तो शुद्ध हृदय ही देख सकता है।जिसका हृदय स्फूर्तिमय हो जाता है वह सर्व हृदय की बातें जान सकता है, जहाँ तर्क और बुद्धि कभी भी नहीं पहुंचे हैं।
स्वामी विवेकानंद जी ने कहा कि आत्मा की अनुभूति का पढ़े लिखे होने से कोई मतलब नहीं है।वे कहते हैं-
यदि तुम किसी का प्राण लेना चाहो तो,तुम्हें ढाल-तलवार आदि शस्त्रों से सज्जित होना होगा।परन्तु आत्महत्या करनी हो तो केवल सुई ही पर्याप्त है।इसी तरह यदि दूसरों को सिखलाना हो तो बहुत सी बुद्धि और विद्वत्ता की आवश्यकता होगी, किन्तु आत्मानुभूति के लिए यह आवश्यक नहीं है।इसके लिये तो हृदय-शुचिता आवश्यक है।और जिनका हृदय शुद्ध है, वे धन्य हैं, क्योंकि उन्हें आत्मा का अनुभव अवश्य होगा।”
श्रीमदाद्य भगवत्पाद शङ्कर इस बात में एक युक्ति देते हैं।वे कहते हैं कि किसी भी तरह की भूख-प्यास, चिन्ता, आरोग्य, कष्ट, दर्द, रोग, बन्धन-मोक्ष आदि का अनुभव तो अपने आप स्वयं ही को होता है, दूसरों द्वारा उनका ज्ञान तो आनुमानिक ही है। इसी तरह आत्मा की अनभूति तो अपने हृद्देश में विराजित आत्मा में ही ऐदंप्राथम्येन सम्भव है-

बन्धो मोक्षः च तृप्तिः च,
चिन्तारोग्यक्षुधादयः।
स्वेनैव वेद्याः यज्ज्ञानं,
परेषाम् आनुमानिकम्।।
– विवेकचूडामणि- 476 ।
इसलिये संसार के भोगमात्र का भोग ही न करने हेतु जन्मे इस मनुष्य को आत्मा की अनुभूति इसी शरीर से इसी जन्म में सभ्भव है।और यदि -नर तन पाइ विषय मन देहीं की स्थिति बनी रहती हैं तो पलटि सुधा ते शठ विष लेहीं भी अवश्यंभावी है।
भगवत्पाद शङ्कर भी इसी की पुष्टि करते दीखते हैं, जब वे कहते हैं कि ,जो लोग आराममय और विलासिता पूर्ण जीवन की इच्छा रखते हुए आत्मानुभूति की चाह रखते हैं, वे सभी उस मूर्ख के समान हैं, जिसने नदी पार करने के लिए एक मगर को लकड़ी क लट्ठा समझ कर पकड़ लिया है। वह मगर उसे अवश्य ही खा डालेगा नदी पार करने की बात तो बहुत दूर है-

शरीरपोषणार्थी सन्,
य आत्मानं दिदृक्षति ।
ग्राहं दारुधिया धृत्वा,
नदीं तर्तुं स इच्छति।।
– विवेकचूडामणि-86।
इस तरह आत्मा की अनुभूति तो विशुद्ध हृदय में ही साक्षाद् की जा सकती है।वह नित्यबोध, स्वस्वरूप, केवलानंद रूप, निरुपम, कालातीत, नित्य मुक्त, निश्चेष्ट, आकाशवद् निःसीम, निष्कल,निर्विकल्प, परमात्मा पूर्ण मनोयोग से हृल्लीन दशा में आत्मा द्वारा अनुभूत हो रहा है।और जिन्हें यह अनुभव हो गया, उनके आनंद की कोई सीमा नहीं-

किमपि सततबोधं केवलानन्दरूपं,
निरुपम-मतिवेलं नित्यमुक्तं निरीहम्।
निरवधि गगनाभं निष्कलं निर्विकल्पं,
हृदि कलयति विद्वान्ब्रह्म पूर्ण समाधौ।।

– विवेकचूडामणि- 409 ।

।।हरिश्शरणम्।।

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अहैतुकी भक्ति

अहैतुकी अर्थात् बिना किसी हेतु के भक्ति , सोचने पर बड़ा अटपटा सा लगता है।बिना किसी हेतु या कारण के इस संसार में कौन है जो किसी भी देवतादि की भक्ति करेगा। आज जहाँ भी देख लीजिए , जो भी पूजा, पाठ ,जप, तप,व्रत किये जा रहे हैं ,उन सबके पीछे कोई न कोई कामना अवश्य रहती है। यह कामना ही तो हेतु या कारण है, जिसकी पूर्ति के लिए हम देवार्चनादि में प्रवृत्त होते हैं।

अब प्रश्न यह है कि कामना-भेद से भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की पूजा अनादि काल से चली आ रही है – स्वर्गकामो यजेत , इत्यादि वेद -वाक्य प्रमाण हैं कि ,हमारे अनुष्ठान प्रायः सकाम,सहेतु ही प्रायोजित होते चले आ रहे रहे हैं। अब इसमें कठिनाई क्या है, यही कारण है बार -बार शरीर धारण के बन्धन से मुक्त न होने का। तब इसका मतलब है कि देवार्चन और अनुष्ठान तो हों ,किन्तु सभी सकाम या सहेतुक नहीं। वाल्मीकि प्रमाण हैं, कि महाराज दशरथ ने अपने जीवन भर अनेक यज्ञानुष्ठान निष्काम निर्हेतुक ही किए थे। विशेष परिस्थिति में अत्यन्त अनिवार्य होने पर ही उन्होंने-पुत्रकाम शुभ -यज्ञ करावा।
और गीतादि शास्त्र इस बात के प्रबल प्रमाण हैं कि- शरीर धारण किए हुए प्राणी का शरीर त्याग करना सुनिश्चित है।इसके बाद दूसरी अर्धाली में बड़ा जोर देकर यह बात भी आती है कि मरे हुए का जन्मना भी उतना ही सुनिश्चित है।
तब चार पुरुषार्थों में अन्तिम वाला मुक्ति क्या है? क्या श्रीभगवान् मुक्ति का कोई अन्य अर्थ स्वीकारते हैं। इसका उत्तर वह स्वयं देते हैं कि इस मुक्ति के लिए अनेक बार जन्म ग्रहण करते -करते शनैः शनैः मन और बुद्धि.की शुद्धि होते जाने से मुक्ति का मार्ग. प्रशस्त होता है।
जब भगवान् को भी यह प्रतीत होता कि अमुक व्यक्ति जन्म-मृत्यु के पाश से छूटना चाहता है।इसकी व्याकुलता चरम पर है, यह कर्म-भोग से त्रस्त हो गया है, तभी उसे अपनी ओर ऐसा आकृष्ट करते हैं, कि वह अनेक जन्मार्जित प्रारब्ध को तत्काल त्याग कर, सदा -सदा के लिए उनके वैकुण्ठ-धाम को प्राप्त कर लेता है।
इस मुक्ति के न होने का साधारण सा कारण स्पष्ट दीखता है कि जब तक हमारी भगवद्भक्ति या प्रीति किसी हेतु , कारण या कामना को लेकर होती रहती है हम मुक्त हो ही नहीं सकते।
क्योंकि कोई हेतु, कारण या कामना पूर्ण होते ही, दूसरी कामना आ जाती है और इसके बाद तीसरी और चौथी।इस तरह एक हेतु के बाद अनन्त हेतुओं की पूर्ति और इससे अनन्त जन्मों का बन्धन चक्रवत् चलता रहता है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि सदाचार-सम्पन्न मनुष्य का जीवन जीते-जीते इन कामनाओं, हेतुओं से स्वतः वैराग्य होता है और मुक्ति का मार्ग स्वतः लक्ष्य पूर्ण कर लेता है, इसी को सोचकर भगवान् उत्तर देते हैं-

अनेक-जन्म-संसिद्धिः,
ततो याति परां गतिम्.

और इस सहेतुक, सकाम भक्ति की सारी प्रक्रिया में मेरे मन में भगवत्कृपया यह बात भी उपजती है कि, जब परमात्मा सभी से निर्हेतुक प्रेम करते हैं, यह तो उनका स्वभाव है।

अकारणकरुणावरुणालय श्रीभगवान् का स्वयं सिद्ध भाव अपने भक्त में प्रीति का होता है ,उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए। अरे सर्व कारण कारण अपने भक्त को अपने स्वभाव का देखना चाहते हैं। उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए।जो सबको सब कुछ देता है ,उसे क्या चाहिए?
अब ऐसे समझें कि जब परमात्मा का निर्हेतुक, निष्काम ,निष्कारण स्वभाव है, तब उनके अंशभूत जीवात्मा का भी मूल स्वरूप-स्वभाव जब तक निर्हेतुक नहीं होगा, तब तक मुक्ति असम्भव है।
अरे भाई भगवान् के अनेकानेक प्रह्लाद आदि भक्त हुए हैं, जिन्होंने भगवान् के बारम्बार वर याचना का आग्रह करने पर ,यही कहा था कि , हे भगवान्! मुझे अनेक जन्मों में आपने बहुत कुछ दिया है, और देते ही चले आ रहे हैं, अब मुझे कुछ भी नहीं चाहिए और यदि आपका देने का हठ ही है, तो अब यही दीजिए कि मेरे जन्म-जन्म का मँगतापना ही छूट जाय।
नित्य-मुक्त-जीवात्मा का मूल स्वभाव निर्हेतुक, निष्काम और निष्कारण ही है।वह जब अपने अंशी के इसी मूल भाव में होगा मुक्ति तभी होगी।
श्रीकृष्ण प्रेम में पागल हो जाने आग्रह हमारे श्रीरामकृष्ण परमहंस देव का था ,तो हमेशा श्रीकृष्ण- प्रेम में उन्मत्त रहनेवाले श्रीचैतन्य महाप्रभु भी इसी नाम -लीला और धाम में बेसुध रहते थे।और यही कारण है कि उन्होंने एकमात्र आठ पद्यों का शिक्षाष्टक ही स्वयं के जीवन में निर्देश किया था, जिसे उनकी कृति कहा जाता है।उनके परम षट् शिष्य-गणों- रूपगोस्वामी प्रभृति भगवद् भक्तों ने अनेक भक्ति-परक रचनाएँ और व्याख्याएँ रची हैं, जो रस-पिपासु भगवद्-भक्तों की अमूल्य निधियाँ हैं।
श्रीचैतन्य महाप्रभु ने जिस निर्हेतुक, निष्कारण और भक्ति के लिए भक्ति का अत्यन्त प्रेमवश उपदेश किया था, उसमें भी ,वही प्रहलाद जैसी प्रेमानुरक्ति ही प्रतीत होती है। यही नित्य मुक्त अंशी और उनके अपने अंशभूत जीवात्मा का स्वतः सिद्ध स्वभाव है।जब उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए, तब इस अंशभूत तुच्छ को भी कुछ नहीं चाहिए।वे कहते हैं-

न धनं न जनं न सुन्दरीं
कवितां वा जगदीश कामये।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे
भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि।।

ऐसी अहैतुकी भक्ति ही पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी-जठरे-शयनं से से मुक्त कर सकती है।

श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे! मुरारे!
हे नाथ! नारायण! वासुदेव! मुरारे!

।।हरिश्शरणम्।।

https://shishirchandra.com/2018/11/22/अहैतुकी-भक्ति/

नाम में देश-काल-पात्र का अविचार

भगवान् या भगवती का नाम स्मरण करने में देश-काल-पात्र का कोई भी विचार नहीं है। मतलब कि किसी भी जाति कुल में उत्पन्न कोई भी व्यक्ति भगवन्नाम के स्मरण में किसी भी स्थान अथवा काल में स्वतंत्र है। और इसका स्वारस्य ये भी है कि नाम का सतत मानसिक/हार्दिक स्मरण करने से अनायास ही वह स्वयं होने लगता है।इस तरह कि स्थिति को ही अजपा जप की स्थिति समझ सकते हैं।
गीता में भगवान् कहते भी हैं कि जिस जिस भाव को स्मरण करता हुआ प्राणी अन्त में शरीर त्यागता है ,वह उसी स्वरूप को प्राप्त कर लेता है-
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजन्त्यन्ते कलेवरम्।
तं तमैवेति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।

अब इस बात यह भी तात्पर्य हुआ कि नाम स्मरण का विस्मरण किसी भी स्थिति में नहीं होना चाहिये। चैतन्य महाप्रभु भी इसी पर ऐकमत्य देते दीखते हैं। उनका कहना है कि हे भगवान्! आपने अनेक लोगों की अनेकानेक रुचियों को देखते हुए अपने नित्य-सिद्ध अनेक नामों को प्रकाशित कर दिया है। और इतना ही नहीं उन-उन नामों में अपनी सम्पूर्ण शक्ति भी भर दी है,जिनका स्मरण करने में किसी देश -काल-पात्र का कोई विचार नहीं।
ऐसे प्रभु-नाम-स्मरण से यह भवसागर आसानी से पार किया जा सकता है।और इस कलिप्रभावग्रस्त प्राणी के लिये इससे सुन्दर कोई साधन भी नहीं।कलिपावनावतार बाबा तुलसी अपनी सभी रचनाओं में इसे बारम्बार स्वीकारते हैं।प्रसिद्ध पंक्ति है-

कलियुग केवल नाम अधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।

इस प्रसंग में एक बात बरबस स्मरण आती है। पिछले दो वर्ष पहले मेरे पिताजी का जब निधन हुआ, उसी दिन रात्रि में मेरे कन्तित ग्रामनिवासी पण्डित जी घर में पधारे। अनेक चर्चाओं के मध्य उन्होंने एक प्रश्न कर दिया कि भगवान् के नाम -रूप -लीला का अशुचि अवसरों पर भी स्मरण होता रहता है। क्या यह ठीक है या नहीं?
मैंने कहा महराज! यह तो मेरे साथ भी होता है और ऐसा अनेक ऐसे लोगों के साथ भी अवश्य ही होता होगा।इसमें तो हमारी विवशता ही दीखती है,क्या करें।
एक बात मैने उस अवसर पर यह भी कही कि , अपवित्र या पवित्र सभी दशाओं में ,किसी भी अवस्था को प्राप्त कर लेने पर भी ,भगवान् पुण्डरीकाक्ष का स्मरण मात्र ही व्यक्ति को बाहर-भीतर से पवित्र कर डालता है।

ओम् अपवित्रः पवित्रो वा,
सर्वावस्थां गतोपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं ,
स वाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।

यह मन्त्र तो हम सभी अवसरों पर उच्चारण करते हैं और पवित्र हो जाते हैं।तब मुझे लगता है कि भगवद्स्मरण किसी भी दशा में हो जाय तो कोई हर्ज नहीं।यह तो सतत स्मरण का परिणाम है और होना भी चाहिए।
अस्तु , यह बात मेरे मन में अबकी बार के ” कल्याण ” अंक को देख कर उठी।
उसमें इसी प्रकार की बात अपने गुरुवर्य मलूक पीठाधीश्वर श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज के शिक्षा गुरु गोलोकवासी सन्त श्रीगणेदास भक्तमाली जी के पत्र-पुष्प से उद्धृत है। जो बातें लिखी गई हैं, उनका उल्लेख मलूकपीठाधीश्वर श्रीमहाराज जी के सत्संग-प्रसंगों प्रायः होता रहता, जिसे अनेक बार मैंने भी सुना है और सुनकर रोमांचित होता रहता हूँ। दो घटनाओं का उल्लेख इस प्रकार है-

1- एक महात्मा शौच-क्रिया सम्पादन काल में अपनी जीभ को दाँतों से दबाए रहते थे, और निवृत्त होने पर ही उसे छोड़ते थे।इसलिए कि प्रभु-नाम न निकल जाय और प्रभु प्रकट न हो जायँ।ऐसी बात जान कर उनके एक शिष्य ने कहा कि महराज यदि ऊसी अवस्था में प्राण छूट गए तो क्या होगा? यह सुनकर उन सन्त ने अपने शिष्य को धन्यवाद दिया और स्वीकार किया कि भगवद् स्मरण अभ्यास वशात् किसी भी काल में होता है, तो यह तो होना ही चाहिए।ध्यान यही रहे वाचिक न हो।

2- दूसरी घटना में हनुमानजी महाराज और प्रभु श्रीराम का स्मरण हुआ है।
इसके अनुसार एक व्यवसायी को प्रभु स्मरण का समय नहीं मिलता था, तो वह शौच-क्रिया-सम्पादन-काल में ही भगवान् के नाम का मानस स्मरण कर लेता था। यह जानकर हनुमानजी को गुस्सा आता था।एक दिन उन्होंने उसकी पीठ पर एक लात से प्रहार कर दिया।भक्त को थोड़ी पीड़ा हुई, वह अपनी क्रिया सम्पादित करबाहर निकल आया। उधर हनुमानजी महाराज जब प्रभुश्रीराम की सेवा में पहुँचे, तब भगवान् ने कहा कि हनुमान् मेरी पीठ में बड़ी पीड़ा हो रही है। हनुमान् जी ने देखा और कारण पूछा।तब प्रभु ने कहा कि तुम्हींने ही मारा है। उन्होंने कहा कि मेरा भक्त ,जो शौच-क्रिया में मेरा स्मरण कर रहा था यदि उसे प्रहार लग जाता तो वह तो सिधार जाता, अतः तत्काल मुझे उसकी रक्षा करने के लिए अपनी पीठ वहाँ लगानी पड़ी। हनुमान् जी महाराज ने अपनी भूल स्वीकार करके प्रभु से क्षमा माँगी।
अस्तु इन घटनाओं और उनके उल्लेख का मतलब यही है कि भगवन्नाम का स्मरण सतत सभी पवित्रापवित्र कालों में हो सकता है।
सभी वर्णों में उत्पन्न भगवान् के भक्तों और यहाँ तक कि पशु-पक्षी योनियों में भी जन्मे प्राणियों को भी प्रभुनाम स्मरण ने जीवन से मुक्त कर परम लोक में प्रतिष्ठित कर दिया है-

गनिका गीध अजामिल तारे,
सबरो गो गजराज।
सूर पतित पावन करि कीजै,
बाँह गहे की लाज।

पतित पावन नाम को सार्थक करनेवाले परम प्रभु के नाम आश्रय ही मुक्ति का परम चरम उपाय है। और यह नामाश्रय कोई भी किसी भी काल में ग्रहण कर सकता है।यह मेरा मत नहीं अपितु भगवान् के सभी प्यारे भक्तों का अभिमत है। और जब श्रीभगवान् देश-काल से परे और सभी हाल में हममें तुममें खड़ग खम्भ में सनातन सतत सुप्रतिष्ठित हैं।तब उनसे परे कौन देश काल है ।अतः अणु-परमाणु में विद्यमान का निरन्तर स्मरण मुक्ति दायक हो-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा

।।हरिश्शरणम्।।

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